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हरियाणा में दलबदल से गर्मायी सियासत

विधायक कुलदीप बिश्नोई को जब कांग्रेस ने धक्का दिया, तो भाजपा ने लगा लिया गले

तत्कालीन कांग्रेस के विधायक कुलदीप बिश्नोई का ट्वीट कि ‘फन कुचलने का हुनर आता है मुझे, साँप के ख़ौफ़ से जंगल नहीं छोड़ा करते…’ बहुत कुछ कह जाता है। इसके हरियाणा के राजनीतिक गलियारों में कई मायने रहे। फन कुचलने के हुनर का तो वह दावा करते हैं; लेकिन साँप कौन? जवाब में इसे वह मुस्कुराकर टाल देते हैं कि उन्होंने किसी का नाम तो नहीं लिया। इसके आधार वह सीधे आर-पार की लड़ाई का सन्देश देते दिखते हैं और ऐसा उन्होंने कर भी दिखाया है।

राज्य की राजनीति की थोड़ी बहुत भी जानकारी रखने वाले जानते हैं कि उनका इशारा किस तरफ़ था। जिस तरफ़ था, उन्हें कांग्रेस आलाकमान मतलब गाँधी परिवार का पूरा समर्थन है। लिहाज़ा पार्टी में रहते हुए कुलदीप के लिए पानी में रहकर मगर से बैर जैसी उक्ति साबित हो रही थी। उनकी राजनीति कांग्रेस में एकला चलो जैसी रही। वह काफ़ी समय से अपने को पार्टी में सहज महसूस नहीं कर रहे थे; लेकिन अन्य कोई विकल्प भी उनके सामने नहीं थे। राजनीति में स्थितियाँ तेज़ी से बदलती हैं और कुलदीप बिश्नोई के मामले में ऐसा ही हुआ। उपेक्षा से आहत उपजी ख़ुन्नस ने उन्हें विकल्प दे दिया।

दो बार के सांसद और चार बार के विधायक कुलदीप बिश्नोई और उनकी पत्नी रेणुका बिश्नोई अब कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं। विधायक पद से उनका इस्तीफ़ा मंज़ूर हो चुका है। अब छ: माह के अन्दर आदमपुर उपचुनाव होगा। कुलदीप अपने बेटे भव्य बिश्नोई को मैदान में उतारने की इच्छा रखते हैं। देखना होगा कि पार्टी किसे टिकट देती है। उप चुनाव में हार जीत पर कुलदीप का राजनीतिक भविष्य तय होगा। कांग्रेस के पास खोने को ज़्यादा नहीं; लेकिन कुलदीप के लिए यह अग्निपरीक्षा जैसा होगा। भाजपा में आने के बाद कुलदीप अपने को इसमें एडजस्ट कर लें, तो यह अपने में बड़ी बात होगी। अति महत्त्वाकांक्षी कुलदीप उपेक्षा से आहत हो जाते हैं, तब वे कुछ भी सुनाने से नहीं चूकते। जहाँ अवसर मिलता है, वे उसे भुना भी लेते हैं।

अनुभवी होने के नाते वे कुछ बड़ा करना चाहते हैं; लेकिन कांग्रेस में उनके लिए ऐसी स्थिति बन नहीं पा रही है। वे उपेक्षा नहीं, बल्कि पार्टी में अहम पद चाहते हैं; लेकिन राह बनती नहीं दिख रही है। पार्टी बदलने के बाद यह स्थिति तो उनके लिए भाजपा में भी रहेगी, ऐसे में उनके लिए मुश्किलें बनी रह सकती हैं। बहरहाल उनके भाजपा में जाने से राज्य की राजनीति में किसी उलटफेर होने की सम्भावना बिल्कुल नहीं है। उनका अपने परम्परागत विधानसभा क्षेत्र आदमपुर या हिसार ज़िले के कुछ हिस्से में ही प्रभाव है। लिहाज़ा भाजपा को निकट भविष्य में इससे कोई बड़ा फ़ायदा नहीं मिलेगा, जबकि कांग्रेस को थोड़ा नुक़सान उठाना पड़ सकता है।

प्रदेश में कांग्रेस पर फ़िलहाल दो बार मुख्यमंत्री रह चुके भूपेंद्र सिंह की पकड़ है और कुलदीप के पार्टी छोडऩे से वह ज़्यादा चिन्तित नहीं है। एक तरह से कहें, तो उनकी एक बड़ी बाधा अब दूर हो गयी है। पार्टी में अब उन्हें सीधे चुनौती देने वाला गाँधी परिवार के समर्थन से राज्य कांग्रेस में उनकी ही बात सुनी जाती है। ऐसे में प्रदेशाध्यक्ष अगर उनकी पसन्द का न हो, तो उन्हें मुश्किल होती है। इसका सामना वह काफ़ी समय से कर चुके हैं। गाँधी परिवार की करीबी कुमारी शैलजा के प्रदेशाध्यक्ष रहते हुड्डा ऐसे दौर से गुज़र चुके हैं, ऐसे में अब वह अपनी ही पसन्द के नेता को चाहते हैं। उनकी यह इच्छा उदयभान के रूप में पूरी हो जाती है, क्योंकि कुलदीप तो इस कसौटी पर जरा भी खरा नहीं उतरते। उदयभान की नियुक्ति का सबसे बड़ा झटका कुलदीप बिश्नोई को लगा।

कुलदीप के मुताबिक, राहुल गाँधी ने उन्हें प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपने की बात कही थी; लेकिन उनकी जगह एक अनजान से चेहरे को दायित्व सौंप दिया। इसके बाद हुड्डा और कुलदीप के बीच जैसे 36 का आँकड़ा बन गया। दोनों एक दूसरे को अपरोक्ष तौर पर चुनौती भी देने लगे थे। भाजपा में जाने के बाद कुलदीप अब सीधे हुड्डा को चुनौती देने लगे हैं कि इस्तीफ़ा देने के बाद होने वाले आदमपुर उप चुनाव में कांग्रेस जीतकर दिखाए। यह हलका उनके पिता और राज्य के कई बार मुख्यमंत्री रहे भजनलाल का पारम्परिक हलक़ा है। दशकों से उनके परिवार का कोई-न-कोई सदस्य यहाँ से जीत हासिल करता रहा है। ऐसे में उप चुनाव में उनकी या उनके परिवार के किसी सदस्य की जीत कोई बड़ी बात नहीं होगी; लेकिन अप्रत्याशित नतीजा तो उनके राजनीतिक भविष्य पर सवालिया निशान लगा देगा।

