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श्रीलंका भेजे हमारे पोत से किसी देश की सुरक्षा नहीं होगी प्रभावित : चीन

क़र्ज़ के बदले श्रीलंका से उसकी हंबनटोटा बंदरगाह 99 साल की लीज़ पर लेने वाले चीन ने अपने बैलेस्टिक मिसाइल और उपग्रहों का पता लगाने में सक्षम पोत ‘युआन वांग 5′ के श्रीलंका बंगरगाह पहुँचने के बाद अपनी पहली प्रतिक्रिया में बुधवार को कहा कि इसकी उपस्थिति किसी देश की सुरक्षा और उसके आर्थिक हितों को प्रभावित नहीं करती और किसी तीसरे पक्ष को इसे बाधित नहीं करना चाहिए।

बता दें भारत और अमेरिका ने चीन के जासूसी पोत के श्रीलंका आने को लेकर आशंकाएं जताई हैं। जब यह पोत पहुंचा तो श्रीलंका में चीनी राजदूत क्यूई जेनहोंग ने हंबनटोटा बंदरगाह पर स्वागत समारोह की मेजबानी की। चीन के दावे के मुताबिक समारोह में श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के प्रतिनिधि के अलावा दस से अधिक दलों और मित्र समुदायों के प्रमुख भी शामिल हुए।

हालांकि भारत और अमेरिका का नाम लिए बगैर चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा – ‘हमारे उच्च प्रौद्योगिकी वाले अनुंसधान पोत की गतिविधियों से किसी देश की सुरक्षा प्रभावित नहीं होगी। किसी तीसरे पक्ष को उसे बाधित नहीं करना चाहिए।’

बता दें यह पोत 22 अगस्त तक श्रीलंका की बंदरगाह पर ही रुकेगा। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि ‘युआन वांग 5 श्रीलंका के सक्रिय सहयोग से हंबनटोटा बंदरगाह पर सफलतापूर्वक पहुंच गया। मैं फिर से जोर देना चाहता हूं कि युआन वांग 5 की समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय सामान्य प्रक्रिया के अनुरूप हैं।’

हंबनटोटा बंदरगाह बीजिंग ने 2017 में श्रीलंका से कर्ज के बदले में 99 साल के पट्टे पर ली थी। श्रीलंका सरकार ने पोत में लगे उपकरणों को लेकर भारत और अमेरिका की चिंता व्यक्त किए जाने के बाद चीन सरकार से इस पोत को भेजने में विलंब करने को कहा था। हालांकि, उसने 16 से 22 अगस्त तक जहाज को बंदरगाह पर ठहरने की अनुमति दे दी। श्रीलंका ने कहा कि उसने व्यापक विचार-विमर्श के बाद जहाज को अनुमति दी है।

सोनिया की गठित जम्मू कश्मीर की दो समितियों से आज़ाद ने दिया इस्तीफा

कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर में मंगलवार शाम वकार रसूल वानी को जम्मू-कश्मीर इकाई का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। हालांकि, वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद, जिन्हें पार्टी ने जम्मू कश्मीर में चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया था, उन्होंने नियुक्ति के कुछ घंटे बाद ही पिछली रात इस्तीफा दे दिया।

आज़ाद, जिन्हें हाल तक कांग्रेस के भीतर जी-23 गुट का नेता माना जाता था, ने पार्टी की जम्मू कश्मीर की राजनीतिक मामलों की समिति की सदस्यता भी छोड़ने का ऐलान किया है। अभी यह पता नहीं चला है कि आज़ाद ने ऐसा क्यों किया क्योंकि नए प्रदेश अध्यक्ष वानी उनके ही नजदीकी हैं। अपेक्षाकृत युवा (47 वर्षीय) वानी विधायक रह चुके हैं और आज़ाद के ही पैतृक इलाके डोडा के बनिहाल के रहने वाले हैं।

आजाद के जम्मू-कश्मीर कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष और पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति की सदस्यता से इस्तीफे से लोगों को हैरानी हुई है क्योंकि यह माना जा रहा था कि गांधी परिवार से उनके मतभेद ख़त्म हो गए हैं। आजाद ने 15 अगस्त को राहुल और प्रियंका गांधी के साथ ‘आजादी गौरव यात्रा’ में भी हिस्सा लिया था। वे लगातार पार्टी के कार्यक्रमों में भी शामिल हो रहे हैं, ऐसे में उनका इस्तीफा हैरानी से देखा जा रहा है।

पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कल शाम आजाद को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपी थी। साथ ही गांधी ने जम्मू-कश्मीर कांग्रेस कमेटी के लिये चुनाव अभियान समिति और राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) समेत सात समितियों का भी गठन किया था।

इससे पहले पिछले करीब पांच साल से प्रदेश अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। आजाद के करीबी माने जाने वाले नए प्रदेश अध्यक्ष वानी प्रदेश में पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं।

महाराष्ट्र: पैसेंजर ट्रेन और मालगाड़ी में टक्कर, 50 से ज्यादा यात्री घायल

महाराष्ट्र के गोंदिया में मंगलवार को देर रात भीषण ट्रेन हादसा हुआ है। इस हादसे में पैसेंजर ट्रेन भगत की कोठी और मालगाड़ी के बीच सिग्नल न मिलने के कारण टक्कर हुर्इ।

टक्कर होने के बाद ट्रेन की एक बोगी S3 डिब्बा पटरी से उतर गया। इस हादसे में 50 लोग जख्मी हुए, इनमें 13 लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं।

गंभीर रूप से घायल यात्रियों को नजदीकी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। बता दे, हादसे का कारण सिग्नल की खराबी को बताया जा रहा है।

जम्मू में दो मुस्लिम परिवारों के घर से छह सदस्यों के शव मिले

जम्मू के एक इलाके में एक घर से 6 लोगों के शव मिले हैं। सभी मृत लोग एक ही परिवार के सदस्य थे। जब पुलिस ने लोगों की सूचना के बाद घर खोला तो शव गलने के कारण भीतर से बदबू आ रही थी।

जानकारी के मुताबिक जम्मू के तवी विहार सिदड़ा में घर से तीन महिलाओं सहित छह शव मिले हैं। दो मुस्लिम परिवारों के इन सदस्यों की हत्या किये जाने की आशंका है। उनके शव जम्मू मेडिकल कालेज अस्पताल में रखे गए हैं। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के बाड़े ही कारण पता चल सकेगा।

पुलिस की फॉरेंसिक टीम ने घटनास्थल से सैंपल जुटाए हैं। प्राथमिक जांच में जहरीला पदार्थ निगलने की संभावना जताई गयी है। इन लोगों की पहचान सकीना बेगम, उसके बेटे जफर सलीम, दो बेटियों रुबीना बानो, नसीमा अख्तर, नूर-उल-हबीब, सज्जाद अहमद के रूप में की गयी है।

पड़ौसियों के मुताबिक जिस घर में शव मिले वह नूर उल हबीब का है जबकि सकीना और उसका परिवार घर की देखरेख करता था। ये परिवार डोडा जिले का रहने वाला है जबकि नूर उल हबीब श्रीनगर का रहने वाला था।

परिवार के सदस्य तीन चार दिन से नहीं दिख रहे थे लिहाजा सुबह घर से पड़ौसियों को बदबू आने के बाद तुरंत पुलिस को सूचित किया गया। पुलिस ने जब मकान का दरवाजा खोला तो भीतर यह शव मिले। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

खुला देह व्यापार!: कोलकाता हवाई अड्डे पर खड़े अवैध टैक्सी चालक चला रहे जिस्म-.फरोशी का धंधा

अधिकतर बड़े शहरों में कुछ ऑटो, टैक्सी चालक ऐसे लोगों पर नज़र रखते हैं, जो अपनी रात रंगीन करने के लिए शराब और शबाब की तलाश में रहते हैं। इसी के मद्देनज़र ये अवैध ऑटो, टैक्सी चालक बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों के उन स्टैण्ड्स पर खड़े रहते हैं, जहाँ से वे लोगों को जिस्म-फ़रोशी के ठिकानों पर ले जा सकें। कोलकाता अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ऐसे ही अवैध टैक्सी चालक यात्रियों को लुभाने के लिए सैक्स रैकेट चलाते हैं। जब भी कोई फ्लाइट आती है, ये अवैध टैक्सी चालक दलालों के रूप में दोगुने हो जाते हैं और यात्रियों को घेरने में लग जाते हैं। यात्रियों में से अगर कोई शराब और शबाब की तलाश वाला होता है, तो इनमें से कुछ उसे शिकार की तरह झपट लेते हैं और उसके गंतव्य तक पहुँचाकर अपना कमीशन वसूलकर फिर नये ग्राहक की तलाश में अपने अड्डे पर जम जाते हैं। इसी अवैध और अनैतिक धंधे को लेकर तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-

भारत में कोरोना-काल था। देश में कोरोना वायरस के मामलों में काफ़ी गिरावट देखी जा रही थी। देश से तालाबंदी धीरे-धीरे हट रहा था। हम पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के आधिकारिक दौरे पर थे। हमें मिली जानकारी के मुताबिक, संवेदनशील जगह होने के बावजूद कोलकाता हवाई अड्डे की कुछ कहानियाँ थीं। दुर्भाग्य से ये कहानियाँ सकारात्मक नहीं, अपितु नकारात्मक कहानियाँ हैं; जिन्हें देश और आम जनता के हित में बताया जाना ज़रूरी है।
एक अच्छी सुबह नाश्ते के बाद हम कहानी की सच्चाई खोजने के लिए होटल से कोलकाता हवाई अड्डे के लिए निकल पड़े। महामारी से भरे साल के बाद देश में हवाई सेवाएँ फिर शुरू होने की तैयारी में थीं और दलाल सक्रिय हो चुके थे। कोलकाता हवाई अड्डा गतिविधियों से गुलजार दिख रहा था। यात्री टैक्सी की तलाश में इधर-उधर भाग रहे थे। कोलकाता हवाई अड्डे पर अवैध टैक्सी संचालकों के गिरोह ने भी वापसी कर ली थी। उन्हें यात्रियों के पीछे दौड़ते और वेश्याओं के लिए लुभाने की कोशिश करते देखा गया। उसी समय अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए आगमन द्वार संख्या-5 पर ‘तहलका’ रिपोर्टर ने एक व्यक्ति संजीव से मुलाक़ात की, जो पेशे से दलाल और टैक्सी चालक था। रिपोर्टर ने ख़ुद को संजीव के सामने एक व्यवसायी के रूप में पेश किया।
यह जानने के तुरन्त बाद कि हम दिल्ली से हैं और किसी व्यावसायिक कार्य के लिए कोलकाता आये हैं; संजीव ने हमें 14 और 15 वर्ष आयु की नाबालिग़ लड़कियों को शारीरिक सम्बन्धों और मसाज के लिए उपलब्ध कराने की पेशकश की। संजीव ने कहा- ‘मैं आपको 16 और 18 साल की उम्र की नाबालिग़ लड़कियों को शारीरिक सम्बन्धों और मसाज के लिए उपलब्ध कराऊँगा। अगर आपको और भी छोटी उम्र की लड़कियों की ज़रूरत है, तो मैं आपके लिए शारीरिक सम्बन्धों और मसाज के लिए 14 और 15 साल की लड़कियाँ भी ला सकता हूँ।’
इसके बाद संजीव ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से विस्तृत चर्चा की। उसने नाबालिग़ लड़कियों के साथ शारीरिक सम्बन्धों और मसाज के तरह-तरह के ऑफर दिये।


