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साँस लेने का अधिकार बहाल करे सरकार

कोरोना महामारी की आहट से फिर से चर्चाओं का बाज़ार गर्म है कि लॉकडाउन लगेगा। हालाँकि सरकार और कई डॉक्टर कोरोना के नये वेरिएंट बीएफ7 का भारत में बहुत ज़्यादा असर नहीं होगा। लेकिन गुजरात में बीएफ7 के दो केस और एक अन्य जगह पर मिला है, वहीं कई शहरों में कोरोना के मामले मिलने की ख़बरें अब अख़बारों और टीवी चैनलों में प्रमुखता पा रही हैं। कोरोना महामारी की इस आहट ने लोगों को 2020 और 2021 की तबाही की याद दिला दी है। चर्चाएँ हो रही हैं कि दोबारा मास्क पहनना अनिवार्य हो जाएगा और अगर कोरोना चीन व अमेरिका की तरह फैला, तो एक बार फिर लॉकडाउन का सामना करना पड़ेगा।

लॉकडाउन के नाम से हम सब घबरा जाते हैं, क्योंकि हम सबने कोरोना महामारी के दौरान लगे दो-दो बार के लम्बे-लम्बे लॉकडाउन और उससे हुई विकट परेशानियों को झेला है। अब भारत एक बार फिर उसी मुहाने पर खड़ा दिख सकता हैं। सवाल यह है मास्क का इस्तेमाल फ़ायदेमंद है या नुक़सानदायक? इस सवाल का जवाब न तो हाँ में दिया जा सकता और न ही न में। लेकिन फिर भी यही माना जाता है कि मास्क लगाने से कोरोना महामारी से बचाव होगा और प्रदूषण से भी। कोरोना महामारी के प्रदूषण की चर्चा इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि इन दिनों पूरे उत्तर भारत की हवा बहुत प्रदूषित है। इस बीच जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड जैसे राज्यों में बढ़ते प्रदूषण ने चिन्ता बढ़ा दी है। हालाँकि न तो इस विषय पर सरकारें चिन्तित दिख रही हैं और न ही इसकी गम्भीरता पर कोई चर्चा करने को तैयार है। दिल्ली जैसे महानगरों के साथ-साथ देश के कई शहरों में अक्टूबर से ही हवा में एक्यूआई स्तर 350 से 500 के आसपास चल रहा है। गैस चैंबर बने इस दमघोटू वातावरण को देखते हुए ही साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोगों का साँस लेने का संवैधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी पटाखों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के एक फ़ैसले में कही थी। इसके बाद नवंबर, 2022 में भी सुप्रीम कोर्ट ने लोगों के इसी अधिकार को दोहराते हुए केंद्र सरकार से कहा था कि उसे पूरे उत्तर भारत के लोगों की चिन्ता करनी चाहिए कि वे स्वच्छ हवा में साँस ले सकें।

आज प्रदूषण का यह हाल है कि इंसान तो क्या अन्य जीव-जन्तु और पेड़-पौधों तक का जीवित रह पाना मुश्किल है। बारिश को चार महीने भी नहीं बीते हैं और पेड़-पौधों के पत्तों पर धूल और कार्बन कणों की एक मोटी परत जमा हो गयी है। इससे पेड़-पौधे तो मर ही रहे हैं, उनकी ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता भी कम हो चुकी है। सवाल यह है कि आख़िर इतने विकट प्रदूषण की वजह क्या है? इसका उत्तर भले ही सरकारें देने को तैयार न हों, लेकिन साफ है कि वाहनों की बढ़ती संख्या, उद्योगों से निकलता धुआँ और भवनों का निर्माण इसकी सबसे बड़ी वजहें हैं। इसके साथ ही सर्दियों में हवा में नमी बढऩे से भी इन दिनों प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। लेकिन सरकारें तभी शोर मचाती हैं, जब किसान अपनी धान की फ़सल उठा लेते हैं, क्योंकि सरकारों को अपनी नाकामी छुपाने के लिए पराली जलाने का बहाना मिल जाता है। इन दिनों न तो खेतों में पराली जल रही है और न किसानों की वजह से प्रदूषण फैल रहा है; लेकिन प्रदूषण अपने चरम पर है और सरकारें ख़ामोश हैं, ख़ासकर केंद्र सरकार।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, प्रदूषित हवा और गन्दे पानी के उपयोग से भारत में हर साल क़रीब 40 लाख लोग मरते हैं। इनमें से अधिकांश मौतें 7 साल से कम उम्र के बच्चों और 60 साल से ज़्यादा उम्र के बुजुर्गों की होती हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रदूषित हवा से बचने के लिए मास्क एक प्रर्याप्त बचाव का साधन है? नहीं, बिलकुल नहीं। क्योंकि मास्क एक तरफ़ अगर प्रदूषित हवा को शरीर में जाने से कुछ हद तक रोकता है, तो दूसरी तरफ़ उससे दम भी घुटता है, जो प्रदूषित हवा में साँस लेने से कम ख़तरनाक नहीं है।

दोनों ही स्थितियों में लोगों के फेफड़े ख़राब होने की सम्भावना ज़्यादा रहती है। दमा और दूसरे साँस रोगियों के साथ-साथ नज़ला आदि के पीडि़तों के लिए तो प्रदूषित हवा भी घातक है और मास्क का उपयोग भी। हवा में सबसे ख़तरनाक गैसों में कार्बन डाई आक्साइड (ष्टह्र2), जो हवा में 0.3 $फीसदी से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए और कार्बन मोनो ऑक्साइड (ष्टह्र1), जो कार्बन डाई आक्साइड से भी कम होनी चाहिए, सल्फर डाई ऑक्साइड (स्ह्र2), जिसकी ऑक्सीजन में मामूली उपलब्धता ही बेहद घातक है, क्लोरीन (ष्टरु1), जो हवा से ढाई गुना भारी होती है और 34 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान में वायुमंडल में छायी रहती है, में जिस तरह से लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है, उससे भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को चिन्ता सता रही है। लेकिन प्रदूषण को लेकर चिन्ता करने वालों की यह चिन्ता दिखावे भर की है, क्योंकि प्रदूषण पर चिन्ता जताने वाले ज़्यादातर लोग अपने लिए स्वच्छ हवा का इंतज़ाम करके रख रखते हैं। इनमें ज़्यादातर वैसे ही लोग हैं, जो ख़ुद का पेट भरकर भूखों के लिए हाय-हाय करते हैं। यही वजह है कि इनके द्वारा उठाये गये क़दम न तो ठोस होते हैं और न ही उनका आम लोगों को कोई फ़ायदा कभी होता है। एक तरफ़ ये लोग प्रदूषण पर कौवों की तरह मौक़ा मिलते ही कांय-कांय करने लगते हैं, तो दूसरी तरफ़ प्रदूषण नियंत्रण के लिए बने सरकारी और $गैर-सरकारी संगठन प्रदूषण फैलाने के लिए ज़िम्मेदार तत्त्वों से भरपूर रिश्वत खाते हैं। क्योंकि प्रदूषण से बचने के लिए पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल, सीएनजी, पीएनजी के उपयोग को रोककर बिजली, सौर ऊर्जा और शारीरिक श्रम का उपयोग किया जा सकता है; लेकिन ऐसा इसलिए नहीं होने दिया जा रहा है, क्योंकि इससे अरबों-ख़रबों का सालाना नुक़सान तेल उत्पादक देशों, तेल की खपत करने वाले विभिन्न देशों की सरकारों की गोद में बैठे उनके चहेते उद्योगपतियों, और प्रदूषण का रोना रोने वाले राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगठनों को होगा।

भारत को अगर इस दोहरे व्यवहार से सही ढंग से निपटना है, तो केंद्र सरकार को हवा में साँस लेने का अधिकार बहाल करना होगा। अगर सरकार हवा में साँस लेने के इस संवैधानिक अधिकार को कड़ाई से लागू करती है, तो प्रदूषण फैलाने वाले कारकों से भी निपटने में उसे परेशानी नहीं होगी और प्रदूषण से बेमौत मरते लोगों की ज़िन्दगी बचाने के साथ-साथ लोगों को बीमार होने से बचाया जा सकता है। लेकिन सरकार ऐसा इसलिए नहीं करेगी, क्योंकि इससे भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों और अपने मुना$फे के लिए लोगों की ज़िन्दगी दाँव पर लगाने वाले उद्योगपतियों की मनमानी पर अंकुश लग जाएगा, जो वे कभी नहीं चाहेंगे।

आज प्रदूषण का ज़हर इंसानों के साथ-साथ दुनिया के हर प्राणी का दम घोंट रहा है और कोई शोर नहीं मचा रहा है, जो शोर मचा रहे हैं, वो ख़ुद के साँस लेने के लिए भरपूर ऑक्सीजन ले रहे हैं, उन्हें न तो प्रदूषण वाले क्षेत्रों में जाने का समय है और न ही वे अपने कंफर्ट जोन में प्रदूषण फैलने देते हैं। लेकिन ज़हरीला गैस-चेंबर आम नागरिकों के लिए कोरोना और कोरोना जैसी अन्य किसी महामारी से भी कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है। आज इस प्रदूषण से लोगों को न सिर्फ दमा, सर्दी, खाँसी, नज़ला व साँस के अन्य रोग हो रहे हैं, बल्कि उनमें कैंसर और टीबी जैसे घातक रोगों के साथ-साथ पेट, त्वचा और आँखों के रोग भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

शहरों में बहुत से लोगों, ख़ासकर अमीरों ने इस ज़हरीली हवा को साफ करने के लिए अपने घरों से बचने के लिए अपने घरों में एयर-फिल्टर लगा लिये हैं। कारों में भी अब एयर फिल्टर मौज़ूद होता है। इसके अलावा बहुत से अमीर लोग अब घरों में ऑक्सीजन सिलेंडर रखने के साथ-साथ गाडिय़ों में भी ऑक्सीजन सिलेंडर लेकर भी घूमने लगे हैं; लेकिन उन 95-96 फीसदी लोगों की चिन्ता कौन करे, जिनके पास इस प्रदूषण में मरने के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है। क्या लोग ऑक्सीजन सिलेंडर रखने के बजाय अपने आस-पास हर महीने दो-चार पौधे नहीं लगा सकते?

आज शहरों में जिस तरह कंकरीट के जंगल खड़े हैं और जितनी तेज़ी से पेड़-पौधे काटे जा सकते हैं, वो आधुनिकता का तात्कालिक सुख तो दे रहे हैं; लेकिन जानलेवा भी साबित हो रहे हैं, जिसकी तरफ़ केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ लोगों को भी ध्यान देने की बहुत ज़रूरत है। आज इस विषय पर दुनिया भर की सरकारों और महानतम वैज्ञानिक होने की ख्याति प्राप्त खगोल शास्त्रियों, वैज्ञानिकों और प्रदूषण का रोना रोने वाले तमाम सरकारी व गैर-सरकारी संगठनों को गहनता से सोचने और ईमानदारी से प्रदूषण रोकने की दिशा में काम करने की ज़रूरत है।

कोरोना की आहट फिर!

चीन में महामारी से ख़राब हालात के बाद दुनिया भर में चिन्ता

महामारी विशेषज्ञ एरिक फिगल डिंग के एक से ज़्यादा ट्वीट्स, जिनमें उन्होंने चीन में कोरोना से हुई मौतों से पर्दा उठाने और वहाँ के गम्भीर हालात को जगज़ाहिर करने का दावा किया; के बाद दुनिया भर में चिन्ता पसर गयी है। कोरोना की जानकारी देने वाले वल्र्डोमीटर के नवीनतम आँकड़े देखने से ज़ाहिर होता है कि हाल के हफ्तों में कोरोना से सबसे ज़्यादा मौत दुनिया के सबसे ताक़तवर देश अमेरिका में हुई हैं, जबकि उसके बाद जापान, ब्राजील, जर्मनी और फ्रांस का नंबर है। अमेरिका में कोरोना से जिन लोगों की हाल के महीनों में मौत हुई है, उनमें 59 फ़ीसदी ऐसे हैं, जिनका टीकाकरण हो चुका था।

नवीनतम घटनाक्रम के बाद भारत सरकार भी सक्रिय हुई है और बैठकों के सिलसिला शुरू करने के अलावा राज्यों को भी अलर्ट कर दिया गया है। यदि देश में मामले बढ़ते दिखते हैं, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी कि हाल के महीनों में मास्क और सेनेटाइजर से मुक्ति पा चुके भारतीयों को फिर यह एहतियाती उपाय अपनाने पड़ें। चीन को लेकर यह आशंका जतायी गयी है कि वहाँ आने वाले तीन-चार महीनों में लाखों लोगों की ज़िन्दगी दाँव पर लग सकती है। निश्चित ही यह आँकड़े भय पैदा करने वाले हैं। विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि कोरोना अगले तीन महीने में पूरी दुनिया की 10 फ़ीसदी आबादी, जबकि चीन की 90 फ़ीसदी आबादी को अपनी गिरफ़्त में ले सकता है। महामारी विशेषज्ञ डिंग ने आशंका जतायी है कि नयी लहर में 10 लाख से भी ज़्यादा लोग मौत का शिकार हो सकते हैं।

अभी तक की रिपोट्र्स से यह ज़ाहिर होता है कि चीन में कोरोना का विस्फोट लोगों के प्रतिबंधों पर जिनपिंग प्रशासन के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों और सरकार की तरफ़ से इनमें दी गयी ढील के बाद देखने को मिला है। रिपोट्र्स से ज़ाहिर होता है कि चीन में हालात कुल मिलाकर क़ाबू से बाहर हैं और देश के अस्पताल महामारी से पीडि़त लोगों से अटे पड़े हैं। महामारी विशेषज्ञ डिंग ने तो अपने ने तो अपने ट्वीट्स में दर्ज़नों लोगों के शव दिखाते हुए इन्हें अस्पताल में महामारी के शिकार बताया है।