पक्के कांग्रेसी कुलदीप बिश्नोई की आख़िर इस कदर विदाई क्यों हुई? इसकी प्रमुख वजह उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष न बनाना रहा है। इसके अलावा ऐसी कोई वजह नहीं कि उन्हें पार्टी छोड़कर धुर-विरोधी भाजपा में जाना पड़ता। कुलदीप इसके लिए गाँधी परिवार से ज़्यादा हुड्डा को ज़िम्मेदार मानते हैं। वह हुड्डा को सबक़ सिखाना चाहते थे; लेकिन चुनौतियों के अलावा अन्य कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। जून में ऐसा मौक़ा आ गया।

राज्यसभा चुनाव में संख्या बल के हिसाब से कांग्रेस का एक सांसद बन सकता था; लेकिन पार्टी में क्रॉस वोटिंग की आशंका बनी हुई थी। गुटबाज़ी के चलते कांग्रेस पक्की जीत नहीं मानकर चल रही थी; लेकिन किसी तरह जीत के प्रति आशान्वित थे। अजय माकन की हार क्रॉस वोटिंग के चलते हुई और इसमें सीधे तौर पर कुलदीप बिश्नोई पार्टी के लिए खलनायक जैसे साबित हुए। माकन की हार पार्टी के लिए बड़ा झटका था। आलाकमान ने इसे गम्भीरता से लिया और कुलदीप बिश्नोई पर कार्रवाई की। पार्टी की प्राथमिक सदस्यता के अलावा उन्हें सभी पदों से अलग कर दिया। कुलदीप को पता था कि पार्टी निश्चित ही उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी। वह इसके लिए तैयार भी थे, क्योंकि अब उन्हें इस पार्टी में रहना नहीं था।

पार्टी से निष्कासन के बाद उनके पास कई विकल्प थे। नयी पार्टी गठित करना, आम आदमी पार्टी या फिर भाजपा में शामिल होने जैसे विकल्प थे। हरियाणा जनहित कांग्रेस जैसी पार्टी बनाकर वह अपने हाथ जला चुके थे। आप में उन्हें राजनीतिक भविष्य नज़र नहीं आया ऐसे में भाजपा के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। इसके लिए उन्होंने भूमिका तैयार करनी शुरू भी कर दी। विधानसभा हलक़े के बजट के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मुलाक़ात की। तभी कयास लगने लगे थे कि वह निश्चित ही भाजपा में जाएँगे। दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाक़ातें इसी का संकेत था। कांग्रेस संस्कृति में रचे-बसे कुलदीप को नये दल में कई तरह की मुश्किलें आएँगी। वह वंशवाद की राजनीति को आगे बढ़ाने वालों में हैं, जबकि भाजपा में यह सब बहुत आसानी से नहीं होने वाला। भाजपा कुलदीप का पार्टी के लिए बेहतर इस्तेमाल कर सकती है।

एक ग़ैर-जाट के तौर पर कुलदीप की अच्छी छवि है। वह अपने पिता भजनलाल की तरह किसी जाति विशेष की राजनीति नहीं करना चाहते। वह 36 बिरादरी के नेता के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। भाजपा को ऐसे ही नेता की ज़रूरत है, देखना होगा कि पार्टी उनका बेहतर इस्तेमाल कर पाने में कितनी सफल होती है।


“कांग्रेस विशाल पार्टी है, कुलदीप जैसे किसी एक के जाने से पार्टी कोई कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। उनके जैसे लोगों की वजह से ही राज्यसभा में कांग्रेस प्रत्याशी की हार हुई। सच्चा कांग्रेसी कभी ऐसा नहीं करता जैसे कुलदीप बिश्नोई ने किया। पार्टी नेतृत्व ही प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति करता है। अगर वह कुलदीप को योग्य समझता, तो उन्हें ज़िम्मेदारी मिल सकती थी। उनकी इसमें कोई भूमिका नहीं है। वे सभी को साथ लेकर चलने में भरोसा रखते हैं, अगर कोई ऐसा न कर अपने लिए अलग रास्ता चुनता है, तो वह इसके लिए स्वतंत्र है।’’
भूपेंद्र सिंह हुड्डा
पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस


“कुलदीप पार्टी के ग़द्दार हैं। उनके साथ कोई मौज़ूदा पार्टी विधायक नहीं जा रहा है। वह एक दौर में अपने आधा दर्ज़न विधायकों को ही नहीं सँभाल पाये और चुनौती भूपेंद्र हुड्डा को दे रहे हैं, जो 10 साल तक मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके नेतृत्व में पार्टी संगठन मज़बूत होगा और कांग्रेस विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करेगी। कांग्रेस चिन्तन रैली के माध्यम से राज्य की जनता को एकजुट करने का प्रयास कर रही है।’’
उदयभान
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, हरियाणा


“भूपेंद्र सिंह हुड्डा के होते हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनना मुश्किल है। वह पुत्र मोह में फँसे हुए हैं। उन्हें वर्ष 2009 और 2014 में मौक़ा दिया गया; लेकिन कांग्रेस की सरकार नहीं बन सकी। राज्य के लोग हुड्डा को नकार चुके हैं। राहुल गाँधी कुछ लोगों से घिरे हैं, जिनकी वजह से वह सही $फैसले नहीं ले पा रहे हैं। राहुल गाँधी को उन जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से मिलने का समय ही नहीं मिलता।’’
कुलदीप बिश्नोई
भाजपा नेता

विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त दुर्भाग्यपूर्ण

सही क़ीमत लगओ, तो हर चीज़ बिकाऊ होती है। झारखण्ड में इन दिनों इस बात की चर्चा आम है। लोग चुहल कर रहे हैं कि ‘झारखण्ड में विधायक बिकता है; बोलो ख़रीदोगे!’ यह भले ही लोगों में हँसी-मज़ाक़ की बात हो; लेकिन माननीयों को इस पर विचार करने की ज़रूरत है। क्योंकि कुछ बिकाऊ विधायकों के कारण सारे विधायकों की प्रतिष्ठा पर दाग़ लग रहा है।

