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सबके सम्मान में ही सुरक्षा

धर्म एक-दूसरे के सम्मान, सहभागिता और सद्भाव से ही चल सकते हैं। ईष्र्या, बैर, भेदभाव, बहस और कलह से तो अलग-अलग धर्मों के ही नहीं, एक ही धर्म के लोग भी लडक़र मर जाएँगे। चाहे दो धर्मों के मानने वालों के बीच का मामला हो या किसी एक ही धर्म के मानने वालों के बीच का, एक-दूसरे का, एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करके, आपसी सौहार्द और प्रेम से मिलकर रहकर ही सब कुशल-मंगल रह सकते हैं। ईष्र्या और बैर से तो एक परिवार के लोग भी सुख-शान्ति से नहीं रह सकते, धर्मों का मसला तो फिर भी बहुत दूर की बात है।

कहने का अर्थ यह है कि दुनिया के हर व्यक्ति को सभी धर्मों के लोगों का सम्मान करना चाहिए। केवल इस बात से किसी को अपना दुश्मन समझ लेना कि वह दूसरे धर्म या दूसरी जाति का व्यक्ति है; अधर्म के सिवाय कुछ और नहीं है। कई बार देखा गया है कि कुछ देशों में दूसरे धर्म के लोगों के धर्मस्थलों को तोड़ दिया जाता है। इससे अशान्ति ही फैलती है। लेकिन कई देश ऐसे भी हैं, जहाँ दूसरे धर्मों के स्थल सदियों से सुरक्षित हैं। इतिहास गवाह है कि धार्मिक स्थलों को लेकर असंख्यों युद्ध हुए हैं। विचार किया जाना चाहिए कि वो धर्म ही कैसे, जिनके लिए तबाही करनी पड़े? धर्म तो केवल ईश्वर की ओर अग्रसर करने का साधन हैं। लेकिन इन्हीं धर्मों को मानने वालों को आज तक यह बात समझ नहीं आयी कि जिन धर्मों के पालन से मन शान्त और सहनशील हो जाना चाहिए, अहंकार नष्ट हो जाना चाहिए, विनम्रता बढ़ जानी चाहिए, उन्हीं धर्मों को मानने वाले लोग आपस में लडक़र मरने पर आमादा क्यों हो जाते हैं? दरअसल ये बिना धर्मों को समझे, सिर्फ़ उनके अंधानुकरण का परिणाम है। यह एक बड़ा सच है कि अंधानुकरण करने वाला कितना भी पड़ा-लिखा और समझदार क्यों न हो, उसे धर्म के नाम पर अनपढ़ भी बड़ी आसानी से मूर्ख बना सकता है। उसे किसी से झगड़ा करने, यहाँ तक कि किसी की हत्या करने के लिए उकसा सकता है। दुनिया भर में अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की ऐसे ही अंधानुकरण करने वालों की भीड़ को ऐसा करते कई बार देखा जाता है। यह भीड़ कभी मूर्तियाँ तोड़ती है, कभी कोई धार्मिक स्थल तोड़ती है, तो कभी दूसरे धर्मों के लोगों पर हमला करती है।