रिपोर्टर : कितनी बड़ी?
संजीव : वो ही 18-16..।
रिपोर्टर : उससे कम ?
संजीव : 15, 14..।
रिपोर्टर : 15 साल की लड़की मिल जाएगी?
संजीव : आराम से।
रिपोर्टर : मसाज के लिए या ले जा भी सकते हैं?
संजीव : सभी के लिए।
रिपोर्टर : ऐसा बोलते हैं, होता नहीं है?
संजीव : नहीं होगा, तो पैसे नहीं लेगा। मेरा गाड़ी वाला नहीं लेगा।

संजीव ने कहा कि वह अपने कई यात्रियों को सम्बन्धित मसाज सेंटर ले गया है। उसके मुताबिक, मसाज सेंटर की नाबालिग़ लड़की हमें बॉडी (शारीरिक) मसाज देगी और उसके बाद हम उसी सेंटर पर उसके साथ सेक्स कर सकते हैं। मसाज सेंटर के मालिक को इसके बारे में कभी पता ही नहीं चलेगा।
रिपोर्टर : ये जो आप 15 साल की लड़की बता रहे हो…,14-15 साल की?
संजीव : वो मसाज कर देगी आपका।
रिपोर्टर : वो हमारी बॉडी मसाज कर देगी, और उसके अलावा?
संजीव : उसको ले जाएगा। उसको बोलेगा पैसा देगा। …काम कर देगा।
रिपोर्टर : लड़की का काम कर देगा वहीं?
संजीव : वो वहीं होगा।
रिपोर्टर : मसाज सेंटर में? वह अलाउ नहीं करेगा न?
संजीव : वो जानेगा कैसे? वो जानेगा ही नहीं।
रिपोर्टर : उसको पता ही नहीं चलेगा मसाज सेंटर वाले को? लड़की मना करे फिर?
संजीव : बोल रहा हूँ, होगा। हम लेकर गया है, कितना गेस्ट वहाँ पर।
रिपोर्टर : उसी मसाज सेंटर में वहाँ पर?
संजीव : हाँ।

अब संजीव ने हमें मसाज का रेट बताया।
संजीव : मसाज का 2000-2500 रुपये लगेगा।
रिपोर्टर : हैं जी?
संजीव : 2000 रुपये में मसाज करेगा।
रिपोर्टर : 2000 रुपये में मसाज करेगा?
संजीव : भीतर मैं आप बात करोगे कितना लगेगा काम, वो बोलेगा इतना लगेगा। आपको पसन्द करेगा…, नहीं तो नहीं करेगा।
रिपोर्टर : उसने मना कर दिया फिर?
संजीव : करेगा।

मसाज सेंटर के अलावा संजीव ने हमें बताया कि वह हमारे लिए एक होटल की व्यवस्था कर सकता है, जहाँ हम उसके द्वारा प्रदान की गयी महिलाओं के साथ सेक्स कर सकें।
संजीव : लड़की चाहिए? सब मिल जाएगा आपको।
रिपोर्टर : दिलवाओगे?
संजीव : हाँ।
रिपोर्टर : बताओ कहाँ ले चलोगे?
संजीव : होटल मैं कर देंगे।
रिपोर्टर : कौन-सा होटल?
संजीव : होटल।
रिपोर्टर : कौन-सा होटल ?
संजीव : चलिए न मेरे साथ। कितना चाहिए आपको, 2 (दो) चाहिए या 3 (तीन)?
रिपोर्टर : दो हैं; दो अलग-अलग रूम्स होंगे।

संजीव ने अब हमें बताया कि वह होटल के कमरे में लड़कियों को उपलब्ध कराने के लिए कितना पैसा लेगा।
रिपोर्टर : पूरे दिन का कितना लोगे?
संजीव : 2000 रुपये दे दीजिएगा।
रिपोर्टर : पूरे दिन का 2000 रुपये?
संजीव : मसाज करना है, मसाज करवा देंगे।
रिपोर्टर : मसाज करवा दोगे, कहाँ ?
संजीव : चलिये, मॉल में। अच्छा लड़की। बच्चा लड़की।

लेकिन संजीव के पास कुछ और सरप्राइज (आश्चर्य) थे। फिर उसने कहा कि उसके पास कई तरह की महिलाएँ हैं, जिनमें विवाहित महिलाएँ भी शामिल हैं। हमें उसे अपनी पसन्द बतानी चाहिए, वह हमें वह मुहैया कराएगा।
संजीव : मैं अपने दोस्त को फोन करूँगा, वह लड़की लेकर आएगा।
रिपोर्टर : वो लड़की कितने साल की होगी?
संजीव : बड़ी चाहिए, लड़की चाहिए, आपको मिल जाएगी। शादी वाली, शादी वाला…।
रिपोर्टर : शादीशुदा औरत भी मिल जाएगी?
संजीव : हाँ, हर तरह का मिल जाएगा।

यह आपके लिए संजीव था। कोलकाता हवाई अड्डे के अंतरराष्ट्रीय गेट नंबर-5 के ठीक सामने खड़ा एक टैक्सी चालक, जो हमें चुनने के लिए कई तरह की महिलाओं की पेशकश करता है- नाबालिग़, युवती या विवाहित; सेक्स और मसाज के लिए। उसने दावा किया कि उसने अपने अधिकांश यात्रियों, जो उसकी टैक्सी में सवार हुए; यह पेशकश की है।
हालाँकि कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती है। हम कोलकाता हवाई अड्डे पर एक अन्य टैक्सी चालक रविदास से मिले- गेट नंबर-1बी पर। उसने हमें सोनागाछी तक ले जाने का वादा किया, जिसे मध्य कोलकाता में स्थित एशिया का सबसे बड़ा रेड-लाइट एरिया (वेश्यावृत्ति क्षेत्र) कहा जाता है। रविदास ने कहा कि सोनागाछी में हम एक घंटे तक एक महिला का नग्न नृत्य देख सकते हैं और उसके बाद उसके साथ सेक्स भी कर सकते हैं। सब पैसे के बदले।
रविदास : सोनागाछी में एक घंटे नृत्य और नेक्ड डांस (नंगा नाच)। एक आदमी को शॉट करने देगा।
रिपोर्टर : लड़की कपड़े उतारकर डांस (नृत्य) करेगी?
रविदास : हाँ, एक घंटा। 4-5 आदमी देख सकता है।
रिपोर्टर : ख़र्चा कितना?
रविदास : 4000, 4500, 6000…, जैसा लड़की लीजिएगा।
रिपोर्टर : आप हमें लेकर चलेंगे?
रविदास : अभी?
रिपोर्टर : शाम को, जब भी, कल-वल।
रविदास : जब बोलिएगा।
रिपोर्टर : आपकी सेटिंग है वहाँ?
रविदास : एकदम।

रविदास ने हमें आश्वासन दिया कि अगर हम सोनागाछी जाते हैं, तो हमें पुलिस की छापेमारी से डरने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वह पुलिस को पैसे देता है। उसने यह भी कहा कि उसे एक दलाल को पकडऩा है और सोनागाछी में उसे पैसे देने हैं। उसके बिना हमें कुछ नहीं मिलेगा। रविदास ने कहा कि यह सब उनका नियमित काम है।
रिपोर्टर : पुलिस का कोई रेड?
रविदास : कोई रेड नहीं। पुलिस का हमें मालूम है। नाइट (रात) में जाने से पुलिस को 100 रुपये देने का। देखिए, दलाल पकडऩा पड़ेगा। उसके बिना कुछ नहीं मिलेगा।
रिपोर्टर : दलाल आपके पास है?
रविदास : हाँ, हम लोगों का तो काम ही यह सब है। वो लोग (दलाल) 200-500 रुपये का खाएगा।

यह पूछे जाने पर कि क्या हम महिलाओं को अपने होटल के कमरे में ला सकते हैं? रविदास ने हमें बताया कि वास्तव में हमें अपने होटल के कमरे में महिला मिल सकती है। लेकिन इनकी दरें अलग होंगी- 10,000-12,000 रुपये और 15,000 रुपये प्रति रात। रविदास ने कहा कि हम अन्त में कितना भुगतान करेंगे? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किस प्रकार की महिला को चुनते हैं। उसने कहा कि वह हमें उनकी तस्वीरें हमारे फोन पर भेजेगा और फिर हम उसे अपनी पसन्द बता सकते हैं। रविदास ने कहा कि जैसे ही हम तस्वीरों में से एक महिला का चयन करते हैं, वह उन सभी को अपने फोन से डिलीट कर देगा।
रिपोर्टर : अगर हमें होटल में लड़की बुलानी हो तो?
रविदास : होटल में आएगी लड़की, 10,000-12,000-15,000…।
रिपोर्टर : एक रात का?
रविदास : एक रात का।
रिपोर्टर : उस लेवल की लड़की होगी?
रविदास : उस लेवल की; मॉडल।
रिपोर्टर : आप फोटो भेजो?
रविदास : 10-15 मिनट लगेगा। फोटो मँगाना पड़ता है। घर में फोन में नहीं रखते। काम ख़त्म, सब डिलीट।

रविदास के बाद अब ‘तहलका’ की मुलाक़ात कोलकाता हवाई अड्डे पर एक अन्य टैक्सी चालक दिग्विजय बाबू से हुई, जो सेना के एक कर्नल के हरियाणा से कोलकाता आने का इंतज़ार कर रहा था…; उसे दो बंगाली महिलाओं के साथ मस्ती करने के लिए कोलकाता के किसी होटल में लेने और छोडऩे के लिए। जब दिग्विजय कोलकाता हवाई अड्डे पर फ्लाइट के उतरने का इंतज़ार कर रहा था, उसने हमसे खुलकर बातचीत की।
रिपोर्टर : यहाँ पब व$गैरह नहीं है क्या?
दिग्विजय : बहुत कुछ है सर! अभी देखो सर, जो साहेब आ रहे हैं, कर्नल साहब आ रहे हैं।
रिपोर्टर : अच्छा, आप कर्नल साहब के इंतज़ार मैं खड़े हैं?
कहाँ से?
दिग्विजय : आ रहे हैं; हरियाणा से आ रहे हैं। तो उनको लेकर जाएँगे। दो आइटम (सुन्दर लड़कियाँ) आएँगी।
रिपोर्टर : कर्नल साहब के साथ?
दिग्विजय : नहीं, बंगाल से। होटल ले जाएँगे। रहेंगे अपना ऐश से।

दिग्विजय ने आगे कोलकाता में स्थित एक होटल के नाम का ख़ुलासा किया, जो अपने उन ग्राहकों को महिलाओं की आपूर्ति करता है, जो उसमें (होटल में) ठहरते हैं। दिग्विजय के मुताबिक, होटल में महिलाओं की सूची है। ग्राहक द्वारा कैटलॉग से चुनी गयी महिलाओं को उसके कमरे में उपलब्ध कराया जाता है। दिग्विजय के अनुसार, चूँकि होटल एक पुलिस वाले का है, इसलिए पुलिस की कोई छापेमारी नहीं होगी।
दिग्विजय : एक होटल है पास में… उसमें क्या आपको नाईट सेवा मिलेगा। वो कैटलॉग दिखा देगा। जैसा आइटम आपको चाहिए, मिल जाएगा। वो होटल प्रशासन के आदमी का है। पुलिस वाले का होटल है।
रिपोर्टर : पुलिस की छापेमारी?
दिग्विजय : पुलिस की रेड-वेड नहीं होती है सर!