पिछले दो दशक से कभी ऐसा मौक़ा नहीं आया, जब विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त की बात सामने न आयी हो। यही वजह है कि अलग राज्य गठन के 22 वर्ष बाद भी झारखण्ड में जितना विकास होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। इन दिनों झारखण्ड की सियासत इन्हीं सब बातों में उलझी हुई है। इसकी वजह तीन कांग्रेसी विधायकों का पश्चिम बंगाल में पुलिस द्वारा भारी मात्रा में नक़दी के साथ गिरफ़्तार किया जाना है। इसे लेकर झारखण्ड से कोलकाता, असम और दिल्ली तक हलचल मची हुई है। इस प्रकरण में कई सवालों के जवाब सब ढूँढ रहे हैं।

नक़दी के साथ विधायक गिरफ़्तार
झारखण्ड के तीन कांग्रेसी विधायक इरफ़ान अंसारी, नमन विक्सल कोंगाड़ी और राजेश कच्छप को 30 जुलाई को पश्चिम बंगाल पुलिस ने 49 लाख रुपये की नक़दी के साथ गिरफ़्तार किया। तीनों विधायक एक गाड़ी से होकर पूर्व मिदनापुर की ओर जा रहे थे। पांचला थाना के अधीन रानीहाटी मोड़ के पास तलाशी में रुपये बरामद हुए। शुरुआती पूछताछ में उन्होंने कहा कि आदिवासी दिवस पर साड़ी बाँटने के लिए वे बंगाल से साड़ी ख़रीदने के लिए पैसे लेकर आये थे। पुलिस ने तीनों को गिरफ़्तार कर मामले को सीआईडी के सुपुर्द कर दिया। न्यायालय से 10 अगस्त तक के लिए सीआईडी की हिरासत में भेज दिया गया है, जहाँ उनसे पूछताछ की जा रही है।

घटना के दूसरे दिन प्रदेश कांग्रेस ने तीनों विधायकों को निलंबित कर दिया। उधर कांग्रेस के अन्य विधायक कुमार जयमंगल उर्फ़ अनूप सिंह ने सरकार गिराने की बात रांची के अरगोड़ा थाने में एफआईआर दर्ज करायी है। इस एफआईआर में अनूप सिंह ने साफ़-साफ़ लिखा है कि विधायक इरफ़ान अंसारी, राजेश कच्छप और नमन विल्सन कोंगाड़ी ने कहा है कि वे मुझे कोलकाता बुला रहे थे और प्रति विधायक 10 करोड़ रुपये और मंत्री पद देने की बात कह रहे थे। उन्होंने इसका लिंक असम से जोड़ा। एफआईआर में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का भी ज़िक्र किया है। जहाँ से यह डील हो रही थी। तीनों विधायकों के असम जाने की भी बात सामने आयी। इस बीच अनूप सिंह के ख़िलाफ़ भी अरगोड़ा थाने में मामला दर्ज कराया गया है। दीपक राव सिंह नामक व्यक्ति ने थाने में की शिकायत में कहा है कि अनूप सिंह द्वारा तीनों विधायकों पर लगाया गया आरोप झूठा है। अनूप का पहले से असम के मुख्यमंत्री से सम्पर्क है। उनकी एक तस्वीर भी असम के मुख्यमंत्री के साथ वायरल हुई है। अनूप सिंह ने सफ़ाई दी है कि वह इंटक मामले को लेकर मिलने के लिए गये थे, जिसकी जानकारी मुख्यमंत्री और पार्टी के प्रदेश प्रभारी को दे दी थी।

हर कांग्रेस विधायक पर शक
इस घटना के बाद कांग्रेस का हर विधायक शक के दायरे में आ गया है। कांग्रेस के टूटने की बात लम्बे समय से आ रही है। पार्टी के 17 विधायक हैं। इनमें से 13 के टूटने की बात थी। अभी तथाकथित तीन विधायक सामने आये हैं। यानी सवाल उठ रहा कि 10 कौन? क्योंकि विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 41 का आँकड़ा चाहिए। भाजपा के पास आजसू के दो विधायकों को मिलाकर केवल 28 विधायक हैं। यानी अगर भाजपा को सरकार बनना है, तो कम-से-कम 13 और विधायकों का समर्थन चाहिए। इस बीच सरकार में मंत्रिमंडल बदलने की भी चर्चा शुरू हो गयी है। जल्द ही नये मंत्रिमंडल के गठन की उम्मीद है, जिसमें कांग्रेस के मौज़ूदा चार मंत्रियों में से दो-तीन का पत्ता साफ़ होना तय माना जा रहा है।

सत्ता पक्ष-विपक्ष आमने-सामने
झारखण्ड में झामुमो के नेतृत्व में सरकार है। कांग्रेस मुख्य सहयोगी के रूप में सरकार में शामिल है। झामुमो और कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर भाजपा पर प्रहार कर रही है और सरकार गिराने की साज़िश का आरोप लगा रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इसे सरकार गिराने का षड्यंत्र करार दिया है। वहीं कांग्रेस के मंत्री और विधायक भी यही बोल रहे। उधर विपक्षी दल भाजपा के विधायक और नेता बोल रहे, सरकार ख़ुद ही गिर रही है। वह कटाक्ष भी कर रहे, क्या तीन विधायकों को तोडऩे से सरकार गिर जाएगी? क्या 49 लाख रुपये में 13-13 विधायक टूट रहे? अगर और अधिक पैसे की बात है, तो बाक़ी के पैसे कहाँ हैं? उन्हें कैसे देने की बात थी? भाजपा नेता इस मामले को राज्य में चल रहे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच से जोड़कर कह रहे हैं कि यह भ्रष्टाचार का पैसा है।

गिरफ़्तारी पर उठे सवाल
तीनों विधायकों की गिरफ़्तारी पर कई सवाल उठ रहे हैं। लोग सवाल कर रहे हैं कि तीनों विधायकों को पैसा कहाँ से मिला और किसने दिया? वह रुपया लेकर कहाँ जा रहे थे? यह किस काम के लिए दिया गया था? विधायकों के पास नक़दी होने की सूचना पुलिस को कहाँ से मिली? उनका सटीक लोकेशन पुलिस को किसने दिया? क्योंकि एक चर्चा यह भी है कि झारखण्ड सरकार की स्पेशल ब्रांच ने बंगाल पुलिस को सूचना दी थी। अगर ऐसा था, तो सरकार ने अपने ही सहयोगी विधायकों के साथ ऐसा क्यों किया? क्या इसमें कांग्रेस की भी रजामंदी थी? कहीं सच में सरकार गिराने की साज़िश तो नहीं थी? या फिर राज्य में चल रहे ईडी कार्रवाई से ध्यान भटकाने के लिए यह सब हुआ। कहीं झारखण्ड में ईडी की कार्रवाई को देखते हुए इस तंत्र में शामिल लोगों का ही पैसा खपाने का प्रयास तो नहीं हो रहा था? सवाल यह भी उठ रहा है कि कहीं तीनों विधायकों के पास बरामद रुपये का कोई बंगाल कनेक्शन तो नहीं है?

