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प्रदूषित क्यों होते जा रहे हमारे शहर?

भारत दुनिया का आठवाँ सर्वाधिक प्रदूषित देश बन चुका है। दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रदूषित 50 शहरों में से 39 शहर भारत के हैं। रैंकिंग स्विस फर्म की वल्र्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट में ख़ुलासा हुआ है कि देश की हवा में पीएम2.5 लेवल 53.3 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक गिर गया है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से 10 गुना भी ज़्यादा है। यह 2022 की रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें 131 देशों के 7,300 से ज़्यादा शहरों के 30,000 से ज़्यादा ग्राउंड बेसड सरकारी, ग़ैर-सरकारी मॉनिटरों से प्रदूषण जाँच के आँकड़े जुटाये गये थे। 2021 में भारत प्रदूषण के मामले में दुनिया में पाँचवें पायदान पर था। पीएम2.5 अति प्रदूषण वाली स्थिति है। वल्र्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट के अनुसार, टॉप 100 प्रदूषित शहरों में भी भारत के शहर बहुत ज़्यादा हैं।

देश की राजधानी दिल्ली दुनिया की दूसरी सबसे ज़्यादा प्रदूषित राजधानी रही है। दिल्ली के पड़ोसी शहर गुडग़ाँव, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद और फ़रीदाबाद में प्रदूषण स्तर में गिरावट आयी है। हालाँकि दिल्ली में आठ फ़ीसदी की गिरावट की गयी है। और  पिछली बार के नंबर एक से दूसरे नंबर पर है। लेकिन दुनिया 50 शहरों में सबसे ज़्यादा भारतीय शहर हैं, जो कि चिन्ता का विषय है। सवाल यह है कि भारत के शहरों में प्रदूषण लगातार बढ़ क्यों रहा है? भारत में दिल्ली के अलावा राजस्थान का भिवाड़ी सबसे प्रदूषित शहर है। वहीं दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर चाड की राजधानी नदजामेना है। भारत में सबसे तेज़ी से प्रदूषण में गिरावट ताजनगरी आगरा में दर्ज की गयी है।

हालाँकि दुनिया में सबसे प्रदूषित शहर पाकिस्तान का लाहौर है। दूसरा सबसे प्रदूषित शहर चीन का होटन, तीसरा भारत का भिवाड़ी है। ज़ाहिर है बढ़ते वाहनों, तरल ईंधन के उपयोग, कंस्ट्रक्शन, कार्बन, बढ़ती आबादी, घटता वन क्षेत्र और बढ़ती गंदगी इसके मुख्य कारण हैं। अगर अभी से प्रदूषण को कम करने की कोशिश नहीं की गयी, तो भारत के घनी आबादी वाले बड़े शहर आने वाले 40 वर्षों में रहने लायक नहीं बचेंगे। पिछले साल दुनिया में पीएम2.5 की वजह से हर साल 20 लाख से ज़्यादा असामयिक मौतें हुई हैं।

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने प्रदूषण को नियंत्रण में लाने के लिए हाल ही में दिल्ली और एनसीआर में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी। एनजीटी ने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान को प्रदूषण से निपटने के लिए साथ आने को कहा है। आख़िर देश में कब तक किसानों को पराली जलाकर प्रदूषण फैलाने की राजनीति होती रहेगी? क्यों न सरकारें अपने स्तर पर प्रदूषण से निपटने के बारे में सोचती हैं? दिल्ली सरकार सडक़ों पर पानी छिडक़कर प्रदूषण कम करने की जो कोशिश कर रही है, उससे प्रदूषण की समस्या कुछ देर के लिए कम तो हो सकती है; लेकिन हमेशा के लिए हल नहीं होने वाली। इसके लिए सभी तरह के प्रदूषणों से निपटने के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करना होगा। वाहनों की संख्या घटानी होगी। लोगों से सार्वजनिक वाहनों में चलने की अपील करनी होगी। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी वाहनों का सही विकल्प इलेक्ट्रिक वाहन हैं, उनका इस्तेमाल बढ़ाना होगा। धूम्रपान और धुआँ पैदा करने वाले अन्य संसाधनों पर रोक लगानी होगी। लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करना होगा।

पिछले 30 वर्षों में जिस तेज़ी से भारत में वन क्षेत्र कम हुए हैं और शहरों का क्षेत्रफल बढ़ा है, उसने प्रदूषण तेज़ी से बढ़ाया है। यह डिजिटलाइजेशन का दौर है, इस दौर में जब हर काम करने के लिए इलेक्ट्रानिक उपकरण हैं, इलैक्ट्रिक वाहन भी बन चुके हैं, प्रदूषण को आसानी से कम किया जा सकता है। लेकिन कुछ पूँजीपतियों के स्वार्थ के चलते यह सम्भव नहीं हो पा रहा है, जिसके पीछे सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव भी बड़ा कारण है। पर पूँजीपतियों के मुनाफ़ा कमाने के लालच को सरकारें इसी तरह समर्थन देती रहीं, तो इसके घातक परिणाम सभी को झेलने होंगे।

न्यायपालिका को बख़्श दीजिए हुजूर!

शिवेंद्र राणा

राजनीतिक चिंतक लास्की के अनुसार, ‘एक राज्य की न्यायपालिका, अधिकारियों के ऐसे समूह के रूप में परिभाषित की जा सकती है, जिनका कार्य राज्य के किसी क़ानून विशेष के उल्लंघन या तोडऩे सम्बन्धी शिकायत, जो विभिन्न लोगों के बीच या नागरिकों व राज्य के बीच एक दूसरे के विरुद्ध होती है; का समाधान वह फ़ैसला करना है।’

संवैधानिक नियमों के व्याख्याकार एवं न्याय के अधिष्ठाता होने के कारण न्यायपालिका का देश में न्यायपालिका और सेना दो ऐसी संस्थाएँ है; जिनके प्रति आम भारतीयों के मन में अगाध श्रद्धा है। आज भी देश का आम नागरिक किसी सरकार के बजाय भारतीय सेना के भरोसे ही राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति आश्वस्त होता है। उसी प्रकार जब दमन-शोषण से पीडि़त आम आदमी का यह विश्वास होता है कि न्यायपालिका उसे न्याय देगी और उसके अधिकारों की रक्षा करेगी।

उच्चतम न्यायालय का ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ है। न्याय-धर्म का यह मंदिर पिछले कुछ समय से नकारात्मक कारणों से चर्चा में है। कारण है- न्यायपालिका का राजनीतिकरण। वर्तमान सत्तारूढ़ दल का नौकरशाही प्रेम बढ़ते हुए अब न्यायपालिका तक प्रसारित होने लगा है। न्यायाधीश ए.के. गोयल, न्यायाधीश आर.के. अग्रवाल, न्यायाधीश पी. सदाशिवम, न्‍यायाधीश रंजन गोगोई जैसे इसके कई उदाहरण हैं। सरकार यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि उसकी कृपादृष्टि नौकरशाही की भाँति न्यायपालिका को भी दूषित और पथभ्रष्ट करेगी। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायधीश दीपक गुप्ता ने पिछले दिनों ठीक ही कहा था कि न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद कोई लाभ नहीं दिया जाना चाहिए; क्योंकि यह जारी रहा, तो न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लिखते हैं- ‘जो आदमी राजनीति में सही ढंग से सोचता है, उसकी प्राथमिकताएँ नहीं बदलतीं।’

सन् 2014 में देश के बदलाव के नाम पर आयी हुई सरकार की प्राथमिकताएँ देश का बदलाव था, न कि न्यायपालिका में अनाधिकृत हस्तक्षेप की ग़लत परम्परा का निर्वहन। लेकिन ऐसा हुआ है। न्यायपालिका के राजनीतिकरण का विशेष मामला लक्ष्मणा चंद्रा विक्टोरिया ग़ौरी का है, जिनकी नियुक्ति फरवरी, 2023 में मद्रास उच्च न्यायालय में बतौर न्यायमूर्ति हुई। मद्रास उच्च न्यायालय में वकील रहीं विक्टोरिया ग़ौरी का नाम कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित करने के बाद से ही ख़ासा विवाद हुआ। इस विवाद से जुड़ी दो कारण थे; पहला- ग़ौरी का सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़ाव, और दूसरा- घृणापूर्ण भाषण (हेट स्पीच) का मामला। हालाँकि एल. ग़ौरी को अतिरिक्त न्यायाधीश बनाये जाने के ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका पीठ ने ख़ारिज़ कर दी। वैसे भी किसी राजनीतिक दल से सम्बन्ध न्यायधीश के रूप में नियुक्ति हेतु अयोग्यता नहीं माना जाता, परन्तु तब भी ग़ौरी के सार्वजनिक द्वेषपूर्ण वक्तव्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए थी। मूल प्रश्न है कि ऐसे विवादों को समझने में सरकार और कॉलेजियम से भूल हुई या यह प्रायोजित नियुक्ति थी? दोनों ही मामलों में न्यायपालिका के सम्मान पर प्रश्नचिह्न लगा।

इसी प्रकार 2014 में उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशिवम सेवानिवृत्ति के तुरन्त बाद केरल के राज्यपाल बनाये गये थे। पुन: मुख्य न्यायाधीश तरुण गोगोई सेवानिवृत्ति के तुरन्त बाद 2020 में राज्यसभा के लिए नामित किये गये, जिसके बाद विवाद प्रारम्भ हो गया। वैसे क़ानूनन उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को राज्यसभा भेजने में कोई भी संवैधानिक दिक़्क़त नहीं है। अनुच्छेद-80 के तहत राज्यसभा की सदस्यता के लिए नामित किये जाने वालों में कला, साहित्य, विज्ञान आदि के साथ विधि विशेषज्ञ भी शामिल हैं। हालाँकि सामान्य तौर पर महत्त्वपूर्ण पदों से सेवानिवृत्त हुए लोगों की अन्य नियुक्तियों के लिए दो साल तक प्रतिबंध रहता है। इस लिहाज़ से देखें, तो गोगोई को नामित करने में नि:संदेह जल्‍दबाज़ी की गयी है।

वैसे भी नौकरशाही की तरह ही भ्रष्टाचार का रोग न्यायपालिका को भी अपनी गिरफ़्त में ले चुका है। अभी सीबीआई ने जुलाई, 2020 में सेवानिवृत्त हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस.एन. शुक्ला के विरुद्ध आय से अधिक सम्पत्ति का केस दर्ज किया है। किसी पूर्व न्यायाधीश के ख़िलाफ़ दर्ज भ्रष्टाचार का यह दूसरा मामला है। इससे पहले जाँच एजेंसी द्वारा दिसंबर, 2019 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश एस.एन. शुक्ला के साथ आई.एम. कुद्दुसी, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और चार अन्य के ख़िलाफ़ लखनऊ स्थित मेडिकल कॉलेज के पक्ष में पैसे लेकर आदेश प्राप्त करने के आरोप में मुक़दमा दर्ज किया गया।

न्यायपालिका की अधोगति के पाश्र्व में दूसरा गम्भीर मुद्दा कॉलेजियम सिस्टम है। बाक़ी तकनीकी विषय को छोड़ भी दें, तो न्यायधीशों का स्वयं अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के परिपेक्ष्य में परिवारवाद-वंशवाद को प्रश्रय देने का मोह विशुद्ध अनैतिकता है। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के प्रति उच्चतम न्यायालय का रवैया उसका संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग ही कहा जाएगा। यह दुनिया का एकमात्र लोकतंत्र है, जहाँ न्यायाधीश संसद यानी जनप्रतिनिधि शासन के नियमों को अस्वीकृत करने को तत्पर है। इसी कारण उच्चतम न्यायालय पर हाल के कुछ वर्षों में न्यायिक निरंकुशता का आरोप निरंतर लगता रहा है। ऐसे में क्या परिवारवाद के समर्थक न्यायधीशों को सामाजिक-राजनीतिक शुचिता पर बोलने का नैतिक अधिकार है?

न्यायपालिका के राजनीतिकरण के अतीत पर दृष्टिपात करें, तो देखेंगे कि स्वतंत्र भारत में आज़ादी के बाद मात्र अगले दो दशकों में ही न्यायपालिका में दूषित राजनीतिक स्वार्थ का आरोपण शुरू हो गया था। मार्च, 1973 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ। वरिष्ठता क्रम की अनदेखी करते हुए ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। यह शासन सत्ता द्वारा न्यायपालिका को नियंत्रित करने का पहला प्रत्यक्ष प्रयास था। इससे पूर्व कांग्रेस सरकार के तत्कालीन क़ानून मंत्री एच.आर. गोखले ने सम्पत्ति के अधिकार के मसले पर कहा था कि न्यायालय का रवैया सरकार की प्रतिबद्धता की राह में एक बड़ी बात है। ऐसा ही एक बयान इंदिरा गाँधी के क़रीबी पी.एन. हक्सर ने देते हुए न्यायाधीशों को सरकार की नीतियों और दर्शन के प्रति प्रतिबद्ध होने को कहा था। उसी समय मुंबई में एक जन समारोह में न्यायमूर्ति के.एस. हेगडे ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा था कि राजनीतिक व्यवस्था और नेताओं के निजी स्वार्थ ने प्रशासनिक मशीनरी के कार्यों को विकृत कर दिया है।

उस दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने ए.एन. रे की नियुक्ति का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में ‘नियमों से बाहर जाकर की जा रही पदोन्नतियों के द्वारा उच्चतम न्यायालय को सरकार के अधीन किये जाना’ कहा था। जिस पर इंदिरा गाँधी ने इसे हल्का निष्कर्ष निकाला जाना कहकर इस आलोचना को ख़ारिज कर दिया था। संविधान विशेषज्ञ ए.जी. नूरानी ने भी इसे न्यायपालिका के राजनीतिकरण का प्रयास कहते हुए चेतावनी दी थी कि अगर इन चुनौतियों से नहीं निपटा गया, तो लोगों की व्यक्तिगत आज़ादी ख़तरे में पड़ सकती है। वहीं 15 मार्च, 1975 को नई दिल्ली में एक सेमिनार में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. सुब्बाराव ने कहा था- ‘निरंकुश सत्ता हर जगह स्वयं को स्थापित कर लेती है और सार्वजनिक हित के नाम पर स्वयं को सत्ता में बनाये रखती है।’