‘तहलका’ रिपोर्टर कोलकाता हवाई अड्डे पर सेक्स रैकेट का पर्दा$फास करने गये थे। लेकिन इस पड़ताल के दौरान पता चला कि जो लोग कोलकाता हवाई अड्डे पर सेक्स रैकेट चला रहे हैं और घरेलू व अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को रेड लाइट डिस्ट्रिक्ट्स (वेश्यावृत्ति वाले ज़िलों) में कम उम्र की मसाज करने वाली और कुलीन यौनकर्मियों को उपलब्ध कराने के लिए लुभाते हैं, वे हवाई अड्डे से अवैध टैक्सी चला भी रहे हैं। कुछ समय पहले कोलकाता के होटल में महिलाओं को सेक्स के लिए खुलकर बात करने वाले दिग्विजय बाबू ने अब ख़ुलासा किया कि कैसे अवैध टैक्सी संचालकों के गिरोह कोलकाता हवाई अड्डे से अवैध रूप से टैक्सी चला रहे हैं।
रिपोर्टर : क्या ये टैक्सी यहाँ से चलना एयरपोर्ट (हवाई अड्डे) से ऐसे चलना अलॉउड (अनुमति) नहीं है क्या?
दिग्विजय : नहीं।
रिपोर्टर : क्यों?
दिग्विजय : प्री-पेड की अनुमति है। हम लोग प्रीपेड में नहीं चलते हैं।
रिपोर्टर : ओला-उबर में भी नहीं चलते?
दिग्विजय : ओला-उबर में भी नहीं चलते।
रिपोर्टर : ऐसे अलाउड नहीं है?
दिग्विजय : ऐसे अलाउड नहीं है। लेकिन हमारी यूनियन है। हम लोकल हैं। हम अपने बलबूते पे चलते हैं।
रिपोर्टर : मतलब आपकी दबंगई?
दिग्विजय : दबंगई समझो।

‘तहलका’ सूत्रों के मुताबिक, कोलकाता हवाई अड्डे से सिर्फ़ प्रीपेड टैक्सी और ओला-उबर (की टैक्सी) ही यात्रियों को ले जा सकती हैं। दूसरों को हवाई अड्डा परिसर में प्रवेश करने की भी अनुमति नहीं है। लेकिन कोलकाता में कई अवैध संचालक हैं, जो हवाई अड्डे से टैक्सी चला रहे हैं और पुलिस को कथित रूप से पैसे देकर यात्रियों को उठा रहे हैं। यही बात दिग्विजय ने भी हमें बतायी, जब हमने उससे एक पखवाड़े के भीतर दिल्ली से कोलकाता आने वाले अपने यात्री को पिक करने के लिए कहा।
रिपोर्टर : 15 दिन में आपको क्लाइंट (ग्राहक) दूँगा। कोलकाता के, दिल्ली से एयरपोर्ट से। लेकिन आप ये देख लेना कभी कोलकाता पुलिस आपको एयरपोर्ट पर एंट्री न दे, कोलकाता में?
दिग्विजय : नहीं, प्रशासन से लेकर सब मेरा अंडरस्टैंडिंग (साँठगाँठ) है। मैं समझ लूँगा।
रिपोर्टर : ऐसा न हो क्लाइंट यहाँ पर आये और गाड़ी न मिले?
दिग्विजय : हमारी गाड़ी, जिस गेट पर बोलिएगा, उस गेट पर लगवा देंगे। एक भी गाड़ी ऐसी नहीं है, मैं डिसीजन (निर्णय) लेता हूँ। सारा थाना-पाना हम देखता हूँ। टेंशन मत लीजिए।
रिपोर्टर : अच्छी सेटिंग है पुलिस-वुलिस में?

दिग्विजय ने अब ख़ुलासा किया कि कोलकाता हवाई अड्डे पर सभी यूनियनों के अपने-अपने निश्चित द्वार हैं, जहाँ से वे अपनी-अपनी अवैध टैक्सी चलाते हैं। पार्टी एक ही है।
रिपोर्टर : यहाँ आउटलाइन में कितना गाडिय़ाँ है, एयरपोर्ट पर; टोटल में?
दिग्विजय : हर यूनियन का फिक्स अलग-अलग है। हर गेट की यूनियन अलग-अलग है। पार्टी एक ही है।

रविदास, जिसने हमें सोनागाछी में सेक्स के लिए महिलाएँ उपलब्ध कराने का वादा किया था, उसने ख़ुलासा किया कि वह कोलकाता हवाई अड्डे से एक अवैध टैक्सी भी चला रहा है। व्यापारी बनकर हमने रविदास से पूछा कि क्या वह कोलकाता हवाई अड्डे से टैक्सी चलाने में हमारी मदद कर सकता है? इस पर रविदास ने हाँ में जवाब दिया और हमें यह अर्थशास्त्र समझाया कि कितना पैसा हम रोज़ाना अवैध टैक्सी कारोबार से कमाएँगे।
रिपोर्टर : जो गाड़ी लगेगी हमारी, उसका क्या रेट होगा?
रविदास : क्या रेट होगा बोले तो?
रिपोर्टर : आप हमें कितना दोगे?
रविदास : प्राइवेट गाड़ी 500, कमर्शियल गाड़ी 700 रुपये।
रिपोर्टर : प्राइवेट गाड़ी अगर हम लगाते हैं, तो 500 रुपये डेली (रोज़)?
रविदास : 500 रुपये डेली।
रिपोर्टर : और कमर्शियल लगाते हैं, तो?
रविदास : 700 रुपये।
रिपोर्टर : 700 रुपये डेली…। यार प्राइवेट में कम दे रहे हो आप?
रविदास : प्राइवेट में जो गाड़ी रास्ते में पुलिस पकड़े, वो हम
देखेंगे न!
अब रविदास ने ख़ुलासा किया कि कैसे वह पुलिस की मदद से कोलकाता हवाई अड्डे से अवैध टैक्सी चला रहा है।
रिपोर्टर : ऐसा न हो कोलकाता एयरपोर्ट पर हमारी गाड़ी की एंट्री न हो?
रविदास : क्यों एंट्री नहीं होगा?
रिपोर्टर : कहीं पुलिस वाले मना कर दे?
रविदास : हम लोग हैं न।
रिपोर्टर : पुलिस में सेटिंग है?
रविदास : हम लोगों का पुलिस से सेटिंग है। पार्किंग की सेटिंग है। लेकिन आपको (उनको) थोड़ी पता चलेगा आपकी गाड़ी है। हम गाड़ी चलाएगा, तो हमारी गाड़ी है।

अब रविदास ने समझाया कि वह कोलकाता हवाई अड्डे से अपनी टैक्सियों को अवैध रूप से चलाने के लिए पुलिस को कितना पैसा दे रहा है।
रिपोर्टर : अच्छा, जो पुलिस को पैसा देना होगा, वो हमें तो नहीं देना होगा?
रविदास : पुलिस को काट के एक गाड़ी पर 100 रुपये करके।
रिपोर्टर : एक ही तो पुलिस है, ट्रैफिक पुलिस?
रविदास : जो जितना गाड़ी चलता है। एक गाड़ी का 100 रुपये देता है।
रिपोर्टर : डेली?
रविदास : डेली।
रिपोर्टर : पुलिस को?
रविदास : ट्रैफिक अलग है; एयरपोर्ट का पुलिस अलग है।
रिपोर्टर : तो डेली कितना लगता है तुम्हारा?
रविदास : डेली 200 रुपये।

रविदास ने ख़ुलासा किया कि वे (सभी टैक्सी चालक) कोलकाता हवाई अड्डे से शिफ्ट में अवैध टैक्सी चला रहे हैं। साथ ही सभी ठेकेदारों ने हवाई अड्डे के गेट आपस में बाँट लिये हैं। और वे एक-दूसरे की सीमा का अतिक्रमण नहीं करते हैं।
रिपोर्टर : तो, 120 गाडिय़ों का तो बहुत हो गया डेली का? कितना होगा 120 गाडिय़ों का?
रविदास : तीन शिफ्ट चलता है। जैसे सोचिए, हम चलता है, सुबह 2:00 बजे से 3:00 बजे तक चलता है। ऐसे शिफ्टिंग चलती है। एक साथ नहीं चलता है। 120 गाड़ी में नहीं चलता है। नाईट (रात) में चलता है। दिन में चलता है। मॉर्निंग (सुबह) में चलता है।
रिपोर्टर : अच्छा, गेट का भी अलग-अलग होगा? ये गेट मेरा?
रविदास : हाँ, हम लोगों का यह गेट है।
रिपोर्टर : 1बी?
रविदास : हाँ, वो लड़का इधर नहीं आएगा, हम उधर नहीं जाएगा।

कोलकाता हवाई अड्डे के अंतरराष्ट्रीय गेट नंबर-5 पर हम हवाई अड्डे से अवैध टैक्सी चलाने वाले एक अन्य ठेकेदार मनोज सिंह से मिले। मनोज ने हमें बताया कि वह हवाई अड्डे पर अवैध रूप से अपनी टैक्सी पार्क करता है। हालाँकि जब कोई वीआईपी (अति विशिष्ट व्यक्ति) हवाई अड्डे पर आता है, जिसके लिए उसे पहले से अलर्ट किया जाता है, तो वह अपनी अवैध रूप से पार्क की गयी टैक्सी को हटाकर पार्किंग में डंप कर (लगा) देता है।
मनोज : देखिए, हमारे यहाँ कोई वीआईपी आता है न। साफ़ बोल रहे हैं; हमारे कोई वीआईपी आता है न, तो हमको बोल देता है गाड़ी हटाने को। हम लोग गाड़ी को पार्किंग में लगा देते हैं। ये पार्किंग है हम लोग ये करते हैं। देखिए, इस गाड़ी से लेकर उस गाड़ी तक हमारा है, यहाँ से लेकर उतनी दूर तक हमारी है। 40 गाड़ी हमारी है।
रिपोर्टर : आपकी यूनियन की 40 गाड़ी?
मनोज : यूनियन की 40 गाड़ी है।
रिपोर्टर : वैसे आपकी गाडिय़ाँ लगी रहती हैं?
मनोज : हाँ।
रिपोर्टर : पुलिस का कोई लफड़ा नहीं है?
मनोज : पुलिस का कोई लफड़ा नहीं है। आगर कोई वीवीआईपी (अत्यधिक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति) आएगा, तो पुलिस हमको बोल
देती है।
जब हम मनोज से बात कर रहे थे, तब हमारी मुलाक़ात कोलकाता हवाई अड्डे से टैक्सी चलाने वाले एक अन्य ठेकेदार विकास धर से हुई। विकास ने कहा कि वह हवाई अड्डे से अवैध टैक्सी चलाने के लिए हर महीने पुलिस को पैसे दे रहा है।
रिपोर्टर : कोई पुलिस-वुलिस का लफड़ा तो नहीं है, एयरपोर्ट पर?
विकास : कुछ नहीं, कुछ नहीं। हम सब लोग मंथली (रिश्वत यानी महीने का बँधा हुआ पैसा) देता है न। पार्किंग देता। मंथली देता।
रिपोर्टर : पुलिस को?
विकास : हाँ।

