
रुखसार — तहलका
नई दिल्ली — 27 सितंबर, 2026 —
दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज की छात्राओं के हाथों में सितंबर की एक दोपहर पोस्टर थे—“रातों पर भी हक है हमारा।” कुछ दिन पहले दक्षिण दिल्ली के आस्था कुंज इलाके में 17 वर्षीय लड़की के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना हुई थी। घटना के बाद कॉलेज ने एक दिन के लिए ऑफलाइन कक्षाएं ऑनलाइन कर दीं और छात्राएं सड़कों पर उतर आईं। 23 सितंबर को 200 से अधिक छात्रों ने मार्च किया। दो दिन बाद एलएसआर (LSR), मिरांडा हाउस, गार्गी कॉलेज, कमला नेहरू कॉलेज और दूसरे संस्थानों के छात्र फिर सड़कों पर थे। मांग सिर्फ एक घटना पर कार्रवाई की नहीं थी—सवाल था कि कॉलेज से घर तक का रास्ता लड़कियों के लिए सुरक्षित क्यों नहीं है।
एलएसआर (LSR) के आसपास छात्राओं ने खराब रोशनी, सीसीटीवी (CCTV) की कमी, पुलिस पेट्रोलिंग और कथित पीछा किए जाने (stalking) तथा उत्पीड़न (harassment) की शिकायतों को भी सामने रखा। यानी एक लड़की के लिए कॉलेज की चारदीवारी में शिक्षा का अधिकार और उसके बाहर सुरक्षित होकर चलने का अधिकार दो अलग-अलग चीजें बन गए हैं।
यहीं से बेटी दिवस की कहानी शुरू होती है।
क्योंकि भारत की बेटी की कहानी सिर्फ उसकी उपलब्धियों की कहानी नहीं है। यह उस संघर्ष की कहानी भी है जिसमें एक लड़की पहले सुरक्षित रास्ता मांगती है, फिर शिक्षा का अधिकार, फिर नौकरी का अवसर और अंततः अपनी पहचान और अपने फैसलों पर अधिकार।
लेकिन इसी कहानी का दूसरा सिरा भी है।
वही देश जहां लड़कियां सार्वजनिक जगहों की सुरक्षा को लेकर आंदोलन कर रही हैं, उसी देश की बेटियां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिरंगा भी उठा रही हैं—अंतरिक्ष से लेकर ओलंपिक पदक मंच तक, मुक्केबाजी रिंग से शतरंज बोर्ड तक और निशानेबाजी रेंज से राष्ट्रमंडल खेलों तक।
एलएसआर से जमुई तक: सुरक्षा अब भी पहला सवाल
दिल्ली की घटना के कुछ ही दिन पहले बिहार के जमुई में एक नाबालिग लड़की और उसके पुरुष मित्र को कथित तौर पर एक समूह ने रास्ते में रोका और उनके साथ मारपीट तथा छेड़छाड़ की। घटना 19 सितंबर की बताई गई है। वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद पुलिस ने एफआईआर (FIR) दर्ज की और कई आरोपियों की पहचान की गई। शुरुआती कार्रवाई में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया और बाद में गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ी। मामले में पॉक्सो (POCSO) समेत अन्य धाराओं के तहत जांच की गई और एसआईटी (SIT) बनाई गई
इस मामले ने एक और गंभीर सवाल खड़ा किया—जब किसी नाबालिग के साथ अपराध होता है तो क्या सोशल मीडिया उसकी सुरक्षा करता है या उसे दूसरी बार सार्वजनिक तमाशा बना देता है?