अगर धर्म के नाम पर भीड़ बनकर हमला करने वाले इन धर्मांध लोगों को कोई रोक सकता है, तो वो धार्मिक नेता, देशों-राज्यों की सरकारें और ताक़तवर लोग हैं। लेकिन अब देखने में आता है कि सरकारें, ताक़तवर लोग और धार्मिक नेता ही अपने फ़यदे के लिए धर्मों में विघटन डालकर रखते हैं। आज तक दुनिया में कोई भी ऐसा धार्मिक विवाद नहीं हुआ, जिसके पीछे इनमें से कोई-न-कोई न हो। वैसे तो धर्म-स्थल किसी भी धर्म के हों, सिवाय झगड़े की जड़ के कुछ नहीं हैं। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि यही धर्म-स्थल लोगों की आस्था का केंद्र भी हैं। ऐसे में विभिन्न धर्मों को मानने वालों के ये आस्था के केंद्र तभी सुरक्षित रह सकेंगे, जब हर धर्म के लोग दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थलों को क्षति नहीं पहुँचाएँगे और उनका सम्मान करेंगे।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने बांग्लादेश के ढाका शहर में 51 सतीपीठों में से एक 12वीं शताब्दी का एक ढाकेश्वरी जातीय काली मन्दिर का जीर्णोद्धार कराकर यही सन्देश दिया है। इस ढाकेश्वरी मन्दिर को ढाकेश्वरी राष्ट्रीय काली मन्दिर भी कहते हैं। इस मन्दिर में सनातनी लोगों के अलावा मुस्लिम महिला-पुरुष भी पूजा करते हैं। बांग्लादेश सरकार की ओर से ढाकेश्वरी राष्ट्रीय काली मन्दिर को वहाँ की राष्ट्रीय मर्यादा माना जाता है और सरकारी बजट से इस मन्दिर की देख-रेख होती है। इस मन्दिर के चार शिव मन्दिर हैं, जो एक पंक्ति में स्थित हैं। ये चारों शिव मन्दिर ढाकेश्वरी मन्दिर में प्रवेश करते ही दिखते हैं। इस मन्दिर में साड़ी चढ़ाने की प्रथा है, जो मुस्लिम लोग भी उसी श्रद्धा से चढ़ाते हैं, जिस श्रद्धा से सनातनधर्मी चढ़ाते हैं। ढाका के नेता (सनातनी और मुस्लिम दोनों) चुनावों के दौरान इस ढाकेश्वरी मन्दिर में साड़ी और रत्न चढ़ाकर चुनावी प्रचार शुरू करते हैं। सन् 1971 के युद्ध मे पाकिस्तान ने इस मन्दिर को तबाह कर दिया था; लेकिन बांग्लादेश सरकार ने इसका पुन: निर्माण कराया। सन् 2018 में बांग्लादेश की मौज़ूदा प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने इस मन्दिर को और विस्तार देने के लिए 1.5 बीघा ज़मीन दान की थी। अगर इस मन्दिर में वहाँ के मुस्लिमों की आस्था नहीं होती, तो सम्भव है कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री भी इस मन्दिर को और भव्य नहीं बनवातीं। इस मन्दिर को सुरक्षित रखने में वहाँ के इस्लाम धर्म के लोगों की भी सराहना की जानी चाहिए। भारत में भी ऐसे कई धार्मिक स्थल हैं, जिनकी सुरक्षा दूसरे धर्म के लोगों द्वारा की जाती है। ऐसे धार्मिक स्थल हर धर्म के हैं। यह व्यावहारिक है कि अपना घर सुरक्षित रखने के लिए दूसरे के घर पर पत्थर नहीं मारना चाहिए, अन्यथा कभी-न-कभी अपने घर पर भी पत्थर बरसेंगे-ही-बरसेंगे।

पड़ौसी देशों के गैर मुस्लिमों को नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत गुजरात में मिलेगी भारतीय नागरिकता

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को नागरिकता क़ानून में फेरबदल की जानकारी देने वाली केंद्र सरकार ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले और वर्तमान में गुजरात के दो जिलों में रह रहे हिंदुओं, सिखों, बौद्ध, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता कानून, 1955 के तहत भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया है। बता दें सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को ही नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अगली सुनवाई के लिए 6 दिसंबर को तारीख तय की है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) पर पहले ही देश में जबरदस्त बवाल हो चुका है। अब मोदी सरकार की तरफ से सीएए की जगह नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नागरिकता देने का फैसला महत्वपूर्ण कहा जाएगा। याद रहे सीएए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्ध, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता देने का भी प्रावधान करता है।

चूंकि सीएए के नियम सरकार ने अब तक नहीं बनाए गए हैं, इसलिए इसके तहत अब तक किसी को भी नागरिकता नहीं दी सकी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक अधिसूचना के अनुसार, गुजरात के आणंद और मेहसाणा जिलों में रहने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को धारा 5, नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6 के तहत और नागरिकता नियम, 2009 के प्रावधानों के अनुसार भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण की अनुमति दी जाएगी या उन्हें देश के नागरिक का प्रमाण पत्र दिया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अगली सुनवाई के लिए 6 दिसंबर को तारीख तय की है।