नूरानी एवं सुब्बाराव सही साबित हुए और देश को इंदिरा गाँधी के आपातकालीन तानाशाही का सामना करना पड़ा। आपातकाल के दौरान भी न्यायपालिका राजनीतिक गतिविधियों से दूषित होती रही। इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर न्यायालयी नियुक्ति में अनाधिकृत हस्तक्षेप किया था। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने तब भारत के न्यायिक इतिहास के विख्यात और प्रेरणादायी एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) मामले में तानाशाह सरकार के विरुद्ध जाकर नागरिक स्वतंत्रता को सुरक्षित करने वाला फ़ैसला दिया था। इससे क्रुद्ध इंदिरा गाँधी ने पुन: नियमों का अतिक्रमण किया तथा न्यायमूर्ति खन्ना पर अधिक्रमण (सुपरसीड) करते हुए कर न्यायमूर्ति एच.एम. बेग को प्रधान न्यायधीश नियुक्त करवाया, जो सरकार समर्थक थे।

ध्यातव्य है कि 1957 में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य के.एस. हेगड़े भी इस्तीफ़ा देकर मैसूर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बने थे। इसके अतिरिक्त कांग्रेस शासन-काल में ही सन् 1970 में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे मोहम्मद हिदायतुल्ला को सन् 1979 में उपराष्ट्रपति बनाया गया। वहीं उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा कांग्रेस के ही टिकट पर सन् 1998 में राज्यसभा सदस्य बने। लेकिन न्यायपालिका में न्यायमूर्ति इस्लाम की सार्वजनिक जीवन यात्रा भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के घालमेल का सबसे भद्दा उदाहरण है।

उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता बहरुल इस्लाम को कांग्रेस ने सन् 1962 तथा सन् 1968 में राज्यसभा भेजा। लेकिन दूसरा कार्यकाल पूरा करने के पूर्व ही उन्हें असम और नगालैंड (अब गुवाहाटी) उच्च न्यायालय का न्यायधीश नियुक्त किया गया। बाद में वह उच्चतम न्यायालय पहुँचे। सन् 1983 में न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्ति के तुरन्त बाद कांग्रेस ने पुन: उन्हें तीसरी बार राज्यसभा भेजा। कहा जाता है कि इस कृपा की मुख्य वजह न्यायमूर्ति इस्लाम का बिहार के कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को विवादस्पद अर्बन को-आपरेटिव बैंक घोटाले में क्लीन चिट देना था। इसी प्रकार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी पर भ्रष्टाचार के पर्याप्त प्रमाणों के पश्चात् मई, 1993 में लाया गया महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया, क्योंकि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने इसमें हिस्सा नहीं लिया।

कांग्रेस द्वारा प्रारम्भ की गयी न्यायपालिका में राजनीति के दूषित आरोपण की अशोभनीय परम्परा को अब भाजपा निभा रही है और कुतर्कों से इसका औचित्य साबित करने पर लगी है। इस देश की राजनीति में एक कुत्सित परम्परा स्थायी हो चुकी है। हर अनैतिक कार्य के समर्थन में पिछली सरकारें भी तो ये कर चुकी हैं; का कुतर्क स्थायी हो चुका है। अगर पिछली सरकारों की गलतियाँ ही जारी रखनी थीं, तो आपकी क्या आवश्यकता थी? पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अपनी आत्मकथा ‘जीवन जैसा जिया’ में लिखते हैं- ‘जनमत लहर की तरह चलता है। एक बार जो राय बन जाती है, वह मज़बूत होती जाती है।’ फ़िलहाल जनमत की राय इस दिशा में बन रही है कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं राजनीतिकरण कर रही है। हो सकता है कि अभी सत्ता को बहुमत की लहर और जन-समर्थन के चलते ऐसे विरोधी तर्क समझ न आते हों; लेकिन देर-सबेर इनका दुष्परिणाम आना तय है। रही बात जनमत के लहर की, तो ऐसी लहर के सामने जब जन-विरोध का कहर टूटता है, तो अर्श और फ़र्श के बीच का अन्तर बिलकुल स्पष्ट समझ आने लगता है।

ऐसे जन-कोप ने इंदिरा गाँधी के अहंकार को ज़मीन दिखायी थी। राजीव गाँधी भी अपनी कुर्सी गँवा बैठे। ऐसे ही फीलगुड शाइनिंग इंडिया के नारों के विरुद्ध जनमत लहर ने अटल सरकार की सत्ता में वापसी की सारी संभावनाएँ ध्वस्त कर दी थीं। इसलिए ऐसे जनमत क्रोध को नज़रअंदाज़ करना कम-से-कम राजनीतिक जीवन के लिए तो ख़तरनाक साबित हो सकता है। सरकार को समझना होगा कि न्यायपालिका में व्याप्त संदूषण न्याय और न्यायिक प्रक्रिया दोनों को दूषित करेगा। लेकिन जिस राष्ट्र में न्याय प्रक्रिया दूषित होती है, वहाँ शनै:-शनै: अराजकता व्याप्त हो जाती है। इस अप्रिय स्थिति से बचना ही सरकार का ध्येय होना चाहिए।

(लेखक पत्रकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं।)

जीत के बाद भी चुनौती

भाजपा के लिए पूर्वोत्तर से ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होंगे अन्य राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव

क्या तीन पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन इतना जबरदस्त रहा है कि इसे इस साल होने वाले कर्नाटक और अन्य राज्यों में उसकी जीत की गारंटी मान लिया जाए? शायद नहीं। त्रिपुरा, जहाँ उसने अपने दम पर दोबारा सत्ता हासिल की है; वहाँ उसकी सीटें पिछले चुनावों के मुक़ाबले कम हुई हैं। जबकि मेघालय में उसने दो ही सीटें जीतीं और नागालैंड में 12 सीटें। तीनों राज्यों में 60-60 सीटें हैं। लिहाज़ा इसे भाजपा का बहुत प्रभावशाली प्रदर्शन नहीं कहा जा सकता। इन राज्यों के विपरीत राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, कर्नाटक जैसे राज्यों, जहाँ इस साल विधानसभा के चुनाव होने हैं; में भाजपा को मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से कड़ा मुक़ाबला करना होगा। इन चुनावों के साथ हुए छ: उपचुनावों में कांग्रेस ने तीन, जबकि भाजपा ने दो सीटें जीती हैं।

तीन पूर्वोत्तर राज्यों में नतीजों से भले देश के दूसरे राज्यों की राजनीतिक स्थिति का संकेत न मिले; लेकिन भाजपा ने पूर्वोत्तर में अपनी जड़ें जमाने का जो अभियान चलाया है, उसमें वह कुछ हद तक सफल हुई है। भले अपने दम पर उसे सिर्फ़ त्रिपुरा में ही बहुमत मिला हो; लेकिन उसने तीनों सरकारों में अपने सहभागिता सुनुश्चित कर ली है। प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों राज्यों के शपथ ग्रहण में पहुँचकर वहाँ की जनता को यह सन्देश देने की कोशिश की कि केंद्र में उनकी सरकार आपके साथ खड़ी है। उनका मक़सद वहाँ जाकर अपनी पार्टी के प्रति जनता का समर्थन जुटाना भी हो सकता है।

कांग्रेस का पूर्वोत्तर के इन तीन राज्यों में जनाधार और सिकुड़ गया, भले उसकी उपस्थिति हर राज्य में रही। उसे त्रिपुरा में माकपा से गठबंधन करके भी सिर्फ़ तीन सीटें मिलीं और 8.56 वोट शेयर के साथ माकपा से काफ़ी पीछे रही, जिसे 11 सीटों के साथ 24.62 फ़ीसदी वोट मिले। वहाँ भाजपा को 32 सीटों के साथ 38.97 फ़ीसदी वोट मिले। भले यह पिछली बार से कम हैं। वहाँ टिपरा मोथा ने भी अपना दम दिखाया और 13 सीटें जीतने में सफल रही। हालाँकि उसकी उपस्थिति से भाजपा और कांग्रेस दोनों का नुक़सान हुआ।

कांग्रेस को नागालैंड में शर्मनाक स्थिति झेलनी पड़ी, जहाँ उसे कोई भी सीट नहीं मिली और वोट शेयर भी महज़ 3.50 फ़ीसदी के क़रीब रहा। वहाँ भाजपा 12 सीटें जीतने में सफल रही। उसे 18.21 फ़ीसदी वोट मिले। एनडीपीपी 25 सीटें जीतकर 32.22 फ़ीसदी वोट लेने में सफल रही। हालाँकि राज्य में जनता ने काफ़ी बिखरा हुआ जनादेश दिया। क्योंकि वहाँ शरद पवार की एनसीपी भी सात सीटें जीतने में सफल रही और उसे 9.56 फ़ीसदी वोट मिले। वहाँ जद(यू) और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी तक ने सीटें जीत लीं।

बात करें मेघालय की, तो वहाँ कांग्रेस एनपीपी सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस सिर्फ़ पाँच सीटें ही जीत सकी, जबकि उसका वोट शेयर 13.14 फ़ीसदी रहा। भाजपा मेघालय में कमाल नहीं दिखा सकी। हालाँकि वह 9.33 फ़ीसदी वोट शेयर लेने में सफल रही और उसे दो ही सीटें मिलीं। मेघालय में ममता बनर्जी की टीएमसी ने ज़रूर कमाल दिखाया, जिसे वहाँ पहली बार पाँच सीटें मिलीं। भाजपा ने चतुराई दिखाते हुए नतीजों के तुरन्त बाद एनपीपी से बात कर ली और सरकार में शामिल हो गयी।

इस तरह देखें, तो तीन राज्यों में 180 में भाजपा को सिर्फ़ 46 सीटें ही मिलीं। वैसे इन 180 सीटों में से भाजपा 130 सीटों पर लड़ी थी। कांग्रेस 180 में से 96 सीटों पर लड़ी थी, जिसे महज़ आठ सीटें मिलीं। भले भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी ने नतीजों के बाद इसे भाजपा की बड़ी जीत बताया; लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह नहीं है। हाँ, भाजपा पूर्वोत्तर में अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज करवा रही है। इसका लाभ उसे लोकसभा चुनाव में मिल सकता है; भले ही पूर्वोत्तर में असम को छोड़ बहुत कम लोकसभा सीटें हों।

इस साल जम्मू-कश्मीर को मिलाकर आठ और राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा भले पूर्वोत्तर में कुछ हद तक सफल रही, उसे कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में सत्ता तश्तरी में रखी नहीं मिलेगी। दक्षिण में कांग्रेस के बेहतर प्रदर्शन करने की उम्मीद जतायी जा रही है, ख़ासकर कर्नाटक में; जबकि छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की सरकारों का काम बुरा नहीं रहा है और उनके ख़िलाफ़ एन्टी इन्कमवेंसी कम-से-कम अभी तो नहीं दिखती। कर्नाटक भाजपा के लिए कठिन बन सकता है, जबकि मध्य प्रदेश में भी उसे कांग्रेस से कड़ी टक्कर लेनी होगी।

कांग्रेस को कमज़ोर करने में भाजपा सफल

इन चुनाव नतीजों से भाजपा की पूर्वोत्तर में राजनीतिक रणनीति का पता चलता है। उसने बहुत सूझबूझ से अपने क्षेत्रीय सहयोगियों की मदद से अपनी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस को राजनीतिक परिदृश्य में हाशिये पर ला खड़ा किया है। एक समय था, जब पूर्वोत्तर की राजनीति कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती थी। उसकी तूती बोलती थी। अब उसकी जगह भाजपा ले रही है। कमोवेश सभी पूर्वोत्तर राज्यों में उसने कांग्रेस को कमज़ोर कर दिया है। अब हालत यह है कि जहाँ भाजपा की दो सीटें भी हैं, वहाँ भी सरकार बनाने या सरकार में उसकी भूमिका है।

हालाँकि जिस तरह त्रिपुरा में उसकी सीटें घटी हैं, इससे संकेत मिलता है कि पूर्वोत्तर के मैदान में भाजपा को स्थायी जगह बनने के लिए अभी काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी, जहाँ कांग्रेस के प्रति लोगों के दिल में ख़ास जगह रही है। भाजपा चूकी, तो कांग्रेस की वापसी सम्भव हो जाएगी। नागालैंड में भाजपा 12 सीटों पर पहुँच गयी है और उसने एनडीपीपी के साथ मिलकर फिर सत्ता हासिल कर ली है।

मेघालय में सिर्फ़ दो सीटें हाथ में होने के बावजूद उसने जिस तेज़ी से एनपीपी का समर्थन किया, उससे ज़ाहिर होता है कि वह सत्ता के साथ रहना चाहती है, ताकि लोगों में उसकी लगातार चर्चा रहे।

मेघालय में कांग्रेस को पार्टी टूटने का दंश झेलना पड़ा है। उसने पिछले चुनाव में 21 सीटें जीती थीं। लेकिन उसके नेता मुकुल संगमा सभी विधायकों के साथ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चले गये। अब इस चुनाव में दोनों के वोटों का बँटवारा हो गया। कांग्रेस 5 सीटों पर सिमट गयी और टीएमसी को भी पाँच ही सीटें मिलीं। कांग्रेस तो पिछली बार 21 सीटें जीतकर भी सरकार नहीं बना पायी थी।

त्रिपुरा में कांग्रेस को अपने ही पुराने नेता प्रद्युत माणिक्य से झटका मिला। उन्होंने कांग्रेस से बाहर आकर टिपरा मोथा पार्टी का गठन कर लिया और 13 सीटें हासिल कर लीं। माकपा, जिससे कांग्रेस ने गठबंधन किया था; उसे 11 सीटें मिलीं और कांग्रेस को तीन। साल 2018 में कांग्रेस शून्य पर अटक गयी थी। इस लिहाज़ से तो उसे फ़ायदा ही हुआ है।

जहाँ तक नागालैंड की बात है, वहाँ नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) और उसकी सहयोगी भाजपा ने मिलकर 37 सीटें जीतीं। दूसरी बार नागालैंड में सत्ता बरक़रार रखी और कांग्रेस को डुबो दिया। उसे एक भी सीट नहीं मिली। एनडीपीपी ने 25 सीटों पर जीत हासिल की, जो 2018 की तुलना में आठ अधिक है, जबकि भाजपा ने 12 सीटें हासिल कीं। उसे पिछले चुनाव में भी इतनी ही सीटें मिली थीं। लिहाज़ा न नुक़सान हुआ, न फ़ायदा।

