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हरियाणा सरकार की सरपंचों से बेरुख़ी

ई-टेंडरिंग के ख़िलाफ़ हरियाणा में क़रीब दो माह से जारी सरपंचों का आन्दोलन अब सरकार के गले की फाँस बन गया है। 300 से ज़्यादा लोगों को पुलिस ने हिरासत में लेकर पुलिस लाइंस में रखा। पंचकूला में विरोध प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज और पत्थरबाज़ी में दो दर्ज़न पुलिसकर्मी और एक दर्ज़न से ज़्यादा प्रदर्शनकारी घायल हो चुके हैं। ऐसी नौबत के लिए सरकार ज़िम्मेदार है। आन्दोलनकारी ई-टेंडरिंग के मुद्दे पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मिलकर अपना पक्ष रखना चाहते थे; पर बातचीत के लिए वह ख़ुद नहीं, बल्कि अपने अधिकारी भेज रहे थे। अगर मंत्री

ई-टेंडरिंग के ख़िलाफ़ हरियाणा में क़रीब दो माह से जारी सरपंचों या अधिकारी ही मुद्दे पर फ़ैसले के लिए अधिकृत होते, तो आन्दोलन कभी का ख़त्म हो गया होता।

लगभग दो माह से गाँव, ब्लॉक और ज़िला मुख्यालयों से शुरू हुआ आन्दोलन अब राज्य स्तरीय बन चुका है। गनीमत यह रही कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने धरनास्थल ख़ाली करने का आदेश दे दिया, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई कर मोर्चा हटा दिया; लेकिन आन्दोलनकारियों ने अगला पड़ाव मुख्यमंत्री के हलक़े करनाल में डाल दिया है।

आन्दोलन को कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों का पूरा समर्थन रहा है। लिहाज़ा मुद्दा अब राजनीतिक भी बन गया है। सरपंचों का यह आन्दोलन माँग पूरी न होने तक बेमियादी है। क़रीब दो माह के इस आन्दोलन में अब तक राज्य सरकार के लिए बातचीत का कोई प्रस्ताव तक नहीं है, जबकि सरपंच एसोसिएशन इस पर बातचीत के लिए तैयार है। अगर सरकार के पास नये संशोधन के पक्ष में तर्क है, तो वह बातचीत में सरपंच एसोएिशन की सहमति बना सकती है। लेकिन अगर नहीं तो माँग मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। राज्य सरकार इस आन्दोलन को लेकर ज़रा भी गम्भीर नहीं है। आन्दोलन की शुरुआत में राज्य के पंचायत मंत्री देवेंद्र बबली इसे चले हुए कारतूसों का आन्दोलन बताकर उकसाने जैसा काम कर रहे हैं, जिसे वे इक्का दुक्का पूर्व सरपंचों का आन्दोलन बता रहे थे, वह अब कमोबेश राज्य स्तरीय हो गया है।

मंत्री बबली राइट टू रिकाल से अपरोक्ष तौर पर धमका भी रहे हैं। इसके तहत जो सरपंच अपनी पंचायतों में इस मुद्दे पर गाँव में विकास नहीं करा रहे, उनकी जगह बहुसंख्यक पंचों को अधिकृत कर काम कराया जाएगा। बबली अपनी ही पार्टी के विधायक पर सरपंच आन्दोलन को हवा देने का आरोप लगाते हैं। अब समझौता बातचीत से ही सम्भव है, जिसके प्रति सरकार अभी तक ज़्यादा गम्भीर नहीं दिख रही, जबकि हरियाणा सरपंच एसोसिएशन बिना शर्त तैयार है।