क्योंकि झारखण्ड के कई विधायकों का बंगाल में राजनीतिक और व्यावसायिक अच्छे सम्बन्ध हैं। इस बीच बंगाल सीआईडी ने यह भी दावा किया है कि 49 लाख पकड़े जाने से पहले 21 जुलाई को इन तीनों विधायकों को कोलकाता में 75 लाख रुपये दिये गये थे। यह राशि वहाँ के एक कारोबारी महेंद्र अग्रवाल ने दी थी। महेंद्र अग्रवाल भी सीआईडी की हिरासत में हैं। कहने वाले यह भी कहते हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके क़रीबी चौतरफा घिरे हैं। मुख्यमंत्री की सदस्यता को लेकर चुनाव आयोग के पास मामला लम्बित है। उनके ख़िलाफ़ न्यायालय में पीआईएल दाख़िल है। उनके विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा को ईडी ने गिरफ़्तार किया है। उनके प्रेस सलाहकार अभिषेक कुमार से पूछताछ की जा रही है। मुख्यमंत्री ख़ुद कभी भी ईडी के रडार पर आ सकते हैं।

कई मामले ठण्डे बस्ते में
राज्य में सन् 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा की सरकार बनी। भाजपा पर झाविमो के छ: विधायकों को तोडऩे का आरोप लगा। ये सभी भाजपा में शामिल हो गये थे। इनमें से कुछ को मंत्री पद तो कुछ को निगम-बोर्ड में जगह मिली। तब भी ख़रीद-फ़रोख़्त की बात उठी। सन् 2010, 2012, 2014, 2016 में राज्यसभा चुनाव में हार्स ट्रेडिंग का मामला आया। विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त की बात हुई। सन् 2012 में राज्यसभा चुनाव के दिन ही निर्दलीय प्रत्याशी आरके अग्रवाल के छोटे भाई सुरेश अग्रवाल की गाड़ी से 2.15 करोड़ रुपये बरामद हुए थे। इससे देश में पहली बार राज्यसभा चुनाव को ही रद्द करना पड़ा था।
जुलाई, 2021 में रांची के एक होटल से तीन लोग पकड़ाये। उनके पास से दो लाख रुपये बरामद हुए थे। उन पर हेमंत सरकार गिराने की साज़िश रचने का आरोप लगा था।

पर्दा उठने का इंतज़ार
बंगाल सरकार ने झारखण्ड के तीनों कांग्रेसी विधायक इरफ़ान अंसारी, नमन विक्सल कोंगाड़ी और राजेश कच्छप के मामले में सीआईडी को सौंप दी है। जाँच में क्या ख़ुलासा होगा? यह तो वक़्त ही बताएगा। अभी तक जितनी बातें सामने आयी हैं, यह सिर्फ़ नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप और सोशल मीडिया के हवाले से आयीं हैं। न पुलिस और न ही किसी जाँच एजेंसी ने पूरे रहस्य से पर्दा उठाया है। तीनों विधायक गिरफ़्तारी के समय से लेकर अभी तक मीडिया के सामने नहीं आ पाये हैं। न ही उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। देखना यह है कि मामले का ख़ुलासा कब तक होता है। सच्चाई क्या है। इस बार मामले का पटाक्षेप हो पाता है या नहीं। या फिर सारी बातें राज ही बन कर रह जाती हैं और तीनों विधायक केवल बली का बकरा बन कर रह जाते हैं।

अलौकिक किवदंतियों का पिटारा माणा गाँव

भारत के आखिरी गाँव माणा से होकर हिमालय की तरफ़ से स्वर्ग गये थे पांडव

भारत का आखिरी गाँव माणा प्राकृतिक दृश्यों और नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर है। कई मायनों में ख़ास यह गाँव अब एक पर्यटन स्थल बन चुका है। आसमान छूते ऊँचे पर्वत शिखरों, झरनों और नदियों से यहाँ का वातावरण पवित्र तो बनता ही है, यहाँ एक अद्वितीय आध्यात्मिक ऊर्जा से तन-मन भी सराबोर होते हैं।

माणा गाँव की सबसे ख़ास बात यह है कि द्वापर युग में पांडवों ने स्वर्ग जाने के लिए इसी गाँव के रास्ते से अपनी यात्रा शुरू की थी। इस गाँव में कुछ ऐसी गुफाएँ भी हैं, जो पौराणिक प्रसंगों की गवाह हैं। माणा में रास्ते सँकरे होने के कारण यहाँ वाहन लाने की अनुमति नहीं है, इसलिए वाहन गाँव के बाहर ही खड़े किये जाते हैं। भारत के प्रसिद्ध चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम से तीन किलोमीटर आगे माणा गाँव पड़ता है। उत्तराखण्ड के चमोली ज़िले में आने वाला यह गाँव समुद्र तल से 3,200 मीटर की ऊँचाई पर है। सरस्वती नदी के किनारे स्थित माणा गाँव ख़ूबसूरत वादियों से सजा हुआ किसी स्वर्ग से कम प्रतीत नहीं होता। यह गाँव भारत-चीन सीमा से 24 किलोमीटर की दूरी पर है। गाँव के लोगों का कहना है कि यही वह स्थान है जहाँ महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना की थी और गणेश ने उसका लेखन किया था। प्राकृतिक नज़ारों से घिरा हुआ यह गाँव सहज और सरल जीवन के साथ-साथ अध्यात्म की बात करता है। कहना पड़ेगा कि इस अद्भुत स्थल पर आकर कोई भी नास्तिक मन उस परम् शक्ति के प्रति आस्थावान होने को मजबूर हो सकता है।

