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कंझावला केस: अंजलि की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा, खोपड़ी टूटी थी; ब्रेन का मैटर गायब

दिल्ली के कंझावला इलाके में 20 साल की युवती को कार के साथ 13 किलोमीटर तक घसीटा गया और इस हादसे में उसकी मौत हो गई थी। यह घटना नया साल शुरू  होने के कुछ घंटों के बाद की हैं। पीड़िता की ऑटोप्सी रिपोर्ट आ गई हैं।

सूत्रों के अनुसार, ऑटोप्सी रिपोर्ट के अनुसार महिला को कम से कम 40 बाहरी चोटें आई थी। उसकी पसलियां पीठ से निकली हुई थीं। खोपड़ी टूटी हुई थी और ब्रेन का मैटर गायब था। साथ ही सिर, रीढ़ और निचले अंगों में चोटें थी। वहीं यौन उत्पीड़न का कोई संकेत नहीं हैं, महिला की मृत्यु का कारण सदमा और रक्तस्त्राव माना गया हैं।

बता दें, डॉक्टर की आरंभिक रिपोर्ट में कहा गया है कि, सिर, रीढ़ की हड्डी, बायीं जांघ की हड्डी और दोनों पैरों में गंभीर चोट पहुंचाने के परिणामस्वरूप रक्तस्त्राव हुआ और आघात लगा। सभी चोटें संभवत: वाहन से हुई दुर्घटना और घसीटे जाने के कारण लगीं।

आपको बता दें, अंजलि की स्कूटी को एक कार ने टक्कर मार दी थी और कार में फंस गयी अंजलि को वे लोग करीब 13 किलोमीटर तक सड़कों पर घसीटते रहे जिससे उसकी मौत हो गई। अंजलि का शव बाहरी दिल्ली के कंझावला इलाके में सड़क किनारे पड़ा मिला था।

आरोपी हरियाणा के मुरथल में एक ढाबे पर खाना खाने गए थे और घटना के समय वे नशे में थे। वहीं दूसरी तरफ अंजलि की सहेली का कहना है कि, वे शनिवार रात अपने दोस्तों से मिलने के लिए एक होटल में गई थीं। अंजलि ने शराब पी हुई थी और नशे में थी। उसने बताया कि मैंने कहा कि मैं स्कूटी चलाउंगी तो अंजलि ने कहा कि अगर उसे स्कूटी नहीं चलाने दी तो वह चलते दुपहिया वाहन से कूद जाएगी।

उसने आगे कहा कि, मैंने उसे स्कूटी चलाने दी। कुछ दूर ही चलने के बाद हमारी स्कूटी की टक्कर एक ट्रक से होने से बची। फिर हम वहां से चले और आगे बढ़े। लेकिन एक अन्य कार ने हमारी स्कूटी को टक्कर मार दी। अंजलि कार के नीचे फंस गई, जबकि मैं सड़क की दूसरी ओर जा गिरी।“

एयर इंडिया की फ्लाइट में महिला सहयात्री पर किया पेशाब, न्यूयॉर्क से आ रहा था प्लेन

एयर इंडिया की न्यूयॉर्क से दिल्ली आने वाली एक फ्लाइट में एक यात्री ने एक महिला सहयात्री पर पेशाब कर दिया। घटना नवंबर की है लेकिन इस महिला के टाटा समूह के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन को इस बाबत लिखे जाने के बाद एयरलाइन ने कार्रवाई की है। नागर विमानन महानिदेशालय ने भी एयरलाइन से इस घटना को लेकर रिपोर्ट मांगते हुए कहा कि ‘हम लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।’

बता दें यह घटना एयर इंडिया की बिजनेस क्लास की है। महिला यात्री ने शिकायत की कि 26 नवंबर को न्यूयॉर्क से दिल्ली जाने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट में एक यात्री पर कथित तौर पर चेन खोलकर पेशाब किया था। एयर लाइन ने कहा है कि शराब के नशे में एक महिला पर पेशाब करने वाले यात्री को नो-फ्लाई लिस्ट में रखा जा सकता है।

घटना को लेकर महिला यात्री ने टाटा समूह के अध्यक्ष एन चंद्रशेखरन को लिखा था। इसके बाद एयरलाइन ने कार्रवाई की है। नागर विमानन महानिदेशालय ने एयरलाइन से रिपोर्ट मांगी है। नियामक ने कहा – ‘हम लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।’

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि यह घटना उस समय हुई जब लंच के बाद लाइट बंद थी। पेशाब करने के बाद, वह आदमी तब तक खड़ा रहा, जब तक कि एक अन्य यात्री ने उसे जाने के लिए नहीं कहा। महिला ने चालक दल से शिकायत की और उन्हें बताया कि उसके कपड़े, जूते और बैग पेशाब में भीग गए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक चालक दल ने महिला यात्री को कपड़े और चप्पलें दीं और उसे अपनी सीट पर लौटने के लिए कहा। सीट गंदी होने के कारण महिला को क्रू की सीट पर बैठाया गया।

कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि एयर इंडिया ने आरोपी व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। एयर इंडिया ने एक आंतरिक समिति का गठन किया और पुरुष यात्री को ‘नो-फ्लाई लिस्ट’ में डालने की सिफारिश की है जिसके लिए उसे सरकारी समिति के निर्णय का इंतजार है।

राहुल गांधी-कमल हसन की बातचीत पर भाजपा ने कहा- व्याकुल नेता ने एक कन्फ्यूज फिल्म स्टार को दिया इंटरव्यू

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने अभिनेता कमल हसन और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की स्पष्ट बातचीत को निंदनीय और अक्षम्य बताया है। उन्होंने कहा कि अभिनेता कमल हसन ने राहुल गांधी का इंटरव्यू लिया है और कमल हसन एक भ्रमित कलाकार हैं।

उन्होंने आगे कहा कि, भारत जोड़ो यात्रा में भारत का भ्रमण करते-करते राहुल गांधी जी खुद भ्रम के शिकार हो गए है। और मुझे ऐसा लग रहा है कि केरल में बी पार्टी वालों के साथ और तमिलनाडु में भारत माता को अपवित्र मानने वालो के साथ, महाराष्ट्र में सावरकर जी के विरूद्ध और गुजरात के विरुद्ध जो बोल रहे थे तो जब ऐसे लोगों के साथ रहेंगे तो भ्रम तो बढ़ेगा ही। और अब उन्हें वास्तविक ज्ञान की ज़रूरत हैं।

त्रिवेदी ने कहा कि, इस भ्रम में चलते चलते उन्होंने भारत का भ्रम दूर कर दिया हैं और अब यह साफ हो गया कि कांग्रेस पार्टी की मंशा क्या है। अभी चीन के साथ विवाद पर भारत की सेना के लिए पीटने का शब्द प्रयोग करने के बाद आज जो वो इस इंटरव्यू में बोले है इसका अर्थ यह है कि भारत चीन के आगे सरेंडर कर दे। वो रूस-यूक्रेन युद्ध का उदाहरण देते हुए क्या बोल रहे हैं। कि रूस ने यूक्रेन का ज्योग्राफी इसने बदलने का प्रयास किया क्योंकि उसे लगा कि यदि पश्चिमी देशों के साथ जाना है और यह स्थिति भारत-चीन के साथ है चूंकि चीन को लगता है कि अगर हम पश्चिमी देशों के साथ गए तो वो हमारा ज्योग्राफी बदलेगा। और अब उनकी बातों से कोर्इ भ्रम शेष नहीं रखा और राहुल गांधी यह साफ कह दिया है कि जैसे किसी ज़माने में आपके खानदानी रिवायत के चलते भाई-भाई का नारा चलते हमने अपनी ज़मीन गवाई थी आप चाहते है चीन का आगे नतमस्तक हो जाए भारत।

उन्होंने आगे कहा कि, हम आपसे एक सवाल पूछना चाहते हैं कि भारत की सेना का मनोबल गिराने के बाद 135 करोड़ वासियों का मनोबल गिराने का प्रयास करना ये आप क्यों कर रहे हैं? चीन से मिले चंदे के दान के एहसान की वजह से कर रहे है या चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से हुए तनाव के प्यार की वजह से कर रहे है?

आपको बता दें, कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से अभिनेता कमल हसन दिल्ली में जुड़े थे। हाल ही में राहुल गांधी और कमल हसन का एक वीडियो आया है जिसमें वे दोनों स्पष्ट बातचीत करते नजर आ रहे है। इस बातचीत में वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से संबंधित मुद्दों पर अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे है। और उनकी इसी बातचीत पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता जमकर मजाक उड़ा रहे है।

हनुमान मंदिर में दर्शन कर राहुल गांधी ने फिर से शुरू की भारत जोड़ो यात्रा, आज करेगी यूपी में एंट्री

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा आज से फिर शुरू हो गई हैं। राहुल गांधी ने दिल्ली के कश्मीरी गेट स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर में दर्शन करने के बाद पदयात्रा शुरू की, उनके साथ प्रियंका गांधी भी मौजूद थी।

बता दे दिल्ली दंगो में प्रभावित मौजपुर, जाफराबाद, गोकुलपुरी से होते हुए यात्रा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में प्रवेश करेगी और लोनी होते हुए पश्चिमी यूपी के बागपत में रात को यात्रा रुकेगी और वहां विश्राम किया जाएगा।

भारत जोड़ो यात्रा के फेस-2 में दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी की सुरक्षा को बढ़ा दिया हैं। साथ ही दिल्ली में भारत जोड़ो यात्रा को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने ट्रैफिक एडवाइजरी जारी की है। और उत्तर पूर्वी इलाकों- लोहा पुल, पुश्ता रोड, जाफराबाद, मौजपुर, गोकुलपुरी इत्यादी में भारी जाम की आशंका जताई हैं।

आपको बता दें, राहुल गांधी के नेतृत्व वारी भारत जोड़ो यात्रा आज नौ दिन के बाद फिर से शुरू हुई हैं। यह 24 दिसंबर को दिल्ली के लाल किला पहुंची थी। यात्रा ने 110 से अधिक दिनों में 3000 किलोमीटर से अधिक का मार्च पूरा कर चुकी हैं।

नौ दिन के विश्राम से पहले यात्रा दक्षिणी राज्यों से शुरू होकर राजस्थान और दिल्ली तक गई थी। यात्रा 7 सितंबर को कन्याकुमारी से शुरू हुई थी जिसमें तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा के कुछ हिस्से को कवर कर चुकी हैं। यात्रा का समापन 30 जनवरी को कश्मीर के श्रीनगर में होगा।

आपदा में अवसर: कोरोना-काल में ताजमहल में हुआ शू कवर घोटाला!

जब कोरोना संकट के बीच पर्यटकों की संख्या कम हो गयी थी, तब स्मारक पर अधिकारियों के शू कवर ख़रीदे गये थे। ताजमहल में भी शू कवर ख़रीदे गये थे, वह भी लाखों में; जबकि वास्तव में उनकी बिलकुल भी आवश्यकता नहीं थी। शूज (जूतों) के इन कवर्स की थोक ख़रीदारी करने पर कई सवाल खड़े हैं। तहलका एसआईटी की एक खोजी रिपोर्ट :-

कोरोना महामारी के संकट-काल और तालाबंदी के दौरान यह नारा काफ़ी प्रचलित हुआ था। इसके पीछे सकारात्मक सोच थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषणों में इस बात पर ज़ोर दिया था। इसका मक़सद शायद महामारी के बीच देशवासियों का मनोबल ऊँचा करना था। लेकिन कुछ लोगों के लिए यह नारा लाभ कमाने के लिए था; लिहाज़ा उन्होंने स्थिति का फ़ायदा उठाने की कोशिश की। उन्होंने अभूतपूर्व संकट-काल में लोगों की विपत्ति को अपने लाभ के अवसर के रूप में प्रयोग किया। तमाम मीडिया प्लेटफॉर्म पर ख़बरें थीं कि कैसे लोगों ने कोरोना संकट के दौरान एंबुलेंस, ऑक्सीजन सिलेंडर, चिकित्सा उपकरण और अस्पताल के बेड आदि के लिए अधिक शुल्क लेकर पैसा कमाया। यह सूची काफ़ी लम्बी है। लेकिन आज हम बात कर रहे हैं दुनिया के सातवें अजूबे ताजमहल की। किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि कोरोना तालाबंदी के दौरान ताजमहल भी कुछ लोगों के लिए जल्दी पैसा कमाने का ज़रिया बन सकता है। लेकिन आरटीआई आवेदनों के ज़रिये की गयी ‘तहलका’ जाँच से पता चलता है कि वास्तव में ऐसा हुआ। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), आगरा सर्कल के कुछ अधिकारियों ने स्थिति का फ़ायदा उठाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा। इस प्रकार ताजमहल, आगरा क़िला और फ़तेहपुर सीकरी सहित दर्ज़नों इमारतों का रखरखाव करने वाले आगरा सर्किल द्वारा की गयी ख़रीदारी पर संकट के बादल छा गये हैं।

‘तहलका’ की ओर से आरटीआई के ज़रिये की गयी विशेष जाँच में यह बात सामने आयी है। इस जाँच से पता चलता है कि ताजमहल में शू कवर (जूता कवर) ख़रीदे गये थे, वो भी लाखों में; जबकि वास्तव में उनकी बिलकुल भी आवश्यकता नहीं थी। ऐसा नहीं है कि एक या दो बार ख़रीदारी की गयी। हर साल दो-तीन बार लाखों रुपये के शू कवर पर ख़र्च किये गये। ख़रीदे गये शू कवर की क़ीमत 8 रुपये से लेकर 90 रुपये प्रति जोड़ी तक थी। वैसे तो ताजमहल में केवल विदेशी पर्यटकों के लिए शू कवर अनिवार्य है; लेकिन वहाँ भी इस सम्बन्ध में आवश्यकता को पूरा करने की ज़िम्मेदारी आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) की है। फिर सवाल उठता है कि एएसआई का आगरा सर्किल किसके लिए लाखों रुपये के शू कवर ख़रीद रहा था?