चीन में हाहाकार

चीन में प्रतिबंधों में ढील के बाद असल में कोरोना महामारी से कितनी मौतें हुई हैं, इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा नहीं है। कारण यह है कि चीन की सरकार ने अपनी तरफ़ से 7 दिसंबर के बाद कोरोना से वहाँ होने वाली मौतों को लेकर कोई आँकड़े जारी नहीं किये हैं। यही कारण है कि इन आँकड़ों को लेकर कयास लग रहे हैं और कुछ में दावा किया जा रहा है कि वहाँ बड़े पैमाने पर लोगों की मौत हुई है। यह आशंका भी विशेषज्ञ जता रहे हैं कि चीन के शहरों में कोरोना बेक़ाबू हैं और सरकार सच्चाई छुपा रही है।

जिनपिंग सरकार आरम्भ से ही यह दावा करती रही है कि उनके देश में कोरोना महामारी को पश्चिमी देशों के मुक़ाबले बेहतर ढंग से सँभाला गया है। लेकिन वर्तमान में वहाँ कोरोना से जुड़ी जानकारियाँ बाहर जाने से रोकने की कोशिश हुई है। हाल में बीजिंग के श्मशान में पुलिस और सुरक्षा कर्मियों ने पत्रकारों को भीतर जाने से रोक दिया।

चीन में कोरोना की स्थिति पर अमेरिका भी चिन्तित दिखता है। अमेरिका में हाल के हफ्तों में कोरोना से जो मौतें हुई हैं, वह दुनिया भर में सबसे ज़्यादा हैं। अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने 20 दिसंबर को एक बयान में कहा- ‘चीन में कोरोना जिस तरह फैल रहा है, वह पूरी दुनिया के लिए चिन्ता की बात है।’ ज़ाहिर है, यह चिन्ता सिर्फ़ अमेरिका में ही नहीं है। भारत और अन्य देश, जहाँ महीनों के प्रतिबंधों के बाद लोगों ने राहत की साँस ली है, किसी भी सूरत में फिर उस स्थिति में नहीं जाना चाहते।

अमेरिका का शोध

आमतौर पर आरोप लगते हैं कि अमेरिका चीन को लेकर अपने हिसाब से चीज़ें कहता है और उनमें से कई ज़मीनी हक़ीक़त से मेल नहीं खातीं। हाल में अमेरिका की सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) सहित कई स्वास्थ्य एजेंसियाँ डेल्टा या ओमिक्रॉन जैसे नये वेरिएंट की खोजकर रही हैं। सीडीसी के मुताबिक, कोरोना का नया वेरिएंट कोरोना वायरस को अधिक आसानी से और टीकाकरण होने के बावजूद फैलाने में सक्षम है।

अमेरिका 2023 की शुरुआत में विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल चीन भेजने वाला है। अमेरिका उम्मीद जाता रहा है कि चीन कोरोना की अपनी वर्तमान स्थिति पर जल्दी नियंत्रण पा लेगा, क्योंकि से चीन को होने वाले नुक़सान से वैश्विक अर्थ-व्यवस्था भी प्रभावित होगी। अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस का कहना है कि चीन की जीडीपी बहुत ज़्यादा है, लिहाज़ा ये सिर्फ़ चीन ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए अच्छा होगा कि चीन कोरोना की वर्तमान लहर पर जल्दी क़ाबू पा ले।

चीन और डब्ल्यूएचओ

चीन में कोरोना की नयी लहार ने दुनिया भर के विशेषज्ञों को चिन्ता में डाल दिया है। प्रमुख वैज्ञानिकों और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का मानना है कि चीन में कोरोना के शीघ्र ख़त्म होने की बात कहना अभी जल्दबाज़ी होगी। विशेषज्ञों का दावा है कि चीन में कोरोना महामारी के कारण अन्य देशों की तुलना में कम मौत हुई हैं। लेकिन अब जो ढील दी गयी है, उससे मौत के मामले बढ़ सकते हैं।

डब्ल्यूएचओ कोरोना इमरजेंसी कमेटी में शामिल डच वायरोलॉजिस्ट मैरियन कोपमैन्स ने तो और भी बड़ी बात कह दी है। उनका कहना है- ‘क्या अब भी हम किसी चीज़ को पोस्ट पैडेंमिक (महामारी के बाद) कह सकते हैं, जब दुनिया का एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण हिस्सा कोरोना की दूसरी लहर में पहुँच रहा है। साफ़ है कि पूरी दुनिया में कोरोना कम हुआ है और हम महामारी के अलग चरण में हैं; लेकिन चीन में बढ़े मामलों ने संकट में इज़ा$फा किया है।’

नहीं भूलना चाहिए कि डब्ल्यूएचओ प्रमुख टेड्रोस अदनोम घेब्रेयसस ने सितंबर, 2022 में कहा था- ‘हम महामारी का अन्त देख रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि 2023 के किसी समय में कोरोना महामारी का पूर्ण $खात्मा हो जाएगा। उन्होंने बाक़ायदा एक मीडिया कॉन्फ्रेंस में यह बात कही थी। इसका आधार उन्होंने बताते हुए उन्होंने कहा था कि ज़्यादातर देशों ने कोरोना प्रतिबंधों को हटा लिया है। लेकिन अब चीन में जिस तरह कोरोना विस्फोट हुआ है, उससे पूरी दुनिया चिन्तित है।

चीन के कमोबेश सभी शहरों में अस्पतालों में बेड की संख्या बढ़ायी गयी है। जाँच के लिए नये क्लीनिक बनाये गये हैं। कोरोना के मामलों के बीच कई एजेंसियाँ चेतावनी दे रही हैं कि बड़े पैमाने पर वायरस के फैलने से म्यूटेशन का ख़तरा बढ़ेगा। इससे दुनिया को एक नया ख़तरा झेलना पड़ सकता है।

चीन ने हाल में डब्ल्यूएचओ के साथ देश का जो डेटा साझा किया है उससे ज़ाहिर होता है कि ओमिक्रोन वेरिएंट ने काफ़ी नुक़सान किया है। बेशक डेटा अधूरा होने के कारण की कमी के कारण तस्वीर साफ़ नहीं है कि चीन में कोरोना विस्फोट कोरोना वेरिएंट के कारण हुआ है या लॉकडाउन ख़त्म होने के कारण मरीज़ों की संख्या बढ़ी है। लेकिन यह सच है कि वहाँ हालात अच्छे नहीं हैं।

 भारत की तैयारी

 

हाल के महीनों में भारत में कोरोना मामलों में लगातार कमी आयी है और वर्तमान में पॉजिटिविटी रेट भी नाममात्र का ही है। कोरोना पाबंदियाँ ख़त्म कर दी गयी हैं; लेकिन इक्का-दुक्का मामले अभी भी हैं। अब चीन की स्थिति को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने हाल में एनसीडीसी और आईसीएमआर को पत्र लिखकर सुझाव दिया है कि यदि कोरोना के नये वेरिएंट्स की समय रहते पहचान करनी है, इसके लिए जीनोम सीक्वेंसिंग ज़रूरी है। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए सैंपल भेजें। मंत्री ने 21 दिसंबर को एक रिव्यू मीटिंग भी की। इसमें नवीनतम जानकारी ली गयी, ताकि देश ज़रूरत पडऩे पर किसी आपात स्थिति से निपट सके। हालाँकि यह भी साफ़ किया है कि जनता को घबराने की ज़रूरत नहीं है। भारत सरकार के वरिष्ठ एंटी टास्क फोर्स सदस्य और कोरोना टीकाकरण अभियान प्रमुख डॉ. एन.के. अरोड़ा ने भी कहा कि भारत को चीन की स्थिति से चिन्तित होने की ज़रूरत नहीं है। उनके मुताबिक, यह कहा जा रहा है कि चीन में महामारी फिर बढ़ रही है; लेकिन भारत में बड़े स्तर पर टीकाकरण हो चुका है। दुनिया के सभी कोरोना वेरिएंट भारत झेल चुका है। हाँ, उनका सावधानी बरतने पर ज़रूर ज़ोर है।

 

पाकिस्तानी भाषा बोल रहा ओआईसी

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

भारत के ख़िलाफ़ हमेशा उग्र रहने वाला इस्लामिक सहयोग संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को ऑपरेशन (ओआईसी) ने एक बार फिर पाकिस्तानी भाषा बोली है। भारत से अचानक रिश्तों में मधुरता का ज़िक्र इस्लामिक देशों में हो रहा है। पाकिस्तान इससे बहुत हैरान है। दरअसल 10 से 12 दिसंबर के बीच ओआईसी सेक्रेटरी जनरल हिसेन ब्राहिम ताहा ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) का दौरा किया था और उसे इस्लामिक सहयोग संगठन का हिस्सा बताया था। जबकि भारत ने कश्मीर मुद्दे पर हमेशा ओआईसी को दख़ल न देने की हिदायत दी है। इसके बावजूद हिसेन ब्राहिम ताहा ने कहा कि ‘हमारे ऊपर कश्मीर मुद्दे का हल ढूँढने की सामूहिक और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी है।’ ताहा के इस बेतुके बयान के बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने अगले ही दिन साफ़ किया कि ओआईसी को कश्मीर पर बोलने का कोई अधिकार नहीं है, संगठन के सेक्रेटरी जनरल ताहा पाकिस्तान के प्रवक्ता न बनें। ओआईसी और ताहा का भारत के आंतरिक मामलों में दख़ल का प्रयास पूरी तरह से अस्वीकार्य है। ओआईसी साम्प्रदायिक, पक्षपातपूर्ण और तथ्यात्मक रूप से $गलत नज़रिया अपनाकर पहले ही अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुका है। उम्मीद है पाकिस्तान द्वारा वहाँ से आतंकवाद को बढ़ावा देने में हिस्सा लेने से ताहा बचेंगे।

बता दें कि मुस्लिम बाहुल्य राष्ट्रों वाला संगठन ओआईसी पाकिस्तान के उकसावे में आकर भारत पर हमेशा ज़ुबानी हमले करता रहा है। वह पाकिस्तान की तरह ही हमेशा से चोरी और सीनाजोरी वाला व्यवहार करने की कोशिशें करता रहा है। बता दें कि संयुक्त राष्ट्र के बाद ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा 57 देशों वाला संगठन है, जिसका गठन मोरक्को के रबात में एक शिखर सम्मेलन के बाद सितंबर 1969 में हुआ था। अब इसका मुख्यालय सऊदी अरब के जेद्दाह में है। इस संगठन को मुस्लिम जगत की सामूहिक आवाज के तौर पर जाना जाता है। यही कारण है कि इस संगठन के सदस्य देशों की आँखों पर इस्लामिक पक्षपात का चश्मा चढ़ा रहता है। ओआईसी का उद्देश्य इस्लामिक मूल्यों और प्रतीकों की सुरक्षा, मुसलमानों के हितों की रक्षा और मुस्लिम देशों के बीच शान्ति स्थापित करना था; लेकिन दुनिया की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन का राजनीतिक महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया है कि अब यह किसी मुस्लिम देश की सही या $गलत नीतियों के आड़े आने वाले देशों को धमकी देने से भी पीछे नहीं हटता।

ख़ास बात यह है कि इस संगठन में कई ऐसे देश भी सदस्य की हैसियत से शामिल हैं, जिनमें सभी मुस्लिम नहीं हैं; लेकिन भारत मुस्लिम आबादी में दूसरा सबसे बड़ा देश है। लेकिन भारत या भारत का कोई मुसलमान इस संगठन का हिस्सा नहीं है। जबकि ओआईसी के गठन के व$क्त भारत को भी रबात में आमंत्रित किया गया था। मुस्लिम आबादी के मामले में दूसरा सबसे बड़ा देश भारत ओआईसी में शामिल हो यह पाकिस्तान कभी नहीं चाहेगा। लेकिन उससे पहले ही भारत ने ओआईसी का सदस्य देश बनने से साफ़ इनकार कर दिया।

संगठन के गठन के बाद 2003 में भी ओआईसी ने अपनी बैठक में भारत को शामिल करने से मना कर दिया था। इसके से 2006 में सऊदी अरब ने भारत को पर्यवेक्षक बनने का निमंत्रण दिया। 2018 में बांग्लादेश ने तो ओआईसी से यहाँ तक कहा कि भारत को संगठन का पर्यवेक्षक बनाने को कहा।

लेकिन पाकिस्तान के ओआईसी के सदस्य होने के कारण यह मुस्लिम संगठन भारत से हमेशा तल्ख़ रवैया अपनाये रहता है। पाकिस्तान ने ओआईसी की स्थापना के बाद से ही भारत को दबाने के लिए इस संगठन की आड़ ली है और इसे भारत के ख़िलाफ़ भडक़ाता रहा है। कश्मीर से अनुच्छेद 2019 हटाने से लेकर तीन तलाक़ और हिजाब वाले विवाद को लेकर भी ओआईसी ने भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगला था। इसके बाद भी भारत ने ओआईसी की ग़ुस्ताख़ियों को हर बार माफ़ किया है।

लेकिन 2019 में जब ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त अरब अमीरात ने जब भारत को गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में एक बार फिर आमंत्रित किया, तो पाकिस्तान के कान खड़े हो गये। लेकिन वह समृद्ध इस्लामिक देशों और $खुद कमज़ोर होने के चलते इसका विरोध खुलकर दर्ज नहीं कर सका। इसका कारण यह भी है कि भारत के रिश्ते कच्चे तेल की समृद्धि वाले पश्चिम एशियाई मुस्लिम देशों से काफ़ी मज़बूत हैं, जिसके चलते ओआईसी द्वारा भारत पर दबाव देने की पाकिस्तान की इच्छा पूरी नहीं हो पाती। इन इस्लामिक देशों से भारत के सम्बन्ध पिछले दो-तीन साल में और मधुर हुए हैं, क्योंकि वित्त वर्ष 2020-21 और 2021-22 के बीच गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) देशों के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 87.4 बिलियन डॉलर से बढक़र 154.7 बिलियन डॉलर हो गया है। जीसीसी यह भी जानता है कि भारत इस्लामिक देशों का एक बहुत बड़ा निर्यातक और आयातक है, इसलिए उससे बिगाडक़र कोई $फायदा नहीं होने वाला। इसके अलावा पाकिस्तान के मंसूबे इसलिए भी नाकाम रहे हैं, क्योंकि ओआईसी के दो सदस्य मालदीव और बांग्लादेश हमेशा से भारत के साथ खड़े रहे हैं।

