Home Blog Page 503

सत्ता पर क़ब्ज़े की ज़िद

एक दौर था, जब सियासत देश सेवा के भाव से किये जाने के लिए सियासतदान वचनबद्ध हुआ करते थे। यही वजह थी कि कई मौक़ों पर विपक्षी दल भी सत्तापक्ष के सामने समर्थक के रूप में नज़र आते थे। संसद में ज़ोरदार तकरार और सवाल-जवाब की नोकझोंक के बावजूद किसी के मन में विद्वेष की भावना नहीं देखी जाती थी। शायद इसी का परिणाम था कि एक बार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की मृत्यु पर भावुक होकर कहा था कि आज अगर मैं ज़िन्दा हूँ, तो राजीव गाँधी की वजह से। आज की स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भी बार नहीं कहा कि अगर आज वह प्रधानमंत्री हैं, तो अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की वजह से।

विदुर कहते हैं कि जो लोग अपने बड़ों का सम्मान करना छोड़ देते हैं, उनका पतन निश्चित होता है। आज यह सभी जानते हैं कि भाजपा का झण्डा उठाकर मोदी ने एक अगुआ की तरह पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है और देश की सर्वोच्च सत्ता हासिल करके लगातार केंद्र की सत्ता में दूसरी सफल पारी खेल रहे हैं। लेकिन वह राजनैतिक मूल्यों की आहुति देकर राजनीति कर रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ज़िद और सत्ता न छोडऩे की राजनीति पर आमादा हैं। यह कोई नयी बात नहीं है, सत्ता की भूख ही ऐसी है कि जो भी सत्ता में आता है, वह गद्दी छोडऩा नहीं चाहता। लेकिन लोकतांत्रिक देशों में जनता का अपना निर्णय ही सबसे महत्त्वपूर्ण होता है, उसमें अपनी मनमानी करने वाले सियासतदानों के लिए जनता की उलाहना और घृणा के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता। दुनिया में कितने ही शासक सिंहासन पर क़ब्ज़ा करके बैठे, परन्तु जनता के दिल में शासन नहीं कर सके। आज मोदी के समर्थकों का कोई मुक़ाबला भले ही न हो, पर उन्होंने अपनी छवि को धूमिल करने की शुरुआत कर दी है। कई प्रदेशों की विपक्षी सरकारों के गिराकर अपनी सरकार बनाने की उनकी लालसा उनकी छवि को निरंकुश शासक की तरह दर्शाने लगी है।

दिल्ली में भी जिस तरह से उनके नेतृत्व और केजरीवाल सरकार के बीच द्वंद्व की स्थिति लगातार बनी हुई है, उससे मोदी की छवि पर कम दाग़ नहीं लग रहे हैं। सत्येंद्र जैन के मामले में न्यायालय द्वारा ईडी की फटकार लगाये जाने के बावजूद उनकी ईडी का विपक्षी नेताओं पर शिकंजा कसना इस बात को साफ़ दर्शाता है कि भाजपा के शीर्ष नेता विद्वेष की राजनीति करने में लगे हैं। यही वजह है कि एक बार फिर मोदी सरकार के दिल्ली के नुमाइंदे संवैधानिक पद पर आसीन उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना और केजरीवाल सरकार के बीच तकरार बढ़ती नज़र आ रही है। इस लड़ाई में उप राज्यपाल की रीढ़ केंद्रीय गृह मंत्रालय बना हुआ है।

समझ नहीं आता कि जिस केजरीवाल सरकार को जनता ने चुना है और सर्वोच्च न्यायालय अपने एक फ़ैसले में भी साफ़ कर चुका है कि दिल्ली का बॉस मुख्यमंत्री है, इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जाकर क़ानूनी रूप से उप राज्यपाल को दिल्ली का बॉस तय कर दिया। लगातार जनहित के कार्यों में रोड़े डालने की उप राज्यपालों की आदत और केजरीवाल सरकार के ख़िलाफ़ कई केंद्रीय जाँचों ने यह तो सिद्ध कर दिया कि सच्चाई को परास्त करना आसान नहीं होता। दरअसल मोदी को ख़तरा केजरीवाल की दिल्ली सत्ता से नहीं, बल्कि देश में उसके विस्तार से ज़्यादा है। कांग्रेस को ख़त्म करने के मंसूबे में बड़े पैमाने पर कामयाब होने के बाद अब नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती अरविंद केजरीवाल से मिल रही है, जिसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह से लेकर कोई भी भाजपाई पचा नहीं पा रहा है।

ताजा विवाद नयी आबकारी नीति को लेकर है। इस मामले में अभी तक यह साफ़ नहीं हो पाया है कि केजरीवाल सरकार की मुफ़्त की राजनीति में केंद्र सरकार का क्या नुक़सान हो रहा है। साफ़ है कि नरेंद्र मोदी को अपनी सत्ता के चढ़े सूरज के डूबने का ख़तरा अब कांग्रेस से ज़्यादा आम आदमी पार्टी के उभरते नेता केजरीवाल से महसूस हो रहा है। केजरीवाल सरकार ने जिस तरह कोरोना काल में बचे शराब के स्टॉक को ख़त्म करने के लिए एक बोतल पर एक बोतल मुफ़्त करने की राजनीति की, उससे ऐसा नहीं कि उनकी छवि पर दाग़ नहीं लगे। ऐसी नीतियों से छवि ख़राब होनी तो तय है। लेकिन गुजरात में शराबबंदी के बावजूद शराब की अवैध रूप से तस्करी ने भाजपा और नरेंद्र मोदी की छवि पर ज़्यादा दाग़ दिखा दिये हैं।

हालाँकि केजरीवाल सरकार ने नयी आबकारी नीति वापस ले लिया है, पर इस मामले में मोदी सरकार उप राज्यपाल के माध्यम से बड़ी कार्रवाई करने पर आमादा है। उप राज्यपाल ने दिल्ली सरकार के तत्कालीन एक्‍साइज कमिश्नर आईएएस अरवा गोपी कृष्ण और दानिक्स अधिकारी तत्कालीन उपायुक्त आनंद कुमार तिवारी समेत कुल 11 अधिकारियों और कर्मचारियों को निलंबित कर दिया है। सूत्रों से पता चला है कि यह कार्रवाई केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश पर की गयी है। उप राज्यपाल के आदेश पर मुख्य सचिव नरेश कुमार ने निलंबन और प्रमुख अनुशासनात्‍मक कार्रवाई के आदेश दिये हैं। इस कार्रवाई से ग़ुस्साये दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने नयी आबकारी नीति को लेकर पूर्व उप राज्यपाल अनिल बैजल को दोषी ठहराते हुए सीबीआई को इस मामले की जाँच के लिए पत्र लिखा है। सवाल यह है कि क्या सीबीआई इस मामले की निष्पक्ष जाँच करेगी? यह सवाल इसलिए उठता है, क्योंकि सीबीआई और ईडी से लेकर न्यायालयों और चुनाव आयोग तक पर मोदी सरकार का दबाव साफ़ नज़र आ रहा है।

इसी दबाव की देन है कि ममता बनर्जी के पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी क़रीबी अर्पिता मुखर्जी पर जब ईडी का चाबुक चला, तो ममता बनर्जी को अपने कई मंत्रियों को हटाकर उनकी जगह नये मंत्री नियुक्त करने पड़े। उनके दिल्ली दौरे और मोदी से मुलाक़ात को जानकार इसी दबाव का नतीजा बता रहे हैं। हालाँकि अर्पिता मुखर्जी पर ईडी की कार्रवाई पर कथित रूप से यह बात उड़ी कि उनके यहाँ जो पैसा मिला, वो सारा का सारा उनका नहीं था। इसी तर्ज पर झारखण्ड की हेमंत सोरेन की सरकार पर भी चुपके-चुपके मोदी सरकार का चाबुक चल रहा है। इससे सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार विपक्षियों को जड़ से ख़त्म करने की कोशिश में लगी है? कुछ राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि मोदी और शाह की जोड़ी विपक्षी दलों को पूरी तरह कमज़ोर और ख़त्म करने पर आमादा है, जिसके लिए वे अनैतिक हथकंडे अपनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। इस बात की पुष्टि दो स्थितियों से होती नज़र आ रही है।

एक स्थिति में कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनके बेटे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी को नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी द्वारा लगातार दबाव में लाया जा रहा है। दूसरी स्थिति को कुछ दिनों पहले ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा द्वारा दिया गया बयान स्पष्ट करता है, जिसमें वह साफ़ शब्दों में कह रहे हैं कि ‘अपनी विचारधारा और कैडर की बदौलत भविष्य में एकमात्र राजनीतिक दल भाजपा ही बचेगी, बा$की सब मिट जाएँगे।’ यहाँ नड्डा ने विचारधारा और कैडर का सहारा लेकर मोदी और शाह की वो मंशा स्पष्ट कर दी है, जिसे पूरा करने के लिए वे विपक्षी पार्टियों को किसी भी तरह ख़त्म करने में लगे हैं। यह लोकतंत्र के लिए ख़तरे की घंटी है और अघोषित आपातकाल है, जिसे अभी सब लोग भले ही नहीं देख पा रहे हैं, परन्तु निकट भविष्य में जल्द ही देख पाएँगे। लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी; क्योंकि लोकतंत्र मर चुका होगा और जनता छटपटा रही होगी।

अगली बार मोदी या कोई और?

साल 2024 के आम चुनाव में भाजपा के नेतृत्व को लेकर अभी से चर्चा

भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की उँगली पकड़कर चलती है, सभी जानते हैं। आरएसएस की बात भाजपा में ब्रह्म वाक्य की तरह मानी जाती है। अब आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने 9 अगस्त को बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि अकेले एक नेता देश के सामने मौज़ूद चुनौतियों से नहीं निपट सकता और कोई एक संगठन या पार्टी देश में बदलाव नहीं ला सकती। इससे कोई एक पखवाड़ा पहले भाजपा के ताक़तवर नेता और गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात के एक पार्टी कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं को कहा कि वे मोदी के नेतृत्व में अगला लोकसभा चुनाव जीतने की अभी से तैयारी शुरू कर दें। शाह जो कहते हैं, उसे भाजपा में ब्रह्म वाक्य माना जाता है। तो क्या भाजपा मोदी के ही नेतृत्व में सन् 2024 के लोकसभा चुनाव में बिखरे हुए विपक्ष से भिड़ेगी या मोहन भागवत ने इससे अलग कुछ संकेत दिया है? भाजपा नेताओं की राय देखें, तो उन्हें लगता है कि मोदी के करिश्मे के बिना भाजपा को चुनाव जीतना मुश्किल होगा।

हाल के विधानसभा चुनाव में जीत और फिर महाराष्ट्र में छल-बल-दलबदल से सरकार बदलकर जो भाजपा ताक़तवर दिख रही थी, वह अगस्त के पहले पखवाड़े के दूसरे हफ़्ते में बिहार जैसे राज्य में नीतीश कुमार के एनडीए से बाहर चले जाने से वहाँ अकेली पड़ गयी है। बिहार के रूप में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बड़ा राज्य भाजपा के हाथ से निकल गया है और उसे अगले लोकसभा चुनाव में एक बहुत मज़बूत गठबंधन, जिसमें दलित, अति और साधारण पिछड़ा वर्ग, अति और साधारण वामपंथ, मध्यमार्ग और अल्पसंख्यक का अद्भुत संयोजन है। अर्थात् राजद, जद(यू), कांग्रेस, वामपंथी, मुस्लिम और घोर पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों का सामना भाजपा के लिए किसी भी सूरत में आसान नहीं होगा।

यह घटनाक्रम तब हुए हैं, जब 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के भीतर बड़े स्तर की चर्चाएँ चल रही हैं। नेतृत्व से लेकर रणनीति तक। भले भाजपा नेता और बड़े बहुमत से 2024 में सत्ता में लौटने के दावे कर रहे हों, पार्टी के भीतर माना जाता है कि अगला चुनाव 2019 के चुनाव के मुक़ाबले थोड़ा कठिन होगा। फ़िलहाल तो भाजपा में यही माना जाता है कि पार्टी के सबसे बड़े आकर्षण होने के नाते नरेंद्र मोदी ही अगले चुनाव में भी नेतृत्व करेंगे। उनके रहते पार्टी के ज़्यादातर नेता जीत को पक्का मानते हैं। लेकिन हाल के समय में पार्टी के भीतर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी भविष्य के नेतृत्व की एक गम्भीर सम्भावना के रूप में उभरे हैं।
अब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने जब यह कहा कि ‘एक चीज़ जो संघ की विचारधारा का आधार है। वह यह है कि कोई एक नेता इस देश के समक्ष मौज़ूद सभी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता है, वह ऐसा नहीं कर सकता; चाहे वह कितना भी बड़ा नेता हो।’ इसके निहितार्थ समझने की कोशिश भाजपा ही नहीं, विपक्ष के नेता भी कर रहे हैं। क्या इसका अर्थ यह है कि भागवत नये नेता को सामने लाने का संकेत दे रहे हैं? आरएसएस हिन्दुत्व, एक भारत और हिन्दू राष्ट्र की सोच पर केंद्रित संगठन है। भाजपा के मामले में वह एक संगठन मात्र नहीं है। एक विचारधारा है, जिससे भाजपा भी संचालित होती है। ऐसे में भागवत के बयान पर कयास लगने जारी हैं।
भाजपा के भीतर नेतृत्व की चाह और नेताओं को नहीं है, यह नहीं कहा सकता। अमित शाह, नितिन गडकरी जैसे नेता हैं, जो नेतृत्व की क्षमता रखते हैं। योगी आदित्यनाथ का अपना बड़ा प्रशंसक वर्ग भाजपा के भीतर है। एक ऐसा भी वर्ग है, जो मोदी की नीतियों से बहुत ज़्यादा इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता; लेकिन ख़ामोश रहता है। ऐसे में संघ नेतृत्व को लेकर क्या सोचता है, यह काफ़ी अहम हो जाता है।