राज्य में 6,000 से ज़्यादा पंचायतें हैं, जिनमें से ज़्यादातर आन्दोलन के समर्थन में हैं। सरकार चाहे इसे पंचायतों को भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी और जवाहदेही की बातें कह ई-टेंडरिंग को सही क़दम बता रही हो; लेकिन कोई सरपंच नहीं चाहता कि पंचायतों के अधिकार कम हों। वे भी तो जनप्रतिनिधि हैं, उनकी भी जवाबदेही है। अगर उनके अधिकारों में कमी आएगी, तो वे आवाज़ तो बुलंद करेंगे ही। यह संशोधन मार्च, 2022 में हुआ और नवंबर, 2022 के दौरान राज्य में सरपंचों के चुनाव भी हो गये। इस साल की शुरुआत से ही छिटपुट तौर पर यह मुद्दा उठने लगा था। रोहतक, भिवानी, फ़तेहाबाद, हांसी और अन्य स्थानों पर खंड विकास पंचायत कार्यालयों पर ताले लगाकर विरोध शुरू हो गया था। पंचायतों में विकास कार्य बाधित होने लगे हैं।

हरियाणा सरपंच एसोसिएशन के अध्यक्ष रणबीर सिंह समैण कहते हैं, जो व्यवस्था अब तक चली आ रही है, उसमें कोई बदलाव की कोई ज़रूरत नहीं है। पहले दो लाख रुपये के पंचायत में होने वाले विकास कार्य सरपंच और पंच अपने तौर पर कराते रहे हैं; लेकिन संशोधन के बाद अब इसके लिए सरकारी पोर्टल पर ई-टेंडरिंग करनी होगी। जब तक सरकार दो लाख रुपये से ज़्यादा के काम को ई-टेंडरिंग के ज़रिये ही कराने का फ़ैसला वापस नहीं लेती, आन्दोलन जारी रहेगा। यह क़दम पंचायती राज व्यवस्था को कमज़ोर करने वाला है और हम लोग ऐसा किसी भी हालत में नहीं होने देंगे।

हरियाणा में सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस के दावा करती है; लेकिन ऐसा है नहीं। विधानसभा में जब कोई विधायक उपमुख्यमंत्री पर ही ज़मीन ख़रीद पर गड़बड़ी के आरोप लगाये और उसको चुनौती न दी जाए, तो समझना ज़्यादा मुश्किल नहीं है। राज्य में भ्रष्टाचार हर स्तर पर है; लेकिन सार्वजनिक मंचों या आँकड़ों के माध्यम से इस पर काफ़ी हद तक अंकुश लगाने के दावे किये जाते रहे हैं।

पंचायतें भी इसका अपवाद नहीं है, विकास कार्यों के लिए पंचायतों को बड़ी राशि मंज़ूर होती है। इसका कितना सदुपयोग होता है, यह गड़बड़ी के दर्ज मामलों से पता लगाया जा सकता है। तो क्या माना जाए कि संशोधन पंचायतों में भ्रष्टाचार पर कुछ अंकुश लगाने के लिए किया गया है। सरपंच इसे अपनी ईमानदारी पर सीधा हमला मानते हैं। वह कहते हैं कि नये क़दम से भ्रष्टाचार पैदा होगा, नये बिचौलिये आएँगे जिससे कमीशनख़ोरी को बढ़ावा मिलेगा। जब दो लाख रुपये से ज़्यादा काम ई-टेंडरिंग के ज़रिये होंगे, तो पंचायत और उनके प्रतिनिधियों की क्या भूमिका रह जाएगी। अधिकारियों का बेवजह हस्तक्षेप बढ़ेगा, जिससे पंचायती व्यवस्था की बुनियाद में ही सेंध लगेगी। सरपंचों की राय में पंचायत स्तर पर दो लाख रुपये के काम बहुत कम होते हैं, ज़्यादातर काम इससे बडी राशि के होते हैं, जो अब वह पहले की तरह नहीं कर सकेंगे। गाँव में किसी भी तरह के विकास कार्य की ज़िम्मेदारी पंचायत की होती है और इस लिहाज़ से वह इसके लिए जवाबदेह भी होता है पर नये क़दम से उसकी जवाबदेही एक तरह से ख़त्म करने का प्रयास किया जा रहा है।