इससे पहले भी ओआईसी ने भारत पर जम्मू कश्मीर को लेकर भडक़ता रहा है, जिससे पाकिस्तान का हौसला बढ़ता रहा है। ओआईसी की पाकिस्तान की भाषा को भारत अच्छी तरह समझता है और वह इस बंदर घुडक़ी का जवाब देना भी जानता है। पिछले दिनों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह कहा था कि भारत का लक्ष्य पीओके के गिलगिट और बाल्टिस्तान जैसे हिस्सों को एक बार फिर वापस अपनी सीमा में शामिल करना है। रक्षा मंत्री के इस बयान के बाद ताहा ने पीओके का दौरा किया और उसे पाकिस्तान तो दूर की बात ओआईसी का हिस्सा तक बता डाला। लेकिन फिर भी ओआईसी के सेक्रेटरी जनरल की हिम्मत कोई छोटी बात नहीं है।

हिसेन ब्राहम ताहा ने यहाँ तक कहा कि ‘कश्मीर मुद्दे को लेकर पाकिस्तान और भारत के बीच बातचीत का एक ज़रिया ढूँढना सबसे आवश्यक है। हम पाकिस्तानी सरकार और अन्य देशों के साथ मिलकर इसके लिए एक खाका भी तैयार करने में जुटे हुए हैं। इसी वजह से हमें इस मामले में संगठन के सदस्य देशों का साथ चाहिए और हमें यह पता होना चाहिए कि कूटनीतिक मुद्दों पर चर्चा सडक़ पर खड़े होकर नहीं की जा सकती है। हम यहाँ अपने सहयोगियों, अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संगठन के सदस्यों की ओर से भारत और पाकिस्तान के बीच लम्बे समय से चल रहे कश्मीर विवाद को सुलझाने का रास्ता ढूँढने के लिए ओआईसी की एकजुटता, सहानुभूति और दृढ़ संकल्प व्यक्त करने आए हैं। ताहा ने यह बात पीओके राष्ट्रपति सुल्तान महमूद, प्रधानमंत्री सरदार तनवीर इलियास, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, कश्मीर मामले में सलाहकार क़मर ज़मान कायरा के सामने कही।

ओआईसी और ताहा की यह हिम्मत तोडऩे के लिए भारत ने तत्काल मुँहतोड़ जवाब दिया और उसे आगे से कश्मीर मामले पर चुप रहने की सलाह दी। क्योंकि पीओके न तो पाकिस्तान का हिस्सा है और न वहाँ के लोग पाकिस्तान के अधीन $खुश रहते हैं। फिर भी पाकिस्तान कश्मीर को अपना हिस्सा बताता है, जिस पर भारत ने हमेशा कड़ी प्रतिक्रिया दी है। यही कारण है कि पिछले दिनों भारतीय सेना के बयान से भी पाकिस्तान बौख़ला गया था।

सन् 1965 और सन् 1971 के भीषण युद्ध के बाद कारगिल युद्ध में भी भारत से मुँह की खाने के बाद पाकिस्तान बौख़लाहट से आज तक भन्नाया हुआ है और वह सीमा पार से भारत में आतंकी गतिविधियों का सबसे बड़ा पैरोकार बन चुका है, जिसके पीछे उसका मक़सद भारत में असंतोष, तबाही और जम्मू-कश्मीर पर अवैध क़ब्ज़ा करना है, जिसे भारत किसी भी हाल में पूरा नहीं होने देगा। हद तो यह है कि जम्मू-कश्मीर को हड़पने और भारत को आतंकी गतिविधियों से तबाह करने की चाहत में पाकिस्तान ओआईसी के अलावा चीन से भी लगातार मदद ले रहा है, जिसके लिए वह चीन को बड़ी कीमत चुका रहा है।

केंद्र व राज्यों में झगड़े की जड़ नयी-पुरानी पेंशन

कई राज्य पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की ओर वापस जा रहे हैं। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड जैसे राज्य पहले ही पुरानी पेंशन योजना लागू कर चुके हैं, जबकि पंजाब और हिमाचल प्रदेश ने इसे लागू करने की योजना की घोषणा की है। हिमाचल में तो कांग्रेस ने इसे चुनाव का अपना सबसे बड़ा वादा बनाया था।

हालाँकि बड़ा सवाल यह है कि नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) के तहत कितना पैसा है, जिसकी माँग राज्य कर रहे हैं; लेकिन केंद्र ने इसके लिए मना कर दिया है।

पेंशन नियामक पेंशन कोष नियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) ने राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड की राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के तहत जमा की गयी राशि को इन राज्यों के पुरानी पेंशन योजना को वापस लेने के बाद वापस करने की माँग को ख़ारिज कर दिया है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जो हाल ही में शिमला में थीं, ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय पेंशन योजना में पैसा व्यक्तिगत योगदानकर्ताओं का है और क़ानून के अनुसार, राज्य सरकारें इसे वापस नहीं ले सकती हैं। उनके जूनियर भागवत कराड ने कहा कि पीएफआरडीए ने सूचित किया है कि एनपीएस अंशदान की वापसी के लिए कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है।

कुछ विपक्ष शासित राज्यों ने ओपीएस में लौटने का प्रण किया है, जो एनपीएस के बजाय सरकारी कर्मचारियों को प्राप्त अन्तिम वेतन का 50 फ़ीसदी प्रदान करता है और जहाँ वेतन का 10 फ़ीसदी योगदान कर्मचारी और नियोक्ता एक समान देते हैं। और नियोक्ता द्वारा एक समान योगदान दिया जाता है। इसके बाद यह पैसा नामित फंड प्रबंधकों को दिया जाता है। सेवानिवृत्ति पर वार्षिकी कवर ख़रीदने के लिए उपयोग की जाने वाली धनराशि के साथ कर्मचारी को समग्र निधि वापस कर दी जाती है। कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के अनुसार, वित्त मंत्रालय (आर्थिक मामलों के विभाग) की अधिसूचना संख्या 5/7/2003-ईसीबी एंड पीआर दिनाँक 22/12/2003 के तहत केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 01/01/2004 से राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) की शुरुआत की गयी थी। यह केंद्र सरकार की सेवा (सशस्त्र बलों को छोडक़र) में शामिल होने वाले उन सभी नये कर्मियों के लिए लागू की गयी थी, जो 01/01/2004 से भर्ती हुए।

राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली की शुरुआत पर, केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 में संशोधन किया गया। तदनुसार केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के तहत पुरानी पेंशन योजना के लाभ संशोधित नियमों के तहत 01/01/2004 को या उसके बाद नियुक्त केंद्र सरकार के सिविल सेवकों के लिए स्वीकार्य नहीं हैं।

मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत सरकार के विचाराधीन 01/01/2004 को या उसके बाद शामिल होने वाले केंद्र सरकार के सिविल कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना को फिर से शुरू करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

राज्यवार आँकड़े

वित्त मंत्रालय की तरफ़ से साझा किये गये आँकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार के 20 लाख से अधिक एनपीएस ग्राहक हैं; जबकि 50 लाख से अधिक राज्य सरकार के कर्मचारियों ने इस योजना की सदस्यता ली है। एनपीएस (केंद्र सरकार) के तहत कुल एयूएम 2,00,000 करोड़ रुपये से अधिक है, जबकि राज्य कर्मचारियों का कुल एयूएम 31 अक्टूबर 2022 तक 3.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। दरअसल एनपीएस लाने के एक साल के भीतर ही लगभग सभी बड़े राज्यों ने अपने स्तर पर इसे लागू कर दिया और 28 फरवरी, 2022 तक राज्य सरकारों के 50 लाख से ज़्यादा कर्मचारी एनपीएस के तहत थे, जबकि 22 लाख से ज़्यादा केंद्रीय कर्मचारी इसके लाभार्थी हैं। पुरानी पेंशन लागू करने से राज्यों के लिए भी चुनौतियाँ बढ़ेंगी।

राज्यों से धनवापसी का अनुरोध

राज्य मंत्री कराड का कहना है कि झारखण्ड सरकार के साथ राजस्थान और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) के तहत ग्राहकों के संचित कोष को वापस करने के लिए केंद्र सरकार/पीएफआरडीए को एक प्रस्ताव भेजा है। हालाँकि पंजाब सरकार से ऐसा कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पीएफआरडीए ने सम्बन्धित राज्य सरकारों को सूचित किया है कि पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2013 के तहत पीएफआरडीए (राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली के तहत निकास और निकासी) विनियम, 2015 और समय-समय पर संशोधित अन्य सम्बन्धित विनियमों के साथ कोई प्रावधान नहीं है।

साथ ही जिसके द्वारा धन, जो पहले से ही एनपीएस के लिए सरकार के योगदान और कर्मचारियों के योगदान दोनों के रूप में जमा किया गया है; को समय-समय पर वापस किया जा सकता है और राज्य सरकार को वापस जमा किया जा सकता है। सवाल उठता है कि पुरानी पेंशन योजना को लेकर हंगामा क्यों हो रहा है और यह एक बड़ा चुनावी मुद्दा क्यों बन गया है :-

पुरानी पेंशन योजना

 ओपीएस में सेवानिवृत्ति पर कर्मचारियों को उनके अन्तिम आहरित मूल वेतन और महँगाई भत्ता का 50 फ़ीसदी या सेवा के पिछले 10 महीनों में उनकी औसत कमायी, जो भी उनके लिए अधिक लाभप्रद हो, प्राप्त होता है। कर्मचारी द्वारा 10 साल की सेवा की आवश्यकता को पूरा किया जाना चाहिए।

 ओपीएस के तहत, कर्मचारियों को अपनी पेंशन में योगदान करने की आवश्यकता नहीं है। सरकारी नौकरी लेने के लिए एक प्रोत्साहन सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन और पारिवारिक पेंशन की गारंटी थी। रिटायरमेंट कॉर्पस बिल्डिंग का दबाव नहीं था। जीवन प्रत्याशा में वृद्धि के कारण ओपीएस सरकारों के लिए अस्थिर हो गया है।

 पुरानी पेंशन योजना में सामान्य भविष्य निधि की सुविधा उपलब्ध है।

 पेंशन के लिए वेतन से कोई कटौती नहीं की जाएगी।

 रिटायरमेंट के बाद एक निश्चित पेंशन दी जाती है, यानी पिछले वेतन का 50 फ़ीसदी  पेंशन के रूप में मिलता है।

 पेंशन की पूरी राशि सरकार देती है।

 यदि किसी सरकारी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु हो जाती है, तो आश्रित परिवार पेंशन का हक़दार होगा।

नयी पेंशन योजना

 इस एनपीएस में सरकार द्वारा नियोजित लोग अपने मूल वेतन का 10 फ़ीसदी एनपीएस में योगदान करते हैं, जबकि उनके नियोक्ता 14 फ़ीसदी तक योगदान करते हैं। निजी क्षेत्र के कर्मचारी भी एनपीएस में स्वेच्छा से भाग ले सकते हैं, हालाँकि कुछ नियमों में बदलाव किया गया है।

 एनपीएस के साथ ग्राहक के पास बहुत अधिक लचीलापन है, उसे अपने फ़ैसले करने के अधिक विकल्प हैं। एक पेशेवर पेंशन फंड मैनेजर यह सुनिश्चित कर सकता है कि इक्विटी या ऋण की परवाह किये बिना बेहतर रिटर्न और एक बड़ा रिटायरमेंट कॉर्पस हासिल किया जाए।

 इसके अतिरिक्त, एनपीएस के तहत कोई सामान्य भविष्य निधि (जीपीएफ) सुविधा उपलब्ध नहीं होगी। वेतन से हर महीने एक निश्चित राशि काटी जाएगी। सेवानिवृत्ति के बाद निश्चित पेंशन की कोई गारंटी नहीं है।

 कर्मचारी के लिए पेंशन की राशि शेयर बाज़ार के रिटर्न पर निर्भर करेगी। पेंशन बीमा कम्पनी एन्यूइटी ख़रीदने के बाद एनपीएस में देगी। नेशनल पेंशन सिस्टम  में महँगाई और पे कमीशन का फायदा नहीं मिलेगा।

पुरानी पेंशन की चुनौतियाँ

 राज्य के बजट पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा।

 राज्य सरकारों पर बोझ बढ़ेगा। पैसे की भरपाई कहाँ से होगी?