राजनीति में करिश्मे वाला नेतृत्व महत्त्वपूर्ण होता है। बिना किसी हिचक के कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी के रूप में भाजपा के पास ऐसा चेहरा है। लेकिन यह भी सच है कि एक वृहद वर्ग में उनकी स्वीकार्यता नहीं है। ख़ासकर अल्पसंख्यक उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखते हैं। इसके अलावा इतनी अपार लोकप्रियता के बावजूद देश के कई राज्यों, ख़ासकर दक्षिण भारत में भाजपा का इन आठ वर्षों में भी पैर न जमा पाना यह संकेत करता है कि मोदी की लोकप्रियता वहाँ पहुँच नहीं पायी है। राजनीति के बहुत जानकार मानते हैं कि भाजपा उत्तर भारत से बाहर बहुत मज़बूत ज़मीन पर नहीं खड़ी है। लेकिन यहाँ यह सवाल भी है कि क्या भाजपा मोदी के नेतृत्व के बिना लोकसभा जैसा बड़ा चुनाव जीत सकती है? इसका जवाब अभी देना कठिन है। इस साल और अगले साल भी कुछ राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। इनके नतीजे बहुत अहम होंगे। भाजपा के लिए मार्च-अप्रैल में हुए विधानसभा चुनावों के विपरीत अगले चुनावों में चुनौती कठिन है। इसका एक बड़ा कारण तो यह है कि इनमें से कुछ राज्यों में भाजपा आधार तलाश रही है, जबकि कुछ अन्य में उसके सामने विपक्षियों की मज़बूत चुनौती है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि भाजपा का नेतृत्व इन चुनावों के नतीजों के आधार तय होगा; लेकिन निश्चित ही यह एक पैमाना रहेगा।

भाजपा ने हाल के महीनों में ध्रुवीकरण की राजनीति को अपना प्रमुख हथियार बना लिया है। वह विकास से इतर हिन्दुत्व और आक्रामक राष्ट्रवाद पर ज़्यादा निर्भर दिखने लगी है। इसके अलावा जो तीसरी बात भाजपा करने लगी है, वह है परिवारवाद के ख़िलाफ़ उसका मोर्चा खोलना। ज़ाहिर है एक रणनीति के तहत भाजपा गाँधी परिवार को निशाने पर रख रही है। राजनीति के जानकार मानते हैं कि भाजपा का अचानक हर मंच पर परिवारवाद के ख़िलाफ़ सक्रिय होना इस कारण से है; क्योंकि वह जनता के दिमा$ग में यह बैठाना चाहती है कि गाँधी परिवार उसके लिए सही नहीं। और यह भी कि वह भ्रष्ट है। जबकि हक़ीक़त यह है कि भाजपा मानती है कि देश की राजनीति में गाँधी परिवार के रहते उसके (भाजपा) सामने राजनीतिक चुनौतियाँ हमेशा रहेंगी, भले फ़िलहाल कांग्रेस कमज़ोर हो। उसके ‘देश में सिर्फ़ भाजपा’ के अभियान में गाँधी परिवार और कांग्रेस ही मुख्य अड़चन हैं, क्षेत्रीय दल कम-से-कम राष्ट्रीय स्तर पर उसके लिए कोई गम्भीर चुनौती नहीं, भाजपा यह अच्छी तरह समझती है।
भाजपा परिवारवाद के ख़िलाफ़ तो बोलती है; लेकिन सच यह है कि ख़ुद उसके दर्ज़नों नेताओं के परिजन उसकी राजनीति चला रहे हैं। इनमें राष्ट्रीय नेताओं से लेकर क्षेत्रीय नेता तक शामिल हैं। कांग्रेस की बात करें, तो राजीव गाँधी की सन् 1991 में एलटीटीई के हाथों हत्या के बाद तीन बार बनी कांग्रेस की सरकारों में एक बार भी गाँधी परिवार का प्रधानमंत्री नहीं रहा। यहाँ तक कि कांग्रेस अध्यक्ष भी हमेशा गाँधी परिवार से नहीं रहा। ऐसे में कांग्रेस को इन तीन दशकों में गाँधी परिवार ने ही चलाया, यह भी सही नहीं है; भले उसका दबदबा पार्टी पर बरक़रार रहा हो।

ऐसे में भाजपा की परिवार विरोधी राजनीति की मुहिम गाँधी परिवार को कितना नुक़सान पहुँचाएगी और ख़ुद भाजपा को कितना फ़ायदा देगी, यह तो समय ही बताएगा। फ़िलहाल भाजपा और भाजपा से बाहर इस बात पर कयास लग रहे हैं कि 2024 के आम चुनाव में कौन नेता पार्टी का नेतृत्व करेगा? प्रधानमंत्री मोदी ही या कोई और। दिग्गज भाजपा नेता अमित शाह और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयानों के बाद यह चर्चा और तेज़ हो गयी है।


“मुझे विश्वास है कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा 2024 के आम चुनाव में दो-तिहाई बहुमत के साथ जीतेगी। इसे कोई नहीं रोक सकता।’’
अमित शाह
वरिष्ठ भाजपा नेता


“कोई एक नेता इस देश के समक्ष मौज़ूद सभी चुनौतियों का सामना नहीं कर सकता है। चाहे वह कितना भी बड़ा नेता हो। कोई एक संगठन या पार्टी देश में बदलाव नहीं ला सकती।’’
मोहन भागवत
आरएसएस प्रमुख

आख़िरकार जागी कांग्रेस, लम्बे समय से ठंडी पड़ी पार्टी के नेता दिखने लगे सड़कों पर

कांग्रेस फिर सड़क पर दिखने लगी है। आठ साल से केंद्रीय सत्ता से बाहर कांग्रेस को लग रहा है कि अब आर-पार की लड़ाई लड़े बिना काम नहीं चलेगा। उदयपुर के चिन्तन शिविर में उसने सड़क पर आने का संकल्प किया था और अब वह उस पर अमल करती दिख रही है। हाल के एक महीने में महँगाई, बेरोज़गारी और अन्य मुद्दों पर कांग्रेस लगातार सड़क पर दिख रही है। इस दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नेशनल हेराल्ड मामले में राहुल गाँधी और फिर सोनिया गाँधी को जब कई-कई बार तलब किया, तो कांग्रेस ने इसे सहानुभूति में बदलने के लिए सड़कों पर आकर नारेबाज़ी की। अब जबकि भाजपा समर्थित सोशल मीडिया में चर्चा है कि राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को ईडी गिरफ़्तार कर सकती है, कांग्रेस का पूरा कुनबा गाँधी परिवार के साथ खड़ा दिखने लगा है।

लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल है कि राहुल और सोनिया गाँधी को ईडी के दफ्तरों के चक्कर लगवाकर क्या भाजपा कांग्रेस को एकजुट नहीं कर रही? यदि कहीं इन दोनों में से किसी को गिरफ़्तार कर लिया जाता है, तो निश्चित की कांग्रेस को एक बहुत बड़ा मुद्दा मिल जाएगा। आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार ने सन् 1979 में कुछ ऐसा ही इंदिरा गाँधी के साथ किया था। तब एक साल बाद ही मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गाँधी सहयोगी दलों से मिलकर 373 सीटों के जबरदस्त बहुमत के साथ सत्ता में लौट आयी थीं।

बिहार में जिस तरह सत्ता परिवर्तन हुआ है और नीतीश कुमार भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से अलग हुए हैं, उससे कांग्रेस को निश्चित ही बिहार की राजनीतिक तस्वीर में आने का अवसर मिला है, भले ही उसके कम मंत्री बने हों। राष्ट्रीय राजनीतिक फ़लक पर भी कांग्रेस को इसका लाभ मिलेगा, क्योंकि नीतीश की पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ेगी। यह माना जाता है कि नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग होने से पहले सोनिया गाँधी से बात की थी, जिसमें उन्होंने कांग्रेस नेता से कहा था कि आपका साथ हमारे लिए ज़रूरी है; क्योंकि उनकी पार्टी यानी जद(यू) यह मानती है कि कांग्रेस के बिना भाजपा का राष्ट्रीय स्तर पर मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। निश्चित ही जद(यू) का कांग्रेस के साथ आना उसके लिए सुखद ही होगा, भले ख़ुद नीतीश कुमार को भविष्य में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार माना जाता है। कांग्रेस को लगता है कि यदि बड़े दल भाजपा से दूर जाना शुरू करते हैं, तो देश की राजनीति में यह एक सुखद संकेत होगा।
कांग्रेस लगातार चुनाव हारने से चिन्तित है। लिहाज़ा अब सड़कों पर दिखने लगी है। यह पहली बार दिख रहा है कि चिन्तन शिविर में उसने जो फ़ैसले किये थे, उन पर वह अमल कर रही है। नहीं तो सत्ता में रहते हुए इस तरह के शिविरों पर हुए फ़ैसलों पर वह कम ही अमल करती रही थी। यहाँ तक की सन् 2014 में सत्ता बे बाहर होने के बाद जब कांग्रेस ने कई विधानसभा चुनाव हारे और उनको लेकर सीडब्ल्यूसी और अन्य बैठकों में जो फ़ैसले हुए, वह काग़ज़ी ही साबित हुए।

विपक्ष के जो दल कांग्रेस का साथ देते रहे हैं, वह भी कांग्रेस की निष्क्रियता से नाराज़ रहे हैं। उनका कहना था कि क्योंकि कांग्रेस का देशव्यापी आधार है, उसे मुद्दों को लेकर आगे आना चाहिए। लेकिन देश में सन् 2019 में दोबारा भाजपा की सरकार बनने के बाद जब काफ़ी बड़े मुद्दे सामने आये, तब भी कांग्रेस ने कोई देशव्यापी आन्दोलन शुरू नहीं किया। देश भर के सभी राज्यों में उसका थोड़ा बहुत ही सही, पर आधार है। राहुल गाँधी ने निश्चित ही देश से जुड़े गम्भीर मुद्दों को बार-बार उठाया है। लेकिन यदि राहुल गाँधी जनता के बीच जाकर आन्दोलन करते, तो आज नतीजा कुछ और ही होता।
देश में इस दौरान कांग्रेस के लिए ऐसे बड़े मुद्दे थे, जो सीधे जनता से जुड़े थे। महँगाई, बेरोज़गारी और सरकारी एजेंसियों के दुरुपयोग का विरोध ख़ुद राहुल गाँधी के प्रिय विषय रहे हैं। वह कोई सामजिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि देश की सबसे पुरानी और अब दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं। उन्हें कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा होने के कारण जनता के बीच जाना चाहिए था। लेकिन महत्त्वपूर्ण मुद्दे सोशल मीडिया में ताक़त से उठाने के बावजूद जनता के बीच न जाकर राहुल गाँधी ने एक बेहतर अवसर गँवा दिया।

अध्यक्ष चुनने की चुनौती
कांग्रेस के सामने अब अध्यक्ष चुनने की बड़ी चुनौती है। अगस्त के दूसरे पखवाड़े जब कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होगी, विपक्ष ही नहीं भाजपा की भी उस पर नज़र रहेगी। राहुल गाँधी के समर्थन में पार्टी का एक बड़ा वर्ग है; लेकिन वो ख़ामोश बैठे हैं। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता कहते हैं कि सोनिया गाँधी को पार्टी का फिर अध्यक्ष बन जाना चाहिए। पार्टी का ही एक वर्ग कहता है कि प्रियंका गाँधी को बाग़डोर सौंप देनी चाहिए।

निश्चित ही कांग्रेस दुविधा में है। राहुल गाँधी कहते हैं कि गाँधी परिवार से बाहर के किसी नेता को अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह बात एक बार से ज़्यादा और ज़ोर देकर कही है। हालाँकि इस पर अमल होगा, ऐसा कहना कठिन है।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने ‘तहलका’ से बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर कहा- ‘वर्तमान परिस्थितियों में सबसे बेहतर विकल्प यह होगा कि सोनिया गाँधी कांग्रेस स्थायी अध्यक्ष बनें। उनका विपक्ष के सभी बड़े नेताओं के साथ बेहतरीन तालमेल है। पार्टी के नेताओं में उनकी स्वीकार्यता किसी भी अन्य पार्टी नेता से कहीं ज़्यादा है। उनके फ़ैसले भी बहुत सोच-विचार कर किये गये होते हैं।’