वो दिन गये, जब दुनिया का सबसे पुराना पेशा वेश्यावृत्ति देश के विभिन्न हिस्सों में वेश्यालयों तक सीमित था। पिछले कुछ वर्षों के दौरान तरीक़ा बदल गया है। अब यह सब बस एक कॉल पर उपलब्ध है। हवाई अड्डे पर पिक करने से लेकर होटल में अपने ठहरने की व्यवस्था करना, महिलाओं के साथ बैठक (मीटिंग) तय करने और पुलिस को दूर रखने के लिए अब अवैध टैक्सी वाले उपलब्ध हैं, जो कोलकाता हवाई अड्डे पर दलालों के रूप में दोहरी भूमिका निभा रहे हैं।
‘तहलका’ के खोजी रिपोर्टर ने कोलकाता हवाई अड्डे पर दो बातों का ख़ुलासा किया। सबसे पहला यह कि अवैध टैक्सी संचालकों के गिरोह कोलकाता के हवाई अड्डे पर नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। दूसरा, कोलकाता के एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बाहर सेक्स (लड़कियों, औरतों का जिस्म) बेचने वाले अवैध टैक्सी चालकों के गिरोह। शहर के रेड-लाइट एरिया (वेश्यावृत्ति क्षेत्र) में आने वाले घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को नाबालिगों और कुलीन यौनकर्मियों के साथ मसाज और शारीरिक सम्बन्धों के लिए उपलब्ध करने के लिए।

यौनकर्मियों की त्रासदी

खुला देह व्यापार : कोलकाता हवाई अड्डे पर बिक्री के लिए सेक्स किसी कहानी के लिए एक आकर्षक शीर्षक है। लेकिन तहलका की विशेष जाँच टीम ने कैमरे में इसे तब क़ैद किया, जब कोरोना महामारी में हुई तालाबंदी के बाद सामान्य स्थिति लौट रही थी। यहाँ तक कि नाबालिग़ लड़कियों को मसाज और शारीरिक सम्बन्धों के लिए बुलाने वाले यात्रियों को लुभाने वाले दलालों के रूप में अवैध टैक्सी संचालक दोहरी भूमिका निभाते दिखते हैं। भारत में अपने स्तर पर वेश्यावृत्ति ग़ैर-क़ानूनी नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने 19 मई को वेश्यावृत्ति को एक पेशे के रूप में मान्यता देने और इस बात पर ज़ोर देने के लिए निर्देश दिया था कि किसी भी अन्य पेशेवरों की तरह यौनकर्मी भी गरिमा और संवैधानिक अधिकारों के हक़दार हैं। हालाँकि वेश्यालय चलाने के लिए सम्पत्ति को दलाली करने के लिए या फिर किराये पर देना अवैध है। यहाँ इस मामले में दलालों ने 14 और 15 वर्ष की आयु वर्ग की नाबालिग़ लड़कियों को तब सेक्स और मसाज के लिए भेजने की पेशकश की जब व्यवसायी के रूप में आये रिपोर्टर ने सवाल किया कि क्या वे उसे मसाज के लिए ले जा भी सकते हैं? ‘सभी के लिए।’

यह सब बेख़ौफ़ चल रहा है। जब सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फ़ैसला आया, तो एशिया के सबसे बड़े रेड-लाइट ज़िलों में से एक कोलकाता के सोनागाछी की तंग गलियों में यौनकर्मियों ने चेहरों पर रंग लगाकर और मिठाई बाँटकर ख़ुशी मनायी। यौनकर्मियों के कल्याण के लिए काम करने वाले एक ग़ैर-सरकारी संगठन, दरबार महिला समन्वय समिति की क़ानूनी अधिकारी महाश्वेता मुखर्जी ने कहा था कि संगठन के 27 साल के संघर्ष ने आख़िरकार फल दिया है। लेकिन ऐसा लगता है कि बहुत कुछ नहीं बदला है। यह अनुमान है कि भारत में 15-35 आयु वर्ग में लगभग 30 लाख यौनकर्मी हैं। इनमें अधिकांश नाबालिग़ लड़कियाँ हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश सिर्फ़ पहला क़दम भर हैं। हालाँकि ग़रीबी, अभाव, भूख और असमानताओं से गम्भीर रूप से पीडि़त कई लोगों के लिए जीवित रहना सर्वोच्च प्राथमिकता है और मानवाधिकार और गरिमा उनके लिए इसके बाद की चीज़ें हैं।

ज़्यादातर महिलाएँ, जिन्होंने स्वेच्छा से या जबरन इस पेशे को चुना है; ग़रीब पृष्ठभूमि से हैं और उन्हें अपने परिवार का समर्थन करने के लिए इस पेशे में घसीटा जाता है। निश्चित ही देश के लिए यह शर्मनाक बात है। वेश्यावृत्ति कई शहरों में समान रूप से फैल गयी है। व्यस्त सड़कों और बाज़ारों में दिन से शाम तक देह व्यापार के लिए पिक-अप प्वॉइंट बन जाते हैं। और अब तो ऑनलाइन देह व्यापार के मामले भी सामने आ रहे हैं, जिन्हें सुलझाना पुलिस के लिए चुनौती बन गया है। पुलिसकर्मी भी यौनकर्मियों की त्रासदी को समझने की जगह उन्हें एक अपराधी के रूप में अधिक देखते हैं। यह हाशिये पर जाने का एक दुष्चक्र है, क्योंकि महिला वेश्याओं को नीची दृष्टि से देखा जाता है; जबकि वेश्यालयों में पैदा होने वाले बच्चों को भी स्कूलों में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के मुताबिक, पुलिस को यौनकर्मियों की शिकायतों को गम्भीरता से लेना है; लेकिन पुलिस पर अक्सर लापरवाही के आरोप लगते रहते हैं। पुनर्वास, समान अधिकार और सुरक्षा सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के मुख्य विषय प्रतीत होते थे। लेकिन यह खोजी रिपोर्ट एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि क्या वे सम्मान के साथ ज़िन्दगी जीने के अधिकारी नहीं?

जॉर्जिया की तर्ज पर भ्रष्टाचार ख़त्म करे सरकार

हिन्दुस्तान ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में भ्रष्टाचार एक ऐसी बीमारी है, जो 1,000 लोगों में कोई एक करता है; लेकिन इसके शिकार बाक़ी के 9,99 लोग होते हैं। सवाल यह है कि क्या यह भ्रष्टाचार पूरी तरह 100 फ़ीसदी रोका जा सकता है? इसका जवाब सीधा-सा है- बिलकुल लगाया जा सकता है; बशर्ते ऐसा करने की नीयत होनी चाहिए। अफ़सोस की बात यह है कि आजकल हिन्दुस्तान की हर राजनीतिक पार्टियाँ इन दोनों ही बुराइयों को ख़त्म करने के दावे और वादे तो करती हैं; लेकिन फिर भी भ्रष्टाचार और अपराध दोनों में रात-दिन इज़ाफ़ा होता जा रहा है।

देश में जब भी नयी सरकार चुनी जाती है, भ्रष्टाचार व घोटालों की लिस्ट और भी लम्बी हो जाती है। इसका सीधा-सीधा असर उस मजबूर जनता पर पड़ता है, जो कड़ी मेहनत करके गुज़ारे के लिए चार पैसे कमाना चाहती है। सदियों से पनपे इस भ्रष्टाचार और अपराध के ख़िलाफ़ बाक़ी 9,99 लोगों में से 10 लोग भी मुश्किल से बोलते हैं; जबकि 989 में 400 लोग अपराधियों और भ्रष्टाचारियों का साथ देते हैं और बाक़ी के 589 लोग ख़ामोश रहते हैं। यही वजह है कि भ्रष्टाचारी और अपराधी बेख़ौफ़ होकर दोनों ही अपराध करते हैं और उनकी ताक़त दिन-रात बढ़ती चली जा रही है। आज हाल यह है कि अगर सही से जाँच की जाए, तो हर विभाग में भ्रष्टाचार के अनेक उदाहरण मिल जाएँगे। यही भ्रष्टाचारी अपराधियों का संरक्षण करते हैं।

सन् 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लोगों को उम्मीद थी कि वह हिन्दुस्तान में जड़ जमा चुके भ्रष्टाचार और अपराध नाम की महामारियों को जड़ से उखाड़ फेकेंगे। बहुत-से लोग आज भी ऐसा ही मानते हैं। लेकिन मेरा मानना यह है कि भ्रष्टाचार तब तक ख़त्म नहीं हो सकता, जब तक कि राजनीति भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं होगी। वैसे तो एक ही ईमानदार नेता अगर ताक़तवर हो, तो इस गंदगी को चंद दिनों में साफ़ कर सकता है; और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह क़तई असम्भव नहीं है। लेकिन उन्हें जॉर्जिया के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल साकाशविली की तरह कड़े क़दम उठाते हुए भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जॉर्जिया के फार्मूले पर काम करना होगा।

दरअसल सन् 2003 तक जॉर्जिया में इस क़दर भ्रष्टाचार था कि वहाँ का हर आम नागरिक इससे परेशान था। हाल यह था कि वहाँ के सरकारी अधिकारी और कर्मचारी खुलेआम लोगों से रिश्वत वसूला करते थे। पुलिस से लेकर हर विभाग तक हर अधिकारी, कर्मचारी रिश्वत लिये बिना काम नहीं करता था। सन् 2003 तक जॉर्जिया के लोगों को रिश्वत देने की आदत-सी बन चुकी थी और उनके दिमा$ग से यह बात तक़रीबन निकल चुकी थी कि भ्रष्टाचार से उन्हें कभी मुक्ति मिलेगी। इसी बीच वहाँ के पूर्व क़ानून मंत्री मिखाइल साकाशविली निकलकर सामने आये, जो काफ़ी लम्बे समय से भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आन्दोलन कर रहे थे। लोगों ने उन्हें चुना और एक मौक़ा उन्हें उनका वादा पूरा करने का दिया, जिसमें पहला वादा भ्रष्टाचार को ख़त्म करने का था। यह मौक़ा मिलने पर मिखाइल चाहते, तो ख़ुद भी भ्रष्टाचारियों से मिलकर अरबों-ख़रबों रुपये इकट्ठे कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा न करके अपनी ईमानदारी को बरक़रार रखा और जॉर्जिया में फैले भ्रष्टाचार को ख़त्म करके ही दम लिया।