पंचायत मंत्री देवेंद्र बबली इसे हरियाणा को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की दिशा में उचित क़दम मानते हैं। दो लाख रुपये से ज़्यादा के विकास कार्य अगर सरकारी पोर्टल पर ई-टेंडरिंग के ज़रिये होने लगेंगे, तो पंचायतों को इसमें क्या नुक़सान है। सब काम सरकार की नज़र में रहेगा, इससे पंचायती राज व्यवस्था को किसी तरह का कोई नुक़सान नहीं होगा। देवेंद्र बबली जननायक जनता पार्टी (जजपा) कोटे से मंत्री हैं, वे बिना अच्छे बुरे नतीजे के बेधडक़ बोल जाते हैं। सार्वजनिक मंच पर एक सरपंच के ख़िलाफ़ उनके गम्भीर आरोपों की ख़ूब आलोचना हुई।

जजपा अध्यक्ष अजय चौटाला ने भी उनके बयान को एक ही लाठी से सभी हाँकने वाला बताया; लेकिन बबली को शायद यह रास नहीं आया। वह अपरोक्ष तौर पर कह गये कि जिनका काम संगठन चलाना है, वे उसे चलाएँ, मंत्री और उन्हें क्या करना है, वे जानते हैं। सरपंच नरेंद्र कहते हैं कि मंत्री देवेंद्र बबली उनकी पंचायत के साथ भेदभाव कर रहे हैं। पंचायत में कोई बड़ा काम नहीं हुआ, बावजूद इसके उन पर तरह तरह के आरोप लगा रहे हैं। कुछ समय के लिए ई-टेंडरिंग फ़ैसले को रद्द करने साथ बबली को मंत्रिपद से बर्ख़ास्त करने की माँग भी उठी थी।

प्रदेश भर में जगह-जगह हो रहे आन्दोलन की वजह से राज्य सरकार पसोपेश में है। तीन कृषि क़ानूनों की तरह वह इसे तुरन्त प्रभाव से वापस लेने के फ़िलहाल तो मूड में नहीं है। बातचीत में किसी समिति के गठित करने और उसकी रिपोर्ट पर कार्रवाई का भरोसा देकर इसे कुछ समय के लिए टाला जा सकता है। सरकार की ओर से अभी तक इसे किसी भी सूरत में वापस न लेने जैसी कोई बात सामने नहीं आयी है, इससे यह उम्मीद लगती है कि बातचीत में कुछ ठोस ज़रूर निकल सकता है। एक-एक क़दम सरकार और सरपंच एसोसिएशन उठा सकते हैं। अभी तक सभी विकल्प खुले हैं।

दिल्ली के किसान आन्दोलन में भाकियू (चढ़ूनी) के गुरनाम सिंह ने आन्दोलन को अपरोक्ष तौर पर समर्थन दिया है। जब तक बातचीत नहीं होती, आन्दोलन का विस्तार होता जाएगा; जिसका राजनीतिक तौर पर भाजपा-जजपा को नुक़सान होगा। इसे दोनों दल अच्छी तरह समझते भी हैं। कांग्रेस तो चाहेगी कि आन्दोलन लम्बा चले और सरकार की किरकिरी हो, जिसका कुछ लाभ उसे ज़रूर मिलेगा। कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमंडल ने हरियाणा के राज्यपाल को इस पूरे मामले से अवगत करा कोई रास्ता निकलाने को कहा है। आन्दोलन को कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और इनेलो के अलावा कुछ ख़ास पंचायतों का भी समर्थन भी है। 