मोरबी पुल हादसे पर सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल, रिटायर्ड जज से जांच की उठाई मांग  

मोरबी पुल हादसे का मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच गया है। इस हादसे में 134 लोगों के मौत हो गयी थी और कई अन्य घायल हो गए थे। इस बीच गुजरात सरकार ने हादसे के चार दिन बाद 2 नवंबर को गुजरात में राज्यव्यापी शोक मनाने का निर्णय किया है। इस बीच हादसे को लेकर जो जानकारियां सामने आ रही हैं उनसे साफ़ लगता है कि पुल जनता के लिए खोलने के मामले में घोर लापरवाही बरती गयी।

देश भर को दुःख में भरने वाले इस हादसे को लेकर अब सर्वोच्च न्यायालय में याचिका  दायर की गयी है। सर्वोच्च अदालत में इस हादसे को लेकर जनहित याचिका दाखिल (पीआईएल) दायर की गयी है। इस पीआईएल में दुर्घटना की सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज के नेतृत्व में एसआईटी जांच कराने की मांग की गई है।

सर्वोच्च अदालत में दायर दाखिल जनहित याचिका में कहा गया है कि ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए देशभर में जितने भी पुराने पुल या स्मारक हैं, वहां होने वाली भीड़ को मैनेज करने के लिए नियम बनाए जाएं। सुप्रीम कोर्ट के वकील विशाल तिवारी ने यह जनहित याचिका दाखिल की है।

उधर मोरबी में पुल गिरने के हादसे के एक दिन बाद पुल की मरम्मत करने वाली कंपनी ओरेवा के दो अधिकारियों सहित 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि, कंपनी के मालिक के खिलाफ कुछ नहीं किया गया है। कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी भी पुल त्रासदी के बाद से लापता हैं। बता दें कंपनी ओरेवा को कई खामियों के लिए दोषी ठहराया जा रहा है, जिसमें फिटनेस प्रमाणपत्र लेने में कथित विफलता और समय से पहले पुल को फिर से खोलना शामिल है।

टाटा स्टील के प्रबंध निदेशक रहे भारत के ‘स्टील मैन’ जमशेद जे ईरानी का निधन

भारत के ‘स्टील मैन’ कहलाए जाने वाले जमशेद जे ईरानी का निधन हो गया है। वे 85 साल के थे। जमशेद टाटा स्टील के प्रबंध निदेशक रहे हैं।

उनका निधन सोमवार देर रात जमशेदपुर में हुआ। टाटा स्टील ने एक बयान में ईरानी के निधन की जानकारी दी। याद रहे ईरानी चार दशकों से अधिक समय तक टाटा स्टील से जुड़े रहे। वह 43 साल की विरासत को पीछे छोड़ते हुए जून 2011 में टाटा स्टील के बोर्ड से सेवानिवृत्त हुए थे।

जमशेद ने विदेश में शिक्षा ग्रहण की और पेशेवर जीवन की शुरुआत करने के बाद, ईरानी 1968 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (अब टाटा स्टील) में शामिल होने के लिए भारत लौट आए। वह कंपनी से अनुसंधान और विकास के प्रभारी निदेशक के सहायक के रूप में जुड़े।

उन्होंने टाटा स्टील और टाटा संस के अलावा, टाटा मोटर्स और टाटा टेलीसर्विसेज सहित टाटा समूह की कई कंपनियों के निदेशक के रूप में भी काम किया। ईरानी के परिवार में उनकी पत्नी डेज़ी ईरानी और उनके तीन बच्चे जुबिन, निलोफ़र और तनाज़ हैं। देश के कई गणमान्य लोगों ने जमशेद के निधन पर शोक जताया है।

पीएम मोदी के मोरबी अस्पताल आने से पहले नई टाइलें-रंगाई-पुताई-सफाई, विपक्ष ने आलोचना की  

