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वैश्विक भुखमरी सूचकांक में भारत और सच्चाई

वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2022 ने भारत को 121 देशों में से पिछले साल के 101 रैंक से और नीचे गिराकर 107वें स्थान पर धकेल दिया है। भारत इस तरह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे खिसकते हुए दिखाया है। हालाँकि केंद्र्र सरकार ने इस रिपोर्ट को ग़लत बताते हुए कहा है कि एक ऐसे राष्ट्र के रूप में भारत की छवि को ख़राब करने के लिए लगातार प्रयास फिर से दिखायी दे रहे हैं और यह बताने की कोशिश हो रही है जैसे कि भारत अपनी आबादी की खाद्य सुरक्षा और पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।

संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्यों पर भारत का प्रदर्शन, जो 2030 तक भूख रहित देश के लक्ष्य को अनिवार्य करता है; यह दर्शाता है कि इस लक्ष्य में पिछड़ गया है। सतत् विकास लक्ष्य-2021 की रिपोर्ट के अनुसार भूख, अपव्यय, एनीमिया, पीने के पानी और लैंगिक समानता पर भारत के प्रदर्शन के बाद से भारत की सूचकांक (रैंकिंग) 193 देशों में 117 से और गिरकर 120 हो गयी है। हालाँकि आज़ादी के बाद से देश में कृषि उत्पादन छ: गुना बढ़ गया है। इसी 13 अक्टूबर को जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2022 दर्शाता है कि दुनिया में भारत की रैंकिंग पिछले साल से छ: अंक और फिसल गयी है। इस महत्त्वपूर्ण मामले में यह भूख और कुपोषण की स्थिति का सूचक है। अफ़ग़ानिस्तान, जो एक युद्धग्रस्त देश है, अपने ग्लोबल हंगर इंडेक्स रैंक के मामले में भारत से नीचे दक्षिण एशिया का एकमात्र देश है। वैश्विक सन्दर्भ में अकेले भारत में लगभग एक-तिहाई लोग भूख से पीडि़त हैं और एक-चौथाई लोग खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और सरकार के पास पिछली जनगणना, दोनों के अनुसार कम-से-कम 75 फ़ीसदी ग्रामीण आबादी और 50 फ़ीसदी शहरी आबादी को रियायती खाद्यान्न उपलब्ध कराने का संवैधानिक अधिकार है। क्या खाद्य क़ीमतों में उच्च मुद्रास्फीति के साथ बढ़ती बेरोज़गारी के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई है?

हालाँकि महिला और बाल विकास मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि ग़लत सूचना सालाना जारी वैश्विक भुखमरी सूचकांक की पहचान है। सूचकांक भूख का एक ग़लत माप है और गम्भीर कार्यप्रणाली मुद्दों से ग्रस्त है। सूचकांक की गणना के लिए उपयोग किये जाने वाले चार संकेतकों में से तीन बच्चों के स्वास्थ्य से सम्बन्धित हैं और पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। कुपोषित (पीओयू) आबादी के अनुपात का चौथा और सबसे महत्त्वपूर्ण संकेतक अनुमान 3,000 के बहुत छोटे नमूने के आकार पर किये गये एक जनमत सर्वेक्षण पर आधारित है।

सरकार के दावे के मुताबिक, रिपोर्ट न केवल ज़मीनी हक़ीक़त से अलग है, बल्कि विशेष रूप से कोरोना महामारी के दौरान आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा किये गये प्रयासों को जानबूझकर नज़रअंदाज़ करने का भी संकेत देती है। एक आयामी दृष्टिकोण लेते हुए रिपोर्ट भारत के लिए कुपोषित जनसंख्या के अनुपात (पीओयू) के अनुमान के आधार पर 16.3 फ़ीसदी पर भारत की रैंक को कम करती है। एफएओ का अनुमान गैलप वल्र्ड पोल के माध्यम से आयोजित खाद्य असुरक्षा अनुभव स्केल (एफआईईएस) सर्वेक्षण मॉड्यूल पर आधारित है, जो 3,000 उत्तरदाताओं के नमूने के आकार के साथ आठ प्रश्नों पर आधारित एक जनमत सर्वेक्षण है।

एफआईईएस के माध्यम से भारत के आकार के देश के लिए एक छोटे-से नमूने से एकत्र किये गये डाटा का उपयोग भारत के लिए पीओयू मूल्य की गणना करने के लिए किया गया है, जो न केवल ग़लत और अनैतिक है, बल्कि यह पूर्वाग्रह का भी स्पष्ट संकेत देता है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक की रिपोर्ट जारी करने वाली कंसर्न वल्र्डवाइड और वेल्ट हंगर हिल्फ की प्रकाशन एजेंसियों ने स्पष्ट रूप से उचित परिश्रम नहीं किया है। सरकार ने एफएओ के साथ जुलाई, 2022 में एफआईईएस सर्वेक्षण मॉड्यूल डाटा के आधार पर इस तरह के अनुमानों का उपयोग नहीं करने का निर्णय किया था, क्योंकि इसका सांख्यिकीय आउटपुट योग्यता पर आधारित नहीं होगा। हालाँकि सरकार का कहना है कि इस बात का आश्वासन दिया जा रहा था कि इस मुद्दे पर आगे और जुड़ाव होगा, इस तरह के तथ्यात्मक विचारों के बावजूद वैश्विक भुखमरी सूचकांक रिपोर्ट का प्रकाशन खेदजनक है।

सर्वे में पूछे गये कुछ प्रश्न- पिछले 12 महीने के दौरान क्या कोई समय था, जब पैसे या अन्य संसाधनों की कमी के कारण आप चिन्तित थे कि आपके पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं होगा? क्या आपने जितना सोचा था, उससे कम खाया? यह स्पष्ट है कि इस तरह के प्रश्न सरकार द्वारा पोषण सम्बन्धी सहायता प्रदान करने और खाद्य सुरक्षा के आश्वासन के बारे में प्रासंगिक जानकारी के आधार पर तथ्यों की खोज नहीं करते हैं। भारत में प्रति व्यक्ति आहार ऊर्जा आपूर्ति जैसा कि खाद्य बैलेंस शीट से एफएओ द्वारा अनुमान लगाया गया है, देश में प्रमुख कृषि वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि के कारण साल-दर-साल बढ़ रहा है और इसका कोई कारण नहीं है कि देश का कुपोषण का स्तर बढऩा चाहिए।

मोदी सरकार का काम

इस अवधि के दौरान सरकार ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई उपाय किये गये थे। सरकार विश्व का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चला रही है। देश में कोरोना वायरस के अभूतपूर्व संकटकाल के कारण हुए आर्थिक व्यवधानों के मद्देनज़र सरकार ने मार्च, 2020 में लगभग 80 करोड़ राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लाभार्थियों को उनके राशन कार्ड पर पाँच किलोग्राम प्रति व्यक्ति नियमित मासिक अतिरिक्त मु$फ्त खाद्यान्न (चावल / गेहूँ) के वितरण की घोषणा की थी। यह योजना प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना (पीएम-जीकेएवाई) के तहत आती है।

अब तक पीएम-जीकेएवाई योजना के तहत सरकार ने राज्यों / केंद्र्र शासित प्रदेशों को लगभग 1,121 लाख मीट्रिक टन खाद्यान्न आवंटित किया है, जो लगभग 3.91 लाख करोड़ रुपये का है। अब खाद्य सब्सिडी में योजना को दिसंबर, 2022 तक बढ़ा दिया गया है। इसका वितरण राज्य सरकारों के माध्यम से किया गया है, जिन्होंने लाभार्थियों को दाल, खाद्य तेल और मसाले आदि प्रदान करके केंद्र्र सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाया है।

इसके अलावा आँगनबाड़ी सेवाओं के तहत कोरोना महामारी के बाद से छ: वर्ष तक के क़रीब 7.71 करोड़ बच्चों और 1.78 करोड़ गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को पूरक पोषण प्रदान किया गया। क़रीब 5.3 मिलियन मीट्रिक टन खाद्यान्न (जिसमें 2.5 मिलियन मीट्रिक टन गेहूँ, 1.1 मिलियन मीट्रिक टन चावल, 1.6 मिलियन मीट्रिक टन चावल और 12,037 मीट्रिक टन ज्वार और बाजरा शामिल हैं) की आपूर्ति की गयी।

भारत में 14 लाख आँगनबाडिय़ों में आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं द्वारा पूरक पोषाहार का वितरण किया गया है। लाभार्थियों को टेक होम राशन हर पखवाड़े उनके घरों पर पहुँचाया गया। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत 1.5 करोड़ से अधिक पंजीकृत महिलाओं को उनके पहले बच्चे के जन्म पर गर्भावस्था और प्रसव के बाद की अवधि के दौरान मज़दूरी समर्थन और पौष्टिक भोजन के लिए 5,000 रुपये प्रदान किये गये।

वैश्विक भुखमरी सूचकांक में शामिल पीओयू के अलावा तीन अन्य संकेतक मुख्य रूप से बच्चों से सम्बन्धित हैं। ये संकेतक भूख के अलावा पीने के पानी, स्वच्छता, आनुवंशिकी, पर्यावरण और भोजन के सेवन के उपयोग जैसे विभिन्न अन्य कारकों की जटिल बातचीत के परिणाम हैं, जिसे जीएचआई में स्टंटिंग और वेस्टिंग के लिए कारक / परिणाम कारक के रूप में लिया जाता है। मुख्य रूप से बच्चों के स्वास्थ्य संकेतकों से सम्बन्धित संकेतकों के आधार पर भूख की गणना करना न तो वैज्ञानिक है और न ही तर्कसंगत। वास्तव में विचार के लिए पर्याप्त भोजन है।

सावधान हो जाएँ 50 के पार वाली महिलाएँ

यदि आप की उम्र 50 वर्ष के पार हो गयी हो और आपका मासिक चक्र बन्द हो गया हो, तो सावधान हो जाएँ। सेहत पर अधिक ध्यान देना होगा, वरना लापरवाही महँगी पड़ सकती है। 50 वर्ष की उम्र के बाद पोस्टमेनोपॉजल की स्थिति में शरीर की हड्डियाँ कमज़ोर होने लगती हैं। हड्डी टूटने की सम्भावना बढ़ जाती है। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद की स्थिति अधिक नाज़ुक होती है। शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन बनना कम हो जाता है, जो शरीर की हड्डियों को मज़बूत बनाता है। हार्मोन का का स्तर कम होने के कारण ओस्टियोपोरोसिस बीमारी होने का ख़तरा अधिक रहता है। वैश्विक स्तर पर बात करें, तो विशेषज्ञों के अनुसार, यूनाइटेड स्टेट्स और यूरोप में 30 फ़ीसदी पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं को ऑस्टियोपोरोसिस है। उनका कहना है कि दुनिया भर में बढ़ती उम्र के साथ इन महिलाओं में ओस्टियोपोरोसिस की घटनाओं में एक बड़ी वृद्धि की सम्भावना हो सकती है।