इतना ही नहीं आगरा सर्किल ने 2015-16 में लाखों रुपये की लागत से शू कवर डिस्पेंसर भी ख़रीदे। ग़ौरतलब है कि ताजमहल में विदेशी पर्यटकों को जूते के ऊपर पहनने के लिए शू कवर दिये जाते हैं। विदेशी पर्यटकों को ताजमहल के मुख्य मक़बरे में तभी प्रवेश दिया जाता है, जब उन्होंने शू कवर पहन रखा हो। और विदेशी पर्यटकों के लिए शू कवर पहनने के लिए एडीए ने पहले से ही ताजमहल परिसर में दो शू कवर डिस्पेंसर लगाये हैं।

एक आरटीआई के जवाब के मुताबिक, घरेलू पर्यटकों को शू कवर मुहैया कराने का कोई प्रावधान नहीं है। हालाँकि यह सही है कि वीआईपी और वीवीआईपी के लिए आगरा सर्कल शू कवर की व्यवस्था करता है। लेकिन वे शू कवर बिना बुने हुए आम शू कवर से बहुत अलग होते हैं। साथ ही इन्हें लगाने के लिए मशीनों की भी ज़रूरत नहीं है। हैरान करने वाली बात यह है कि आगरा सर्किल ने इन ख़ास शू कवर की खपत ऐसे समय में भी दिखायी है, जब कोरोना तालाबंदी के दौरान ताजमहल में कोई वीआईपी और वीवीआईपी नहीं आ रहा था। इसके अलावा तालाबंदी के दौरान जब ताजमहल को केवल कुछ दिन के लिए ही खोला गया था, तो दिलचस्प बात यह थी कि स्वचालित डिस्पेंसर से लगभग एक लाख शू कवर का इस्तेमाल दिखाया गया था।

इस मसले पर कुछ और जानकारी जुटाने के लिए आगरा में कई आरटीआई दाख़िल की गयी। लेकिन हर बार आगरा सर्कल (एएसआई) का दिया गया जवाब, पहले दिये गये जवाब से भिन्न था। कभी वे कहते थे- ‘हम मुख्य मक़बरे पर आने वाले भारतीय पर्यटकों को शू कवर देते हैं।’ जबकि कुछ जवाब में उन्होंने बताया- ‘मुख्य मक़बरे पर जाने वाले भारतीय पर्यटकों को शू कवर देने का कोई प्रावधान नहीं है। 50 रुपये के सामान्य टिकट पर भी शू कवर देने का प्रावधान नहीं है।’

शू कवर मशीन के बारे में भी आरटीआई में पूछे गये सवालों के अलग-अलग जवाब दिये गये। सबसे पहले एक आरटीआई के जवाब में कार्यालय ने कहा कि शू कवर लगाने के लिए 8 मशीनें ख़रीदी जा चुकी हैं और 31 जुलाई, 2021 तक दो मशीनें चालू हालत में थीं और दूसरी आरटीआई के जवाब में कहा कि छ: मशीनें चालू हालत में हैं। जब मशीनों की तस्वीरें माँगी गयीं, तो अधिकारियों ने फोटो प्रतियाँ प्रदान कीं, जिनसे कुछ भी समझना बहुत मुश्किल था, क्योंकि छवियाँ बहुत-काली थीं।

वीआईपी-वीवीआईपी के अलावा आगरा सर्कल ने अपने कुछ कर्मचारियों और सीआईएसएफ जवानों के लिए शू कवर ख़रीदे, जो ताजमहल की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात हैं। ये कर्मचारी और सीआईएसएफ के जवान ताजमहल के मुख्य मक़बरे पर ड्यूटी करते हैं। हालाँकि ऐसे कर्मचारियों की संख्या कम है। मुख्य मज़ार पर जूते-चप्पल पहनकर जाना मना है, इसलिए उन्हें जूतों के ऊपर डालने के लिए शू कवर दिये जाते हैं।

आगरा सर्किल के कर्मचारियों की ड्यूटी सुबह से शाम तक रहती है, जबकि सीआईएसएफ के जवान दो शिफ्ट में ड्यूटी करते हैं। हालाँकि कई मौक़ों पर आरटीआई के ज़रिये आगरा सर्किल से मुख्य समाधि पर रोज़ाना ड्यूटी पर जाने वाले कर्मचारियों का नंबर देने का अनुरोध किया गया; लेकिन हर बार जवाब देने से मना कर दिया गया। कार्यालय ने कहा कि स्मारक पर आने वाले पर्यटकों की संख्या के हिसाब से ऐसे कर्मचारियों की संख्या बदलती रहती है।

इसी तरह सीआईएसएफ के जिन जवानों को शू कवर दिये जाते हैं, उनकी संख्या के सवाल पर भी टालमटोल किया गया। हालाँकि एक बार मोबाइल पर बात करते हुए एक अधिकारी ने मुख्य समाधि पर रोज़ाना आने वाले कर्मचारियों और सीआईएसएफ जवानों की संख्या 8 से 10 बतायी। अधिकारी की बतायी गयी संख्या में हम अधिकतम 10 मान रहे हैं, जिनमें इतने ही सीआईएसएफ कर्मी भी शामिल है। इस तरह कार्मिक ड्यूटी पर कुल लोगों की संख्या दैनिक आधार पर 20 हो जाती है। दुनिया के सात अजूबों में जगह पाने वाला ताजमहल महीने में 26 दिन हर तरह के पर्यटकों के लिए खुला रहता है। शुक्रवार को यह बन्द रहता है। इसे केवल शुक्रवार की नमाज़ के लिए खोला जाता है, जब नमाज़ी ताजमहल में बनी मस्जिद में जाते हैं, जबकि मुख्य मक़बरे में कोई नहीं जाता है। इस हिसाब से एक महीने में 520 शू कवर की ज़रूरत होती है। जूतों पर 600 शू कवर लगवाते हैं।

हो सकता है कि एएसआई, पुलिस, प्रशासन या किसी अन्य विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारी या मित्र ताजमहल देखने आये हों, और उन्हें शू कवर भी दिया गया हो। इसलिए हम मान लेते हैं कि एक महीने में 600 शू कवर की जगह 1,000 शू कवर की ज़रूरत पड़ेगी। आगरा सर्किल कहे तो हम 100-200 शू कवर भी बढ़ा सकते हैं।

शू कवर के प्रकार

इस खोजी रिपोर्ट के विवरण में जाने से पहले हमारे लिए शू कवर के प्रकार और उनकी लागत को समझना महत्त्वपूर्ण है। मुख्य रूप से शू कवर चार प्रकार के होते हैं- कॉटन क्लॉथ विथ कैनवस बॉटम, वेलवेट क्लॉथ विथ कैनवस बॉटम, मैटी क्लॉथ विथ कैनवस बॉटम और नॉन-वोवन शू कवर। इनमें से बिना बुने हुए शू कवर का इस्तेमाल शू डिस्पेंसर यानी शू कवर मशीन में किया जाता है। ये यूज एंड थ्रो शू कवर हैं। एक बार इस्तेमाल करने के बाद जैसे ही पर्यटक मुख्य मक़बरे से लौटते हैं, उन्हें फेंक दिया जाता है। इन्हें थोक में ख़रीदा जाता है। सन् 2021 में जनवरी से जुलाई के बीच तीन लाख से ज़्यादा बिना बुने शू कवर ख़रीदे गये। इनकी क़ीमत 4.75 रुपये से लेकर पाँच रुपये प्रति जोड़ी थी। वर्ष 2019-20 में भी आगरा सर्किल ने इन शू कवर को 11.50 रुपये प्रति जोड़ी की दर से ख़रीदा था।

शेष तीन प्रकार के शू कवर कई दिन तक चल जाते हैं। सबसे महँगा शू कवर वेलवेट क्लॉथ विद कैनवस बॉटम है, जिसकी क़ीमत 92.35 रुपये है। सन् 2021 में इन्हें आगरा सर्किल ने इसी रेट पर ख़रीदा था। कैनवस बॉटम शू कवर वाला मैटी क्लॉथ सन् 2021 में 48 रुपये में ख़रीदा गया था। कैनवस बॉटम शू कवर वाला कॉटन क्लॉथ आख़िरी बार साल 2018 में 46 रुपये में ख़रीदा गया था।

एएसआई, आगरा सर्किल की ख़रीदारी

कोरोना महामारी को देखते हुए 17 मार्च, 2020 से ताजमहल के द्वार सभी प्रकार के पर्यटकों के लिए बन्द कर दिये गये थे। लेकिन इससे दो महीने पहले जनवरी में आगरा सर्किल ने 90 रुपये प्रति जोड़ी की दर से मखमली कपड़े के 200 शू कवर और शू डिस्पेंसर के लिए 20,000 बिना बुने शू कवर 11.50 रुपये प्रति जोड़ी की दर से ख़रीदे। इसी तरह वर्ष 2021 में शू डिस्पेंसर के लिए बिना बुने हुए शू कवर तीन बार ख़रीदे गये। पहले जनवरी में 4.75 रुपये की दर से 1.05 लाख शू कवर ख़रीदे गये। फरवरी में फिर से 1.05 लाख शू कवर 4.75 रुपये की दर से ख़रीदे गये। जबकि जुलाई में पाँच रुपये की दर से एक लाख शू कवर ख़रीदे गये।

कोरोना महामारी के कारण 17 मार्च, 2020 से 20 सितंबर, 2020 तक ताजमहल पूरी तरह बन्द रहा। पर्यटकों को 21 सितंबर से ऑनलाइन टिकट ख़रीदने का विकल्प दिया गया। लेकिन इस बार भी, कितने पर्यटक मक़बरे में प्रवेश कर सकते हैं, इसके निर्णय का अधिकार आगरा सर्किल के पास था। ताजमहल को केवल पाँच दिन तक खुला रखने की अनुमति थी। कोरोना महामारी के दौरान ताजमहल में सिर्फ़ घरेलू पर्यटकों का ही स्वागत हुआ। अंतरराष्ट्रीय उड़ानें बन्द होने की वजह से देश में कोई विदेशी पर्यटक नहीं आ रहे थे। लिहाज़ा 15 अप्रैल, 2021 तक तो सब ठीक चला; लेकिन 16 अप्रैल, 2021 से ताजमहल को फिर से पर्यटकों के लिए बन्द कर दिया गया। यह 15 जून, 2021 तक लगभग दो महीने तक बन्द रहा और 16 जून, 2021 से फिर से खोल दिया गया।

130 दिन में 1.05 लाख जोड़ी शू कवर का उपयोग

वैसे जनवरी 2020 से जुलाई, 2021 तक आगरा सर्किल ने 3,30,200 शू कवर ख़रीदे थे। इसमें प्रत्येक जोड़ी के लिए 90 रुपये के मूल्य टैग के साथ शू कवर भी शामिल हैं। अगर 2021 की ही बात करें, तो 3.10 लाख जोड़ी शू कवर ख़रीदे गये। ये बिना बुने हुए शू कवर थे। सितंबर, 2021 में दायर एक आरटीआई आवेदन के जवाब में आगरा सर्किल ने कहा था कि 31 जुलाई, 2021 तक उसके पास केवल 2.05 लाख ग़ैर-बुने हुए शू कवर बक़ाया थे। यानी जनवरी से 31 जुलाई तक 1.05 लाख शू कवर का इस्तेमाल किया गया। वह भी तब जब इस अवधि में ताजमहल महामारी के कारण केवल 130 दिन के लिए ही खुला था। नीचे दिये गये बॉक्स में दिये गये आँकड़ों से जानते हैं कि साल 2021 में 1 जनवरी से 31 जुलाई तक ताजमहल कब खुला और कब बन्द रहा :-

तो ऊपर दिये गये आँकड़े बताते हैं कि 1 जनवरी, 2021 से 31 जुलाई, 2021 तक ताज सिर्फ़ 152 दिन ही खुला रहा। लेकिन शुक्रवार बन्द दिन है। इसलिए अगर हम 22 शुक्रवार घटा दें, तो ताजमहल पर्यटकों के लिए केवल 130 दिन के लिए खुला रहता है।

स्थिति वाक़ई दिलचस्प है। अगर आगरा सर्किल की मानें, तो 130 दिन में रोज़ाना 10 शू कवर इस्तेमाल किये गये; क्योंकि कुल मिलाकर 1,300 शू कवर इस्तेमाल हुए। हम काल्पनिक रूप से रोज़ाना 20 शू कवर इस्तेमाल होने का आँकड़ा मान लेते हैं। इस हिसाब से 2,600 शू कवर का इस्तेमाल किया गया। चलिए, 2,600 को भी छोड़ देते हैं। मान लेते हैं कि 3,000 इस्तेमाल हुए। चलो, मान लीजिए 200-500 शू कवर चूहों ने खा लिए, तो भी इस्तेमाल हुए 3,500 शू कवर।

मान लीजिए कि कोरोना के कारण एहतियातन कुछ लोगों ने डबल शू कवर का इस्तेमाल किया होगा, तो भी इस्तेमाल हुए क़रीब 5,000 शू कवर। लेकिन फिर भी यह सवाल उठता है कि बिना बुने जूतों के एक लाख कवर कहाँ गये? पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि आगरा सर्किल ने 11 जुलाई, 2022 को एक आरटीआई के जवाब में बताया था कि ड्यूटी पर तैनात सीआईएसएफ जवानों को मैट कपड़े के साथ कैनवस बॉटम वाले शू कवर दिये जाते हैं। इसका मतलब है कि बिना बुने हुए शू कवर का इस्तेमाल सिर्फ़ और सिर्फ़ एएसआई के कर्मचारियों के बीच ही होता है। लेकिन सवाल यही है कि वे कितने शू कवर का इस्तेमाल कर सकते थे?

ताज में तीन हज़ार वीवीआईपी-वीआईपी विजिटर

‘तहलका’ की जाँच में पाया गया कि आगरा सर्किल ने चार तरह के शू कवर ख़रीदे। इसका ज़िक्र हम ऊपर भी कर चुके हैं। इनमें से हमने आपको बिना बुने हुए शू कवर की ख़रीद और उपयोग के बारे में विस्तार से बताया है। हालाँकि इस रिपोर्ट के बाक़ी हिस्सों में भी और खुलासे होने वाले हैं। तो हमने उल्लेख किया कि कैनवास के नीचे के सूती कपड़े, कैनवास के नीचे के मखमल के कपड़े और कैनवास के नीचे के मैटी कपड़े के शूकवर भी ताजमहल के नाम से ख़रीदे जाते थे। लेकिन कितने इस्तेमाल किये गये? इस सवाल का जवाब सिर्फ़ आगरा सर्कल ही दे सकता है।

ये ख़ास तीन तरह के शू कवर वीवीआईपी, वीआईपी और सीआईएसएफ कर्मियों को दिये जाते हैं। एक आरटीआई के माध्यम से वर्ष 2021 में प्राप्त जानकारी के अनुसार, जनवरी 2018 से जनवरी 2020 तक 15,000 जोड़ी शू कवर ख़रीदे गये। इनकी क़ीमत अलग-अलग 46 रुपये, 85.51 रुपये और 90 रुपये थी। ये शू कवर सूती कपड़े और मखमली कपड़े की दोनों क़िस्मों के थे और दोनों ही कैनवास बॉटम के साथ थे। आगरा सर्किल के अनुसार ये सभी शू कवर भी 31 जुलाई, 2021 तक इस्तेमाल किये गये थे। अब अगर प्रोटोकॉल के साथ एक वीवीआईपी और वीआईपी सहित पाँच लोग मुख्य समाधि पर गये और सभी पाँच लोगों को शू कवर दिये गये, तो इसका मतलब 3,000 वीआईपी हुए। दो साल में क्या इतने वीवीआईपी करेंगे स्मारक का दौरा? इस सम्बन्ध में जब आगरा सर्किल से वीवीआईपी और वीआईपी की आवाजाही के आँकड़े माँगे गये, तो उन्होंने कोई भी जवाब देने से साफ़ इनकार कर दिया।

क्या आडंबर का सहारा लेता है आगरा मंडल?