“लोकतंत्र में अपनी माँग के लिए आवाज़ उठाने का हक़ हर नागरिक को है। सरकार को सरपंचों की बात सुननी चाहिए। पंचायती राज व्यवस्था को और ज़्यादा मज़बूत करने की ज़रूरत है; लेकिन भाजपा-जजपा सरकार इसके प्रति ज़रा भी गम्भीर नहीं है। दो माह से आन्दोलन चल रहा है; लेकिन सरकार समझ रही है कि यह ऐसे ही ख़त्म हो जाएगा। सरकार को बातचीत का न्योता देकर बुलाना चाहिए, वरना स्थिति और भी विकट हो सकती है।’’

भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री, हरियाणा

“भाजपा-जजपा सरकार ने भ्रष्टाचार मुक्त राज्य बनाने की दिशा में अन्य क़दमों की तरह दो लाख रुपये से ज़्यादा के पंचायती विकास कार्यों के लिए ई-टेडरिंग व्यवस्था बनायी है। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही रहेगी, वहीं काम भी पहले के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से होंगे।’’

देवेंद्र बबली, विकास और पंचायत मंत्री, हरियाणा

झारखण्ड में लिखी जा चुकी चुनावी पटकथा

देश में 2024 के पूर्वाद्ध में लोकसभा चुनाव होगा। झारखण्ड का विधानसभा चुनाव भी नवंबर, 2024 तक होना है। चर्चा यह भी है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव सम्भवत: साथ ही हो जाए। जो भी हो, पर वर्ष 2024 चुनावी वर्ष होगा। इससे पहले पिछले दिनों राज्य में हुए रामगढ़ विधानसभा उपचुनाव का नतीजा वर्ष 2024 की पटकथा ज़रूर लिख गया है। इस उपचुनाव की पृष्ठभूमि में कहा जा सकता है कि भाजपा व आजसू (एनडीए) गठबंधन और झामुमो, कांग्रेस व राजद (यूपीए) महागठबंधन, दोनों को 2024 के लिए अपनी-अपनी रणनीति पर विचार करना होगा।

एनडीए ने महागठबंधन के जिस विजय रथ को रोका है, वह आगे भी रोकना चाहेगा। वहीं, महागठबंधन को अपनी हार के कारणों को तलाशना होगा, तभी वह दोबारा सत्ता पर क़ाबिज़ हो सकेगा। छोटे-से उपचुनाव को दोनों तरफ़ से 2024 का सेमीफाइनल ही माना गया। चुनाव प्रचार में दोनों तरफ़ से पूरी ताक़त झोंकी गयी थी। एनडीए की तरफ़ से तीनों पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा और रघुवर दास के अलावा आजसू प्रमुख सुदेश महतो, सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी समेत भाजपा और आजसू के तमाम नेता प्रचार के लिए उतरे।

वहीं महागठबंधन की तरफ़ से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, कांग्रेस प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर समेत राज्य सरकार के सभी मंत्री और अन्य नेताओं ने प्रचार में पूरी ताक़त झोंक दी। यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि इसके बाद भी आख़िर ऐसा क्या हुआ कि महागठबंधन का विजय रथ रोकने में एनडीए कामयाब रहा? एनडीए की रणनीति क्या रही? यूपीए कहाँ चूक गया? उसे क्यों अपनी सीट को गँवानी पड़ी?

एनडीए को मिली जीत

बीते महीने 27 फरवरी को रामगढ़ विधानसभा का उपचुनाव हुआ था और 3 मार्च को नतीजा आया। उपचुनाव में महागठबंधन को हार मिली। एनडीए ने आख़िरकार प्रदेश में जीत का स्वाद चखा। राज्य में हेमंत सोरेन सरकार का गठन 2019 में हुआ था। इसके बाद से अब तक प्रदेश में पाँच उपचुनाव हुए। रामगढ़ पाँचवाँ उपचुनाव था। पूर्व विधायक ममता देवी को एक मामले में सज़ा होने और सदस्यता जाने के कारण यह उपचुनाव कराना पड़ा। इससे पहले के चारों उपचुनावों में महागठबंधन ने जीत हासिल किया था। रामगढ़ उपचुनाव में आजसू (एनडीए) प्रत्याशी सुनीता चौधरी ने कांग्रेस (यूपीए) प्रत्याशी बजरंग महतो को 21,977 वोटों से हराया। यह जीत बहुत कुछ कह रही। इससे यूपीए और एनडीए दोनों को सबक़ मिल गया है।