पूर्वोत्तर में भाजपा ने केंद्र की सत्ता का लाभ उठाते हुए विकास पर बहुत फोकस किया है। मोदी सरकार ने 15वें वित्त आयोग (2022-23 से 2025-26) की बाक़ी बची अवधि के लिए 12,882.2 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (एमडीओएनईआर) की योजनाओं को मंज़ूरी दी है। सरकार के मुताबिक, एमडीओएनईआर योजनाओं के तहत पिछले चार साल में वास्तविक व्यय 7,534.46 करोड़ रुपये था, जबकि 2025-26 तक अगले चार वर्षों के लिए उपलब्ध धनराशि 19,482.20 करोड़ रुपये (क़रीब 2.6 गुना) है।

ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल

मोदी सरकार का यह भी दावा है कि उसकी कोशिशों से पूर्वोत्तर में विद्रोह (उग्रवाद) की घटनाओं में 74 फ़ीसदी कमी आयी है। सुरक्षा बलों पर हमलों में 60 फ़ीसदी और नागरिक मौतों में 89 फ़ीसदी की कमी हुई है। क़रीब 8,000 युवा मुख्यधारा में लौट आये हैं, जिससे उनके और उनके परिवारों के लिए बेहतर जीवन की शुरुआत हुई है।

अब कांग्रेस की बात करें। राहुल गाँधी ने तीनों राज्यों में सिर्फ़ मेघालय में एक जनसभा की। पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े बहुत कम दिखे और दूसरे बड़े नेता भी नहीं आये। इसे अंदाज़ा लग जाता है कि कांग्रेस तीन राज्यों के इस चुनाव में कितनी सक्रिय थी।

इन चुनाव नतीजों से एक बात साफ़ हो गयी है कि भाजपा की पूर्वोत्तर की रणनीति में असम के मुख्यमंत्री हिमंत विसवा सरमा अब काफ़ी महत्त्वपूर्ण हो गये हैं। एक समय किरण रिजुजू उसके मुख्य चेहरा थे; लेकिन सरमा ने उन्हें पीछे छोड़ दिया है। जिस तरह सरमा का कद भाजपा में बढ़ रहा है, उसे देखकर लगता है कि उन्हें भाजपा नेतृत्व हिन्दी भाषी राज्यों में भी चुनावों में इस्तेमाल करेगा। वह एक बेहतर रणनीतिकार तो हैं ही, कांग्रेस को हमेशा निशाने पर रखते हैं। राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा में बढ़ी दाढ़ी पर उन्हें सद्दाम हुसैन कहने वाले सरमा इसी कारण भाजपा नेतृत्व की नज़रों में चढ़ गये हैं, भले बहुत-से लोग यह भी मानते हैं कि इस तरह की भाषा ज़्यादा दिन नहीं चलती।

इस तरह देखें तो पूर्वोत्तर में भाजपा का लगभग पूरा क़ब्ज़ा हो गया है। मणिपुर में मार्च, 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में 60 में से कांग्रेस ने 28 सीटें जीती थीं; लेकिन 2022 में वह पाँच सीटों पर सिमट गयी। जिस भाजपा को तब 21 सीटें मिली थीं, उसने 2022 में 32 सीटें जीतकर पूरा बहुमत हासिल कर लिया था। अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार है ही। सियासी उठापटक के बीच 2016 में पेमा खांडू कांग्रेस छोड़ पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश में शामिल हुए और फिर भाजपा में चले गये। अब वहाँ भाजपा की ही सरकार है।

मिजोरम में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा वहाँ अपनी कोशिशों में जुटी है। पिछले चुनाव 2018 में हुए थे, जिसमें मिजो नेशनल फ्रंट को 40 में से 26 सीटें मिली थीं। राज्य में मिजो नेशनल फ्रंट या कांग्रेस का ही अब तक प्रभुत्व रहा है। कांग्रेस को पिछले चुनाव में 5 सीटें मिली थीं, जबकि वहाँ वह कई बार सत्ता में रही है। अब भाजपा वहाँ कांग्रेस के वोटों में सेंध लगाने की तैयारी में हैं।

दीदी की ताक़

बहुत कम लोगों को पता है कि भाजपा के साथ काफ़ी कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करने वाली बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आरएसएस से काफ़ी अच्छे सम्बन्ध रहे हैं। एक वह भी समय था, जब आरएसएस नेता तरुण विजय ने ममता बनर्जी को ‘बंगाल की दुर्गा’ कहकर पुकारा था और ममता ने 2003 में आरएसएस से अपील की थी कि वह यदि साथ दे, तो बंगाल में वह लाल आतंक (वामपंथ) का सफ़ाया कर सकती हैं।

उस समय दीदी एनडीए के साथ थीं और वामपंथियों से जमकर लोहा ले रही थीं। और आख़िर वे बंगाल में अपनी पार्टी टीएमसी को सत्ता में लाने में सफल रही थी। उसके बाद वामपंथी बंगाल में कभी सत्ता में नहीं लौट सके हैं। हालाँकि अब स्थितियाँ कुछ अलग दिखती हैं। टीएमसी और ममता बनर्जी काफ़ी मज़बूत हो चुके हैं। कोर्ट से कोई $फैसला आ गया, तो तीन महीने में बंगाल में पंचायत चुनाव हो सकते हैं।

कहा जा रहा है कि वहाँ सीपीएम टीएमसी को कमज़ोर करने के लिए आरएसएस-भाजपा की मदद करने को भी तैयार है। हालाँकि ममता बनर्जी हिन्दू वोट बैंक को यूँ ही थोड़े जाने देंगी। मार्च के पहले पखवाड़े ममता बनर्जी वरिष्ठ सहयोगियों के साथ कोलकाता में बाबूघाट पर गंगा आरती में शामिल हुईं। ममता को चतुर रणनीतिकार माना जाता है, जिन्होंने बिना हार माने अपने बूते पर पार्टी को ज़मीन पर मज़बूत किया है। इसकी सम्भावना कम ही लगती है कि आरएसएस और वामपंथी एक मंच पर आएँगे। इसका कारण यह भी माना जाता है कि तमाम बातों के बावजूद एक सच यह भी है कि केंद्र सरकार ने जहाँ एजेंसियों के ज़रिये तमाम राज्यों में ग़ैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों या उनकी सरकारों को परेशान किया है, ममता बनर्जी इस मामले में एक अपवाद रही हैं।

उपचुनावों में कांग्रेस को तीन सीटें

तीन पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव के साथ चुनाव आयोग ने पाँच राज्यों की छ: ख़ाली विधानसभा सीटों पर भी उपचुनाव कराया था। इनमें कांग्रेस को सबसे ज़्यादा तीन, जबकि भाजपा को दो सीटें मिलीं। कांग्रेस ने चौंकाने वाला नतीजा पश्चिम बंगाल में हासिल किया, जहाँ उसने टीएमसी और भाजपा को झटका देते हुए सागरदिघी सीट जीत ली। पार्टी के बेरॉन बिस्वास 22986 वोटों से जीते। इस तरह बंगाल विधानसभा में कांग्रेस का खाता खुल गया। वहाँ टीएमसी के देबाशीष बनर्जी और भाजपा के दिलीप साहा को हार मिली। यह सीट टीएमसी विधायक सुब्रत साहा की मौत से ख़ाली हुई थी। इस जीत को पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की वापसी कहना जल्दबाज़ी होगा; लेकिन उसने जीत हासिल कर यह तो बता दिया है कि वह ख़त्म नहीं है। हालाँकि ममता बनर्जी का आरोप है कि भाजपा ने वहाँ कांग्रेस की मदद की।

यह जीत इस मायने में महत्त्वपूर्ण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। राज्य में टीएमसी अभी भी जड़ें जमाये हुए है। महाराष्ट्र में दो सीटों पर उपचुनाव हुए। क़स्बापेठ सीट कांग्रेस के रवींद्र धंगेकर ने जीत ली, जहाँ 1995 से लगातार भाजपा जीत रही थी। ज़ाहिर है भाजपा के लिए यह बड़ा झटका है। हालाँकि भाजपा महाराष्ट्र की चिंचवाड़ सीट जीतने में सफल रही। तमिलनाडु की ईरोड सीट कांग्रेस के एलंगोवन ने 66,397 वोटों के बड़े अंतर से जीती।  ज़ाहिर होता है कि राज्य में कांग्रेस-डीएमके गठबंधन मज़बूत बना हुआ है और एआईडीएमके अभी वापसी करने की स्थिति में नहीं। इस का लाभ गठबंधन को अगले साल के लोकसभा चुनाव में मिल सकता है। झारखण्ड की रामगढ़ सीट पर भाजपा- एजेएसयू गठबंधन जीता जबकि अरुणाचल प्रदेश में भाजपा जी त्सेरिंग ल्हामू निर्विरोध चुनी गयीं, क्योंकि और कोई उम्मीदवार वहाँ नहीं था।

दोहरा ऑस्कर भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम समय

मार्च भारत के लिए शानदार क्षण लेकर आया है। फ़िल्म आरआरआर के गाने नाटू-नाटू (नाचो-नाचो) मूल गीत श्रेणी में अकादमी पुरस्कार जीतने वाला पहला भारतीय फ़िल्म ट्रैक बन गया है। ऐसे ही वृत्तचित्र ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’ 95वें अकादमी पुरस्कारों में इतिहास रच रहा है। डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट कैटेगरी में जीतने वाला यह पहला भारतीय प्रोडक्शन है।

‘द एलिफेंट व्हिस्पर्स’ के निर्माता गुनीत मोंगा ने कहा- ‘मैं कह सकता हूँ, भारतीय सिनेमा का भविष्य बेहतरीन है। यहाँ भविष्य है; और नहीं भूलना चाहिए कि भविष्य वास्तव में महिलाओं का है।’ कार्तिकी गोंसाल्वेस और गुनीत मोंगा का ‘द एलिफेंट व्हिस्परर्स’, जो तमिलनाडु अभयारण्य में मनुष्यों और एक परित्यक्त हाथी के बच्चे के बीच के बंधन की पड़ताल करता है, डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट श्रेणी में भारत का पहला अवार्ड है। ‘स्माइल पिंकी’ और ‘पीरियड, ऐंड ऑफ सेंटेंस’, दोनों भारत में बने; ने भी इसी श्रेणी में अवार्ड हासिल किया था। लेकिन वे विदेशी प्रोडक्शन थे।

दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के मुदुमलाई टाइगर रिजर्व के अंदर थेप्पकडु हाथी शिविर में गोली का शिकार होने की कहानी वाली ‘द एलीफेंट व्हिस्परर्स’ आदिवासियों बोम्मन और बेली नाम के दम्पति को लेकर है, जो एक घायल हाथी ‘रघु’ की देखभाल करते हैं; जो अपने झुण्ड से अलग हो गया है। जब रघु किशोरावस्था में पहुँचता है, तो राज्य का वन विभाग उसे ले जाता है और उसे दूसरे केयरटेकर के साथ रख देता है। दम्पति हतप्रभ हैं और रघु को शिद्दत से याद करते हैं। एक दृश्य में हाथी का बच्चा बेली के आँसू पोंछता है, जब वह रघु के अलगाव पर बिलख पड़ती है।

भारत ने कभी भी अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म श्रेणी या सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म में ऑस्कर नहीं जीता जैसा कि पहले माना जाता था। भानु अथैया ऑस्कर जीतने वाली पहली भारतीय थीं, जिन्हें रिचर्ड एटनबरो की ‘गाँधी’ में सर्वश्रेष्ठ कॉस्ट्यूम डिजाइन के लिए अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। ‘गाँधी’ ने सन् 1983 में आठ ट्राफियाँ जीती थीं। निर्देशक सत्यजीत रे को सन् 1992 में ऑस्कर की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था।

नाटू-नाटू के संगीतकार एम.एम. कीरावनी ने चुटकी लेते हुए कहा- ‘मेरे मन में केवल एक ही इच्छा थी और राजामौली और हमारे परिवारों की भी; कि आरआरआर को जीतना है, …हर भारतीय का गौरव…, यह तो बस शुरुआत है।’ कीरावनी द्वारा रचित और एसएस राजामौली की ब्लॉकबस्टर फ़िल्म में चंद्रबोस द्वारा लिखित ‘नाटू-नाटू’ इस श्रेणी में ऑस्कर जीतने वाला चौथा $गैर-अंग्रेजी गीत है। इससे पहले ‘जय हो’ ने सन् 2009 में यह पुरस्कार जीता था। भारतीय गौरव को बढ़ाने के लिए अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने दर्शकों को ‘नाटू-नाटू’ पेश किया।

आरआरआर (राइज रोर रिवॉल्ट), स्वतंत्रता पूर्व की एक काल्पनिक कहानी है; जो सन् 1920 के दशक में दो वास्तविक जीवन के चरित्रों भारतीय क्रांतिकारियों- अल्लूरी सीताराम राजू (राम चरण) और कोमाराम भीम (जूनियर एनटीआर) पर आधारित है।  इसे तेलुगु, तमिल, हिन्दी और मलयालम में रिलीज किया गया था। राम चरण और जूनियर एनटीआर अभिनीत राजामौली की फ़िल्म में यह ऊर्जावान गीत था, जिसे एम.एम. कीरावनी और गीतकार चंद्र बोस ने लिखा। इसने तीन अन्य नामांकनों को पछाडक़र पुरस्कार जीता, जिसमें एवरीथिंग, एवरी वेयर, ऑल एट वंस से ‘दिस इज अ लाइफ’, टेल इट लाइक अ वुमन से ‘आपलोज’ और ब्लैक पैंथर : वकानदा फॉरएवर  से ‘रेज मी अप’ शामिल हैं। मंच पर ‘नाटू-नाटू’ के गायक थे। राहुल सिप्लिगुंज और काल भैरव। एक बार ख़त्म होने के बाद हॉलीवुड और विश्व सिनेमा की हस्तियों समेत दर्शकों ने खड़े होकर तालियाँ बजायीं। गोल्डन ग्लोब और क्रिटिक्स चॉइस अवार्ड जीतने के बाद तेलुगु गीत के लिए यह तीसरी बड़ी अंतरराष्ट्रीय मान्यता है।

यह भारत के लिए सि$र्फ एक रात भर नहीं थी। 95वें अकादमी पुरस्कारों को ‘सब कुछ, हर जगह और सब कुछ एक साथ’ के साथ एशियाई प्रतिभाओं को पहचानने के लिए भी याद किया जाएगा, जिसमें सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, डेनियल शेनर्ट और डेनियल क्वान के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, मलेशिया की मिशेल योह के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और वियतनामी अमेरिकी के हुई क्वान के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता सहित सात पुरस्कार शामिल हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, पूर्व कांग्रेस प्रमुख राहुल गाँधी और अन्य ने ऑस्कर की दोहरी जीत की सराहना की। प्रधानमंत्री ने ट्विटर पर कहा- ‘असाधारण! नाटू-नाटू की लोकप्रियता वैश्विक है। यह एक ऐसा गीत होगा, जिसे आने वाले कई साल तक याद रखा जाएगा…भारत गर्व और जोश से भरा है।’ उन्होंने ‘द एलीफेंट व्हिस्परर्स’ के निर्माताओं को भी यह कहते हुए बधाई दी- ‘आपने भारतीय फ़िल्म निर्माताओं के लिए प्रेरणा के द्वार खोल दिये हैं! जय हो प्तबॉसवुमेन।’ प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘उनका काम आश्चर्यजनक रूप से सतत विकास और प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने के महत्त्व पर प्रकाश डालता है।’ इसलिए देखते रहिये, भविष्य भारत का है!