ओस्टियोपोरोसिस की बीमारी के बारे में अधिक जागरूकता के लिए हर वर्ष 20 अक्टूबर को विश्व ओस्टियोपोरोसिस दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय ओस्टियोपोरोधसिस फाउंडेशन (आईओएएफ) ने ‘स्टेप अप फॉर बोन हेल्थ’ लक्ष्य रखा है। इसके मुताबिक, किसी भी उम्र में हड्डियों को तंदुरुस्त रखने के लिए पाँच स्टेप्स ज़रूरी हैं, जो भविष्य में हड्डी के टूटने को कम करने के लिए सहायक होंगे। इनमें पोषक आहार, हड्डियों और पशुओं को मज़बूत बनाने के लिए व्यायाम, शरीर के भार को सन्तुलित रखना, सिगरेट और शराब का सेवन नहीं करना और जागरूकता। ओस्टियोपोरोसिस ऐसी बीमारी है जिसका आसानी से पता नहीं चलता। इसमें हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे हड्डी टूटने का रिस्क बढ़ जाता है। हड्डी टूटने तक ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण न के बराबर होते हैं। हड्डियाँ खोखली हो रही हैं, इसका तब पता चलता है, जब हल्की-सी चोट लगने पर हड्डी टूट जाती है। डब्ल्यूएचओ ऑस्टियोपोरोसिस को एक दैहिक अस्थि रोग के रूप में परिभाषित करता है, जो कम अस्थि घनत्व, हड्डी के ऊतकों की सूक्ष्म संरचना बिगडऩे के द्वारा होता है। इसके परिणाम स्वरूप हड्डी की नाज़ुकता एवं अस्थि टूटने की सम्भावना बढ़ जाती है। रीड की हड्डी या कूल्हे पर हड्डी का घनत्व, जो सामान्य औसत संदर्भ आबादी में 2.5 मानक विचलन से कम या बराबर है; ऑस्टियोपोरोसिस का संकेत है।

इस बार विश्व ओस्टियोपोरोसिस दिवस के मौक़े पर पीजीआई चंडीगढ़ के एंडोक्राइनोलॉजी विभाग के नये ओपीडी कम्प्लेक्स में एक जागरूकता अभियान चलाया गया। विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर संजय भदादा ने बताया कि यहाँ पिछले एक वर्ष से महीने के हर पहले मंगलवार को ओस्टियोपोरोसिस एंड मेटाबॉलिक बोन डिजीज क्लीनिक चलाया जा रहा है। इसके अलावा एक ऑनलाइन ऑस्टियोपोरोसिस रजिस्ट्री ऑफ इंडिया भी चल रहा है, जिसमें इस रोग से पीडि़त 130 रोगियों का डाटा है। इनमें ज़्यादातर 93 फ़ीसदी महिलाएँ ऑस्टियोपोरोसिस से पीडि़त हैं। 20 फ़ीसदी लोगों की हड्डियाँ एक या एक अधिक जगह से टूटी थीं। 27 फ़ीसदी लोग एक साल में एक या इससे अधिक बार गिर चुके थे। डॉक्टर संजय भदादा का कहना है कि पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं और बड़ी उम्र के पुरुषों में हड्डी टूटने का एक बड़ा कारण ऑस्टियोपोरोसिस है। इस मौक़े पर डॉक्टर संजय, डॉक्टर कन्हैया अग्रवाल और डॉक्टर अनिल किशोर सिन्हा के संयुक्त प्रयासों से ‘ओस्टियोपोरोसिस : कारण एवं निवारण’ पुस्तिका का विमोचन भी किया गया। पुस्तिका में इस बीमारी के अलग-अलग पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है।

हड्डी का टूटना एक गम्भीर समस्या है, ख़ासकर यदि हड्डी कूल्हे की हो। डॉक्टरों का कहना है कि जिन लोगों की कूल्हे की हड्डी टूट जाती है, वे कभी-कभी ख़ुद चलने की क्षमता खो देते हैं। इनमें से कई लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। इसलिए कूल्हे की हड्डी को टूटने से बचाना बहुत महत्त्वपूर्ण है। क़रीब 20 फ़ीसदी लोगों की कूल्हे की हड्डी टूटने के एक साल के अन्दर ही मौत हो जाती है। लेकिन अब इसका उपचार उपलब्ध है, जो कि हड्डियों के घनत्व को (बीएमडी) को बनाये रखने या बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। विशेषज्ञ 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए डेक्सा परीक्षण यानी हड्डी सघनता परीक्षण की सलाह देते हैं। ऐसा इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि इस आयु वर्ग की महिलाओं में ओस्टियोपोरोसिस का ख़तरा सबसे अधिक होता है। रजोनिवृत्ति की शुरुआत के साथ हड्डी पुनर्निर्माण की दर बढ़ जाती है। पुनर्निर्माण असन्तुलन के प्रभाव को बढ़ाता है। हड्डी की व्यक्तिगत ट्रेबेकुलर प्लेट ख़त्म हो जाती हैं। इससे हड्डी की मात्रा काफ़ी कम हो जाती है और सूक्ष्म संरचनात्मक रूप से हड्डी का ढाँचा कमज़ोर हो जाता है। हड्डी पुनर्निर्माण की प्रक्रिया यानी रीमॉडलिंग में पुरानी हड्डी को हटाकर उसे नयी हड्डी से बदलकर एक जटिल सन्तुलन बनाये रखती है। जब यह सन्तुलन बिगड़ जाता है तो हड्डी का नुक़सान होता है। जिसके परिणाम स्वरूप हड्डियों का क्षरण प्रतिस्थापन की तुलना में अधिक होता है। यह असन्तुलन रजोनिवृत्ति और बढ़ती उम्र के साथ ज़्यादा होता है।

ज़्यादा टूटती हैं भारतीयों की हड्डियाँ

वर्ष 2009 में इंटरनेशनल ऑस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन के एशियन ऑडिट में विशेषज्ञ समूहों ने अनुमान लगाया था कि भारत में इस बीमारी के रोगियों की संख्या वर्ष 2003 में लगभग 2.5 करोड़ थी। वर्ष 2013 में पाँच करोड़ लोग या तो ओस्टियोपोरोटिक हैं या हड्डियों का घनत्व कम है। सिंगापुर में प्रवासी भारतीयों पर वर्ष 2001 में हुए अध्ययन से पता चला कि भारतीयों में प्रति लाख आबादी पर कूल्हे की हड्डी टूटने की आशंका ज़्यादा पायी गयी, जो कि क्रमश: महिलाओं और पुरुषों में 308 एवं 128 प्रति लाख थी। डॉक्टरों का कहना है कि भारतीयों में अपने उत्तरी अमेरिकी समकक्षों की तुलना में बीएमडी कम है। इस अन्तर का कारण आनुवंशिक, अस्थि का छोटा आकार होना और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण कुपोषण हो सकता है। अधिक मात्रा में धूप के बावजूद विटामिन डी की कमी भारत में काफ़ी है। यह त्वचा के कालेपन, कपड़ों के पहनने की आदतों और विटामिन डी की अनुपस्थिति जैसे कारकों के कारण हैं। भारतीय भोजन में कैल्शियम की मात्रा पश्चिमी देशों की तुलना में कम होती है।

महिलाओं में ख़तरा ज़्यादा

विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं की उम्र बढऩे के साथ ट्रैबेकुला ढीला होना शुरू हो जाता है। ट्रैबेकुले के बीच अन्तर अधिक होता रहता है। जबकि पुरुषों में बढ़ती उम्र के साथ ट्रैबेकुला केवल पतला होता है। कॉर्टिकल हड्डी का नुक़सान बाद में शुरू होता है। महिलाओं के जीवन-काल में हड्डियों के टूटने का ख़तरा 50 फ़ीसदी होता है, जबकि महिलाओं में कम (13-25 फ़ीसदी) होता है।

कैसे करें हड्डियों की देखभाल?

डॉक्टरों की राय में मीनोपॉज के पाँच वर्ष बाद सभी महिलाओं को कम से कम एक बार बोन डेंसिटी परीक्षण करवाने चाहिए। इन परीक्षण के परिणामों को टी और जेड स्कोर कहा जाता है। 50 वर्ष और इससे अधिक आयु वाले पुरुषों में और पोस्ट मीनोपॉजल महिलाओं में टी स्कोर अधिक महत्त्वपूर्ण है। अन्य लोगों में जेड।

डॉक्टरों का कहना है कि हड्डियों को टूटने का बचाव ही बेहतर इलाज है। यदि आप की हड्डी एक बार टूट जाए, तब वो कभी भी मूल अवस्था में नहीं पहुँच सकती। इसलिए ऑस्टियोपोरोसिस को रोकने के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में पौष्टिक आहार लेना, नियमित व्यायाम करना और धूम्रपान से बचना शामिल है। हड्डी को स्वस्थ रखने के लिए यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि आप को पर्याप्त प्रोटीन और कैलोरी के साथ-साथ कैल्शियम और विटामिन डी भी भरपूर मात्रा में मिले। कैल्शियम शरीर में हड्डियों को मज़बूत बनाये रखने के लिए बहुत ज़रूरी है और विटामिन डी शरीर में कैल्शियम को अवशोषित करने में मदद करता है। विटामिन डी की कमी तब होती है, जब आपके शरीर में पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी नहीं बनता है। दूध एवं दूध से बने सभी खाद्य पदार्थ कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं। बादाम सिर्फ़ दिमाग़ को तेज़ ही नहीं करते, बल्कि हड्डियों और दातों को भी मज़बूत बनाते हैं। मांसपेशियों को तंदुरुस्त रखते हैं। कीवी, नारियल, आम, जायफल, अनानास और सीताफल में भरपूर कैल्शियम होता है।

कैल्शियम, विटामिन की ज़रूरत

विशेषज्ञों के अनुसार प्रीमेनोपॉजल महिला और पुरुष को प्रतिदिन कम से कम 1000 मिलीग्राम कैल्शियम लेना चाहिए। पोस्टमेनोपॉजल महिलाओं को प्रतिदिन 1200 मिलीग्राम कैल्शियम के सेवन की आवश्यकता होती है। विटामिन डी की बात करें तो इन महिलाओं को 800 अंतरराष्ट्रीय विटामिन डी इकाइयों (20 माइक्रोग्राम) का सेवन करना चाहिए। विशेषज्ञ मानते हैं कि लोगों के शरीर में सूरज की रोशनी से विटामिन डी बनता है। चमड़ी सीधे धूप का उपभोग करके विटामिन डी बनाती है। 30 मिनट के लिए प्रतिदिन कम कपड़े के साथ खुली धूप में बैठना चाहिए। विटामिन डी का प्राथमिक आहार स्रोत दूध है।

अन्य खाद्य पदार्थ जैसे सन्तरे का रस, दही और अनाज में भी अतिरिक्त विटामिन डी होता है। हरी सब्ज़ियाँ, कश्मीरी हरा साग, ब्रोकली, मशरूम आदि में भी विटामिन डी पाया जाता है। अधिकांश विशेषज्ञ हर सप्ताह में 5 बार कम से कम 30 मिनट प्रतिदिन व्यायाम करने की सलाह देते हैं। इसके अलावा टहलना और चलना भी ज़रूरी है। व्यायाम प्री मेनोपजल महिलाओं में हड्डी के घनत्व में सुधार लाता है। मीनोपॉज की स्थिति से गुज़रने वाली महिलाओं में हड्डियों के घनत्व को बनाये रखता है, और टूटने के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