‘उत्तरांचल के तीर्थ स्थान’ पुस्तक में लिखा गया है कि स्वामी विवेकानंद मध्य-हिमालय क्षेत्र के आध्यात्मिक आकर्षण से प्रभावित हुए थे। उन्होंने कहा था- ‘यह हमारे पूर्वजों का स्वप्नलोक है, जहाँ पर भारत की माँ पार्वती जन्मीं। यह वह पवित्र भूमि है, जहाँ पर भारत की हर उद्दीप्त आत्मा जीवन के अन्तिम पहर में आना चाहती है और नश्वर शरीर की यात्रा के अध्याय को विश्राम देना चाहती है। इस सौभाग्यशाली धरती की चोटियों पर, उसकी कंदराओं की गहराइयों में और वेगवान नदियों के तटों पर विलक्षण विचारों का सृजन हुआ। यह वही भूमि है, जहाँ पर मैं बचपन से ही अपना जीवन बिताने के सपने देखता आया हूँ। मैं सच्चे हृदय से प्रार्थना करता हूँ। आशा करता हूँ, और विश्वास भी करता हूँ कि मेरे अन्तिम दिन यहाँ पर व्यतीत हों।’

माणा गाँव के निवासी सूरज पर्यटक मार्गदर्शक (टूरिस्ट गाइड) हैं। वह माणा गाँव के बारे में पर्यटकों को बताते हैं। और उनके भाई पर्यटकों को स्वर्गारोहण की तरफ़ ट्रैक पर लेकर जाते हैं। सूरज बताते हैं कि इसी गाँव से पाँच पांडव द्रौपदी के साथ स्वर्ग की ओर बढ़े थे। यहाँ से आगे भीम पुल प्वाइंट (बिन्दु) है। उससे आगे सतोपंथ और स्वर्गारोहण ट्रैक है। सूरज के अनुसार भीम पुल यहाँ से 800 मीटर दूर है। सतोपंथ 27 किलोमीटर है। पाँच दिन का रास्ता है। यहाँ कैम्प करके ट्रैकिंग से जाना पड़ता है। जैसा उन्होंने सीख रखा है। पांडवों के बारे में बताते हुए सूरज कहते हैं कि पाँचों में से केवल युधिष्ठिर ही स्वर्ग लोक जा पाये थे। उनके बाक़ी भाइयों ने स्वर्गारोहण में ही एक-एक कर शरीर छोड़ दिये थे। ट्रैकिंग के दौरान उनके निशान वहाँ मिलते हैं; लेकिन वह सारा क्षेत्र सेना के अंतर्गत आता है। माणा के एक दुकानदार देवेंद्र मोलपा भी यही बताते हैं।

टूरिस्ट गाइड सूरज ने बताया कि वह यहाँ छ: महीने रहते हैं। खेती-बाड़ी करते हैं। आलू, गोभी और पत्ता गोभी की फ़सल होती है। मुख्य व्यापार ऊनी वस्त्रों का है। गाँव की औरतें बुनायी करती हैं। तालाबंदी के कारण दो साल के बाद अब पर्यटक आ रहे हैं। तीन-चार महीने में अच्छी कमायी हो जाती है, जिससे साल भर का गुज़ारा चल जाता है। दुकानदार देवेंद्र मोलपा का कहना है कि छ:-सात महीने, जब मौसम ठीक रहता है; तब इसी गाँव में रहते हैं। लेकिन ज़्यादा ठण्ड के दिनों में वह नीचे के क्षेत्रों में गोपेश्वर चले जाते हैं। माणा गाँव में कई जड़ी-बूटियाँ मिलती हैं, जो बीमारियों के इलाज में काफ़ी कारगर होती हैं।

उत्तराखण्ड वन विभाग के अनुसंधान विंग द्वारा माणा गाँव में हर्बल पार्क बनाया गया है, जिसमें 40 से अधिक प्रजातियों की जड़ी-बूटियाँ शामिल हैं। बाज़ार के कई दुकानदारों के पास काफ़ी जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध हैं। इनमें एक ख़ास बालछड़ी काफ़ी मशहूर है, जिसको बुरी नज़र से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा दुकानों में ऊनी वस्त्र बिकते हैं। महिलाएँ भी व्यापार करती हैं। अगर कोई पर्यटक उनकी फोटो खींचने लगता है, तो वे अपना चेहरा छुपा लेती हैं। कई महिलाओं की फोटो खींचने की कोशिश की गयी; लेकिन उन्होंने फट से अपना चेहरा छुपा लिया। इस बारे में जब दुकानदारों से बात की, तो उन्होंने बताया कि फोटो खींचने-खिंचवाने पर महिलाओं पर गाँव के सरपंच द्वारा जुर्माना वसूला जाता है। किसी कारण से हमारा माणा के सरपंच से सम्पर्क नहीं हो सका। मकानों को ख़ूबसूरत चित्रकारी से सजाया गया है, जिनमें पौराणिक चित्र भी शामिल किये गये हैं। पंजाब से आयी दो महिला पर्यटकों- वीणा और कुसुम का कहना है कि यह क्षेत्र अद्भुत है। लोगों का जीवन सीधा-सादा है। इनके चेहरों पर सहजता, सरलता और सन्तुष्टि दिखायी देती है। यहाँ सचमुच ईश्वर की शक्ति के दर्शन होते हैं।

दर्शनीय स्थल
भारत के इस आख़िरी गाँव में देखने लायक बहुत कुछ है। प्राकृतिक दृश्यों के अलावा गणेश गुफा, व्यास गुफा, भीम शिला, वसुधारा, माता मूर्ति मन्दिर, लक्ष्मी वन, इंद्रधारा, अलकापुरी, चक्रतीर्थ, सतोपंथ स्वर्गारोहण आदि पवित्र स्थान है। इन स्थानों से बहुत सारी पौराणिक कहानियाँ और प्रसंग जुड़े हुए हैं। मान्यता है कि इस गाँव की भूमि श्राप मुक्त और पाप मुक्त है। माणा गाँव का नाम मणिभद्र देव के साथ भी जुड़ा हुआ है। ऊँचे पर्वत शिखर और दुर्गम रास्ते होने के कारण पहले यहाँ का सफ़र आसान नहा थी; लेकिन अब ऋषिकेश से आगे नेशनल हाईवे बनने और काफ़ी आगे तक पक्की सड़क की सुविधा हो जाने से माणा गाँव की यात्रा आसान हो गयी है।