रंग लायी दोस्ती

रामगढ़ में महागठबंधन की हार का सबसे पहला कारण रहा आजसू पार्टी और भाजपा का साथ आना। रामगढ़ विधानसभा सीट का इतिहास एनडीए के साथ रहा है। वर्ष 2005 से 2014 के बीच लगातार तीन बार यहाँ से एनडीए प्रत्याशी के रूप में आजसू पार्टी के चंद्रप्रकाश चौधरी ने जीत हासिल की थी। वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और आजसू अलग-अलग लड़ी। उस समय आजसू की सुनीता चौधरी को 71,038 वोट मिले थे।

भाजपा के रणजय कुमार को 31,787 वोट मिले थे। वहीं, कांग्रेस की ममता देवी को 99,442 वोट मिले थे। उन्होंने आजसू को 28404 वोट से हरा दिया था। यानी उस वक़्त ममता देवी के जीत का अंतर भाजपा और आजसू को मिलाकर कुल मत के योग से कम था। भाजपा और आजसू दोनों को गठबंधन नहीं करने के नुक़सान का एहसास हुआ और इस बार उपचुनाव में दोनों दल साथ मिलकर लड़े, जिसका परिणाम आशानुकूल रहा।

विश्वसनीयता पर सवाल

चुनावी आँकड़ों से इतर रामगढ़ में सत्ता विरोधी लहर का असर भी दिखा। सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए। हेमंत सोरेन सरकार ने 1932 के खतियान पर आधारित स्थानीयता विधेयक विधानसभा से आनन-फ़ानन में पारित कर राज्यपाल के ज़रिये केंद्र के पास भेजा; लेकिन राज्यपाल ने ही विधेयक वापस कर दिया। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लोगों के बीच इसे भाजपा का षड्यंत्र कहते रहे; लेकिन समझा नहीं पाये। क्योंकि विधानसभा से स्थानीयता आधारित विधेयक पारित करने के एक महीने पहले हेमंत सोरेन ने ख़ुद ही विधानसभा में बयान दिया था कि सन् 1932 का आधार बनाना कठिन है; यह क़ानूनी दाँव-पेच में फँस सकता है। इसके बाद अचानक विशेष सत्र बुलाकर विधेयक पारित करना लोगों के मन में संदेह घर कर गया कि इस मुद्दे पर केवल राजनीति हो रही है।

नाराज़ हैं युवा

हेमंत सोरेन प्रतिवर्ष पाँच लाख रोज़गार के वादे के साथ सत्ता में आये थे। झामुमो के घोषणा-पत्र में इसका ज़िक्र था। सरकार गठन को तीन साल बीते और केवल 857 नियुक्तियाँ ही हो सकीं। सरकार ने जो नियोजन नीति बनायी थी, वह उच्च न्यायालय से रद्द हो गयी। इसकी वजह से 13,000 से ज़्यादा नियुक्तियाँ रद्द हो गयीं। पिछले साल शीतकालीन सत्र के दौरान आक्रोशित युवाओं ने विधानसभा तक मार्च भी निकाला। रामगढ़ उपचुनाव की पूरी कैंपेनिंग के दौरान युवाओं की नाराज़गी और बेरुख़ी ज़ाहिर हो रही थी। इसका भाजपा और आजसू ने लाभ उठाया।