तंत्र-जाल के अपराध

हाल में केरल जैसे प्रगतिशील राज्य में बलि के नाम पर एक दम्पति द्वारा कथित तौर पर एक तांत्रिक के साथ मिलकर दो महिलाओं की हत्या वाली ख़बर ने एक बार फिर याद दिला दिया कि विकास के बड़े-बड़े दावों के बावजूद अभी भी इस समाज में तंत्र-मंत्र, जादू-टोना जैसी तांत्रिक क्रियाएँ अपनी जगह बनाये हुए हैं। क्या इस वैज्ञानिक युग में सोच सकते हैं कि कोई इंसान किसी दूसरे इंसान की बलि दे सकता है? पुलिस का कहना है कि इस मामले में जिन तीन आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया है, उन्होंने इन महिलाओं की हत्या जादू-टोना के लिए तंत्र क्रियाओं के तहत की। आरोपियों को भरोसा था कि यदि वे मानव बलि देंगे, तो उनकी आर्थिक हालत बहुत अच्छी हो जाएगी। केरल की रोजलिन और पद्मा नामक दोनों महिलाएँ, जिनकी बलि दी गयी; लॉटरी बेचने का काम करती थीं। दोनों ही इसी साल जून और सितंबर माह में लापता हुई थीं। पुलिस ने जब उनके लापता होने की जाँच शुरू की, तो पता चला कि इन दोनों का अपहरण करने के बाद उनकी मानव बलि दी गयी।

बहरहाल इस ख़बर ने केरल की सत्ताधारी वामपंथी सरकार पर भी सवालिया निशान लगा दिये हैं। वहाँ ऐसी अंधविश्वासी प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए और इस सन्दर्भ में मौज़ूदा क़ानूनों के कड़ाई से अमल करने की माँग उठी है। सीपीएम पार्टी के सदस्यों ने इस घटना पर शोक व्यक्त किया और कहा कि पार्टी मानव की आत्मा को झकझरोने वाली इस घटना की निंदा करती है।’

मौज़ूदा क़ानूनों के कड़ाई से अमल करने के अलावा यदि ज़रूरी हुआ, तो एक नये क़ानून पर भी विचार किया जा सकता है। ग़ौरतलब है कि देश में अंधविश्वास, काला जादू, जादू-टोना या मानव बलि से निपटने के लिए कोई केंद्रीय क़ानून नहीं है। काला जादू के नाम पर किसी भी नागरिक के प्रति किया गया अपराध उसके मूल अधिकार का उल्लघंन है और संविधान के अनुच्छेद-14,15 और 21 का उल्लघंन करता है।

दरअसल देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर मानव बलि की ख़बरें, जादू-टोना से जुड़ी ख़बरें पढऩे सुनने को मिलती रहती हैं। बीते दिनों गुज़रात के जूनागढ़ में एक पिता पर 14 साल की बेटी की हत्या का आरोप लगा और पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया है। पिता पर धन और पुत्र प्राप्ति की लालसा में बेटी को बलि देने का सन्देह है। दो साल पहले कानपुर की छ: साल की एक बच्ची भी मानव बलि का शिकार बन गयी। कानपुर के एक दम्पति की ख़ुद की सन्तान नहीं थी। पति-पत्नी दोनों दु:खी रहते थे, उन्हें किसी तांत्रिक ने बच्चे होने का यह उपाय बताया कि वह किसी मानव की बलि देंगे, तो सन्तान प्राप्ति होगी। दम्पति ने इस अंधविश्वास के फेर में गाँव से एक छ: साल की बच्ची का अपहरण करवाया और फिर उसकी बलि दे दी। इसी तरह विदिशा (बिहार) में एक नव-विवाहित पति-पत्नी के आपसी झगड़े का फायदा उठाते हुए एक तांत्रिक ने झाड़-फूँक के नाम पर महिला से दुष्कर्म कर दिया। महिलाओं से तांत्रिकों द्वारा दुष्कर्म के ऐसे मामले हर महीने कहीं-न-कहीं सुनने, पढऩे को मिलते हैं।

दरअसल धर्म, आस्था, तर्क इंसान को गढऩे में कितना योगदान देते हैं। इस पर मतभिन्नता हो सकती है; लेकिन अंधविश्वास, जादू-टोना, काला जादू की इस वैज्ञानिक युग में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। मानव की विकास यात्रा से भी यही सन्देश मिलता है। लेकिन कई कट्टरवादी आज भी अंधविश्वास, जादू-टोने में आस्था वाली अवधारणा को कमज़ोर होते नहीं देखना चाहते और इसके ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वालों को अपना घोर दुश्मन मानने लगते हैं। वे अंधविश्वास के ख़िलाफ़ सोचने वाली मानसिकता को नास्तिकता से जोडक़र देखने के आदी हो गये हैं। इसमें कोई दो-राय नहीं कि धर्म, आस्था एक निजी मामला है; लेकिन मानव बलि का धर्म व आस्था में कोई स्थान नहीं। अंधविश्वासी लोगों का ख़ेमा वैज्ञानिकों व तर्कवादियों को समय-समय पर अपने तरीकों से चुनौती देने का दुस्साहस करता रहता है। सन्दर्भवश ज़िक्र किया जा रहा है- डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का। पुणे के 71 वर्षीय डॉ. नरेंद्र दाभोलकर प्रसिद्ध तर्कवादी थे और अंधविश्वास के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे थे। और काला जादू जैसे तंत्र-मंत्र को एक क़ानून के तहत प्रतिबन्धित करने के मक़सद से कई वर्षों से महाराष्ट्र सरकार पर दबाव बना रहे थे। वह महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक व अध्यक्ष थे।

20 अगस्त, 2013 को उनकी हत्या कर दी गयी। उनकी हत्या के बाद देश भर में उमड़े रोश के मद्देनज़र महाराष्ट्र सरकार ने काला जादू, अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के निर्मूलन के लिए लम्बे समय से लम्बित विधेयक को एक अध्यादेश की शक्ल में लाने का ऐलान कर दिया था। यह एक सामाजिक बुराई है और इसकी ज़द में अधिकतर महिलाओं व बच्चों को निशाना बनाया जाता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड शाखा की सन् 2021 रिपोर्ट के देश में जादू-टोना के 68 मामले दर्ज किये गये। सबसे अधिक छत्तीसगढ़ में 20 मामले व उसके बाद मध्य प्रदेश में 18 दर्ज किये गये। महिलाओं को डायन, चुडै़ल, टोनही कहकर समाज में बदनाम करने की परम्परा बहुत पुरानी है। ऐसी महिलाएँ जो अकेली होती हैं, विधवा होती हैं; उन्हें समाज का बहुत बड़ा तबक़ा कमज़ोर महिला के तौर पर आँकता है और कई मर्तबा उनकी जायदाद पर क़ब्ज़ा करने के लिए उनके ख़िलाफ़ साज़िश रचता है। कुछ लोग उनकी छवि को बुरी आत्मा के तौर पर प्रचारित करके बहुत कुछ हासिल करने के चक्कर में लगे रहते हैं। गाँव, दूर-दराज़ इलाक़ों व शहरों की भी कुछ बस्तियों में भी अगर कोई लम्बे समय तक बीमार रहता है, तो उसके इलाज के लिए अभिभावक, रिश्तेदार अंधविश्वास का सहारा लेते हैं। तांत्रिकों के पास जाते हैं और जादू-टोना को असली सच स्वीकार कर लेते हैं। महिलाओं, बच्चों को इससे संरक्षण प्रदान करने व इस धंधे में शामिल लोगों को दण्डित करने की मंशा से देश के कई राज्यों ने इसके ख़िलाफ़ क़ानून भी बनाये हैं। मसलन बिहार ऐसा पहला राज्य है, जिसने यह क़ानून बनाकर दूसरे राज्यों के सामने एक मिसाल क़ायम की।

सन् 1999 में बिहार राज्य में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम-1999 क़ानून लागू किया गया। यह अधिनियम कहता है कि इसकी मंशा जादू-टोने की प्रथाओं को रोकने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाना है। इसके तहत कोई भी व्यक्ति किसी भी महिला की डायन के रूप में पहचान करता है, उसे दण्डित करना और जैसा कि ऐसी घटनाएँ अधिकतर आदिवासी इलाक़ों में व राज्य के दूसरे इलाक़ों में होती हैं और समाज के द्वारा महिलाओं को दी जाने वाली यातनाओं व हत्याओं को ख़त्म करना है। इसके तहत डायन ऐसी महिला के लिए पारिभाषित किया गया है, जिसके बारे में समाज की राय थी कि उस महिला के पास दूसरों को नुक़सान पहुँचाने वाली शक्तियाँ हैं और वह काला जादू, बुरी नज़र या मंत्र के ज़रिये दूसरों को हानि पहुँचा सकती है। जो महिलाओं को डायन के तौर पर प्रचारित करते हैं, उनके लिए इस अधिनियम में जेल की अवधि तीन महीने की है और 1,000 रुपये का आर्थिक दण्ड का प्रावधान भी किया गया है।

बिहार की तर्ज पर सन् 2001 में झारखण्ड राज्य डायन प्रथा प्रतिषेध क़ानून लागू किया। छत्तीसगढ़ ने 2002 में टोनही प्रताडऩा निवारण अधिनियम लागू किया। इस राज्य में डायन को टोनही कहा जाता है। किसी की भी टोनही के रूप में पहचान करने चाले इंसान की सज़ा की अवधि बढ़ाकर तीन साल की जा सकती है। इसके अलावा प्रताडऩा करने की सूरत में कठिन सज़ा की अवधि पाँच साल है। इसके साथ ही तंत्र-मंत्र से किसी का इलाज करना व पशुओं को नुक़सान पहुँचाने वाले कामों को भी दण्डनीय माना गया है। राजस्थान, असम, ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र में भी ऐसे क़ानून लागू है। राजस्थान के ऐसे क़ानून के तहत अपराधी के लिए न्यूनतम सज़ा तीन साल व अधिकतम सात साल या 50,000 रुपये का आर्थिक दण्ड का प्रावधान है।

कुछ राज्यों ने जब ये क़ानून बनाये, तो राजनीतिक विरोधी दलों व कुछ धार्मिक संगठनों ने इसका विरोध किया। आलोचकों ने इसे धार्मिक आज़ादी में सरकारी दख़लंदाज़ी बताया। अर्थात् इस सामाजिक बुराई में भी सियासत अपना रंग दिखाने से बाज़ नहीं आता। जहाँ तक ध्यान देने वाली बात यह है कि केंद्रीय स्तर पर अभी कोई क़ानून पारित नहीं हुआ है। सन् 2016 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से तत्कालीन सांसद राघव लखन पाल ने द प्रिवेंशन ऑफ विच हंटिंग बिल-2016 को लोकसभा में पेश किया था। इसमें एक महिला को समाज डायन क्यों मानता है? उन कारणों के साथ ही पुनर्वास और सरकार के द्वारा चलाये जाने वाले जागरूकता कार्यक्रमों का ज़िक्र किया गया था। लेकिन इस बिल पर चर्चा करने के लिए आज तक कोई विचार नहीं किया गया।