 अभी तक एनपीएस में जमा पैसों का क्या होगा, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है और सरकारें इस पैसे को वापस ले सकती हैं।

पतनशीलता की ओर भोजपुरी सिनेमा

शिवेंद्र राणा की रिपोर्ट

सिनेमा भारत की सामाजिक-राजनीतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है, बेशक आप इसे स्वीकार करें या नकार दें। पिछले दिनों नदव लैपिड और कश्मीर फाइल्स के विवाद में सिनेमा से सम्बन्धित एक अहम ख़बर गौड़-सी हो गयी। गोवा में आयोजित भारतीय अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में बिहार के कला एवं संस्कृति मंत्री ने घोषणा की कि बिहार सरकार अपनी नयी फ़िल्म नीति को अन्तिम रूप दे रही है। उन्होंने ख़ासतौर भोजपुरी सिनेमा को ध्यान में रखते हुए बिहार को एक आकर्षक शूटिंग स्थल के रूप में विकसित किये जाने, शूटिंग के लिए एकल खिडक़ी मंज़ूरी की सुविधा प्रदान करने, बेहतर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात कही।

बिहार में फ़िल्मों की शूटिंग हमेशा चुनौतीपूर्ण निर्णय रहा है। उदाहरणस्वरूप 70 के दशक में विजय आनंद द्वारा निर्देशित ‘जॉनी मेरा नाम’ की शूटिंग के लिए नालंदा आयी यूनिट ख़राब भीड़ प्रबंधन की शिकायत लेकर लौटी। इस नकारात्मकता का प्रभाव लम्बे समय तक बिहार पर बना रहा। मूलभूत सुविधाओं के अभाव के साथ ही स्थानीय जनता का उपद्रव एवं क़ानून-व्यवस्था की समस्या बिहार की सबसे दुर्धर्ष व्याधि तथा उसके विकास का सबसे बड़ा अवरोधक रहा है। इसी वजह से निर्माता-निर्देशक ऐसे लोकेशन के लिए उत्तर प्रदेश, झारखण्ड या मध्य प्रदेश का रुख़ कर लेते हैं।

ध्यातव्य है कि रिचर्ड एटनबरो की ‘गाँधी’, ई. निवास की ‘शूल’ और 2019 में प्रदर्शित राजकुमार गुप्ता की ‘इंडियाज मोस्ट वांटेड’ जैसे कुछ एक अपवादों को छोडक़र बिहार में फ़िल्मों की शूटिंग शायद ही होती है। यहाँ तक कि बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित ‘दामुल’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’ जैसी फ़िल्मों का फ़िल्मांकन भी राज्य से बाहर हुआ। किन्तु भोजपुरी सिनेमा के साथ और भी कई समस्याएँ हैं और मूलभूत-विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या केवल सरकारी नीतियों एवं आर्थिक सहायता से भोजपुरी सिनेमा का स्वरूप सुधर जाएगा? क्योंकि यहाँ वास्तविक समस्या भोजपुरी इंडस्ट्री से जुड़े वर्ग की नीति और नीयत है। भोजपुरी सिनेमा का नाम सुनते ही पहला ख़याल जो मन में आता है, वह अश्लीलता, नग्नता एवं फूहड़ता का होता है। भारत में एक बड़ा वर्ग, जिसमें राजनेता भी शामिल रहें हैं; सिनेमा का घोर आलोचक रहा है। सितंबर, 1950 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने भारतीय समाज पर सिनेमा के दुष्प्रभाव की आलोचना की थी। सन् 1953 में मद्रास के मुख्यमंत्री ने फ़िल्म निर्माताओं से अपील की थी कि उन्हें फ़िल्मों से सेक्स अपील कर करना चाहिए। उनका मानना था कि सेक्स एवं हत्याओं पर केंद्रित सिनेमा भारतीय युवाओं को भ्रष्ट कर रहा है।

हिन्दी या बाक़ी क्षेत्रीय सिनेमाई वर्ग की तुलना करें, तो यह आक्षेप भोजपुरी सिनेमा पर सर्वाधिक वस्तुनिष्ठ रूप से लागू होता है। आज महिलाओं के प्रति यौन हिंसा एवं दुव्र्यवहार के पीछे के कारणों की समीक्षा हो रही है, उसका एक पक्ष जो अभी भी इस आलोचना से अछूता है, सिनेमा का है; जिसने समाज के अवचेतन मन में अनियंत्रित-असन्तुलित यौनिकता की विद्रूप भावना भर दी है। भोजपुरी सिनेमा ने तो ऐसी अभद्र कुंठा के प्रदर्शन के कीर्तिमान स्थापित कर रखें हैं। भोजपुरी फ़िल्मों के दृश्य, उसके गाने सॉफ्ट पोर्न का एहसास कराएँगे। अधिकांश भोजपुरी फ़िल्में ऐसी हैं, जिन्हें परिवार के साथ देखने की हिम्मत नहीं की जा सकती।

भोजपुरी सिनेमा के उत्थान तथा आलोच्य बिहार सरकार की सिनेमा नीति पर सर्वाधिक आश्चर्यजनक तथा हास्यास्पद सुझाव एवं वक्तव्य सत्तारूढ़ दल के सांसदों, जो भोजपुरी सिनेमा के गायक और अभिनेता रहें हैं; के थे। ये बिहार सरकार को सिनेमा के लिए 500 करोड़ का कोष रखने, सुनिश्चित नीति लागू करने एवं फ़िल्म सिटी विकसित करने की राय दे रहे थे। लेकिन ये वही लोग हैं, जिन्होंने भोजपुरी की रोटी खायी और उसका मान-मर्दन भी किया। सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए यहाँ अश्लीलता एवं पतनशीलता की शुरुआत की, और इसी के बूते आज देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुँचकर जनता को नैतिकता एवं सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का ज्ञान दे रहें हैं। इन सभी को तो अपने कुकर्मों के लिए भोजपुरी भाषी जनता से माफ़ी माँगनी चाहिए। वो भोजपुरी में कहते हैं ना!… ‘फ़ायदा बदे क़ायदा नाही बिगाड़ल जाला’। लेकिन वही क़ायदा बिगाडऩे वाले आज यहाँ क़ायदे का सुझाव दे रहे हैं।

देश के विभिन्न प्रादेशिक सिनेमा इंडस्ट्रीज आज बॉलीवुड़ से कड़ी प्रतिस्पर्धा कर रहें हैं और उसे पछाड़ भी रहें हैं। गुजराती फ़िल्म ‘छेल्लो शो’ भारत की तरफ़ से आधिकारिक रूप से 2023 के ऑस्कर पुरस्कार के लिए भेजी गयी। कन्नड़ में ‘केजीएफ’ एवं ‘कांतारा’, तेलुगु में ‘बाहुबली’ एवं ‘आरआरआर’, तमिल में ‘पोंनियिन सेलवन-1’ तथा ‘पुष्पा’ ने भारत समेत वैश्विक जगत में अपना लोहा मनवाया। वहीं मलयालम सिनेमा अपने श्रेष्ठ विषयवस्तु (कन्टेट) के लिए ही जाना जाता है। यहाँ तक कि बंगाली, असमिया या उडिय़ा सिनेमा भी निरंतर अपनी कलात्मकता से ध्यान आकर्षित करते रहते हैं। इसी के बरअक्स भोजपुरी सिनेमा को देखें। उसकी उल्लेखनीय फ़िल्मों में ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ (1963) एवं ‘नदिया के पार’ (1982) के अतिरिक्त किसी और फ़िल्म का नाम याद करना कठिन है। इसकी वजह क्या है?

असल में समृद्ध साहित्य ही समृद्ध सिनेमा का आधार बनता है। ऐतिहासिक रूप से सातवीं सदी में ही अपना आकार धारण कर चुकी भोजपुरी के पास साहित्य एवं संस्कारों की एक समृद्ध विरासत है। किन्तु भोजपुरी सिनेमा उससे कोसों दूर है। इसे अपने समाज की मूलभूत संस्कृति और इतिहास पर आधारित होना चाहिए था। वह गिरमिटिया मज़दूरों की वेदना, वर्तमान में रोज़गार के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में पलायन करने वाले मज़दूरों की पीड़ा, उनके परिवार, पत्नी-प्रेयसी के एकाकीपन, शिक्षा एवं उद्योगों की न्यूनता से उपजा कष्ट, जातिगत संघर्ष और अपराध की पीड़ा, ग़रीबी-अभाव एवं वंचना के चित्रण आदि को अपने क़िस्सागोई के केंद्र में रखना चाहिए था। लेकिन भोजपुरी सिनेमा से ये विषय नदारद हैं। इसके बजाय उस पर ‘बॉलीवुडियापन’ का प्रभाव बढ़ता जा रहा है और उसका नतीजा भी प्रत्यक्ष है।

भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. कमलेश राय कहते हैं- ‘भोजपुरी सिनेमा के भ्रष्ट तत्त्वों को न साहित्यकारों से कोई सरोकार है और न ही भोजपुरी के प्रतिष्ठित साहित्यकार ऐसे तत्त्वों और उनके कार्यों में रुचि रखते हैं।’

नतीजा स्पष्ट परिलक्षित है। आज का भोजपुरी सिनेमा इसीलिए पतित है, क्योंकि उसने अपने जड़ों को छोड़ दिया है। भोजपुरी इंडस्ट्री अपनी संस्कृति को गम्भीरतापूर्वक सिल्वर पर्दे पर गौरवान्वित रूप से प्रदर्शित करने का प्रयास नहीं करती। वर्तमान भोजपुरी सिनेमा में घूँघट और पनघट, सीता और संस्कृति, चौपाल और पंचायत, बिरहा और निर्गुण, खेती और मज़दूर जैसे अपनाईयत वाले विषय नदारद हैं। भोजपुरी के अभिनेता-अभिनेत्रियाँ पर्दे पर पश्चिमी परिधानों में दिखते हैं। इसके विपरीत दक्षिण के प्रादेशिक सिनेमा ने अपने पारम्परिक संस्कारों को निरंतर सहेजकर रखा है। तमिल, तेलुगु या मलयाली सिनेमा के कलाकार अपने पारम्परिक परिधान लुंगी-कुर्ते में दिखते हैं, चाहे वह बिजनेस टायकून हो, हीरो या विलेन ही क्यों न हो; और वहाँ की महिला कलाकारों का भी पहनावा पारम्परिक ही होता है। दक्षिण के कलाकार परदे पर ही नहीं। वे अपने सामान्य व निजी जीवन में अपने भारतीय संस्कारों को गौरव के साथ प्रदर्शित करते हैं। पिछले दिनों अभिनेता धनुष एवं सूर्या का पारम्परिक धोती-कुर्ते पहनकर फ़िल्मी अवॉर्ड समारोह में जाना एक सुखद तथा गौरवान्वित चर्चा का विषय बना था। वहीं भोजपुरी सिनेमा के कलाकार आये दिन विभिन्न कार्यक्रमों के मंचों और सोशल मीडिया पर अपने गाली-गलौज, झगड़े एवं विवादों के लिए चर्चा में रहते हैं।

वास्तव में भोजपुरी सिनेमा की यही सबसे बड़ी ख़ामी है। जब कोई भी सिनेमा अपने समाज से कटा होगा, तो न वह समाज पर अवलंबित होता है और न समाज उसको स्वीकृति करता है। इसीलिए वह अपने को सुदृढ़ नहीं कर सकता। इसी परिपेक्ष्य में देखें, तो समाज के अवलम्बन की बात तो दूर, भोजपुरी सिनेमा एवं गीत-संगीत अपने ही सामाजिक संस्कारों एवं संस्कृति को खोखला करने में लगा है। अथवा यूँ कहिये कि इस वक़्त भोजपुरिया समाज के अपमान का सूचक बन चुका है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जिस परम्परागत भोजपुरिया नारी का आभूषण परदा रहा है, उसे भोजपुरी सिनेमा ने व्यावसायिकता के लोभ में अद्र्धनग्न अवस्था में कामुक मनोभावों के साथ परदे पर ला खड़ा किया है।  जब सिनेमा नारी की नग्नता और यौन कुंठा पर आधारित हो जाए, तो वह कला नहीं, बल्कि भांडगीरी होती है। अत: जिस भोजपुरी सिनेमा के उत्थान की तक़रीरें हो रही हैं, वो मूल रूप से हैं ही नहीं। फिर उसके पतनशीलता का प्रश्न ही कहाँ उठता है? अगर कला का कोई रूप भाषा एवं संस्कृति को इस तरह विकृत रूप में प्रस्तुत करता है, तो ऐसी कला का उन्मूलन कर दिया जाना ही उस समाज के हित में होगा। फिर ऐसी असभ्यता को कला के स्वरूप में परिभाषित करना कला का अपमान ही है।

कुछ ऐसी ही दुर्गति आज बॉलीवुड की भी है। क्योंकि वह भी अपने मूल परिदृश्य को छोडक़र समलैंगिकता, अनैतिक यौन सम्बन्ध, बेतरतीब हिंसा, ड्रग्स, पारिवारिक-सामाजिक मूल्यों का तिरस्कार करने एवं विवाह संस्था को अपमानित करने में ही ख़ुद को गौरवान्वित महसूस करने लगा था। वह भी अपने आधारभूत मूल्यों को त्यागकर ख़ुद को ‘वोग’ दिखाने और भारतीय जनता को ‘प्रवोक’ करने के फेर में कहीं का नहीं रहा है।

सिनेमाई जगत का यह तर्क सिरे से अस्वीकृति है कि सिनेमा दर्शकों की इच्छानुरूप ढलता है; बल्कि सच्चाई यह है कि सिनेमा का व्यवसायी वर्ग दर्शकों को अपने लोभ और अपनी व्यवस्था के अनुरूप परिवर्तित करने का प्रयास करता है। प्रशंसित कन्नड़ फ़िल्म ‘कांतारा’ का ही उदाहरण लें, जिसने इस ढोंगी आधुनिकता में स्थानीय कन्नड़ संस्कृति के अंतर्मन को आत्मविश्वास के साथ दर्शाया और जिसे पूरे देश ने सराहा। कांतारा अपने सांस्कृतिक मूल्यों की गौरवशाली परम्परा का बेहतरीन निरूपण करती है। जिस तरह इसने स्थानीय देवता, स्थानीय समाज, स्थानीय आचार-विचार, भाषा-व्यवहार को प्रदर्शित किया है, उसने भारतीय संस्कृति का सम्मान करने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित किया। कहने का तात्पर्य यह है कि दक्षिण का सिनेमाई उद्योग अपने जड़ों से जुडक़र अच्छा व्यवसाय कर रहा है। अत: इससे ज़्यादा वाहियात बात कुछ नहीं हो सकती कि भोजपुरी इंडस्ट्री सारा दोषारोपण अपने दर्शकों की रुचि पर करे। विख्यात फ्रांसीसी फ़िल्म समीक्षक जीन गोडार्ड ने कहा था- ‘दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत धोखे का नाम सिनेमा है।’

आज यही क्रूर धोखा भोजपुरी सिनेमा अपने लोगों के साथ कर रहा है। भोजपुरी इंडस्ट्री के साथ कुछ और दिक़्क़तें भी हैं। हाल के वर्षों में मसाला फ़िल्मों के ज़रिये इसने ठीक-ठाक कमायी की है; लेकिन अच्छे कथानक एवं स्तरीय अभिनय के अभाव में इसकी साख गर्त में है। यही कारण है कि गम्भीर विषयों पर फ़िल्में बनाने वाले निर्माता-निर्देशक, एवं कलाकार इससे जुडऩा नहीं चाहते। आज भी इनका पूरा ध्यान पटकथा के बजाय आइटम गीतों, फूहड़ संवाद और अनावश्यक एक्शन दृश्यों पर है। रही बात इनके गीतों का स्तर की तो यह आज भी चोली, चुम्मा, नाभी, जीजा-साली, देवर-भौजाई, ‘कमरिया करे लपालप’, और ‘रिमोट से लहँगा उठाने’ से आगे नहीं बढ़ पाया है।