संवैधानिक पदों की गरिमा ताक पर

The President, Smt. Droupadi Murmu, during her swearing-in-ceremony at Central Hall, Parliament, in New Delhi on July 25, 2022.

शैलेंद्र कुमार ‘इंसान’

संविधान की गरिमा होती है। इस गरिमा का सम्मान हर नागरिक को करना चाहिए। परन्तु अब संविधान की धज्जियाँ सरेआम उड़ायी जाती हैं। कई संवैधानिक पदों का तिरस्कार कर नये-नये शब्दों को गढ़ा जाने लगा है। जैसे इस बार राष्ट्रपति को महामहिम न कहकर माननीय कहा जाने लगा। अर्थात् देश के सर्वोच्च पद पर बैठे पहले नागरिक को सामान्य सांसदों की श्रेणी में लाने की यह एक कोशिश हुई है, जो आने वाले समय में राष्ट्रपति का सम्मान कम कराएगी। इसकी शुरुआत भी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा हो चुकी है, जिन्होंने राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को बेचारी ग़रीब आदिवासी महिला तक कह दिया, जो कि बचाव के नाम पर सीधा-सीधा राष्ट्रपति का अपमान था।

इसी प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बार-बार आदिवासी राष्ट्रपति कहकर उनका अपमान किया। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का भी कई बार अपमान किया गया। देखा गया कि उन्हें राष्ट्रपति होने के बावजूद रामनाथ कोविंद और उनकी पत्नी को कथित रूप से पुष्कर मन्दिर, जगन्नाथपुरी मन्दिर में नहीं घुसने दिया गया। वह हाथ जोड़ते थे, तो भी प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन्हें नमस्कार नहीं करते थे। इन लोगों ने उन्हें अपने सामने कभी रेड कारपेट पर नहीं चलने दिया।

इससे पता चलता है कि संवैधानिक पदों पर बैठे स्वयंभू लोग ख़ुद को ऊँचा मानने वाले जातिवाद से बाहर नहीं निकलते। विचारणीय है कि जब ये लोग इनके समान तथा इनसे उच्च पदों पर बैठे छोटी जाति के लोगों की इज़्ज़त नहीं करते, तो फिर ये सामान्य जनता में निम्न वर्ग के लोगों को किस खेत की मूली समझते होंगे। सामान्य वर्ग के लोगों को तो ये लोग वैसे भी कुछ नहीं समझते। इनमें उन माननीयों की भी बड़ी ग़लती है, जो निम्न वर्गों से आते हैं और अपने अतिरिक्त अपने वर्ग के लोगों के अपमान को बर्दाश्त करते हैं। निम्न वर्गों के जन प्रतिनिधि विधानसभा और संसद में पहुँचने के बाद ख़ुद को उच्च मानने लगते हैं तथा अपने वर्ग के लोगों के साथ उसी तरह का व्यवहार करते हैं, जो व्यवहार उनसे स्वयंभू उच्च वर्गों के जन प्रतिनिधि करते हैं। परन्तु उनका सम्मान फिर भी स्वयंभू उच्च वर्ग के जन प्रतिनिधि नहीं करते। भाजपा में तो निम्न वर्गों के जन प्रतिनिधियों और स्वयंभू उच्च वर्ग के जन प्रतिनिधियों के बीच एक भेदभाव की खाई सदैव रहती है, जो अमूमन सार्वजनिक मंचों पर भी दिखायी दे जाती है।

अब स्वयंभू उच्च वर्गों के जन प्रतिनिधियों के महिमामंडन को भी देख लें, जिसमें संवैधानिक पदों का मखौल उड़ाये जाने का स्पष्ट रूप दिखायी देता है। सभी जानते हैं कि प्रधानमंत्री का पद एक संवैधानिक पद है। लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद बहुमत वाली पार्टी, जो केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में होती है, उसके लोकसभा सदस्यों की सहमति से संवैधानिक रूप से किसी सांसद को प्रधानमंत्री चुना जाता है तथा प्रधानमंत्री को संवैधानिक भाषा में प्रधानमंत्री ही बोला जाता रहा है। जबकि गरिमापूर्ण संबोधन के लिए माननीय प्रधानमंत्री कहा जाता है। लेकिन अब प्रधानमंत्री को सरेआम प्रधान सेवक बोला जाने लगा है, ख़ासकर भाजपा के नेताओं, सांसदों, विधायकों और मंत्रियों द्वारा, वह भी संसद में।

दूसरी बात संवैधानिक भाषा में प्रधानमंत्री को माननीय कहकर संबोधित किया जाना चाहिए, परन्तु अब भाजपा के नेता, सांसद, विधायक और मंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यशस्वी प्रधानमंत्री या यशस्वी प्रधान सेवक कहकर संबोधित करते हैं। तीसरी बात, पहले केंद्र की सत्ता को केंद्र सरकार या भारत सरकार कहा जाता था, लेकिन अब भाजपा के कार्यकर्ताओं से लेकर नेता, विधायक, सांसद और मंत्री तक मोदी सरकार कहते हैं। यहाँ तक कि लगातार कथित आरोप लग रहे हैं कि प्रधानमंत्री ख़ुद को चमकाने में लगे रहते हैं। उनका हर मंत्रालय में इतना दख़ल है कि उस मंत्रालय को सँभालने वाले मंत्री को भी अपने विभाग के निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।

यह सब भले ही कथित आरोप हैं, परन्तु ऐसे आरोप यूँ ही नहीं लगते। अक्सर देखा गया है कि हर क्षेत्र में उद्घाटन, शिलान्यास तथा विकास कार्यों की घोषणा प्रधानमंत्री ही करते हैं। जबकि यह काम उस मंत्री का होता है, जिसके मंत्रालय के तहत वह काम हुआ हो। ऐसे ही तस्वीरें खिंचाने और वीडियोग्राफी कराने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शौक़ किसी से छिपा नहीं है। कई बार उन्हें कैमरे के सामने आने वालों को सामने से हटने का इशारा करते देखा गया है। सार्वजनिक स्थलों से लेकर मंदिरों तक में उन्हें साफ़-साफ़ कैमरे पर फोकस करते देखा गया है। जानकार कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी कहीं भी जाएँ, उनके साथ दर्ज़नों कैमरे रहते हैं।

क्या यह जानबूझकर किया जा रहा, ताकि देश की जनता के दिमाग में यह घुसाया जा सके कि मोदी ही सरकार हैं और सर्वोपरि हैं। क्या नरेंद्र मोदी वन मैन पॉवर बनने की कोशिश में लगे हैं? क्या वह जनतांत्रिक रूप से सत्ता को अपने हाथ की कठपुतली बनाकर आजीवन जबरन सत्ता में बने रहना चाहते हैं?

यह सब अनायास ही नहीं कहा जा रहा है। सन् 2014 में उनके सत्ता में आने के बाद यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि मोदी के अलावा किसी में प्रधानमंत्री बनने की क्षमता नहीं है। जबकि नरेंद्र मोदी की योग्यता के बारे में भी सब जानते हैं। उनकी डिग्रियों तक को लेकर संदेह बना हुआ है। आज भी उनकी डिग्रियों को लेकर सवाल खड़े हैं, जिनका जवाब नहीं दिया जाता है। ऐसे ही उनके नौ वर्ष के कार्यकाल को कई ऐसी घटनाएँ हुई हैं, जिन्हें भूले से भी नहीं भुलाया जा सकता। सन् 2014 में उनके लिए पागल हो चुकी जनता में अधिकतर लोग अब उनके ख़िलाफ़ दिखायी देने लगे हैं। पिछले चार-पाँच वर्षों के सर्वे बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता लगातार गिर रही है। विपक्षी दलों का उनके ख़िलाफ़ एकजुट होने का यही कारण है।

उनके पसंदीदा कामों में पार्टी प्रचार, यात्राएँ, कैमरे के सामने सूटबूट में रहना तथा खचाखच भरी जनसभाएँ हैं। प्रचार सभाओं में विपक्षियों को लगातार कोसना भी उनके काम का हिस्सा बन चुका है। चुनाव किसी भी राज्य के हों, दर्ज़नों रैलियाँ तथा जनसभाएँ उनकी ही होती हैं। छोटे से लेकर बड़े चुनाव भी वह अपने नाम पर लड़ते हैं। अगर इस सबको प्रधानमंत्री अपना काम समझते हैं, तो उन्हें प्रधानमंत्री के उत्तरदायित्वों को एक बार फिर समझने की ज़रूरत है। उन्हें ख़ुद इस बात को समझने की ज़रूरत है कि जब उनकी चुनावी रैली और चुनावी सभाओं में लोग आते तक नहीं हैं, तो उन्हें एक बड़ी जीत कैसे मिल जाती है? इस सवाल पर देश की जनता, चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय को भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री का पद संवैधानिक गरिमा के साथ-साथ देश की दिशा तय करने वाला शक्तिशाली पद है। इसे हल्के में लेना तथा उत्तरदायित्वों की जगह चेहरा चमकाने वाले कार्यों को करके इतिश्री समझना एक बड़ी भूल है। प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति को संवैधानिक द्वारा दी गयी शक्तियों से अतिरिक्त मनमानी करने का अधिकार नहीं होता है। उसे स्वयंभू अथवा निरंकुश बनने का कोई अधिकार है ही नहीं। उसे वही कार्य करने का अधिकार संविधान ने दिया है, जो देश और जनहित में हों। साथ ही प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति की अपने देश और जनता के प्रति जवाबदेही भी तय होती है, जिसके लिए वह उत्तरदायी है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद-75 के अनुसार, संसद के मंत्रि परिषद् का नेता प्रधानमंत्री होता है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति तब करता है, जब यह मंत्री परिषद् उसे प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने पर राजी होता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद-78 प्रधानमंत्री के कर्तव्यों को निर्धारित करता है। संविधान में दिये गये प्रधानमंत्री के कर्तव्यों तथा अधिकारों के अनुसार ही देश के हर प्रधानमंत्री को अपना कार्य करना चाहिए।

साथ ही किसी भी जन प्रतिनिधि को यह अधिकार नहीं है कि वह संवैधानिक पदों पर बैठे अन्य जन प्रतिनिधि को संवैधानिक संबोधन के अतिरिक्त गरिमाहीन तथा अतिरिक्त गरिमामयी शब्दों के संबोधन से अपमानित तथा सम्मानित करने की कोशिश करे। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से इस तरह की परंपरा पड़ती दिख रही है कि निम्न वर्ग के जन प्रतिनिधियों को गरिमाहीन शब्दों से संबोधित करके उनका अपमान किया जाने लगा है, जबकि स्वयंभू उच्च वर्गों के जन प्रधिनिधियों को गढ़े गये गरिमामयी शब्दों से सम्मानित किया जा रहा है, जिसकी अनुमति संविधान नहीं देता है।

प्रधान सेवक, यशस्वी, पूज्यनीय, अवतार, भगवान, विकासपुरुष, चौकीदार, सबसे लोकप्रिय, इनके अतिरिक्त और कोई नहीं इत्यादि इसी प्रकार के गढ़े हुए शब्द जबरन सम्मान कराने के लिए बार-बार बोले जाने लगे हैं। ऐसे ही आदिवासी ग़रीब महिला, दबे-कुचले, दलित, बेचारा-बेचारी, दया के पात्र इत्यादि गरिमाहीन शब्दों से तथा प्रतिष्ठित संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का सम्मान न करने से अपमानित करने पर भी रोक लगनी चाहिए। भारतीय संविधान तथा संवैधानिक पदों की गरिमा बचाये तथा बनाये रखने के लिए इन दोनों ही प्रकार की स्थितियों पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए।

तेज़ी से रुक रहीं दिलों की धडक़नें

कोरोना के बाद दिल के दौरे से बढ़ रहीं मौतें; हालाँकि सही कारणों का नहीं लग सका है पता

कोरोना महामारी के बाद दिल का दौरा पडऩे के कारण होने वाली मौतों में अचानक वृद्धि ने चिकित्सकों, नीति निर्माताओं और आम लोगों के साथ-साथ विशेषज्ञों को भी चकित कर दिया है। अभी भी निश्चित नहीं है कि इन मौतों का कोरोना से क्या और कैसा सम्बन्ध है? हाल में अभिनेत्री, मॉडल और मिस यूनिवर्स पेजेंट की पहली विजेता ने लाइव चैट सत्र के दौरान अपने इंस्टाग्राम पेज पर घोषणा की कि उनकी मुख्य धमनियों में से एक में 95 फ़ीसदी रुकावट के साथ उन्हें दिल का तीव्र दौरा पड़ा है।