व्यर्थ का विरोध

इन दिनों फ़रमानी नाज़ द्वारा गाये गये भजन रूपी मंत्रों ‘हर-हर शम्भू, जय महादेवा, शिव महादेवा’ को लेकर ख़ासा हंगामा मचा हुआ है। हालाँकि असली ‘हर-हर शम्भू’ गाने वाली फ़रमानी नाज़ नहीं, बल्कि उड़ीसा की अभिलिप्सा पांडा हैं। मगर फ़रमानी नाज़ को लेकर हंगामे की असल जड़ वे उलेमा और मौलवी हैं, जो शरीअत का हवाला देकर यह रोना रो रहे हैं कि कोई मुस्लिम गीत गाये; इस्लाम में इसकी इजाज़त नहीं है। सवाल यह है कि एक कलाकार के लिए अगर इस तरह की बन्दिशें लगायी जा सकती हैं, तो फिर उन पर कितनी पाबंदियाँ लगनी चाहिए, जो यह दिखाते हैं कि वे दीन (धर्म) के पाबंद हैं? यह सवाल उन लोगों से है, जो धर्म की ठेकेदारी करते हैं और परदे की आड़ में या रात के अँधेरे में आदमीअत का चोला उतारकर हवस और हैवानियत की सारी हदें पार करने में ज़रा भी शर्म नहीं करते।

फ़रमानी नाज़ ने ठीक ही जवाब दिया कि कलाकार का कोई धर्म नहीं होता। वाक़ई एक कलाकार का धर्म तो सिर्फ़ कला है, बशर्ते उसमें कोई अश्लीलता या फूहड़पन न हो। आज ऐसे तथाकथित अ-कलाकारों की एक भीड़ है, जो न केवल कला की हत्या कर रही है, बल्कि असली कलाकारों का हक़ मारकर भी खा रही है। क्या कोई इस तथाकथित अ-कलाकारों की भीड़ के विरोध में आवाज़ उठाता है? एक सवाल फ़रमानी नाज़ पर फ़तवा जारी करने वाले उलेमाओं ओर मौलवियों से, जो फ़रमानी नाज़ ने भी पूछा है कि वे तब कहाँ थे? जब उसके शौहर ने उसे तलाक़ दिये बिना बदहाली में छोड़कर दूसरी शादी कर ली थी। क्या ऐसे लोगों के लिए शरीअत में कोई सज़ा नहीं है? यह कोई एक फ़रमानी नाज़ पर दबाव नहीं बना है। हर धर्म में ऐसे ठेकेदारों की भरमार है, जिन्होंने ऐसे लोगों के विचारों पर आपत्ति जताते हैं, जो पूरी दुनिया के लोगों को अपना घर मानकर सभी से प्यार करते हैं। धर्मों में ऐसे ही दकियानूसी लोगों की भरमार से केवल सभी धर्म और उनके मानने वाले भी ख़तरे में हैं।

सवाल यह है कि क्या वे लोग अपने सही मायने में धर्म की रक्षा कर रहे हैं, जिन्हें सभी धर्मों के लोगों से लगाव रखने वाले अपने ही धर्म के लोग दुश्मन नज़र आते हैं। इन दकियानूसी ठेकेदारों की इसी एक कमी की वजह से अपने ही कई विद्वानों, कलाकारों और गुणी लोगों को तिरस्कृत और अपमानित करके उनके अपने ही धर्म से बाहर फेंक दिया जाता है। इतिहास ऐसे विद्वानों, कलाकारों और गुणी लोगों के तिरस्कार और उनकी हत्या तक का गवाह रहा है। अगर एक कलाकार दूसरे धर्म का गुणगान करके अपराध कर रहा है, तो धर्म संसद के ठेकेदार धर्म संसद की बैठक में एक-दूसरे के धर्म की तारी$फों के पुल क्यों बाँघते हैं? वहीं मंचों पर ही आपस में क्यों नहीं लडऩे-मरने लगते हैं?

क्या कभी किसी धर्म का कोई ठेकेदार यह सोचता है कि अपने ही धर्म के मानवतावादी विद्वानों, कलाकारों और गुणी लोगों का धार्मिक बहिष्कार करके उनके धर्म का और उनका कितना नुक़सान होता है? यह तो अपनी ही पीढिय़ों के लिए अज्ञानता की खाई खोदने जैसा है। अगर हमारे समाज में विद्वानों, कलाकारों और गुणीजनों का तिरष्कार करेंगे, तो स्पष्ट है कि ज्ञान हासिल करने के लिए तैयार हो रहे बच्चों को कौन शिक्षा देगा? भारत में कुछ बाहरी आततायियों ने यहाँ यही तो खेल किया, जिसका नतीजा आज हमारे इस रूप में है कि हम सबसे पिछड़ चुके हैं। जिस भारत को सदियों तक पूरी दुनिया सोने की चिडिय़ा मानकर लूटने को आती रही, और यहाँ के धन व ज्ञान से अपनी-अपनी दरिद्रता दूर कर चुकी है। आज हम इसी भारत को न केवल समझने की भूल कर रहे हैं, वरन् इस महान् देश को अपने ही हाथों कलंकित करने में लगे हैं। कैसे-कैसे संत, महंत, ऋषि, मुनि, फ़क़ीर, अध्येता, कवि, राजीतिज्ञ इस देश ने हमें दिये। परन्तु हमने उनसे सीखने के बजाय आपस में लडऩा, मरना सीख लिया। इस देश ने किसे क्या नहीं दिया? लेकिन कुछ लोग हैं, जो इसे बर्बाद करने पर तुले हुए हैं।

