| नई दिल्ली 4 मई 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (पूर्व में भारतीय जनसंघ) का सफर दशकों की संघर्ष यात्रा के बाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में 9 सीटें और 5.8% वोट हासिल करने वाली पार्टी 1957 से 1971 के बीच पूरी तरह हाशिए पर चली गई। इस दौरान पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली और उसका वोट शेयर घटकर करीब 1% तक सिमट गया। 1977 में जनता पार्टी के साथ विलय के बाद पार्टी ने 15 सीटें और 21.46% वोट हासिल कर मजबूत वापसी के संकेत दिए। हालांकि, यह उभार स्थायी नहीं रह सका और 1982 से 2016 तक बीजेपी को लगातार शून्य सीटों का सामना करना पड़ा। 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 3 सीटें और 10.16% वोट के साथ वापसी की। इसके बाद 2021 में पार्टी ने बड़ा प्रदर्शन करते हुए 77 सीटें और 38.15% वोट हासिल किए और राज्य में मुख्य विपक्षी दल बन गई। अब 2026 के चुनावी रुझानों में बीजेपी 192 सीटें और करीब 45% वोट के साथ सत्ता की दहलीज पर खड़ी नजर आ रही है, जो उसके अब तक के सबसे बड़े विस्तार को दर्शाता है। लोकसभा में भी बढ़ा जनाधार पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनावों के आंकड़े भी बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को दिखाते हैं। 1952 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में पार्टी ने 2 सीटों से शुरुआत की थी। 1991 में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली, हालांकि उसे 11.66% वोट प्राप्त हुए। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 18 सीटें और 40.64% वोट हासिल कर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। वहीं, 2024 में पार्टी को 12 सीटें और 38.73% वोट मिले। गठबंधन से आगे निकलकर मुख्य दावेदार दिलचस्प बात यह है कि 2001 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के साथ गठबंधन के बावजूद बीजेपी को कोई सीट नहीं मिली थी। आज वही पार्टी राज्य की राजनीति में सत्ता के सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर चुकी है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बदलाव लंबे संगठनात्मक विस्तार, नेतृत्व की रणनीति और वोट बैंक में लगातार बढ़ोतरी का नतीजा है, जिसने बंगाल की राजनीति में नई दिशा तय कर दी है। |
भाजपा ने बंगाल में सड़क से सत्ता तक यूं तय किया सफर
कभी 1% वोट पर सिमटी पार्टी अब 45% वोट के साथ बहुमत की ओर; 2021 में मुख्य विपक्ष बनने के बाद 2026 में बड़ा उछाल