गुजरात मॉडल की पोल खोलने वाले मोरबी के खस्ताहाल सरकारी अस्पताल की पिछले दो दिन में मरम्मत कर दी गयी, उखड़ चुकी दीवारों पर रंग पोत दिया गया और सफाई करवा दी गयी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को मोरबी हादसे के घायलों को देखने अस्पताल आने वाले हैं। विपक्ष ने इस सारे घटनाक्रम की कड़ी निंदा की है। उधर कांग्रेस ने कहा कि ‘पीएम मोदी मोरबी के सिविल अस्पताल आने वाले हैं, उससे पहले वहां रंगाई-पुताई का काम चल रहा है…पीएम मोदी की तस्वीर में कोई कमी न रहे, इसका सारा प्रबंध हो रहा है।’

जैसे ही पीएम मोदी के अस्पताल आने की घोषणा हुई, अस्पताल और प्रशासन का अमला सब कुछ छोड़ खस्ताहाल अस्पताल के रंगाई-पुताई में जुट गया। रातोंरात अस्पताल की सूरत बदलने की कोशिश की गई है। पीएम मोदी आज उन पीड़ितों से मुलाकात करेंगे, जो 134 लोगों की जान लेने वाले पुल की घटना में बच गए।

अस्पताल की इस रंगाई-पुताई की विपक्षी दलों ने कड़ी आलोचना की है। अस्पताल की उन दीवारों और छत के कुछ हिस्सों को दोबारा पेंट किया गया है जिस तरफ पीएम को आना है। नए वॉटर कूलर लगाए गए है और उन दो वॉर्डों में बिस्तरों की चादरें भी बदली गई हैं जहाँ पीएम घायलों का हाल जानेंगे।

अस्पताल में पुल हादसे के काफी घायल इलाज के लिए भर्ती हैं। मजदूरों को परिसर में झाड़ू लगाते भी देखा गया है। कायापलट की इस व्यापक कार्यवाही के दौरान दिख रहे पुराने कूलर और क्षतिग्रस्त दीवारें और छत असलियत का बखान करती दिख रही थीं।

उधर विपक्षी दलों कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी ने भाजपा पर प्रधानमंत्री का ‘फोटोशूट’ सुनिश्चित करने के लिए ‘ईवेंट मैनेजमेंट’ में व्यस्त होने का आरोप लगाया है। हादसे को ‘त्रासदी’ बताते हुए कांग्रेस ने अपने आधिकारिक हैंडल से ट्वीट में लिखा – ‘पीएम मोदी मोरबी के सिविल अस्पताल जाएंगे… उससे पहले वहां रंगाई-पुताई का काम चल रहा है… चमचमाती टाइल्स लगाई जा रही हैं… पीएम मोदी की तस्वीर में कोई कमी न रहे, इसका सारा प्रबंध हो रहा है… इन्हें शर्म नहीं आती…! इतने लोग मर गए और ये इवेंट बाजी में लगे हैं’।

उधर आम आदमी पार्टी ने ट्वीट में कहा – ‘प्रधानमंत्री के फोटोशूट में कोई कमी न रह जाए, इसलिए अस्पताल की मरम्मत की जा रही है… अगर बीजेपी ने 27 वर्ष में काम किया होता, तो आधी रात को अस्पताल को चमकाने की जरूरत न पड़ती।’

आप का ट्वीट –
@AamAadmiParty
Morbi Civil Hospital का दृश्य…कल प्रधानमंत्री के Photoshoot में कोई कमी ना रह जाए इसलिए अस्पताल की मरम्मत की जा रही है। अगर भाजपा ने 27 वर्षों में काम किया होता तो आधी रात को अस्पताल को चमकाने की जरूरत न पड़ती।

कांग्रेस का ट्वीट –
@INCIndia
त्रासदी का इवेंट। कल PM मोदी मोरबी के सिविल अस्पताल जाएंगे। उससे पहले वहां रंगाई-पुताई का काम चल रहा है। चमचमाती टाइल्स लगाई जा रही हैं। PM मोदी की तस्वीर में कोई कमी न रहे, इसका सारा प्रबंध हो रहा है। इन्हें शर्म नहीं आती! इतने लोग मर गए और ये इवेंट बाजी में लगे हैं।

मोरबी पुल हादसे में ओरेवा कंपनी के दो कनिष्ठ अधिकारी गिरफ्तार, वरिष्ठ अफसर अभी लापता

