
1504 में बाबर की जड़ें उज़्बेकिस्तान से जुड़ी थीं। 2026 में मोदी ने उसी धरती पर भारत की नई रणनीति रखी।
29-30 अगस्त 2026 को पीएम मोदी का उज्बेकिस्तान दौरा सिर्फ एक विदेश यात्रा नहीं, बल्कि मध्य एशिया में भारत की दीर्घकालिक रणनीति का अहम हिस्सा था। यह मोदी का चौथा उज्बेकिस्तान दौरा था, जो इस देश के प्रति भारत की गंभीरता को दर्शाता है।
रिश्ता हुआ ‘कॉम्प्रिहेंसिव स्ट्रैटेजिक’
ताशकंद में मोदी और राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव के बीच हुई वार्ता के बाद दोनों देशों ने अपने संबंधों को Comprehensive Strategic Partnership के स्तर पर ले जाने का ऐलान किया। इसका मतलब है कि अब सहयोग सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऊर्जा, रक्षा, डिजिटल तकनीक और रणनीतिक मामलों तक फैलेगा।
भारत को मिला क्या? 5 बड़े फायदे
1. यूरेनियम की सप्लाई: उज्बेकिस्तान दुनिया के प्रमुख यूरेनियम उत्पादक देशों में शामिल है। भारत ने अपनी परमाणु ऊर्जा सुरक्षा (energy security) को मजबूत करने के लिए यूरेनियम की दीर्घकालिक सप्लाई के लिए एक फ्रेमवर्क पर काम आगे बढ़ाया है। यह भारत की supply-chain diversification रणनीति का अहम हिस्सा है।
2. व्यापार लक्ष्य: दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। अभी यह आंकड़ा इससे काफी कम है, इसलिए इसे कई गुना बढ़ाने के लिए बिजनेस-टू-बिजनेस पार्टनरशिप और लॉजिस्टिक्स पर काम होगा।
3. क्रिटिकल मिनरल्स: इलेक्ट्रिक व्हीकल, बैटरी और सेमीकंडक्टर बनाने के लिए जरूरी critical minerals की सप्लाई चेन में भारत अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। उज्बेकिस्तान के साथ mineral resources और exploration में सहयोग का फ्रेमवर्क इसी दिशा में एक कदम है।
4. UPI का विस्तार: उज्बेकिस्तान में भारतीय UPI ऐप्स के जरिए पेमेंट को संभव बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। यह भारत की digital soft power को मजबूत करता है और भारतीय डिजिटल इकोसिस्टम को विदेश में पहुंचाता है।
5. रक्षा सहयोग: उज्बेकिस्तान लंबे समय से रूसी रक्षा इकोसिस्टम से जुड़ा रहा है, लेकिन अब वह अपनी defense partnerships को diversify करना चाहता है। भारत के लिए यह defense manufacturing और technology के क्षेत्र में जगह बनाने का अवसर है।
सॉफ्ट पावर और कनेक्टिविटी
भारत ने 100 लाल बहादुर शास्त्री स्कॉलरशिप, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी में संस्कृत चेयर और उज्बेकिस्तान के प्राचीन बौद्ध स्थलों (Fayaz Tepa और Kara Tepa) के संरक्षण में सहयोग की घोषणा की। ये सभी कदम people-to-people ties को मजबूत करते हैं।
कनेक्टिविटी के मामले में भारत ईरान के चाबहार पोर्ट और International North-South Transport Corridor (INSTC) के जरिए मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि पाकिस्तान के कारण सीधा land route उपलब्ध नहीं है।
बड़ा भू-राजनीतिक संदर्भ
मध्य एशिया इस समय एक नए Great Game का मैदान है। चीन बेल्ट एंड रोड के जरिए यहां अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है, रूस का पुराना प्रभाव है, और अमेरिका भी अपनी रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखना चाहता है।
भारत की रणनीति चीन या रूस को सिर्फ counter करने की नहीं, बल्कि एक alternative trusted partner के तौर पर अपनी जगह बनाने की है। भारत के पास market, technology, pharmaceuticals, education और digital infrastructure जैसी ताकतें हैं, जिनका उपयोग करके वह Central Asia में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
अफगानिस्तान और SCO
उज्बेकिस्तान की सीमा अफगानिस्तान से मिलती है, इसलिए वहां की स्थिति का सीधा असर ताशकंद पर पड़ता है। भारत और उज्बेकिस्तान दोनों अफगानिस्तान में स्थिरता और समावेशी व्यवस्था चाहते हैं। ताशकंद के बाद मोदी किर्गिस्तान में SCO Summit में भी शामिल हुए, जहां भारत ने security, connectivity और opportunity पर जोर दिया।
निष्कर्ष
मोदी के उज्बेकिस्तान दौरे का सबसे बड़ा हासिल कोई एक agreement नहीं, बल्कि भारत की Central Asia policy का institutionalization है। 5 अरब डॉलर का trade target, uranium supply, critical minerals exploration और defence agreements को जमीन पर उतारना अब अगले कुछ सालों की चुनौती होगी।
कूटनीति में घोषणा headline बनाती है, लेकिन implementation इतिहास बनाता है। ताशकंद में भारत ने headline तो बना दी है, अब इतिहास लिखने का काम आने वाले वर्षों में होगा।