एनडीए ने भुनाये दो अहम मुद्दे

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी हेमंत सोरेन सरकार घिरी। साहिबगंज में हुए 1000 करोड़ के अवैध खनन मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ख़ुद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की पूछताछ का सामना करना पड़ा। उनके विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा इडी की गिरफ़्त में हैं। मुख्यमंत्री के क़रीबियों से पूछताछ चल रही है। रामगढ़ चुनाव में वोटिंग से महज़ दो दिन पहले ही ग्रामीण कार्य विभाग के चीफ इंजीनयिर वीरेंद्र राम के यहाँ इडी का छापा पड़ा। अरबों रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग का ख़ुलासा हुआ। पूछताछ में कई राजनेताओं और ब्यूरोक्रेट्स के इसमें शामिल होने की बात सामने आयी। एनडीएन ने इसे भुनाया। साथ ही विधि-व्यवस्था को भी $खूब उछाला।

महागठबंधन के नेताओं ने चुनाव प्रचार में भाजपा पर महिला को अपमानित करने और असंवेदनशील होने का आरोप लगाया। पूर्व विधायक ममता देवी को षड्यंत्र के तहत जेल भेजने की बात कही। कैंपेनिंग के दौरान ममता देवी को हुई सज़ा के ज़रिये सहानुभूति हासिल करने का प्रयास किया। महागठबंधन के नेता उनके दुधमुँहे बच्चे को रैलियों में लेकर आये। मासूम को न्याय दिलाने के नाम पर वोट माँगा; लेकिन जनता नहीं पिघली। वहीं, एनडीए ने दुमका का अंकिता और साहिबगंज में रेबिका पहाडिऩ हत्याकांड के अतिरिक्त दुमका, लिट्टीपाड़ा और गुमला में नाबालिग़ बच्चियों के साथ हुई गैंगरेप की वारदात को लेकर हेमंत सरकार को महिला सुरक्षा के मुद्दे पर भी बैकफुट पर कर दिया।

इतना ही नहीं, मतदान से एक दिन पहले रामगढ़ में आजसू नेता की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। मांडर में दिनदहाड़े 65 लाख रुपये की लूट हुई। इस तरह राज्य में क़ानून व्यवस्था ध्वस्त होने के कई मामलों को उठाकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया, जिसका लाभ एनडीए को मिला।

आगामी चुनाव में दिखेगा बदलाव

आजसू की विजेता नेत्री सुनीता चौधरी

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अमूमन देखा जाता है कि किसी भी उपचुनाव को न ही राजनीतिक दल और न ही जनता ज़्यादा तवज्जो देती है। दोनों तरफ़ से उदासीनता दिखती है। रामगढ़ उपचुनाव में ऐसा नहीं रहा। यहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष ने पूरी ताक़त झोंकी। जनता ने भी उपचुनाव में बढ़चढक़र हिस्सा लिया। वर्ष 2019 में हुए विधानसभा चुनाव के मुक़ाबले इस उपचुनाव में केवल तीन फ़ीसदी कम मतदान हुआ। सन् 2019 में 71.36 फ़ीसदी मतदान हुआ था, वहीं इस बार 67.96 फ़ीसदी लोगों ने वोट डाला। यह दिखाता है कि जनता ने 2024 के चुनाव के पहले एक झाँकी दिखा दी है। यूपीए और एनडीए दोनों को रणनीति बदलनी होगी। अगली बार भाजपा और आजसू अलग-अलग चुनाव लडऩे की ग़लती नहीं दोहराएँगी। क्योंकि केवल रामगढ़ विधानसभा सीट ही नहीं, कई ऐसी अन्य सीटें भी हैं, जहाँ दोनों के 2019 में भाजपा-आजसू के अलग-अलग चुनाव लडऩे का लाभ यूपीए को मिला था। वहीं एनडीए के पक्ष में एक बात और है कि बाबूलाल मरांडी की पार्टी झाविमो का भाजपा में विलय हो चुका है। इस बार झाविमो भी चुनाव मैदान में नहीं रहेगा। एनडीए अपनी वर्तमान रणनीति के तहत जनता के बीच मज़बूती से खड़ी दिख रही है। लिहाज़ा यूपीए को नये सिरे से रणनीति बनानी होगी, क्योंकि रामगढ़ उपचुनाव में सत्ता और युवा विरोधी विशेषणों को सिरे से नहीं नकारा जा सकता है।