इस पर हिन्दी के एक वरिष्ठ पत्रकार तल्ख़ टिप्पणी करते हैं- ‘अभद्र तरीक़े से कूल्हे मटकाने को न तो नृत्य कहते हैं और न ही अशिष्ट शब्दों के प्रयोग को गीत।’ इसको कला कहना तो कला का अपमान ही है। यही वजह है कि 25 से 30 करोड़ की भोजपुरी भाषी जनसंख्या में से 10 फ़ीसदी आबादी भी भोजपुरी सिनेमा नहीं देखती, जबकि औसतन 10 से 15 करोड़ की तमिल, तेलुगु या मलयाली आबादी का सिनेमा आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहा है। थोड़ी समस्या भोजपुरी सिनेमा के पिछले दो दशकों में तैयार हुए दर्शकों की भी है, जिन्हें अभी भी ‘घाघरा-चोली’ की विकृत यौन कुंठा से बाहर निकलने की ज़रूरत है। हालाँकि इस घुप अँधेरे में रोशनी की किरण भी कौंध रही है। अवधेश मिश्रा की ‘बाबुल’, ‘जुगनू’ एवं प्रभात वर्मा की ‘चिरइयो ना बोले’ जैसी फ़िल्में साफ़-सुथरे और बेहतरीन भोजपुरी सिनेमा की उम्मीद जगाती हैं।

साहित्य अथवा कला का कोई भी स्वरूप, जो समाज के लिए शर्मिंदगी एवं विघटन का प्रतीक बन जाए; उसका न होना ही उचित है। वैसे भोजपुरी की परम्परा इतनी महान् है कि उसके सिनेमाई जगत के कुछ अवांछित तत्त्वों की भ्रष्टता इसकी गौरवशाली थाती को नष्ट नहीं कर पाएगी। भोजपुरी सिनेमा इस कुटिलता और फूहड़ता से अवश्य उभरेगा, भले ही थोड़ा समय लगे। जैसा कि भोजपुरी के सुकुमार गीतकार आनंद गहमरी कहते हैं :-

‘‘ओस दूभ पर कबले ठहरी।

धीर-धीरे दिन लगले बहुरी।।’’

(लेखक राजनीति व इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

छात्रों को निगल रही अंधी सनक

जून की दहकती गर्मी में वायु सेना के सार्जेन्ट पद से सेवानिवृत्त हुए 60 से 65 वर्षीय कुलदीप रस्तोगी तडक़े अपनी बेटी दीपांशी के साथ बदायूँ से जयपुर पहुँचे थे। वह दीवान से टेक लगाये सोफे पर बैठी अपनी बेटी दीपांशी से मुखातिब थे। उनके चेहरे पर ग़ुस्से के तेवर साफ़ नज़र आ रहे थे। बाप-बेटी के बीच किसी गरमागरम मुद्दे को लेकर छिड़ी बहस ने लेकर अब तक दीवान पर लेटने की मुद्रा में पसरे हुए रस्तोगी दीपांशी के जवाब पर एकाएक तमक कर खड़े हो गये। वह आवेश में बेटी से बोले, तो यह तुम्हारा आख़िरी फ़ैसला है कि ‘तुम कोचिंग ज्वाइन नहीं करोगी? तुम हमारी उन उम्मीदों पर पलीता लगाने पर तुली हो, जो हमने यह सोचकर लगा रखी थी कि एक दिन आईआईटियन बनकर परिवार का नाम रोशन करोगी।’

दीपांशी ने एक गहरी साँस लेते हुए कहा- ‘पापा! आप इतना उखड़ क्यों रहे हैं? जो सब्जेक्ट मेरी च्वाइस में नहीं है, उसे सिर्फ़ आपकी बेजा ख़्वाहिशों की ख़ातिर ढोल की तरह गले में लटकाने से मेरा क्या फ़ायदा? फोटोग्राफी मेरा शौक़ है। मेरा पैशन है। मुझे इसमें कुछ करने दीजिए। इसमें भी तो मैं अपना करियर बना सकती हूँ। इसमें क्या दिक़्क़त है आपको? कैसे बाप हैं आप? जो मेरी भावना की बलि चढ़ाने पर तुले हैं। सिर्फ़ अपनी आन की ख़ातिर, ताकि सोसायटी में ज्ञान बघार सकें कि देखो मैं उस टॉपर आईआईटियन बेटी का बाप हूँ, जिसने कट ऑफ में अपना अव्वल मुक़ाम बनाया है।’ बुरी तरह रुआँसी हो चुकी दीपांशी ने एक पल रुककर कहा- ‘पापा मेरा यह आख़िरी ही नहीं, पहला फ़ैसला था। आख़िरी फ़ैसला तो इसे आप बना रहे हैं। आख़िर जो दवा मुझे पीनी ही नहीं, वो आप मेरे गले में जबरन क्यों उड़ेल रहे हैं?’

दीपांशी के दो-टूक जवाब से तिलमिलाये हुए रस्तोगी उफनते ग़ुस्से पर क़ाबू पाने की बजाय उस पर झपट पड़े। दीपांशी को बुरी तरह झिंझोड़ते हुए बोले- ‘अब मैं क्या मुँह लेकर घर वापस जाऊँगा? तूने तो मेरे अरमानों की अरथी ही निकाल दी। इससे तो अच्छा है, तुझे भी मार दूँ और ख़ुद को भी ख़त्म कर लूँ?

सुबह 10:00 बजे तक भी जब रस्तोगी का कमरा नहीं खुला और दस्तक देने के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला, तो क़रीब तीन बार चाय की ट्रे लेकर वापस लौट चुका होटल का वेटर आशंकाओं से शकपकाया हुआ मैनेजर के पास पहुँचा। हाँफते हुए जितना कुछ उसने बताया, मैनेजर ने भी कमरा खुलवाने के लिए वही कोशिश दोहरायी। अंदेशा यक़ीन में बदल चुका, तो आख़िर सबने मिलकर दरवाज़ा तोड़ दिया। कमरे का दृष्य देखते ही मैनेजर की आँखें फटी रह गयीं। दीपांशी सोफे पर मरी पड़ी थी और रस्तोगी की लाश पंखे से लटक रही थी।’

दूसरी घटना सार्थक की है। आईआईटी की तैयारी के लिए उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से आया सार्थक हॉस्टल की बजाय कॉलोनी के मकान में अपने रिश्तेदारों के पास रह रहा था। पिछले पाँच घंटे से अपने ग्राउंड फ्लोर के कमरे में किताबों में सिर गड़ाये हुए था। रात के 10:00 बज चुके थे। लेकिन खाना खाने के लिए नहीं पहुँचने पर परिजनों ने कमरे के बाहर दस्तक दी। खाने के पुरज़ोर आग्रह के बावजूद उसने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि भूख लगने पर वो ख़ुद किचन से लेकर खाना खा लेगा। सार्थक को अनमना देखते हुए घर वालों ने ज़्यादा आग्रह भी नहीं किया। कमरे में उसकी स्टडी टेबल पर किताबों का ढेर लगा हुआ था। लेकिन उसकी उचटती निगाह रह-रहकर पापा के उस पत्र की पंक्तियों में उलझ जाती थी, जिसमें कहा गया था- ‘याद रखना बेटे! तुम्हें 70 प्रतिशत नंबर लाने हैं। वरना सब बेकार चला जाएगा। …बड़े जोड़-तोड़ के साथ इतनी बड़ी रक़म जुटायी है और अगर तुम्हारी मेहनत ठीक नहीं रही, तो हम बुरी तरह क़र्ज़े में डूब जाएँगे। याद रखना बेटा! पूरे परिवार का भविष्य तुम्हारे हाथ में है…।’

यह चिट्ठी आये क़रीब तीन दिन बीत चुके थे। सार्थक को तनाव में देखकर उसके एक सहपाठी वीरेन्द्र ने बड़े आग्रह के साथ पूछा, तो सार्थक बुरी तरह फफक पड़ा,। अब 70 परसेंट नहीं आये, तो क्या होगा?’ वीरेन्द्र ने उसे तसल्ली भी दी- ‘टेंशन क्यों लेता है यार! अपना काम है जमकर मेहनत करना। फिर क्यों नहीं आएँगे 70 परसेंट? लेकिन सार्थक चाहकर भी न तो अपने आपको तसल्ली दे सका और न ही बढ़ते दबाव से मुक्त हो पाया। अगली सुबह घर में मौत का सन्नाटा पसर गया। देर तक दस्तकों के बाद भी कोई हरकत नहीं हुई, तो घरवालों ने दरवाज़ा तोडक़र खोला, सार्थक की लाश पंखे से झूल रही थी। स्टडी टेबल पर एक पुर्जे में चंद वाक्य लिखे थे- ‘पापा! इतना प्रेशर नहीं झेल पाया। यही बात दिनों-दिन खाये जा रही थी कि 70 परसेंट नहीं आये, तो क्या होगा? पापा! आप मेरे भाई को मेरी तरह अपने से अलग मत करना।’

तनाव से बचने के लिए मरहम लगाने वालों के लिए तो यह स्थिति और त्रासद होती है। बावजूद उन्हें भी माँ-बाप की सनक का शिकार होना पड़ता है। कीर्ति नामक काऊंसलर भी अपने आपको इस सनक से नहीं बचा सकी। भावनात्मक पीड़ा से निजात पाने के लिए उसने भी यही राह अपनायी। तीन वाक्यों की चिट्ठी में उसका लावा बह गया- ‘पापा! मैं अंग्रेजी पढऩा चाहती हूँ। आप जबरन मुझ पर विज्ञान थोप रहे हैं। पिता को अपनी ग़लती पर पछतावा तो हुआ; लेकिन तब, जब बेटी मौत के आगोश में चली गयी। इन घटनाओं का डरावना पहलू यह है कि दीपांशु और सार्थक ही अकेले छात्र नहीं हैं, जिन पर माता-पिता की प्रबल इच्छा के चलते भयावह दबाव है। व्हाट्स ऐप पर छात्रा प्रियंका की यह बात बहुत कुछ कह जाती है कि ‘हर पल पापा का उदास चेहरा नज़र आता है, जो उसे आईआईटियन देखने की प्रबल आशंका सँजोये हैं।’

मनोचिकित्सकों का कहना है कि प्रतिभा अब मानो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन गयी है, जिसे सम्भावित करियर के लिए उर्वर माना जाने लगा है। बढ़ती राष्ट्रीय प्रवृत्ति की बात करें, तो बच्चों को नामवर बनाने की सनक के लिए छटपटाते हुए माँ-बाप हर कहीं मिल जाएँगे; लेकिन उनकी महत्त्वाकांक्षा में जकड़ा कोटा कोचिंग उद्योग कितना पिस रहा है? इसकी सत्य और सटीक मिसाल यह है कि ‘आबादी के मामले में कोटा भले ही मुम्बई से 12 गुना कम है। लेकिन एक करोड़ 24 लाख की आबादी वाले मुम्बई महानगर के मुकाबले कोटा में छात्रों की ख़ुदकुशी के मामले ज़्यादा सामने आ रहे हैं। हर आठवें दिन एक छात्र मौत को गले लगा रहा है। महत्त्वाकांक्षी माँ-बाप पुरानी रूढिय़ों से बाहर निकलकर संतान की सफलता के लिए उनकी ज़िन्दगी का जोखिम उठाने से भी नहीं हिचकते। शिक्षा शास्त्रियों का तो यहाँ तक कहना है कि बच्चे को धकियाकर और धमकाकर इस तरह सफलता के लिए प्रेरित करना हिंसा करने जैसा है।

मनोचिकित्सक डॉ. स्नेहाशीष गुप्ता कहते हैं कि कोई भी विषय जबरन थोपकर बच्चों को होनहार बिरबान नहीं बनाया जा सकता। माँ-बाप बच्चों के माध्यम से अपने सपनों को साकार देखना चाहते हैं। यह करियर थोपने जैसी जबरन कोशिश बच्चों को अवसाद और आत्मघात की ओर धकेल रही है।

यह हठीला सच है कि अभिभावक ख़ूँख़ार हो गये हैं और मध्यम वर्गीय दुश्चक्र से बाहर आने के लिए बच्चों को जबरन अपनी आकांक्षाओं का ज़रिया बनाते हैं। पता नहीं क्यों अभिभावक नहीं जानते कि भारी दबाव के दुष्प्रभाव ही होते हैं। आख़िर वे क्यों नहीं सोचते कि बच्चा भी तो उनकी ही तरह सामान्य इंसान है। छात्र ताराचंद द्वारा की गयी आत्महत्या की मिसाल दें, तो घूम-फिर कर बात वहीं आकर ठहरती है। महावीर नगर थाना क्षेत्र की कॉलोनी में रहकर कोचिंग की तैयारी कर रहे पाली निवासी ताराचंद ने अपने सुसाइड नोट में अपने पिता को सब कुछ साफ़ लिखा है कि मैं आपका सपना साकार नहीं कर पाऊँगा आप मेरे बारे में जैसा सोचते थे, मैं वैसा नहीं था। मैंने कुछ ग़लत काम नहीं किया; लेकिन कुछ सही भी तो नहीं किया। मैंने जो कुछ माँगा, आपने दिया; लेकिन बदले में मैंने आपको क्या दिया? टेंशन?’

मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक डॉक्टर देवेन्द्र विजयवर्गीय कहते हैं- ‘परिजनों ने उससे जैसी अपेक्षाएँ लगायी थीं, उसकी मानसिकता उसे स्वीकार ही नहीं कर पा रही थी। ज़ाहिर है कि परिजनों ने डॉक्टर बनने की अपनी कामना जबरन बच्चे पर थोप दी, जबकि उस विषय में उसकी कोई रुचि नहीं थी। उसका मन इसको स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था, जिसकी परिणति उसे ज़िन्दगी से निजात ही नज़र आयी, और उसने वही किया; यानी एक और छात्र माँ-बाप की बेजा सनक की बलि चढ़ गया।’

पिछले दिनों कोटा में बच्चों के आत्मघात की तीन घटनाएँ क्या हुईं, पूरा शहर हिल गया। इनमें से दो छात्र बिहार के थे और एक अन्य छात्र मध्य प्रदेश के शिवपुरी का था। सब एक ही कोचिंग संस्थान से नीट की तैयारी कर रहे थे। बिहार निवासी अंकुश आनंद तथा उज्ज्वल तलवंडी स्थित एक हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे, जबकि शिवपुरी का प्रणव शर्मा कन्हाड़ी के लेंडमार्क सिटी स्थित हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा था। उज्ज्वल और अंकुश अपने-अपने कमरे में संदिग्ध हालत में मृत मिले, जबकि प्रणव अपने कमरे के बाहर बेसुध मिला। उसे अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ उसने भी दम तोड़ दिया। एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रियल साईक्रेटी ऑफ इंडिया की सालाना कॉन्फ्रेंस में यह मुद्दा सुलग उठा।

संगठन के रांची निदेशक डॉ. वासुदेव दास का कहना था- ‘बच्चों की परफॉर्मेंस पर बेजा सवाल उठाने की बजाय उससे सामान्य तरीक़े से हालचाल पूछो, तभी आपका बच्चा आपसे अपनी परेशानी साझा करेगा।’

डॉ. दास ने कहते हैं- ‘मेरा बेटा भी इंजीनियरिंग कोचिंग के लिए कोटा आया हुआ है। बतौर पेरेंट्स मैंने बेटे को स्पष्ट कर दिया कि उसकी ख़ुशी से ज़्यादा हमारे लिए कुछ नहीं है।’

तलवंडी स्थित हॉस्टल में रहने वाले छात्र रूह कँपाने वाली यह घटना ज़िन्दगी भर नहीं भूल पाएँगे। सुबह उठने के साथ ही हॉस्टल में उनके साथ रहने व पढऩे वाले दो सहपाठी अचानक उनके बीच से दुनिया छोड़ गये। भविष्य सँवारने के लिए आये दो छात्र परिजनों को रोता-बिलखता छोडक़र चले गये और उनके साथी तनाव और चिन्ता की शिकन लिये अपने सहपाठियों के शव उठा रहे थे। साथी छात्र ही एंबुलेंस से दोनों मृतक छात्रों के शव लेकर मोर्चरी पहुँचे। एंबुलेंस से शव उतारते हुए ये छात्र डरे-सहमे नज़र आये।

हॉस्टल में रहने वाले छात्र हिमांशु ने बताया कि अंकुश व और उज्ज्वल हॉस्टल की पहली मंजिल पर रहते थे। दोनों के कमरे आसपास ही थे। वह अंकुश के सामने वाले कमरे में रहता है। सुबह वह अपने कमरे में था। उसने दोपहर क़रीब 12:00 बजे अंकुश को कई बार कॉल की; कॉल रिसीव न होने पर वह अंकुश के कमरे तक गया। आवाज़ देने के बाद भी उसने दरवाज़ा नहीं खोला, तो कॉल करके हॉस्टल संचालक को बताया। उसके बाद हॉस्टल संचालक आया और पुलिस को बुलाया। छात्र ने बताया कि अंकुश और उज्ज्वल चार साल से कोटा में रहकर नीट की तैयारी कर रहे थे। उज्ज्वल की बहन भी कोटा में रहकर पढ़ाई कर रही है। वह गल्र्स हॉस्टल में रहती है। हॉस्टल में घटना की बात सुनकर वह आयी थी। जब उसने उज्ज्वल के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया, तो अन्दर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी। इसके बाद पुलिस ने उसे कमरे के दरवाज़े को तोडक़र देखा, तो उज्ज्वल भी संदिग्ध हालात में मृत मिला। हाल ही में बरेली, उत्तर प्रदेश के अनिकेत ने भी कोटा के एक हॉस्टल में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली।

कोटा में कोचिंग करने वाले छात्र-छात्राओं की आत्महत्या के अधिकतर मामले पढ़ाई के तनाव के चलते हुए हैं। गत दिनों पढ़ाई के तनाव और टेस्ट में नम्बर कम आने पर एक छात्र कोटा छोडक़र ट्रेन में बैठकर चला गया था। दूसरे के मामले में एक छात्रा की संदिग्ध हालात में मौत हो गयी थी। पुलिस के अनुसार, प्रथम दृष्टया सामने आया था कि छात्रा पढ़ाई को लेकर तनाव में थी। कोचिंग टेस्ट में उसके नंबर कम आये थे। इसी तरह रात को घूमने जाने की बात पर पिता ने डाँटा तो एक छात्रा हॉस्टल छोडक़र ट्रेन में बैठकर चली गयी। छात्र-छात्राओं में पढ़ाई का तनाव इस क़दरहावी है कि उन्हें अच्छे-बुरे का एहसास नहीं है। कोटा में कोचिंग संस्थानों में पढऩे वाले छात्रों की आत्महत्याओं के बढ़ते मामले को कोटा रेंज के आईजी ने बेहद गम्भीर माना है। उन्होंने इस मामले में मंगलवार को एक बैठक बुलायी। बैठक में जिन थानों में छात्रों के आत्महत्या के प्रकरण दर्ज है, उस थाने से सम्बन्धित पुलिस अधिकारियों एवं कोचिंग संस्थानों के संचालकों को बुलाया गया। कोटा मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. बी.एस. शेखावत कहते हैं कि आत्महत्या एक मानसिक बीमारी है। इसके कई कारण होते हैं। विपरीत परिस्थिति होने के कारण भी कोई आत्महत्या जैसा क़दम उठाता है। ऐसे में वह व्यक्ति शुरुआती तौर पर बाहर निकलना चाहता है; लेकिन नेगेटिविटी के चलते वह बाहर नहीं निकल पाता। आत्महत्या के क़दम अक्सर लोग पढ़ाई, प्रेम में असफलता धोखा व क़र्ज़ा होने की स्थिति में उठाते हैं। स्टूडेंट माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पाते हैं। पढ़ाई का बोझ सहन नहीं कर पाते। कोचिंग में काउंसलिंग के लिए साइकोलॉजिस्ट होना चाहिए, जो ऐसे लोगों को इनकी गतिविधियों से भांपकर काउंसलिंग कर उन्हें समय पर इलाज उपलब्ध करवा सके।

हॉस्टल के कमरे में ख़ुदकुशी करने वाला कोचिंग छात्र उज्ज्वल पढ़ाई में बेहतर था; लेकिन ऑनलाइन गेम पबजी खेलने का शोकीन था। वह पबजी ऑनलाइन टीम के साथ खेलता था। वहीं आत्महत्या करने वाला एक अन्य छात्र अंकुश पढ़ाई में पिछड़ रहा था, जिससे तनाव में था। उज्ज्वल के दोस्त विपुल ने बताया कि उज्ज्वल कई बार उसके सामने भी टीम बनाकर पबजी खेलता था। एक दिन पहले ही उससे इस बारे में बात हुई थी। वह जवाहर नगर स्थित एक मैस से खाना खाकर आ रहा था। तब उज्ज्वल जवाहर नगर पुलिया पर मिला था। बातचीत के बाद वह कमरे में चला गया। उज्ज्वल को असामान्य कभी नहीं देखा गया। उसका व्यवहार भी सही था।

राजस्थान में एक ही दिन में तीन छात्रों का यकायक जीवन से हारकर मौत को गले लगाना सोचने पर मजबूर करता है। आख़िर ऐसे कौन से कारण रहे होंगे, जिनके चलते इन छात्रों को जीने की चाह ख़त्म हो गयी। शिक्षा नगरी कोटा में आत्महत्या करने वाले तीनों छात्र नीट की तैयारी कर रहे थे, जबकि भरतपुर में आत्महत्या करने वाला अलवर का युवा चिकित्सक बनकर लोगों का जीवन बचाने से पहले ख़ुद ही ज़िन्दगी की जंग हार गया। चार प्रतिभाशाली छात्रों का जीने के प्रति मोह भंग क्यों हुआ। इसकी तह तक जाना ज़रूरी है। इसको सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। वैसे प्रारम्भिक रूप से इतना तो तय है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी या प्रोफेशनल कोर्स करने वाले युवाओं पर भारी दबाव होता है। अक्सर कोमल मन यह दबाव झेल नहीं पाता है।

आत्महत्या करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे, छात्र वर्ग में असफलता को न झेल पाना, अपमानित होने का भय, अपनों से दूरी, ख़ुद को हीन समझ लेना, भावनाओं पर क़ाबू न रख पाना आदि प्रमुख कारण माने जा सकते हैं। इसके अलावा कई सामाजिक आर्थिक, वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं। एक प्रमुख वजह यह भी है कि परिजन देखा-देखी के चक्कर में बच्चों से वह सब करवाना चाहते हैं, जो कि बच्चों की पसन्द नहीं होता। परिजनों को यह समझना होगा कि हर बच्चा चिकित्सक या इंजीनियर नहीं बन सकता। हो सकता है कि बच्चा किसी दूसरे क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाये। इस प्रकार के उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। दूसरी बात, सिर्फ़ पढ़ाई के लिए बच्चों को दूसरे शहर में भेजकर परिजनों को इतिश्री नहीं करनी चाहिए। बच्चों के साथ निरंतर संवाद भी पढ़ाई जितना ही ज़रूरी है। अब मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में घटनाओं का पूरा ब्योरा तलब करते हुए सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

उत्तर प्रदेश में जीएसटी पर शान्ति

उत्तर प्रदेश में जीएसटी वसूली को लेकर छापेमारी में ढील, व्यापारिक प्रतिष्ठान खुले

उत्तर प्रदेश में जीएसटी जाँच के विरोध में बन्द दुकानों और दूसरे औद्योगिक संस्थानों के शटर फिर उसे उठने लगे हैं। यहाँ लगभग एक महीने तक जीएसटी टीमों की छापेमारी से नाराज़ व्यापारियों में हाहाकार मचा रहा। मगर यह हाहाकार गुण्डों के डर से नहीं मचा था, वरन् प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के जाँच दलों के डर से मचा रहा।

अभी तक बुलडोजर के डर से जनता बाहर ही नहीं निकल सकी है कि जीएसटी का एक नया डर लोगों में बैठ गया। यह डर जीएसटी अर्थात् केंद्रीय बिक्री कर की वसूली को लेकर हुई ताबड़तोड़ छापेमारी की वजह से बना रहा। इस छापेमारी के डर से लगभग प्रदेश भर के व्यापारी हर दिन भारी घाटा उठाते रहे। न चाहते हुए भी उन्हें अपनी दुकानें और प्रतिष्ठान बन्द रखने पड़े। प्रशासनिक छापेमारी ने पिछले एक महीने तक उन्हें परेशान किया, ऐसा व्यापारियों का कहना है। हालाँकि अब माहौल कुछ शान्त है। मगर व्यापारियों और दुकानदारों में एक डर अभी भी बना हुआ है।

छापेमारी व आरोप-प्रत्यारोप

एक ओर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने जीएसटी चोरी का आरोप लगाकर जीएसटी विभाग के लगभग 248 जाँच दलों के अतिरिक्त आयकर विभाग, बिक्री कर विभाग, वित्त विभाग, राजस्व, ख़ुफ़िया महानिदेशालय के कई दलों एवं पुलिस बल को छुट्टा छोड़ रखा है, तो दूसरी ओर व्यापारी सरकार पर गुण्डागर्दी का आरोप लगाकर अपनी दुकानों और प्रतिष्ठानों को लगभग एक महीने बन्द करके बैठे रहे। हाल यह रहा कि प्रदेश के सभी जनपदों तथा गाँवों में छापेमारी तथा जीएसटी वसूली की गयी। कथित सूत्रों का दावा है कि अभी तक लगभग 130 करोड़ रुपये से अधिक जीएसटी चोरी पकड़ी गयी। इसके अतिरिक्त 75 करोड़ रुपये के मूल्य का सामान ज़ब्त किया गया था।

इस छापेमारी में सरकारी दावे यही हैं कि अधिकतर व्यापारी बिना बिल के सामान की बिक्री करके बड़े पैमाने पर जीएसटी चोरी कर रहे हैं। सरकारी जाँच दलों की छापेमारी के चलते वर्तमान में उत्तर प्रदेश के लकड़ी, फर्नीचर, कतरन-डली अर्थात् स्क्रैप, पंसारी अर्थात् परचून, घरेलू उपकरण जैसे बिजली का सामान आदि, घर निर्माण उपकरण. घी, तेल, आटा, चावल, दाल, आयरन, स्टील, मेंथा तथा रेस्टोरेंट व होटल आदि का व्यवसायों पर बन्दी की मार पडी। सरकार के जीएसटी वसूली करने वाले अधिकारियों का कहना है कि इन वस्तुओं एवं व्यवसायों में बड़े पैमाने पर जीएसटी चोरी की जा रही है। मगर प्रश्न यह है कि अगर इन संस्थानों में जीएसटी चोरी हो रही है, तो फिर गाँव-देहात अथवा क़स्बों तथा शहरों में छोटे दुकानदारों तक को तंग क्यों किया गया? इस छापेमारी का असर यह है कि छोटे-छोटे दुकानदार भी अपनी दुकानें नहीं खोल पा रहे थे, जिससे जनता को आवश्यक वस्तुएँ मिलना दुश्वार हो गयी थीं। प्रदेश भर में उत्तर प्रदेश उद्योग व्यापार प्रतिनिधिमंडल से लेकर जनपदों के छोटे-बड़े व्यापारिक संगठन उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के विरुद्ध एकजुट हो गये थे। कई जनपदों में व्यापारियों ने कई बार हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन एवं रैली का आयोजन भी किया, मगर योगी आदित्यनाथ सरकार पर इसका महीने भर तक कोई असर नहीं हुआ।

भौजीपुरा के एक दुकानदार सर्वेश ने कहा कि योगी सरकार की भूख इतनी बढ़ गयी है कि वह अब लोगों की छोटी-छोटी कमायी में से भी बड़ा हिस्सा हड़पने पर आमादा हो गयी है। सर्वेश कहते हैं कि वो महीने में 12-13 घंटे दुकान चलाकर बड़ी मुश्किल से घर चला रहे थे, मगर अब तो यह भी दुश्वार हो गया है; क्योंकि अगर दुकान खोलेंगे, तो अधिकारी लूटने आ जाएँगे। इसी क़स्बे के कुछ दुकानदारों ने कहा कि अगर इस तरह सरकार व्यापारियों को तंग करेगी, तो व्यापारियों से लेकर जनता तक के भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। प्रदेश की योगी सरकार ने राम राज्य का सपना दिखाकर इंस्पेक्टर और गुण्डा राज लागू कर दिया है। हम लोग कठिन परिश्रम करके अपनी गृहस्थी चलाते हैं यह सरकार को रास नहीं आ रहा है। वास्तव में योगी सरकार में भी गुण्डे तथा चमचे सुखी हैं, ईमानदार एवं मेहनती लोग नहीं। यदि योगी आदित्यनाथ को 28 प्रतिशत तक जीएसटी वसूली ही करानी है, तो इससे तो अच्छा हो कि वो स्वयं एक गुण्डे की भाँति बन्दूक लेकर अपने सरकारी अधिकारियों और पुलिस को लेकर दुकान-दुकान जाकर हफ़्ता वसूली का काम करना शुरू कर दें।