हालाँकि पार्टी का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस उम्र में सोनिया गाँधी को मार्गदर्शक के रूप में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और राहुल गाँधी या प्रियंका गाँधी में से किसी एक को पार्टी का अध्यक्ष बनाना चाहिए। एक वर्ग ऐसा भी है, जिसमें नेता मानते हैं कि सचिन पायलट जैसे युवा को कमान सौंपकर पार्टी से बाहर गाँधी परिवार के निंदकों को ख़ामोश कर देना चाहिए।

अभी साफ़ नहीं है कि पार्टी किसे अध्यक्ष बनाएगी। अशोक गहलोत जैसे व$फादार; लेकिन राजनीतिक अनुभव में वज़नदार नेता को भी पार्टी अध्यक्ष चुन सकती है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि चुनाव में राष्ट्रीय चेहरा राहुल गाँधी या प्रियंका गाँधी को बनाना पार्टी की मजबूरी है; क्योंकि ‘पैन इण्डिया’ चेहरे के रूप में कांग्रेस के पास यह दो सबसे मजबूत चेहरे हैं।

पार्टी की पदयात्रा
अब अक्टूबर से कांग्रेस ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शुरू करने की तैयारी कर रही है। इसकी अगुवाई राहुल गाँधी करेंगे। क़रीब 3,500 किलोमीटर की इस यात्रा की शुरुआत कन्याकुमारी से होगी। कांग्रेस इस यात्रा के ज़रिये न सिर्फ़ राजनीतिक तौर पर खोयी अपनी ज़मीन तलाशने की कोशिश करेगी, बल्कि मोदी सरकार की विफलताओं को जनता के सामने रखेगी।

‘भारत जोड़ो यात्रा’ की रूपरेखा तैयार करने के लिए कांग्रेस के वॉर रूम काफ़ी सक्रिय हैं; क्योंकि पार्टी इसे जनता से संवाद की दिशा में बड़ी उम्मीद के रूप में देख रही है। भारत जोड़ो यात्रा समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह हैं, जबकि प्रियंका गाँधी, सचिन पायलट और अविनाश पांडे जैसे नेता इसमें हैं।
यह माना जाता है कि 2024 में लोकसभा चुनाव की तैयारी इस पद यात्रा से करने जा रही है। पार्टी को लगता है कि जनता से जो कनेक्ट उसने खोया है, वह फिर बहाल होगा। कांग्रेस सन्देश देना चाहती है कि भाजपा देश में धार्मिक उन्माद फैलाकर देश को तोडऩे का काम कर रही है और देश-जनता के असली मुद्दों की तरफ़ उसका ध्यान नहीं है। कांग्रेस जनता के सामने अपनी छवि ‘देश को जोडऩे वाली पार्टी’ के रूप में लाना चाहती है। राहुल गाँधी अक्सर इसकी बात करते हैं।

घोटाले का पर्याय बनीं ई-पॉस मशीनें!

राशन वितरण में आ रहीं दिक़्क़तें, लोग कर रहे शिकायत

मशीनों से घोटाले की कल्पना अधिकतर लोग नहीं करते। मगर इस युग में मशीनों से घोटाले होते हैं। सेवानिवृत्त अध्यापक यशवंत सिंह कहते हैं कि आधुनिक मशीनों के आने से लोग परिश्रम के बिना ही सब कुछ पा लेना चाहते हैं। यही कारण है कि अब घोटाले बढ़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश में घोटाले न हों, ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। राशन घोटाले के समाचार आने से क्रोधित सेवानिवृत्त अध्यापक यशवंत सिंह की तरह ही अन्य कई ग्रामीण भी इसे लेकर क्रोधित दिखते हैं।

विदित हो कि उत्तर प्रदेश में राशन घोटाले को रोकने तथा आम लोगों को सही, सुनिश्चित व सुचारू रूप से राशन वितरण के लिए लगभग आठ वर्ष पूर्व योगी आदित्यनाथ सरकार-1 में ई-पॉस अर्थात् इलेक्ट्रिक पीओएस मशीनों को लगाया गया था। पूरे प्रदेश में 80,000 से अधिक ई-पॉस मशीनें लगायी गयी थीं। सरकार के निर्देशानुसार वर्ष 2016 की शुरुआत से इन मशीनों के माध्यम से राशन वितरण आरम्भ हुआ था। मगर अधिकतर मशीनों ने आरम्भ से ही राशन वितरण कार्य से मानो मना ही कर दिया हो। पूरे प्रदेश में पचासों स्थानों पर राशन न मिलने से मशीनों द्वारा राशन बँटने की लोगों की प्रसन्नता पर पानी फिर गया। तबसे लेकर आज तक इन मशीनों ने राशन उपभोक्ताओं की नाक में दम करके रखा हुआ है। स्थिति ऐसी हो चुकी है कि कभी मशीनों की वजह से, तो कभी किसी अन्य कारण से लोगों को राशन न मिल पाने के समाचार पढऩे व सुनने को मिलते हैं।
जालिम नगला गाँव के पप्पू कैप्टन कहते हैं कि करोड़ों रुपये के व्यय से लगायी गयीं ई-पॉस मशीनें फेल होती दिख रही हैं, तो उन्हें ठीक करने पर भी करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे हैं। योगी सरकार तो स्थिति में सुधार के लिए ई-पॉस मशीनें लेकर आयी थी, मगर राशन वितरकों तथा अधिकारियों की मिलीभगत से घोटाले के द्वार खुलते दिख रहे हैं।

विदित हो कि प्रदेश के सभी 75 जनपदों के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित राशन की लगभग 80,000 दुकानों पर ई-पॉस मशीनें लगाने का ठेका सरकार ने दो कम्पनियों को दिया था। मशीनें भी लग गयीं। मगर आरम्भ से ही कभी नेटवर्क नहीं रहता है, तो कभी मशीन राशन कार्ड धारक के अँगूठे के निशान को पहचानने से मना कर देती है। प्रकाशित समाचारों से पता चलता है कि अधिकांश क्षेत्रों में 50-55 फ़ीसदी राशन कार्ड धारकों को ठीक तरह से राशन वितरण नहीं हो पा रहा है।

घोटाले की परतें
लिखित में राशन न मिलने की शिकायतों से पता चलता है कि नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, बुलंदशहर, अमरोहा, मुरादाबाद, बरेली, सहारनपुर, मेरठ, लखनऊ, प्रयागराज, रायबरेली, उन्नाव, औरैया, बलरामपुर, मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, आगरा, मथुरा, मैनपुरी तथा फ़िरोज़ाबाद समेत कई जनपदों में लगभग 350 करोड़ रुपये के राशन घोटाले की बात उत्तर प्रदेश एसटीएफ के माध्यम से उजागर हुई है।

एसटीएफ को मेरठ में हुए राशन घोटाले की शिकायत के आधार पर सितंबर, 2018 में जाँच करने के आदेश मिले थे। यह जाँच 14 जनपदों में की गयी थी। अभी शेष जनपदों में राशन घोटालों की जाँच हो सकती है। जाँच तो यहाँ तक बताती है कि राशन कार्ड धारकों का आधार नंबर मशीन में डालकर राशन निकाल लिया गया, मगर राशन कार्ड धारक को एक दाना भी प्राप्त नहीं हुआ। जाँच में सामने आया है कि केवल मेरठ में ही 27,000 राशन कार्ड धारकों के लिए राशन की 220 दुकानें हैं, जिन पर गड़बड़ी पायी गयी है। इतना ही नहीं, अकेले मेरठ के राशन कार्ड धारकों ने अलग-अलग थानों में 51 प्राथमिकी दर्ज करायी हैं।

करोड़ों का नुक़सान

सरकार ने राशन वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए प्रत्येक मशीन 20,000 रुपये में क्रय किया था। सभी 80,000 मशीनों को 160 करोड़ रुपये के व्यय से लगाया गया था। अब तक इन मशीनों का किराया और रखरखाव पर 12,00 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय किया जा चुका है। प्रत्येक मशीन के किराये व रखरखाव के लिए पहले सरकार 17 रुपये प्रति कुंतल के हिसाब से भुगतान करती थी, जिसे अब बढ़ाकर 21 रुपये प्रति कुंतल कर दिया गया है। इस तरह मशीन लगाने वाली कम्पनियों को प्रदेश की योगी सरकार प्रति वर्ष किराये व रखरखाव के लिए 240 करोड़ रुपये का भुगतान कर रही है। ये मशीनें वर्ष 2016 से लगातार उपयोग में लायी जा रही हैं।
सरकार के रिकॉर्ड में इन मशीनों के माध्यम से हर माह 15 करोड़ से अधिक राशन उपभोक्ताओं को राशन वितरित हो रहा है। मगर धरातल पर बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को राशन नहीं मिल पाता है। कई लोगों की शिकायत है कि उन्हें राशन नहीं मिला, जबकि उनके हिस्से का राशन बँट गया। लोग कह रहे हैं कि राशन विततरण के नाम पर घोटाले की कोई सीमा नहीं है। राजकुमार मौर्य बताते हैं कि उनका राशन कई बार गड़बड़ हुआ है। कभी चना नहीं मिलता, तो कभी रिफाइंड नहीं मिलता, सो अलग। मशीन बन्द हो गयी है। मशीन काम नहीं कर रही है। ऊपर से इस बार राशन नहीं आया है। इस प्रकार की कहानियाँ राशन वितरक आये दिन सुनाते रहते हैं। कई-कई चक्कर लगाने के बाद राशन मिल जाए, तो गनीमत समझो।

सत्यवीर नाम के एक राशन कार्ड धारक का कहना है कि राशन पहले हाथ से बँटता था, तब ठीक प्रकार से मिलता था, मगर अब तो सब राम भरोसे है। कभी मिल जाता है, तो कभी नहीं भी मिलता है। कभी बहुत जल्दी राशन वितरित हो जाता है, तो कभी महीने के अन्त में भी नहीं मिलता। सत्यपाल गंगवार कहते हैं कि राशन वितरण बन्द करके सरकार को उपभोक्ताओं के खाते में सीधे पैसे भिजवा देने चाहिए जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों के खाते में सीधे-सीधे पैसा भेजते हैं। इससे राशन वितरकों को घोटाला करने का मौक़ा ही नहीं मिलेगा। उनका कहना है कि जितना पैसा योगी आदित्यनाथ सरकार ई-पॉस मशीनों पर और राशन पर व्यय कर रही है, उतने पैसे को राशन कार्ड धारकों के बीच प्रति यूनिट के हिसाब से विभाजित करके देखे कि एक यूनिट के हिस्से में कितने रुपये आते हैं, जितने रुपये एक यूनिट के हिस्से में आएँ उस हिसाब से पूरे परिवार के पैसे राशन कार्ड के मुखिया के बैंक खाते में भेज दे। अगर सरकार ऐसा करती है, तो एक यूनिट के हिस्से में कुछ नहीं तो 1,000 रुपये आराम से आ आएँगे। इससे उसे महीने भर के खाने भर को राशन, तेल, दालें सब कुछ मिल जाएगा।

एक बुज़ुर्ग उपभोक्ता कहते हैं कि पहले राशन के साथ चीनी तथा मिट्टी का तेल भी मिलता था, अब तो न चीनी देखने को मिलती है और न मिट्टी का तेल। अब या तो पाँच किलो गेहूँ ले लो या पाँच किलो चावल। कोई मंत्री पाँच किलो राशन से महीना भर भोजन कर सकता है क्या? अगर कर ले, तो हम इतना राशन भी छोड़कर उसी मंत्री को दे देंगे। क्रोध में बुज़ुर्ग उपभोक्ता कहते हैं कि सरकार की आँखों पर पट्टी बँधी है, जो ये मशीनें लगा रखी हैं। ऐसा लगता है कि मशीनें राशन निगल रही हैं। राशन वितरक कहता है कि वह ईमानदार है, तो फिर सरकार यह बताये कि $गरीबों के हिस्से का राशन खा कौन रहा है?
इस विषय में मंत्रियों तथा स्थानीय नेताओं तक शिकायतें पहुँच रही हैं। थानों में भी शिकायतें पहुँच रही हैं तथा खाद्य वितरण विभाग से भी उपभोक्ता शिकायत कर रहे हैं। देखना यह है कि इस घोटाले में योगी आदित्यनाथ सरकार क्या कार्रवाई करती है?

मज़बूत ईडी, फिर भी लाखों करोड़ रुपये का बैंक क़र्ज़ बट्टे खाते में!