वैसे तो मिखाइल साकाशविली तब चर्चा में आये, जब एक बार उन्होंने संसद की मंत्रिमंडल की बैठक में भ्रष्टाचार की तस्वीरें लहराते हुए सरकार पर अधिकारियों के ज़रिये भ्रष्टाचार कराने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि भ्रष्ट अधिकारी मामूली-सी तनख़्वाह पाने के बावजूद चंद दिनों में आलीशान इमारतें ख़रीद लेते हैं, क्योंकि वे जनता से खुली वसूली करते हैं। तब जॉर्जिया के लोगों को यह नहीं मालूम था कि मिखाइल उनके लिए मसीहा बनकर उभरेंगे। लेकिन इतना ज़रूर था कि उनके समर्थक लगातार बढ़ते जा रहे थे। नवंबर, 2003 में वह अपने लाखों समर्थकों के साथ संसद में घुस गये, इसका असर यह हुआ कि जॉर्जिया के तत्कालीन राष्ट्रपति को वहाँ से भागना पड़ा। आख़िर दो महीने बाद नये सिरे से चुनाव हुए और मिखाइल साकाशविली की जीत हुई। भ्रष्टाचार से जनता कितनी तंग थी, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि चुनाव में उनके गठबंधन को 96 फ़ीसदी वोट हासिल हुए थे। यह कोई छोटी जीत नहीं, बल्कि इतिहास की एक सबसे बड़ी लोकतांत्रिक जीत थी, जो आज तक दुनिया के किसी भी नेता को हासिल नहीं हो सकी है।

जीत हासिल करके सत्ता में आते ही सबसे पहले मिखाइल ने एक छोटी-सी टीम बनाकर जॉर्जिया में सुधार के लिए सबसे पहले ट्रैफिक पुलिस में भ्रष्टाचार रोकने से शुरुआत की। उन्होंने वहाँ की पुरानी पुलिस को पूरी तरह बर्ख़ास्त करके नये सिरे से भर्ती की और तनख़्वाह भी बढ़ायी। साथ ही यह क़ानून बनाया कि अगर कोई ट्रैफिक पुलिसकर्मी रिश्वत लेता है, तो उसकी नौकरी तो जाएगी ही, उसे उम्र क़ैद की सज़ा भी सुनायी जाएगी। बस फिर क्या था, सुधार होने लगा। इसके बाद हर सरकारी विभाग में इसी तरह पुराने लोगों को हटाकर नयी भर्तियाँ की गयीं। इससे हुआ यह कि जॉर्जिया का हर आम आदमी इसी में लग गया कि अब उसे किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को रिश्वत नहीं देनी है, और अगर कोई उससे रिश्वत माँगता है या किसी से रिश्वत लेते दिखता है, तो उसकी शिकायत उन नंबरों पर कर देनी है, जो भ्रष्टाचार निरोधक नंबर हैं। आज जॉर्जिया में भ्रष्टाचार पर क़रीब-क़रीब 80 से 90 फ़ीसदी रोक लग चुकी है। यह तब है, जब मिखाइल के बाद के लोग वहाँ शासन कर रहे हैं। आज वहाँ की आम जनता काफ़ी सुखी है और समृद्ध हो रही है।

बहरहाल जॉर्जिया का उदाहरण देते हुए यह सब लिखने का मेरा मतलब यह है कि यह सुधार तभी सम्भव हो सका, जब वहाँ के एक राजनेता ने इसके लिए सही मायने में एक ईमानदार पहल की और लोगों का भरोसा जीता। आज हिन्दुस्तान में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में भरपूर शक्तियाँ हैं और देश की जनता को उनसे आशा है कि वह भ्रष्टाचार और अपराध मुक्त हिन्दुस्तान का नवनिर्माण करेंगे, जो कि हिन्दुस्तान को विश्व गुरु बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण क़दम साबित होगा। आज हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं और केंद्र की मोदी सरकार ने घर-घर तिरंगा अभियान चलाया हुआ है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि इस अभियान से लोगों में देश के प्रति समर्पण की भावना पैदा होगी और इससे एक माहौल बनेगा, जो राष्ट्र निर्माण के नज़रिये से एक बेहतर क़दम माना जा सकता है। बशर्ते इसमें किसी तरह के आरोप-प्रत्यारोप और सियासी हमले की गुंजाइश न रहे।

आज हिन्दुस्तान का हर आदमी यही चाहता है कि उसका रोज़ी-रोज़गार चलता रहे, वह जो भी कमाये उससे उसका घर आसानी से चलता रहे और उसे किसी तरह की दिक्क़त न हो। ज़ाहिर है कि जब देश में भ्रष्टाचार नहीं होगा, तो न तो लोगों पर कर (टैक्स) बढ़ाने की ज़रूरत महसूस होगी, न सरकारें घाटे में जाएँगी और न ही देश पर विदेशी क़र्ज़ बढ़ेगा। लेकिन जब देश पर क़र्ज़ नहीं बढ़ेगा, तो डॉलर के मुक़ाबले में रुपया भी कमज़ोर नहीं होगा। मेरे ख़याल से इस नीति पर अगर काम हुआ, तो हिन्दुस्तान की तरक्क़ी इतनी तेज़ी से होगी कि दुनिया भर में एक मिसाल क़ायम हो जाएगी। बाक़ी और बेहतर सुझाव सरकार और अर्थशास्त्रियों के पास होंगे। उम्मीद है कि केंद्र की मोदी सरकार इस दिशा में काम कर भी रही होगी। अगर नहीं, तो उसे ऐसा करना चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

हमारे अंतरराष्ट्रीय हीरे

बर्मिंघम में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने कुछ नये खेलों में भी जीते पदक

इंग्लैंड के बर्मिंघम में इस बार के राष्ट्रमंडल खेल भारत के लिए कुछ नये खेलों की ज़मीन तलाशने वाले साबित हुए हैं। मसलन ट्रिप्पल जम्प। इस खेल में एक वक़्त ऐसा लग रहा था कि पोडियम पर तीनों भारतीय होंगे। ऐसा होता, तो यह अनोखी घटना होती। लेकिन भारत के प्रवीण वह चौथे स्थान पर रहे और कांस्य उनके हाथ नहीं आ पाया। कुछ अन्य खेलों में भी भारत ने पहली बार पदक (मेडल) जीते। एक और बात, पुरुष खिलाडिय़ों को चिन्ता में डालने वाली। महिला खिलाड़ी पदक जीतने में पुरुष साथियों को कड़ी टक्कर दे रही हैं। इस बार दो दर्ज़न पदक महिला खिलाडिय़ों ने जीते, जिनमें सात स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) हैं।

इस बार शूटिंग राष्ट्रमंडल खेलों में शामिल नहीं थी। होती, तो भारत के पदकों का ग्राफ कहीं ऊँचा होता। लेकिन कोई शक नहीं कि भारतीय खिलाडिय़ों ने दमदार खेल दिखाया। नये क्षेत्र (खेल) भी खोजे और पहले से मज़बूत क्षेत्रों में और दमदार प्रदर्शन किया।

अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत के खिलाड़ी अब नये तेवर के साथ मैदान में उतरते हैं। वह प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी की आँखों में आँखें डालकर बात करते हैं और मनोवैज्ञानिक रूप से ख़ुद को एक विजेता के दावेदार के रूप में पेश करते हैं। इस बार के राष्ट्रमंडल खेलों में यह साफ़ दिखा और इसके नतीजे भी सुखद रहे हैं।
उदाहरण के लिए मुक्केबाज़ निकहत ज़रीन की फाइनल में अपनी प्रतिद्वंद्वी उत्तरी आयरलैंड की कार्ले मैकनाउल के ख़िलाफ़ बॉडी लैंग्वेज को गौर से देखें। कार्ले को 5-0 से हराने के बाद वह राष्ट्रमंडल खेलों में पहली बार मेडल जीतीं। लेकिन जीत के बाद उनका चेहरा देखने से साफ़ लगता था कि उन्हें स्वर्ण पदक जीतने का पक्का भरोसा था। हाल में निकहत ने विश्व मुक्केबाज़ी में भी टाईटल जीता था। भारतीय खिलाडिय़ों में आत्मविश्वास का यह नया स्तर है, जो उन्हें अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में और ऊँचे पायदान पर ले जा रहा है।

पदकों की संख्या से देखें, तो भले यह सन् 2010 में जीते 101 पदकों से काफ़ी कम हैं। लेकिन कई खेलों में भारत ने भविष्य के लिए बड़ी सम्भावनाओं का रास्ता खोला है। हॉकी में महिलाओं ने कांस्य पदक (ब्रांज मेडल) जीता और क्रिकेट में महिलाओं ने ही रजत पदक (सिल्वर मेडल)। लान बॉल गेम में स्वर्ण पदक, जबकि मिनिमम वेट कैटेगिरी में भी स्वर्ण। ट्रिप्पल जम्प में स्वर्ण और रजत दोनों भारत के हिस्से आये। पैरालम्पिक महिला टेबल टेनिस में भाविना हसमुख भाई ने भी स्वर्ण पदक जीतकर बता दिया कि शारीरिक बाध्यता हौसले से ज़्यादा ताक़तवर नहीं होती।

अविनाश साबले ने तो 3,000 मीटर स्टीपलचेज में भारत को राष्ट्रमंडल का पहला पदक दिलाया है। उनका रजत जीतना बताता है कि साबले लम्बी दूरी की दौड़ में भविष्य की उम्मीद हैं। वह महज़ 0.05 सेकेंड से स्वर्ण जीतने से चूक गये। लेकिन जिस तरी$के से उन्होंने फिनिशिंग की, उससे ज़ाहिर होता है कि वह कितनी योजना बनाकर ट्रैक पर उतरे थे। प्रियंका गोस्वामी ने 10,000 मीटर पैदल चाल में कांस्य जीतकर उम्मीद जगायी है।

अनु रानी भाला फेंक में पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनीं, जिन्होंने कांस्य जीता। ट्रिपल जम्प में अल्डास पॉल और अब्दुल्ला अबुबकर ने जबरदस्त कमाल किया। स्वर्ण और रजत पदक जीतकर। राष्ट्रमंडल खेलों में पॉल ट्रैक इवेंट में स्वर्ण जीतने वाले सिर्फ़ छठे भारतीय हैं। सबसे पहला स्वर्ण सन् 1958 में महान् धावक मिल्खा सिंह ने जीता था।