गुजरात के मोरबी में रविवार को हुए पुल हादसे के मामले में पुलिस ने सोमवार शाम पुल का काम करने वाली कंपनी ओरेवा के दो अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया  है। हालांकि, गिरफ्तार किये गए दोनों लोग कंपनी के माध्यम दर्जे के कर्मी है जबकि वरिष्ठ अधिकारी हादसे के बाद से ही लापता हैं।

इस हादसे में अब तक 140 लोगों की मरने की खबर है। हादसे के बाद ओरेवा कंपनी को खामियों का दोषी बताया गया है। अभी तक की जानकारी के मुताबिक जब यह हादसा हुआ पुल पर निर्धारित संख्या से कहीं ज्यादा लोग थे। सरकार ने आज सुबह ही हादसे की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया है।

बताया गया है कि इस पुल की एक समय में 100 लोगों की क्षमता है जबकि हादसे के वक्त उसपर 400 से ज्यादा लोग थे। करीब एक सदी पुराने पुल को पांच दिन पहले ही मरम्मत और नवीनीकरण काम के बाद जनता के लिए खोला गया था।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, शीतकालीन सत्र में राजद्रोह क़ानून पर कर सकते हैं कुछ फैसला

केंद्र सरकार संसद के आने वाले शीतकालीन सत्र में राजद्रोह क़ानून को लेकर कोई  फैसला कर सकती है। इस तर्क के साथ केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले से जुड़ी सुनवाई टालने का आग्रह किया था। अब अदालत ने सोमवार को केंद्र के आग्रह को स्वीकार करते हुए जनवरी के दूसरे हफ्ते में सुनवाई का फैसला किया है। हालांकि, तब तक केंद्र सरकार को राजद्रोह क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट की पहली से लगी  रोक का पालन करना होगा।

सुनवाई के दौरान आज सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के सुनवाई टालने के आग्रह को स्वीकार कर लिया। जिन याचिकाओं में पहले नोटिस जारी नहीं हुआ, अब उनमें भी नोटिस जारी किया गया है। केंद्र सरकार 6 हफ्ते में इनका जवाब देगी। सुप्रीम कोर्ट अगले साल जनवरी के दूसरे हफ्ते में इस मामले पर दोबारा सुनवाई करेगा।

प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की बेंच सुनवाई कर रही है। याद रहे मई में सर्वोच्च अदालत ने राजद्रोह कानून पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को राजद्रोह कानून की आईपीसी की धारा 124ए के तहत कोई मामला दर्ज नहीं करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने सरकार को आईपीसी की धारा 124ए के प्रावधानों पर समीक्षा की अनुमति भी दी है।

हालांकि, अदालत ने कहा कि राजद्रोह कानून की समीक्षा होने तक सरकारें धारा 124ए में कोई केस दर्ज न करे और न ही इसमें कोई जांच करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कि अगर राजद्रोह के मामले दर्ज किए जाते हैं, तो वे पक्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए स्वतंत्र हैं। अदालतों को ऐसे मामलों का तेजी से निपटारा करना होगा।

भारत जोड़ो यात्रा रोक राहुल गांधी ने मोरबी हादसा पीड़ितों को दो मिनट का मौन रखकर दी श्रद्धांजलि  

गुजरात के मोरबी में पुल टूटने से हुए हादसे में जान गंवाने वाले लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा रुकवाकर दो मिनट का मौन  रखा। बड़ी संख्या में यात्रा में शामिल कार्यकर्ता और आम लोग रुक गए और दिवंगतों को श्रद्धांजलि दी।

राहुल गांधी और पार्टी के अन्य नेताओं, कार्यकर्ताओं और आम लोगों ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान गुजरात के मोरबी शहर में पुल हादसे में मारे गए लोगों की याद में दो मिनट का मौन रखा। बाद में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि पर और सरदार वल्लभभाई पटेल को उनकी जयंती पर पुष्पांजलि भी अर्पित की।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक ट्वीट में बताया – ‘भारत जोड़ो यात्रा का चौथा दिन शादनगर में सुबह साढ़े पांच बजे शुरू हुआ। भारत यात्रियों ने सरदार पटेल और इंदिरा गांधी को पुष्पांजलि अर्पित की और फिर गुजरात में मोरबी पुल त्रासदी में मारे गए लोगों की याद में दो मिनट का मौन रखा।’