जीरो फिगर बनाये रखने और वज़न कम करने के लिए मशहूर हस्तियों के जिम जाने की ख़बरों के बीच एक अच्छी ख़बर यह है कि वैज्ञानिक वज़न कम करने वाली दवा पर प्रयोग कर रहे हैं, जो वास्तव में असरकारक दिख रही है। रही है। बल्कि जीएलपी-1 रिसेप्टर एगोनिस्ट नामक दवाओं का एक वर्ग, वेगोवी और ओजेम्पिक जैसे ब्रांड नामों के तहत बेचा जाता है। टिकटॉक की नामचीन हस्तियाँ और मशहूर लोग वज़न कम करने के लिए इंजेक्शन के दीवाने हैं। आख़िरकार इसके लाभार्थी वह अरबों लोग होंगे, जिनके वज़न ने उन्हें अस्वस्थ बना दिया है।

जानलेवा है मोटापा

मोटापा अब सिर्फ़ अमीर-देशों की समस्या नहीं है। एक अनुमान के अनुसार, 2035 तक पृथ्वी पर आधे से अधिक लोग अधिक वज़न वाले या मोटे होंगे। अभी दवाएँ महँगी हैं और उनके दीर्घकालिक प्रभाव अज्ञात हैं। लेकिन प्रतिस्पर्धा और सरकारों द्वारा थोक ख़रीदारी उनके मूल्य नीचे लाने में मदद कर सकती है। और अगर सावधानीपूर्वक निगरानी से कोई बड़ा दुष्प्रभाव नहीं मिलता है, तो दवाएँ मानवता के संकट के ख़िलाफ़ अपनी लम्बी और अब तक की निरर्थक रही लड़ाई जीतने में मदद कर सकती हैं।

नयी तरह की दवा अमीरों और आकर्षक दिखने वाले लोगों के बीच उत्साह पैदा कर रही है। हफ़्ते में बस एक बार लेने से वज़न कम हो जाएगा। मशहूर हस्तियाँ यह दावा करती हैं; प्रभावशाली व्यक्ति टिकटॉक पर इसकी प्रशंसा करते हैं; अचानक दुबली-पतली हो गयी हस्तियों ने इनकार कर दिया कि उन्होंने इसे लिया है। लेकिन नवीनतम वज़न घटाने वाली दवाएँ केवल कॉस्मेटिक वृद्धि के लिए नहीं हैं। उनके सबसे बड़े लाभार्थी अकेले सेलिब्रिटी नहीं, बल्कि दुनिया भर के अरबों आम लोग होंगे, जिनके वज़न ने उन्हें अस्वस्थ बना दिया है।

कोरोना वायरस में झेले दर्द के परिणामस्वरूप कई लोग मोटापे के जोखिमों के बारे में जागरूक हो गये हैं। हालाँकि कई लोग मानते हैं कि आहार और व्यायाम के माध्यम से वज़न कम करने का उपाय उनके पास है ही। डॉक्टर नोवो नॉर्डिस्क, एक डेनिश दवा निर्माता से इंजेक्शन वाली दवा का उपयोग करने का सुझाव देते हैं, जो टाइप-2 मधुमेह के लिए स्वीकृत है। लेकिन मामूली लाभ के रूप में वज़न घटाने में भी मदद करता है। यह शुरू करने के लिए जेब पर प्रति माह लगभग 1,000 डॉलर का ख़र्च पड़ता। हालाँकि उपयोग में वृद्धि के साथ ख़र्च नीचे आ सकता है।

यह ख़बर ऐसे समय में आयी है, जब नये अध्ययनों से पता चला है कि कोरोना संक्रमण ने हृदय रोग के ख़बरे को गम्भीर रूप से बढ़ा दिया है; ख़ासकर कम उम्र के लोगों में। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ वेटरन्स अफेयर्स के आंकड़ों पर आधारित एक अध्ययन में कहा गया है कि जिन लोगों को कोरोना हुआ था, उनमें दिल का दौरा और स्ट्रोक सहित हृदय सम्बन्धी समस्याओं का काफ़ी उच्च जोखिम है। ये समस्याएँ उन लोगों में भी हो सकती हैं, जिन्हें अपेक्षाकृत हल्का कोरोना था और वे इससे पूरी तरह ठीक हो चुके हैं।

नेचर नाम के एक जनरल में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन में यह बताया गया था कि जो लोग गम्भीर कोरोना से ठीक हो गये थे, उनमें एक साल बाद तक हृदय सम्बन्धी समस्याओं के विकसित होने का अत्यधिक उच्च जोखिम था। इसमें दिल की सूजन और फेफड़ों के थ्रोम्बो एम्बोलिज्म शामिल थे, जो कि उन लोगों की तुलना में 20 गुना अधिक था; जो असंक्रमित रहे। येल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में गम्भीर कोरोना के साथ अस्पताल में भर्ती लोगों में ऑटो-एंटीबॉडी की अत्यधिक संख्या की उपस्थिति की जानकारी दी गयी है। इनमें से अधिकांश एंटीबॉडी अपने स्वयं के ऊतकों और कोशिकाओं के ख़िलाफ़ काम करती हैं और अनजाने में दिल सहित शरीर के ऊतकों पर हमला कर सकती हैं।

यही नहीं, यह उनकी संरचना को कमज़ोर कर सकते हैं। कोरोना वायरस फेफड़ों, न्यूरॉन्स, लीवर, किडनी, आंत और हृदय और रक्त वाहिकाओं जैसे अंगों और ऊतकों में पाए जाने वाले एसीई2 रिसेप्टर के माध्यम से प्रवेश करता है। थक्के हृदय या मस्तिष्क जैसे महत्त्वपूर्ण अंगों को रक्त की आपूर्ति को अवरुद्ध कर सकते हैं और ये दिल का दौरा या स्ट्रोक का कारण बन सकते हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

कैथ लैब्स (पैन मैक्स) कार्डिएक साइंसेज के प्रधान निदेशक और प्रमुख डॉ. विवेका कुमार कहते हैं- ‘हाल में हमने बहुत-से युवाओं को एक्यूट हार्ट अटैक और विशेष रूप से कार्डियक अरेस्ट से मरते हुए देखा है; जो डांसिंग, ड्राइविंग, जिम जैसी शारीरिक गतिविधि करते हैं और वह सब शादी समारोह और अन्य कार्यक्रमों के दौरान भी घटित हुआ है। ओमिक्रॉन द्वारा प्रेरित तरंगें हल्की होती हैं; लेकिन उनका अपना प्रभाव होता है। वैक्सीन कोरोना का अभी तक एक पूर्ण उपचार नहीं है, क्योंकि टीकों ने भी कुछ दुष्प्रभाव पैदा किये और हृदय सम्बन्धी दिक्क़तों का कारण बनी।

डॉक्टर कुमार कहते हैं कि ऐसे लोग हैं, जिन्हें केवल टीके लगे हैं और एक हफ़्ते या एक महीने के भीतर हमने देखा कि एक मरीज़ को दिल का दौरा पड़ गया। टीके के साइड इफेक्ट कम तीव्रता वाले हैं। लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण हृदय सम्बन्धी घटनाएँ बढ़ रही हैं; विशेष रूप से कार्डियक अरेस्ट।’

इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट कार्डियोथोरेसिक एंड हार्ट एंड लंग ट्रांसप्लांट सर्जन डॉ. मुकेश गोयल कहते हैं- ‘अब यह ज्ञात हो गया है कि कोरोना हृदय सहित शरीर के विभिन्न अंगों की छोटी वाहिकाओं में व्यापक रक्त के थक्के का कारण बनता है। यह मायोकार्डिटिस नामक हृदय की मांसपेशियों की सूजन का भी कारण बनता है।’

शिकागो में नॉर्थ-वेस्टर्न यूनिवर्सिटी, इलिनोइस ने कोरोना वायरस समूह के 1,000 लोगों पर किये अपने शोध में पाया है कि इससे हृदय की नाकाम का जोखिम 72 फ़ीसदी बढ़ गया है और लगभग 12 अतिरिक्त लोग इससे प्रभावित हुए हैं। अस्पताल में भर्ती होने से भविष्य में हृदय सम्बन्धी जटिलताओं की सम्भावना बढ़ जाती है; लेकिन अस्पताल में भर्ती होने से बचने वाले लोगों को भी कई स्थितियों के लिए उच्च जोखिम होता है।

कोरोना वायरस महामारी से पहले दिल का दौरा दुनिया भर में मौतों का प्रमुख कारण था। हालाँकि प्रमुख बात यह है कि इसमें लगातार गिरावट आ रही थी। हालाँकि हाल में पीयर-रिव्यू जर्नल ऑफ मेडिकल वायरोलॉजी में प्रकाशित नये अध्ययन से पता चलता है कि दिल के दौरे से होने वाली मौतों की दर में तीव्र मोड़ आया गयी और महामारी के बाद सभी आयु समूहों में वृद्धि हुई है। दिल से सम्बन्धित दिक्क़तों में बढ़ोतरी के दूसरे कारण नौकरी छूटने और अन्य वित्तीय दबावों से जुड़ी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक चुनौतियों से सम्बन्धित तनाव भी हो सकते हैं, जो हृदय रोग के लिए तीव्र या तनाव का कारण बन सकते हैं।

शोध दल के सदस्यों का कहना है कि वे लम्बे समय से जानते हैं कि फ्लू जैसे संक्रमण हृदय रोग और दिल के दौरे के जोखिम को बढ़ा सकते हैं; लेकिन दिल के दौरे से होने वाली मौतों में तेज़ वृद्धि पहले नहीं दिखती थी। इसमें बढ़ोतरी का काम मोटापे ने भी किया है, जिसे एक बड़ी आबादी ग्रसित है।

उत्साहजनक बात

आज़ादी के बाद भारत सूखे, अकाल और भुखमरी से जूझ रहा था, जो कुपोषण का कारण बनता है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में आर्थिक विकास, फ़सलों की बहुतायत और जीवन शैली में बदलाव के कारण देश ने एक और पोषण सम्बन्धी समस्या विकसित की है, जो कि मोटापा है।

 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में देश में मोटे लोगों की संख्या दोगुनी हो गयी है। सर्वेक्षण के अनुसार, प्रति वर्ग मीटर 25 किलोग्राम से अधिक बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) वाले लोगों को मोटा माना गया है। मोटापे की व्यापकता महिलाओं में 12.6 फ़ीसदी और पुरुषों में 9.3 फ़ीसदी है। दूसरे शब्दों में भारत में 100 मिलियन से अधिक व्यक्ति मोटापे से ग्रस्त हैं, जिससे उच्च ट्राइग्लिसराइड्स (रक्त का गाढ़ापन) और कम उच्च घनत्व वाले लिपोप्रोटीन (एचडीएल) कोलेस्ट्रॉल, टाइप-2 मधुमेह, उच्च रक्तचाप, पुराने ऑस्टियो आर्थराइटिस, हृदय रोग, स्ट्रोक और यहाँ तक कि कैंसर भी हो सकता है। मोटापे की सर्जरी के कई रूप हैं; लेकिन अक्सर सर्जरी पेट के आकार को इतना कम कर देती है कि कम मात्रा में ही आराम से खाना खाया जा सके। लिहाज़ा नये प्रकार की दवा जो उम्मीद जगा रही है, वह एक उत्साहजनक विकास है।

मुख्य निष्कर्ष

 महामारी से पहले के वर्ष में दिल का दौरा पडऩे से 1,43,787 लोगों की मौत हुई थी; महामारी के पहले साल के भीतर यह संख्या 14 फ़ीसदी बढक़र 164,096 हो गयी थी।

 तीव्र म्यो कॉर्डिअल धमनी की रुकावट सम्बन्धी मृत्यु दर में अधिकता पूरे महामारी के दौरान बनी रही है, यहाँ तक कि सबसे हाल की अवधि के दौरान प्रकल्पित कम-विषाणु वाले ओमिक्रॉन वैरिएंट में वृद्धि हुई है।

 शोधकर्ताओं ने पाया कि यद्यपि महामारी के दौरान तीव्र म्यो कॉर्डिअल से होने वाली मौतों में सभी आयुवर्ग में वृद्धि हुई; लेकिन सापेक्ष वृद्धि 25 से 44 वर्ष की आयु के सबसे कम उम्र के वर्ग के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण थी।

 महामारी के दूसरे वर्ष तक दिल का दौरा पडऩे से मृत्यु दर 25-44 आयु वर्ग के वयस्कों में 29.9 फ़ीसदी, 45-64 आयु वर्ग के वयस्कों में 19.6 फ़ीसदी और 65 से ज़्यादा आयु वर्ग में 13.7 फ़ीसदी बढ़ गयी थी।

दवाएँ बनाने में अग्रणी भारत स्वास्थ्य सेवाओं में पीछे क्यों?