लेकिन इस प्रदर्शन के बाद भारतीय खिलाड़ी सन्तुष्ट होकर नहीं बैठ सकते। विश्व या ओलम्पिक मुक़ाबलों में प्रतिस्पर्धा कहीं ज़्यादा कठिन होती है। वहाँ जीत का पैमाना भी ऊँचा रहता है। सबसे बड़ी बात यह कि ओलम्पिक जैसे खेलों में अमेरिका, चीन, जर्मनी, रूस, फ्रांस और इटली जैसे मुश्किल प्रतिद्वंद्वी होते हैं। लिहाज़ा भारतीय खिलाडिय़ों को वर्तमान तेवर बनाये रखते हुए और बेहतर प्रदर्शन के साथ आगे जाना होगा।

इन राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय खिलाडिय़ों ने सम्भावनाएँ जगायी हैं, जो विश्व या ओलम्पिक स्पर्धाओं के उन खेलों में भारत के पदकों का सूखा खत्म कर सकती हैं, जिनमें पदक का अभी तक सिर्फ़ इंतज़ार है। बहुत-से ऐसे खेल हैं, जिनमें भारत पदक पाने के लिए दशकों से तरसता रहा है। कई खेल तो ऐसे हैं, जहाँ भारत के खिलाड़ी विश्व रिकॉड्र्स के आसपास भी नहीं हैं। लेकिन इस बार के राष्ट्रमंडल खेलों को देखें, तो उम्मीद की किरण नज़र आती है।

पुरुष हॉकी में भारत ने रजत पदक जीता। हॉकी खेल भारत के खेलों का कभी मुकुट हुआ करता था; लेकिन हाल के तीन दशकों में भारत विश्व पायदान में हॉकी में नीचे ही गया है। अब राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय टीम ने रजत जीतकर भविष्य के लिए उम्मीद जतायी है। हालाँकि फाइनल में भारत की ऑस्ट्रेलिया के हाथों 0-7 की हार निराशाजनक कही जाएगी। मनप्रीत सिंह के नेतृत्व में भारत ने फाइनल तक बेहतर खेल दिखाया था। इंग्लैंड के ख़िलाफ़ ज़रूर उसने 4-1 की अच्छी-ख़ासी बढ़त के बावजूद ड्रॉ खेला। पेनल्टी कार्नर में भारत को सुधार की और ज़रूरत है।

महिलाओं का कमाल

पी.वी. सिंधु पिछली बार स्वर्ण नहीं जीत पायी थीं। इस बार उन्होंने भारत की झोली में स्वर्ण पदक डालकर ख़ुद के महान् खिलाड़ी होने का परिचय दिया। भले उनकी प्रतिद्वंद्वी कनाडा की मिशेल ली की वल्र्ड रैंकिंग उनसे कमज़ोर है; लेकिन किसी भी अंतरराष्ट्रीय फाइनल में मुक़ाबला कभी आसान नहीं होता। ली की विश्व रैंकिंग 13वीं है; जबकि सिंधु की 7वीं। निश्चित ही सिंधु आज भारत की स्टार शटलर हैं। ख़ासकर उनके प्रदर्शन का महत्त्व तब और बढ़ जाता है, जब हैदराबाद की उनकी सहयोगी साइना नेहवाल का खेल ढलान की तरफ़ जाता दिखता है।

युवा श्रीजा अकुला ने टेबल टेनिस में बड़ी उम्मीद जगायी है। अचंता शरत कमल के साथ मिश्रित युगल में श्रीजा अकुला ने टीटी का स्वर्ण पदक जीता। श्रीजा कम उम्र की हैं और उनके पास अपने खेल को ऊँचाई तक ले जाने का बड़ा अवसर है। भारत ने इस बार महिला लॉन बॉल में पहली बार पदक जीता और वह भी स्वर्ण। लवली चौबे, पिंकी, नयनमोनी सैकिया और रूपा रानी टिर्की की चौकड़ी ने निश्चित ही कमाल किया।

कॉमनवेल्थ खेलों में पहली बार महिला क्रिकेट को शामिल किया गया था और भारत ने रजत पदक जीता। भविष्य में स्वर्ण जीतने के लिए उसे ऑस्ट्रेलिया से पार पाना होगा। लेकिन भारतीय टीम शानदार खेली। अन्नू रानी को भाला फेंक में कांस्य पदक मिला और वे भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम दिखती हैं।

वैसे भारत के लिए मीराबाई चानू ने 2022 के स्वर्ण जीतने का खाता खोला। उनके खेल में लगातार सुधार आया है और उनसे ओलंपिक और विश्व स्पर्धा में स्वर्ण पदक की उम्मीद है। वह वेटलिफ्टिंग की स्टार हैं। इन खिलाडिय़ों के अलावा प्रमुख महिला विजेताओं में बिंदियारानी देवी ने इसी खेल में रजत पदक जीता। जुडो में सुशीला देवी ने रजत, हरजिंदर कौर ने वेटलिफ्टिंग में कांस्य, तूलिका मान ने जुडो में रजत, अंशु मलिक ने 57 किग्रा कुश्ती में रजत, साक्षी मलिक ने 62 किग्रा फ्रीस्टाइल में स्वर्ण, प्रियंका गोस्वामी 10,000 मीटर रेस वॉक में रजत, जैस्मीन लम्बोरिया ने 60 किग्रा लाइटवेट में रजत, पूजा गहलोत ने 50 किग्रा फ्रीस्टाइल में कांस्य, नीतू घंगास ने 48 किग्रा मिनिमम वेट में स्वर्ण, निकहत ज़रीन ने 50 किग्रा लाइट फ्लाईवेट में स्वर्ण के अलावा पूजा सिहाग (76 किग्रा फ्रीस्टाइल, कांस्य), भाविना पटेल (सिंगल्स क्लासेस 3-5 पैरा टेबल टेनिस स्वर्ण), सोनलबेन पटेल सिंगल्स क्लासेस पैरा टीटी 3-5 (रजत) और त्रिशा जॉली-पुलेला गायत्री गोपीचंद (डबल्स बैडमिंटन रजत) जीते हैं।

भारत के सामने अब अगली चुनौती पेरिस ओलम्पिक हैं। ये खेल 26 जुलाई, 2024 को होंगे। संयोग की बात है कि 100 साल बाद 2024 को पेरिस आधिकारिक तौर पर तीसरी बार ओलंपिक खेलों की मेज़बानी करेगा। वैसे फ्रांस ओलंपिक गेम्स का छठी बार आयोजन करेगा। उसने सन् 1924 में पहली बार ग्रीष्मकालीन खेलों की पहली बार मेज़बानी की थी। भारत के राष्ट्रमंडल खेलों में प्रदर्शन को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि वह खेलों के इस महाकुम्भ में सबसे बेहतर प्रदर्शन करेगा।

स्वर्णिम यादें
आज जब हम राष्ट्रमंडल खेलों की बात कर रहे हैं, तो बता दें भारत के लिए किसी भी खेल में सबसे पहला पदक राशिद अनवर ने जीता था। यह सन् 1934 की बात है, जब राष्ट्रमंडल खेलों (कॉमनवेल्थ गेम्स) का नाम ब्रिटिश एम्पायर गेम्स था। रशीद ने 74 किलोग्राम भार वर्ग में फ्री-स्टाइल रेसलिंग में कांस्य पदक भारत की झोली में डाला था। कल्पना की जा सकती है, तब देश के खेल प्रेमियों को कितनी ख़ुशी हुई होगी! जहाँ तक भारत के पहले स्वर्ण पदक की बात है, इसका सौभाग्य दिग्गज मिल्खा सिंह को मिला था। सिंह ने सन् 1958 में कार्डिफ राष्ट्रमंडल खेलों में स्प्रिंट (440 मीटर, 46.6 सेकण्ड) में स्वर्ण पदक जीता था।

किसके हिस्से, कौन-सा पदक?
स्वर्ण पदक विजेता : मीराबाई चानू, जेरेमी लालरिनुंगा, अंचिता शेउली, महिला लॉन बॉल टीम, टीटी पुरुष टीम, सुधीर, बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक, दीपक पूनिया, रवि दहिया, विनेश, नवीन, भाविना, नीतू, अमित पंघाल, एल्डहॉस पॉल, निकहत ज़रीन, शरत-श्रीजा, पीवी सिंधु, लक्ष्य सेन, सात्विक-चिराग, शरत।
रजत पदक विजेता : संकेत सरगर, बिंदियारानी देवी, सुशीला देवी, विकास ठाकुर, भारतीय बैडमिंटन टीम, तूलिका मान, मुरली श्रीशंकर, अंशु मलिक, प्रियंका, अविनाश साबले, पुरुष लॉन बॉल टीम, अब्दुल्ला अबुबकर, शरथ-साथियान, महिला क्रिकेट टीम, सागर, पुरुष हॉकी टीम।
कांस्य पदक विजेता : गुरुराजा, विजय कुमार यादव, हरजिंदर कौर, लवप्रीत सिंह, सौरव घोषाल, गुरदीप सिंह, तेजस्विन शंकर, दिव्या काकरन, मोहित ग्रेवाल, जैस्मिन, पूजा गहलोत, पूजा सिहाग, मोहम्मद हुसामुद्दीन, दीपक नेहरा, रोहित टोकस, सोनलबेन, महिला हॉकी टीम, संदीप कुमार, अन्नू रानी, सौरव-दीपिका, किदांबी श्रीकांत, त्रिषा-गायत्री, साथियान।

भारत के पाँच श्रेष्ठ प्रदर्शन
सन् 2002 मैनचेस्टर कुल 69 पदक (चौथा स्थान) 30 स्वर्ण।
सन् 2010 दिल्ली कुल 101 पदक (दूसरा स्थान) 38 स्वर्ण।
सन् 2014 ग्लासगो कुल 64 पदक (पाँचवाँ स्थान) 15 स्वर्ण।
सन् 2018 गोल्ड कोस्ट (घाना) कुल 66 पदक (तीसरा स्थान) 26 स्वर्ण।
सन् 2022 बर्मिंघम कुल 61 पदक (चौथा स्थान) 22 स्वर्ण।

भाजपा को सबक़ है नीतीश का छिटकना

देश की राजनीति पर असर डाल सकता है जद(यू) का एनडीए से अलग होना

बिहार में सत्ता परिवर्तन हो गया। नीतीश कुमार एनडीए छोड़कर सरकार बनाने के लिए राजद-कांग्रेस के साथ चले गये। हाल के वर्षों में नीतीश और उनकी पार्टी जद(यू) भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को छोडऩी वाली देश की दूसरी बड़ी पार्टी हैं। उनसे पहले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना सन् 2019 में यूएपीए का हिस्सा हो गयी थी। नीतीश का एनडीए से बाहर जाना भाजपा के लिए सबक़ है कि अपने ही सहयोगियों को तोडऩे की जगह उसे उनसे बेहतर तरीक़े से पेश आना चाहिए। नीतीश और उद्धव दोनों ने अपने साथ भाजपा के ख़राब बर्ताव की शिकायत की थी। बिहार जैसे बड़े राज्य में नीतीश का एनडीए से बाहर जाना 2024 के मिशन में जुटी भाजपा के लिए बड़ा झटका है।