बदनाम होता योगीराज

अपने कड़े निर्णयों के लिए प्रसिद्ध उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार दो के शासन-काल में अब लोगों में उनके प्रति वो सम्मान नहीं दिख रहा है, तो उन्होंने पिछले शासन-काल में प्राप्त किया था। इसमें सम्भवत: कोई मतभेद नहीं होगा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का उनके साधु होने के नाते प्रदेश भर के लोग उनका विकट सम्मान करते हैं, मगर एक मुख्यमंत्री होने के नाते अब उनकी छवि पहली बार के शासन-काल की तरह लोगों के मन में नहीं रही।

भौजीपुरा निवासी रामपाल कहते हैं कि ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके ही मंत्री और अधिकारी गुमराह कर रहे हैं। अन्यथा एक सन्त आदमी किसी का बुरा क्यों करेगा? भौजीपुरा के ही बलवीर कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ को जब अपने ही प्रदेश के लोगों का दु:ख नहीं दिखायी देता है, तो वो उनकी समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे। उन्हें तो हर ज़िले का महीने में एक बार दौरा करना चाहिए और वहाँ के लोगों से उनकी समस्याएँ जाननी चाहिए, ताकि उनका समय पर समाधान हो सके। विकास योजनाएँ आती हैं, मगर अधिकारियों तथा ग्राम प्रधानों के बीच ही उनमें पलीता लग जाता है। लोगों तक पाँच किलोग्राम राशन अवश्य पहुँच रहा है, मगर सुना है कि उसमें भी बटा लग रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की निंदा तथा प्रशंसा करने वालों की प्रदेश में कमी नहीं है, मगर उनके कुछ कामों की समीक्षा होनी आवश्यक है।

प्रशंसनीय कार्य

सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उन कार्यों की चर्चा की जाए, जो प्रशंसनीय हैं। इन कार्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों के जीर्णोद्धार का कार्य है, जो अभी होना है। हालाँकि सरकारी लोग बताते हैं कि कुछ तालाबों का जीर्णोद्धार हो चुका है तथा शीघ्र ही पूरे प्रदेश के सभी गाँवों में तालाबों का जीर्णोद्धार हो जाएगा, ताकि वर्षा जल संचयन के अतिरिक्त गिरते भूजल स्तर में सुधार हो सके। हर गाँव में सरकारी टंकियों पर भी कार्य हो रहा है, जिनसे नगरों एवं महानगरों की तरह ही पीने योग्य पानी टंकी के माध्यम से हर घर तक पहुँचाया जाएगा। कुछ गाँवों में ग्रामीणों को पीने योग्य पानी देने के लिए फिल्टर लगाये गये हैं, मगर जनसंख्या के अनुसार इनकी क्षमता अभी बहुत कम है। पाँच किलो राशन वाली योजना भी प्रशंसा के योग्य है। ग्रामीण और नगरीय विकास की अनेक योजनाएँ इसी प्रकार उत्तर प्रदेश विधानसभा में योगी आदित्यनाथ सरकार दो में पास हुई हैं। मगर प्रश्न यही है कि इन योजनाओं में से कितनी योजनाएँ सही रूप से लोगों तक पहुँचेंगी।

बढ़ रहे दुष्कर्म तथा अपराध

उत्तर प्रदेश कई दशक से अपराधों के लिए बदनाम है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन्हें रोकने में नाकाम रहे हैं, इतना ही सत्य नहीं है। सत्य यह है कि उनके शासन-काल में दुश्कर्मों और अपराधों में बढ़ोतरी हुई है। जबकि मुख्यमंत्री तथा उनके मंत्री सदैव दावा करते रहे हैं कि योगीराज में अपराध घटे हैं। योगीराज ही रामराज्य है। मगर सत्य यह है कि योगीराज में हर दूसरे-तीसरे दिन समाचार पत्रों में सामूहिक दुष्कर्म अथवा दुष्कर्म की घटनाएँ प्रकाशित होती हैं। अपराध की दर्ज़नों घटनाएँ हर दिन समाचार पत्रों में प्रकाशित होती हैं। अचंभा तो तब होता है, जब इन्हीं समाचार पत्रों के माध्यम से पता चलता है कि कहीं-कहीं पुलिस भी लोगों के साथ अपराधियों की तरह व्यवहार करती है। सामूहिक दुष्कर्म, दुष्कर्म, अन्य प्रकार के अपराधों पर योगी आदित्यनाथ को प्रदेश का मुख्यमंत्री होने के नाते रोक लगानी चाहिए तथा पुलिस को स$ख्त आदेश देना चाहिए कि अगर उनके थाना क्षेत्र में कोई अपराध हुआ, तो पूरा का पूरा थाना निलंबित कर दिया जाएगा। तय है कि ऐसा आदेश जारी होने से अपराधों में विकट कमी आएगी।

टूटी सडक़ें

उत्तर प्रदेश के विकास के पोस्टर हर एक-दो किलोमीटर पर लगे दिख जाते हैं। मगर प्रदेश के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सडक़ों की दशा कई वर्षों से दुर्दशापूर्ण है, जिससे दुर्घटनाओं की सम्भावना सदैव बनी रहती है। प्रदेश में ग्रामीण क्षेत्रों की सडक़ों में तो इतने बड़े-बड़े तथा गहरे-गहरे गड्ढे हैं कि वाहनों के छतिग्रस्त होने के अतिरिक्त राहगीरों की दुर्दशा हो जाती है। धूल फाँकती टूटी-फूटी सडक़ें कई वर्षों से अपनी मरम्मत की बारी की वाट जो रही हैं। ग्रामीणों से इस बारे में बात करो, तो अधिकतर लोग डर के मारे कुछ भी बोलने को तैयार नहीं होते। एक भाजपा कार्यकर्ता ने प्रकाशित न करने की विनती करते हुए कहा कि जो विधायक और मंत्री बन चुके हैं, वे अब अपने क्षेत्रों में काम नहीं कराना चाहते हैं। जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की ओर से पहले शासन-काल में भी सडक़ों के निर्माण एवं मरम्मत के लिए पैसा पास हुआ था तथा अब भी पैसा विधायक एवं प्रधान निधि के रूप में आ रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ग्रामीण विकास के लिए पर्याप्त पैसा जारी करते हैं, मगर जो लोग काम कराने वाले हैं, वो उस पैसे को या तो दबाकर बैठे हैं या फिर उसे पचाने में लगे हैं।

बिजली कटौती तथा अधिक बिल

योगी आदित्यनाथ सरकार में अगर सबसे अधिक परेशान कोई करता है, तो वो है बिजली। नगरों में 24 घंटे के अन्दर चार-पाँच से लेकर आठ-आठ कट तक लगते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में तो 24 घंटे में बिजली ही छ: से आठ घंटे ही रहती है। उसमें भी कई-कई कट तक लग जाते हैं। इसके अतिरिक्त बिजली महँगी बहुत है। कई लोगों के तो बिल ही इतने आते हैं कि उन्हें अपने अधिक बिलों को सही कराने के लिए बिजली विभाग के चक्कर लगाने के अतिरिक्त रिश्वत तक देनी पड़ती है। ग्रामीण लोगों के पास पैसा इतना नहीं होता कि वो महँगी बिजली का बिल भर सकें, सो अनेक ग्रामीणों ने अपने बिजली कनेक्शन ही कटवा रखे हैं। वहीं बिजली मीटर भी लोग डर से नहीं लगवा रहे हैं। जबकि योगी आदित्यनाथ सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में भी बिजली के मीटर लगवाने के कई प्रयास कर चुकी है।

अस्पतालों की दुर्दशा

उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं है। हाल ही में डेंगू के एक रोगी को प्लेटलेट्स की जगह मौसमी का जूस चढ़ाने से उसकी मृत्यु की बात भी सामने आई थी। हालाँकि अब कहा जा रहा है कि रोगी को प्लेटलेट्स ही चढ़ायी गयी थी; लेकिन रोगी गम्भीर हालत में था, इसलिए उसकी मृत्यु हो गयी। हालाँकि इस मामले को अगर छोड़ दें, तो भी योगी राज में अस्पतालों के कई मामले ऐसे सामने आ चुके हैं, जिनमें एक ही अस्पताल में दर्ज़नों रोगियों की मौत हुई है।

बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए कुछ अस्पताल कई बार मौत के अस्पताल बने हैं। इसके बाद भी योगी सरकार ने अस्पतालों की नाकामी पर पर्दा डालने के अतिरिक्त कोई बड़ा क़दम स्वास्थ्य सुविधाएँ सुधारने में नहीं उठाया। अब तक देखा गया है कि अगर कोई महामारी फैल जाए, तो किसी भी अस्पताल में उसके रोगियों की चिकित्सा की व्यवस्था नहीं होती है। सामान्य दिनों में भी प्रदेश के अस्पतालों की दशा यह रहती है कि कई रोगियों को एक ही बेड पर रखने के लिए डॉक्टर मजबूर होते हैं।

कम नहीं हो सका भ्रष्टाचार

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ईमानदार माना जाता है तथा भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध माना जाता है, मगर उनकी इस ईमानदारी का कोई भी असर होता प्रदेश में नहीं दिखता। आज ग्राम पंचायत से लेकर तहसील तथा जनपद स्तर तक कोई भी काम सम्भवत: ही ऐसा होगा, जिसे प्रदेशवासी बिना रिश्वत दिये करा लेते हों। प्रधानों से लेकर पटवारी तक से ग्रामीणों के काम अधिक पड़ते हैं, मगर उनके काम कितनी ईमानदारी से होते हैं, इसकी जाँच प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक बार तो अवश्य करानी चाहिए।

टैबलेट से वंचित अनेक छात्राएँ

योगी आदित्यनाथ सरकार ने प्रदेश की 12वीं तथा स्नातक पास करने वाली छात्राओं को टैबलेट देने का वादा किया था। मगर अभी तक सभी छात्राओं को टैबलेट नहीं मिले हैं। इस बारे में एक अध्यापक ने अपना नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए बताया कि टैबलेट वाँटने में बड़ा घोटाला हुआ है। कुछ घोटाले विद्यालय स्तर पर हुआ है, तो कुछ घोटाला अधिकारियों के स्तर पर हुआ है। अगर इस मामले में योगी सरकार जाँच कराए, तो कई परते घोटाले की खुलेंगी। वहीं एक अध्यापक से जब अनेक छात्राओं को टैबलेट न मिलने का प्रश्न किया, तो उन्होंने कहा कि जितने टैबलेट आये थे, वो वाँट दिये गये हैं, जैसे ही और टैबलेट आएँगे, वाँट दिये जाएँगे। इसका अर्थ यह हुआ कि योगी सरकार ने उतने टैबलेट विद्यालयों एवं महाविद्यालयों को उपलब्ध नहीं कराये, जितनों की आवश्यकता है।