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वास्थ्य एवं चिकित्सकीय अनुसंधान विषय पर आयोजित एक बेबिनार में कहा कि उनकी सरकार लोगों को समय पर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के प्रयासों में तेज़ी ला रही है। कोरोना वैश्विक महामारी के दौर में दवाओं, टीकों और चिकित्सकीय उपकरणों जैसे जीवन रक्षकों का व्यापक इस्तेमाल किया गया। उन्होंने स्वास्थ्य के क्षेत्र में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए उनकी सरकार द्वारा उठाये गये विभिन्न उपायों को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारे उद्यमियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भारत को किसी भी प्रोद्यागिकी का आयात न करना पड़े। भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने। उन्होंने यह भी कहा कि स्वास्थ्य सुविधाओं को सस्ता और सुलभ बनाने में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है। लिहाज़ा तकनीक के अधिक से अधिक इस्तेमाल पर ज़ोर दिया जा रहा है। डिजिटल हेल्थ आईडी के माध्यम से हम लोगों को समय पर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएँ प्रदान करना चाहते हैं।

दरअसल भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया में अपनी छवि को मज़बूत करना चाहता है, और इस संदर्भ में वह कोई भी मौक़ा हाथ से नहीं गँवाना चहाता। ग़ौरतलब है कि इन दिनों भारत जी-20 की मेज़बानी कर रहा है। और जी-20 की इस मेज़बानी में भारत ने स्वास्थ्य क्षेत्र में तीन प्राथमिकताओं पर ध्यान क्रेंद्रित करने का एंजेडा बनाया है। इनमें आपातकालीन स्वास्थ्य, दवा क्षेत्र में सहयोग को मज़बूत करना और डिजिटल स्वास्थ्य तथा नवाचार शामिल हैं। भारत का एक स्वस्थ पृथ्वी का दृष्टिकोण वसुधैव कुटुम्बकम (विश्व एक परिवार है) के उस दर्शन से निकलता है, जिसका भावार्थ है- एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य। स्वास्थ्य के संदर्भ में यह सिंद्वात जी-20 देशों के सदस्यों का स्थानीय स्वास्थ्य संकटों के बारे में विचार करने और सार्वभौमिक समाधानों को निकालने बाबत सहयोग करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

भारत ऐसी वैश्विक संरचना वाले नज़रिये को सामने रख रहा है, जिसमें अमीर व $गरीब दोनों देशों को एक साथ वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं का फ़ायदा मिले और वे बीमारियों व महामारियों से पैदा आपात स्थितियों का सामना कर सकें। अब जब भारत जी-20,2023 की अध्यक्षता कर रहा है, तो सबसे अहम है कि भविष्य में सभी देश प्रकोपों, महामारियों सरीखी चुनौतियों का मिलकर सामना करें। इसी के मद्देनज़र पहली प्राथमिकता आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत रोकथाम से जुड़े उपाय, तैयारियाँ, त्वरित प्रतिक्रिया आदि शमिल है। यह वैश्विक स्वास्थ्य संरचना पर ज़ोर देती है। वैश्विक स्वास्थ्य संरचना देशों को अगले स्वास्थ्य आपात स्थिति का सामना करने और मज़बूत उपचारात्मक व्यवस्थाओं के समर्थ होने की परिकल्पना करती है।

आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा को वैश्विक स्तर पर कोरोना महामारी के संदर्भ में समझा जा सकता है। कोरोना महामारी में विश्व का कमज़ोर स्वास्थ्य तंत्र ढह गया और निम्न व मध्यम आय वाले देशों में असमानताओं व विषमताओं को और तेज़ कर दिया। इसने विश्व को यह महसूस करा दिया कि एक अकेले देश में स्वास्थ्य आपातकाल विश्व भर के स्वास्थ्य तंत्र को प्रभावित कर सकता है। महामारी के दौरान जीवन रक्षक दवाइयों, वैक्सीन, चिकित्सा उपकरणों पर परस्पर निर्भरता साफ़तौर पर बनी व दिखायी दी।

भारत की वर्तमान सरकार का मानना है कि कोरोना महामारी के कठिन दौर में सरकार ने उसका मज़बूती से सामना किया और विश्व में एक मिसाल भी क़ायम की। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी इस संदर्भ में भारत सरकार की सराहना की है। भारत का ज़ोर बड़े प्रकोपों को रोकने, उनकी तैयारियों व त्वरित प्रतिक्रिया के लिए राष्ट्रीय क्षमताओं को मज़बूत करना है। इसी पहली प्राथमिकता में एंटीबायोटिक दवाओं के ख़िलाफ़ पैदा होती प्रतिरोधक क्षमता के मामले को भी कार्यसूची में रखा गया है।

ग़ौरतलब है कि बीते कुछ वर्षों से एंटीबायोटिक रेजि़स्टेंस (एएमआर) एक चिन्ता का विषय बना हुआ है। बीते कई वर्षों से विश्वभर में एंटीबायोटिक दवाइयों के असर में गिरावट देखी गयी है। अनुमान है कि विश्व भर में सालाना 12.7 लाख लोग इसी एंटीबायोटिक रेजिस्टस यानी एंटीबायोटिक प्रतिरोध के कारण मर जाते हैं। इस समय विश्व के सामने एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक बहुत बड़ी चुनौती है।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की हाल में आयी एक रिपोर्ट में ख़ुलासा किया गया है कि यह प्रतिरोध महामारी के दौरान बढ़ा है। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के मुद्दे को जी-20 के पिछले सम्मेलनों में भी प्रमुखता से उठाया गया और उम्मीद यही की जा रही है कि भारत इस बार अध्यक्ष होने के नाते इससे निपटने में ठोस नेतृत्वकारी भूमिका निभाएगा। दूसरी प्राथमिकता दवा क्षेत्र में सहयोग को मज़बूत करना है। इससे कम क़ीमत पर दवाओं की उपलबधता को बढ़ाने और उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने का रास्ता साफ़ होगा। ग़ौरतलब है कि दुनिया में भारत के दवा उद्योग की अहम जगह है। और देश इस क्षेत्र में अपनी क्षमताओं व संभावनाओं को अच्छी तरह पहचानता है।

भारत का दवा उद्योग का सालाना कारोबार ढाई से तीन लाख करोड़ का है। दुनिया के 100 से अधिक देशों में भारत से दवाइयाँ निर्यात होती हैं। अमेरिका में सामान्य दवाइयों की माँग का 40 प्रतिशत और ब्रिटेन की कुल दवाइयों की 25 प्रतिशत की आपूर्ति भारत में बनी दवाइयों से ही होती है। वित्तीय वर्ष 2022 में 24.47 अरब डॉलर के फार्मा उत्पाद 200 देशों को सप्लाई किये गये। कोरोना वैश्विक महामारी के दौरान भी भारत ने कोरोना की रोकथाम के लिए स्वदेशी प्रभावशाली टीका ईजाद किया और अन्य ज़रूरतमंद देशों की भी कई तरह से मदद की। कोरोना के मुश्किल चरणों के दौरान भारत ने सार्वभौमिक वैक्सीनेशन कार्यक्रमों के नेताओं में से एक नेता के रुप में अपनी स्थिति को तराशा है।

इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउडेंशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय दवा उद्योग मात्रा के आधार पर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार है। भारतीय दवा उद्योग के विस्तार के लिए सरकार की नीति में अनुसंधान और विकास पर का$फी ज़ोर दिया गया है। दवा उद्योग में अपनी क्षमताओं के आकलन के आधार पर भारत ने स्वास्थ्य के एजेंडे में फार्मास्युटिकल सेक्टर में उद्योग को मज़बूत करने सम्बन्धित प्राथमिकता को दूसरे स्थान पर रखा है। सहयोग को मज़बूत करने के पीछे एक मंशा बढिय़ा वैक्सीन, चिकित्सा विधान और नैदानिक तक पहुँच के लिए न्यायसंगत तंत्र को बेहतर बनाना है।

भारत की कोशिश क्लिनीकल परीक्षण और अनुसंधान व विकास के लिए अनुकूल ढाँचा बनाना है और चिकितसा को क़िफ़ायती बनाना है; ख़ासतौर पर निम्न व मध्यम आय वाले देशों के लिए। इटली (जी -20, 2021) और इंडोनेशिया ने (जी-20, 2022) अपनी-अपनी अध्यक्षता में क्षेत्रीय उत्पादन व शोध हब पर ध्यान क्रेंद्रित किया, भारत ने जी-20 अध्यक्षता में उपलब्धता, पहुँच बनाने और ख़रीदने के सामथ्र्य सम्बन्धित फ़ासलों को संबोधित करने वाला प्रस्ताव दिया है। तीसरी प्राथमिकता के तहत डिजिटल स्वास्थ्य के लिए मौज़ूदा वैश्विक प्रयासों को एक संस्थागत ढाँचे में परिवर्तित करने के मकसद से भारत डिजिटल स्वास्थ्य नवाचार और समाधान पर ध्यान क्रेंद्रित करेगा। इस प्राथमिकता के तहत भारत की योजना वैश्विक डिजिटल जन स्वास्थ्य सामग्री-टेली मेडिसन, टेली रेडियोलॉजी, और यहाँ तक कि ई-आईसीयू को बढ़ावा देने की है।

वैश्विक स्वास्थ्य ढाँचे को बेहतर बनाने के लिए भारत में जी-20 स्वास्थ्य कार्य समूह की चार बैठकों में से पहली बैठक जनवरी में केरल में आयोजित की गयी थी। इस बैठक के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री डॉ. भारती प्रवीण प्रवार ने कहा कि जी-20 की भारत की अध्यक्षता के साथ, हमारे पास इस बात का अवसर है कि हम देशों के बीच बहुपक्षीय सहयोग बनाये, ज्ञान साझा करने की सहायता से प्रभावी नीतियों का निर्माण करें, जो दुनिया भर के नागरिकों को सुलभ, क़िफ़ायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में सहायक हो।

दूसरी बैठक इसी 17-19 मार्च को गोवा में होगी। भारत जी-20, 2023 की अध्यक्षता कर रहा है और इस मौक़ को विश्वस्तर पर एक बहुत बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश भी कर रहा है। लेकिन जहाँ तक देश के भीतर स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभ उपलब्धता व गुणवत्तापूर्ण सेवाओं का सवाल आता है, तो कई सवाल खड़े हो जाते हैं। आज भी कई दुर्गम इलाक़ों में रहने वाले लोगों को आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध नहीं हैं।

प्रधानमंत्री आयुषकार्ड योजना के तहत भी कई गढ़बढियाँ सामने आती रहती हैं। जहाँ तक केंद्रीय स्वास्थ्य बजट का सवाल है, तो वह भी आबादी को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने से बहुत दूर है। यह बात दीगर है कि प्रधानमंत्री का ज़ोर देश के लोगों को यह बताने पर है कि अब 5जी तकनीक की वजह से स्वास्थ्य के सेक्टर में स्र्टाटअप के लिए भी बहुत सम्भावनाएँ बन रही हैं। ड्रोन तकनीक की वजह से दवाओं की डिलीवरी और टेस्टिंग से जुड़े लॉजिस्टक्स में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आते दिख रहा है।

भ्रष्टाचार या विपक्ष को ख़त्म करने की कोशिश!

पिछले मंगलवार को ज़मीन के बदले नौकरी मामले में सीबीआई की एक टीम ने पहले पटना में राबड़ी देवी और उसके बाद राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव से उनकी पुत्री मीसा भारती के दिल्ली स्थित आवास पर पूछताछ की। ज़ाहिर है कि चंद रोज़ पहले ही लालू सिंगापुर में किडनी का इलाज कराने के बाद दिल्ली लौटे हैं। ऐसे में सीबीआई की टीम के घंटों पूछताछ करने को विपक्षी दलों ने तमाम विपक्षी दलों के नेताओं साथ सियासी साज़िश और विपक्ष को ख़त्म करने की मुहिम बताया है। दरअसल आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया को उप मुख्यमंत्री रहते भ्रष्टाचार के नाम पर गिरफ़्तार करना विपक्षी पार्टियों के लिए यह साफ़ संकेत है कि उन्हें राजनीति से दूर हो जाना चाहिए। केंद्र की मोदी सरकार का यह संकेत सभी विपक्षी दल समझ भी रहे हैं; लेकिन दुर्भाग्य से एकजुट होकर इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। कोई एकाध विरोध का सुर उठ भी रहा है, तो उसका असर सरकार पर नहीं हो रहा है।

विपक्षी दलों के कई नेताओं का कहना है कि भ्रष्टाचार ख़त्म करने के नाम पर विपक्षियों और विरोधियों पर इस तरह की कार्रवाई से पता चलता है कि सरकार भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि विपक्ष को समाप्त कर देना चाहती है। क्योंकि भाजपा के मोदी सरकार के नौ साल के कार्यकाल में देखा गया है कि जो विपक्षी पार्टी या नेता भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हुए भी भाजपा में शामिल हो जाता है, उसके ख़िलाफ़ किसी भी प्रकार की कोई कार्रवाई नहीं होती है। क्या भाजपा के पास कोई ऐसा साबुन है, जो एक ही झटके में तमाम दाग़ों को धोकर एकदम साफ़ कर देता है? इसका मतलब भाजपा की मोदी सरकार के पास भ्रष्टाचारियों के लिए दो क़ानून हैं, एक यह कि अगर विरोधी पार्टी या कोई विपक्षी नेता भाजपा के सुर में सुर नहीं मिलाता है, तो उसके ख़िलाफ़ सीबीआई, ईडी और आईटी के अलावा पुलिस कार्रवाई भी कभी भी हो सकती है; लेकिन अगर वही पार्टी या नेता भाजपा में आ जाए, तो उसके सारे पाप धुल जाते हैं और उसके ख़िलाफ़ कभी कोई कार्रवाई नहीं होती।

बहरहाल अगर मनीष सिसोदिया की बात करें, तो उन पर अभी तक सीबीआई कोई भ्रष्टाचार साबित नहीं कर सकी है। बस उसके पास एक ही बहाना है कि सिसोदिया जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सीबीआई जाँच में जितना सहयोग मनीष सिसोदिया ने किया है, कोई नेता नहीं करता है। सीबीआई दूसरी बात यह कह रही है कि कुछ गवाहों से सिसोदिया का सामना कराना है। मनीष सिसोदिया के वकीलों का कहना है कि कथित शराब घोटाले में अभी तक सीबीआई ने एक भी गवाह का नाम दर्ज नहीं किया है, तो फिर वह गवाह कहाँ से खोजकर लाएगी और किसे खड़ा करेगी? क्या यह सब कुछ फ़र्ज़ीवाड़ा नहीं चल रहा है? फ़िलहाल उच्चतम न्यायालय ने भी सरकार की मंशा के अनुरूप काम करना शुरू कर दिया है और सिसोदिया मामले में सीबीआई की इच्छा को ही प्राथमिकता दी है। देखने वाली बात यह है कि सिसोदिया की गिरफ़्तारी के दौरान से लेकर अब तक जिस तरह से पुलिस, सेना के जवान तैनात किये गये, जैसे मानों कोई बड़ा इंटरनेशनल आतंकवादी पकड़ रखा हो।

अगर नयी शराब नीति की बात करें, तो दिल्ली की आप सरकार ने जिस प्रकार से नयी शराब नीति का ड्राफ्ट तैयार किया और उपराज्यपाल से पास कराकर लागू किया, उसी शराब नीति में अगर सिसोदिया को गिरफ़्तार किया जा सकता है, तो नयी शराब नीति को कुछ सुझावों के साथ मंज़ूरी देने वाले उपराज्यपाल को दोषी क्यों नहीं माना जा रहा?