नीतीश बिहार में फिर मुख्यमंत्री हो गये हैं; लेकिन इस बार राजद-कांग्रेस और कुछ अन्य दलों के साथ। ऐसा पहले भी हुआ था; लेकिन 2018 में वे भाजपा के सहयोगी हो गये थे। इसके बावजूद वैचारिक स्तर पर नीतीश कुमार और भाजपा के बीच दुराब जारी रहा था। भाजपा के साथ होते हुए भी नीतीश ने केंद्र सरकार की सीएए, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को ख़त्म करना जैसे फ़ैसलों का समर्थन नहीं किया।

देश में अल्पसंख्यकों के साथ भाजपा के रुख़ के भी नीतीश विरोधी रहे। ऊपर से उनकी पार्टी के भीतर यह ख़ौफ़ बना रहा कि भाजपा मगरमच्छ की तरह उनकी पार्टी को निगल जाएगी। ऐसे माहौल में नीतीश का भाजपा से बाहर जाना कोई बड़ी घटना नहीं है। बड़ी बात यह है कि शक्तिशाली भाजपा से बिना ख़ौफ़ खाये नीतीश ने उससे बाहर जाने की हिम्मत दिखायी, जो उन अन्य दलों के रास्ता खोल सकती है, जो भाजपा के साथ रहते हुए भी उससे डर कर रहते हैं।

बिहार के इस सारे राजनीतिक घटनाक्रम से तेजस्वी यादव और उनकी राजद ताक़तवर होकर उभरे हैं। तेजस्वी नीतीश की सरकार में उप मुख्यमंत्री बने हैं; लेकिन आने वाले समय में वह निश्चित ही मुख्यमंत्री पद के गम्भीर उम्मीदवार बन गये हैं। तेजस्वी युवा हैं और उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) बिहार में सबसे बड़ा राजनीतिक दल है।

इस घटनाक्रम से कांग्रेस को भी लाभ हुआ, जो अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। उसे देश में एक बड़ा राजनीतिक सहयोगी मिल गया है। कहा जाता है कि एनडीए छोडऩे से पहले नीतीश ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भरोसे में लिया था। नीतीश ने फोन करके अपने फ़ैसले की जानकारी उन्हें देते हुए उनसे ख़ुद के लिए सहयोग माँगा था। सोनिया ने सहयोग का वादा किया और उसे निभाया। बिहार जैसे राज्य के ज़रिये कांग्रेस को भाजपा का एक बड़ा विरोधी मिल गया है।

बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं, जिनमें से सन् 2019 के चुनाव में भाजपा ने नीतीश के सहयोग से 20 सीटें जीती थीं। भले ख़ुद नीतीश दो सीटों पर सिमट गये थे। तब भी जद(यू) के कुछ बड़े नेताओं ने आरोप लगाया था कि भाजपा ने चुनाव में जद(यू) के उम्मीदवारों को अपना वोट ट्रांसफर नहीं किया, ताकि उसे कमज़ोर किया जा सके। ऐसा ही आरोप सन् 2019 के महाराष्ट्र के विधानसभा के चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने भी लगाया था, जिसने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।

इस तरह सहयोगियों का भाजपा से छिटकना 2024 के उसके ‘मिशन रिपीट’ के लिए बड़ा झटका है। यदि कुछ और सहयोगी अब उससे अलग होने की हिम्मत दिखाते हैं, तो भाजपा को लेने के देने भी पड़ सकते हैं। बिहार की ही बात करें, तो वहाँ भाजपा अब अकेली पड़ गयी है। उसका कोई मज़बूत सहयोगी नहीं रहा और अपने बूते उसे विधानसभा या लोकसभा के चुनाव में बड़ी जीत हासिल करना सम्भव नहीं रहेगा। जातियों पर आधारित राजनीति वाले बिहार में भाजपा अकेले कहीं नहीं ठहरती।

नीतीश आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। नीतीश सन् 1974 के बिहार छात्र आन्दोलन के दौर से सूबे की राजनीति में सक्रिय हैं और उन्होंने देश में सबसे ज़्यादा बार मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड बना दिया है। सन् 1990 में जब लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने थे, तो इसमें नीतीश की ही बड़ी भूमिका थी। यह अलग बात है कि बाद में लालू प्रसाद के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गये। तब नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ समता पार्टी बनायी और सन् 1996 के लोकसभा चुनाव से पहले ही भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा बन गये।

उस समय संघर्ष कर रही भाजपा जब गठबंधन के साथ सत्ता में आयी, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें उपकृत करते हुए रेल मंत्री का ओहदा दिया। बाद में सन् 2000 में नीतीश पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण उनकी सत्ता सात दिन तक ही चली। उसके बाद कई उतार-चढ़ाव देखने वाले नीतीश बिहार की राजनीति के ‘किंग’ बने रहे।

आज तक बिहार में उनका सिक्का चल रहा है। यही कारण है कि अगस्त के पहले पखवाड़े उन्होंने जब ताक़तवर भाजपा के ख़िलाफ़ विद्रोह किया, तो भी उनके तमाम घटक उनके साथ मज़बूती से बने रहे। बिहार में 165 विधायकों के समर्थन के साथ नीतीश निश्चित की मज़बूत पिच पर खड़े हैं। बशर्ते भाजपा भविष्य में कोई ख़ुराफ़ात न करे।

पीएम उम्मीदवारी का पेच
भाजपा इन ख़बरों को हवा दे रही है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव में नीतीश प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। ख़ुद नीतीश से उनके शपथ ग्रहण के बाद पत्रकारों ने इस बाबत सवाल किया, तो नीतीश का जवाब ‘न’ था। साल 2024 में देश में क्या राजनीतिक स्थिति बनेगी? अभी नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तरह नीतीश ने सोनिया गाँधी को फोन किया और उनके सम्मान का पूरा ख़याल रखा, उससे लगता नहीं है कि वह विवाद करके प्रधानमंत्री पद के दावेदार होना चाहेंगे।

नीतीश कुमार ने नये गठबंधन के बाद खुले रूप से तो नहीं; लेकिन माना जाता है कि सोनिया गाँधी से बातचीत में यह कहा था कि कांग्रेस को विपक्ष का नेतृत्व करने में सबसे सक्षम मानते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि पलटी मारने के लिए बदनाम नीतीश का आने वाले दो साल में क्या रुख़ रहता है?

तेजस्वी हुए मज़बूत
वर्तमान परिवर्तन का यदि किसी को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ है, वह राजद और उसके नेता तेजस्वी यादव हैं। उनके पास जातिगत समीकरण से लेकर ज़मीन पर वोट बैंक का ठोस आधार है। यह इस तथ्य से ही ज़ाहिर हो जाता है कि पिछले विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के जलवे के होते हुए भी राजद सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी थी।

अब जिस तरह तेजस्वी यादव ने सबसे ज़्यादा सीटें होते हुए भी नीतीश को सम्मान देते हुए मुख्यमंत्री बनाया है, उससे आम जनता में भी अच्छा सन्देश गया है। लालू यादव के समय राजद की छवि थी, तेजस्वी ने उससे भी बाहर निकलने की कोशिश। यदि वे राजद को एक बेहतर लोकतांत्रिक संस्था में बदलने में सफल रहे निश्चित ही बिहार में भविष्य उनका है।

नीतीश का सफ़रनामा
 1985 में पहली बार एमएलए बने
 1989 में पहली बार सांसद बने
 1996,1998, 1999 में फिर सांसद बने
 1998 में केंद्र में पहली बार मंत्री (रेल) बने
 1999 में केंद्रीय कृषि मंत्री
 2000 में बिहार के मुख्यमंत्री
 2005, 2010, 2013, 2015, 2017, 2020 में
  मुख्यमंत्री बन और अब बीच में ही 2022 में भाजपा से नाता तोड़कर फिर मुख्यमंत्री बने हैं।

सामाजिक ध्रुवीकरण का कुत्सित प्रयास

इतिहास अपने वास्तविक स्वरूप में गतिशील होता है। उसके गर्भ में कुछ ऐसे बीज तत्त्व होते हैं, जो वर्तमान एवं भविष्य की गतिशीलता को प्रेरित करते हैं। इतिहास की इस गतिशीलता की पृष्ठभूमि में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। ब्रिटिश इतिहासकार हर्बर्ट बटरफ़ील्ड ने इतिहास को ‘एक निरंतर अग्रसारित होने वाली शक्ति’ के रूप में परिभाषित किया हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से भारत में इस शक्ति का उपयोग नकारात्मकता के प्रसार में किया जा रहा है।

देश में राजनीतिक विमर्श का स्वरूप विघटनकारी हो चुका है। पिछले कई वर्षों से लगातार व्यक्तित्व के समानांतर व्यक्तित्व को खड़ा करके विवाद पैदा करने के कुत्सित प्रयास किये जा रहे हैं। इसके लिए सन्दर्भ रहित घटनाओं, आधे-अधूरे तथ्यों एवं परिस्थिति विशेष में कहे गये वक्तव्यों का प्रयोग किया जा रहा है। इसी के अनुरूप गाँधी-अंबेडकर, पटेल-नेताजी सुभाष चंद्र बोस-नेहरू, गाँधी-सावरकर जैसे चलायमान विवादों की इसी फ़ेहरिस्त में नया नाम शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का है।

ऐसे बेतुके विमर्श का नया क्षेत्र पंजाब बना है। पंजाब में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को एक-दूसरे पर तरजीह देने का विवाद तब शुरू हुआ, जब आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री पद का कार्यभार ग्रहण करते हुए भगवंत मान के पीछे मुख्यमंत्री कक्ष से गाँधी जी की तस्वीर ग़ायब थी। कांग्रेस के नेताओं ने आम आदमी पार्टी पर गाँधी जी की तस्वीर जानबूझकर हटाने का आरोप लगाया। हालाँकि दीवार पर डॉ. अंबेडकर और शहीद भगत सिंह की तस्वीरें लगी हुई दिखायी दे रही थीं।

उधर भाजपा और अकाली दल के नेताओं ने आम आदमी पार्टी पर महाराजा रणजीत सिंह की तस्वीर हटाये जाने का आरोप लगाकर हंगामा किया। प्रथम दृष्टया यह विवाद पैदा करने का सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है। ऐसा नहीं था कि मुख्यमंत्री कार्यालय की दीवार इतनी सीमित थी कि भगत सिंह और डॉ. अंबेडकर की तस्वीरों के साथ गाँधी जी एवं महाराजा रणजीत सिंह की तस्वीरें न लगायी जा सकें। वास्तव में यह सब प्रतीकों के माध्यम से वैचारिक युद्ध का प्रयास है, जिनमें व्यक्तित्वों का प्रयोग हथियार एवं सुरक्षा आवरण दोनों ही रूपों में किया जा रहा है।