इस साल 28 मार्च को भारतीय रिजर्ब बैंक (आरबीआई) ने डेटा जारी किया था। इसमें दावा किया गया था कि वित्तीय वर्ष के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा सकल ग़ैर-निष्पादित परिसम्पत्तियों की वसूली वित्त वर्ष 2017-18 में 11.33 फ़ीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2018-19 में 13.52 फ़ीसदी और 2019-20 में 14.69 फ़ीसदी हो गयी है। हालाँकि बिल्ली थैले से बाहर आ गयी, जब 2 अगस्त को वित्त राज्य मंत्री भागवत के. कराड ने राज्यसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि बैंकों ने पिछले पाँच वित्तीय वर्षों में क़रीब 10 लाख करोड़ रुपये को क़र्ज़ बट्टे खाते में डाल दिया।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने पिछले पाँच वित्तीय वर्षों में क़रीब 10 लाख करोड़ रुपये के ऋण को बट्टे खाते में डाल दिया है। वित्त वर्ष 2021-22 में राइट-ऑफ की गयी राशि 1.57 लाख करोड़ रुपये थी। जबकि वित्त वर्ष 2020-21 में यह राशि 2.02 लाख करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2019-20 में 2.34 लाख करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2018-19 में 2.36 लाख करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2017-18 में 1.61 लाख करोड़ रुपये थी। वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान राइट-ऑफ राशि पिछले वित्त वर्ष के 2,02,781 करोड़ रुपये की तुलना में घटकर 1,57,096 करोड़ रुपये रह गयी। वित्त वर्ष 2019-20 में राइट-ऑफ राशि 2,34,170 करोड़ रुपये थी, और वित्त वर्ष 2018-19 में दर्ज राशि 2,36,265 करोड़ रुपये से कम थी, जो कि सभी पाँच वर्षों में सबसे अधिक थी। कुल मिलाकर पिछले पाँच वित्त वर्षों (2017-18 से 2021-22) के दौरान 9,91,640 करोड़ रुपये का बैंक ऋण बट्टे खाते में डाला गया है।

निश्चित ही बट्टे खाते में डाले गये क़र्ज़ से सवाल खड़े होते हैं। सवाल यह कि यह सब ऐसे समय में कैसे हो सकता है, जब ईडी बहुत मज़बूत है? प्रवर्तन निदेशालय ने 23 मार्च, 2022 तक 19,111 करोड़ रुपये की सम्पत्ति कुर्क की है। यह धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत ऋण भगोड़ों के कुछ मामलों से जुड़ी है, जो कि इन मामलों में 22,586 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की राशि का 84.61 फ़ीसदी है। इन कुर्क की गयी सम्पत्तियों में से 15,113 करोड़ रुपये, जो कि धोखाधड़ी की राशि का 66.91 फ़ीसदी है; को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बहाल कर दिया गया है।

ग़ौरतलब है कि केंद्र ने विलफुल बैंक लोन डिफॉल्टर्स या भगोड़े आर्थिक अपराधियों से निपटने के निर्देश जारी किये थे। इसके लिए एक अधिकृत प्रवर्तक के अनुरोध पर भारतीय नागरिकों और विदेशियों के सम्बन्ध में आप्रवासन ब्यूरो द्वारा एक लुक आउट सर्कुलर खोला जा सकता है। इसमें अधिकृत लोगों में भारत सरकार के उप सचिव के पद से नीचे का अधिकारी न हो; या एक अधिकारी, जो राज्य सरकार में संयुक्त सचिव के पद से नीचे का न हो ; या ज़िला अधिकारी; या पुलिस अधीक्षक; या विभिन्न क़ानून लागू करने वाली और सुरक्षा एजेंसियों के नामित अधिकारी; या इंटरपोल के नामित अधिकारी; या सभी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अध्यक्ष / प्रबन्ध निदेशक / मुख्य कार्यकारी; या भारत में किसी भी आपराधिक न्यायालय के निर्देशों के अनुसार तय लोग शामिल हैं।

गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि आव्रजन प्राधिकरण किसी भी व्यक्ति, जिसमें जानबूझकर चूककर्ता भी शामिल है; को भारत छोडऩे से रोका जा सकता है। उसके ख़िलाफ़ एलओसी जारी की गयी है। ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन ने अब तक बैंकों के इशारे पर 83 एलओसी खोले हैं। भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम, 2018 भारतीय अधिकार क्षेत्र से भागने वाले आर्थिक अपराधियों के ख़िलाफ़ प्रभावी कार्रवाई के लिए अधिनियमित किया गया है। यह भगोड़े आर्थिक अपराधियों की सम्पत्ति की कुर्की और ज़ब्ती का प्रावधान करता है और उन्हें किसी भी नागरिक दावे का बचाव करने से वंचित करता है। इसके अलावा सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 50 करोड़ रुपये से अधिक की ऋण सुविधाओं का लाभ उठाने वाली कम्पनियों के प्रमोटरों और निदेशकों और अन्य अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के पासपोर्ट की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने की सलाह दी है। आरबीआई के अनुसार, विलफुल डिफॉल्टर्स (जानबूझकर बने दिवालिया) के सम्बन्ध में सीआरआईएलसी डेटा 2018-19 से बनाये रखा जाता है। आँकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में विलफुल डिफॉल्टर्स की कुल संख्या 10,306 थी। वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान रिपोर्ट किये गये सबसे अधिक 2,840 विलफुल डिफॉल्टर्स की संख्या अगले वर्ष 2,700 थी। मार्च, 2019 के अन्त में विलफुल डिफॉल्टर्स की संख्या 2,207 थी, जो वित्त वर्ष 2019-20 में बढ़कर 2,469 हो गयी।

मार्च, 2022 के अन्त में शीर्ष 25 विलफुल डिफॉल्टर्स का विवरण साझा करते हुए कराड ने कहा कि गीतांजलि जेम्स लिमिटेड इस (डिफाल्टर्स) सूची में सबसे ऊपर है। ये डिफॉल्टर्स बैंकों के 59,000 करोड़ रुपये दबाये बैठे हैं। इसके बाद एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग, कॉनकास्ट स्टील एंड पॉवर, आरईआई एग्रो लिमिटेड और एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड आते हैं। फरार हीरा कारोबारी मेहुल चोकसी की कम्पनी गीतांजलि जेम्स पर बैंकों का 7,110 करोड़ रुपये बकाया है। वहीं एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग पर 5,879 करोड़ रुपये और कॉनकास्ट स्टील एंड पॉवर लिमिटेड का 4,107 करोड़ रुपये बकाया हैं। इसके अलावा आरईआई एग्रो लिमिटेड और एबीजी शिपयार्ड ने बैंकों से क्रमश: 3,984 करोड़ रुपये और 3,708 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की है।

अन्य विलफुल डिफॉल्टर्स जैसे फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड पर 3,108 करोड़ रुपये, विनसम डायमंड्स एंड ज्वेलरी पर 2,671 करोड़ रुपये, रोटोमैक ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड पर 2,481 करोड़ रुपये, कोस्टल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड पर 2,311 करोड़ रुपये और कुडोस केमी पर 2,082 करोड़ रुपये बकाया हैं। आरबीआई से मिली जानकारी के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों / भारतीय बैंकों (विदेशी बैंकों को छोड़कर) / चुनिंदा वित्तीय संस्थानों द्वारा रिपोर्ट किये गये 500 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी और उससे अधिक की धोखाधड़ी के मामलों में वित्त वर्ष 2019-20 में 79 मामले, वित्त वर्ष 2020-21 में 73 मामले और वित्त वर्ष 2021-22 में (30 जून 2021 तक) 13 मामले दर्ज हैं।
धोखाधड़ी पर आरबीआई मास्टर सर्कुलर-2015 में पाया गया है कि बेईमान उधारकर्ताओं द्वारा धोखाधड़ी विभिन्न तरीकों से की जाती है, जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ उपकरणों की धोखाधड़ी छूट, गिरवी रखे गये या गिरवी रखे शेयरों का धोखाधड़ी से निपटान, फंड डायवर्जन, आपराधिक उपेक्षा और दुर्भावनापूर्ण प्रबंधकीय विफलता शामिल है। एक क़र्ज़दारों का हिस्सा भी है। मास्टर सर्कुलर कुछ अन्य तरीक़ों को भी संदर्भित करता है, जिसमें जाली लिखित, हेरफेर की गयी खाता बही, फ़र्ज़ी खाते, अनधिकृत क्रेडिट सुविधाएँ, धोखाधड़ी वाले विदेशी मुद्रा लेन-देन, एकाधिक बैंकिंग व्यवस्था का शोषण और भूमिका के साथ तीसरे पक्ष की ओर से ऋण स्वीकृति और संवितरण कमी शामिल है।

सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के बड़े मूल्य की बैंक धोखाधड़ी से सम्बन्धित प्रणालीगत और व्यापक छानबीन के लिए एक फ्रेमवर्क जारी किया है, ताकि उनकी ग़ैर-निष्पादित परिसम्पत्तियों (एनपीए) के पुराने स्टॉक की जानकारी समय पर मिल सके और उसकी रिपोर्टिंग और जाँच हो सके। इस व्यवस्था के तहत 50 करोड़ से अधिक मूल्य के खातों, यदि उन्हें एनपीए के रूप में वर्गीकृत किया गया है; की सम्भावित धोखाधड़ी के कोण से बैंकों द्वारा जाँच की जाएगी। इस जाँच के निष्कर्षों पर एनपीए की समीक्षा के लिए बैंक की समिति के समक्ष एक रिपोर्ट रखी जाएगी। साथ ही किसी खाते के एनपीए होने की स्थिति में केंद्रीय आर्थिक ख़ुफ़िया ब्यूरो से क़र्ज़ लेने वाले की रिपोर्ट माँगी जाएगी। भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम-2018 आर्थिक अपराधियों को भारतीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र से बाहर रहकर भारतीय क़ानून की प्रक्रिया से बचने से रोकने के लिए अधिनियमित किया गया है।

यह अधिनियम एक भगोड़े आर्थिक अपराधी की सम्पत्ति की कुर्की, सम्पत्ति की ज़ब्ती और उसे किसी भी नागरिक दावे का बचाव करने से वंचित करने का प्रावधान करता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को सलाह दी गयी है कि वो 50 करोड़ रुपये से अधिक की ऋण सुविधा प्राप्त करने वाली कम्पनियों के प्रमोटरों / निदेशकों और अन्य अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के पासपोर्ट की प्रमाणित प्रति प्राप्त करें। उन्हें कहा गया है कि वो भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार और उनकी बोर्ड-अनुमोदित नीति के अनुसार विलफुल डिफॉल्टर्स की तस्वीरें प्रकाशित करने और अधिकारियों / कर्मचारियों के रोटेशनल ट्रांसफर को सख्ती से सुनिश्चित करने का निर्णय लें। पीएसबी के प्रमुखों को लुक आउट सर्कुलर के लिए अनुरोध जारी करने का भी अधिकार दिया गया है। सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को आरबीआई के निर्देशों के अनुसार और उनकी बोर्ड-अनुमोदित नीति के अनुसार इरादतन चूककर्ता की तस्वीरें प्रकाशित करने और 50 करोड़ रुपये से अधिक की ऋण सुविधा प्राप्त करने वाली कम्पनियों के प्रमोटरों / निदेशकों और अन्य अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के पासपोर्ट की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के लिए निर्देश / सलाह जारी की गयी है।

शीर्ष 10 विलफुल डिफॉल्टर्स (पूरी सूची 25 की है।)
गीतांजलि जेम्स लिमिटेड : 7110 करोड़ रुपये
इरा इंफ्रा इंजीनियरिंग लिमिटेड : 5879 करोड़ रुपये
कनकास्ट स्टील एंड पॉवर लिमिटेड : 4107 करोड़ रुपये
आरईआई एग्रो लिमिटेड : 3984 करोड़ रुपये
एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड : 3708 करोड़ रुपये
फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड : 3108 करोड़ रुपये
विनसम डायमंड्स ऐंड ज्वेवरी लिमिटेड : 2671 करोड़ रुपये
रोटोमैक ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड : 2481 करोड़ रुपये
कोस्टल प्रोजेक्ट्स लिमिटेड : 2311 करोड़ रुपये
कुडोस केमी लिमिटेड्स : 2082 करोड़ रुपये

गुजरात शराबकांड, मौत के सौदागर

गुजरात में एक बार फिर नक़ली शराब ने चार दर्ज़न से ज़्यादा लोगों की जान ले ली। अहमदाबाद से लेकर बोटाद ज़िले तक शराब माफिया की ज़हरीली शराब ने पूरे गुजरात में हाहाकार मचा दिया है। गम्भीर हालत में इलाज करा रहे लोगों में कई की हालत बेहद नाज़ुक है। इससे राजनीतिक हवा तेज़ चलने लगी है। क्योंकि गुजरात में यह हादसा ऐसे समय में हुआ है, जब कुछ ही महीनों में वहाँ विधानसभा चुनाव होने हैं और आम आदमी पार्टी को मिल रहे जनसमर्थन ने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की नाक में दम करके रखा हुआ है। लम्बे समय से गुजरात में वापसी की आस लगाये बैठी कांग्रेस भी इस मौक़े को हाथ से नहीं जाने देना चाहती। वहीं गुजरात में लोग कह रहे हैं कि शराबबंदी का मक़सद ही बाहरी शराब और नक़ली शराब की तस्करी को बढ़ावा देना है। ज़हरीली शराब के इस कांड से पहले सन् 2016 में सूरत के वडोदरा इलाक़े में क़रीब दो दर्ज़न से ज़्यादा लोग मर गये थे। उस समय पुलिस और सरकार ने लोगों की मौत की वजह शराब में मेथेनॉल अल्कोहल नाम के केमिकल के शराब में प्रयोग को माना था। इस बार भी सरकार और पुलिस का यही कहना है कि शराब में मेथेनॉल अल्कोहल नाम का केमिकल इस्तेमाल किया गया था, जिसके चलते इतने लोगों की मौत हो गयी।