ताजमहल के नाम पर ख़रीदे जा रहे शू कवर के बारे में विवरण जानने के लिए आगरा सर्किल में एक नहीं, बल्कि कई आरटीआई आवेदन और अपील दायर की गयी थीं। लेकिन इन सवालों के जवाब में हर बार आगरा सर्किल ने संदेहास्पद जवाब भेजा। जैसे जब हमने पूछा कि ताजमहल में किसे शू कवर दिया जाता है? इसके जवाब में आगरा सर्किल ने 1 सितंबर, 2021 को जानकारी दी कि 10 दिसंबर, 2018 से मुख्य समाधि पर आने वाले सीआईएसएफ कर्मियों, एएसआई, एसआईएस, सफ़ाईकर्मियों, वीआईपी-वीवीआईपी और घरेलू पर्यटकों को शू कवर दिये गये। लेकिन फिर 27 अप्रैल 2022 को अपने दूसरे जवाब में ऑफिस ने हमें बताया कि घरेलू पर्यटकों को शू कवर देने का कोई नियम नहीं है।

इसके बाद हमने आगरा सर्कल से जानना चाहा कि उनके कितने कर्मचारी ड्यूटी के लिए मुख्य समाधि में जाते हैं? इसके जवाब में आगरा सर्किल ने 16 नवंबर, 2021 को कहा कि पर्यटकों की संख्या के हिसाब से सीआईएसएफ, एएसआई और एसआईएस कर्मियों और सफ़ाई कर्मचारियों की संख्या बदलती रहती है, इसलिए कोई निश्चित आँकड़ा नहीं है। इतना ही नहीं अकेले 2021 में लाखों में ख़रीदे गये शू डिस्पेंसर के लिए बिना बुने हुए शू कवर के बारे में आगरा सर्किल ने 11 जुलाई, 2022 को जानकारी दी कि एडीए शू डिस्पेंसर में इस्तेमाल होने वाले शू कवर उपलब्ध कराता है। आगरा की तरफ़ से दिया गया जवाब कई सवाल खड़े करता है। क्योंकि अगर शू डिस्पेंसर के लिए शू कवर एडीए देता है, तो आगरा सर्कल शू डिस्पेंसर के लिए लाखों बिना बुने हुए शू कवर क्यों ख़रीद रहा है?

आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) यूपी सरकार का एक विभाग है और शहर के रखरखाव के लिए ज़िम्मेदार है। एडीए को ताजमहल परिसर के बाहरी इलाक़े में रखरखाव का काम भी सौंपा गया है। इसके बदले में एडीए एएसआई के आगरा सर्किल से टोल फंड लेता है। इसका मतलब यह है कि एएसआई ताजमहल के प्रवेश टिकट की क़ीमत का एक हिस्सा एडीए को देता है। बदले में एडीए विदेशी पर्यटकों को टिकट के साथ एक जोड़ी शू कवर और एक छोटी पानी की बोतल देता है। ये शू कवर शू डिस्पेंसर के लिए बिना बुने हुए हैं। विदेशी पर्यटकों के लिए एडीए ने ताजमहल परिसर में दो शू कवर डिस्पेंसर रखे हैं। वहाँ एक आदमी भी तैनात रहता है, जो विदेशी पर्यटकों को टिकट देखकर ही डिस्पेंसर से शू कवर देता है।

लापता डिस्पेंसर

एक आरटीआई के जवाब में एएसआई के आगरा सर्किल ने कहा कि वर्ष 2015-16 में उसने आठ शू कवर डिस्पेंसर ख़रीदे थे। शू कवर डिस्पेंसर ताजमहल के समीप कटरा उमर $खाँ स्थित हनुमान इंटरप्राइजेज ताजगंज से ख़रीदा गया था। आगरा सर्किल ने एक डिस्पेंसर की क़ीमत 61,000 रुपये बतायी है। उल्लेखनीय है कि इस मॉडल का शू कवर डिस्पेंसर काफ़ी कम क़ीमत में ऑनलाइन उपलब्ध है। डिस्पेंसर का मॉडल सीडी-ओटीओ-720 है। आगरा मंडल ने टेंडर जारी करते समय इस मॉडल का ज़िक्र किया है।

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, 31 जुलाई, 2021 तक सिर्फ़ दो शू कवर डिस्पेंसर चालू हालत में थे। फिर जब 27 अप्रैल, 2022 को जूता डिस्पेंसर की जानकारी माँगी गयी, तो बताया गया कि छ: डिस्पेंसर चालू हालत में थे और एक उस समय ख़राब था। सवाल यह है कि जब आगरा सर्किल ने आठ शू कवर डिस्पेंसर ख़रीदे थे, तो सिर्फ़ सात डिस्पेंसर की ही जानकारी क्यों दे रहे हैं? आठवाँ डिस्पेंसर कहाँ गया?

आरटीआई के तहत आगरा सर्कल से काम करने वाले और ख़राब शू कवर डिस्पेंसर की अलग-अलग सॉफ्ट या हार्ड फोटो माँगी गयी थी। विभाग ने फोटो की फोटो कॉपी भेजी। इसके द्वारा भेजी गयी हार्ड कॉपी इतनी धुँधली और-काली है कि कुछ भी पढऩा और देखना आसान नहीं है। वहाँ भी विभाग के पास कुल आठ डिस्पेंसर की जगह सिर्फ़ सात डिस्पेंसर की फोटोकॉपी दी गयी है।

एक हज़ार कवर ही काफ़ी थे

हुआ यह था कि अक्टूबर 2015 से और ख़ासकर 2021 से आगरा सर्किल को ताजमहल के लिए लाखों शू कवर की ज़रूरत पडऩे लगी थी। जबकि साल 2015 से पहले यानी 2014 तक हर साल 600 से 1,000 शू कवर की ज़रूरत होती थी। आरटीआई की 16 नवंबर, 2021 की जानकारी इस प्रकार है :-

 2010-11 में 30 रुपये प्रति जोड़ी की दर से कैनवास बॉटम वाले सूती कपड़े के 600 जोड़े शू कवर ख़रीदे गये।

 2011-12 में 40 रुपये की दर से सूती कपड़े के 1,100 जोड़े शू कवर, कैनवस बॉटम के साथ ख़रीदे गये।

 2013-14 में 36.40 रुपये की दर से सूती कपड़े के 2,400 जोड़े शू कवर, कैनवस बॉटम के साथ ख़रीदे गये।

अब सवाल यह है कि साल 2013-14 से 2014-15 तक यानी दो साल तक 2,400 शू कवर में काम किया गया। चूँकि कुल अवधि, जिसके लिए ऊपर डेटा प्राप्त किया गया था वह चार साल है, तो 4,100 जोड़ी शू कवर के साथ, चार साल की आवश्यकता पूरी हो गयी है। जबकि उस वक़्त भी प्रोटोकॉल के साथ सीआईएसएफ के जवान, एएसआई, एसआईएस, सफ़ाई कर्मचारी और वीआईपी-वीवीआईपी थे। साल 2015 से ऐसा क्या हुआ है कि महँगे कवर के साथ-साथ सस्ते शू कवर की माँग में भी इतनी तेज़ बढ़ोतरी हो गयी?

ख़रीदारी की वर्षवार सूची

आरटीआई आवेदन के जवाब में मिली जानकारी के मुताबिक, एएसआई के आगरा सर्किल द्वारा लगातार शू कवर की ख़रीदारी की जा रही है। शू कवर सीसीटीवी बेचने वाली और एसी की मरम्मत करने वाली, फर्नीचर बेचने वाली और घर से दुकान चलाने वाली फर्मों से ख़रीदे गये हैं। हमने वर्ष 2010 से शू कवर की जानकारी लेना शुरू किया। हालाँकि आगरा सर्कल ने वर्ष 2016-17 के शू कवर की ख़रीद का कोई रिकॉर्ड नहीं दिया।

घरेलू पर्यटकों को बेचे गये कवर

मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक, मई 2019 में एएसआई आगरा सर्किल ने सर्वोच्च न्यायालय में साइट मैनेजमेंट प्लान फाइल किया था। यह योजना ताजमहल से जुड़ी हुई थी। इस योजना में अन्य तैयारियों के साथ ताजमहल के मुख्य गुंबद को धूल के कणों से बचाने की भी योजना थी। इसके लिए एएसआई ने मुख्य गुंबद पर आने वाले सभी पर्यटकों से शू कवर पहनने को कहा था। एडीए विदेशी पर्यटकों को शू कवर देता है। लेकिन घरेलू पर्यटकों को शू कवर उपलब्ध कराने की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है।

हाल ही में एक वीडियो सामने आया था, जिसमें ताजमहल परिसर के अंदर घरेलू पर्यटकों को अवैध रूप से शू कवर बेचे जाते हुए दिखाया गया था।

लुकाछिपी का खेल

आरटीआई के मुताबिक, आगरा सर्किल से साल 2015-16 से 2021-22 तक की जानकारी माँगी गयी थी। वर्ष 2016-17 को छोडक़र शू कवर की ख़रीद के सम्बन्ध में सभी जानकारी प्रदान की गयीं। साल 2016-17 के मामले में शू कवर की ख़रीद शून्य घोषित की गयी थी। लेकिन जब दूसरी आरटीआई में ताजमहल से जुड़े ख़र्च की जानकारी माँगी गयी, तो पता चला कि साल 2016-17 में 5,52,500 रुपये के री-यूज वाले शू कवर ख़रीदे गये थे। अब आगरा मंडल इस ख़रीद को क्यों और किस मक़सद से छिपा रहा है? यह तो वही बता सकते हैं।

यह हमें हैरान कर देता है कि शू कवर के बारे में आरटीआई पूछताछ के जवाब में दी गयी जानकारी पूरी है या नहीं। रिपोर्ट पर उनका पक्ष जानने के लिए सम्पर्क किये जाने पर राजकुमार पटेल, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) आगरा सर्कल के अधीक्षक और वसंत कुमार स्वर्णकार, संरक्षण निदेशक और पीआरओ, एएसआई ने ‘तहलका एसआईटी’ को अपना पक्ष देने से इनकार कर दिया।

 

ख़रीदारी का सिलसिला

शू कवर का प्रकार                   ख़रीदे गये जोड़ों की संख्या     प्रति जोड़ी क़ीमत          कुल ख़र्च की गयी राशि  

वर्ष 2015

सूती कपड़ा कैनवास बॉटम के साथ      26,000                     37.75 रुपये               9,81,500 रुपये (अक्टूबर)

मखमली कपड़ा कैनवास बॉटम के साथ   800                              50 रुपये                40,000 रुपये

जूते के लिए बिना बुना डिस्पेंसर               1,00,000                      8.20 रुपये               8.20 लाख रुपये

 

वर्ष 2018

कॉटन क्लॉथ के साथ कैनवास बॉटम     9,612                        46 रुपये             4,42,152 रुपये (जनवरी में )

5,000                    54.51 रुपये                  2,72,550 रुपये (दिसंबर में)

वेलवेट क्लॉथ के साथ कैनवास बॉटम    200                              85.51 रुपये                 17,102 रुपये (दिसंबर में)

डिस्पेंसर के लिए बिना बुना जूता      30,000                            8.95 रुपये                  2,68,500 रुपये (जनवरी में)

15,000                  8.51 रुपये                  1,27,650 रुपये (दिसंबर में)

 

वर्ष 2020

कैनवास बॉटम के साथ सूती कपड़ा      00                                  00                                      00

वेलवेट क्लॉथ के साथ कैनवास बॉटम    200                                90 रुपये                18,000 रुपये

बिना बना शू डिस्पेंसर के लिए                  20,000                      11.50 रुपये          2,30,000 रुपये

वर्ष 2021

सूती कपड़ा कैनवास बॉटम के साथ        00                                   00                                          00

कैनवास के साथ मखमली कपड़ा           00                                  00                            00

शू डिस्पेंसर के लिए बिना बुना                   1.05 लाख                 4.75 रुपये                4.98 लाख रुपये (जनवरी में)

1.05 लाख               4.75 रुपये         4.98 लाख (फरवरी में )

1,00,000                                   5 रुपये (जुलाई में)      00

जुलाई, 2021 के बाद

कैनवास बॉटम के साथ सूती कपड़ा         00                             00                                         00

कैनवास बॉटम के साथ वेलवेट क्लॉथ      500                                92.35 रुपये                46,175 रुपये

शू डिस्पेंसर के लिए बिना बुना                 1,00,000                                                  5 रुपये             00

कैनवास बॉटम के साथ मैटी क्लॉथ      5,000                                    48 रुपये                 2.40 लाख रुपये

उम्मीद ही रास्ता

वैश्विक महामारी से उपजी अनिश्चितता और निराशा के बावजूद आशा की एक किरण के रूप में हम नये साल की शुरुआत कर रहे हैं। तमाम बाधाओं के बीच हम आगे बढ़े हैं और यह सबक़ हमने सीखा है कि कोई भी बाधा हमें रोक नहीं सकती। लोग कहेंगे, शक्तिशाली लोगों को सुनना होगा और हमारी सामूहिक आवाज़ दुनिया को बदल सकती है। इस मोड़ पर जब हम 2022 को अलविदा कह चुके हैं और नये साल की शुरुआत कर रहे हैं, हम एक अँधेरी सुरंग के अन्त में प्रकाश की किरण देखने की उम्मीद कर सकते हैं।

कोई सन्देह नहीं कि हाल में चीन में हमने महामारी के मामलों में वृद्धि देखी है, जबकि जापान, दक्षिण कोरिया, यूएसए, फ्रांस, ब्राजील, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया, हॉन्गकॉन्ग और ताइवान से भी कोरोना महामारी के मामलों में बढ़ोतरी की रिपोट्र्स हैं। लेकिन शुक्र है कि इस दौरान भारत में मामलों की संख्या बढऩे के बावजूद स्थिति चिन्ताजनक नहीं है।

जाने-माने टीका विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि भारत में 97 फ़ीसदी लोगों को कोरोना का पहला टीका लग चुका है, जबकि 90 फ़ीसदी लोगों को दोनों टीके लग चुके हैं, और 27 फ़ीसदी लोगों को बूस्टर डोज लग चुकी है। उनका कहना है कि भारत में लोगों ने हाईब्रिड इम्युनिटी विकसित कर ली है, क्योंकि बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हुए हैं और बड़ी आबादी को टीका लगाया जा चुका है। यह चीन और अन्य देशों से हाल ही में रिपोर्ट हुए संक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करता है।