दिल्ली और जमुई की घटनाएं अलग हैं, लेकिन उनके बीच एक समान धागा है—सार्वजनिक जगह पर लड़की की सुरक्षा।
और अब यह केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है।
सितंबर 2026 में नॉर्थवेस्टर्न विश्वविद्यालय (Northwestern University) की लॉरी बीमन (Lori Beaman), प्रिंसटन विश्वविद्यालय (Princeton University) की सीमा जयचंद्रन (Seema Jayachandran) और अशोका विश्वविद्यालय (Ashoka University) की अनिशा शर्मा (Anisha Sharma) के अध्ययन ने दिल्ली और बेंगलुरु में 4,000 से अधिक महिलाओं के अनुभवों को दर्ज किया। अध्ययन के अनुसार दिल्ली में 65 प्रतिशत महिलाओं ने पिछले एक साल में सार्वजनिक जगहों पर उत्पीड़न (harassment) का अनुभव बताया। 41 प्रतिशत ने गलत तरीके से छूने (groping), पीछा किए जाने (stalking) या यौन हमले (sexual assault) जैसी गंभीर श्रेणियों का अनुभव बताया। लगभग 70 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उत्पीड़न के डर से उनके काम करने के फैसलों को प्रभावित करता है।यानी समस्या केवल यह नहीं कि किसी लड़की के साथ क्या हुआ।
समस्या यह भी है कि जिस चीज के होने का डर है, वह उसके फैसले बदल रही है।
कौन-सा रास्ता लेना है। कितनी देर बाहर रहना है। किस नौकरी के लिए आवेदन करना है। रात की शिफ्ट करनी है या नहीं। कॉलेज की पाठ्येतर गतिविधि (extracurricular activity) में रहना है या घर लौटना है।
डर भी एक सामाजिक लागत है।
नेहा बोरा: जब बेटी सिर्फ सुरक्षित रास्ता नहीं, सवाल पूछने का अधिकार मांगती है
बेटियों की कहानी को केवल अपराध की खबरों तक सीमित करना भी गलत होगा।
2026 में छात्र आंदोलनों के बीच नेहा बोरा का चेहरा सार्वजनिक रूप से सामने आया। एआईएसए (AISA) की अध्यक्ष के रूप में उन्होंने भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और छात्रों की मांगों को लेकर आंदोलनों में भाग लिया। अगस्त में रांची में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं से जुड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान विधानसभा मार्च में उन पर स्याही फेंके जाने की घटना सामने आई। पुलिस ने एक व्यक्ति को हिरासत में लिया।
नेहा की कहानी यहां किसी राजनीतिक विचारधारा को सही या गलत साबित करने के लिए नहीं, बल्कि एक दूसरे सवाल को समझने के लिए महत्वपूर्ण है—जब एक युवा महिला सार्वजनिक असहमति की आवाज बनती है तो क्या उसके लिए राजनीति और आंदोलन की जगह उतनी ही खुली है जितनी पुरुषों के लिए?
एक लड़की का सार्वजनिक जीवन सिर्फ नौकरी या पद तक सीमित नहीं है। वह आंदोलनकारी हो सकती है, छात्र नेता हो सकती है, पत्रकार हो सकती है, वैज्ञानिक हो सकती है, खिलाड़ी हो सकती है या किसी संस्था का नेतृत्व कर सकती है।
और यही बदलाव भारत की बेटियों की दूसरी तस्वीर है।
कल्पना चावला से मैरी कॉम तक: जिन बेटियों ने सीमा आगे खिसकाई
भारत की बेटियों की उपलब्धियों की सूची नई नहीं है।
कल्पना चावला ने करनाल से अंतरिक्ष तक का सफर तय किया। 1997 में वह अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला बनीं। 2003 में कोलंबिया अंतरिक्ष यान (Columbia shuttle) दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई, लेकिन उनका नाम आज भी भारतीय विज्ञान और अंतरिक्ष के इतिहास में दर्ज है।
मैरी कॉम ने मुक्केबाजी (boxing) में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बनाई। छह बार की विश्व चैंपियन (World Champion) और 2012 लंदन ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता मैरी कॉम ने यह भी दिखाया कि विवाह और मातृत्व किसी महिला के खेल करियर का अंत नहीं होना चाहिए।