फ़िलहाल गुजरात के अहमदाबाद और बोटाद में हुए ज़हरीली शराब कांड से दो बातें साफ़ होती हैं कि शराबबंदी के बावजूद अवैध ज़हरीली शराब इन दो जगहों पर एक ही जगह से किसी एक बड़े माफिया के इशारे पर बिकती है और शराबबंदी का फ़ायदा माफिया उठा रहे हैं। राज्य के डीजी आशीष भाटिया ने संवाददाता सम्मेलन में कहा है कि इस कांड का मुख्य आरोपी जयेश है। उससे पूछताछ में ख़ुलासा हुआ है कि उसने हाल ही में 40,000 रुपये का मेथेनॉल केमिकल बेचा था। मरने वालों और बीमार लोगों ने इसी केमिकल और पानी का मिश्रण पिया था। डीजी ने दावा किया कि आरोपी जयेश ने अहमदाबाद स्थित अमोस केमिकल कम्पनी से यह केमिकल चुराया था, जिसके सीसीटीवी फुटेज भी मिले हैं। उसने इस चुराये गये मेथेनॉल अल्कोहल में एक फ़ीसदी पानी मिलाकर कुल 600 लीटर नक़ली शराब का पेय तैयार किया था, जिसमें से बचा हुआ 460 लीटर मेथेनॉल पुलिस ने उसके पास से ज़ब्त कर लिया है। वहीं जयेश के अपनों का कहना हैं कि जयेश ने अमोस कम्पनी से केमिकल चुराया नहीं था, बल्कि ख़रीदा था। इसलिए अमोस कम्पनी के मालिकों को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए। एटीएस की टीम ने इस मामले में जयेश समेत क़रीब 14 लोगों को गिरफ़्तार किया है।

सरकार ने बनायी जाँच समिति
इस शराब कांड से भाजपा सरकार की पूरे राज्य में निंदा हो रही है। भाजपा को मालूम है कि अगर इस समय इस मामले में सख़्ती नहीं बरती गयी, तो यह उसके लिए नुक़सान का सौदा हो सकता है। क्योंकि आने वाले कुछ ही महीनों में गुजरात में चुनाव होने है, जिसमें इस मुद्दे को विपक्षी दल भुनाने से पीछे नहीं रहेंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों की निगरानी वाली एक जाँच समिति बनायी है, जिसे 24 घंटे में रिपोर्ट देने का आदेश भी था। फ़िलहाल पुलिस पूरे राज्य में शराब तस्करी रोकने के लिए सख़्ती से काम कर रही है, ताकि अहमदाबाद और बोटाद जैसी कोई और घटना न हो।

पुलिस पर गिरी गाज, माफिया आज़ाद
गुजरात एक ऐसा राज्य है, जहाँ बड़े-बड़े शराब माफिया सक्रिय हैं। इस बात की पुष्टि इसी से होती है कि गुजरात के अन्दर शराबबंदी के बावजूद क़रीब 40 फ़ीसदी लोग शराब पीते हैं। सब्ज़ी और परचून की दुकानों तक पर खंबा के नाम से शराब मिल जाती है। कुछ लोगों का कहना है कि गुजरात में शराब की कमी नहीं है; लेकिन चोरी से ही मिल पाती है। इससे तो अच्छा होता कि सरकार शराब के ठेके खोल देती। फ़िलहाल राज्य सरकार ने बोटाद और अहमदाबाद ज़िलों के पुलिस अधीक्षकों का ट्रांसफर करने के साथ-साथ छ: पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है। गुजरात के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) राजकुमार ने इसके लिए पुलिस की भूमिका को ज़िम्मेदार मानते हए यह क़दम उठाया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे अवैध शराब की तस्करी रुकेगी? क्योंकि छोटे-मोटे अवैध शराब माफिया को गिरफ़्तार करने और चंद पुलिस वालों को सस्पेंड करने से हर रोज़ माफिया और उनको शह देने वाले अफ़सरों को लाखों कमाकर देने वाला यह धंधा किसी बड़ी मछली की शह के बग़ैर राज्य में पनप ही नहीं सकता। इसलिए जब तक बड़े माफिया को जेल नहीं भेजा जाएगा, तब तक गुजरात में शराब की अवैध बिक्री पर रोक लगाना नामुमकिन है।

विपक्षी दलों को मिला मौक़ा
इस शराब कांड से विपक्षी दलों, ख़ासकर कांग्रेस और अभी पैर जमाने में लगी आम आदमी पार्टी को सरकार को घेरने का मुद्दा दे दिया है। कांग्रेस का कहना है कि राज्य की भाजपा सरकार इस मामले की जाँच उच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश से कराये। गुजरात की इस मुख्य विपक्षी पार्टी ने भाजपा सरकार पर अपने संरक्षण में नशे का अवैध कारोबार कराने का आरोप लगाते हुए लोगों से सरकार के बहिष्कार की अपील की है। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने ट्वीट करके सरकार को घेरा है। उन्होंने लिखा है- ‘ड्राई स्टेट गुजरात में ज़हरीली शराब पीने से कई घर उजड़ गये। वहाँ लगातार अरबों रुपये के मादक पदार्थ भी बरामद हो रहे हैं। यह चिंता की बात है। बापू और सरदार पटेल की धरती पर, ये कौन लोग हैं, जो धड़ल्ले से नशे का कारोबार कर रहे हैं? इन माफिया को कौन-सी ताक़तें संरक्षण दे रही हैं?’

वहीं आम आदमी पार्टी के नेता भी इस मामले में भाजपा सरकार को घेर रहे हैं। उनका कहना है कि उस पार्टी को सत्ता में रहने का कोई हक़ नहीं है, जो लोगों के जीवन से खिलवाड़ करे। आम आदमी पार्टी इस बार चुनाव की तैयारियों में जिस शिद्दत से लगी है, उससे लोगों में उसकी चर्चा चल रही है। इसकी एक वजह इस पार्टी द्वारा लोगों के हित के मुद्दों की बात करना है।

संसद में नहीं हुई चर्चा
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि भाजपा की सरकार गुजरात में भी है और केंद्र में भी, बावजूद इसके संसद में केंद्र सरकार ने न तो इस शराब कांड पर शर्मिंदगी जतायी और न ही चर्चा की। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा ऐसा जानबूझकर कर रही है, ताकि देश में लोगों को उसकी करतूत का पता न चल सके। कांग्रेस नेता इस मामले में मीडिया के सामने लगातार बयान देकर भाजपा और उसकी सरकार को घेरने में लगे हैं। संसद में विपक्ष द्वारा इस शराब कांड और उस पर हंगामे की चर्चा भी अख़बारों की सुर्ख़ी बनी हुई है।

शराबबंदी से नहीं रुकी बिक्री
किसी राज्य में शराबबंदी इसीलिए की जाती है, ताकि लोगों की नशे की लत छूट सके और वे बर्बादी से बच सकें। लेकिन शराब पीने वालों को इस लत छुटकारा दिलाना इतना आसान नहीं होता। इसकी सबसे बड़ी वजह शराबबंदी वाले राज्यों में शराब की अवैध बिक्री पर रोक नहीं लग पाना है। भारत में फैशन बन चुका नशा अब युवाओं को ज़्यादा बर्बाद कर रहा है। सन् 2019 में मुम्बई, दिल्ली, पुणे, कोलकाता, राजस्थान, पंजाब समेत कई शहरों में नशाख़ोरी के एक सर्वे से पता चलता है कि देश में क़रीब 80 फ़ीसदी से ज़्यादा युवा 16 से 18 वर्ष की उम्र में ही कोई-न-कोई नशा कर चुके होते हैं। क़रीब 75 फ़ीसदी युवा 21 साल की उम्र से पहले ही शराब पीकर देख चुके होते हैं। वहीं 47 फ़ीसदी युवा सिगरेट और 20 फ़ीसदी युवा ड्रग्स आदि का इस्तेमाल कर चुके होते हैं। गुजरात में शराबबंदी लागू होने के बावजूद बड़ी संख्या में यहाँ के युवा, युवतियों से लेकर उम्रदराज़ लोग तक तंबाकू, शराब, सिगरेट और अन्य तरह के नशे में लिप्त हैं। यही वजह है कि गुजरात नशे का कारोबार $खूब फलफूल रहा है। शराब पीने वालों का हाल यह है कि राज्य में अब तक ज़हरीली शराब पीने से 3,000 से भी ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। साल 2008 में अहमदाबाद में ही ज़हरीली शराब से 150 लोगों की मौत हुई थी।

बता दें कि गुजरात में यदि किसी का स्वास्थ्य ख़राब है और उसे शराब पीने से राहत मिलती है, तो वह स्वास्थ्य ख़राब होने की डॉक्टर की रिपोर्ट दिखाकर शराब पीने का परमिट हासिल कर सकता है। इसे हेल्थ परमिट कहा जाता है। पूरे राज्य की आबादी क़रीब छ: करोड़ है, जिसमें में फ़िलहाल राज्य के क़रीब 31 हज़ार से ज़्यादा लोगों के पास हेल्थ परमिट हैं। शराब की वैध बिक्री के लिए गुजरात उच्च न्यायालय में भी मामला चल रहा है। फ़िलहाल सरकार को अवैध शराब माफिया के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की ज़रूरत है।

अतिवादी चीन

ताइवान को अपना बताने वाला चीन उसे दिखा रहा आँखें

चीन ताइवान को तबसे आँखें दिखा रहा है, जबसे अमेरिका की प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी ताइवान की यात्रा पर गयी हैं। यहाँ सवाल उठता है कि क्या चीन ताइवान को यूक्रेन बनाने की तैयारी में है? क्या अमेरिका ताइवान की मदद से वैसे ही पीछे हट जाएगा, जैसा उसने यूक्रेन के मामले में किया था; या नैंसी पेलोसी ने ताइवान के साथ खड़े रहने का जो वादा वहाँ की यात्रा के दौरान किया था, उसे अमेरिका पूरी शक्ति से निभाएगा?

यहाँ बता दें कि कुछ समय पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन को एक चिट्ठी लिखी थी। लेकिन ताइवान की स्वतंत्र पहचान की प्रवल समर्थक वेन ने उसे कूड़ेदान में फेंक दिया था। सख़्त मिज़ाज की वेन ताइवान के लोगों में बहुत लोकप्रिय हैं और कोरोना की महामारी के दौरान अपने देश में उसके प्रबंधन को दुनिया ने एक मॉडल के रूप में अपनाया था। चीन ताइवान पर तुरन्त हमला करेगा, इसकी सम्भावना कम है। क्योंकि फ़िलहाल कई दशक से चीन ने कोई युद्ध नहीं लड़ा है। चीन ने ज़मीन पर आख़िरी युद्ध सन् 1979 में लड़ा था, जब उसने वियतनाम पर हमला किया था।

हालाँकि चीन के लिए चीज़ें इतनी आसान नहीं हैं; भले वह आक्रामक रुख़ दिखा रहा हो। नैंसी पेलोसी के वापस अमेरिका लौटते ही चीन ने अमेरिका को अपना सख़्त रुख़ दिखाने और ताइवान को दबाव में लाने के उद्देश्य से ताइवान के चारों तरफ छ: जगह पर युद्ध अभ्यास किया। हालाँकि हफ़्ते भर बाद ही ताइवान ने भी चीन के मुक़ाबले अपनी ताक़त का शक्ति प्रदर्शन करने का ऐलान कर चीन को भौचक्का कर दिया। यह तब हुआ जब चीन जल्दी ही दूसरा युद्ध अभ्यास करने की धौंस दिखा रहा था।

चीन के लिए इस दौरान ख़राब बात यह भी हुई कि चीन के सैन्‍य अभ्‍यास का असर ताइवान के साथ-साथ जापान पर भी पड़ा है। इसके चलते आसियान देशों ने चीन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। आसियान देशों के विदेश मंत्रियों ने ताइवान द्वीप के समीप चीनी सैन्‍य अभ्‍यास की कड़ी निंदा की। यही नहीं, आसियान देश नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा को शान्तिपूर्ण बता चुके हैं। ज़ाहिर है आसियान देशों के ख़िलाफ़ खड़े होने का मतलब होगा हिन्द प्रशांत क्षेत्र में चीन का अकेले पड़ जाना।

चीन पहले ही पेलोसी की ताइवान यात्रा से बौखलाया हुआ है; क्योंकि उसे इससे दुनिया के सामने नीचा देखना पड़ा है। कारण है चीन का ताइवान को अपना हिस्सा बताना। ताइवान ख़ुद को स्वतंत्र देश कहता है। ताइवान का दावा है कि चीन ने युद्धाभ्यास के दौरान उसके द्वीप पर क़ब्ज़े और ताइवानी नौसेना पर हमले का मॉक टेस्ट भी किया था। अपनी तैयारी के लिए ताइवान की युद्धाभ्यास की घोषणा का चीन को नापसन्द करने वालों और ताइवान से सहानुभूति रखने वाले देशों ने स्वागत ही किया। जहाँ तक दुनिया की बात आज की तारीख़ में सिर्फ़ 13 देश ताइवान को एक अलग और सम्प्रभु देश मानते हैं। चीन का दबाव इसका एक बड़ा कारण है, जिससे वह ताइवान को एक अलग राष्ट्र मान्यता देने से कतराते हैं। चीन नहीं चाहता कि दूसरे देश ताइवान को अलग पहचान वाला देश बताएँ; क्योंकि इससे उसके ताइवान का अपना हिस्सा होने के दावे पर सवाल उठेंगे। ताइवान की अलग सरकार है। चीन को यही बात बहुत खलती है। हाल में रक्षा मंत्री ने कहा था कि चीन के साथ उसके सम्बन्ध पिछले 40 साल में सबसे ख़राब दौर से गुज़र रहे हैं।