इसी कड़ी में कुछ समय से अचानक ही कुछ अराजक तत्त्वों ने शहीद भगत सिंह को अपमानित करना शुरू कर दिया है। अकाली दल (अमृतसर) के प्रमुख एवं संगरूर (पंजाब) से सांसद सिमरनजीत सिंह मान ने संगरूर सीट से अपनी जीत को भिंडरावाले को समर्पित किया। इसके बाद उन्होंने शहीद भगत सिंह पर विवादित टिप्पणी करते हुए उन्हें ‘आतंकी’ कहा। अपनी टिप्पणी का आधार सिमरनजीत सिंह ने भगत सिंह द्वारा एक अंग्रेज अधिकारी की हत्या एवं संसद में बम फेंकने को बताया। हालाँकि पंजाब की आम अवाम और बाहर रहने वाले सिखों ने इसका जमकर विरोध किया। आश्चर्य है कि राष्ट्र एवं संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेने वाले जनप्रतिनिधि एक राष्ट्रीय नायक के प्रति ऐसे अशोभनीय एवं अनैतिक विचार रखते हैं। दूसरी मुख्य बात यह वर्तमान में राजनीतिक-बौद्धिक समूहों के द्वारा चयनित तर्कों के आधार पर राष्ट्रीय नायकों के सम्मान हनन की प्रचलित हो चुकी सुनियोजित परम्परा का हिस्सा है। बौद्धिक-राजनीतिक जगत में ऐसा विमर्श पिछले काफ़ी समय से अस्तित्व में हैं।
दिक़्क़त यह है कि इस गम्भीर विमर्श में अल्पज्ञ एवं अमर्यादित प्रकृति के नेता भी कूद पड़े हैं, जो ऐसे मुद्दों पर आधारित बहसों में भाषा की मर्यादा लाँघ जा रहे हैं। कोई शहीद भगत सिंह को अपशब्द कह रहा है, किसी की समीक्षा के अंतर्गत देश की सारी समस्याओं की जड़ में गाँधीवाद है। साथ ही यह तुलना करने का प्रयास भी जारी है कि महात्मा गाँधी ज़्यादा महान थे या डॉ. अंबेडकर? आजकल वीर सावरकर की माफ़ी का सबसे ज़्यादा ज़िक्र करने वालों में आम आदमी पार्टी के नेता शामिल हैं। सम्भवत: वे ख़ुद अपनी पार्टी के मुखिया केजरीवाल को भूल गये हैं, जिन्होंने पहले एक भाजपा नेता पर निराधार आरोप लगाया, और फिर न्यायालय से फटकार पड़ते ही चिट्ठी लिखकर माफ़ी माँग ली।

आधारभूत मसला यह है कि कौन-सी विचारधारा किसी समाज के लिए किसी विशेष परिस्थिति में अधिक श्रेष्ठ है, इस पर बहस की जा सकती है। लेकिन किसी चयनित राष्ट्रीय नायक के त्याग को दूसरे प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के समक्ष श्रेष्ठ साबित करने का प्रयास बौद्धिक अशिष्टता ही मानी जाएगी। किसी विभूति द्वारा किया गया त्याग कुछ विशेष परिस्थितियों पर आधारित होता है। राष्ट्रीय नायकों के संघर्षों एवं त्याग की तुलनात्मक व्याख्या एक ऐसी अनैतिक बहस को जन्म देगी, जिसका परिणाम अंतहीन एवं विकृत टकराव होगा।

ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को अपने मनोनुकूल कुछ विशेष घटनाओं के परिपेक्ष्य में सम्पूर्णत: से देखने या दिखाने का प्रयास विद्रूप अन्याय ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक कुटिलता भी होगी। उदाहरणार्थ बाल गंगाधर तिलक ने औपनिवेशिक सत्ता के विरोध के दौरान सामाजिक सुधार के कुछ मुद्दों पर रूढि़वादी मत को अपना समर्थन दिया। जैसे बाल विवाह को रोकने के लिए पारित क़ानून-1891 का एज ऑफ कंसेंट एक्ट, जिसका लोकमान्य तिलक ने इस आधार पर कड़ा विरोध किया कि विदेशियों को भारत के धार्मिक-सामाजिक रीति-रिवाज़ों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं हैं। उनके इस निर्णय के बहुत सारे पहलू हो सकते हैं, मसलन उन्होंने इसके आधार पर भारत में राष्ट्रवाद के प्रसार का प्रयास किया। परन्तु उनके इस निर्णय ने कहीं-न-कहीं बच्चियों के मानवाधिकारों को आघात पहुँचाया। अब इस एक घटनाक्रम के आधार पर लोकमान्य तिलक जैसे विराट व्यक्तित्व का मूल्यांकन, तो नहीं किया जा सकता।

स्वयं महात्मा गाँधी ने ख़िलाफ़त आन्दोलन (1919-20) को समर्थन देने के दौरान जिस तरह मुस्लिम रूढि़वाद को तरजीह दी, वह बहुत हद तक भारत में मुस्लिम साम्प्रदायिकता का आधार बनी। स्वयं बाबा साहेब अंबेडकर (थॉट्स ऑन पाकिस्तान) समेत कई विद्वानों ने इस विषय पर गाँधी जी के रुख़ की आलोचना की है। अब महात्मा गाँधी की एक ऐतिहासिक भूल (जैसा कई इतिहासकारों ने कहा है,) के आधार पर उनके व्यक्तित्व का चित्रांकन सरासर अनुचित होगा। ऐसा कोई भी प्रयास राष्ट्र के प्रति उनके त्याग, तपस्या एवं समर्पण की अवहेलना होगी। अन्यत्र गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने गाँधीवादी रणनीति से प्रेरित स्वतंत्रता आन्दोलन पद्धति की आलोचना की है। किन्तु इससे यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि वह साम्राज्यवादी सत्ता के समर्थक थे। इसके अतिरिक्त पिछले कुछ वर्षों से यह बहस चर्चा में थी कि नेहरू की जगह सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते, तो देश की स्थिति क्या होती? हालाँकि समस्या यह है कि इतिहास का मूल्यांकन तथ्यों एवं यथार्थ पर आधारित होता है, ऐतिहासिक कल्पनाओं पर नहीं। अत: ऐसे विमर्श औचित्यहीन हैं। आज जो राजनीतिक समूह इन व्यक्तित्वों के प्रति अपना समर्पण दिखा रहे हैं, ऐसा नहीं है कि वे इनके व्यक्तित्व या विचारों से प्रभावित या इनके प्रति समर्पित ही हैं। वास्तव में उनका लक्षित समूह समाज का वह वर्ग है, जो इन महापुरुषों के विचारों, इनके जातिगत-सामाजिक आधार से ख़ुद का जुड़ाव महसूस करता है। ऐसे लोगों को यह समझने की ज़रूरत है कि ये विशिष्ट व्यक्तित्व इस राष्ट्र और समाज की साझा विरासत हैं। इन्हें सुविधाजनक खाँचों में बाँटकर ऐसे स्वार्थी तत्त्व इनके जीवन मूल्यों का अपमान तो कर ही रहे हैं, साथ ही समाज में अनावश्यक संघर्ष भी पैदा कर रहे हैं।

इसमें कोई समस्या नहीं कि कोई राजनीतिक या सामाजिक अथवा धार्मिक समूह किसी इतिहास पुरुष के विचारों एवं जीवन वृत्त के प्रति जुड़ाव रखे। किन्तु उसके समकक्ष किसी अन्य व्यक्तित्व को अनुचित तरी$के से विरोधी या खलनायक की तरह प्रस्तुत करना समस्या पैदा करेगा। यह उस व्यक्तित्व से जातिगत, धार्मिक अथवा किसी अन्य रूप में जुड़े दूसरे पक्ष को उकसायेगा कि वह इसका प्रतिकार करे। इससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ेगा, जिसके परिणाम अंतत: विघटनकारी होंगे।

ऐसे विमर्श का दायरा भारतीय राजनीति के वर्तमान नेतृत्व वर्ग तक भी प्रसारित है, जिसके लिए बहुत हद तक सरकारी तंत्र, राजनीति एवं मीडिया भी ज़िम्मेदार हैं। चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने पर पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री के तगमे से अख़बारों को पाट दिया गया। वही हालत महामहिम द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति निर्वाचित होने पर हो रही है। उनके साथ आदिवासी शब्द का प्रयोग लगातार उपसर्ग (प्रीफिक्स) के रूप में किया जा रहा है। इसी प्रकार भूतपूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन जैसे उच्च प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति की जातिगत पहचान को प्रमुखता से बनाये रखने में भी राजनीति एवं मीडिया जगत की ही प्रमुख भूमिका थी। उन्हें एक विद्वान राष्ट्रपति के बजाय आज भी देश के पहले दलित राष्ट्रपति के रूप में ही सम्बोधित किया जाता है।

कैसी विडंबना है कि जो देश संविधान लागू होने के बाद के सात दशकों से अधिक की यात्रा में लगातार जाति-भेद मिटाने का लक्ष्य लेकर चला है, उसका शिक्षित तबक़ा, जिसमें हर जाति-वर्ग के लोग शामिल है; समाज के प्रेरक व्यक्तित्वों को उनकी जातिगत पहचान से बाहर ही नहीं आने देना चाहता। सरकारी तंत्र भी इस प्रयोजन में उतना ही योगदान दे रहा है। आज भी दलित बस्तियों के नाम बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर ही क्यों हो? यह लोकमान्य तिलक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लोकनायक जे.पी. के नाम पर क्यों नहीं हो सकते हैं? इसी के समानांतर संस्कृत और ज्योतिष विद्यालयों-महाविद्यालयों एवं सवर्ण गाँवों के नाम भी डॉ. अंबेडकर और महात्मा ज्योतिबा फुले के नाम पर होने चाहिए।

इतिहासकार ए.एल. राउज का मानना है कि ‘इतिहास की उपयोगिता संकुचित दृष्टि वाले व्यक्तियों के लिए नहीं है।’ सम्मानित विभूतियों के व्यक्तित्व के मध्य सूक्ष्म अन्वेषण द्वारा लक्षित विरोधाभास, भारतीय राजनीति के लिए विभाजित वर्गों के भावनाओं का लाभ उठाने के लिए सुरम्य भूमि बन गये हैं। व्यक्ति को व्यक्ति से लड़ाने या इतिहास को जातिगत-वर्गीय खाँचों में बाँटने का प्रयास समाज और राष्ट्र को विभाजित और कमज़ोर ही करेगा।

ये उचित है कि नयी पीढ़ी को वास्तविक एवं तथ्यपूर्ण इतिहास का ज्ञान होना चाहिए। किन्तु इतिहास का प्रयोग राजनीतिक कुचक्रों के लिए किया जाना अनुचित है। वर्तमान की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं एवं समाज के ध्रुवीकरण हेतु इतिहास से प्रतिशोध नहीं लिया जाना चाहिए। यदि ऐसा होता रहा, तो समाज में कटुता और विघटन का बढऩा तय है, जिसके विध्वंसक परिणाम राष्ट्र को भुगतने होंगे।

(लेखक राजनीति एवं इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)