किसानों का हनन

उत्तर प्रदेश में ट्रैक्टर-ट्राली में परिवार के सदस्यों अथवा श्रमिकों को बैठाकर ले जाने पर 10,000 रुपये का चालान काटा जाता है। इसके अतिरिक्त किसानों के गन्ने का भुगतान भी समय पर नहीं मिलता है। $फसलों के नुक़सान की भरपाई भी सरकार नहीं करती, जबकि आवारा पशुओं को रोकने के लिए अगर कोई किसान अपने खेत के चारों ओर कंटीले तार लगाता है, तो उसे दण्डित किये जाने का आदेश है। इसी प्रकार अगर कोई किसान अपने खेत में खरपतवार जलाता है, तो भी उसे दण्डित किया जाता है। किसानों को गेहूँ-धान का भाव भी ठीक नहीं मिलता। गन्ने का भाव लागत बढऩे के बाद भी नहीं बढ़ रहा है।

प्रदेश में इन अव्यवस्थाओं के सुधार के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को विचार करना चाहिए, जिससे प्रदेश में वो खुशहाली आ सके, जो कि रामराज्य में होती थी तथा जिसकी बात मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यदा-कदा करते रहते हैं।

चुनाव से पहले गुरमीत को पैरोल के मायने

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की पैरोल फिर सुर्ख़ियों में रही। डेरा प्रमुख दुष्कर्म और हत्या के जुर्म में 20 साल की सज़ा काटने के लिए हरियाणा के ज़िला रोहतक की सुनारिया जेल में था। पैरोल किसी भी बंदी का अधिकार नहीं कि वह उसे क़ानूनन हासिल कर सके; लेकिन जेल मैन्यूअल में इसका प्रावधान है और राज्य सरकार इसकी आड़ में सुविधा दे रही है। जेल मंत्री रणजीत सिंह कहते हैं कि जेल मैन्यूअल में क़ैदी के लिए पैरोल का प्रावधान है। जघन्य अपराधी यह सुविधा लेते रहे हैं और मीडिया में इसकी चर्चा भी नहीं होती। चूँकि डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के लाखों अनुयायी हैं, इसलिए वह चर्चा में आ जाते हैं।

सवाल पैरोल से ज़्यादा उसके समय पर उठते हैं, और यह लाजिमी भी है। यह निंदनीय है और इसके लिए राज्य सरकार की आलोचना होना स्वाभाविक भी है। राम रहीम की तीन पैरोल का समय चुनाव का रहा है। इसे संयोग नहीं, बल्कि डेरा समर्थकों के एकमुश्त वोट हासिल करना कहा जाएगा।

पंजाब के मालवा क्षेत्र, हरियाणा के सिरसा, हिसार, फ़तेहाबाद, कुरुक्षेत्र, कैथल और पंचकूला ज़िलों के अलावा हिमाचल के कुछ हिस्से में डेरा सच्चा सौदा के लाखों अनुयायी हैं और डेरा प्रमुख के अपरोक्ष इशारे पर वे मतदान करते रहे हैं। समर्थक मतदाता दर्ज़नों सीटों पर नतीजों में उलटफेर कर सकते हैं। अब प्रभाव पहले जैसा तो नहीं; लेकिन असरकारक अब भी है। हालाँकि कभी किसी पार्टी या व्यक्ति विशेष के पक्ष में मतदान करने की डेरे की ओर से कभी घोषणा नहीं हुई; लेकिन समर्थकों के लिए वहाँ से इशारा ही काफ़ी होता है।

राम रहीम की पैरोल के तीन मौक़े ऐसे आये, जब उस अवधि में चुनाव हुए। पहला उदाहरण, वर्ष 2021 में 7 फरवरी से 27 फरवरी तक राम रहीम को फरलो मिली। फरवरी की इसी समय अवधि के दौरान पंजाब में विधानसभा चुनाव तय थे। फरलो की समय सीमा पर हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार की आलोचना हुई; लेकिन जेल मैन्यूअल का हवाला देकर इसे सामान्य बताया गया। जून 2022 में राम रहीम को 30 दिन की पैरोल मिली, उसी समय अवधि के दौरान हरियाणा में स्थानीय निकाय चुनाव तय थे।

तीसरी बार 14 अक्टूबर, 2022 को 40 दिन की पैरोल मिली, तो राज्य में पंचायत और आदमपुर उप चुनाव तय हैं। मतलब स्पष्ट है कि हरियाणा सरकार डेरा प्रमुख पर मेहरबान है; लेकिन यह परम्परा समाज में ग़लत सन्देश देती है। जघन्य अपराध के दोषियों को पैरोल इतनी आसानी से नहीं मिलतीं, जितनी कि डेरा प्रमुख को मिल रही हैं। जेल मैन्यूअल के मुताबिक, पैरोल सज़ायाफ़्ता क़ैदी को वर्ष में 90 दिन तक मिल सकती है। जितने दिन क़ैदी पैरोल पर रहेगा, उतने दिन बाद में उसकी सज़ा में जुड़ जाएँगे। पैरोल सज़ा अवधि में किसी तरह की छूट नहीं है, बावजूद इसके डेरा प्रमुख बार-बार पैरोल क्यों ले रहे हैं?

यह सुविधा वे अपना मर्ज़ी से ले रहे हैं या उन्हें इसके लिए तैयार किया जाता है। इसमें जबरदस्ती की बात नहीं है, क़ैदी की कहीं-न-कहीं सहमति होती ही है। हर क़ैदी पैरोल चाहता है; लेकिन जघन्य अपराध श्रेणी के दोषियों को सम्बन्धित गृह विभाग बड़ी मुश्किल से इसकी मंज़ूरी देता है। डेरा प्रमुख भी इसी श्रेणी में आते हैं। जेल से बाहर उनके लिए जेड प्लस सुरक्षा का प्रावधान है। इसे लेकर बहुत तामझाम करने पड़ते हैं।

डेरा प्रमुख के ख़िलाफ़ पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत में इसी उनका पक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये सुना जाता रहा है। क़ानून व्यवस्था का मुद्दा तो वही है, अब भी लाखों अनुयायी हैं उनके। इसके बावजूद यह मुद्दा गौण हो गया है। क़ानून व्यवस्था का मुद्दा उनकी पैरोल में कमोबेश कभी ज़्यादा आड़े नहीं आया। सरकारें चाहें तो सब प्रबन्ध कर लेती हैं, बशर्ते वह उनके अनुकूल हो।

पंजाब में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी (एसजीपीसी) और कई सिख संगठन पैरोल का जबरदस्त विरोध करते रहे हैं। उनकी राय में सज़ा पूरी कर चुके सिख क़ैदियों की रिहाई के बारे में कुछ नहीं किया जा रहा, जबकि जघन्य अपराध के दोषी डेरा प्रमुख को बराबर पैरोल या फरलो पर जेल से कुछ समय के लिए आज़ादी दी जा रही है। एसजीपीसी प्रधान हरजिंदर सिंह धामी की राय में हरियाणा सरकार डेरा प्रमुख पर कुछ ज़्यादा ही मेहरबान है।

सब इसकी वजह भी जानते हैं; लेकिन सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि डेरा प्रमुख पर गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी और मोड़ मंडी (पंजाब) बम धमाके की साज़िश के आरोप हैं। डेरा प्रमुख के जेल से बाहर आने के बाद पंजाब में इसके विस्तार की बातें होने लगती है, जिससे राज्य की शान्ति भंग होने की आशंका है।

डेरा प्रमुख 40 दिनों की पैरोल अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश के ज़िला बाग़पत के बरनावा के डेरे पर रहेंगे। वह ऑनलाइन प्रवचन कर रहे हैं, लोग उनसे जुड़ रहे हैं। वह इशारों की इशारों में संकेत दे रहे हैं। ऐसे ही ही एक ऑनलाइन प्रवचन में उनका यह कहना कि ज़िम्मेदार जैसा आपको कहेंगे, उनके अनुसार आप लोगों को चलना है। इसे हरियाणा के आदमपुर विधानसभा उप चुनाव और पंचायत चुनाव से जोडक़र देखा जा रहा है। किसी पार्टी विशेष को ऐसे इशारों के आधार पर कितनी सफलता मिलती है? यह तो नतीजों से स्पष्ट होगा।

लेकिन इससे फ़ायदा ही होगा नुक़सान नहीं। इस डेरे की परम्परा रही है कि मतदान से कुछ समय पहले संकेत जाता है और किसी को कुछ भनक नहीं लगती और एकमुश्त मतदान होता है। पंजाब में कभी कांग्रेस इसका बख़ूबी इस्तेमाल कर चुकी है। पंजाब और हरियाणा में ज़्यादातर राष्ट्रीय पार्टियों के नेता डेरा प्रमुख से  दुष्कर्म के आरोप में सज़ा मिलने से दण्डवत् होकर आशीर्वाद लेते रहे हैं। तब तक लगभग ठीक था; लेकिन अब स्थितियाँ बदल चुकी हैं। अब वह दुष्कर्म और हत्या के दोषी साबित हो चुके हैं। अब खुले में सत्संग नहीं होगा, तो फिर आशीर्वाद के लिए ऑनलाइन की सुविधा है। कुछ नेता इसका लाभ उठा रहे हैं और इसके लिए आलोचना भी झेल रहे हैं।

हरियाणा विधानसभा के उपाध्यक्ष और नलवा से भाजपा विधायक रणबीर सिंह गंगवा भी हैं। विधानसभा चुनाव में उनकी जीत में डेरा समर्थकों की क्या भूमिका रही है, वह अब सार्वजनिक हो चुकी है। सन्त या महात्मा का अनुयायी होना कोई ग़लत नहीं; लेकिन विधानसभा उपाध्यक्ष होने के नाते यह उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है। विधानसभा उपा्ध्यक्ष ही नहीं करनाल की मेयर रेणु बाला, सीनियर डिप्टी मेयर राजेश और डिप्टी मेयर नवीन कुमार, हिसार मेयर की पत्नी भी डेरा प्रमुख के ऑनलाइन प्रवचन से जुड़ चुके हैं। इसकी वजह राजनीतिक न बता सामाजिक कार्यों में डेरे की भूमिका बतायी जाती है। रक्तदान, सामूहिक विवाह, स्वच्छता अभियान और भी कई में डेरे की भूमिका रही है।

सिरसा में तो डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख मुख्यालय है ही, क़रीब पाँच ज़िलों में डेरा समर्थकों की अच्छी-ख़ासी तादाद अब भी है। दुष्कर्म और हत्या मामले में दोषी साबित होने के बाद डेरा प्रमुख की आमजन में धूमिल हुई। डेरे का वह रुतबा अब नहीं रह गया है; लेकिन समर्थकों में फिर से जोश भर रहा है और यही डेरा प्रमुख की सोच भी है।

किसी को जेल से कुछ समय के लिए आज़ादी चाहिए और किसी को अपरोक्ष तौर पर समर्थन। कह सकते हैं कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। ऐसे में स्थितियाँ अनुकूल ही साबित होती है। पैरोल चूँकि वर्ष में ज़्यादा-से-ज़्यादा 90 दिन (लगभग तीन माह) के प्रावधान के तहत भविष्य में यह दरवाज़ा खुला ही रहेगा। हरियाणा, पंजाब या हिमाचल में किसी भी राजनीतिक दल के नेता की आधिकारिक प्रतिक्रिया आलोचना के तौर पर सामने नहीं आएगी। सवाल वही पैरोल से ज़्यादा उसके समय का कि आख़िर चुनाव से पहले ही पैरोल की नीति अमल में क्यों आती है?