बहरहाल सिसोदिया को 20 मार्च तक के लिए जेल भेज दिया गया है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि मनीष सिसोदिया राजनीति का शिकार हुए हैं। कहा जा रहा है कि सिसोसिया को पहले भी गिरफ़्तार किया जा सकता था; लेकिन इतना समय इसलिए लगाया गया है, ताकि उन्हें भाजपा में जाने के लिए मनाया जा सके। सिसोदिया ने पिछली पूछताछ के दौरान सीबीआई पर साफ़ आरोप लगाया था कि सीबीआई ने ख़ुद उन्हें भाजपा में जाने की सलाह दी और दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का ऑफर किया।

दरअसल मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी से पहले दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ़्तार कर लिया गया था। कहा तो यह भी जा रहा है कि मोदी सरकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के गिरेबान तक पहुँचने की तैयारी कर रही है। इतना ही नहीं, वह पंजाब में भी आम आदमी पार्टी की सरकार को ध्वस्त करने की तैयारी कर चुकी है। इसका मतलब यही हुआ कि देश में सबसे तेज़ी से अपना राजनीतिक क़द बढ़ा रही आम आदमी पार्टी से भाजपा के शीर्ष नेताओं को ख़तरा महसूस हो रहा है। कांग्रेस को काफ़ी हद तक ठिकाने लगा चुकी मोदी सरकार किसी भी विरोधी पार्टी को अपने बराबर खड़े नहीं रहने देना चाहती। यही वजह है कि केंद्र की मोदी सरकार विपक्षी पार्टियों के नेताओं को साफ़ संदेश देना चाहती है कि वे ख़ामोश रहें और चुनावों में जीत की मंशा को त्यागकर सरेंडर कर दें, नहीं तो वे कितने भी ईमानदार क्यों न हों, उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डालना सरकार के लिए कोई बड़ी बात नहीं है।

राजनीति के जानकार तो यहाँ तक कह रहे हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव जीतने के लिए केंद्र की मोदी सरकार कई मज़बूत विरोधियों को जेल भेजने की तैयारी कर चुकी है, जिसके लिए उनकी फाइल बहुत पहले ही तैयार हो चुकी है। कहा जा रहा है कि इस कड़ी में कई दिग्गज हैं।

राजनीति के जानकारों का दावा है कि 2024 के चुनाव से पहले कम-से-कम एक दर्ज़न विपक्षी नेता जेल में होंगे। लालू प्रसाद यावद पर दोबारा से बड़ी कार्रवाई करना विरोधियों पर कार्रवाई का दूसरा बड़ा संकेत है। कहा जा रहा है कि लालू प्रसाद यादव ही नहीं, बल्कि राजनीतिक तौर पर मज़बूत 22 और नेताओं और राजनीति को प्रभावित करने की सामथ्र्य रखने वाले 54 और नेताओं के सीबीआई और ईडी की फाइलों में जाँच के लिए दर्ज हो चुके हैं, जिसमें लालू प्रसाद यादव के पूरे परिवार का नाम बताया जा रहा है। यानी भाजपा की केंद्र की मोदी सरकार बिहार में हर उस विपक्षी को 2024 से पहले जेल में भेज देना चाहती है, जो भाजपा को हराने में सक्षम है। नीतीश के द्वारा भाजपा का साथ छोडक़र महागठबंधन की सरकार बना लेने से बौखलाये भाजपा नेतृत्व ने बिहार में वापसी की जो तैयारी की है, उसे नैतिक तो नहीं कहा जा सकता।

सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार उन लोगों को बर्दाश्त नहीं कर पा रही, जो विपक्ष या विरोध में रहकर भाजपा को एक भी सीट का नुक़सान चुनाव में लगा सकती है। कहा जा रहा है कि ईडी और सीबीआई के पास 120 से ज़्यादा विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई करने के लिए फाइलें तैयार हैं। उच्चतम न्यायालय ने मुहर लगा दी है कि ईडी, जिसे चाहे एक साल तक गिरफ़्तार करके रख सकता है। सीबीआई को भी खुली छूट दी जा चुकी है कि अगर कुछ न मिले, तो पूछताछ और जाँच में सहयोग न करने के नाम पर किसी को गिरफ़्तार कर लो।

आज देश के विपक्षी नेताओं में किसी के ख़िलाफ़ हेराल्ड मामला है, किसी पर हवाला का, किसी पर खदान का, किसी पर बैंक ऋण न लौटाने का, तो किसी पर हवाला और विदेश में पैसा रखने का मामला तैयार है। जिस पर कोई मामला नहीं है, उस पर फ़र्ज़ी मामला बनाया जा चुका है। क्या यह मान लिया जाए कि अब कभी भी किसी को गिरफ़्तार किया जा सकता है? अगर वह कूदकर भाजपा की गोद में बैठ जाता है, तो क्या उसे कई नेताओं की तर्ज पर तत्काल क्लीन चिट मिलनी तय है? ऐसे कई नाम हैं, जो इसी तरह बचे हुए हैं। लेकिन फाइल उनकी भी तैयार है, ताकि अगर वे फिर से भाजपा के दायरे से बाहर कूदे, तो उन्हें भी जेल भेजा जाएगा।

राजनीति के जानकारों का कहना है कि भाजपा की हिट लिस्ट में इन दिनों केरल, तेलंगाना, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार, पंजाब, दिल्ली, बंगाल, तमिलनाडु और राजस्थान के विपक्षी नेताओं के नाम हैं, जिनमें 2024 से पहले उन सबको गिरफ़्तार किया जा सकता है, जो भाजपा के साथ खड़े नहीं होंगे। मनीष के बाद बंगाल सरकार के मंत्री शांतनु बनर्जी को ईडी ने गिरफ़्तार कर लिया। सवाल यह उठता है कि क्या केंद्र की मोदी सरकार लोकतंत्र और संविधान को ख़त्म करने का प्लान बना चुकी है? राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी तक की फाइलें तैयार हैं और उनसे पूछताछ भी हो चुकी है। याद होगा पी. चिदंबरम और उनके बेटे कार्तिक चिदंबरम से कांग्रेस के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मुहिम शुरू हुई थी। इस समय विपक्षी दलों में टीएमसी पर 30, कांग्रेस पर 26, राजद पर 10, बीजद पर 10, वाईएसआरसीपी पर छ: और  टीडीपी पर पाँच, बसपा पर पाँच और सपा पर चार,  आम आदमी पार्टी पर चार, एआईडीएमके पर चार और डीएमके पर दो, सीपीएम पर चार, एनसीपी पर तीन, नेशनल कांफ्रेंस पर दो और पीडीपी पर एक और टीआरएफ पर दो मुक़दमे दर्ज हो चुके हैं। 

बहरहाल कांग्रेस को छोडक़र आठ विपक्षी दलों के नौ बड़े नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी को सीधे तौर पर तीन पन्ने का एक पत्र लिखा है और अनेक सवाल उठाकर लोकतंत्र को ख़त्म करने का आरोप उन पर लगाया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी पर इसका कोई असर पड़ेगा? हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लंदन में भी मोदी सरकार पर लोकतंत्र को ख़त्म करने का आरोप लगाया।

अडानी के ख़िलाफ़ इतने बड़े मामले में मोदी सरकार द्वारा अडानी का नाम तक नहीं लेना और विपक्ष को आरोप-प्रत्यारोप और आलोचना का आलोचना का स्पष्ट मौक़ा मिलना माना जा रहा है। लेकिन सवाल कई है जैसे सत्ता के लिए यह जबरदस्ती वाले असंवैधानिक तरीक़े से वह कितने समय तक सत्ता को अपनी मुट्ठी में रख सकती है?

क्या सरकार के लिए कभी ये हथकंडे भारी पड़ सकेंगे? क्या मोदी सरकार को जनता या विपक्षी पार्टियों का एकजुट विरोध सहना होगा? क्या मोदी सरकार 2024 में विपक्ष रहित सत्ता हासिल कर सकेगी? क्या मोदी शाह की जोड़ी निरंकुश स्वशासन की पृष्ठभूमि तैयार कर चुकी है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

विश्व जल दिवस विशेष

लगातार घट रहा पानी

पानी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इसलिए कहा गया है कि जल ही जीवन है। लेकिन धरती पर जिस तरह से पानी की कमी हो रही है और पीने योग्य पानी लोगों द्वारा दूषित और बर्बाद किया जा रहा है, उससे ऐसा लगता है कि पानी के लिए तीसरे विश्व युद्ध के होने की सम्भावना सही हो सकती है। जिस तरह से पानी की कमी दुनिया में हो रही है, उससे लगता है कि आने वाले 50-60 वर्षों में दुनिया के कई इलाक़ों में पानी की कमी हो जाएगी। इन दिनों दुनिया के कई देशों में पानी का संकट मँडरा रहा है।

पानी की बढ़ती कमी की चिन्ता में ही ब्राजील में रियो डी जेनेरियो में सन् 1992 में पर्यावरण तथा विकास का संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन आयोजित हुआ था। इस आयोजन में पहली बार इस बात को महसूस किया गया कि जल संरक्षण ज़रूरी है और तब विश्व जल दिवस मनाने की पहल की गयी। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने सन् 1993 में एक 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को जल संरक्षण और पीने योग्य साफ़ पानी के महत्त्व को बताना था।

तीन दशक से मनाये जा रहे विश्व जल दिवस के बावजूद पानी की बढ़ती कमी यह बताती है कि अभी भी लोग पानी की बर्बादी और लगातार होती कमी को लेकर चिन्तित नहीं हैं। हर साल पूरी दुनिया में सरकारें और कई सरकारी व निजी संगठन पानी की लगातार होती कमी का रोना रोते रहते हैं; लेकिन इसके बावजूद किसी के द्वारा पानी बचाने और उसे स्वच्छ रखने की कोई ख़ास योजना नहीं है। लोगों में पानी को लेकर जागरूकता की इतनी कमी है कि भारत जैसे देश में लोग पानी की बर्बादी करने में सबसे आगे हैं। पानी गंदा करने में भारतीय अग्रिम पंक्ति में हैं।

सबसे ज़्यादा प्राकृतिक पानी के स्रोत भारत में हैं, बावजूद इसके पानी का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग यहीं होता है। लेकिन हम ये भूल रहे हैं कि देश के कई इलाक़ों में पानी की कमी होती जा रही है। भारत में खेती-बाड़ी भी बारिश के पानी पर ज़्यादा निर्भर है। इसके बावजूद पानी के मोल को लोग नहीं समझ रहे हैं। पानी पर्यावरण, स्वास्थ्य, कृषि और व्यापार सहित जीवन में कितना महत्त्वपूर्ण है, इसकी कल्पना वही कर सकता है, जिसके पास पानी की कमी हो। देश के कई हिस्सों में पानी की कमी से हर साल किसानों को करोड़ों रुपये का घाटा होता है। दुनिया में क़रीब 200 करोड़ लोग मानव-मल से दूषित पानी को पीने, नहाने और कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इससे हैजा, पेचिश, टाइफाइड और पोलियो के साथ-साथ पेट और चमड़ी के रोग लगातार बढ़ रहे हैं। भारत में हर साल साफ़ पानी न मिलने की वजह से दो लाख लोगों की मौत हो जाती है। पिछले साल सरकार ने कहा था कि साल 2030 तक भारत की लगभग 60 करोड़ आबादी पानी के संकट का सामना कर सकती है। 17 मार्च, 2022 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में जल शक्ति मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि साल 2030 तक पानी की सबसे ज़्यादा दिक़्क़त महानगरों में हो सकती है।

सन् 1952 के मुक़ाबले 2022 तक एक-तिहाई पानी ही रह गया है, जबकि इस दौरान देश की आबादी 36 करोड़ से बढक़र 140 करोड़ के क़रीब पहुँच गयी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, कई स्थानों पर ज़मीन में पानी का स्तर हर साल क़रीब एक फीट तक कम हो रहा है। भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र में कुल भू-जल की मांग साल 2025 तक क़रीब 1.5 प्रतिशत ज़्यादा और साल 2050 तक क़रीब 3.1 प्रतिशत ज़्यादा हो जाएगी। पानी के प्रदूषण में भी भारत आगे है। यहाँ का 70 प्रतिशत पानी प्रदूषित है, जो हर साल बढ़ रहा है। हालाँकि जल संकट में अभी भारत काफ़ी दूर खड़ा है। लेकिन लगातार तेज़ी से गिरते भूजल स्तर को लेकर अभी से सावधान होना और इस समस्या से निपटना भारत के लिए काफ़ी ज़रूरी है, ताकि भविष्य में यहाँ पानी की क़िल्लत न हो।

संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के कनाडा स्थित जल पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान की पिछले साल की रिपोर्ट में कहा गया है कि अफ्रीका में समग्र तौर पर जल सुरक्षा का स्तर काफ़ी कम है। आज दुनिया के क़रीब 17 प्रमुख देश पानी के गम्भीर संकट से जूझ रहे हैं। इन 17 प्रमुख देशों में सऊदी अरब, क़ुवैत, क़तर, यूएई, इजराइल, लेबनान, ईरान, जॉर्डन, लीबिया, इरिट्रिया, सैन मैरिनो, बहरीन, भारत, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ओमान और बोत्सवाना है। यूएन-वाटर ने रोम में अपनी 30वीं बैठक में तय किया था कि भूजल की समस्या से निपटने के प्रयासों में तेज़ी लायी जाएगी।

धरती के क़रीब 70 प्रतिशत हिस्से में पानी है; लेकिन पीने योग्य पानी सिर्फ़ तीन प्रतिशत के क़रीब ही है। इसके अतिरिक्त जितना पानी है, वो पीने योग्य नहीं है। इस पीने योग्य तीन प्रतिशत पानी में लगातार प्रदूषण बढऩा चिन्ता का विषय है। धरती पर मीठे पानी का क़रीब 99 प्रतिशत हिस्सा तरल है। इस पानी में से लोग घरेलू उपयोग में सिर्फ़ 50 प्रतिशत ही लाया जाता है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 91 जलाशय ऐसे हैं जिनमें महज़ 20 फ़ीसदी पानी ही बचा है। पश्चिम और दक्षिण भारत के जलाशयों में पानी पिछले 10 वर्षों के औसत से भी नीचे चला गया है। जलाशयों में पानी की कमी की वजह से देश का क़रीब 42 फ़ीसदी हिस्सा सूखाग्रस्त है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की क़रीब 5 फ़ीसदी जनसंख्या (7.6 करोड़ लोग) के लिए पीने का पानी उपलब्ध नहीं है और क़रीब 1.4 लाख बच्चे हर साल गंदे पानी की वजह से होने वाली बीमारियों के कारण मर जाते हैं। जल संसाधन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, देश के 639 में से 158 ज़िलों के कई हिस्सों में भूजल खारा हो चुका है और उनमें प्रदूषण का स्तर सरकारी सुरक्षा मानकों को पार कर गया है।