डब्ल्यूएचओ के आपात प्रमुख डॉ. माइकल रेयान ने कहा है कि ‘टीकाकरण ही ओमिक्रॉन से बचने की रणनीति है।’ उधर डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अदनोम घेब्येयियस ने 21 दिसंबर को कहा कि हमें उम्मीद है कि इनमें से हरेक- कोरोना महामारी, एमपॉक्स और इबोला को अगले साल अलग-अलग अवसरों पर खत्म हुआ घोषित किया जाएगा। डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने कहा कि निश्चित रूप से हम एक साल पहले की तुलना में महामारी के साथ बहुत बेहतर स्थिति में हैं। जैसे-जैसे साल खत्म होने को आया, फीफा विश्व कप ने हमें उम्मीद का सन्देश भी दिया कि इस ट्रॉफी पर अब यूरोपीय देशों का एकाधिकार नहीं रहा। जब क्रिकेट दिग्गज सचिन तेंदुलकर ने एक ट्वीट में भारत की सन् 2011 क्रिकेट विश्व कप यात्रा की तुलना इस फीफा विश्व कप में अर्जेंटीना के अभियान के साथ की, तो इसने भारत के लिए एक सकारात्मक सन्देश दिया, जो वर्तमान में फीफा की रैंकिंग में 106वें स्थान पर है।

सन्देश यह है कि 1.4 अरब की आबादी वाला देश भी प्रयास करे, तो दुनिया के सबसे करामाती खेल में अपनी सर्वोच्चता साबित कर सकता है। सऊदी अरब ने इसे साबित लिया है, जब उसने चैंपियन अर्जेंटीना के ख़िलाफ़ टूर्नामेंट के पहले ही मैच में 2-1 से जीत के साथ अपने अभियान की शुरुआत की और अर्जेंटीना के लगातार 36 मैच जीतने किये अभियान का अन्त कर दिया। टूर्नामेंट में ग़ैर-यूरोपीय और ग़ैर-दक्षिण अमेरिकी टीमों द्वारा अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देखने को मिला। बेशक, फुटबॉल के सर्वकालिक महान् खिलाडिय़ों में से एक मेस्सी ने निस्सन्देह दिग्गज डिएगो माराडोना के बराबर सम्मान पाने का गौरव अर्जित किया है। यह वह सन्देश है, जो हमें निराशा के समय में आशा की एक किरण देता है। ऐसा कहा जाता है कि जब जीवन की परिस्थितियाँ हमें घुटनों पर डाल देती हैं, तो हम आशा की कमी महसूस करते हैं। लेकिन यह समझकर कि आशा ही एक विकल्प है, हम बाधाओं का बेहतर तरी$के से सामना करके इसे जीवित रख सकते हैं। सबसे ज़्यादा बिकने वाली किताबों में से एक ‘द पॉवर ऑफ पॉजिटिव थिंकिंग’ के लेखक नॉर्मन विंसेंट पीले सुझाव देते हैं- ‘आशा का अभ्यास करें। जैसे-जैसे उम्मीद एक आदत बन जाती है, आप स्थायी रूप से एक ख़ुश आत्मा पा सकते हैं।’

 

नये साल में नये संकल्पों की ज़रूरत

फ़ालतू के ‘डे’ मनाने के बजाय युवा समझें राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय दिवसों का महत्त्व

बीते वर्षों की तरह साल 2022 भी विदा हो गया और हम 2023 में प्रवेश कर चुके हैं। जनवरी का स्वागत दुनिया भर ने पूरे ज़ोर-शोर से किया है। इसी तरह हमारी ज़िन्दगी के साल दर साल गुज़रते जाते हैं, और हम हर साल कुछ नया करने का संकल्प लेते हुए आगे बढ़ते रहते हैं। ज़ाहिर है इस साल के लिए भी सभी ने कोई न कोई संकल्प लिया ही होगा। लेकिन इसके बावजूद कुछ ऐसे संकल्पों को पूरा करने से हम लोग चूक जाते हैं, जिनके लिए बहुत से लोग पछतावा करते नजर आते हैं। यह स्थिति जागरूक युवाओं की ज़्यादा होती है, ख़ासकर उनकी जो पढ़ाई करके अपना करियर बनाने में दिन-रात लगे रहते हैं।

लेकिन अगर हम सब अपनी ज़िन्दगी सँवारने के लिए संकल्पों के अलावा भी कुछ संकल्प लें, तो हो सकता है कि हमें बेहद ख़ुशी मिले। इन्हीं संकल्पों में से एक है- हर साल के हर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस पर अपनी ओर से कुछ ऐसा करना, जिससे हमें और हमारे समाज को फ़ायदा पहुँचे। लेकिन विडंबना यह है कि आजकल के युवा कई ज़रूरी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवसों पर कुछ करने के बजाय रोज़-डे, प्रपोज-डे, स्लैप-डे, किस-डे, फ्रैंड्स-डे जैसे फ़ालतू के मनगढ़ंत दिवसों में उलझ गये हैं, जिन्हें न तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवसों की मान्यता मिली है और न इन्हें मनाने का कोई फ़ायदा है। यहाँ तक कि मदर-डे और फादर-डे जैसे दिवसों पर भी लोग सिवाय एक-दूसरे को बधाई देने के कुछ नहीं करते, भले ही फिर वो माँ-बाप की सही मायने में इज़्ज़त करने की बात हो।

हर साल की तरह इस साल भी जनवरी में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवस हैं, जिनमें 4 जनवरी को विश्व ब्रेल दिवस है। 6 जनवरी को विश्व युद्ध अनाथ दिवस है। 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस है। 9 जनवरी को भारतीय प्रवासी दिवस है। 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस है। 11 जनवरी से 17 जनवरी तक राष्ट्रीय सडक़ सुरक्षा सप्ताह है। 11 जनवरी को लाल बहादुर शास्त्री पुण्य-तिथि है। 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस एवं स्वामी विवेकानंद जयंती है। और 14 जनवरी को सशस्त्र बल वयोवृद्ध दिवस, तो 15 जनवरी को भारतीय सेना दिवस प्रमुख है।

विश्व युद्ध अनाथ दिवस

6 जनवरी को विश्व युद्ध अनाथ दिवस मनाया जाता है। लेकिन अब इसका उतना महत्त्व नहीं रह गया है। क्योंकि अब द्वितीय विश्व युद्ध को हुए भी 83 साल बीत चुके हैं। इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध में भी अनाथ हुए बच्चों में शायद ही कोई बचा होगा। लेकिन इन दिनों रूस-यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के चलते अनाथ हुए बच्चों को अंतरराष्ट्रीय संरक्षण की ज़रूरत है, जिस पर ध्यान दिये जाने की बहुत ज़रूरत है। विश्व युद्ध अनाथ दिवस मनाने का मतलब भी तभी सार्थक होगा, जब किसी भी युद्ध में अनाथ और घायल हुए बच्चों को संरक्षण, शिक्षा और पोषण मिले। आज इस तरह के बच्चों की ओर देखने वाले संगठनों और देशों का नितांत अभाव है, केवल इस नाम पर पैसों की लूटमार ही हर देश में चल रही है। कई देशों में युद्ध में अनाथ और घायल हुए बच्चों के फंड का तो इस्तेमाल भी नहीं होता है।

विश्व पटल पर हिन्दी

बात जब हिन्दी की आती है, तो हमारे ही देश के कुछ लोग नाक-भौं सिकोडऩे लगते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि जिस हिन्दी भाषा की वे अवहेलना कर रहे हैं, वही हिन्दी भाषा उनकी जन्मघुट्टी में उन्हें पिलायी गयी है और इसके बिना उनका वजूद उसी तरह नहीं है, जिस तरह देश के बिना उनका कोई वजूद नहीं है। इसलिए अपनी मातृ भाषा से सभी को उसी तरह प्यार करना चाहिए, जिस तरह वे अपने देश से करते हैं। हर साल 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है। अगर हम आज विश्व पटल पर हिन्दी की बात करें, तो यह दुनिया की तीसरी सबसे समृद्ध भाषा है और धीरे-धीरे इसे बोलने-समझने वालों की तादाद बढ़ रही है। आज दुनिया में 72 करोड़ से ज़्यादा लोग हिन्दी पढ़ते-लिखते और बोलते हैं। भारत में 18 करोड़ से ज़्यादा लोगों की मूल भाषा हिन्दी है, जबकि $करीब 31 करोड़ लोग इसे दूसरी और 25 करोड़ तीसरी मुख्य भाषा के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। माना जा रहा है कि आने वाले तीन दशक में हिन्दी दुनिया की दूसरी सबसे समृद्ध भाषा का दर्जा पा चुकी होगी।

राष्ट्रीय सडक़ सुरक्षा सप्ताह

राष्ट्रीय सडक़ सुरक्षा दिवस पहली बार 4 मार्च 1972 को मनाया गया था। साल 2015 में यह दिवस 11 जनवरी से 17 जनवरी तक मनाया गया। इस प्रकार इसे अब राष्ट्रीय सडक़ सुरक्षा सप्ताह कहा जाता है। भारत में जहाँ साल 2020 में 3,35,050 लोग सडक़ हादसे में ज़ख्मी हुए, वहीं 1,33,201 लोग मारे गये, वहीं साल 2021 में 3,71,884 लोग ज़ख्मी हुए, जबकि 1,55,622 लोग मारे गये। इस साल के आँकड़े अभी जारी नहीं हुए हैं। भारत में कुल 78.7 फीसदी सडक़ दुर्घटनाएँ चालकों की $गलती से होती हैं। सबसे ज़्यादा हादसे बारिश और सर्दियों में होते हैं। भारत में सडक़ दुर्घटनाएँ रोकने के लिए सडक़ नियमों का कड़़ाई से पालन होने के अलावा, ड्राइविंग लाइसेंस में बरती जाने वाली असावधानियाँ भी हैं, जिसकी सबसे बड़ी वजह है रिश्वत के दम पर लाइसेंस जारी होना। साथ ही सडक़ों की दशा $खराब होना भी सडक़ हादसों का बड़ा कारण है। हालाँकि आज़ादी के बाद से सडक़ व्यवस्था में का$फी इज़ाफ़ा हुआ है और दिनोंदिन सडक़ें बढ़ती तथा सुधरती जा रही है; लेकिन आज भी सडक़ों की गुणवत्ता और उनमें बहुत जल्द पडऩे और लम्बे समय तक न भरे जाने वाले गड्ढों की वजह से भी सडक़ हादसे होते हैं, जिसके लिए सरकार के राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय परिवहन विभाग, नेता और ठेकेदार सभी ज़िम्मेदार हैं।

भारतीय सेना दिवस

हर साल 15 जनवरी को भारतीय सेना दिवस के रूप में मान्यता मिली हुई है। यह दिन भारत के लिए कई मायने में ख़ास है। 15 जनवरी को भारत के गौरव बढ़ाने वाले जवानों को सम्मानित किया जाता है। इस साल 15 जनवरी को 75वाँ राष्ट्रीय सेना दिवस मनाया जाएगा। इस मौक़े पर थल सेना की वीरता, शौर्य और शहादत को याद किया जाएगा। 15 जनवरी को राष्ट्रीय सेना दिवस मनाने के पीछे की कहानी यह है कि 15 अगस्त, 1947 को देश के आज़ाद होने के बाद भी भारतीय सेना का अध्यक्ष ब्रिटिश मूल का ही होता था। 14 जनवरी, 1949 तक आख़िरी ब्रिटिश कमांडर इन चीफ जनरल फ्रांसिस बुचर रहे। लेकिन 15 जनवरी, 1949 को पूर्ण आज़ाद भारत के भारतीय सेना प्रमुख के.एम. करियप्पा बने थे। इसी दिन से भारतीय सेना दिवस मनाया जाता है।

इन दिवसों पर अगर अपने स्तर पर हर व्यक्ति कुछ सकारात्मक करे, तो इसका लाभ पूरे मानव समाज के साथ-साथ अन्य प्राणियों और प्रकृति को भी मिलेगा। इसी सोच के साथ जनवरी के पहले पखवाड़े में आने वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दिवसों के बारे में कुछ जानें, महान् लोगों से कुछ सीखें।

अनैतिक राह पर चीन, क्या भारत के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा है ड्रैगन?

क्या तीसरी बार और पूरी ताक़त से चीन की सत्ता पर बैठने के बाद शी जिनपिंग राज्य विस्तार और एशिया क्षेत्र में अर्थ-व्यवस्था पर एकाधिकार के अपने मंसूबे पूरे करने में जुट गये हैं? भारत सीमा पर उसकी गतिविधियाँ, ताइवान में उकसावे वाली हरकतें, जापान से तनाव और रूस से गहरी दोस्ती जिनपिंग के इरादों की झलक देती हैं। पाकिस्तान के साथ जिनपिंग पींगे बढ़ा चुके हैं, जिसे भारत के लिए अतिरिक्त ख़तरा माना जा सकता है।

कुछ जानकार तो कोरोना को भी चीन के एक हथियार के रूप में देखते हैं। तवांग में एक महीना पहले भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प महज़ एक झड़प तक सीमित नहीं रखी जा सकती। इस तरह की घटनाओं के बाद भारत ने पिछले एक पखबाड़े के भीतर चीन सीमा पर अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए निगरानी को मज़बूत करने के लिए भारतीय वायुसेना की गरुड़ स्पेशल फोर्स को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सक्रिय किया है और लड़ाकू विमानों की उड़ानें बढ़ायी हैं। भारत की सुरक्षा एजेंसियों को ये इनपुट मिला था कि चीन भारत को लद्दाख़, नॉर्थ ईस्ट और नेपाल तीन तरफ़ से घेरना चाहता है। चीन की गतिविधियों की गूँज संसद में भी सुनायी दी है और कांग्रेस सहित विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार चीन के मामले में चीज़ों को साफ़ करने से कतरा रही है।

इन घटनाओं के बाद भारत ने पिछले एक पखवाड़े के भीतर चीन सीमा पर अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए निगरानी पर फोकस किया है और भारतीय वायुसेना की गरुड़ स्पेशल फोर्स को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सक्रिय करते हुए लड़ाकू विमानों की उड़ानें बढ़ायी हैं। लेकिन चीन सिर्फ़ सैनिक स्तर पर ही सक्रिय नहीं है। दिसंबर के आख़िर में भारत के पड़ोसी नेपाल में सत्ता परिवर्तन के पीछे भी चीन को देखा जा रहा है। ऐसे में चीन के समर्थन से नेपाल में सरकार बनने के बाद सीमा क्षेत्र में निर्माण में तेज़ी आ सकती है। इससे सीमा सुरक्षा को लेकर भारत की चिन्ता बढ़ सकती है। पाकिस्तान पहले से ही चीन की गोद में बैठा हुआ है और उससे उसकी दोस्ती बरक़रार है।