इससे पहले पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ राहुल गांधी ने सोमवार सुबह यहां से पदयात्रा शुरू की और उनके करीब 22 किलोमीटर की दूरी तय करने का कार्यक्रम है। यह तेलंगाना में भारत जोड़ो यात्रा का छठा दिन है।

सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती वाली याचिकाओं पर 6 दिसंबर को होगी सुनवाई

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अगली सुनवाई के लिए 6 दिसंबर को तारीख तय की है।

प्रधान न्यायाधीश यूयू ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने सोमवार को कहा कि तीन हफ्ते में असम और त्रिपुरा को जवाब दाखिल करना है। सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील पल्लवी प्रताप और केंद्र की ओर से कनु अग्रवाल को नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। दोनों सारे दस्तावेज एक साथ कर मामलों का बंटवारा करेंगे और पक्षों को देंगे।

अदालत ने सभी पक्षों को तीन पेज की लिखित दलील देने को कहा है। अगले दो  हफ्ते में याचिकाकर्ताओं को जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया है। कुल 232 याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है।

सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर रोक लगाने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था और जवाब मांगा था।

याद रहे सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए कांग्रेस, त्रिपुरा राजपरिवार के वंशज प्रद्योत किशोर देव बर्मन और असम गण परिषद,  इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल), कांग्रेस सांसद जयराम रमेश और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा, असदुद्दीन औवैसी, सीपीआई, डीएमके, ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू), पीस पार्टी, गैर सरकारी संगठन रिहाई मंच और सिटिजंस अगेंस्ट हेट, अधिवक्ता एमएल शर्मा और कानून के कई छात्रों की तरफ से याचिकाएं दायर की गईं हैं।

सुप्रीम कोर्ट का टू फिंगर टेस्ट पर बड़ा फैसला; ऐसा करने वाले दोषी, एमबीबीएस से हटेगा  

रोक के बावजूद यौन उत्पीड़न पीड़ितों के टू-फिंगर टेस्ट जारी रहने पर सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को सख्त नाराजगी जताई है। इस टेस्ट पर सर्वोच्च अदालत ने 2013 पर पाबंदी लगा दी थी। सर्वोच्च अदालत ने एक बड़े फैसले में टू-फिंगर टेस्ट करने वाले व्यक्तियों को कदाचार का दोषी मानने और मेडिकल कॉलेजों में अध्ययन सामग्री से टू-फिंगर टेस्ट हटाने का आदेश दिया है।

सर्वोच्च अदालत ने इस मामले की सुनवाई पर कहा कि टू-फिंगर टेस्ट पीड़िता को दोबारा एक आघात से गुजरने पर मजबूर करता है। सर्वोच्च अदालत ने चेतावनी दी है कि दुष्कर्म के मामलों में टू-फिंगर टेस्ट करने वाले व्यक्तियों को कदाचार का दोषी माना जाएगा। सर्वोच्च अदालत ने एक आरोपी को बरी करने के हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

यही नहीं अदालत ने मेडिकल कॉलेजों में अध्ययन सामग्री से टू-फिंगर टेस्ट को हटाने का आदेश दिया है और कहा कि बलात्कार पीड़िता की जांच की अवैज्ञानिक आक्रामक विधि यौन उत्पीड़न वाली महिला को फिर से आघात पहुंचाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टू फिंगर टेस्ट इस पितृसत्तात्मक सोच पर आधारित है कि यौन रूप से सक्रिय महिला से रेप नहीं हो सकता।

एक मामले में फैसला सुनाते हुए एक दोषसिद्धि को बहाल करते हुए टू-फिंगर टेस्ट पर नाराजगी जाहिर करते हुए जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा पीड़िता के यौन इतिहास के साक्ष्य मामले के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में इस प्रथा को असंवैधानिक माना था और कहा था कि ये टेस्ट नहीं किया जाना चाहिए।