पैरोल भी, फरलो भी

जघन्य अपराध श्रेणी में दोषी को पैरोल बहुत मुश्किल से दी जाती है। कई मामलों में ऐसे बहुत-से दोषियों को सज़ा पूरी होने तक एक बार भी यह सुविधा नहीं मिल पाती है। जब सबन्धित राज्य सरकार से यह सुविधा नहीं मिलती, तो न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है। न्यायालय पैरोल का आदेश दे सकता है या इनकार भी कर सकता है। चाहे तो कस्टडी रिमांड भी दे सकता है। जिसमें कुछ घंटों के लिए पुलिस की मौज़ूदगी में क़ैदी अपनी भूमिका अदा कर सकता है। फरलो क़ैदी के अधिकार में आता है। यह सुविधा पाँच साल से ज़्यादा सज़ा पाने वालों के लिए है। यह अवधि एक साल में अधिकतम एक माह की होती है। इसकी प्रक्रिया पैरोल से जटिल है। डेरा प्रमुख इस सुविधा को हासिल कर चुके हैं।

इस्तेमाल नहीं हुए गांगुली

सौरव गांगुली क्रिकेट के कई क़िरदारों में दिखे हैं। क्रिकेट के मैदान से बाहर की राजनीति में भी वह कभी कमज़ोर नहीं रहे और यह उनके क्रिकेट एसोसिएशन आफ बंगाल (कैब) से लेकर बीसीसीआई तक की कमान सँभालने से ज़ाहिर हो जाता है। भारतीय टीम के कप्तान बने, तो ठसके से कप्तानी की। मर्ज़ी की टीम बनायी और उसे शिखर तक ले गये। उनकी कप्तानी में ही भारतीय क्रिकेट के कई और मज़बूत क़िरदार सामने आये- युवराज सिंह, ज़हीर ख़ान, हरभजन सिंह, वीरेंद्र सहवाग और एमएस धोनी।

सौरव तब कप्तान बने थे, जब स्पॉट फिक्सिंग में फँसी भारतीय क्रिकेट संकट में दिख रही थी। सौरव न सिर्फ़ उसे इससे बाहर निकाल लाए, बल्कि उन्होंने अपने नेतृत्व में एक ऐसी टीम खड़ी की, जिसके तेवर ही अलग थे और जो जीत के लिए मैदान में विरोधी के सामने हौसले से खड़ी दिखती थी। यही गांगुली अक्टूबर के तीसरे हफ्ते भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड (बीसीसीआई) से कुछ बेआबरू करके बाहर कर दिये गये। कहते हैं कि उन पर भाजपा में शामिल होने का दबाव था, जिसे सौरव ने नहीं माना।

क़िरदारों की यह कहानी काफ़ी दिलचस्प है। सौरव को क्रिकेट की दुनिया में दादा और बंगाल टाइगर के नाम से जाना जाता है। बहादुर फ़ैसले करना सौरव के ख़ून में है।

बीसीसीआई से बाहर होने के बाद भी उनकी टिपण्णी ग़ौर करने लायक है, जिसमें उन्होंने कहा- ‘मैं एक प्रशासक रहा हूँ और मैं किसी और चीज़ पर आगे बढ़ूँगा। आप हमेशा के लिए खिलाड़ी नहीं हो सकते, आप हमेशा के लिए प्रशासक नहीं हो सकते। दोनों काम करके बहुत अच्छा लगा।’

सौरव आईसीसी के अध्यक्ष बनना चाहते थे। वह इसके क़ाबिल भी थे। लेकिन यह माना जाता है कि भाजपा में कुछ ताक़तवर लोगों ने उनकी यह राह भी रोक ली। भाजपा सौरव को साथ लाना चाहती थी, यह चर्चा तब और पुख़्ता हुई थी, जब गृह मंत्री अमित शाह कुछ महीने पहले बंगाल में उनके घर तशरीफ़ ले गये थे। बता दें कि अंमित शाह के बेटे जय शाह बीसीसीआई में लगातार दूसरी बार सचिव के पद पर बरक़रार हैं।

भाजपा बंगाल में ममता बनर्जी जैसी ताक़तवर नेता के ख़िलाफ़ किसी बड़े और लोकप्रिय चेहरे की तलाश में है; क्योंकि उसे वहाँ मनमाफ़िक़ राजनीतिक सफलता नहीं मिली है। भाजपा को सौरव अपनी इस ज़रूरत में फिट बैठते दिखे; लेकिन ख़ुद सौरव शायद राजनीति में नहीं जाना चाहते। सवाल यह है कि क्या भाजपा इसलिए उनसे नाराज़ हुई और उन्हें बीसीसीआई के अध्यक्ष पद से जाना पड़ा? जो भी हो, सौरव ने बीसीसीआई के महत्त्वपूर्ण पद को छोडऩा मुनासिब समझा; लेकिन राजनीति के लिए इस्तेमाल नहीं हुए।

सौरव फिर बंगाल क्रिकेट की राजनीति में लौट रहे हैं और बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन (कैब) के अध्यक्ष बन सकते हैं। कैब के वर्तमान अध्यक्ष अभिषेक डालमिया उन्हें अगले अध्यक्ष के रूप में समर्थन की बात कह चुके हैं। सौरव को वर्तमान घटनाक्रम में बंगाल में सत्तारूढ़ ममता बनर्जी से अप्रत्याशित रूप से मज़बूत समर्थन मिला है। मुख्यमंत्री ममता जानती हैं कि सौरव गांगुली बंगाल की जनता में कितने लोकप्रिय हैं। उनके अध्यक्ष पद से हटने में भाजपा का हाथ होने की बात जनता में फैलना ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक लाभदायक और भाजपा को नुक़सानदायक है। लेकिन सौरव राजनीति में न पड़ते हुए भी राजनीति के इस तिरस्कार और समर्थन का आनन्द ले रहे हैं।

दादा को शानदार वापसी करने के लिए जाना जाता है। जीत के बाद लॉड्र्स में टीशर्ट उतारकर हवा में लहराने, ग्रेग चैपल प्रकरण, टीम में धमाकेदार वापसी से लेकर बीसीसीआई के बॉस के पद से उनकी अप्रत्याशित छुट्टी तक कई घटनाएँ हैं, जो सौरव से जुड़ी हैं। सौरव ने जब टीम इंडिया की कमान सँभाली थी, तब आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में भारतीय टीम आठवें नंबर पर थी, जिसे वह दूसरी रैंकिंग तक लेकर आ गये। सन् 2003 में गांगुली की कप्तानी में टीम इंडिया विश्व कप में फाइनल तक पहुँची।

सौरव किस मिजाज़ और तेवर के खिलाड़ी हैं, यह सन् 2006 में आये एक विज्ञापन से ज़ाहिर हो जाता है; जिसमें वे कहते हैं- ‘मेरा नाम सौरव गांगुली है। आप सभी मुझे भूले तो नहीं। मैं टीम में वापस आने के लिए बहुत-बहुत कोशिश कर रहा हूँ। क्या पता हवा में टी-शर्ट घुमाने का एक और मौक़ा मिल जाए। मैं चुप बैठने वाला नहीं हूँ।’

इसके बाद टीम में उन्होंने सच में धमाकेदार वापसी की थी। सन् 2008 में जब आईपीएल शुरू हुआ, तो दादा ही कोलकाता नाईट राइडर्स (केकेआर) के कप्तान बने।

गांगुली सन् 2015 से 2019 तक क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल के अध्यक्ष रहे और इसके बाद सन् 2019 में बीसीसीआई में अध्यक्ष बने। उनका कार्यकाल निश्चित ही बेहतरीन रहा। कुछ विवाद होते हैं, जिन्हें टाला नहीं जा सकता। सौरव को भी उनका सामना करना पड़ा।

सौरव के समय में नवंबर, 2019 में पिंक बॉल से पहला डे-नाइट अन्तरराष्ट्रीय टेस्ट मैच भारत और बांग्लादेश के बीच कोलकाता के ईडन गार्डन स्टेडियम में हुआ। घरेलू खिलाडिय़ों की फीस बढ़ाने से लेकर कोरोना-काल में आईपीएल मैच सफलतापूर्वक आयोजन करवाना भी दादा ही कर सकते थे।

दादा अब भले ही बीसीसीआई के अध्यक्ष नहीं रहे। लेकिन बहुत-से लोग कहते हैं कि अभी उनका दौर $खत्म नहीं हुआ। पिछले दो दशक का उनका इतिहास उनके जीवट की कहानी कहता है। फ़िलहाल वह बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन पर फोकस कर रहे हैं। शायद वह भविष्य में दोबारा देश की क्रिकेट के संचालन में बड़ी भूमिका निभाएँ, इसकी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील कर चुकी हैं कि सौरव गांगुली की योग्यता को देखते हुए उन्हें आईसीसी अध्यक्ष पद के लिए बीसीसीआई का उम्मीदवार बनाया जाए।

हालाँकि सम्भावना कम है कि ऐसा होगा; क्योंकि इसके पीछे अब राजनीतिक कारण जुड़ गये हैं। लेकिन ख़ुद दादा कह चुके हैं कि वह कुछ नया करेंगे। क्या वह ममता बनर्जी की इच्छा को पूरा करेंगे कि संसद में जाएँ? कहा नहीं जा सकता। फ़िलहाल तो सौरव क्रिकेट में ही रमते दिखते हैं।

बीसीसीआई के नये बॉस रोजर बिन्नी

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि स्कॉटिश मूल के भारतीय रोजर बिन्नी जेवेलियन थ्रो में इतने माहिर थे कि उन्होंने जूनियर वर्ग में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। एक खेल पत्रकार की सन्तान रोजर बिन्नी की ईमानदारी इतनी थी कि बीसीसीआई में राष्ट्रीय चयनकर्ता रहते हुए वह बैठक से तब बाहर चले जाते थे, जब उनके बेटे स्टुअर्ट बिन्नी के चयन पर चर्चा होती थी, ताकि कोई उन पर पक्षपात का आरोप न लगाए। यही बिन्नी अब बीसीसीआई के अध्यक्ष हो गये हैं। बिन्नी ऑलराउंडर रहे और सन् 1983 में विश्व कप जीतने वाली भारत की टीम के स्टार खिलाड़ी थे।

कपिल देव के नेतृत्व में उस विश्व कप में बिन्नी ने आठ मैच खेलकर सबसे ज़्यादा 18 विकेट लिये थे। कई बार ज़रूरत के समय भारत को अपनी बल्लेबाज़ी से भी उन्होंने सँभाला। बीसीसीआई के अन्य पदाधिकारियों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह सचिव, महाराष्ट्र भाजपा के नेता आशीष शेलार कोषाध्यक्ष, कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला उपाध्यक्ष और देवजीत सैकिया संयुक्त सचिव चुने गये हैं।

हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के छोटे भाई अरुण धूमल आईपीएल के नये चेयरमैन बनाये गये हैं। देखना है कि बीसीसीआई किसे आईसीसी के अध्यक्ष पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाता है?