वहाँ भारत समर्थक प्रधानमंत्री नेपाली कांग्रेस के प्रमुख शेर बहादुर देउबा, जिनकी पार्टी नेपाली कांग्रेस के संसद में सबसे ज़्यादा 89 सदस्य हैं; सत्ता से बाहर हो गये। जबकि चीन समर्थक पुष्प कमल दहल प्रचंड नये प्रधानमंत्री बन गये, जिनकी 275 सदस्यों वाली नेपाली संसद में महज़ 32 सदस्य हैं। नेपाल के सत्ता परिवर्तन में चीन की भूमिका इस तथ्य से ज़ाहिर हो जाती है कि माओवाद सेंट्रल के सुप्रीमो प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने से महज़ एक हफ़्ते पहले चीन के एक वरिष्ठ अधिकारी वांग शिन की उनसे और पूर्व प्रधानमंत्री सीपीएन (यूएमएल) के सुप्रीमो के.पी. शर्मा ओली (संसद में 78 सदस्य हैं) से हुई थी। ओली भी चीन के क़रीबी हैं।

भारत की तैयारी

भारत का मानना है कि चीन वास्तविक सीमा रेखा (एलएसी) पर तनाव कम नहीं करना चाहता। लिहाज़ा वहाँ भारतीय सेना रहेगी। इसके अलावा आईटीबीपी अरुणाचल में चौकियों की संख्या भी बढ़ा रही है। चीन के साथ भारत की सीमा विवाद और तनाव पर दिसंबर के आख़िर तक 17 दौर की बातचीत हो चुकी है और इस बात से यही ज़ाहिर होता है कि उसकी नियत तनाव कम करने की बिलकुल नहीं है। वह सीमा पर लगातार तनाव बनाये रखना चाहता। दोनों देशों की एलएसी पर सीमा 3,488 किलोमीटर की है और इन सर्दियों में वहाँ भारतीय सेना की संख्या बढ़ी है।

इस सीमा पर चीन ने क़रीब 1.80 लाख सैनिक जमा कर रखे हैं। यह सैनिक लगातार वहाँ रहते हैं। यही नहीं चीन ने वहाँ हथियारों का भी भारी भरकम जमाबड़ा कर लिया है और पक्के निर्माण (स्ट्रक्चर) भी किये हैं। भारत इसे ख़तरे के रूप में देखता है, लिहाज़ा उसने इसकी टक्कर के बराबर ही तैयारी की है। वहाँ सेना के अलावा आईटीबीपी भी है। सेटेलाइट की तस्वीरें देखने से ज़ाहिर होता है कि सीमा के दोनों और टैंक और दूसरे हथियारों का ज़ख़ीरा जमा किया गया है, जिनमें रॉकेट लॉन्चर, मल्टी ग्रेनेड और अंडर बैरल लॉन्चर शामिल हैं।

भारत ने चीन की गतिविधियों और घुसपैठ पर नज़र रखने के लिए हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे स्थापित करने को अपनी योजना में शामिल किया है। यह कैमरे ख़रीदने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इन्हें आईटीबीपी ऊँचाई वाली जगहों पर स्थापित करेगी। बता दें आईटीबीपी वहाँ 18,000 फुट की ऊँचाई तक तैनात है। विवादित सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच की दूरी अब काफ़ी कम है और कई जगह तो यह महज़ 500 फीट ही है; लिहाज़ा तनाव को समझा जा सकता है।

चीन करता जा रहा निर्माण

यह सामने आया है कि चीन भारत सीमा पर लगातार निर्माण कर रहा है और यह तैयारियाँ युद्ध की दृष्टि से की गयी दिखती हैं। चीन एलएसी पर सडक़, रेल और एयर कनेक्टिविटी बढ़ा रहा है। साल 2022 की ही बात करें, तो इस्टर्न कमांड के ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल आरपी कालिटा ने मई में स्वीकार किया था कि चीन की सेना (पीएलए) अरुणाचल से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) के पास निर्माण कर रही है। उनके मुताबिक, चीन एलएसी के पास बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट कर रहा है। इससे से कुछ समय पहले ही चीन ने अप्रैल में हॉट स्प्रिंग इलाक़े में मोबाइल टॉवर स्थापित किये थे। चीन की तरफ़ से अप्रैल में एलएसी से सटे हॉट स्प्रिंग में तीन मोबाइल टॉवर लगाने की जानकारी लद्दाख़ के चुशुल क्षेत्र के पार्षद कोन्चोक स्तान्जिन ने सोशल मीडिया पर साझा कर चौंका दिया था। इससे चीन की तैयारियों की जानकारी देश के सामने आयी। यही नहीं, कोन्चोक ने यह भी दावा किया कि पैंगोंग झील पर चीन ने पुल बना लिया है। कांग्रेस सहित विपक्ष ने इस पर सरकार से सवाल पूछे थे।

नवीनतम जानकारी के मुताबिक, चीन ने अब वहाँ मोबाइल टॉवर बनाने का काम तेज़ कर दिया है, ताकि भारत के ख़िलाफ़ अपने निगरानी तंत्र को मज़बूत कर सके। विपक्ष का यह भी आरोप है कि चीन पहले ही भारत की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है और वह कई जगह उस जगह पर बैठा है, जहाँ वह पहले नहीं था। रिपोट्र्स के मुताबिक, भारत को घेरने की रणनीति के तहत चीन भूटान में भी घुसपैठ कर चुका है और हाल में यह बात सामने आयी है कि उसने वहाँ भारतीय सीमा के नज़दीक 25,000 एकड़ इलाक़े में जबरदस्ती 4 गाँव बसा लिये हैं।

बढ़ रहा तनाव

दिसंबर के शुरू में तवांग में चीनी घुसपैठ से पहले की बात करें, तो साल 2021 में चीन के कोई 180 सैनिकों ने तवांग इलाक़े में घुसपैठ की कोशिश की थी। हालाँकि भारतीय सेना ने उसे मुहँतोड़ जवाब देते हुए इसे निष्फल कर दिया था। यह मामला पेट्रोलिंग के दौरान उपजे सीमा विवाद पर हुआ था। हालाँकि बाद में यह मसला बातचीत से सुलझा लिया गया था। हाल के वर्षों में दोनों देशों के सैनिकों के बीच सबसे बड़ी टक्कर जून 2020 में को लद्दाख़ के गलवान इलाक़े में हुई थी, जिसमें दोनों ही तरफ़ सैनिकों का नुक़सान हुआ था। अब यह भी सवाल है कि अरुणाचल प्रदेश चीन के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है? चीन इस भारतीय राज्य को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है। तिब्बत, भूटान और म्यांमार के साथ अरुणाचल की सीमाएँ लगती हैं और भारतीय सेना इस राज्य को अपनी सुरक्षा दीवार (सेफ्टी वॉल) मानती है। इसी राज्य में तवांग है, जहाँ हाल में भारतीय और चीनी सैनिकों की झड़प हुई थी। इस राज्य का सामरिक महत्त्व है। सन् 1962 के युद्ध के दौरान चीनी सैनिकों ने भारत पर हमले के लिए बुम ला दर्रे को चुना था, जो तवांग के उत्तर में ही स्थित है। तवांग में ही चार सदी पुराना तवांग मठ है, जहाँ 1959 में चीन के क़ब्ज़े के दौरान भागकर वर्तमान दलाई लामा काफ़ी समय तक रुके थे। इस मठ को चीन तिब्बती विद्रोह का केंद्र मानता है। यही नहीं सन् 1683 में छठे दलाई लामा का जन्म भी इसी क्षेत्र में हुआ बताया जाता है। बहुत-से रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की नज़र वास्तव में अरुणाचल प्रदेश पर है, ताकि भूटान के पश्चिम में सामरिक रूप से काफ़ी अहम क्षेत्र को जोडऩे की उसकी योजना का रास्ता सुगम हो जाए।

सरकार रक्षात्मक

विपक्ष का आरोप है कि पाकिस्तान के मामले में हर दूसरे दिन ब्यान देने वाली मोदी सरकार चीन के मामले में चुप्पी साध लेती है। संसद के शीतकालीन सत्र में भी कांग्रेस और विपक्ष चीन के मामले में सरकार को घेर चुका है। अरुणाचल प्रदेश में तवांग सेक्टर के यांगत्से क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर 9 दिसंबर को चीन के अकारण आक्रमण पर सरकार को बयान देने में चार दिन लग गये। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसद में दिये बयान में अभूतपूर्व नरमी दिखी। उनका बयान बहुत संक्षिप्त रखा, जबकि यह मसला काफ़ी गम्भीर था और विपक्ष इस पर पूरी जानकारी की माँग कर रहा था। तराजनाथ ने कहा- ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों ने तवांग सेक्टर के यांगत्से क्षेत्र में एलएसी को पार करने और यथास्थिति को एक पक्षीय तरीक़े से बदलने की कोशिश की; लेकिन भारतीय सेना की तीन हथियारबंद यूनिटों ने उन्हें बहादुरी से रोका और उन्हें अपने पोस्ट पर वापस होने को विवश कर दिया। न तो कोई भारतीय जवान शहीद हुआ या गम्भीर रूप से घायल हुआ। मैं सदन को यह भी आश्वस्त करता हूँ कि हमारी सेना देश की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा कर सकती है। भारतीय सेना के स्थानीय कमांडिंग ऑफिसर ने 11 दिसंबर को अपने चीनी समकक्ष के साथ फ्लैग मीटिंग की और चीनी पक्ष से इस तरह के कामों से बचने और सीमा के पास शान्ति और धीरज बनाये रखने को कहा। राजनयिक माध्यमों से भी चीनी पक्ष के साथ यह मुद्दा उठाया गया है।’

याद रहे इस झड़प में भारतीय पक्ष के 20 जवान घायल हुए। छ: को इलाज के लिए एयरलिफ्ट कर गुवाहाटी लाया गया। इससे अधिक संख्या में चीनी सैनिक भी घायल हुए। जून, 2020 में पूर्वी लद्दाख़ की गलवान घाटी में हिंसक संघर्ष, जिसमें 20 भारतीय जवान शहीद हो गये थे; के बाद यह पहली बड़ी झड़प थी। इस झड़प के पाँच दिन बाद 14 दिसंबर को मुंबई में जी-20 की जो बैठक हुई, उसमें चीन के प्रतिनिधि हान्वें तांग भी शामिल हुए। उन्होंने इसमें कहा- ‘जी 20 ऐसे महत्त्वपूर्ण मसलों पर विचार के लिए भारत और चीन को बड़ा मंच उपलब्ध करता है, जिनका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।’

यह संयोग है या कुछ और, तवांग में चीन ने तब घुसपैठ करने की कोशिश की, जब जी-20 की बैठक होने वाली थी। याद करें, लद्दाख़ में डेमचोक और चुमार क्षेत्रों में चीनी सेना तब घुसी थी, जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में अहमदाबाद में बैठक कर रहे थे।

मई, 2020 में जब पीएलए के 50,000 सैनिकों ने एलएसी का उल्लंघन कर भारतीय जवानों के साथ संघर्ष किया था और लद्दाख़ के पूर्वी सेक्टर में बड़े क्षेत्र में अतिक्रमण किया था, तब भी सरकार की तरफ़ से जानकारी बहुत डेरी से और अधूरे तरीक़े से आयी थी। विपक्ष ने तब भी मोदी सरकार को घेरा था। यहाँ तक कि भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तक ने इस पर सवाल उठाये थे। इस बार भी स्वामी सवाल उठाने में पीछे नहीं हटे।

चीन और अरब के रिश्ते

चीन की भारत ही नहीं अमेरिका के साथ भी तनातनी बनी हुई है। इसकी काट के लिए चीन सऊदी अरब से सम्बन्ध बढ़ा रहा है। सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान ने हाल में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अपने देश पहुँचने पर जिस अंदाज़ में स्वागत किया, वह अमेरिका ही नहीं, भारत के लिए भी चिन्ता का सबब हो सकता है। इस दौरे के दौरान सऊदी अरब और चीन के बीच अरबों डॉलर के समझौतों पर भी दस्तख़त हुए। चीन जिनपिंग की इस यात्रा को बहुत सफल इसलिए भी बता रहा है क्योंकि सऊदी अरब ने राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ शिखर बैठक के लिए खाड़ी के कई देशों को भी बुलाया। जिनपिंग की इस यात्रा के बाद भारत के लिए पहले से चिन्ता का कारण रहे चाइना-पाकिस्‍तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) में अब सऊदी अरब भी निवेश कर सकता है। भारत के लिए यह सीपीईसी इसलिए भी गले की फाँस है, क्योंकि यह पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुज़रता है और भारत इसका कड़ा विरोध करता रहा है। हाल में भारत के कुछ वर्गों की तरफ़ से इक्का-दुक्का यह रिपोट्र्स सामने आयी हैं कि सैन्य कार्रवाई के ज़रिये भारत पीओके को अपने साथ मिला सकता है। सेना के एक बड़े अधिकारी ने भी हाल में कहा था कि सेना पीओके में बड़ी कार्रवाई के लिए हमेशा तैयार है, भले उन्होंने सन्दर्भ पीओके में आतंकियों के लॉन्च पेड का दिया हो। हाल में यह रिपोट्र्स भी आयी थीं कि सऊदी अरब अरबों डॉलर का ऑयल रिफाइनरी पाकिस्तान में लगाने की मंशा रखता है। हालाँकि कुछ ठोस अभी सामने नहीं आया है। चीन की तरह वर्तमान में सऊदी अरब की भी अमेरिका से तनातनी बनी हुई है, जिसके मूल में तेल की कीमतें और उत्पादन है। एक रणनीति के तहत हाल के महीनों में चीन ने सऊदी अरब में निवेश और सऊदी अरब से रक्षा सम्बन्धों पर काफ़ी काम किया है। ईरान की चुनौती से निपटने के लिए चीन ने सऊदी अरब को मिसाइलें सप्लाई की हैं। इस तरह चीन मित्रों की एक कतार खड़ी कर रहा है। पाकिस्तान पहले से ही सऊदी अरब और चीन का क़रीबी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के वर्षों में सऊदी अरब से सम्बन्धों को नया आयाम देने की कोशिश की है और वहाँ की यात्रा भी की है। इसमें काफ़ी हद तक सफलता भी मिली है। हो सकता है भारत के कारण वह सीपीईसी में निवेश न करे। ऐसा होता है, तो यह भारत की सफलता होगी। हालाँकि चीन और पाकिस्तान इसे पसन्द नहीं करते और वह सऊदी अरब के निवेश की भरपूर कोशिश करेंगे। सऊदी अरब भले तेल के मामले में आत्मनिर्भर हो, हथियारों के मामले में वह फिसड्डी है और उसकी 97 फ़ीसदी रक्षा ज़रूरतें बहार के मुल्कों से पूरी होती हैं। चीन इसे अच्छी तरह समझता है; लिहाज़ा वह वहाँ निवेश के ज़रिये आगे बढ़ रहा है।

