
तहलका डेस्क।
नई दिल्ली/गुवाहाटी। असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की ओर बढ़ रहे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-नीत राष्ट्रीय जतांत्रिक गठबंधन (राजग) के नेताओं ने कहा कि समाज के सभी वर्गों को लाभान्वित करने वाले कल्याणकारी उपायों ने राज्य में जनसमर्थन बनाए रखने में मदद की। इन नेताओं ने यह भी दावा किया कि उचित रणनीति के अभाव में विपक्ष मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच बनाने में नाकाम रहा। इन नेताओं ने यह भी दावा किया कि उचित रणनीति के अभाव में विपक्ष मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंच बनाने में नाकाम रहा।
निर्वाचन आयोग के अनुसार, शाम चार बजे तक के रूझानों में 126-सदस्यीय विधानसभा में भाजपा 71 सीट पर आगे है और 11 सीट पर उसके उम्मीदवार जीत हासिल कर चुके हैं। उसकी सहयोगी असम गण परिषद (अगप) नौ सीट पर आगे है, जबकि बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट एक सीट पर जीत हासिल करने के बाद नौ पर आगे है।
हालांकि, असम के चुनावी रण में भाजपा गठबंधन की बढ़त ने यह साबित कर दिया है कि राज्य की राजनीति अब भावुकता से ज्यादा ठोस समीकरणों पर टिक गई है। भाजपा की रिकॉर्ड तोड़ बढ़त सिर्फ विकास का नतीजा नहीं, बल्कि बिसात पर चली गई उनकी सोची-समझी चालों का परिणाम है। परिसीमन के जरिए निर्वाचन क्षेत्रों की नई घेराबंदी ने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को बिखेर दिया और भाजपा के आधार को अभेद्य किला बना दिया।
हिमंत बिस्वा सरमा ने “पहचान और सुरक्षा” के मुद्दे को विकास के साथ ऐसा मिलाया कि मतदाता किसी और विकल्प की ओर देख ही नहीं पाए। ‘ओरुनोदोई’ जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं के बीच एक ऐसा साइलेंट वोट बैंक तैयार किया, जिसे विपक्ष की कोई भी दलील भेद नहीं सकी।
दूसरी तरफ, कांग्रेस का ग्राफ गिरना सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि नेतृत्व और रणनीति का पूरी तरह ध्वस्त होना है। कांग्रेस न तो सत्ता विरोधी लहर को जमीन पर उतार पाई और न ही जुबीन गर्ग जैसे सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ जुड़े संवेदनशील मुद्दों को चुनावी मुद्दा बना सकी। जुबीन की मौत पर उपजा असंतोष और भावनात्मक उबाल विपक्ष के लिए एक बड़ा मौका था, लेकिन कांग्रेस इसे वोट में तब्दील करने में नाकाम रही।
बहरहाल, जोरहाट में गौरव गोगोई की हार ने यह साबित कर दिया कि विपक्ष के पास न तो कोई मजबूत चेहरा बचा है और न ही जनता को बांधने वाला कोई विजन। बिखरा हुआ गठबंधन और क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल की कमी ने कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। आज का असम भावनात्मक नारों के बजाय उन हाथों के साथ खड़ा दिखा, जो सत्ता की चाबी मजबूती से थामना जानते हैं।