इसमें कोई मतभेद नहीं कि इस देश के मूल निवासी सनातनी हैं। लेकिन सनातन संस्कृति से बैर करने वाले और ख़ुद सनातनी भी आज इसी संस्कृति के शत्रु हो चुके हैं। धर्मों के नाम बदले जा रहे हैं। मूर्खता करके लोग ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ कह रहे हैं। चंद लोग हमें नचा रहे हैं और हम बंदर की तरह नाच रहे हैं। अपने ही देश, अपनी ही संस्कृति और अपने ही महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक विचारों का गला घोंटने की सोच हमारे अन्दर इस क़दर घर कर चुकी है कि हमें अपने ही लोगों पर अत्याचार करने में आनन्द आने लगा है।

क्या हम अब इंसान बने रहना नहीं चाहते? आज दुनिया के उन देशों में भी हम अपनी मूर्खताओं के चलते हँसी का पात्र बन गये हैं, जिन देशों ने कभी हमसे शरण और भीख माँगी थी। दुराग्रह की स्थितियाँ हमें व्यर्थ का विरोध करने को मजबूर कर रही हैं। यही तो कुछ लोग चाहते हैं; ताकि वे ऐश करते रहें और हम लड़ते-मरते रहें।

कश्मीर के पहलगाम में बस खाई में गिरी, 6 आईटीबीपी जवानों की मौत

अमरनाथ यात्रा की ड्यूटी से लौट रहे भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों को ले जा रही एक बस कश्मीर के पहलगाम में हादसे का शिकार हो गयी है। इस हादसे में अब तक 6 जवानों की जान जाने की सूचना है, हालांकि, मृतकों की संख्या बढ़ सकती है क्योंकि घायलों में ज्यादातर गंभीर हैं। ब्रेक फेल होने से बस करीब 500 फीट नीचे गहरे खाई में गिर गई।

जानकारी के मुताबिक पहलगाम के पास हुए इस हादसे का शिकार हुई बस में 40 जवान सवार थे जिनमें 38 आईटीबीपी जबकि 2 जेके पुलिस के थे। यह हादसा चंदनबाड़ी के पास हुआ है और हादसे में बस के परखचे उड़ गए। जख्मी जवानों को एयरलिफ्ट कर श्रीनगर आर्मी अस्पताल भेजा गया है।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों को ले जा रही बस एक खाई में जा गिरी। हादसे में 6 जवान शहीद हुए हैं जबकि 32 घायल हैं। हादसे के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया है। सेना के जवान घायलों के बचाव कार्य में जुटे हैं।

पुलिस के मुताबिक आईटीबीपी के जवान अमरनाथ यात्रा की ड्यूटी पूरी करने के बाद लौट रहे थे। बस आईटीबीपी कर्मियों को लेकर चंदनवाड़ी से वापस आ रही थी, लेकिन फ्रिसलान इलाके में ब्रेक फेल होने से दुर्घटना का शिकार हो गई, जो चंदनवाड़ी और पहलगाम के बीच पड़ता है।

बताया जा रहा है कि बस चंदनवाड़ी जा रही थी, लेकिन फ्रिसलान इलाके में ब्रेक फेल होने के बाद 500 फीट नीचे गहरे खाई में गिर गई। जख्मी जवानों को एयरलिफ्ट कर श्रीनगर आर्मी अस्पताल भेजा गया है।

कश्मीर के शोपियां में आतंकियों ने की एक कश्मीरी पंडित की हत्या, दूसरा घायल

कश्मीर के शोपियां में आतंकियों ने मंगलवार को एक और कश्मीरी पंडित की हत्या कर दी। आतंकियों ने उनपर हमला किया जिसमें एक भाई की मौत हो गयी जबकि उसका दूसरा भाई गंभीर रूप से घायल हुआ है।

‘तहलका’ की ‘जानकारी के मुताबिक आतंकियों ने शोपियां इलाके में हमला करके दोनों पर गोलीबारी की जिसमें एक की की मौत होने की खबर है जबकि दूसरा भाई घायल हो गया है। उसे अस्पताल में भर्ती किया गया है।

हाल के महीनों में आतंकियों ने कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया है और हाल के महीनों में यह इस समुदाय में चौथी हत्या है। यह घटना छोटेपोरा की है। यह हमला सेब के एक बाग़ में किया गया। सुरक्षा बलों ने इलाके को घेर लिया है।

कोरोना के मामले घटे; 24 घंटे में आये देश में 8, 813 मामले, 29 की मौत

भले राजधानी दिल्ली में अभी भी कोरोना के मामले काफी आ रहे हैं, कुल मिलाकर देश में कोरोना के पिछले 24 घंटे में 40 फीसदी कमी के साथ 8, 813 नए मामले सामने आए हैं। इस दौरान देश भर में 28 लोगों की मौत हुई है जिसमें अकेले दिल्ली में पांच लोग शामिल हैं।

देश में पिछले 24 घंटे में संक्रमण से जिन 29 लोगों की मौत हुई है उनमें दिल्ली में 5, कर्नाटक और महाराष्ट्र में 3-3, छतीसगढ़, नगालैंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 2-2 और असम, चंडीगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, केरल, ओडिशा और उत्तराखंड में 1-1 मौत शामिल है। अब तक देश भर में कुल 527, 098 लोगों की मौत हो चुकी है।

उधर नए मामलों के साथ देश में कुल मामलों की संख्या 44, 277, 194 हो गई है। सक्रिय मामलों की संख्या 111,252 है। पिछले 24 घंटे में कोरोना से 15, 040 लोग ठीक हुए, अब तक कुल 43, 638, 844 लोग कोरोना से ठीक हुए हैं।

पिछले 24 घंटे में 6,10,863 वैक्सीनेशन हुआ। अब तक कुल 2,08,31,24,694 वैक्सीनेशन हो चुका है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति ने की नेहरू की तारीफ़, बोले उनके रास्ते पर भारत

भारत के अपने स्वतंत्रता दिवस पर सोमवार को श्रीलंका को एक डोर्नियर समुद्री टोही विमान उपहार में देने के बीच श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जमकर प्रशंसा की है। उन्होंने भारत की तरफ से संकट में मदद देने के लिए भी भारत सरकार का आभार जताया है।

विक्रमसिंघे ने श्रीलंका में डोर्नियर समुद्री टोही विमान उपहार के लिए हुए एक समारोह में भारत के स्वतंत्रता दिवस की 75वीं वर्षगांठ का जिक्र करते हुए कहा – ‘मैं देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के प्रसिद्ध ‘नियति से वादा’ भाषण से प्रेरित हूँ, जो भारत की आजादी की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त, 1947 को दिया गया था।’

