
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
दिल्ली के सत्या निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत ढहने और 7 लोगों की मौत के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार, दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू), दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) और अन्य संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पीजी और हॉस्टलों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। कोर्ट के समक्ष दाखिल जनहित याचिका में दिल्ली के छात्र आवासों का व्यापक स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट कराने और असुरक्षित इमारतों को खाली कराने की मांग की गई है।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की पीठ के समक्ष मामले को तत्काल सुनवाई के लिए रखा गया। याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय के कानून के छात्र अनिकेत कुमार गुप्ता ने अधिवक्ता उमेश कुमार के माध्यम से दाखिल की है। याचिका में सत्या निकेतन हादसे की स्वतंत्र और व्यापक जांच के साथ यह पता लगाने की मांग की गई है कि इमारत का निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुरूप हुआ था या नहीं और उसे पीजी या हॉस्टल के रूप में संचालित करने के लिए जरूरी मंजूरियां हासिल थीं या नहीं।
इमारत को निर्माण की मंजूरी मिली थी या नहीं?
हाईकोर्ट के समक्ष उठाए गए प्रमुख सवालों में यह भी शामिल है कि सत्या निकेतन की ढही इमारत वैध अनुमति के तहत बनी थी या नहीं। मामले में एमसीडी से निर्माण की मंजूरी, स्वीकृत बिल्डिंग प्लान, अतिरिक्त मंजिलों, बेसमेंट में किए गए बदलाव और इमारत के इस्तेमाल से जुड़ी अनुमति की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि यदि निर्माण स्वीकृत नक्शे से अलग था या कोई अनधिकृत निर्माण हुआ था तो इसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। साथ ही यह भी जांचने की मांग की गई है कि हादसे से पहले चल रहे मरम्मत या निर्माण कार्य ने इमारत की संरचनात्मक मजबूती को प्रभावित किया था या नहीं?
दिल्ली के पीजी और हॉस्टलों का होगा सुरक्षा ऑडिट?
याचिका में सत्या निकेतन के सभी पीजी, हॉस्टल और छात्र आवासों का तत्काल व्यापक स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट कराने की मांग की गई है। इसके बाद दिल्ली के दूसरे प्रमुख छात्र इलाकों में भी इसी तरह की जांच कराने का प्रस्ताव रखा गया है। इन इलाकों में विजय नगर, कमला नगर, मुखर्जी नगर, गांधी विहार, नेहरू विहार, हडसन लेन, गुरमंडी, करोल बाग, ओल्ड राजेंद्र नगर और लक्ष्मी नगर शामिल हैं। ऑडिट में स्वीकृत बिल्डिंग प्लान, इमारत के अनुमत इस्तेमाल, स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी, अनधिकृत निर्माण, अतिरिक्त मंजिलों, बेसमेंट में बदलाव, ऑक्यूपेंसी परमिशन और फायर एवं लाइफ सेफ्टी मानकों की जांच की मांग की गई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जिन इमारतों को तत्काल खतरा पैदा करने वाला पाया जाए, उन्हें खाली कराया जाए और वहां रह रहे छात्रों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराया जाए।
मालिक से लेकर इंजीनियर और अधिकारियों तक जांच हो
जनहित याचिका में हादसे की वजह और जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। इसमें भवन मालिक, बिल्डर, ठेकेदार, आर्किटेक्ट, स्ट्रक्चरल इंजीनियर, मरम्मत कार्य में शामिल लोगों और भवन सुरक्षा नियमों को लागू करने वाले सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच करने की मांग है। याचिका में हादसे से जुड़े जरूरी दस्तावेज और साक्ष्य सुरक्षित रखने की भी मांग की गई है, ताकि जांच के दौरान किसी तरह के रिकॉर्ड या अन्य महत्वपूर्ण सबूत के नष्ट होने की आशंका न रहे।