अमेरिका ने भले ताइवान को हर हालत में समर्थन का ऐलान किया है; लेकिन उसके ताइवान के साथ आधिकारिक राजनयिक रिश्ते नहीं हैं। यही नहीं, भारत ही की ही तरह अमेरिका भी चीन की ‘एक चीन नीति’ का समर्थन करता है। इसके बावजूद अमेरिका ताइवान के साथ अपने रिश्तों के क़ानून के चलते उसे हथियार बेचता है। यह क़ानून कहता है कि अमेरिका ताइवान की आत्मरक्षा में उसका मददगार रहेगा।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि चीन ने योनागुनी और सेनकाकस द्वीपों के पास युद्धाभ्यास किया। यह माना जाता है कि चीन ताइवान को सबक़ सिखाने के लिए ताइवान के कुछ द्वीपों पर क़ब्ज़ा करना चाहता है। वैसे सेनकाकस जापान शासित द्वीप है। हालाँकि चीन और ताइवान दोनों इस पर अपने-अपने दावे करते हैं। यही कारण है कि चीन के इस द्वीप में अभ्यास करने के साथ-साथ जापान ने भी कड़ा विरोध किया। अभ्यास के दौरान चीन की मिसाइलें इस क्षेत्र में गिरीं थीं।

ताक़त और कमज़ोरी ताइवान की ताक़त उसकी राष्ट्रपति साई इंग वेन की भी हैं, जिन्हें बहुत मज़बूत नेता माना जाता है। क़रीब 2.36 करोड़ आबादी वाले ताइवान को लेकर चीन भले आक्रामक रहता है। लेकिन वेन कभी झुकती हुई दिखायी नहीं दीं। सन् 2016 में वेन ताइवान की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं, तो इसका बड़ा कारण देश की स्वतंत्र पहचान का उनका मज़बूत इरादा था। अमेरिका से क़ानून की मास्टर डिग्री और ब्रिटेन के लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पीएचडी करने वालीं वेन ने क़ानून और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की पढ़ाई भी की है। चीन के ख़िलाफ़ उनका रुख़ ही देश में उनके जबरदस्त समर्थन का आधार है। भले ही वेन ताइवान की मज़बूत इरादों वाली महिला राष्ट्रपति हों; चीन की सैन्य ताक़त के मुक़ाबले ताइवान कहीं नहीं ठहरता। अमेरिका की मदद के बिना ताइवान लम्बे समय तक चीन का सैन्य विरोध करने की क्षमता नहीं रखता। इस साल आयी ग्लोबल फायर पॉवर इंडेक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ताइवान जहाँ दुनिया की 21वीं सबसे बड़ी सैन्य ताक़त है, वहीं चीन इस मामले पर तीसरे नंबर पर है। चीन के पास 20 लाख, जबकि ताइवान के पास महज़ 1.70 लाख सक्रिय सैनिक हैं। इसी तरह चीन के पास 3,285 एयर क्रॉफ्ट हैं; जबकि ताइवान के पास 751 एयर क्रॉफ्ट हैं। इसके अलावा चीन के पास 281 लड़ाकू हवाई जहाज़, जबकि ताइवान के पास महज़ 91 ही हैं। चीन की बेड़े में 79 पनडुब्बियाँ हैं, जबकि ताइवान के पास सिर्फ़ चार ही हैं। ज़ाहिर है ताइवान के लिए चीन का सैन्य मुक़ाबला करना बहुत आसान नहीं होगा। हाँ, यदि अमेरिका खुलकर ताइवान के साथ आये, तो तस्वीर कुछ अलग हो सकती है।

यहाँ एक और बात है। यदि चीन ताइवान पर युद्ध थोपता है, तो इसका बहुत बुरा असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कम्पनी, दुनिया के 92 फ़ीसदी एडवांस सेमीकंडक्टर बनाती है। दुनिया भर में सेमीकंडक्टर से होने वाली कमायी का 54 फ़ीसदी हिस्सा ताइवान की कम्पनियों के पास है। युद्ध की स्थिति में दुनिया में मोबाइल फोन, लैपटॉप, ऑटोमोबाइल, हेल्थ केयर, हथियारों का उत्पादन संकट में पड़ जाएगा। इस तरह यूक्रेन युद्ध के कारण पैदा हुए खाद्यान्न संकट और इससे उपजी महँगाई में समस्या भी जुड़ जाएँगी।

अतिक्रमणवादी सोच
चीन ने आख़िरी बार सन् 1999 में मकाउ पर क़ब्ज़ा किया था। वैसे सन् 1949 में जब कम्युनिस्ट शासन आया, तो चीन ने तिब्बत पर सन् 1951 में, पूर्वी तुर्किस्तान पर सन् 1949 में, तिब्बत पर सन् 1950 में और इनर मंगोलिया पर सन् 1949 में ही क़ब्ज़ा कर लिया; या कहें कि उन पर अपना दावा जता दिया। इसके बाद सन् 1997 से हॉन्गकॉन्ग और सन् 1999 से मकाउ उसके क़ब्ज़े (दोनों चीन के विशेष प्रशासनिक क्षेत्र) में हैं। चीन ने छ: देशों को अपने नक्शे में रखा है और उसका इन पर क़ब्ज़ा है या उन्हें अपना हिस्सा बताता है और इसमें ताइवान भी शामिल है।

ताइवान और चीन के बीच यह जंग 70 साल लम्बी है। ज़मीन ही नहीं चीन 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले दक्षिणी चीन सागर पर न सिर्फ़ अपना दावा करता है, बल्कि उसने वहाँ आर्टिफिशियल आइलैंड तक बना लिया है। चीन ने दक्षिण चीन सागर में स्प्रेटली चेन के पास यह आर्टिफिशियल आइलैंड बनाये हैं।
चीन का दावा कि दक्षिणी चीन सागर से उसका ताल्लुक़ 2,000 साल से भी ज़्यादा पुराना है। यही नहीं, चीन ने कुछ साल पहले हिमालय पर्वत को भी अपना बताया था। यहाँ यह भी दिलचस्प है कि कुल 97,6,961 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले चीन की सीमा 22,117 किलोमीटर तक है और दुनिया में वह सबसे ज़्यादा 14 देशों के साथ सीमा साझा करता है। लेकिन ख़राब चीज़ यह है कि इन सभी से उसका कोई-न-कोई विवाद है। दिलचस्प यह है कि इन देशों का कुल क्षेत्र 41,13,709 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक है, जो चीन के कुल क्षेत्रफल का 43 फ़ीसदी है।

आपराधिक मानसिकता

देश में ख़त्म नहीं हो रही मनचाहे बच्चे की चाहत के कारण पनपी लिंग निर्धारण की लालसा

हाल ही में देश की राजधानी दिल्ली के रोहिणी ज़िले के अमन विहार इलाक़े में पुलिस ने अवैध लिंग निर्धारण (जाँच) और गर्भपात रैकेट का भंडाफोड़ करके इसमें शामिल दो महिलाओं को गिरफ़्तार किया। एक महिला फ़रार हो गयी। दरअसल पुलिस को सूचना मिली कि हरियाणा के सोनीपत में एक दवा विक्रेता के यहाँ काम करने वाला रविंदर नामक आदमी गर्भ में लिंग निर्धारण के ग़ैर-क़ानूनी धंधे में शामिल है। पुलिस ने नक़ली ग्राहक को उसके पास भेजा। दोनों के बीच 28,000 रुपये में सौदा तय हुआ। पुलिस भी छापे के लिए तैयार थी। तय रणनीति के मुताबिक, दिल्ली में उन दोनों महिलाओं को पकड़ लिया, जो यह काम करवाने में अहम भूमिका निभाती थीं। पकड़ी गयी दोनों महिलाओं में से एक आशा वर्कर और एक एएनएम है।

आशा वर्कर व एएनएम प्रथम पंक्ति की स्वास्थकर्मी (हैल्थ वर्कर्स) हैं और इनका काम महिलाओं व बच्चों तक सरकारी स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाना था। साथ ही यह सुनिश्चित करना कि समय पर माँ (जच्चा) का टीकाकरण हो जाए और वे स्वस्थ शिशुओं को जन्म दे सकें। देश भर में कोरोना के टीकाकरण अभियान को सफल बनाने में आशा वर्कर्स के योगदान को सराहा भी गया है। गिरफ़्तार हुई दोनों महिलाओं ने पुलिस को बताया कि सीमा नाम की नर्स अमन विहार में क्लीनिक चलाती थी, जहाँ वह लिंग निर्धारण करती थी। पुलिस ने सरिता के क्लीनिक पर छापा मारा, सरिता फ़रार थी। उसके क्लीनिक पर ताला लगा हुआ था। पुलिस ने ताला तोड़कर वहाँ से भारी मात्रा में दवाएँ, इंजेक्शन और गर्भ ख़त्म करने वाली गोलियाँ मिलीं।

जून के महीने में हरियाणा के गुरुग्राम ज़िले के पटौदी में वहाँ के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने ग़ैर-क़ानूनी लिंग जाँच करने के मामले में दो नीम-हकीमों व एक डॉक्टर को गिरफ़्तार किया गया था। छापे के दौरान वहाँ से 45,000 रुपये नक़द व एक पोर्टेबल अल्ट्रासांउड मशीन मिली। इसी तरह मई महीने में पुणे में भी इस तरह का मामला सामने आया। इन तीनों मामलों में आरोपियों के ख़िलाफ़ पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम-1994 (पीसी व पीएनडीटी) के तहत मामले दर्ज किये गये हैं।

दरअसल ये वो मामले हैं, जो मीडिया के ज़रिये बाहर आ जाते हैं। बताते हैं कि क़ानून लागू होने के 26 साल बाद भी देश के महानगरों, क़स्बों में भ्रूण का लिंग जानने वाला ग़ैर-क़ानूनी धंधा जारी है। समाज को दोषारोपण करने के साथ-साथ यह बात भी स्वीकार करनी पड़ेगी कि सरकार एजेंसियाँ क्या कर रही हैं? यह ग़ैर-क़ानूनी काम करने वालों को आख़िर क़ानून का डर क्यों नहीं है? ग़ौरतलब है कि देश में कन्या भ्रूण हत्या को रोकने और गिरते लिंगानुपात के मद्देनज़र पीसी व पीएनडीटी अधिनियम-1994 पारित किया गया। इसके तहत प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण की जाँच पर प्रतिबंध है। यह अधिनियम गर्भाधान से पूर्व बाद में लिंग की जाँच पर रोक लगाने का प्रावधान करता है। अधिनियम को लागू करने का मुख्य मक़सद भ्रूण के लिंग निर्धारण करने वाली तकनीक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाना और लिंग आधारित गर्भपात के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीक के दुरुपयोग को रोकना है। कोई भी प्रयोगशाला या केंद्र या क्लीनिक भ्रूण के लिंग का निर्धारण करने के मक़सद से अल्ट्रासोनोग्राफी सहित कोई परीक्षण नहीं करेगी। इसका उल्लंघन करने वाले अल्ट्रासोनोग्राफी केंद्र चलाने वाले, डॉक्टर, लैब कर्मी को तीन से पाँच साल तक की सज़ा व 10 से 50,000 रुपये तक का ज़ुर्माना हो सकता है। गर्भवती महिला या उसके रिश्तेदारों को शब्दों, संकेतों या किसी अन्य विधि से भ्रूण का लिंग नहीं बताया जा सकता। कोई भी व्यक्ति, जो प्रसव पूर्व गर्भाधान लिंग निर्धारण सुविधाओं के लिए नोटिस या किसी भी दस्तावेज़ की शक्ल में विज्ञापन देता है या इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट रूप में या अन्य किसी रूप में इश्तहार देता है या ऐसे किसी भी काम में संलग्न पाया जाता है, तो उसे तीन साल की सज़ा व 10,000 रुपये तक का ज़ुर्माना हो सकता है। इस क़ानून को बने 27 साल हो गये हैं और अब तक इसके तहत कितने लोग दोषी पाये गये, इस बाबत एक संसदीय कमेटी की रिपोर्ट का ज़िक्र करना प्रासगिंक है।