सानिया मिर्जा ने भारतीय टेनिस को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी। वह महिला युगल (women’s doubles) में विश्व नंबर 1 रहीं और छह ग्रैंड स्लैम युगल खिताब (Grand Slam doubles titles) जीते। उनकी उपलब्धि केवल ट्रॉफियों की संख्या नहीं थी; उन्होंने भारतीय लड़कियों के लिए पेशेवर टेनिस को करियर विकल्प के रूप में स्थापित करने में भूमिका निभाई।
साइना नेहवाल ने 2012 लंदन ओलंपिक में बैडमिंटन कांस्य जीतकर इतिहास रचा। वह ओलंपिक बैडमिंटन पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।
पीवी सिंधु ने रियो 2016 में रजत और टोक्यो 2020 में कांस्य जीतकर दो अलग-अलग ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनने की उपलब्धि हासिल की।
साक्षी मलिक ने रियो 2016 में कुश्ती कांस्य जीतकर भारतीय महिला कुश्ती को ओलंपिक पदक मंच तक पहुंचाया।
मीराबाई चानू ने टोक्यो 2020 में भारोत्तोलन में रजत जीता। 2026 ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने महिला 48 किलोग्राम वर्ग में फिर स्वर्ण हासिल किया।
और पेरिस 2024 ने एक नई पीढ़ी का नाम सामने रखा—मनु भाकर। उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल में कांस्य और मिश्रित टीम स्पर्धा में दूसरा कांस्य जीता। एक ही ओलंपिक आयोजन में दो पदक जीतने वाली वह स्वतंत्र भारत की पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं।
फिर आई वह पीढ़ी जिसे अब “भविष्य” कहकर टाला नहीं जा सकता।
पिछले एक साल की नई बेटियां
2025-26 में अंतरराष्ट्रीय मंच पर कई भारतीय महिलाओं ने अपने-अपने क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियां दर्ज कीं।
दिव्या देशमुख ने 2025 महिला विश्व शतरंज कप (Women’s Chess World Cup) जीतकर ग्रैंडमास्टर खिताब (Grandmaster title) हासिल किया। इससे भारतीय महिला शतरंज में एक नई पीढ़ी का चेहरा सामने आया।
वैशाली रमेशबाबू पहले ही ग्रैंडमास्टर बन चुकी थीं और 2026 महिला उम्मीदवार प्रतियोगिता (Women’s Candidates Tournament) के लिए क्वालीफाई कर चुकी हैं।
मुक्केबाजी में निकहत जरीन, जैस्मिन लाम्बोरिया, प्रीति पवार, साक्षी चौधरी, प्रियंका घांघस और अरुंधति चौधरी जैसी खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की महिला मुक्केबाजी की गहराई दिखाई।
ग्लासगो 2026 राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय महिलाओं का प्रदर्शन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। भारत के 13 स्वर्ण पदकों में से आठ स्वर्ण महिला खिलाड़ियों ने जीते। स्वर्ण पदक मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, जूडो और पैरा-एथलेटिक्स जैसे अलग-अलग खेलों से आए। (भारतीय ओलंपिक संघ)
मीराबाई चानू ने भारोत्तोलन में स्वर्ण जीता। अस्मिता डे राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की पहली महिला जूडो स्वर्ण पदक विजेता बनीं। मुक्केबाजी में प्रीति पवार, जैस्मिन लाम्बोरिया, साक्षी चौधरी, प्रिय घांघस और अरुंधति चौधरी ने स्वर्ण जीते। (भारतीय ओलंपिक संघ)
रजत पदक मंच पर ज्ञानेश्वरी यादव, हरजिंदर कौर और लवलीना बोरगोहेन जैसी भारतीय बेटियां रहीं। कांस्य में बिंद्यारानी देवी, सीमा कालिरमना और उन्नति शर्मा सहित कई महिला खिलाड़ियों ने जगह बनाई। (भारतीय ओलंपिक संघ)
निशानेबाजी में भी नई पीढ़ी उभरी। ईशा सिंह ने 2026 में विश्व कप में 25 मीटर पिस्टल में स्वर्ण के साथ विश्व रिकॉर्ड स्तर का प्रदर्शन दर्ज किया। जूनियर स्तर पर वांशिका चौधरी ने 2026 जूनियर विश्व कप में महिला 10 मीटर एयर पिस्टल में स्वर्ण और एशियाई चैंपियनशिप में भी पदक मंच पर स्थान हासिल किए। (आईएसएसएफ)