भारत की परियोजनाएँ

चीन के दबाव बनाने से निपटने के लिए भारत ने कई क़िलेबन्दियाँ की हैं, जिनमें सडक़, एयर स्ट्रिप, सुरंग निर्माण से लेकर रक्षा क्षेत्र में ख़ुद को मज़बूत करना शामिल है। सीमा पर हैलीपैड और एयर स्ट्रिप का निर्माण भारत की रणनीति में शामिल है और अकेले उत्तराखण्ड में हैलीपेड की संख्या हाल के कुछ वर्षों में बढक़र 50 हो चुकी है, जबकि तीन सक्रिय एयर स्ट्रिप पूरी तरह तैयार हैं, जहाँ फाइटर प्लेन लैंड कर सकते हैं। भारत की हिमांक परियोजना चीन सीमा तक सडक़ों का जाल बिछाने को लेकर है। बीआरओ कठिन परिस्थितियों में यह काम करके भारतीय सेना का रास्ता आसान कर रहा है। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी ज़िले में बीआरओ ने 2022 में ऐसी दो परियोजनाएँ शुरू की हैं। ये वो क्षेत्र हैं, जहाँ चीनी सेना की दूरी महज़ 500 मीटर से भी कम है। उधर अरुणाचल और लद्दाख़ सीमाओं पर इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्डिंग के तहत सभी मौसमों में काम करने वाले सडक़ों का निर्माण शामिल है। इससे हॉट स्प्रिंग इलाक़े तक भारत की पहुँच सुगम हो जाएगी। पूर्वी लद्दाख़ में भारत ने सैनिकों के ठहराव क्षमता को 35,000 जवान तक करने की तैयारी की है और वर्तमान में इस पर तेज़ी से काम चल रहा है। इन क्षेत्रों में ऐसे बंकर का निर्माण हो रहा है जो आसानी से ध्वस्त नहीं हो सकते। जोरावर परियोजना के तहत  निर्मित लाइटवेट टैंक सीमा पर तैनात किये जाने हैं और पूर्वी लद्दाख़ से यह काम शुरू किया जा रहा है। इसके अलावा उत्तराखंड में चीन से लगी 345 किलोमीटर लम्बी सीमा के पास भारत के 25,000 करोड़ की लागत वाले बहुत कठिन ट्रेन ट्रैक का काम तेज़ी से चल रहा है। कर्णप्रयाग में चीन के बाराहोती बॉर्डर पर दो साल के भीतर ट्रेन दौडऩे लगेगी। बाराहोती वह सीमा है, जहाँ चीन अब तक पाँच दर्ज़न बार घुसपैठ कर चुका है। सेना के लिए इससे वहाँ पहुँचना बहुत सुगम हो जाएगा। इन परियोजनाओं का कितना महत्त्व है, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि ख़ुद प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इस पर चल रहे काम का साप्ताहिक रिव्यू करता है।

 

“तवांग के मुद्दे को चीनी पक्ष के साथ कूटनीति के स्तर पर भी उठाया गया है। हमारी सेनाएँ, हमारी भौमिक अखंडता को सुरक्षित रखने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।’

राजनाथ सिंह

रक्षा मंत्री, भारत

 

“बीजिंग द्विपक्षीय सम्बन्धों को स्थिर और मज़बूत करने के लिए भारत के साथ काम करने को तैयार है। दोनों देश सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिरता बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जहाँ 2020 से तनाव व्याप्त है। चीन और भारत ने राजनयिक और सैन्य स्तर पर सम्पर्क बरक़रार रखा है। दोनों ही देश सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिरता बनाये रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं। पाकिस्तान और चीन भी एक-दूसरे का दृढ़ता से समर्थन करना जारी रखे हुए हैं। पिछले एक साल में चीन और रूस का राजनीतिक और रणनीतिक विश्वास और मज़बूत हुआ है।’’

वांग यी

विदेश मंत्री, चीन

 

“चीन भारत की सीमा पर युद्ध की तैयारी कर रहा है और भारत सरकार सोयी हुई है और ख़तरे को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश कर रही है। चीन ने 2,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया है। जो चीन का ख़तरा है, वो स्पष्ट है और केंद्र सरकार छिपाने की कोशिश कर रही है। उस ख़तरे को छुपाया नहीं जा सकेगा, न अनदेखा किया जा सकेगा। चीन, भारत की सीमा पर युद्ध की तैयारी कर रहा है।’’

                                 राहुल गाँधी

कांग्रेस नेता

 

“तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भद्दी गालियाँ दी गयी थीं, क्योंकि भारत चीन से लड़ाई हार गया था। अब मोदी उन विशेषणों से महरूम क्यों हैं? क्या उनके साथ वैसा ही सुलूक नहीं किया जाना चाहिए। तवांग में चीन से भारतीय सेना की झड़प के बाद मोदी कैबिनेट के मंत्री संसद में स्पष्टीकरण दे रहे हैं। लेकिन उन्हें ऐसा क्यों करना चाहिए? उनका कहना था कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहते और अब प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की चीन से नज़दीकी किसी से छिपी नहीं है। मोदी जिनपिंग के बीच 18 बैठकें हो चुकी हैं। वन टू वन की मीटिंग के बाद चीनी राष्ट्रपति मोदी की कमज़ोरियों को भाँप चुके हैं। हमारे प्रधानमंत्री को फोटो खिंचवाने का शौक़ है और कपड़ों के प्रति उनका लगाव किसी से छिपा नहीं है। जटिल वैश्विक मसलों पर वो ज़्यादा कुछ नहीं करते। मोदी ने कोई आया नहीं, कहकर गलवान देसपांग और पैंगोंग लेक चीन को गिफ्ट में दे दिया। अगर सरकार का ये ही रवैया रहा, तो चुसुल मिलिटरी एयरफील्ड भी हम जल्द चीन को सौंपने जा रहे हैं।’’

सुब्रमण्यम स्वामी

भाजपा सांसद

क़र्ज़ लौटाने में अमीरों से ज़्यादा ईमानदार ग़रीब

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि केंद्र की मोदी सरकार देश के नागरिकों से ही दोग़ला व्यवहार करने में लगी है। एक तरफ़ वह अपने उद्योगपति मित्रों का क़र्ज़ माफ़ करने में और उन्हें क़र्ज़ पर क़र्ज़ दिलाने में लगी है, तो दूसरी तरफ़ वह आम नागरिकों को दिये क़र्ज़ पर लगातार ब्याज दरें बढ़ाने का खेल खेल रही है। हाल ही में आरबीआई ने पाँचवीं बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी करते हुए इसके रेपो रेट को 5.90 फ़ीसदी से बढ़ाकर 6.25 फ़ीसदी कर दिया है। अब अगर कोई 20 साल के लिए 30 लाख रुपये का क़र्ज़ लेता है, तो उसे कुल 1,55,330 रुपये ज़्यादा चुकाने होंगे।

ध्यान रहे यह ब्याज दरें अमीरों के लिए नहीं हैं, क्योंकि अमीरों को हज़ारों करोड़ का क़र्ज़ भी मामूली ब्याज दरों पर दिया जाता है और उसे भी माफ़ करने के रास्ते निकाल लिये जाते हैं, जिसका बोझ आम क़र्ज़दारों पर ही पड़ता है। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि फिर भी ग़रीब लोग ही क़र्ज़ चुकाने में अमीरों से आगे हैं। यानी एक तरफ़ जहाँ अमीर लोग, जिनमें कि सबसे ज़्यादा केंद्र की मोदी सरकार के दोस्तों और चहेतों की संख्या सबसे ज़्यादा है, जो या तो क़र्ज़ लेकर विदेश भाग चुके हैं या फिर डिफाल्टर हैं, उनके लाखों करोड़ रुपये के क़र्ज़े माफ़ कर दिये गये हैं। वहीं दूसरी तरफ़ वे लोग हैं, जो बहुत बड़ी मजबूरी में छोटा-मोटा क़र्ज़ ले चुके हैं; लेकिन वो उसे मोटी ब्याज दर के बावजूद समय पर चुका रहे हैं। यानी देश में दो तरह के लोग हैं- एक, अमीर बेईमान और दूसरी तरफ़ ग़रीब ईमानदार।

हाल ही में सामने आयी रिपोर्ट के मुताबिक, मुद्रा योजना के तहत बैंकों से लिए छोटे क़र्ज़ को छोटे-छोटे बिजनेस करने वाले व्यापारियों ने कोरोना-काल में भी समय से ज़्यादातर क़र्ज़ लौटा दिया है। वहीं बड़े उद्योगपतियों में ज़्यादातर या तो डिफाल्टर हैं या क़र्ज़ लौटाने की बजाय उसे माफ़ कराने के जुगाड़ भिड़ा रहे हैं।

बता दें कि सात साल पहले शुरू हुई योजना के तहत बेल्डर, लोहार, दुकानदार, मोबाइल रिपेयर और गुमटी वाले छोटे व्यापारियों ने कोरोना महामारी में विकट घाटे के बावजूद भी क़र्ज़ की क़िस्तें समय पर चुकाकर ख़ुद को ईमानदार साबित किया। इसका ही नतीजा यह है कि मुद्रा योजना का एनपीए सबसे कम महज़ 3.38 फ़ीसदी है। एक आरटीआई के जवाब में आरबीआई ने बताया है कि मुद्रा योजना के लॉन्च होने के बाद से 8 अप्रैल 2015 से 30 जून 2022 तक सभी प्रकार की बैंकों के लिए प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत कुल 13.64 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ छोटा काम करने वालों ने लिया। इस दौरान एनपीए 46,053.39 करोड़ रुपये तक बढ़ गया था।

अब दिसंबर, 2022 में यह घटकर महज़ 3.38 फ़ीसदी रह गया है। वहीं वित्त वर्ष के अंत में यानी 31 मार्च 2022 को अमीरों का एनपीए 5.97 फ़ीसदी था। यह तब था, जब उद्योगपतियों का 11 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ कर दिया गया है। अमीरों पर क़र्ज़ का यह एनपीए यूपीए सरकार की तुलना में क़रीब पाँच गुना ज़्यादा है।

इस स्थिति के चलते ही आज की तारीख़ में बैंकों के कमज़ोर हो रहे हालात के बारे में समझ सकते हैं, जिसे लगातार छिपाने की कोशिशें बैंक भी कर रहे हैं और सरकार भी इस पर पर्दा डाल रही है। केंद्र की मोदी सरकार के ही जवाब से पता चलता है कि 1 अप्रैल, 2015 से 31 मार्च, 2021 तक उसने उद्योगपतियों का 11,19,482 करोड़ रुपये का क़र्ज़ राइट ऑफ यानी माफ़ किया है, जो कि बैंकों को सीधे तौर पर चूना लगाने जैसा ही है। आरटीआई के जवाब में सामने आया है कि यूपीए की केंद्र की मनमोहन सरकार ने भी मोदी सरकार आने से पहले के अपने पाँच साल के कार्यकाल में यानी सन् 2004 से सन् 2014 तक केंद्र की यूपीए सरकार ने क़र्ज़दारों के 2.22 लाख करोड़ रुपये माफ़ किये थे। लेकिन मोदी सरकार ने पाँच गुना क़र्ज़ माफ़ किया है, वो भी उद्योगपतियों का।

हैरानी की बात यह है कि आरटीआई का जवाब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने दिया है। सवाल यह है कि संसद में यह भी क्यों नहीं बताती कि कितने लोग अब तक देश के बैंकों का कितना-कितना पैसा लेकर भाग चुके हैं? साथ ही उसे यह भी खुलकर बताना चाहिए कि स्विस बैंक में अब तक कितना काला धन जमा हो चुका है? सन् 2014 में प्रधानमंत्री बनने बाद नरेंद्र मोदी ने सन् 2016 तक कहा था कि उनके पास काले धन वालों की लिस्ट है। सवाल यह भी है कि अब काले धन वालों की लिस्ट कहाँ चली गयी? और मोदी सरकार को यह भी बताना चाहिए कि इस समय विदेशों की बैंकों में कितना और किन-किन लोगों ने काला धन छुपाकर रखा हुआ है?

इसी शीत सत्र में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में देश के बैंकों द्वारा पिछले 5 साल में माफ़ की गयी यानी बट्टे खाते में डाली गयी रक़म 10,9,511 करोड़ रुपये बतायी थी। वित्त मंत्री ने यह भी कहा है कि यह कहना गलत होगा कि सरकार ने क़र्ज़ माफ़ कर दिया है। बट्टे खाते में क़र्ज़ ट्रांसफर करना और उसे माफ़ करना दोनों ही अलग-अलग बातें हैं। बैंक इन पैसों की वसूली के लगातार प्रयास करते रहे हैं। इसके लिए बैंक अदालत का दरवाज़ा भी खटखटा सकते हैं। इसके साथ ही बैंक क़र्ज़दार के ऊपर दिवाला सम्बन्धित क़ानून के तहत कार्रवाई करने के भी सक्षम हैं।

अदालत डिफॉल्टर्स के ख़िलाफ़ दिवाला क़ानून संहिता 2016 के तहत कार्रवाई कर सकता है। इस बट्टे खाते में जमा रक़म की वसूली के सवाल के जवाब में वित्त राज्य मंत्री भागवत कराड ने संसद में बताया है कि जिन क़र्ज़ों को बट्टे खाते में डाला है, उन्हें सरकार द्वारा माफ़ किये गये क़र्ज़ की श्रेणी में नहीं डाला गया है। उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2021-22 में कुल 1,74,966 करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले गये थे। बाद में बैंकों ने इसमें से 33,534 करोड़ रुपये वसूल कर लिये।

बहरहाल आरटीआई के जवाब में आरबीआई ने कहा है कि सिर्फ़ कोरोना के 15 महीनों में केंद्र सरकार ने उद्योगपतियों का 2,45,465 करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया है, जिसमें सरकारी बैंकों ने 1,56,681 करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया, जबकि प्राइवेट बैंकों ने 80,883 करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया। वहीं विदेशी बैंकों ने 3,826 करोड़ रुपये का, एनबीएफसी ने 1,216 करोड़ रुपये का और शेड्यूल कॉमर्स बैंक ने 2,859 करोड़ रुपये का क़र्ज़ माफ़ किया है। इसी शीत शत्र में सरकार ने संसद में एक सवाल के जवाब में कहा है कि आरबीआई से क़र्ज़ माफ़ी के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यानी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अब अपने मित्रों की क़र्ज़ माफ़ी के आँकड़े भी छुपाने में लगी है।