सन् 2021 में संसद के शीत सत्र यानी दिसंबर, 2021 में महिला सशक्तिकरण पर गठित संसदीय समिति ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना पर अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दिसंबर, 2020 तक देश में पीसी व पीएनडीटी अधिनियम-1994 के तहत बीते 25 साल में 617 लोगों को सज़ा सुनायी गयी। अभी देश में 3,158 ऐसे मामले लम्बित हैं। इस समिति ने पाया कि देश के 36 राज्यों-केंद्र शासित राज्यों में से 18 ऐसे हैं, जहाँ ऐसा एक भी मामला न तो दर्ज किया गया और न ही किसी को अभी तक सज़ा सुनायी गयी। 31 सदस्यों की इस समिति ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों को देरी से निपटाने का एक अर्थ यह भी समझा जा सकता है कि इस अधिनियम की मूल आत्मा यानी मूल मक़सद को कमज़ोर करना है। समिति ने यह भी सिफ़ारिश की है कि ऐसे मामलों का निपटारा छ: महीनों के अन्दर हो जाना चाहिए। राज्यों को ऐसे मामले दर्ज करने व उनके रिकॉर्ड ऑनलाइन रखने के निर्देश पहले ही दिये जा चुके हैं। लेकिन समिति ने अपनी जाँच में पाया कि केवल 18 राज्य ही अब तक ऐसा तंत्र विकसित कर पाये हैं।

समिति ने इस पर भी रोशनी डाली कि देश में 71,096 नैदानिक सुविधा केंद्र हैं। इनमें से कुछ केंद्र व चिकित्सक भ्रूण लिंग बताने के ग़ैर-क़ानूनी धंधे में शामिल हैं। ग़ौरतलब है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5, 2019-2021 के मुताबिक, भारत में जन्म के समय लिंगानुपात (शून्य से पाँच साल की आयु तक) प्रति 1,000 लड़कों पर 929 लड़कियाँ हैं। जन्म लिंगानुपात में लड़कों व लड़कियों की संख्या में यह फ़ासला चिन्ताजनक है। बेशक एनएफएचएस-4 (2015-16) में जन्म लिंगानुपात 919 था। मगर बीते पाँच वर्षों में इसमें कुछ सुधार देखने को मिला और यह आँकड़ा अब 929 हो गया है। लेकिन प्राकृतिक बाल लिंगानुपात के अनुसार यह आँकड़ा प्रति 1,000 लड़कों पर 955 लड़कियों का है। हालाँकि भारत इस दृष्टि से बहुत पीछे है। ऐसे कई राज्य हैं, जहाँ यह राष्ट्रीय औसत से भी कम है। जैसे- आंध्र प्रदेश में 1,000 लड़कों पर 877 लड़कियाँ, अरुणाचंल में 912, असम में 916, चंडीगढ़ में 820, गोवा में 822, हिमाचल प्रदेश में 843, झारखण्ड में 781, महाराष्ट्र में 878, पंजाब में 858, तमिलनाडु में 893, तेलगांना में 873, दमन और दीव में 705 व लद्दाख़ में महज़ 897 ही है। यहाँ सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ मुहिम अपना अपेक्षित नतीजे क्यों नहीं दिखा रही है? लिंगानुपात में कमी के अलावा देश में कुल कार्यबल में भी कामकाजी महिलाओं के प्रतिशत में भी कमी आयी है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के ये आँकड़े आगाह करते हैं कि दुनिया भर में होने वाले सालाना लिंग चयन गर्भपात के कारण जन्म नहीं लेने वाली लड़कियों की संख्या क़रीब 12 से 15 लाख है, जिसमें से 90 फ़ीसदी मामले भारत और चीन के हैं।

इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारतीय समाज लड़कियों के मामले में तंग नज़रिया रखता है। आज भी यहाँ लड़कियों को बोझ मानने की प्रवृत्ति ज़िन्दा है। लड़कों को प्राथमिकता देने और दहेज लेने पर क़ानूनन प्रतिबंध है। लेकिन बावजूद इसके सरेआम इन दोनों का ही प्रचलन जारी है। लड़कियों की तुलना में लड़कों को प्राथमिकता देना यहाँ की संस्कृति का हिस्सा मान लिया गया है। पुरुष प्रधान सोच लड़कियों की प्रगति की राह में बाधा है। पाँच ख़रब की अर्थ-व्यवस्था बनाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है। आज़ादी के 75वें साल में भी भ्रूण हत्या के मामले कटघरे में तो खड़ा कर ही देते हैं।

देश में शिक्षित महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। लेकिन ये सवाल भी हमारे सामने हैं कि महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति कितनी सजग हैं और इनके इस्तेमाल के लिए कितना आगे आती हैं? समाज कितना बदला है? लड़कियों, महिलाओं को आगे बढऩे के वास्ते समाज कितना समर्थन करता है? वह इस पर कितना निवेश करता है? वंश को आगे बढ़ाने की प्रथा में लड़कों के साथ लड़कियों को भी बराबर की जगह देने के लिए कितना खुद को बदलता है? इन सवालों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। बाल लिंगानुपात के आँकड़ों में लड़कियों का कम दर्शाना एक सामाजिक समस्या तो है ही, पर इसके मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक व आर्थिक दुष्प्रभाव भी होते हैं। सरकारी तंत्र को और अधिक सख्ती से पेश आने की ज़रूरत है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मौज़ूदा सरकार ने जो नये भारत का नारा गढ़ा है, उसमें लड़कियों को जन्म देने से पहले कोई उनकी हत्या न करे। तभी लैंगिक बराबरी ज़मीनी स्तर पर नज़र आयेगा।

क्या ख़त्म हो जाएगा अल-क़ायदा?

लादेन के बाद जवाहिरी की मौत से इस ख़ूँख़ार आतंकी संगठन को लगा बड़ा झटका

आज से 11 साल पहले ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी सील कमांडो के हाथों मारे जाने के बाद अब अल-क़ायदा में उसके उत्तराधिकारी आयमान अल जवाहिरी का भी अमेरिका ने काबुल में ख़ात्मा कर दिया। यह माना जाता है कि लादेन के समय अल-क़ायदा जितना मज़बूत था, उतना जवाहिरी के समय नहीं रहा। वो कुछ देशों में गुटों में भी बँटा है। सैफ-अल-अदेल अल-क़ायदा का नया सरगना हो सकता है, जो कभी लादेन का सुरक्षा प्रमुख रहा है। लेकिन अमेरिका को अल-क़ायदा के इन दो दुर्दांत आतंकियों को ख़त्म करने में 20 साल लग गये। अल-क़ायदा को ख़त्म करने के लिए ही अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान गया और उसने नाटो सेनाओं को युद्ध में झोंका। एक अनुमान के मुताबिक, उसे इन सालों में क़रीब 180 लाख करोड़ रुपये फूँकने पड़े। हजारों सैनिकों और नागरिकों की जान गयी वो अलग। ऐसे में यह बड़ा सवाल है कि क्या लादेन और जवाहिरी जैसे योजनाकारों के अभाव में अल-क़ायदा ख़त्म हो जाएगा? इसका जवाब मुश्किल है। लेकिन यह सच है कि अल-क़ायदा समय के साथ कमज़ोर हो रहा है और उस पर दबाव जारी रहता है, तो उसके बिखरने की सम्भावना है। भले इस दौरान वह अपने मज़बूत होने का सन्देश देने के लिए इक्का-दुक्का बड़े हमले कर दुनिया को थर्राने की कोशिश करे।

अल-क़ायदा भारत को निशाने पर लेने की बहुत कोशिश करता रहा है। कश्मीर में उसने हाल के दशकों में अपने पैर जमाने की बड़ी कोशिश की लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। जवाहिरी ने एक समय कश्‍मीर की स्थिति की तुलना फ़िलस्‍तीन से की थी। जवाहिरी भारत में कश्मीर मुद्दे को लेकर जेहाद की भी बात करता था। हाल ही में उसने कर्नाटक में हुए हिजाब विवाद पर भी बयान देकर उसका समर्थन किया था।

उसने भारत के समर्थन के लिए सऊदी अरब जैसे देशों की आलोचना भी की थी। जवाहिरी के अफ़ग़ानिस्तान में मारे जाने से यह तो पता चल गया है कि अल-क़ायदा तालिबान की सत्ता वाले इस देश को फ़िलहाल अपने लिए सुरक्षित ठिकाना मान रहा है और वह भारत सहित एशिया क्षेत्र के देशों के ख़िलाफ़ अपनी गतिविधियाँ वहाँ से चला रहा है। हाल में भारत ने तालिबान नेतृत्व के साथ सम्पर्क साधा है और अपना दूतावास भी काबुल में सक्रिय किया है। भारत का मक़सद अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन को अल-क़ायदा जैसे गुटों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देना ही है।

पूर्वोत्तर राज्य असम में 29 जुलाई को अल-क़ायदा से जुड़े एक्यूआईएस और अंसारुल्लाह बांग्ला टीम (एबीटी) के 11 लोगों को हिरासत में लिया गया था। मोरीगाँव, बारपेटा, गुवाहाटी और गोलपारा ज़िलों से इन लोगों के पकड़े जाने से ज़ाहिर होता है कि अल-क़ायदा भारत में पैर जमाने की कोशिश में है। लेकिन इसके बावजूद भारतीय एजंसियों की सक्रियता के चलते उसे उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है।

टूट रहा है अल-क़ायदा
अल जवाहिरी के अमेरिका के हाथों मारे जाने से निश्चित ही अल-क़ायदा को बड़ा झटका लगा है। सन् 2019 में फ्लोरिडा में तीन अमेरिकी नौ सैनिकों की हत्या में जवाहिरी की भूमिका रही। हालाँकि छिटपुट आतंकी घटनाओं को छोड़ जवाहिरी के मुखिया रहते अल-क़ायदा कमज़ोर हुआ है। अटलांटिक काउंसिल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जवाहिरी ने इस बीच आईएसआईएस जैसी इस्लामिक स्टेट बनने के सपने से दूर सीरिया, यमन, अफ्रीका और दक्षिण एशिया में सहयोगी संगठनों के ज़रिये विस्तार किया। उसने अल-क़ायदा को आतंकी संगठनों का सांकेतिक नेतृत्व के लायक बनाये रखा। हालाँकि जवाहिरी की मौत के बाद अल-क़ायदा मिटने की कगार पर आ खड़ा हुआ है, ऐसा बहुत से रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं। सीरिया में उसकी एक शाखा को इसी साल जून में एक प्रतिद्वंद्वी गुट ने ही ख़त्म कर दिया। यमन में उसे अपने नेता के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने के कुछ ही समय बाद विद्रोहियों के हाथों हारना पड़ा। इसी साल माली में फ्रांस के एक हमले में उसके नेता की मौत के बाद अभी तक उसका उत्तराधिकारी तक अल-क़ायदा नहीं चुन पाया है। भले ही अफ्रीकी देशों सोमालिया और माली में अल-क़ायदा की शाखाएँ अब भी मज़बूत हैं। अल-क़ायदा का सबसे ताक़तवर और ख़तरनाक गुट अल-शबाब है। सोमालिया के मध्य और दक्षिणी हिस्से के अधिकतर ग्रामीण इलाक़े आज भी अल-शबाब के क़ब्ज़े में हैं, जहाँ उनकी सत्ता चलती है। सीरिया में अल-क़ायदा की नुमाइंदगी उसका अघोषित गुट हुर्रास अल-दीन करता है; लेकिन वह अपनी पैठ बनाने में नाकाम रहा है। कारण अमेरिका का लगातार दबाव और आपसी अनबन है। सीरिया के लोग अल-क़ायदा को एक ख़तरा मानते हैं। हुर्रास अल-दीन को उनका ही एक प्रभावशाली विरोधी गुट चुनौती दे रहा है।
उधर यमन में इसकी शाखा अल-क़ायदा इन अरेबियन पेनिनसुला (एक्यूएपी) एक जमाने में अल-क़ायदा का बहुत ख़ूँख़ार गुट था। आज वह अल-क़ायदा के सबसे कम सक्रिय गुटों में शामिल है। जनवरी में एक्यूएपी के प्रमुख को अमेरिका ने एक ड्रोन हमले में मार गिराया था। यही नहीं, हाल ही में बाक़ायदा सूबे में हूथी विद्रोहियों ने एक्यूएपी का एक मज़बूत गढ़ उससे छीन लिया। यह माना जाता है कि एक्यूएपी में जासूसों की सेंध ने उसकी बड़ी तबाही की है।

अल-क़ायदा के कमज़ोर होने की एक बड़ी बजह सामान्य मुस्लिमों में पहुँच बना पाने में उसकी नाकामी है। अल जवाहिरी के समय में भी इस दिशा में कुछ नहीं हुआ। वह ख़ुद को आधुनिक बनाने में भी नाकाम रहा है। इसका कारण यह है कि वह ख़ुद की कट्टर जिहादी संगठन की छवि नहीं बदलना चाहता। उसका नेतृत्व महसूस करता है कि रास्ता बदलने से उसके अस्तित्व पर ही संकट आ सकता है। हालाँकि अपनी उपस्थिति बनाये रखने के लिए अल-क़ायदा ने हाल के वर्षों में कई हमले भी किये हैं।