और सितंबर 2026 में एशियाई खेलों में बरानिका एलांगोवन ने महिला पोल वॉल्ट में कांस्य जीतकर अपनी पहली एशियाई खेलों की भागीदारी को पदक में बदला। (प्रेस सूचना ब्यूरो)
यह सूची पूरी नहीं है। लेकिन इससे एक बदलाव जरूर दिखाई देता है—भारतीय महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय सफलता अब कुछ गिने-चुने नामों तक सीमित नहीं है।
हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली: आंकड़ों में बेटी
यहां एक सावधानी जरूरी है। किसी राज्य की “लड़कियों की उपलब्धि” का कोई आधिकारिक प्रतिशत उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह कहना कि हरियाणा की 95 प्रतिशत लड़कियां सफल हैं या उत्तर प्रदेश की इतनी प्रतिशत लड़कियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाया, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन तीन राज्यों के लिंग अनुपात, महिला साक्षरता और महिला श्रमबल भागीदारी जैसे संकेतक यह समझने में मदद करते हैं कि बेटियों के लिए सामाजिक और आर्थिक अवसरों की तस्वीर कैसी है।
हरियाणा
हरियाणा का जन्म के समय लिंग अनुपात लंबे समय से राष्ट्रीय लैंगिक बहस का हिस्सा रहा है। राज्य सरकार के अनुसार एसआरबी (SRB) 2010 के 838 से बढ़कर 2025 में 923 लड़कियां प्रति 1,000 लड़के हुआ। (पीआरएमएस)
2023-24 के पीएलएफएस-आधारित आंकड़ों में हरियाणा की महिला साक्षरता करीब 77.8% दर्ज की गई। महिला श्रमबल भागीदारी इससे अलग तस्वीर दिखाती है—2024-25 के पीएलएफएस आंकड़ों पर आधारित उपलब्ध अनुमानों में हरियाणा की महिला श्रमबल भागीदारी करीब 26.9% रही। (आरटीई गुजरात
यानी जन्म के स्तर पर लिंग अनुपात में सुधार और शिक्षा में प्रगति के बावजूद आर्थिक भागीदारी अभी एक अलग चुनौती है
और इसी हरियाणा से अंतरराष्ट्रीय खेलों में कई बड़े महिला चेहरे निकले हैं। 2026 राष्ट्रमंडल खेलों में हरियाणा से जुड़ी नई पीढ़ी की जैस्मिन लाम्बोरिया ने मुक्केबाजी में स्वर्ण जीता; राज्य लंबे समय से कुश्ती, मुक्केबाजी और निशानेबाजी जैसे खेलों में महिला खिलाड़ियों की मजबूत प्रतिभा-श्रृंखला के लिए जाना जाता है।
उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में सरकारी आंकड़ों के अनुसार महिला साक्षरता करीब 70.4% और कुल लिंग अनुपात 912 महिलाएं प्रति 1,000 पुरुष है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ डैशबोर्ड में उत्तर प्रदेश का जन्म के समय लिंग अनुपात 936 लड़कियां प्रति 1,000 लड़के दर्ज है। (इन्वेस्ट यूपी)
महिला श्रमबल भागीदारी भी एक महत्वपूर्ण संकेतक है। 2024-25 के उपलब्ध पीएलएफएस-आधारित अनुमानों में यूपी की महिला श्रमबल भागीदारी करीब 34.6% बताई गई है। (एसएसजेएआर)
यानी यहां भी सवाल केवल यह नहीं कि कितनी लड़कियां स्कूल जा रही हैं। सवाल यह है कि शिक्षा के बाद कितनी महिलाएं कार्यबल में प्रवेश कर पा रही हैं और कितनी अपनी आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कर रही हैं।
दिल्ली
दिल्ली में जनगणना-आधारित कुल लिंग अनुपात 821 महिलाएं प्रति 1,000 पुरुष है, जबकि 2024 में दर्ज जन्म के समय लिंग अनुपात 920 लड़कियां प्रति 1,000 लड़के रहा।
दिल्ली की महिला साक्षरता 2023-24 के पीएलएफएस अनुमानों में करीब 78.7% रही। लेकिन महिला कार्यबल भागीदारी एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाती है। उपलब्ध पीएलएफएस आंकड़ों में दिल्ली की महिला श्रमबल भागीदारी 2022-23 में करीब 14.8% थी।
और यही वह विरोधाभास है जो दिल्ली की वर्तमान कहानी में दिखाई देता है—यह देश के बड़े शैक्षणिक और पेशेवर केंद्रों में से एक है, लेकिन सार्वजनिक सुरक्षा और महिलाओं की भागीदारी दोनों के सवाल अभी बाकी हैं।
उपलब्धि और असुरक्षा के बीच कितना फासला?