योगी आदित्यनाथ सरकार पर क्रोधित होते इन व्यापारियों में से कई की दशा दयनीय दिखी। पूरे प्रदेश के व्यापारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम विधायकों और ज़िलाधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर शीघ्र ही जीएसटी की भारी-भरकम वसूली तथा जाँच दलों की छापेमारी व लूट-खसोट पर रोक लगाने की माँग की थी। व्यापारियों स्पष्ट कह रहे हैं कि सरकार को सर्वे करना चाहिए। अगर कहीं कोई व्यापारी चोरी कर रहा है, तो उस पर कार्यवाही भी होनी चाहिए, मगर जिन व्यापारियों के पास जीएसटी नंबर है, उन पर झूठे आरोप लगाकर लूट क्यों मचायी जा रही है? जिस तरह से सरकारी अधिकारी व्यापारियों को डरा धमकाकर लूट मचा रहे हैं, ये काम तो गुण्डे ही कर सकते हैं। जब व्यापारियों को सताने का आरोप लगा, तो सरकारी जाँच दलों ने सफ़ाई दी कि वे दुकानदारों को न तो तंग कर रहे हैं तथा न ही उनका सामान उठा रहे हैं।

जाँच दलों पर इस तरह का आरोप लगाकर व्यापारी अपनी जीएसटी चोरी पर पर्दा डालना चाहते हैं। प्रदेश भर में जीएसटी छापेमारी तथा व्यापारियों के विरुद्ध जबरन वसूली की कार्यवाही को लेकर समाजवादी पार्टी भी योगी आदित्यनाथ सरकार को घेर रही है। वहीं कुछ भाजपा नेता व्यापारियों से बचकर निकलने का प्रयास करते दिखे, तो कुछ अनर्गल बातें करके व्यापारियों का पारा बढ़ा रहे हैं।

अलग-अलग जीएसटी

उत्तर प्रदेश में जीएसटी शब्द इतना प्रचलित हो चुका है कि अब अनपढ़ तथा बच्चे तक जानने लगे हैं कि सरकार जीएसटी माँग रही है। भले ही सही मायने में अधिकतर लोगों को जीएसटी के बारे में कुछ भी नहीं पता है, मगर लोग इसकी चर्चा कर रहे हैं। असल में लोगों को नहीं मालूम है कि देश के अन्दर चार प्रकार की जीएसटी लागू है, जिसमें एसजीएसटी, सीजीएसटी, आईजीएसटी एवं यूजीएसटी कहते हैं। वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर इन सभी जीएसटी की अलग-अलग प्रकार से वसूली की जाती है। इनमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार तथा दो राज्यों के बीच वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर अलग-अलग प्रकार से जीएसटी लागू होता है। एसटी के तहत यदि कोई व्यापारी 10 करोड़ रुपये की सालाना बिक्री करता है, तो उसका ई-चालान होगा। यह नियम अक्टूबर, 2022 से लागू है। यही नियम व्यापार से व्यापार अर्थात् किसी व्यवसायी से किसी व्यवसाय के लिए क्रय-विक्रय पर पाँच करोड़ रुपये तक के लेन-देन पर लागू है। वहीं सामान्य तौर पर 40 लाख रुपये के वार्षिक क्रय-विक्रय पर जीएसटी पंजीकरण होना ही चाहिए।

इसके अतिरिक्त जीएसटी की वसूली के लिए वस्तुओं को चार स्तरों में बांटा गया है, जिनमें 5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत तथा 28 प्रतिशत तक की जीएसटी वसूली का प्रावधान है। 5 प्रतिशत जीएसटी सामान्य आवश्यकता वाली वस्तुओं जैसे पैकिंग वाली वस्तुओं, गेहूँ, आटा, चावल, गुड़, चीनी, मुरमुरा, राई, जौ, शहद, पनीर, दही, छाछ, लस्सी, चाय, काफ़ी, मिठाई आदि पर लगाया गया है। 12 प्रतिशत जीएसटी होटल में ठहरने, कंप्यूटर, संसाधित अर्थात् प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों आदि पर वसूला जाता है। 18 प्रतिशत जीएसटी एवं 18 प्रतिशत जीएसटी के दायरे में महँगे जूते, औद्योगिक सामग्री, बोतलबन्द पानी, विलासिता व नुकसानदेह वस्तुओं जैसे कार, एसी, सिगरेट, तम्बाकू, शराब आदि पर लगाया गया है।

व्यापारियों का कहना है कि जब पूरे देश में एक टैक्स की बात केंद्र सरकार कह चुकी है, तो इतने प्रकार की जीएसटी क्यों? व्यापारी यह भी कह रहे हैं कि कई वस्तुओं को व्यापारी वर्ग 1-2 प्रतिशत के लाभ पर ही बेचता है, मगर जब इन वस्तुओं पर भारी भरकम जीएसटी लग जाता है, तो ग्राहक उन्हें लेने से कतराने लगते हैं। इससे बिक्री भी प्रभावित होती है तथा कुछ व्यापारी विवश होकर बिना जीएसटी के वस्तु की बिक्री करने लगते हैं। योगी आदित्यनाथ सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वह प्रदेश के व्यापारियों को भी समाप्त करना चाहती है? व्यापारियों का कहना है कि पहले योगी सरकार ने किसानों को तंग किया अब व्यापारियों को तंग कर रही है।

कुल मिलाकर योगी आदित्यनाथ सरकार एवं व्यापारियों में जीएसटी को लेकर तकरार की स्थिति है, जिस पर अभी तक कोई समाधान नहीं हो सका है। मगर सरकार तथा व्यापारियों की इस तकरार में सामान्य जन पिस रहा है, क्योंकि तमाम प्रतिष्ठानों के बन्द होने के चलते आपूर्ति प्रभावित हो रही है।

सस्ते नशे का मकडज़ाल, झारखण्ड में बड़ी संख्या में युवाओं को लग चुकी है नशे की लत

झारखण्ड के रांची ज़िले का एक सरकारी स्कूल कक्षा आठ का एक लडक़ा। आँख लाल और दिमाग़ क़ाबू में नहीं। बातचीत का लहज़ा अजीब-ओ-ग़रीब। पूछे जा रहे सवालों और उसके जवाबों में भी कोई तालमेल नहीं। कक्षा के एक दूसरे छात्र ने बताया कि अमुक लडक़ा नशा करता है। वह दिन भर रुमाल में कुछ सूँघता रहता है। पॉकेट की जाँच की गयी तो, उससे एक गंदा-सा रुमाल निकला। उस रुमाल से बहुत-ही विचित्र बदबू आ रही थी।

दूसरे मामले में रांची शहर के बाहरी रिंग रोड क्षेत्र पर सडक़ किनारे तीन युवा लडक़े (किसी कॉलेज के पढऩे वाले) बाइक लगाकर बैठे थे। उनमें से एक सिगरेट से तम्बाकू निकालकर उसमें कुछ भर रहा था। पूछने पर उसने बदतमीजी से जवाब देकर भागने को बोला। मोबाइल से फोटो खींचने का प्रयास करते देख, तीनों लडक़े मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। यहाँ स्कूल या बच्चों का नाम लिखा जाना या तस्वीर देना उचित नहीं है।  निश्चित रूप से अमुक स्कूल के शिक्षकों ने बच्चे को लेकर उचित क़दम उठाया होगा। पर इस पर गम्भीरता से सोचने की ज़रूरत है। क्योंकि यह एक-दो मामला नहीं है।

इस तरह के सैकड़ों मामले झारखण्ड में अपने आसपास नज़र दौराते ही देखने को मिल जाते हैं। क्योंकि आजकल युवा वर्ग सस्ते नशे के मकडज़ाल में फँसते जा रहे हैं। झारखण्ड में सस्ते नशे का प्रचलन लगातार बढ़ रहा है। यह युवाओं को देखकर तो महसूस किया ही जा सकता है, साथ ही पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई के दौरान नशे से सम्बन्धित सामान की बरामदगी भी एक सुबूत है।

हडिय़ा-दारू है आम नशा

झारखण्ड में हडिय़ा एक आम नशा है। इसका पहले नशा से अधिक अच्छे स्वास्थ्य और शरीर में बीमारी से लडऩे के लिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए उपयोग होता था। कई बीमारियों से यह बचाता और इलाज भी करता था। धीरे-धीरे हडिय़ा ने विकृत रूप ले लिया। जिस वजह से इसके साथ दारू शब्द जुड़ गया। अब लोग ‘हडिय़ा-दारू’ शब्द ही उपयोग करते हैं।

‘हडिय़ा-दारू’ बिक्री पर क़ानूनी प्रतिबंध है; लेकिन ‘हडिय़ा’ पारंपरिक पेय होने के कारण इस पर पाबंदी नहीं है। नतीजतन विकृत रूप से ‘हडिय़ा-दारू’ खुलेआम बिकता है। लोग खुलेआम पीते हैं। यह एक सस्ता नशा है, जिसे राज्य में कहीं भी लोगों को बेचते और पीते हुए देखा जा सकता है।

अफ़ीम की खेती का हब

इसी तरह झारखण्ड में अफ़ीम की खेती आम बात है। राज्य के 24 में से लगभग 17 ज़िलों में अवैध रूप से अफ़ीम की खेती होती है। हालाँकि इस पर प्रतिबंध है। अफ़ीम की खेती नक्सल इलाक़े में ज़्यादा होती है। इसकी खेती को नक्सलियों का समर्थन और खेती में हाथ भी है। क्योंकि इससे नक्सलियों का आर्थिक तंत्र मज़बूत होता है। रांची, खूंटी, चतरा, पलामू आदि क्षेत्र में पहाडिय़ों, घने जंगलों में इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। पिछले कुछ समय से झारखण्ड अफ़ीम की खेती का हब बनता जा रहा है। इसका उपयोग केवल झारखण्ड में ही नहीं, राज्य के बाहर और विदेश तक हो रहा है। सूत्रों की मानें, तो यहाँ तैयार हुए अफ़ीम पंजाब, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों तक जाते हैं। वहाँ हेरोइन बनाने के बाद पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और यूरोपीय देशों तक भेजे जाते हैं।

हालाँकि समय-समय पर पुलिस कार्रवाई भी करती है और अफ़ीम की खेती को नष्ट भी किया जाता है। पुलिस के आँकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल में विभिन्न ज़िलों में 2885 एकड़ से अधिक भूमि पर लगे अफ़ीम के पौधे नष्ट किये गये। वहीं, 425 मामले दर्ज किये गये और 205 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। हालाँकि झारखण्ड की भौगोलिक स्थिति और नक्सल प्रभाव के कारण कई दुर्गम इलाक़ों तक सुरक्षा बलों का पहुँच पाना सम्भव नहीं होता। नतीजतन खेती के बाद अफ़ीम की खेप तस्करी के समय भी कई बार पकड़ में आते हैं। चूँकि राज्य में अफ़ीम की खेती होती है, इसलिए यहाँ के युवाओं का अफ़ीम तक पहुँच आसान है और उपलब्धता भी आसानी से है।

दवाओं से नशा लेने की कोशिश

हेरोइन, ब्राउन शुगर, स्मैक जैसे अन्य ड्रग्स की उपलब्धता आसानी से नहीं है। साथ ही इसकी क़ीमत भी काफ़ी अधिक होती है। नतीजतन मध्यम और ग़रीब तबक़े के युवा सस्ते नशे की ओर आकृष्ट हो रहे हैं। यही कारण है कि झारखण्ड में महँगे ड्रग्स की जगह सस्ते नशे के लिए दवाई, सिरप, इंजेक्शन आदि की खपत बढ़ गयी है। सरकारी स्कूल के जिस बच्चे का ज़िक्र आलेख के शुरू में किया गया था, जब उसके द्वारा नशे के लिए उपयोग में लाये जाने वाले सामान की जानकारी ली गयी, तो सुनकर हैरानी हुई। वह लडक़ा व्हाइटनर (काग़ज़ पर कलम से लिखे चीज़ को मिटाने के उपयोग में लाने वाला) को रूमाल पर लगा कर सूँघता था। उस व्हाइटनर के ट्यूब की क़ीमत केवल 30 रुपये है, जो किसी भी स्टेशनरी की दुकान पर आसानी से उपलब्ध है। लगातार सारा दिन सूँघते रहने से उसे नशा महसूस होता था। पुलिस के आँकड़े भी सस्ते नशे के बढऩे की बात की पुष्टि करती है। पिछले एक साल में जितने ड्रग्स पकड़ाये उससे कई गुना अधिक नशे के उपयोग में लाये जाने वाली दवाई, सिरप और इंजेक्शन के अवैध खेप पकड़ाये हैं। इनमें ऑनरेक्स, विनकोरेक्श, कूका, आरसी, कोफिन, रैक्सिस आदि नाम के सिरप हैं।

इसी तरह नाइट्रोजन, नाइट्रो हैप, डायलेक्ट आदि दवाइयाँ और पेंटाजोसिन, फायरमैन मैलेट आदि इंजेक्शन मिले। इन सिरप, दवा या इंजेक्शन को केवल डॉक्टर की पर्ची पर ही बेचा जा सकता है, लेकिन झारखण्ड में ब$गैर पर्ची के आसानी से अवैध रूप से उपलब्ध है। पुलिस ने इन दवाओं और सिरप को पिछले एक साल में भारी मात्रा में पकड़ा है। आँकड़ों बताते हैं कि पिछले एक साल में 32,000 से अधिक सिरप की बोतलें, जो लगभग 650 लीटर है और 72 हजार पीस टैबलेट पकड़े गये हैं। इन दवाओं का न ही कोई थोक विक्रेता का नाम-ओ-निशान मिला और न ही खुदरा विक्रेता।