श्रीलंका के राष्ट्रपति ने कहा – ‘पंडित नेहरू का तय किया गया आगे का रास्ता दिखा रहा है। भारत ने इसे समझा और आज वह विश्व शक्ति बन रहा है, और यह अब भी उत्थान पर है। मध्य शताब्दी तक जब हम वहां नहीं हैं, तो आप एक शक्तिशाली भारत देख सकते हैं जो वैश्विक मंच पर प्रमुख भूमिका निभा रहा है।’

विक्रमसिंघे ने कहा कि नेहरू ने श्रीलंका को संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा बनाने में अग्रणी भूमिका निभाई थी और पूरा सहयोग दिया था। उस समय संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि रहे वी कृष्ण मेनन ने विक्रमसिंघे के पिता की मदद की थी। विक्रमसिंघे ने कहा कि वह उभरते हुए श्रीलंकाई नेताओं को सलाह देना चाहेंगे कि वे अपने भारतीय सहयोगियों को अच्छी तरह से जानें।

भारत की तरफ से श्रीलंका को उपहार में दिया डोर्नियर समुद्री टोही विमान दिया द्वीप राष्ट्र को अपने जलक्षेत्र में मानव और मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य संगठित अपराधों जैसी कई चुनौतियों से निपटने में सक्षम बनाएगा। विक्रमसिंघे ने अपने देश को डोर्नियर विमान उपहार में दिए जाने पर भारत का आभार व्यक्त किया।

इसे लेकर रखे एक समारोह में श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने कहा’- ‘भारत के साथ सहयोग के अन्य क्षेत्रों के परिणामों की तरह श्रीलंका की वायुसेना को डोर्नियर प्रदान करना प्रासंगिक है और समुद्री सुरक्षा की उसकी जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक कदम है। यह भारत की उसके मित्रों की शक्ति बढ़ाने की क्षमता का उदाहरण है।’

चीन का उपग्रह-मिसाइल निगरानी पोत श्रीलंका की बंदरगाह पर, भारत चिंतित

चीन का उपग्रह और मिसाइल निगरानी पोत श्रीलंका की बंदरगाह हंबनटोटा पर पहुंच गया है। भारत ने इसे लेकर गंभीर चिंता जताई थी जिसके बाद श्रीलंका ने चीन से इसे न भेजने का आग्रह किया था, हालांकि बाद में उसने इसे भेजने के लिए हाँ कह दी। भारत ने इस घटनाक्रम पर कहा है कि सरकार भारत की सुरक्षा और आर्थिक हितों से जुड़े किसी भी विकास की सावधानीपूर्वक निगरानी करती है और उनकी सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करती है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक हंबनटोटा बंदरगाह पर अपने जहाज को आने को लेकर भारत के विरोध के बाद चीन ने कहा था – ‘कुछ देशों के कोलंबो पर दबाव बनाने के लिए कथित सुरक्षा चिंताओं का हवाला देना और उसके आंतरिक मामलों में पूरी तरह हस्तक्षेप करना बिल्कुल अनुचित है।’ इसके बाद श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के 13 अगस्त को एक आदेश में कहा था कि ‘कोलंबो ने कुछ चिंताओं को लेकर गहन परामर्श किया है’।

इधर भारत की चिंता है कि चीनी पोत के ट्रैकिंग सिस्टम भारतीय प्रतिष्ठानों की जासूसी करने की कोशिश कर सकते हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची के बयान के मुताबिक ने ‘हमें चीनी पोत के हंबनटोटा की यात्रा की रिपोर्ट की जानकारी है।

बागची ने कहा था कि सरकार भारत की सुरक्षा और आर्थिक हितों से जुड़े किसी भी विकास की सावधानीपूर्वक निगरानी करती है और उनकी सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय करती है।

नीतीश मंत्रिमंडल का आज विस्तार, 31 मंत्रियों को किया जाएगा शामिल

भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए से बाहर निकलकर कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए में शामिल हुए नीतीश कुमार की सरकार का आज विस्तार होगा। पिछले हफ्ते नीतीश ने मुख्यमंत्री जबकि उनके सहयोगी आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। आज नीतीश मंत्रिमंडल में 31 मंत्री शामिल किये जाने की संभावना है। राज्यपाल फागू चौहान 11.30 बजे नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाएंगे।

जानकारी के मुताबिक मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा मंत्री गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी के होंगे जबकि कांग्रेस भी मंत्रिमंडल में शामिल हो रही है। मंत्रियों की सूची पिछली रात राज्यपाल को सौंप दी गयी थी। महागठबंधन में कुल सात दल शामिल हैं।

नीतीश कुमार पुराने चेहरों पर ही विश्वास करते हुए उन्हें मंत्री बना रहे हैं। ख़बरों के मुताबिक जेडीयू से विजय कुमार चौधरी, बिजेन्द्र प्रसाद यादव, अशोक चौधरी, श्रवण कुमार, संजय कुमार झा, लेसी सिंह, सुनील कुमार, जयंत राज और जमा खान मंत्री बनाये जा रहे हैं।

विधानसभा में सबसे बड़े दल आरजेडी से तेज प्रताप यादव, सुधाकर सिंह, आलोक मेहता, अनिता देवी, चंद्रशेखर यादव, सुरेंद्र यादव, सर्वजीत पासवान, समीर महासेठ, मास्टर कार्तिकेय सिंह, शाहनवाज आलम, राहुल तिवारी और सुनील सिंह के नाम सूची में हैं।

तीसरे सबसे बड़े दल कांग्रेस से शकील अहमद खान और मुरारी प्रसाद गौतम को मंत्री बनाया जाएगा। निर्दलीय सुमित कुमार सिंह और जीतनराम मांझी की पार्टी ‘हम’ से संतोष कुमार सुमन भी मंत्री बन रहे हैं।

याद रहे नीतीश कुमार आठवीं बार मुख्यमंत्री जबकि तेजस्वी यादव दूसरी बार बिहार के उप मुख्यमंत्री बने हैं। नीतीश कुमार को 24 अगस्त को विधानसभा में बहुमत साबित करना है।