दुनिया का सबसे बड़ा भूजल क्षेत्र एशिया-प्रशांत क्षेत्र में है, जिसमें 10 देश शामिल हैं। इन 10 देशों में 8 भारत और उसके निकटवर्ती देश नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन, इंडोनेशिया, ईरान, और तुर्की हैं। लेकिन यह भी सच है कि दुनिया की कुल भूजल निकासी का क़रीब 60 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं 10 देशों द्वारा इस्तेमाल में लाया जाता है। चिन्ता की बात यह है कि घटती बारिश और बढ़ते भूजल दोहन के चलते इन देशों में भूजल स्तर गिर रहा है। कम बारिश होने का सबसे बड़ा कारण वनों का लगातार कटान होना है। मीठे पानी के दूषित होने को लेकर दुनिया भर में चिन्ता बनी हुई है और मीठे पानी के महत्त्व और इसके संरक्षण के लिए हर साल 22 मार्च अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व जल दिवस मनाया जाता है। इस साल विश्व जल दिवस 22 मार्च को बुधवार के दिन मनाया जाएगा, जिसका मुख्य उद्देश्य सतत विकास लक्ष्य पाने के लिए साल 2030 तक दुनिया के सभी लोगों के लिए स्वच्छ पानी और स्वच्छता के समर्थन में वैश्विक जल संकट से निपटने के लिए कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करना रहेगा।

बड़ी चिन्ता यह भी है कि धरती पर तेज़ी से तालाब, झीलें और नदियाँ सूख रही हैं। पीने योग्य पानी के स्रोतों के इस तरह विलुप्त होने के चलते जंगली जीवों और पक्षियों के जीवन पर संकट मँडरा रहा है। आज पानी का संकट एक बड़ा मुद्दा बन गया है, जिस पर राजनीति और धन संग्रहण की कोशिशें तो होती हैं; लेकिन पीने योग्य पानी के स्रोतों को बचाने, घटते भूजल को वापस बढ़ाने और बढ़ते जल प्रदूषण को कम करने को लेकर कोई ख़ास काम नहीं होता है। बढ़ती जनसंख्या और पीने के पानी के कम होने के मद्देनज़र पूरी दुनिया को तेज़ी से प्रयास करने चाहिए कि पानी की बर्बादी को रोका जा सके। आज के समय में पीने योग्य शुद्ध पानी सबके लिए उपलब्ध कराना कठिन हो चुका है। कई जगहों पर तो पीने के पानी की इतनी क़िल्लत है कि वहाँ पानी को लेकर आये दिन झगड़े होते रहते हैं। अनेक शहरों में ज़मीन का पानी पीना तो दूर नहाने योग्य भी नहीं रहा है।

आइए, इस बार विश्व जल दिवस पर हम सब मिलकर संकल्प लें कि पानी की बर्बादी नहीं करेंगे और न ही पानी को दूषित करेंगे। नालियों से लेकर नदियों तक साफ़-सफ़ाई रखेंगे और उनमें किसी भी प्रकार का कचरा, केमिकल और मल-मूत्र इत्यादि नहीं डालेंगे। अगर इतना संकल्प दुनिया का हर आदमी ले ले, तो आने वाले दो दशकों के भीतर पीने योग्य पानी में बढ़ोतरी हो जाएगी और लोगों को दूषित पानी पीने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा। इसके लिए सरकारों को भी मिलकर काम करने की ज़रूरत है। पानी के महत्त्व को सिर्फ़ इतनी-सी बात से समझ लेना चाहिए कि पानी के बिना एक दिन भी जीना मुश्किल है।

योगी राज बनाम अपराध

अपराध को रोकने के लिए यदि अपराध का सहारा लेना पड़े, तो इसे उचित नहीं माना जा सकता। क़ानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है। बुलडोजर नीति पर कुछ लोग यही कह रहे हैं। मगर कुछ लोग प्रसन्न हैं कि योगी राज में अपराधियों पर बुलडोजर चल रहा है। होली पर बुलडोजर बाबा से लेकर राम राज्य के गुणगान वाले गाने बजाकर ये लोग अति प्रसन्न हैं। मगर इन लोगों को यह ज्ञान नहीं है कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जिस अपराध को समाप्त करने के लिए लगातार हुंकार भर रही है, वो अपराध अगर समाप्त हो रहा होता, तो हर दिन अपराधों के दर्ज़नों समाचार पत्रों की सुर्ख़ियाँ नहीं बन रहे होते।

जघन्य हत्याकांड

जौनपुर के सुजानगंज थाना क्षेत्र के लोहिंदा बाज़ार में घटी घटना ने किसका दिल नहीं दहला दिया होगा, जहाँ बदमाशों ने एक पंक्चर मिस्त्री की हत्या कर उसकी पत्नी की दोनों आँखें निकाल लीं। विवाद दुकान के सामने बोलेरो खड़ी करने को लेकर शुरू हुआ। पंक्चर जोडऩे वाले छोटे से दुकानदार कमालुद्दीन (45) ने बदमाशों से उसकी दुकान के आगे से बलेरो हटाने को कहा। बस बदमाशों ने योगी के राम राज का नमूना पेश करते हुए पहले दुकानदार की पिटाई शुरू कर दी, फिर उसे गोली मार दी।

इस बीच थोड़ी सी तू-तू, मैं-मैं हुई, जिसमें बीच-बचाव के लिए उतरी पंक्चर मिस्त्री की पत्नी की आँखें फोडऩे का घिनौना कृत्य करते हुए बदमाशों के हाथ नहीं काँपे और न बाज़ार में किसी की हिम्मत हुई कि वह बदमाशों का विरोध कर सके। इतने पर भी बदमाशों का जी नहीं भरा, तो उन्होंने पंक्चर मिस्त्री की आठ महीने की बेटी को उठाकर पटक दिया। प्रश्न यह उठता है कि कुछ दिन पूर्व माफ़िया को मिट्टी में मिलाने की घोषणा विधानसभा से करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्या इन बदमाशों को भी मिट्टी में मिलाएँगे?

सरकारी धमकी बना बुलडोजर

उत्तर प्रदेश में बुलडोजर क़ानून के चर्चे हैं। एक प्रकार से बुलडोजर सरकारी धमकी बन चुका है। प्रश्न यह उठता है कि क्या अब अपराध रोकने के लिए बुलडोजर कार्रवाई क़ानूनी रूप से उचित है? क्या अपराधियों के अतिरिक्त विरोधियों के घरों पर भी बुलडोजर चल रहा है? योगी आदित्यनाथ सरकार पर आरोप तो ऐसे ही लगते रहे हैं।

कुछ दिन पूर्व उमेश पाल हत्याकांड को लेकर प्रयागराज में गैंगस्टर अतीक अहमद और उसके साथी जफर की संपत्तियों पर बुलडोजर चलाया गया। इससे पहले भी सैकड़ों लोगों के घरों पर बुलडोजर उत्तर प्रदेश सरकार ने चला रखा है। आरोप है कि अपराधियों एवं आरोपियों के घर पर बुलडोजर चलाने को लेकर उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार न्यायालय की अनुमति लेने की भी आवश्यकता नहीं समझती है। कुछ दिन पूर्व मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ के एक मंत्री जेपीएस राठौर ने भी अपराधियों को संकेतों में कानपुर के विकास दुबे कांड की याद दिलायी। उन्होंने चेतावनी की तरह उमेश हत्याकांड के आरोपियों का एनकाउंटर होने के संकेत दिए।

मंत्री राठौर ने कहा कि माफ़ियाओं के ठिकानों पर पुलिस के द्वारा दबिश दी जा रही है। इनको पाताल लोक से भी खोजकर लाएँगे। जब ये पकड़े जाएँ, तो गाड़ी में बैठते समय हाय तोबा न करें। ऐसा न हो कि ड्राइवर असंतुलित हो जाए और गाड़ी पलट न जाए। प्रश्न यह उठता है कि क्या अनर्गल भाषा के इस्तेमाल से अपराध रुक सकते हैं?

आपराधिक आँकड़े

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आये दिन प्रदेश में अपराधों के कम होने के दावे करके अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं, मगर जब भी राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आँकड़े सामने आते हैं, उन्हें ग़लत बताया जाता है। 2022 के राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के आँकड़ों की मानें, तो उत्तर प्रदेश में महिलाओं व बच्चों के प्रति अपराधों की संख्या बढ़ी है। हालाँकि महिला एवं साइबर अपराधों के आरोपियों से निपटने में उत्तर प्रदेश पुलिस का स्थान पहला है। वहीं सन् 2022 की अपेक्षा सन् 2019, 2020 एवं 2021 में अपराधों में कमी देखी गयी।

विदित हो कि पहली बार उत्तर प्रदेश की सत्ता जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सँभाली, तब अपराधियों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई में 81 अपराधियों का एनकाउंटर हुआ। वहीं सन् 2017 में 28 अपराधियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया। सन् 2019 में 34 अपराधी मुठभेड़ में मारे गए। सन् 2020 में 26 अपराधी मारे गए। सन् 2021 में 26 अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिराया गया एवं सन् 2022 में 14 अपराधी मुठभेड में मारे गये। वहीं अगर इस वर्ष दो महीने एक सप्ताह में नौ अपराधी मुठभेड़ में ढेर किये गये हैं। प्रदेश में सबसे अधिक 63 अपराधी मेरठ में एनकाउंटर में मारे गये हैं। उत्तर प्रदेश में अब तक कुल मुठभेड़ों में 1416 पुलिसकर्मी घायल भी हुए हैं। मगर प्रदेश पुलिस ने पिछले छ: वर्षों में 23,000 से भी अधिक अपराधियों को जेल भी भेजा है।

मगर हाथरस कांड के आरोपियों का बरी हो जाना इस ओर संकेत करता है कि उत्तर प्रदेश में जघन्य अपराध के आरोपी आराम से बरी भी होते हैं। लखीमपुर खीरी के मुख्य आरोपी नेता पुत्र को लेकर भी कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। स्पष्ट है कि अगर सत्ता में रहकर कोई अपराध करता है, तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होने का प्रश्न ही नहीं उठता है।

लोगों की राय

नाम न छापने की विनती करते हुए भाजपा के एक क्षेत्रीय नेता ने कहा कि आँकड़े बदलते रहते हैं। आँकड़ों पर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि आँकड़े सरकार के हिसाब से भी तय होते हैं। मगर ज़मीनी हक़ीक़त तब पता चलती है, जब पैनी दृष्टि से अपराधों की निगरानी की जाती है। उत्तर प्रदेश इतना बड़ा राज्य है जहाँ भुखमरी, निर्धनता तथा काम धंधे की कमी है। स्पष्ट है कि जहाँ ये समस्याएं होंगी वहाँ अपराध होगा ही होगा। हालाँकि मुख्यमंत्री योगी अपराधियों के प्रति सख़्त बहुत हैं; मगर केवल उनकी सख़्ती से काम नहीं चलने वाला। इसके लिए पुलिस प्रशासन को भी अपराधियों के प्रति सख़्त होना पड़ेगा।

फ़तेहगंज निवासी विकास गंगवार ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में क़ानून व्यवस्था सुधरी है। स्थितियाँ धीरे-धीरे सुधरती हैं। पहले गुंडों की संख्या काफ़ी थी। अब तक हमने दो ही सरकारों के शासनकाल में गुंडों में ख़ौफ़ देखा है एक मायावती की सरकार में तथा योगी आदित्यनाथ की सरकार में। भौजीपुरा निवासी रामपाल ने कहा कि सरकार कोई भी हो गुंडागर्दी सबके शासन में होती है। अंतर इतना है कि हर सरकार के समय में उस सरकार के अपने गुंडे होते हैं। अभी उत्तर प्रदेश में कौन से कम अपराध हो रहे हैं? आप तो पत्रकार हैं, सब समझते हैं। 

मंत्रियों का आपराधिक चिट्ठा

प्रश्न यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपराधियों में भी भेद करते हैं? क्या वे अपराधियों को एक समान दृष्टि से देखते हैं? यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वर्तमान प्रदेश सरकार में कई मंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह प्रश्न इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ दिन पूर्व ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की ओर संकेत करते हुए कहा था कि एक पार्टी अपराधियों को पालती थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जीरो टॉलरेंस की नीति के परिणाम जल्द सामने आएँगे। जो ये अपराधी हैं, माफ़िया हैं, पाले किसके द्वारा गये हैं? जिस माफ़िया के ख़िलाफ़ परिवार ने आरोप लगाये हैं, क्या सपा ने उन्हें सांसद नहीं बनाया था? आप अपराधियों को माल्यार्पण करेंगे, उन्हें प्रश्रय देंगे, गले का हार बनाएँगे और फिर दोषारोपण भी करेंगे?

मगर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्मस (एडीआर) एवं उत्तर प्रदेश इलेक्शन वाच ने योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में सम्मिल्लित 53 मंत्रियों में से 45 की पड़ताल में पाया कि इनमें 22 अर्थात 49 प्रतिशत मंत्रियों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन 22 मंत्रियों में से 20 मंत्रियों के विरुद्ध गम्भीर धाराओं के तहत मुक़दमे चल रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने से पहले स्वयं योगी आदित्यनाथ पर के विरुद्ध भी मुक़दमे रहे हैं। प्रश्न यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने उन मंत्रियों के विरुद्ध कभी बुलडोजर चलवाएंगे, जिन पर आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं? अगर नहीं तो विरोधियों पर बुलडोजर कार्रवाई का क्या औचित्य है? प्रश्न यह भी है कि क्या बुलडोजर कार्रवाई की अनुमति देश का क़ानून या कोई न्यायालय देता है?

कुछ दिन पूर्व ही कानपुर में बुलडोजर कार्रवाई के तहत एक महिला और उसकी बेटी को प्रशासनिक अधिकारी एवं पुलिस प्रशासन ने जीवित जला दिया। क्या सरकार को इस घटना से कोई ग्लानि हुई? अत: केवल अपनी पीठ थपथपाने से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्याथ को इस समीक्षा की आवश्यकता है कि उनकी बुलडोजर कार्रवाई में अपराधियों के नाम पर निरपराध जनता पर तो कार्रवाई नहीं हो रही है? उन्हें इसकी समीक्षा करने की भी आवश्यकता है कि कहीं उनके पास अपराधियों को देखने के दो अलग-अलग चश्मे तो नहीं हैं?