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने और आम आदमी पार्टी के मुखिया, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व पार्टी के नेता संजय सिंह ने इस मुद्दे पर कई बार केंद्र की मोदी सरकार को घेरा है कि किस तरह से मोदी सरकार अपने उद्योगपति दोस्तों पर मेहरबान है। आज की तारीख़ में गौतम अडानी की नेटवर्थ क़रीब 140 अरब डॉलर यानी तक़रीबन 11.18 लाख करोड़ रुपये है। इतना ही नहीं, अडानी को बैंक क़र्ज़-पर-क़र्ज़ दिये जा रहे हैं और वसूली का कोई हिसाब ही नहीं है। पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने चेतावनी दी है कि सन् 2023 देश की अर्थ-व्यवस्था के लिहाज़ से बहुत ख़राब होने वाला है।

सवाल यह है कि बैंक डिफाल्टर्स के चलते ईमानदार छोटे क़र्ज़ धारकों को इसकी क़ीमत ज़्यादा ब्याज देकर चुकानी पड़ रही है, तो वहीं आम जनता को महँगाई की मार झेलकर इसे चुकाना पड़ रहा है। ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह बेईमानों के प्रति नरम रुख़ अख़्तियार करके उन लोगों को ग़रीबी की तरफ़ न धकेले, जो दिन-रात मेहनत करके ईमानदारी से बमुश्किल दाल-रोटी खाने की कोशिशें करते रहते हैं। सरकार को यह भी याद रखना होगा कि हिन्दुस्तान में ग़रीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी और आत्महत्याओं की दर लगातार बढ़ रही है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

कौन, कितने पानी में? आम चुनाव 2024 के लिए भाजपा-कांग्रेस सक्रिय, तीसरा मोर्चा अभी ठंडा

दिसंबर के दूसरे हफ़्ते बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संकेत दिये कि वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं। इसके कुछ दिन बाद ही भाजपा की कोर टीम ने देश की उन 160 लोकसभा (पहले 144 की थीं) सीटों को चिह्नित किया, जहाँ वह ख़ुद को कमज़ोर मानती है और उन पर काम करना चाहती है। पटना और हैदराबाद की बैठकों में उसने इस पर मंथन किया है।

ग़ैर-कांग्रेसी विपक्ष (तीसरा मोर्चा) समय का इंतज़ार कर रहा है, जबकि कांग्रेस राहुल गाँधी के नेतृत्व वाली ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के ज़रिये पहले ही जनता में पहुँच चुकी है। भाजपा के विपरीत कांग्रेस को देश भर की अधिकतर सीटों पर मेहनत की ज़रूरत है, जिनमें से काफ़ी उसके सहयोगियों और भाजपा के पास हैं। गुजरात में तीसरे नंबर पर रहने और हिमाचल में सभी सीटों पर जमानत गँवा देने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प बनने का सपना अभी अधूरा लगता है; लेकिन इसके बावजूद कुछ राज्यों में अपनी उपस्थिति दिखाने की उसकी कोशिश होगी। ऐसी ही स्थिति तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की है, जो पश्चिम बंगाल से बाहर ज़्यादा कुछ नहीं कर पायी है। हालाँकि यह भी सच है कि पार्टी की नेता ममता बनर्जी की देशव्यापी छवि है और विपक्ष के काफ़ी दलों में उनकी स्वीकार्यता भी है।

पहले बात करते हैं भाजपा की, जो सीट-दर-सीट अपनी ख़ामियों और मज़बूती का आँकड़ों और जातीय समीकरणों के आधार पर आँकलन कर रही है। उसने ऐसी 160 लोकसभा सीटों को पाया है, जहाँ वह समझती है कि यदि रणनीति में फेरबदल नहीं करती, तो हार भी सकती है। इस लिहाज़ से देखा जाए, तो उसे देश भर की उन आधी से ज़्यादा सीटों, जिन पर वह लड़ती है; पर मेहनत की दरकार है। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री मोदी जैसा ब्रांड नाम और अमित शाह और जे.पी. नड्डा जैसे मझे रणनीतिकार पास होते हुए भाजपा को उम्मीद है कि वह इस संख्या को काफ़ी कम कर लेगी।

दक्षिण अभी भी भाजपा की कमज़ोर नस बना हुआ है। भाजपा की चिह्नित की इन 160 सीटों में अधिकतर दक्षिण क्षेत्र की हैं, जहाँ भाजपा की उपस्थिति नाममात्र की ही है। जैसे तमिलनाडु की 36, आंध्र प्रदेश की 25, केरल की 20, तेलंगाना की 12 सीटें शामिल हैं। यही नहीं महाराष्ट्र, जहाँ भाजपा शिंदे वाली शिवसेना के साथ सत्ता में है, वहाँ की भी काफ़ी सीटों को उसने चुनौतीपूर्ण माना है।

पश्चिम बंगाल, जहाँ ममता बनर्जी मज़बूती से पाँच जमाये हुए हैं; की 23 सीटों पर भाजपा को लगता है कि जीतने के लिए उसे मेहनत करने की ज़रूरत है। और नीतीश कुमार से गठबंधन टूटने के बाद विपक्ष में बैठी भाजपा बिहार में 22 सीटों को कमज़ोर मानती है। पिछला चुनाव वहाँ उसने जिन नीतीश कुमार के साथ चुनाव लड़ा था, अब वो तेजस्वी यादव की राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन में हैं। अन्य बड़े राज्य, जहाँ भाजपा की लिस्ट में कमज़ोर शब्द लिखा है, वह उत्तर प्रदेश की 12 और इतनी ही ओडिशा की लोकसभा सीटें हैं।

यदि राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा का असर रहता है, तो दक्षिण में भाजपा के लिए अगले चुनाव में कठिनाई पैदा हो सकती है। कर्नाटक में भाजपा ख़ुद को सिर्फ पाँच ही सीटों पर कमज़ोर मानती है; लेकिन वहाँ कांग्रेस बेहतर कर सकती है। कर्नाटक में अगले साल विधानसभा का चुनाव है और वहाँ भाजपा को अपनी सरकार को दोहराना होगा, अन्यथा संकट की स्थिति बन सकती है।

राहुल की यात्रा के बाद कर्नाटक में कांग्रेस का काडर सक्रिय होता दिख रहा है, जिसकी कांग्रेस को बहुत ज़रूरत थी। यदि वह विधानसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करती है, तो भाजपा को लोकसभा चुनाव के लिए कहीं ज़्यादा मेहनत करनी पड़ेगी। कांग्रेस का मक़सद साफ़ है, वह 2024 के लिए तैयारी कर रही है। राहुल की यात्रा के बाद पार्टी राज्य बार भारत जोड़ो यात्रा निकलने की योजना बना चुकी है, जिससे उसे अपने कार्यकर्ता को ज़मीन पर सक्रिय करने में बहुत मदद मिलेगी। राज्य में देवेगौड़ा की जेडीएस भी है, जिसका काफ़ी इलाक़ों में आधार है।

2019 बनाम 2024

भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर भारत में ही ज़्यादातर सीटें जीती थीं। कुछ राज्यों में तो सभी की सभी। लिहाज़ा यदि वह यह प्रदर्शन नहीं दोहरा पाती है, तो इसकी भरपाई वह कहाँ से करेगी, इस पर वह मंथन कर रही है। हालाँकि यह इतना आसान नहीं होगा। दक्षिण उसके लिए विकल्प था; लेकिन अब वहाँ उसकी राह आसान नहीं दिखती। उसे उत्तर भारत में अपना पिछले प्रदर्शन पूरी तरह दोहराना होगा। भाजपा ने पिछले चुनाव में 303 सीटें जीतीं थीं, जो लोकसभा की कुल सीटों में बहुमत से 31 ही ज़्यादा है। सीटों का थोड़ा-बहुत अनुपात दाएँ-बाएँ होने से ही उसके लिए संकट बन सकता है।

कर्नाटक में मई, 2023 में विधानसभा चुनाव हैं। साल 2019 के चुनाव में भाजपा ने 28 सीटों में 25 जीत ली थीं। वर्तमान में 224 विधानसभा सीटों में भाजपा के पास 104 सीटें हैं। कर्नाटक भाजपा के लिए इस बार चुनौतीपूर्ण रह सकता है। साल के आख़िर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव हैं। दो जगह कांग्रेस सत्ता में है। निश्चित ही भाजपा को इन राज्यों में कांग्रेस की सीधे चुनौती होगी, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उसने राजस्थान (25) और मध्य प्रदेश (29) की सभी सीटें जीत ली थीं। छत्तीसगढ़ में 11 में से नौ उसके पास हैं। मध्य प्रदेश में भी भाजपा को सन् 2019 वाला प्रदर्शन दोहराने में कठिनाई हो सकती है।

दक्षिण में दिसंबर, 2023 में तेलंगाना के चुनाव हैं। वहाँ भाजपा के पास महज़ एक विधानसभा, जबकि 4 लोकसभा सीटें हैं। भाजपा के लिए वहाँ कठिन चुनौती है। केसीआर सरकार को सत्ता से बाहर करना कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए मुश्किल है। हालाँकि भाजपा को लगता है कि वह ऐसा कर सकती है। विधानसभा चुनाव जीत गये, तो केसीआर लोकसभा के चुनाव में भी इस बार ज़्यादा ज़ोर लगाएँगे। वह राष्ट्रीय राजनीति को लेकर अपनी महत्त्वाकांक्षा जगज़ाहिर कर चुके हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए ममता बनर्जी एक मुश्किल चुनौती हैं। सन् 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता यह साबित कर चुकी हैं। सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा 42 में 18 सीट जीत गयी थीं। उस समय प्रधानमंत्री मोदी का जादू शिखर पर था। सन् 2024 में स्थिति क्या होगी, अभी कहना कठिन है। बिहार में भाजपा ने पिछली बार 40 में 17 विधानसभा सीटें जीतीं थीं; लेकिन तब उसके साथ नीतीश कुमार थे। अब उसे कमोवेश अकेले लडऩा होगा।

इसके अलावा हरियाणा में भाजपा सभी 10 सीटों पर जीती थी। गुजरात में सभी 26 और असम की 14 में से 9 सीटें भाजपा जीती थी। उत्तराखण्ड में भी सभी पाँच सीटें उसने ही जीती थीं। ज़ाहिर है 2019 का प्रदर्शन दोहराना भाजपा के लिए मशक्कत का काम होगा। महाराष्ट्र, पंजाब, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखण्ड में भाजपा के लिए चुनौती। पंजाब में तो उसका कोई नामलेवा ही नहीं दिखता, बेशक उसने पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को अपने साथ मिला लिया है, जो ख़ुद 2022 का विधानसभा चुनाव हार गये थे।

महाराष्ट्र में भाजपा के पास 48 में 23 सीटें हैं और वह शिंदे की शिव सेना के साथ सत्ता में है। लेकिन दिसंबर 2022 में हुए पंचायत चुनाव के नतीजों से लगता है कि उद्धव-कांग्रेस-एनसीपी का महाविकास अघाड़ी गठबंधन अभी भी काफ़ी मज़बूत है। राज्य में भाजपा को इससे कड़ी चुनौती मिलेगी। पंजाब विधानसभा में भाजपा के पास 13 लोकसभा सीटों में से महज़ दो हैं, जबकि उसने लोकसभा के मद्देनज़र अब पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ को पार्टी में शामिल किया है।

केरल में भाजपा ख़ाली हाथ है। हालाँकि उसे पिछले चुनाव में 12.9 फ़ीसदी वोट मिले थे, जिसे अब वह बढ़ाना चाहेगी। इसी तरह तमिलनाडु में भी पार्टी शून्य है और वोट शेयर भी महज़ 3.9 फ़ीसदी मिले थे। तबसे अब तक भाजपा वहाँ कोई उलटफेर नहीं कर पायी है। लिहाज़ा भाजपा के लिए यह 39 सीटें कठिन रास्ता है। आंध्र प्रदेश तीसरा राज्य है जहाँ भाजपा 25 में से एक भी लोकसभा सीट नहीं जीती थी। हाँ, ओडिशा में भाजपा अपने लिए सम्भावनाएँ देखती है, जहाँ कांग्रेस की निष्क्रियता के कारण पार्टी के पास 21 में 8 लोकसभा सदस्य हैं। भाजपा लोकसभा चुनाव में मिले अपने 38.4 फ़ीसदी वोट को 45 फ़ीसदी करना चाहती है। झारखण्ड में भाजपा 14 में से 11 पर क़ाबिज़ है। अब वहाँ हेमंत सोरेन सरकार है। लिहाज़ा भाजपा को मेहनत करनी होगी। गोवा की दो में एक सीट भाजपा के पास है।

अन्य राज्यों में से सबसे बड़ा उत्तर प्रदेश है जहाँ भाजपा की असली ताक़त है। कुल 80 में से 62 सीटें उसने जीती थीं। वहाँ मायावती की बसपा अब ढीली पड़ चुकी है; लेकिन पिता को खोने के बाद अखिलेश यादव नये तेवर के साथ मैदान में हैं। विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस भी वहाँ कुछ सक्रिय हुई है। ख़बर है कि 2024 का लोकसभा चुनाव राहुल गाँधी दोबारा अमेठी से लड़ सकते हैं।

साल 2023 में भाजपा को 9 राज्यों के विधानसभा चुनाव झेलने हैं। इन राज्यों में लोकसभा की 116 सीटें हैं, जिनमें से 2019 में भाजपा ने 92 पर जीत दर्ज की थी। इन्हें 100 से पार ले जाना या बचाकर रखना भाजपा को आसान नहीं होगा।

उत्तर पूर्व की बात करें, तो त्रिपुरा और असम में भाजपा बेहतर दिखती है। त्रिपुरा में वह सरकार में है और दोनों लोकसभा सीट उसके पास हैं। मिजोरम में उसके पास कोई सीट नहीं। नागालैंड में भी भाजपा ढीली दिखती है। हालाँकि उसके पास 60 में से 12 विधानसभा सीटें हैं।

कांग्रेस की तैयारी

कांग्रेस देश की सबसे अनोखी पार्टी है। उसकी रणनीति और योजनाएँ किसी की समझा में नहीं आतीं। फिर भी वह देश की भाजपा के पास दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, पूरे देश में उसकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी और उसके लिए सबसे बड़ा ख़तरा भी। भले पिछले दो लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा है; लेकिन इसके बावजूद भाजपा यदि किसी पार्टी से भय खाती है, तो वह कांग्रेस ही है; जिसके पास 2019 के लोकसभा चुनाव में अब तक का सबसे ख़राब प्रदर्शन करने के बावजूद 11.50 से ज़्यादा का वोट बैंक था, जो भाजपा को मिले मतों से क़रीब 10.50 करोड़ कम था।

कांग्रेस के हाल में अपनी रणनीति में बदलाव किया है। जहाँ उसके पूर्व अध्यक्ष भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिये 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए लगातार दो बार हार से त्रस्त कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटे हैं, वहीं प्रियंका गाँधी विधानसभा चुनाव में प्रचार का बड़ा चेहरा बन रही हैं। ज़मीनी स्तर पर देखें तो हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में प्रियंका ने जैसी भूमिका निभायी, उसने कांग्रेस के बड़े नेताओं को प्रभावित किया है। प्रधानमंत्री मोदी को भाजपा का मुख्य चेहरा बनाने किए बावजूद हिमाचल में भाजपा को करारी मात मिली है और वह 44 सीटों से 25 पर सिमट गयी। पिछली बार से उसे क़रीब आठ फ़ीसदी वोट कम मिले हैं। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से भाजपा चिन्तित है?