अमेरिका ने ही पाला था अल-क़ायदा को!
आज भले अमेरिका अल-क़ायदा का दुश्मन हो; लेकिन एक ज़माने में अमेरिका ने ही उसे पाला-पोसा। आज जो तालिबान अफ़ग़ानिस्तान में शासक है, उसके अल-क़ायदा से पुराने रिश्ते हैं। याद करें, तो पता चलता है कि 80 के दशक में जब तत्कालीन सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर क़ब्ज़े की जंग लड़ी उस समय सोवियत संघ को अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकालने के लिए जो संगठन बने उनमें अल-क़ायदा एक था। ओसामा बिन लादेन ने इसका गठन किया था। उसे सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ रहे मुजाहिदीनों का भी समर्थन था। लेकिन हैरानी यह है कि अल-क़ायदा को अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए का भरपूर समर्थन था। समय के साथ अल-क़ायदा अमेरिका के लिए ही साँप बनकर आ खड़ा हुआ और नौवत यह आ गयी कि इसी अमेरिका ने इस आतंकी संगठन के दो प्रमुखों को मारने का काम किया।

जवाहिरी का उत्तराधिकारी कौन?
अल जवाहिरी की मौत के बाद सैफ़-अल-आदेल अल-क़ायदा का मुखिया बन सकता है, जो मिस्र में सेना अधिकारी रहा है। अल-क़ायदा के संस्थापक सदस्यों में से एक आदेल साल 80 के दशक में आतंकवादी संगठन मक़तब अल-ख़िदमत में शामिल हुआ था और इसी दौरान वह लादेन और जवाहिरी से मिला। आदेल अमेरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी एफबीआई की मोस्ट वांटेड लिस्ट में है और उसने आदेल पर 10 मिलियन डॉलर का इनाम घोषित किया हुआ है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर टेररिज्म की रिपोर्ट के अनुसार, जवाहिरी के बाद अल-क़ायदा की कमान के आदेल के अलावा कई और भी दावेदार हैं। इनमें अल-क़ायदा की मीडिया कमेटी के प्रमुख और अल जवाहिरी के दामाद अब्द-अल-रहमान-अल मघरेबी का नाम भी शामिल है। ओसामा बिन लादेन का बेटा उसमा लादेन उसका बहुत क़रीबी था। उनके अलावा ऑपरेशन कमांडर अबु-अल-मसारी और ओसामा बिन लादेन का सिक्योरिटी कमांडर रहे अमीन मुहम्मद-उल-हक़ साम ख़ान को भी अल-क़ायदा की कमान सौंपी जा सकती है।

अपराधियों का अड्डा बनता सोशल मीडिया

बीती 18 जुलाई को शाम का धुँधलका घना हो चला था। सूरत के एक कॉफी हाउस में काले रंग की कैफरी पेंट और नाभि से कई इंच ऊपर टॉप पहने लड़की पर कई लोगों की नज़र थी। तभी एक लड़का उसके सामने आता है। दोनों हाथ मिलाते हैं; लेकिन थोड़ा नर्वस लगते हैं। लड़के का सवाल था- ‘क्या तुम वक़्ती तौर पर मेरे साथ हो या लम्बे समय तक सम्बन्ध बनाये रखना चाहती हो? एकाएक लड़की की ज़ुबान में तल्ख़ी आ गयी- ‘सिर्फ़ एक रात के लिए तुम्हारे साथ रहना चाहती, तो जयपुर से सूरत क्यों आती? क्या सिर्फ़ एक रात बिताने के लिए? लड़का एकाएक हड़बड़ाया- ‘मेरा मतलब यह नहीं था।’ एकाएक पीछे से कंधे पर किसी का हाथ पड़ा और लड़की के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ती दिखीं। लड़का फुर्ती से पीछे मुड़ा, तो सामने पुलिस खड़ी थी।

सूरत के पांडेसरा निवासी क्रिश सिंह के प्रेमजाल में फँसी जयपुर की रहने वाली लड़की अनामिका (बदला हुआ नाम) की उससे सात महीने पहले जयपुर के एक सिटी मॉल में मुलाक़ात हुई थी। तबसे वे फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्स ऐप पर दोनों चैटिंग कर रहे थे। कुछ दिन पहले वह लड़के के कहने पर ट्रेन में बैठकर सूरत पहुँच गयी। परिजनों ने पुलिस में लड़की के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज करवायी। सोशल मीडिया की जाँच के बाद लड़की को सूरत से पकड़ा गया।

सोशल मीडिया की फ्रेंडशिप ने अब तक राजस्थान में अनेक लड़कियों को गुमराह किया है। दरअसल किशोरावस्था की दहलीज़ लाँघती लड़कियों में पर वर्जनाएँ थोप दी जाती हैं, जबकि इसी दौर में उनमें लड़कों के प्रति आकर्षण बढऩे लगता है। प्यार में पगलायी ऐसी लड़कियों की काउंसिलिंग बेहद जटिल काम होता है। 12 जुलाई को कोटा पुलिस ने चैटिंग के ज़रिये प्यार की दुनिया में पहला क़दम रखने वाली ज़िद्दी लड़की को ढूँढकर बाल कल्याण समिति के हवाले किया। समिति के रोस्टर सदस्य अरुण भार्गव बताते हैं कि लड़की पिछले तीन साल से एक लड़के की सोहबत में थी। लड़के ने उसे मोबाइल दिलवाया, जो उनके बीच चैटिंग का ज़रिया बना। लड़की ने कहा कि मुझे लड़के से चैटिंग करना अच्छा लगता था। मुझे उससे बेहद प्यार है और रहेगा। प्यार में पड़ी इस लड़की ने घर से निकलकर लड़के के साथ इकलेरा में गृहस्थी बसा ली। पुलिस ने संदेहास्पद रहन-सहन को देखकर दोनों को पकड़ा और बाल कल्याण समिति को सौंप दिया। कुछ घटनाएँ, जिसमें पुलिस द्वारा पकड़ी की गयी लड़कियाँ बाल कल्याण समिति को जैसा कुछ बताती हैं; यक़ीन से परे लगती हैं। हालाँकि भार्गव कहते हैं कि हमें जो कुछ आप बीती लड़कियाँ बताती हैं, उस पर यक़ीन करना पड़ता है। मसलन 28 जुलाई को ग्रामीण पुलिस द्वारा पकड़ी की गयी लड़की का कहना था कि किसी ने उसे कुछ सुंघाकर बेहोश कर दिया। फिर रामगंजमण्डी में ट्रेन में सूरत से ले जा रहा था। नागदा स्टेशन पर उसकी नींद खुल गयी। उसने किसी राहगीर से मोबाइल लेकर परिजनों को इत्तला की। लेकिन सोशल मीडिया की आभासी छाया फिर भी छिपाये नहीं छिपी। भार्गव समिति की विवशता बताते हुए कहते हैं कि हम लड़कियों को 18 साल की होने तक ही रख सकते। जबकि उन पर जुनून सवार होता है।

वह कहते हैं कि सोशल मीडिया ने ऐसी ख़्वाहिशों की आग में घी का काम किया है। लड़कियाँ 16वें साल के रूमानी दौर में उत्तेजक संसार में विभोर हो रही हैं, तो आश्चर्य कैसा? कई शादीशुदा औरतें तो ढलती उम्र के बावजूद देह की बची-खुची मादकता की नुमाइश करने से कोई परहेज़ नहीं करतीं। उन्हें मनचाहे ठिकानों पर अजनबियों को अपनी ख़्वाहिशों में बिंधी कहानी बताने में कोई हर्ज नहीं। फेसबुक साइट पर बेशुमार ‘लाइक’ उनका हौसला दोबाला करते हैं। दरअसल वे अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी के रूखे हो जाने से तंग आयी हुई होती हैं। उन्हें प्रबलता से प्यार करने वाले नये घोंसलों की तलाश होती है। उनकी इस छानबीन में इंटरनेट मददगार होता है, जो दाम्पत्य जीवन में दरार डालने का औज़ार बन चुका है। सोशल मीडिया ने लोगों के एकाकीपन को तोड़कर व्यस्त रखने के लिए मैत्री का एक नया संसार रच दिया है, तो अपराधियों के लिए भी जुर्म के नये रास्ते खोल दिये हैं। पिछले दिनों दबंगों के एक गिरोह ने अजमेर ज़िले के एक व्यापारी को अश्लील चैटिंग के जाल में फँसाया और 15 लाख रुपये झटक लिये। पुलिस ने अश्लील चैटिंग को हथियार बनाने वाले आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया।

साइबर ठगी के लिए झारखण्ड का जामताड़ा कुख्यात है। लेकिन इन शातिरों के लिए अब राजस्थान का मेवात भी नया जामताड़ा (ठगी का नया अड्डा) बन गया है। ठगों का कहना है कि सब कुछ बेहद आसान है। फेसबुक, ओएलएक्स पर महँगी चीज़ें सस्ते में डालकर जाल फेंकते हैं, तो लोग आसानी से जाल में फँस जाते हैं। पुलिस ने ऐसी ठगी करने वाले सलीम, शाकिर ख़ान, सुनील कुमार, योगेश कुमार और असलम को गिरफ़्तार किया है। अलवर ज़िले के मेहराणा गाँव के रोज़लीन के बारे में पुलिस का कहना है कि यह बड़ा शातिर जालसाज़ है। विषेशज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर शिकार की तलाश में लगे इन अपराधियों से बच्चे तक सुरक्षित नहीं हैं। उन्हें नियंत्रित करना बड़ी चुनौती है। बच्चा ऑनलाइन के ज़रिये अश्लील कंटेंट या हानिकारक अथवा ग्राफिक वेबसाइट्स तक पहुँच सकता है। तकनीकी प्रमुखों का कहना कि टेक कम्पनियों को विवादास्पद तकनीक से आगे बढऩा चाहिए, जो उपभोक्ता के मोबाइल पर बाल शोषण की तस्वीरें स्केन करती हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना ने इलेक्ट्रॉनिक एवं सोशल मीडिया को फटकारते तथा चेतावनी देते हुए कहा कि वो ज़िम्मदारी से काम करें, मीडिया ट्रायल, कंगारू अदालतें आयोजित करने, एजेंडा संचालित डिबेट प्रसारित करने पक्षपातपूर्ण मत एवं राय का प्रचार करने तथा स्वेच्छाचारी रवैये से बाज़ आ जाए। उन्होंने कहा कि आपसी ज़िम्मदारी अतिक्रमण एवं उल्लंघन के चलते, उनसे अपेक्षा की जाती है कि ध्यान रखें, क्योंकि वे दोनों ही हमारे लोकतंत्र को दो क़दम पीछे ले जा रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार जाल खंबाता ने ख़बर का ख़ुलासा करते हुए कहा कि प्रिंट मीडिया में ज़िम्मदारी तथा जवाबदेही को एक मात्रा फिर भी है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जवाबदेही शून्य हो गयी है; क्योंकि जो कुछ यह दिखाता है, वह विरल हवा में खो जाता है। इससे भी ज़्यादा बदतर स्थिति सोशल मीडिया की है। इलेक्ट्रानिक एवं सोशल मीडिया द्वारा प्राय: किये जा रहे उल्लंघनों एवे अतिक्रमणों के फलस्वरूप होने वाली सामाजिक अशान्ति के परिणाम सामने आ रहे हैं। मीडिया के लिए सब कुछ निभाने की बढ़ती हुई माँग का हवाला देते हुए मुख्य न्यायाधीश रमन्ना ने कहा कि हाल ही के तौर-तरीक़ों एवं प्रवृतियों को देखते हुए मीडिया के लिए सर्वोत्तम चीज़ यही है कि वे स्वनियंत्रण को अपनाएँ तथा अपने शब्दों को नाप-तोलकर काम में लें।

हनीट्रेप में फँसा जवान

राजस्थान इंटेलिजेंस ऑपरेशन ने भारतीय सेना में जयपुर में पदस्थ कंचनपुर निवासी जवान शान्तिमोय राणा को जासूसी करने के आरोप में पकड़ा है। डी.जी. उमेश मिश्रा ने बताया कि जवान सोशल मीडिया के ज़रिये पाकिस्तानी ख़ुफ़िया हैंडलर को भेज रहा था। एडीजी एस. मेंगाथिर के मुताबिक, पाक महिला एजेंट ने सोशल मीडिया पर ख़ुद को मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज में कार्यरत बताकर राणा को रूप जाल में फँसाया। एक अन्य महिला एजेंट ने निष (छद्म नाम) बताकर आरोपी जवान के बैंक खाते में 6,000 रुपये जमा करवाये। आरोपी जवान को पाक महिला एजेंट ने अपना पता शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) और छद्म नाम गुरनूर उर्फ़ अंकिता बता रखा था। पाक महिला एजेंट ने आरोपी से सेना के गोपनीय दस्तावेज़ के फोटोग्राफ्स, वार्षिक युद्धाभ्यास के वीडियो सोशल मीडिया के ज़रिये मँगवाये। आरोपी जवान ढाई वर्ष से पाक महिला एजेंट के सम्पर्क में था। क़रीब एक वर्ष पहले वह इंटेलिजेंस के रडार पर आया था। तभी से उसकी गतिविधियों पर नज़र रखी जा रही थी। वह छुट्टी पर अपने गाँव गया था। जयपुर लोटा, तो इंटेलिजेंस ने नोटिस देकर उसे पूछताछ के लिए बुलाया। काफ़ी सुबूत मिलने के बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया।