बृज खंडेलवाल

आख़िरकार देश की सर्वोच्च अदालत को दख़ल देना पड़ा। यह सिर्फ़ वृंदावन में प्रस्तावित रिवर फ्रंट परियोजना पर रोक लगाने का मामला नहीं है। यह उस सोच पर कड़ा तमाचा है जो एक जीवित नदी को सिर्फ़ खाली पड़ी ज़मीन मानती है, जिस पर जब चाहो सीमेंट और कंक्रीट बिछा दो। बृज वृंदावन देवालय समिति की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केशी घाट के पास चल रहे निर्माण कार्य पर तुरंत रोक लगा दी। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार से छह सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। यदि अदालत समय रहते हस्तक्षेप नहीं करती, तो मिट्टी भरकर बनाया जा रहा विशाल प्लेटफॉर्म यमुना के एक और हिस्से को हमेशा के लिए कंक्रीट के नीचे दफ़ना देता। यह कोई पहली बार नहीं है जब अदालत को सरकार की नाकामी की भरपाई करनी पड़ी हो। पिछले एक दशक से न्यायपालिका बार-बार यमुना की रक्षा के लिए आगे आ रही है, जबकि सरकारें विकास के नाम पर नदी का गला घोंटने में लगी हुई हैं।
साल 2015 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने यमुना के चिन्हित बाढ़ क्षेत्र में हर तरह के निर्माण पर रोक लगा दी थी। अवैध निर्माणों की पहचान कर उन्हें हटाने के आदेश भी दिए गए थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में साफ़ कहा कि बाढ़ क्षेत्र नदी का अभिन्न हिस्सा है, कोई निर्माण स्थल नहीं। दिल्ली पुलिस तक को बाढ़ क्षेत्र में बैरक बनाने की अनुमति नहीं मिली। अदालत ने तीखा सवाल किया था कि जब बाढ़ का पानी स्वयं सुप्रीम कोर्ट परिसर तक पहुंच चुका है, तब कोई वहां निर्माण करने की ज़िद कैसे कर सकता है? हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी यमुना के बाढ़ क्षेत्र में बनी अवैध कॉलोनियों को पूरी तरह ग़ैर-क़ानूनी बताते हुए नए निर्माण और मरम्मत तक पर रोक लगा दी। साफ़ है कि न्यायपालिका लगातार वही बात दोहरा रही है जिसे सरकारें सुनना ही नहीं चाहतीं—बाढ़ का मैदान नदी का शरीर है, उस पर कब्ज़ा नहीं किया जा सकता।
अगर आज यमुना के बाढ़ क्षेत्र का कुछ हिस्सा बचा हुआ है, तो उसका श्रेय सरकारों को नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को जाता है। आगरा का रिवर कनेक्ट अभियान, दिल्ली का यमुना जिए अभियान, वृंदावन के पर्यावरण प्रेमी और अनेक सामाजिक संगठन वर्षों से अदालतों के दरवाज़े खटखटा रहे हैं। उन्होंने सबूत जुटाए, जनहित याचिकाएँ दायर कीं और हर उस परियोजना को चुनौती दी जो नदी के अस्तित्व के लिए ख़तरा बन रही थी। अधिवक्ता राहुल चौधरी और आकाश वशिष्ठ जैसे लोगों ने वर्षों तक अदालतों में यह लड़ाई लड़ी। यह संघर्ष बिना किसी प्रचार और सरकारी मदद के चलता रहा। सच तो यह है कि यमुना की जो थोड़ी-बहुत कानूनी सुरक्षा बची है, वह नागरिक समाज की बदौलत है, सरकार की मेहरबानी से नहीं।
पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य के अनुसार तस्वीर बेहद ख़ौफ़नाक है। यमुना में पहुंचने वाले कुल प्रदूषण का लगभग अस्सी प्रतिशत केवल दिल्ली के 22 किलोमीटर लंबे हिस्से में नदी में गिरता है। वहां घुलित ऑक्सीजन का स्तर कई बार शून्य तक पहुंच जाता है। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर गंभीर चिंता जता चुका है। दूसरी ओर मथुरा और वृंदावन में रोज़ाना लाखों लीटर बिना शोधन का सीवर सीधे यमुना में छोड़ा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पिछले दस वर्षों में नमामि गंगे जैसी महत्वाकांक्षी योजना पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद यमुना की हालत क्यों नहीं सुधरी? नदी आज भी दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में गिनी जाती है। मछलियाँ कम होती जा रही हैं, पक्षियों का बसेरा उजड़ रहा है, जैव विविधता घट रही है, बाढ़ क्षेत्र सिकुड़ रहा है और अतिक्रमण लगातार बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर अधिकारी नए-नए टाइल्स लगे घाटों पर तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त हैं। असली बीमारी छिपाकर केवल चेहरा चमकाने से नदी नहीं बचेगी। फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन के संयोजक जगन्नाथ पोद्दार का कहना है कि वृंदावन रिवर फ्रंट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसे वर्षों पहले नदी तट के विस्तार और सौंदर्यीकरण के नाम पर पेश किया गया था। तब भी इस योजना पर अदालतों ने सवाल उठाए थे। अब फिर उसी परियोजना को नए रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। इसका मतलब साफ़ है कि वैज्ञानिकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और अदालतों की चेतावनियों का सरकारी तंत्र पर कोई असर नहीं पड़ा। आज भी योजनाएँ जल विशेषज्ञ नहीं, बल्कि बुलडोज़र और ठेकेदार तय कर रहे हैं।
दुनिया के अनेक शहर अब अपनी नदियों को फिर से खुला बहने दे रहे हैं। कंक्रीट की दीवारें हटाई जा रही हैं ताकि नदियाँ अपने प्राकृतिक स्वरूप में लौट सकें। लेकिन भारत में तस्वीर उलटी है। यहां विकास के नाम पर नदी को सीमेंट की दीवारों और चौड़े प्लेटफॉर्मों में कैद किया जा रहा है। इसे विकास का नाम दिया जा रहा है, जबकि यह दरअसल पर्यावरण का विनाश है। जनचिंतक प्रोफेसर परस नाथ चौधरी ठीक कहते हैं कि ब्रज की पहचान यमुना से है। यदि यमुना मर गई तो घाट, मंदिर, परिक्रमा, संस्कृति और आस्था सब अपनी रूह खो देंगे। नदी के बिना ब्रज केवल इमारतों का शहर बनकर रह जाएगा। अब उत्तर प्रदेश सरकार के पास बहाने बनाने का वक़्त नहीं है। उसे प्रतीकात्मक सौंदर्यीकरण छोड़कर असली काम करना होगा। बिना शोधन का सीवर नदी में गिरना तुरंत बंद हो। यमुना में पर्याप्त पर्यावरणीय जल प्रवाह सुनिश्चित किया जाए। बाढ़ क्षेत्र से अतिक्रमण हटाए जाएँ। सीवेज शोधन संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलाया जाए। नदी को सांस लेने की जगह वापस दी जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस विनाश पर ब्रेक लगा दिया है। एनजीटी और विभिन्न उच्च न्यायालय वर्षों से कानूनी आधार तैयार कर चुके हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अपना फ़र्ज़ निभाया है। अब सबसे बड़ा सवाल सरकार से है; क्या वह अदालतों और जनता की आवाज़ सुनेगी, या फिर विकास के नाम पर यमुना को मिटाने का सिलसिला जारी रहेगा? ब्रज को बचाना है तो यमुना को बचाना होगा। क्योंकि जब नदी मरती है, तब केवल पानी नहीं मरता, बल्कि एक पूरी सभ्यता, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी उसके साथ बह जाता है।