मृतकों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग
याचिका में प्रत्येक मृतक छात्र के परिवार को 1 करोड़ रुपये मुआवजा देने की मांग की गई है। घायलों के लिए उचित मुआवजा, प्रभावित छात्रों के इलाज और पुनर्वास तथा जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की मांग भी की गई है। हादसे के कारण स्थायी रूप से प्रभावित होने वाले छात्रों के लिए रोजगार संबंधी सहायता की मांग भी याचिका में की गई है।
डीयू में हॉस्टल की कमी का मुद्दा भी याचिका में उठा
सत्या निकेतन हादसे के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र हॉस्टल की कमी का मुद्दा भी सामने आया है। बड़ी संख्या में छात्र दक्षिण और उत्तर कैंपस के आसपास निजी पीजी और किराये के मकानों में रहने को मजबूर हैं। इसी वजह से सुरक्षित और पर्याप्त छात्र आवास उपलब्ध कराने की मांग तेज हुई है।
उधर, आरजेडी के राज्यसभा सांसद और डीयू के प्रोफेसर मनोज कुमार झा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर डीयू के लिए अलग और सुरक्षित छात्र हॉस्टल निर्माण के लिए ‘इमरजेंसी, रिंग-फेंस्ड फंड’ बनाने की मांग की है। उन्होंने उत्तर और दक्षिण कैंपस के साथ विश्वविद्यालय के कॉलेजों में समयबद्ध छात्र आवास कार्यक्रम शुरू करने और इसके लिए सरकारी जमीन चिन्हित करने की मांग की है।
सरकार भी सार्वजनिक इमारतों के ऑडिट की तैयारी में
हाईकोर्ट में मामला पहुंचने के बीच दिल्ली सरकार ने भी सार्वजनिक इस्तेमाल वाली इमारतों के लिए स्ट्रक्चरल सेफ्टी व्यवस्था कड़ी करने की बात कही है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा है कि सरकार एमसीडी के साथ मिलकर ऐसी नीति तैयार कर रही है, जिसके तहत पीजी, नर्सिंग होम, स्कूल और अन्य सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों का समय-समय पर स्ट्रक्चरल ऑडिट और सेफ्टी सर्टिफिकेशन अनिवार्य किया जाएगा। बिना सुरक्षा प्रमाणन के ऐसी इमारतों में सार्वजनिक गतिविधि की अनुमति नहीं होगी। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि असुरक्षित पीजी में लोगों को रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी और हादसे के बाद खाली कराए गए छात्रों के लिए कॉलेज हॉस्टलों में वैकल्पिक व्यवस्था की गई है।
सत्या निकेतन में पहले से सामने आ रहे थे सुरक्षा के सवाल
हादसे के बाद आसपास के दूसरे पीजी और हॉस्टलों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सी ऑपरेटर द्वारा संचालित आसपास के दो अन्य हॉस्टलों में बेहद संकरे रास्ते, एक ही प्रवेश-निकास मार्ग, बंद लोहे के गेट और खुले में लटकते बिजली के तार जैसी सुरक्षा संबंधी कमियां सामने आई हैं। एक अन्य हॉस्टल पांच मंजिला इमारत में संचालित हो रहा है। रिइलाके में तीन मंजिल से अधिक ऊंची इमारतों को लेकर भी नियमों के उल्लंघन के सवाल उठे हैं, जबकि कई पीजी चार से पांच मंजिल की इमारतों में संचालित हो रहे हैं। हादसे के बाद एमसीडी ने चार मंजिल से अधिक के अवैध निर्माण को तत्काल सील करने का आदेश दिया है।
एमसीडी के पांच अधिकारी निलंबित
हादसे के बाद एमसीडी ने साउथ जोन के पांच अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इनमें डिप्टी कमिश्नर राकेश कुमार, सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर रणवीर सिंह, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर (बिल्डिंग) ललित कुमार गोयल, असिस्टेंट इंजीनियर (बिल्डिंग) सुनील चौहान और जूनियर इंजीनियर (बिल्डिंग) आशीष कुमार शामिल हैं। ये निलंबन विभागीय कार्रवाई लंबित रहने तक प्रभावी हैं। एमसीडी कमिश्नर संजीव खिरवार के मुताबिक, इसी इलाके में अगस्त में तीन से चार इमारतों को गिराने के आदेश भी जारी किए गए थे। हादसे से सटी एक अन्य इमारत को कमजोर पाए जाने के बाद उसे भी नियंत्रित तरीके से गिराने की तैयारी की जा रही है।