हिमाचल में हाल में सत्ता में आई कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने ‘तहलका’ से बातचीत में इसे लेकर कहा- ‘दक्षिण भारत में भाजपा फिसड्डी है। उसे पता है वहाँ कांग्रेस के सामने उसकी नहीं चलेगी। लेकिन जैसी भीड़ उत्तर भारत में भी राहुल गाँधी के समर्थन में उतरी है, उससे भाजपा की नींद हराम है। उसने कोरोना के बहाने राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा रोकने की चाल चली है।’

मल्लिकार्जुन खडग़े के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी को सक्रिय किया जा रहा है। पार्टी में अनुशासन को भी महत्त्व देने पर ज़ोर दिया जा रहा है और जल्दी ही पार्टी हाल के सालों में कांग्रेस से बाहर गये कुछ प्रभावशाली नेताओं को संगठन में वापस लाने की क़वायद करने वाली है। लोकसभा का 2024 का चुनाव पार्टी राहुल गाँधी के ही नेतृत्व में लड़ेगी, यह लगभग साफ़ है। हालाँकि पार्टी प्रधानमंत्री पद के चेहरे के रूप में शायद अपने पत्ते नतीजों के बाद खोलेगी। पार्टी को उम्मीद है कि अगले लोकसभा चुनाव में उसकी सीटों की संख्या में इतनी बढ़ोतरी होगी कि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में होगी।

पार्टी दक्षिण पर फोकस कर रही है और साथ ही उत्तर भारत में अपने खोये जनाधार को वापस जीतने की भी कोशिश में है। इन राज्यों में उसका आधार तो है ही। कई जगह तो उसकी भाजपा से सीधी टक्कर है। कांग्रेस का फोकस अब अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार फिर बनाने, मध्य प्रदेश और दक्षिण राज्य कर्नाटक में भाजपा को हारने पर है। कांग्रेस महसूस करती है कि 2024 से पहले वह कम से कम 5-6 राज्यों में सत्ता में आ जाती है तो 2024 उसकी स्थिति कहीं बेहतर रह सकती है।

कांग्रेस की कोशिश दक्षिण में ख़ुद को मज़बूत करने और उत्तर भारत में भाजपा को अगले लोकसभा चुनाव में 2019 जैसा प्रदर्शन दोहराने से रोकने की है। कांग्रेस जल्दी ही राज्यों में भी भारत जोड़ो यात्रा शुरू करने की योजना बना रही है, जिसे स्थानीय क्षत्रप निकालेंगे। देशव्यापी भारत जोड़ो यात्रा में मिल रहे समर्थन से कांग्रेस काफ़ी उत्साहित दिख रही है और उसे उम्मीद है कि वह अपना खोया जनाधार पाने की स्थिति में पहुँच सकती है। अगले छ: महीने में कांग्रेस राज्यों में अपना संगठन मज़बूत करना चाहती है, ताकि पार्टी काडर सक्रिय होकर 2024 का लोकसभा चुनाव जीतने के इरादे से मैदान में उतरे और भाजपा को कड़ी टक्कर दे।

कांग्रेस के राज्य सभा सदस्य आनन्द शर्मा ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा- ‘आपने देखा हिमाचल में भाजपा को कांग्रेस से सीधी टक्कर में हार मिली। बेशक वहाँ भाजपा ने प्रधानमंत्री साहब को चेहरा बनाया था। हिमाचल में 95 फ़ीसदी आबादी हिन्दू हैं और उन्होंने कांग्रेस को वोट दिया है लिहाज़ा भाजपा का हिन्दू वोटों का दावा खोखला है। पार्टी 2024 में पूरी ताक़त से भाजपा को हारने की मंशा से मैदान में उतरेगी और जनता के समर्थन से हमें सफलता मिलेगी।’

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ 10 जनपथ की हाल में जो बैठक हुई है, उसमें कुछ दिलचस्प बातें सुनने में आयी हैं। इनमें सबसे बड़ी यही है कि क्या नीतीश कुमार कांग्रेस में जा सकते हैं? यदि वह जाते हैं, तो यह बड़ी राजनीतिक घटना होगी। भले भाजपा नेता राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा का मज़ाक़ उड़ाते हों, सच यह है कि इससे भाजपा में बेचैनी है। यात्रा में जनता से मिल रहे समर्थन से भाजपा को हैरानी हुई है।

लिहाज़ा उसे दक्षिण राज्यों ही नहीं उत्तर भारत में अपनी रणनीति बदलने को मजबूर होना पड़ रहा है। नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने स्वीकार किया जनता के बीच जाने से राहुल गाँधी की छवि में बदलाव आया है और जनता उन्हें ज़्यादा गम्भीरता से लेने लगी है।

कांग्रेस के एआईसीसी के सचिव और विधायक राजेश धर्माणी ने कहा- ‘मुझे भी यात्रा में शामिल होने का अवसर मिला है। मैंने देखा कि जनता राहुल जी को सुनने और उनसे मिलने के लिए आतुर है। राहुल जो मुद्दे उठा रहे हैं, वही जनता के वास्तविक मुद्दे हैं। राहुल गाँधी के लगातार यात्रा में चलने और उनका स्टैमिना देख भाजपा परेशान है। निश्चित की इस यात्रा ने कांग्रेस में एक बड़ा बदलाव लाया है साथ ही जनता की सोच में भी।’

यात्रा के उत्तर भारत में आने के बाद से ही भाजपा के नेता अलग-अलग बयान देकर इसे हल्का साबित करने की कोशिश करते रहे हैं। मध्य प्रदेश में ऐसा देखने को मिला था, जहाँ अगले साल चुनाव हैं और भाजपा को लगता है कि कांग्रेस से उसे कड़ी चुनौती मिल सकती है। वहाँ भाजपा के युवा नेताओं ने झंडे दिखाकर नारेबाजी की थी।

कांग्रेस के राज्य सभा सदस्य रणदीप सुरजेवाला कहते हैं- ‘भाजपा जब भी यात्रा में व्यवधान डालने की कोशिश करती हैं, हमें बिलकुल बुरा नहीं लगता। हम समझ जाते हैं कि भाजपा नेता यह सब यात्रा की सफलता से परेशानी महसूस करने के कारण कर रहे हैं। राहुल गाँधी तो भाजपा के झंडे उठाये नेताओं तक को यात्रा में शामिल होने का न्योता देते हैं। इस यात्रा ने साबित किया है कि राहुल गाँधी देश भर में कितने लोकप्रिय और स्वीकार्य नेता हैं और जनता उन्हें बड़ी भूमिका में देखना चाहती है, क्योंकि वह महसूस करती है कि इस नेता को देश की चिन्ता है।’

यात्रा में जिस तरह राजनीति से हटकर तमाम वर्गों के लोग शामिल हुए हैं, उससे यात्रा की स्वीकार्यता और गम्भीरता बढ़ी है। कश्मीर तक जाने के राहुल गाँधी के इरादे ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भरा है और वे पहले से कहीं ज़्यादा सक्रिय दिखने लगे हैं। कांग्रेस का मक़सद ही यही था। उसका लक्ष्य 2024 है और तब तक प्रदेश स्तर की यात्राएँ भी अपना प्रभाव डालेंगी। क्योंकि राहुल गाँधी जहाँ मुद्दों को उठा रहे हैं, वहीं मोदी सरकार पर नाकामी का आरोप लगाकर उसपर प्रहार भी कर रहे हैं।

कांग्रेस के सम्भावित मुद्दे

कांग्रेस नेता राहुल गाँधी लगातार बेरोज़गारी, महँगाई, अर्थ-व्यवस्था, चीन के साथ तनाव, किसान और देश की एकता के मुद्दे पर डटे हुए हैं। उनकी भारत जोड़ो यात्रा में उनके भाषणों से साफ़ हो जाता है कि पार्टी जनता के इन मुद्दों पर क़ायम रहते हुए ही अगले चुनाव में भाजपा से भिड़ेगी। तमाम कठिनाइयों के बावजूद कांग्रेस यूपीए के अपने सहयोगियों को अपने साथ बनाये रखने में प्रयासरत रही है। जहाँ तक ममता बनर्जी की बात है, वह भी भाजपा की मुखर विरोधी दिखती हैं। हालाँकि हाल के महीनों में मोदी सरकार ने उनके मंत्रियों के ख़िलाफ़ ईडी/सीबीआई के ज़रिये दबाव बनाने की रणनीति पर काम किया है। तेलंगाना के नेता केसीआर राष्ट्रीय राजनीति के प्रति दिलचस्पी दिखा चुके हैं; लेकिन अभी इसके लिए कोई तीसरा गठबंधन सामने नहीं दिखा रहा। यही स्थिति अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की है, जो भाजपा और कांग्रेस के बीच वाली लाइन पर चलकर हिन्दूवादी व विकास, दोनों का चेहरा बनना चाहती है।

तीसरा मोर्चा

भले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि देश में तीसरा मोर्चा नाम की कोई चीज़ नहीं। ऐसे अनेक दल हैं, जो ग़ैर-भाजपा या ग़ैर-कांग्रेस ख़ेमे में आते हैं। इनकी विचारधारा भले कांग्रेस से बहुत ज़्यादा भिन्न न हो, यह कांग्रेस के साथ जाने में गुरेज़ करते हैं और भाजपा के भी विरोधी हैं या अभी तक अपना कोई मत नहीं बना पाये हैं। इनमें सबसे मज़बूत दल ममता बनर्जी की टीएमसी है, जिसकी पश्चिम बंगाल में सरकार है और काफ़ी लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य भी हैं। दूसरी अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी है, जिसकी दो राज्यों में सरकार है और उसके पास राज्य सभा सदस्य भी हैं, भले लोकसभा में कोई सदस्य नहीं।

इनके अलावा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव भी दिल्ली पर नज़र रखे हुए हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के नाम को हाल में राष्ट्रीय स्वरूप दिया है और इसे टीआरएस से भारत राष्ट्र समिति में बदल दिया है। कभी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शुमार रहे केसीआर के नेतृत्व में ही तेलंगाना मूवमेंट चली थी, जिसका मक़सद राज्य का दर्जा हासिल करना था। हालाँकि राज्य का दर्जा मिलते ही केसीआर कांग्रेस के अलग हो गये। वह केंद्र में मंत्री रहे हैं और यदाकदा विपक्षी दलों को एकजुट करने की क़वायद करते दिखते हैं। आने वाले महीनों में नीतीश कुमार और जेडीयू का रोल भी काफ़ी अहम होगा और देखना है कि वे क्या रुख़ अपनाते हैं। ममता बनर्जी ने हाल के तीन चार महीनों में बहुत ज़्यादा सक्रियता नहीं दिखायी है। हालाँकि विपक्ष के कई दल उनकी तरफ़ उम्मीद भरी निगाह रखते हैं। इसका कारण है ममता बनर्जी की देशव्यापी छवि। शायद ही देश का कोई कोना हो, जहाँ ममता बनर्जी को लोग न जानते हों। लेकिन इसके बावजूद ममता के लिए बंगाल को छोडऩा आसान नहीं होगा, क्योंकि भाजपा वहाँ लगातार अपनी ज़मीन मज़बूत करने की कोशिश करती रही है।

ममता कितनी ताक़तवर नेता हैं यह पिछले विधानसभा चुनाव से ज़ाहिर हो जाता है, जब भाजपा के सभी दिग्गजों के वहाँ जम जाने के बावजूद टीएमसी ने न सिर्फ़ चुनाव जीत लिया था, बल्कि उसकी सीटें पहले से भी ज़्यादा हो गयी थीं। इसमें दो-राय नहीं कि भाजपा ने वहाँ अपना वोट बैंक खड़ा कर लिया है। कांग्रेस और वामपंथी दल कमज़ोर हुए हैं और उन्हें दोबारा खड़ा करने के लिए ख़ासी मशक्कत करनी पड़ेगी। ऐसे में ममता दिल्ली आना चाहेंगी या नहीं यह अभी कहना मुश्किल है।

अन्य क्षेत्रीय दल अपने राज्यों तक सीमित हैं। इनमें सबसे मज़बूत डीएमके है, जिसके लोकसभा में काफ़ी सदस्य हैं। हालाँकि उसका समर्थन कांग्रेस को रहा है और राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार होने का भी वह समर्थन करती है। चन्द्रबाबू नायडू भी हाल के महीनों तक सक्रिय थे लेकिन अब शान्त हैं। उनकी भी राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षा रही हैं। एनसीपी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए का हिस्सा है और शरद पवार प्रधानमंत्री की इच्छा होने से इनकार कर चुके हैं। उन्हें भी राहुल गाँधी के नाम पर विरोध शायद ही होगा। विपक्ष के इन दलों की सक्रियता शायद 2023 के मध्य तक दिखेगी, जब देश में काफ़ी विधानसभा चुनाव होने हैं और अगले लोकसभा चुनाव का भी माहौल बनने लगेगा।

भाजपा के सम्भावित मुद्दे

राम मंदिर निर्माण और सरहदी राज्य जम्मू-कश्मीर में धारा-370 ख़त्म करने के बाद भाजपा अब समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण क़ानून पर फोकस कर रही है और यही 2024 में उसके सबसे बड़े मुद्दे होने की सम्भावना है। भाजपा के एक शीर्ष वर्ग में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में कार्रवाई कर उसे पाकिस्तान से अलग करने की भी चर्चा है। हालाँकि यह शायद इतना आसान काम न हो। भाजपा महसूस करती है कि जनवरी, 2019 में पुलवामा घटना के बाद जिस तरह जनता उसके समर्थन में एकजुट हुई, उसे देखते हुए पीओके के फैसले को अमलीजामा पहनकर जीत सुनिश्चित की जा सकती है।

2019 में दो करोड़ से ज़्यादा वोट

कुल 61,41,72823 वोट पड़े

भाजपा 22,90,76879 (37.36 फ़ीसदी)

कांग्रेस 11,94,95214 (19.49 फ़ीसदी)

टीएमसी      2,49,29330 (4.06 फ़ीसदी)

बसपा  2,22,46501 (3.62 फ़ीसदी)

आप   27,16629 (0.44 फ़ीसदी)