इन आंकड़ों को एलएसआर की छात्राओं के प्रदर्शन के साथ रखकर देखिए।
एक तरफ लड़की कॉलेज तक पहुंच रही है।
दूसरी तरफ वही लड़की कॉलेज से घर लौटने के रास्ते की रोशनी और पुलिस गश्त को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रही है।
एक तरफ भारतीय महिला खिलाड़ी राष्ट्रमंडल खेलों में देश के 13 स्वर्ण में से आठ स्वर्ण जीत रही हैं।
दूसरी तरफ शोध बता रहा है कि दिल्ली में 65 प्रतिशत सर्वेक्षण में शामिल महिलाओं ने पिछले एक साल में सार्वजनिक जगहों पर उत्पीड़न का अनुभव बताया और करीब 70 प्रतिशत ने कहा कि उत्पीड़न का डर उनके काम करने के फैसले को प्रभावित करता है।
यही भारत की बेटी की आज की सबसे बड़ी विडंबना है
वह पदक मंच पर पहुंच रही है, लेकिन रास्ते में डर रही है।
वह ग्रैंडमास्टर बन रही है, लेकिन सार्वजनिक जगह में उत्पीड़न से जूझ रही है।
वह संसद, विश्वविद्यालय और विरोध स्थल में सवाल पूछ रही है, लेकिन उसकी आवाज को स्वीकार करने के लिए उसे अब भी अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ता है।
वह अंतरिक्ष तक पहुंच चुकी है, लेकिन उसके लिए सुरक्षित सड़क अभी भी एक अधूरा सपना हो सकती है।
बेटी दिवस
बेटी दिवस पर हम अक्सर बेटियों की तस्वीर लगाते हैं—मेडल के साथ, स्नातक की पोशाक में, वर्दी में, मंच पर या पिता के कंधे पर।
लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा भी देखना होगा।
वह लड़की जो एलएसआर के बाहर खड़ी होकर कहती है कि उसे रात में भी सड़क पर चलने का अधिकार चाहिए।
वह नाबालिग लड़की जिसके साथ जमुई में कथित अपराध हुआ और जिसकी पहचान को सोशल मीडिया के शोर से बचाना भी हमारी जिम्मेदारी है।
वह नेहा बोरा जो छात्र आंदोलन में अपनी बात रखती है।
वह कल्पना चावला जो अंतरिक्ष तक पहुंचती है।
वह मैरी कॉम जो मुक्केबाजी रिंग में विश्व चैंपियन बनती है।
वह सानिया मिर्जा जो टेनिस में विश्व नंबर 1 बनती है।वह पीवी सिंधु जो दो ओलंपिक में पदक मंच पर पहुंचती है।वह मीराबाई चानू जो राष्ट्रमंडल पदक मंच पर फिर खड़ी होती है।वह मनु भाकर जो एक ही ओलंपिक में दो पदक जीतती है।और वह नई पीढ़ी—दिव्या देशमुख, ईशा सिंह, जैस्मिन लाम्बोरिया, प्रीति पवार, नीरू धांडा और उन जैसी दर्जनों बेटियां—जो यह बता रही हैं कि भारत की बेटी की कहानी अब किसी एक क्षेत्र में सीमित नहीं है।लेकिन उपलब्धियों की यह सूची तभी पूरी होगी जब अवसर भी बराबर होंगे।बेटी को सिर्फ जन्म लेने का अधिकार नहीं, सुरक्षित होकर जीने का अधिकार चाहिए।उसे सिर्फ स्कूल जाने का अधिकार नहीं, अपनी पढ़ाई चुनने का अधिकार चाहिए।उसे सिर्फ नौकरी पाने का अवसर नहीं, सुरक्षित कार्यस्थल (workplace) और आर्थिक स्वतंत्रता चाहिए।उसे सिर्फ मंच पर तालियां नहीं, फैसले लेने की जगह चाहिए।और उसे सिर्फ “उड़ने” की शुभकामना नहीं चाहिए।उसे ऐसी जमीन चाहिए जहां उड़ान भरने से पहले उसे यह न सोचना पड़े कि रास्ते में कौन उसका रास्ता रोक देगा।क्योंकि बेटियों की असली उपलब्धि सिर्फ यह नहीं कि उन्होंने दुनिया के सामने भारत का नाम रोशन किया।असली उपलब्धि उस दिन होगी जब किसी लड़की का सफल होना खबर नहीं, सामान्य बात होगी—और किसी लड़की का सुरक्षित होकर घर लौटना भी खबर नहीं होगा।



