‘सीता राम’ से Apple तक: जब स्टीव जॉब्स भारत आए, लेकिन अधूरी रह गई नीम करोली बाबा से मुलाकात

स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा: नीम करोली बाबा से मिलने आए थे, लेकिन मुलाकात अधूरी रह गई
स्टीव जॉब्स 1974 में नीम करोली बाबा से मिलने भारत आए थे, लेकिन तब तक बाबा का निधन हो चुका था। जॉब्स ने कैंची धाम में समय बिताया और सात महीने भारत में आध्यात्मिक तलाश में रहे।

मोहिनी सेंगर। नई दिल्ली

असली तलाश थी भीतर की शांति की

साल 1974 में Apple के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स भारत पहुंचे थे। उस समय वे तकनीक की दुनिया के सफल कारोबारी नहीं, बल्कि जीवन के अर्थ और आध्यात्मिक जवाब तलाश रहे एक युवा थे। उनका लक्ष्य नीम करोली बाबा से मिलना था, जिनकी शिक्षाओं के बारे में उन्होंने अपने मित्र डैन कोटके के साथ पढ़ा था।

मुलाकात से पहले ही बदल गई कहानी

जॉब्स जब भारत पहुंचे, तब तक नीम करोली बाबा का 1973 में निधन हो चुका था। यानी जिस संत से मिलने की इच्छा उन्हें भारत तक खींच लाई थी, उनसे उनकी मुलाकात कभी नहीं हो सकी। इसके बावजूद जॉब्स ने कैंची धाम और उसके आसपास समय बिताया और भारत में करीब सात महीने आध्यात्मिक अनुभवों की तलाश में रहे।

‘सीता राम’ और सेवा का संदेश

नीम करोली बाबा, जिन्हें भक्त महाराजजी भी कहते हैं, भगवान हनुमान के अनन्य भक्त माने जाते थे। उनकी शिक्षाओं में प्रेम, सेवा, करुणा, सादगी और भक्ति को खास महत्व दिया जाता था। पश्चिम में बाबा की पहचान उनके शिष्य राम दास के जरिए भी व्यापक हुई।

क्या इस यात्रा ने Apple की सोच बदली?

जॉब्स की भारत यात्रा को उनकी सादगी, एकाग्रता और अंतर्ज्ञान की सोच से जोड़ा जाता है। हालांकि यह कहना कि Apple की सफलता सीधे नीम करोली बाबा की शिक्षाओं का परिणाम थी, एक निश्चित ऐतिहासिक तथ्य नहीं है। इतना जरूर है कि भारत का उनका अनुभव उनके जीवन और सोच में महत्वपूर्ण अध्याय रहा।

अब पर्दे पर दिख रही है बाबा की कहानी

नीम करोली बाबा की जिंदगी और उनके आध्यात्मिक संदेश पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने इसी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया है। विशाल चतुर्वेदी निर्देशित यह फिल्म करीब 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी और उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करते हुए चर्चा में आई। फिल्म के जरिए एक बार फिर यह सवाल सामने है, आखिर वह संत कौन थे, जिनकी तलाश में दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में से एक के संस्थापक भारत तक चले आए थे?