झारखण्ड के खेल हीरे

फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप 2022 तक पहुँचने वाली राज्य की बेटियों व अन्य खिलाडिय़ों को मदद की दरकार

ओडिशा के भुवनेश्वर से 14 अक्टूबर को ख़बर आयी कि भारतीय टीम फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप 2022 में ख़िताब की दौड़ से बाहर हो गयी है। दरअसल भुवनेश्वर के कलिंगा स्टेडियम में आयोजित मुक़ाबले भारतीय टीम को मोरक्को ने 3-0 से हरा दिया। भारत को अपने पहले मुक़ाबले में अमेरिका ने भी 8-0 से हरा दिया था।

यह ख़बर झारखण्ड के लोगों को दु:खी करने वाली थी। क्योंकि चंद दिनों पहले फीफा विश्व कप को लेकर झारखण्ड में काफ़ी उत्साह था। कारण, यहाँ की छ: बेटियाँ इस टीम में शामिल थीं। ख़ास बात यह थी कि भारतीय टीम का नेतृत्व भी झारखण्ड की बेटी अष्टम उरांव ही कर रही थीं। हर तरफ़ ख़शियाँ मनायी जा रही थीं। राज्य के मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, राजनीतिक दलों के नेता समेत अन्य लोग खिलाडिय़ों को बधाई दे रहे थे। समाचार पत्रों के पहले पन्ने पर झारखण्ड के इस ग़ौरव को जगह दी जा रही थी। अष्टम के गाँव में भी ख़शियाँ मनायी जा रही थीं।

प्रशासन ने अष्टम के घर में टीवी लगवा दिया, ताकि उनके मात-पिता अष्टम का मैच देख सकें। लेकिन कुछ दिनों के अन्दर ही भारतीय टीम के फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप से बाहर होने के बाद स्थिति बदल गयी। आज अख़बारों के पन्नों से इन खिलाडिय़ों की ख़बरें तो ग़ायब हो रही हैं, धीरे-धीरे ख़ास और आम चर्चा भी बन्द हो चुकी है। हार-जीत खेल में होती है। पर फीफा अंडर-17 में भारतीय टीम का जिस तरह का प्रदर्शन रहा, उस पर राज्य के रहनुमाओं को सोचने की ज़रूरत है। क्योंकि राज्य में खेल के हीरों की कमी नहीं है। बस ज़रूरत है, तो उन्हें तराशने की; जिससे भारत भी दूसरे देश के साथ बराबरी का मुक़ाबला कर सके।

राज्य की खिलाड़ी बेटियों के हालात

फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप के भारतीय टीम में झारखण्ड की छ: बेटियों- अष्टम उरांव, नीतू लिंडा, अंजली मुंडा, अनिता कुमारी, पूर्णिमा कुमारी और सुधा अंकिता तिर्की का चयन हुआ था। अष्टम व सुधा गुमला ज़िले की, नीतू, अनिता व अंजली रांची की और पूर्णिमा कुमारी सिमडेगा ज़िले की रहने वाली हैं। ये सभी महिला खिलाड़ी ग़रीब परिवार से ही आती हैं। राष्ट्रीय स्तर तक ख़द की मेहनत से किसी तरह से पहुँची। ये खिलाड़ी और इनके परिवार रोज़मर्रा की ज़रूरतों और बुनियादी सुविधाओं के लिए हर दिन जूझते हैं।

पहले फीफा अंडर-17 महिला विश्व कप की कप्तान अष्टम उरांव की पारिवारिक स्थिति को ही देखते हैं। अष्टम झारखण्ड के गुमला ज़िला अंतर्गत एक छोटे से गाँव बनारी गोराटोली की रहने वाली हैं। उसके परिवार में माता-पिता, तीन बहनें और एक भाई हैं। परिवार की माली हालत अच्छी नहीं है। माता-पिता मज़दूरी करते हैं। कच्चा घर है। हालत यह है कि बेटी का मैच देखने के लिए घर में टीवी भी नहीं है। पारिवारिक स्थिति के बारे में उसकी माँ तारा देवी ने ‘तहलका’ को बताया- ‘अष्टम शुरू से ही एक जुझारू बच्ची रही है। यही वजह है कि आज वह इस मुकाम तक पहुँच पायी है। हमारी माली हालत ऐसी नहीं है कि बच्चों को सुख-सुविधा मुहैया करा सकें। यहाँ तक कि बेहतर भोजन दे सकूँ, यह भी सम्भव नहीं होता है। मैंने अपने सभी बच्चों को माड़-भात खिलाकर बड़ा किया है। अभाव में ही बच्ची अपनी मेहनत और लगन से यहाँ तक पहुँची है।’

हाल यह है कि गाँव में अष्टम नाम से सडक़ का निर्माण कराया गया, तो अभावों के चलते इस सडक़ के निर्माण में अष्टम के माता-पिता को मज़दूरी करनी पड़ी। स्थानीय लोग कहते हैं कि यह ख़शी की बात है कि सडक़ को अष्टम के नाम पर बनाया गया; लेकिन दु:ख की बात है कि इस सडक़ के निर्माण में अष्टम के माता-पिता को मज़दूरी करनी पड़ी। यह दिखाता है कि अष्टम के परिवार की माली हालत कितनी ख़राब है। लोग कहते हैं कि ज़ाहिर है अष्टम के माता-पिता को मिला टीवी एक डब्बा बनकर रह जाएगा; क्योंकि वे पहले खाने-पीने और अन्य ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काम करेंगे या टीवी केबल का रिचार्ज कराएँगे? जिन बच्चों के परिवार की स्थिति ऐसी हो, उनसे अव्वल दर्जे के प्रदर्शन की कैसे उम्मीद की जा सकती है?

कुछ ऐसा ही हाल खिलाड़ी पूर्णिमा कुमारी का है। सिमडेगा ज़िले के जामबहार गाँव की रहने वाली पूर्णिमा अपनी माँ को बचपन में ही खो चुकी हैं। उनका परिवार विकट आर्थिक तंगी से गुज़र रहा है। उसका घर आज भी कच्चा और खपड़े का है। घर में पौष्टिक आहार तो दूर ढंग के खाने तक के लाले हैं। दूसरे खिलाडिय़ों की भी कमोबेश यही स्थिति है। ये खिलाड़ी जब ट्रेनिंग कैम्प में रहती हैं, तो अच्छा खाना मिल भी जाता है। लेकिन छुट्टी में खाने को मोहताज हो जाती हैं। ज़ाहिर है केवल तीन महीने या छ: महीने के ट्रेनिंग कैम्प में हुई तैयारी से विश्व स्तर पर मुक़ाबले या उत्कृष्ट प्रदर्शन की उम्मीद रखना बेमानी ही है। जिन बेटियों की पारिवारिक स्थिति ही ठीक नहीं हो; घर में रहने पर सही पौष्टिक आहार नसीब न हो; प्रैक्टिस करने की बजाय घर के कामकाज की चक्की में पिस रही हों; वे मानसिक और शारीरिक रूप से कितनी सक्षम होंगी? अन्य देशों की साल भर मेहनत करने वाली, सुख-सुविधाओं में जीने वाली खिलाडिय़ों के साथ मैदान में वे कैसे जूझ पाएँगी?

संकट में भविष्य

झारखण्ड की खेल की दुनिया में एक अलग पहचान है। यह पहचान राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन करने वाले कुछ खिलाडिय़ों ने बनायी है। इनमें क्रिकेट के पूर्व भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, हॉकी में सुमराय टेटे, अंसुता लकड़ा, ओलंपियन निक्की प्रधान, तीरंदाज़ ओलंपियन दीपिका कुमारी, मधुमिता कुमारी और कोमोलिका कुमारी का नाम देखने को मिलता है। इन खिलाडिय़ों ने पूरी दुनिया में देश का परचम लहराया है। अब भी राज्य में इन विश्व स्तरीय खिलाडिय़ों की तरह कई ऐसी खेल प्रतिभाएँ हैं, जो अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। इनमें से कई प्रतिभाएँ अभावों के बीच अपनी मेहनत राष्ट्रीय स्तर पर भी पहुँची हैं।

ज़ाहिर है यही प्रतिभाएँ भविष्य में देश और राज्य का नाम पूरी दुनिया में रोशन करेंगी। लेकिन ग़रीबी और मदद न मिलने के कारण ये प्रतिभाएँ दम तोड़ रही हैं। खेल के मैदान में जौहर दिखाने वाले खिलाड़ी जीवनयापन के झंझावातों में उलझ रहे हैं। अष्टम, पूर्णिमा, नीतू, सुधा, अनिता, अंजली और पूर्णिमा कुमारी जैसी फुटबॉल खिलाड़ी हों या फिर अन्य अभी जूनियर खेलों में अपने बलबूते दमख़म लगाकर बेहतर प्रदर्शन करने वाले बच्चे हों; इन खिलाडिय़ों की प्रतिभाओं पर पारिवारिक आर्थिक संकट का काला साया पड़ रहा है, जिससे खेल के मैदान के बाहर वे हर दिन जूझते हैं। पारिवारिक संकट इनकी प्रतिभा कमज़ोर हो रही है, जिसके लिए आर्थिक रूप से या नौकरी देकर मदद देने की बहुत दरकार है। इसके लिए राज्य व केंद्र की सरकारों को आगे आने की ज़रूरत है। क्योंकि आर्थिक संकट के चलते इन खिलाडिय़ों का वर्तमान ही नहीं, भविष्य भी संकट में है। अगर केंद्र और राज्य सरकारें इन खिलाडिय़ों की मदद करें, तो राज्य की ये होनहार प्रतिभाएँ देश और राज्य का नाम रोशन करने में सफल होंगी; ऐसा विश्वास है। राज्य में कई ऐसे बड़े खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अपनी क्षमता का लोहा राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मनवाया है।

कुछ खिलाडिय़ों को छोड़ दें, तो अब भी उनमें क्षमता बाक़ी है। लेकिन जीवनयापन के लिए कोई सब्ज़ी बेचने को मजबूर है, कोई मज़दूरी कर रहा है, कोई रोज़गार की तलाश में है, तो कोई किराने की छोटी-सी दुकान चला रहा।