कुछ दवाएँ तो अवैध कारोबार करने वाले राज्य के बाहर से लेकर आ रहे थे। सूत्रों का कहना है कि इनका उपयोग नशे के लिए होता है। इससे थोड़ा महँगा नशा गाँजा, डोडा और भाँग जैसे चीज़ों का है। पिछले एक साल में गाँजा 19,000 किलो, डोडा 96,000 और भाँग 12,000 किलो बरामद हुए। इसके विपरीत ब्राउन शुगर 117 किलो, हेरोइन सात किलो और स्मैक 75 ग्राम बरामद हुए।

बर्बाद हो रहे युवा

फ़िल्म अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर बनी फ़िल्म संजू में नशे की लत को दिखाया गया है। किस तरह से नशे की लत लगती है और क्या हश्र होता है। इसके अलावा भी कई फ़िल्मों में नशे या ड्रग्स की आदत और इसके नतीजे को दिखाया गया है। यह केवल फ़िल्म की ही बात नहीं है; हक़ीक़त में भी ऐसा होता है। राज्य में प्रवर्तन निदेशालय (इडी) की अवैध माइनिंग और मनी लॉड्रिंग की जाँच चल रही है।

इस क्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा को इडी ने गिरफ़्त में लिया। हिरासत में पंकज मिश्रा की तबीयत ख़राब हुई। रिम्स अस्पताल के डॉक्टरों ने इलाज के बाद उन्हें मानोचिकित्सक के पास भेजने की सलाह दी। सूत्रों की मानें, तो पंकज मिश्रा को नशे की आदत थी। वह नशे के लिए इंजेक्शन लेते थे। उन्हें सीआइपी के नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती कराया गया है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ज़्यादातर मामलों में शुरू में नासमझी और स्टाइल के चक्कर में युवा नशे को अपनाते हैं, बाद में यह लत में तब्दील हो जाता है। जब आर्थिक कारणों से महँगा नशा नहीं कर पाते, तो सस्ता की ओर भागते हैं।

नशा एक ऐसी बुरी आदत है, जो किसी इंसान को पड़ जाए तो उसे दीमक की तरह अंदर से खोखला बना देती है। नशा से पीडि़त व्यक्ति मानसिक,आर्थिक एवं शारीरिक रूप से बर्बाद हो जाता है। भारत युवाओं का देश है। इस पर हम गर्व कर रहे हैं। ऐसे में अधिक संख्या में नशे में डूबते युवा चिन्ता का विषय है। इसके निदान के लिए सभी को मिल कर आगे आना होगा। तभी इस गिरफ़्त से समाज निकल सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी को वैध करार दिया, इसके खिलाफ दायर 58 याचिकाएं खारिज

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को एक बड़े फैसले में 2016 में  नोटबंदी के फैसले को वैध करार दिया है। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने इससे जुड़ी 58 याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

याद रहे पीएम मोदी ने 8 नवंबर, 2016 को एक राष्ट्रव्यापी प्रसारण में नोटबंदी की घोषणा की थी। इस फैसले को लेकर सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी गयी थी। इस गलत फैसला बताने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आज फैसला सुना दिया है।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में 58 याचिकाएं दाखिल हुई थीं। जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने 7 दिसंबर को सुनवाई पूरी कर ली थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाती हुए 2016 की नोटबंदी को वैध करार दिया है। साथ ही सभी 58 याचिकाएं खारिज कर दी हैं।

अपनी याचिका में याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि सरकार ने बिना उचित प्रक्रिया का पालन किए अचानक 500 और 1000 के पुराने नोट प्रचलन से बाहर कर दिए थे।  इसके जवाब में सरकार ने कहा है कि यह टैक्स चोरी रोकने और काले धन पर लगाम लगाने के लिए लागू की गई सोची-समझी योजना थी। फैसला सुरक्षित रखते समय कोर्ट ने केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक को नोटबंदी के फैसले से जुड़ी प्रक्रिया के दस्तावेज सौंपने को कहा था।

जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ ने 7 दिसंबर को सुनवाई पूरी कर ली थी। जस्टिस नज़ीर के अलावा संविधान पीठ के अन्य 4 सदस्य जस्टिस बीआर गवई, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमण्यम और बीवी नागरत्ना हैं।

यह कैसी शराबबंदी!

बिहार में पूर्ण शराबबंदी के बावज़ूद शराब उपलब्ध, मौतों पर सियासत

बिहार एक बार फिर अपनी शराबबंदी नीति के कारण चर्चा में है। इस चर्चा का मुख्य फोकस हाल ही में बिहार का सारण ज़हरीला शराब कांड है। बिहार सरकार के अनुसार, इस कांड में 38 लोगों की जान गयीं, जबकि सांसद व भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने लोकसभा में दावा किया कि बिहार में ज़हरीली शराब पीने से 100 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इस सूबे में सन् 2016 से लागू शराबबंदी नीति के बाद से आजतक ज़हरीली शराब पीने से मरने वालों व विकलांग होने की ख़बरें आती रहती हैं; लेकिन इस बार भाजपा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर अति अक्रामक रुख़ अपनाये हुए है। यह तेवर पटना में बिहार विधानसभा से लेकर दिल्ली में संसद में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि जद(यू) नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस मुद्दे के बहाने भाजपा घेर रही है और कहीं-न-कहीं अपनी ख़ुन्नस निकाल रही है, क्योंकि नीतीश कुमार ने एनडीए से बाहर निकल राष्ट्रीय जनता दल के साथ सरकार बना ली। सारण शराब कांड को लेकर राजनीति गरमा गयी है।

बहरहाल मुद्दा यह है कि बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है और सुशासन बाबू के तमगे से मशहूर सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज में वहाँ ज़हरीली शराब के सेवन से लोग क्यों मर रहे हैं? ग़रीब लोगों तक यह शराब कौन पहुँचाता है? कैसे पहुँचती है? इस पर निगरानी रखने वाला तंत्र विफल क्यों है? बिहार पुलिस, राजनेता क्या करते हैं? इन सब की ओर से आँखें मूँदने, लापरवाही, कर्तव्य का ईमानदारी से पालन नहीं करने का $खामियाजा इस सूबे की ग़रीब, दलित जनता चुका रही है और किशोरों को इस धंधे में लपेटा जा रहा है। बिहार सरकार का दावा है कि वह शराब की बुराइयों को आम जनता तक पहुँचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाती है; लेकिन वह कितना कारगर है, यह कौन जानता है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि वह इस 25 दिसंबर से शराब पीने के ख़िलाफ़ जागरूकता यात्रा पर निकलेंगे। और वह अपने इस रुख़ पर सख़्ती से क़ायम हैं कि ‘जो शराब पीएगा, वह मरेगा।’ उन्होंने बिहार विधानसभा में साफ़ कहा कि शराब पीने से हुई मौत पर उनके परिवारजनों को मुआवज़ा नहीं दिया जाएगा। विपक्षी दल भाजपा मुआवज़ा की माँग कर रही है। मुख्यमंत्री ने इसके एवज में दलील दी कि कोई शराब पीये, और गंदी शराब पीये, उसको क्या हम लोग मदद करेंगे? सवाल ही पैदा नहीं होता है। शराब पीने वालों से कोई हमदर्दी नहीं होनी चाहिए।

सवाल यह है कि शासन का मुखिया होने के नाते उनकी इस सख़्ती का लहज़ा शराबबंदी को लेकर ज़मीनी स्तर पर अमल में क्यों नहीं नज़र आता? क्या नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री होने के नाते अपनी ग़लतियों व दूसरों की ग़लतियों से सबक़ नहीं लेना चाहिए? यह एक कड़वा सच है कि जहाँ भी शराबबंदी लागू की गयी और जिन राज्यों में आज भी है, वहाँ ज़हरीली शराब से मरने वालों की ख़बरें आती रहती हैं। वहाँ शराब मिलती है अंतर इतना है कि खुलेआम न मिलकर चोर दरवाज़े से मिलती है। मध्यम आयु वर्ग का तबक़ा व अमीर तबक़ा मानव के लिए सुरक्षित व महँगी शराब का इंतज़ाम आसानी से कर लेता है। वहीं ग़रीब तबक़ा अंतत: मानव के लिए असुरक्षित शराब के सेवन से कई बार अपनी जान गँवा बैठता है।

शराब के अति सेवन से कई आर्थिक दिक़्क़तें पैदा हो सकती हैं, सामाजिक बुराइयों का भी इससे नाता है, इंसान को हिंसक बना सकती है व स्वास्थ्य पर पडऩे वाले बुरे असर को लेकर भी डॉक्टर सचेत करते हैं। जहाँ तक बिहार की बात है, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सन् 2015 में विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं से वादा किया था कि अगर वह सत्ता में लौटे यानी अगर उन्हें जीत मिलती है, तो वे राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू करेंगे, ताकि ग़रीब, दलित, अति पिछड़े वर्ग की महिलाएँ व उनके बच्चों की जीवन स्तर सुधरे। उन्होंने कहा कि शराबबंदी की माँग महिलाओं की तरफ़ से की गयी थी।

महिलाओं ने उन्हें बताया था कि उनके पति अपनी कमायी का एक मोटा हिस्सा दारू पर ख़र्च कर देते हैं, इस पर जो पैसा ख़र्च होता है, उससे उनके बच्चों की पढ़ाई व उनका खान-पान प्रभावित होता है। यही नहीं, शराब पीने के बाद घरेलू हिंसा भी करते हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सूबे को शुष्क राज्य यानी शराबबंदी लागू करने के पीछे सार्वजनिक तौर पर इसी वजह का ज़िक्र किया था। यह तथ्य हर कोई जानता है कि नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी लागू करने से पहले सूबे की महिलाओं व लड़कियों के अधिकारों व कल्याण सम्बन्धित योजनाओं को सशक्त बनाने के लिए निवेश किया। लड़कियों के स्कूल छोडऩे की दर को कम करने के लिए साइकिल योजना व वज़ीफ़ा योजना शुरू की।

एक समझदार राजनेता की तरह अपनी राजनीतिक मानव पूँजी बनायी और शराबबंदी के ज़रिये भी यही मक़सद काम कर रहा था। सन् 2016 में बिहार मद्यनिषेध उत्पाद क़ानून लागू हुआ। इसके तहत सूबे में शराबख़ोरी, शराब की तस्करी करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी सज़ा का प्रावधान है। उस समय क़ानून में यह भी प्रावधान था कि कोई शराब पीते हुए पहली बार पकड़ा गया, तो उसे सज़ा होगी।

इस प्रावधान का नतीजा यह हुआ कि पकड़े जाने वालों में अधिकतर लोग ग़रीब, मज़दूर, दलित थे; उनके परिजनों के पास उनकी जमानत तक कराने के लिए रक़म तक नहीं थी और बिहार की जेलें ऐसे लोगों से भर गयीं। जब इस प्रावधान की कड़ी अलोचना होने लगी तो नीतीश कुमार को अपनी ग़लती का एहसास हुआ कि यह कैसा सामाजिक न्याय है? बीते साल इस क़ानून में संशोधन किया गया, शराब का सेवन करने वाले प्रतिबंध का पहली बार उल्लघंन करने पर अब 20,00-50,00 रुपये तक का आर्थिक दण्ड लग सकता है। इन संशोधनों में शराब पीने के जुर्म में जेल भेजे जाने के स्थान पर मजिस्ट्रेट के सामने तय ज़ुर्माना राशि को भरने के बाद छोड़े जाने का प्रावधान लागू किया गया है। ज़ुर्माना नहीं भरने की सूरत में अभियुक्त को जेल भेजा जाएगा। शराब बनाने व बेचने वालों के ख़िलाफ़ पहले की ही तरह कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी।

सन् 2016 वर्ष जब यह क़ानून लागू हुआ तब से इस अक्टूबर (2022) तक बिहार पुलिस व राजस्व विभाग ने क़रीब 4 लाख मामले दर्ज किये, 4.5 लाख लोगों को पकड़ा और इनमें से 1.4 लाख लोगों पर मुक़दमा चल रहा है। जिन लोगों पर मुक़दमा चला, उनमें से महज़ 1,300 लोग यानी महज़ एक प्रतिशत को ही सज़ा हुई। इन 1300 में से शराब की सप्लाई व यह धंधा करने वाले महज़ 80 लोग ही हैं। इससे साफ़ है कि शराबबंदी वाले इस सूबे में ग़ैर-क़ानूनी तरीके से शराब बनाने वाले, बेचने वाले किस तरह बच रहे हैं। पटना उच्च अदालत ने भी शराबबंदी के एक मामले में सुनवाई के दौरान बिहार सरकार को शराबबंदी की विफलता को लेकर फटकार लगायी थी। कहा था कि सरकारी अधिकारियों के जानबूझकर हाथ पर हाथ धरे रहने के कारण पूरे राज्य में शराब की तस्करी से लेकर शराब बनाने तक का काम बढ़ रहा है। बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू करने में राज्य सरकार की विफलता के कारण लोगों की जान को ख़तरे में डाल दिया है। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो रही है।

इससे बिहार में एक अवैध शराब की एक समानांतर अर्थ-व्यवस्था बन गयी है। शराबबंदी के इन छ: वर्षों में ग़ैर-सरकारी आँकड़ें बताते हैं कि बिहार में ज़हरीली शराब पीने से 200 लोगों की जान गयी है, यह बात दीगर है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड शाखा 2016-2021 के दरमियान होने वाली ऐसी मौतों का आँकड़ा 23 बताता है। कारण यह सरकारी संस्था वहीं आँकड़े दर्ज करती है, जो राज्य सरकार व केंद्र शासित राज्य उन्हें भेजते है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड शाखा के अनुसार, ज़हरीली शराब सेवन से होने वाली मौतों में कमी आयी है। देश भर में वर्ष 2017 में यह आँकड़ा 1,510 था, जो कि 2018 में 1,361 हो गया। सन् 2019 में 1,296 और सन् 2020 में 947 था। जिन राज्यों में शराबबंदी लागू नहीं हैं, वहाँ भी ज़हरीली शराब के सेवन से मौते होती हैं। जहाँ शराबबंदी लागू है और जहाँ नहीं- इस बिन्दु से आगे जाकर यह सोचने की जरूरत है कि हरेक मानव की जान क़ीमती है, सरकार का दायित्व उसे बचाने का है।