व्यवस्था बदलने की ज़रूरत

सरकार ने हाल के दिनों में खेल नीति बनायी है। इसका लाभ राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन कर चुके खिलाडिय़ों को धीरे-धीरे मिल रहा है। कुछ लोगों को आर्थिक सहायता और नौकरी दी गयी। यह सब ऊँट के मुँह में जीरा के समान ही है। सरकार, प्रशासन, खेल संघ, समाज सभी को आगे बढक़र खेल प्रतिभाओं को उभारने की ज़रूरत है। उनका दायित्व लेने की ज़रूरत है। आज जिस तरह शिक्षा के अधिकार के तहत हर बच्चे को शिक्षा की व्यवस्था के साथ-साथ अन्य सुविधाएँ दी जाती हैं, उसी तरह खेल को भी एक शिक्षा के रूप में लेना होगा। अन्य देशों की तरह बालपन से ही खेल प्रतिभाओं को तराशना होगा। उनके पारिवारिक आर्थिक संकट को दूर करना होगा। तभी राज्य के ये खेल हीरे राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चमक बिखेर सकेंगे।

सबके सम्मान में ही सुरक्षा

धर्म एक-दूसरे के सम्मान, सहभागिता और सद्भाव से ही चल सकते हैं। ईष्र्या, बैर, भेदभाव, बहस और कलह से तो अलग-अलग धर्मों के ही नहीं, एक ही धर्म के लोग भी लडक़र मर जाएँगे। चाहे दो धर्मों के मानने वालों के बीच का मामला हो या किसी एक ही धर्म के मानने वालों के बीच का, एक-दूसरे का, एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करके, आपसी सौहार्द और प्रेम से मिलकर रहकर ही सब कुशल-मंगल रह सकते हैं। ईष्र्या और बैर से तो एक परिवार के लोग भी सुख-शान्ति से नहीं रह सकते, धर्मों का मसला तो फिर भी बहुत दूर की बात है।

कहने का अर्थ यह है कि दुनिया के हर व्यक्ति को सभी धर्मों के लोगों का सम्मान करना चाहिए। केवल इस बात से किसी को अपना दुश्मन समझ लेना कि वह दूसरे धर्म या दूसरी जाति का व्यक्ति है; अधर्म के सिवाय कुछ और नहीं है। कई बार देखा गया है कि कुछ देशों में दूसरे धर्म के लोगों के धर्मस्थलों को तोड़ दिया जाता है। इससे अशान्ति ही फैलती है। लेकिन कई देश ऐसे भी हैं, जहाँ दूसरे धर्मों के स्थल सदियों से सुरक्षित हैं। इतिहास गवाह है कि धार्मिक स्थलों को लेकर असंख्यों युद्ध हुए हैं। विचार किया जाना चाहिए कि वो धर्म ही कैसे, जिनके लिए तबाही करनी पड़े? धर्म तो केवल ईश्वर की ओर अग्रसर करने का साधन हैं। लेकिन इन्हीं धर्मों को मानने वालों को आज तक यह बात समझ नहीं आयी कि जिन धर्मों के पालन से मन शान्त और सहनशील हो जाना चाहिए, अहंकार नष्ट हो जाना चाहिए, विनम्रता बढ़ जानी चाहिए, उन्हीं धर्मों को मानने वाले लोग आपस में लडक़र मरने पर आमादा क्यों हो जाते हैं? दरअसल ये बिना धर्मों को समझे, सिर्फ़ उनके अंधानुकरण का परिणाम है। यह एक बड़ा सच है कि अंधानुकरण करने वाला कितना भी पड़ा-लिखा और समझदार क्यों न हो, उसे धर्म के नाम पर अनपढ़ भी बड़ी आसानी से मूर्ख बना सकता है। उसे किसी से झगड़ा करने, यहाँ तक कि किसी की हत्या करने के लिए उकसा सकता है। दुनिया भर में अलग-अलग धर्मों को मानने वालों की ऐसे ही अंधानुकरण करने वालों की भीड़ को ऐसा करते कई बार देखा जाता है। यह भीड़ कभी मूर्तियाँ तोड़ती है, कभी कोई धार्मिक स्थल तोड़ती है, तो कभी दूसरे धर्मों के लोगों पर हमला करती है।

अगर धर्म के नाम पर भीड़ बनकर हमला करने वाले इन धर्मांध लोगों को कोई रोक सकता है, तो वो धार्मिक नेता, देशों-राज्यों की सरकारें और ताक़तवर लोग हैं। लेकिन अब देखने में आता है कि सरकारें, ताक़तवर लोग और धार्मिक नेता ही अपने फ़यदे के लिए धर्मों में विघटन डालकर रखते हैं। आज तक दुनिया में कोई भी ऐसा धार्मिक विवाद नहीं हुआ, जिसके पीछे इनमें से कोई-न-कोई न हो। वैसे तो धर्म-स्थल किसी भी धर्म के हों, सिवाय झगड़े की जड़ के कुछ नहीं हैं। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि यही धर्म-स्थल लोगों की आस्था का केंद्र भी हैं। ऐसे में विभिन्न धर्मों को मानने वालों के ये आस्था के केंद्र तभी सुरक्षित रह सकेंगे, जब हर धर्म के लोग दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थलों को क्षति नहीं पहुँचाएँगे और उनका सम्मान करेंगे।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने बांग्लादेश के ढाका शहर में 51 सतीपीठों में से एक 12वीं शताब्दी का एक ढाकेश्वरी जातीय काली मन्दिर का जीर्णोद्धार कराकर यही सन्देश दिया है। इस ढाकेश्वरी मन्दिर को ढाकेश्वरी राष्ट्रीय काली मन्दिर भी कहते हैं। इस मन्दिर में सनातनी लोगों के अलावा मुस्लिम महिला-पुरुष भी पूजा करते हैं। बांग्लादेश सरकार की ओर से ढाकेश्वरी राष्ट्रीय काली मन्दिर को वहाँ की राष्ट्रीय मर्यादा माना जाता है और सरकारी बजट से इस मन्दिर की देख-रेख होती है। इस मन्दिर के चार शिव मन्दिर हैं, जो एक पंक्ति में स्थित हैं। ये चारों शिव मन्दिर ढाकेश्वरी मन्दिर में प्रवेश करते ही दिखते हैं। इस मन्दिर में साड़ी चढ़ाने की प्रथा है, जो मुस्लिम लोग भी उसी श्रद्धा से चढ़ाते हैं, जिस श्रद्धा से सनातनधर्मी चढ़ाते हैं। ढाका के नेता (सनातनी और मुस्लिम दोनों) चुनावों के दौरान इस ढाकेश्वरी मन्दिर में साड़ी और रत्न चढ़ाकर चुनावी प्रचार शुरू करते हैं। सन् 1971 के युद्ध मे पाकिस्तान ने इस मन्दिर को तबाह कर दिया था; लेकिन बांग्लादेश सरकार ने इसका पुन: निर्माण कराया। सन् 2018 में बांग्लादेश की मौज़ूदा प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने इस मन्दिर को और विस्तार देने के लिए 1.5 बीघा ज़मीन दान की थी। अगर इस मन्दिर में वहाँ के मुस्लिमों की आस्था नहीं होती, तो सम्भव है कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री भी इस मन्दिर को और भव्य नहीं बनवातीं। इस मन्दिर को सुरक्षित रखने में वहाँ के इस्लाम धर्म के लोगों की भी सराहना की जानी चाहिए। भारत में भी ऐसे कई धार्मिक स्थल हैं, जिनकी सुरक्षा दूसरे धर्म के लोगों द्वारा की जाती है। ऐसे धार्मिक स्थल हर धर्म के हैं। यह व्यावहारिक है कि अपना घर सुरक्षित रखने के लिए दूसरे के घर पर पत्थर नहीं मारना चाहिए, अन्यथा कभी-न-कभी अपने घर पर भी पत्थर बरसेंगे-ही-बरसेंगे।

पड़ौसी देशों के गैर मुस्लिमों को नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत गुजरात में मिलेगी भारतीय नागरिकता

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को नागरिकता क़ानून में फेरबदल की जानकारी देने वाली केंद्र सरकार ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले और वर्तमान में गुजरात के दो जिलों में रह रहे हिंदुओं, सिखों, बौद्ध, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को नागरिकता कानून, 1955 के तहत भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया है। बता दें सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को ही नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अगली सुनवाई के लिए 6 दिसंबर को तारीख तय की है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) पर पहले ही देश में जबरदस्त बवाल हो चुका है। अब मोदी सरकार की तरफ से सीएए की जगह नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नागरिकता देने का फैसला महत्वपूर्ण कहा जाएगा। याद रहे सीएए अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्ध, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता देने का भी प्रावधान करता है।

चूंकि सीएए के नियम सरकार ने अब तक नहीं बनाए गए हैं, इसलिए इसके तहत अब तक किसी को भी नागरिकता नहीं दी सकी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक अधिसूचना के अनुसार, गुजरात के आणंद और मेहसाणा जिलों में रहने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई को धारा 5, नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6 के तहत और नागरिकता नियम, 2009 के प्रावधानों के अनुसार भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण की अनुमति दी जाएगी या उन्हें देश के नागरिक का प्रमाण पत्र दिया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को नागरिकता संशोधन कानून 2019 (सीएए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अगली सुनवाई के लिए 6 दिसंबर को तारीख तय की है।

मोरबी पुल हादसे पर सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल, रिटायर्ड जज से जांच की उठाई मांग  

मोरबी पुल हादसे का मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच गया है। इस हादसे में 134 लोगों के मौत हो गयी थी और कई अन्य घायल हो गए थे। इस बीच गुजरात सरकार ने हादसे के चार दिन बाद 2 नवंबर को गुजरात में राज्यव्यापी शोक मनाने का निर्णय किया है। इस बीच हादसे को लेकर जो जानकारियां सामने आ रही हैं उनसे साफ़ लगता है कि पुल जनता के लिए खोलने के मामले में घोर लापरवाही बरती गयी।

देश भर को दुःख में भरने वाले इस हादसे को लेकर अब सर्वोच्च न्यायालय में याचिका  दायर की गयी है। सर्वोच्च अदालत में इस हादसे को लेकर जनहित याचिका दाखिल (पीआईएल) दायर की गयी है। इस पीआईएल में दुर्घटना की सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज के नेतृत्व में एसआईटी जांच कराने की मांग की गई है।

सर्वोच्च अदालत में दायर दाखिल जनहित याचिका में कहा गया है कि ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए देशभर में जितने भी पुराने पुल या स्मारक हैं, वहां होने वाली भीड़ को मैनेज करने के लिए नियम बनाए जाएं। सुप्रीम कोर्ट के वकील विशाल तिवारी ने यह जनहित याचिका दाखिल की है।

उधर मोरबी में पुल गिरने के हादसे के एक दिन बाद पुल की मरम्मत करने वाली कंपनी ओरेवा के दो अधिकारियों सहित 9 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि, कंपनी के मालिक के खिलाफ कुछ नहीं किया गया है। कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी भी पुल त्रासदी के बाद से लापता हैं। बता दें कंपनी ओरेवा को कई खामियों के लिए दोषी ठहराया जा रहा है, जिसमें फिटनेस प्रमाणपत्र लेने में कथित विफलता और समय से पहले पुल को फिर से खोलना शामिल है।