राज्य का सबसे अहम मुद्दा 1932 खतियान आधारित स्थानीयता और नियोजन नीति है। ये दोनों ही अब तक फँसी हुई हैं। सत्तासीन यूपीए इस मुद्दे को भुना नहीं पा रही है। भ्रष्टाचार और विधि व्यवस्था के मुद्दे पर पहले से सरकार बैकफुट पर है। सत्तासीन यूपीए ने भी परिस्थिति को भाँप लिया है। निश्चित ही वह सत्ता में बने रहने के लिए रणनीति में बदलाव करेगा। इसलिए राजनीतिक जानकार राज्य में 2024 में होने वाले विधानसभा चुनाव में बहुत कुछ बदले रहने की उम्मीद जता रहे हैं।

शिवराज सरकार पर भर्तियों में घोटाले का आरोप

पिछले वर्ष 26 नवंबर, 2022 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार कोढ़ है। इसे पूरी तरह समाप्त करना ज़रूरी है। राज्य सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति है। जन-कल्याणकारी योजनाओं, विकास कार्यों, थानों में एफआईआर लिखे जाने और आपराधिक प्रकरणों पर कार्यवाही के मामलों में भ्रष्टाचार की प्रत्येक शिकायत या सूचना पर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ तत्काल कार्यवाही सुनिश्चित करें।’

अभी व्यापम घोटाले का मामला अभी तक अदालत में लंबित है, और मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार पर विभिन्न पदों पर हो रही नियुक्तियों में भ्रष्टाचार और अनियमितता के आरोप लग रहे हैं। मेडिकल कॉलेजों में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित पदों को भ्रष्टाचार करके अनारक्षित रूप से भरने के आरोप डॉक्टरों ने लगाये हैं। सीएम राइज स्कूल में भी अनियमित रूप से भर्ती करने के आरोप लग रहे हैं। अब ताज़ा मामला मध्य प्रदेश पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियम-2022 यानी पेसा क़ानून के तहत 89 आदिवासी विकासखण्डों में ज़िला और विकासखंड समन्वयक की नियुक्तियों में कथित भ्रष्टाचार मामले ने तूल पकड़ा है। मध्य प्रदेश के कई आदिवासी संगठनों एवं कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया है कि पेसा क़ानून के क्रियान्वयन एवं जागरूकता के लिए ज़िला और विकासखंड समन्वयक की नियुक्तियाँ नियमों से परे जाकर की गयी हैं।

इस सम्बन्ध में जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन ने प्रदेश अध्यक्ष इंद्रपाल मरकाम और कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रविराज बघेल के नेतृत्व में मध्य प्रदेश के विभिन्न ज़िलों एवं तहसील स्तर पर 11 मार्च, 2023 को राज्यपाल के नाम से ज्ञापन सौंपकर अपना विरोध दर्ज कराया। वहीं मध्य प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने प्रेसवार्ता कर आरोप लगाया कि पेसा अधिनियम समन्वयक भर्ती में भाजपा के रिश्तेदारों और कार्यकर्ताओं को $गलत तरीक़े से नियुक्ति दी गयी है।

क्या है मामला?

हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम-1996 के तहत मध्य प्रदेश पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) नियम-2022 बनाये एवं उन्हीं नियमों के क्रियान्वयन एवं जागरूकता फैलाने के लिए 89 आदिवासी विकासखण्डों में 20 ज़िला और 89 विकासखंड समन्वयक नियुक्त करने की घोषणा की गयी।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जनजातीय वर्ग के उत्थान के लिए पेसा नियम की जानकारी उन तक पहुँचाने, पेसा कोऑर्डिनेटर पर मुस्तैदी से कार्य करने के लिए पेसा समन्वयक और मोबलाइजर की ज़िम्मेदारी तय की। साथ ही पेसा नियम को निम्न स्तर तक ले जाने के लिए ज़िला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, पेसा समन्वयक और मोबलाइजर को मिलकर काम करने के निर्देश दिये।

सन् 2021 में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा 20 पेसा क़ानून ज़िला समन्वयकों और 89 विकासखंड समन्वयकों की भर्ती का विज्ञप्ति में कहा गया था कि 12वीं और बेचलर डिग्री की मेरिट के आधार पर अभ्यर्थियों का चयन होगा। मेरिट में 890 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए चुना गया। साक्षात्कार 9 फरवरी, 2022 से 12 फरवरी, 2022 के बीच होने थे; लेकिन 8 फरवरी को उद्यमिता विकास केंद्र (सेडमैप) ने एक सूचना जारी कर रद्द कर दिये गये। सूचना में कहा गया कि एमपी ऑनलाइन (रूक्कशठ्ठद्यद्बठ्ठद्ग) पोर्टल पर सूचना अपलोड है तथा आवेदकों द्वारा आवेदन में दी गयी ईमेल पर भी सूचना भेज दी गयी है।

इसमें कहा गया कि प्रथक से आगामी अवधि में होने वाले पेसा ब्लॉक कोऑर्डिनेटर हेतु साक्षात्कार की सूचना शॉर्टलिस्टेड आवेदकों को प्रथक से एमपी ऑनलाइन के माध्यम से भेजी जाएगी। लेकिन उक्त 890 अभ्यर्थियों को आगे साक्षात्कार, नियुक्ति या शुल्क वापसी के सम्बन्ध में कोई भी जानकारी नहीं मिली। यह मामला तब तूल पकड़ गया, जब सोशल मीडिया के माध्यम से ज़िला एवं विकासखंड समन्वयकों को तीन दिवसीय प्रशिक्षण दिये जाने की सूचना मिली, जिसमें पूर्व में साक्षात्कार के लिए चयनित अभ्यर्थियों को शामिल नहीं किया गया था। बल्कि पंचायती राज मंत्रालय ने एक आउटसोर्स एजेंसी एमपीसीओएन (रूक्कष्टह्रहृ) (केंद्र सरकार के उपक्रम) द्वारा एक वर्ष के उपबंध के तहत अस्थायी तौर पर ज़िला एवं विकासखंड समन्वयकों की नियुक्ति की गयी। इससे पूर्व में साक्षात्कार के लिए चयनित 890 अभ्यर्थी ख़ुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

भर्ती पर सवाल

एमपीसीओएन के ज़रिये नियुक्त ज़िला एवं विकासखंड समन्वयकों की भर्ती पर आदिवासी संगठन एवं विपक्षी नेताओं ने सवाल खड़े किये हैं। मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध आदिवासी नेता एवं मनावर से विधायक डॉ. हिरालाल अलावा ने कहा कि एक तरफ़ सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करती है और दूसरी तरफ़ भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है। 89 आदिवासी विकासखंडों में 20 पेसा क़ानून ज़िला समन्वयकों और 89 विकासखंड समन्वयकों की भर्ती में भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के युवाओं को चयनित कर प्रदेश सरकार ने हज़ारों आदिवासी युवाओं के साथ धोखा करते हुए फ़र्ज़ी नियुक्तियाँ की हैं। यह लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था पर हमला है। हमारी सरकार से माँग है कि इन नियुक्तियों को तुरन्त निरस्त कर पारदर्शी तरीक़े से भर्ती की जाए, अन्यथा हम इस भर्ती घोटाले के मामले को सडक़ से विधानसभा तक ज़ोरशोर से उठाएँगे।

जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन मध्य प्रदेश के अध्यक्ष इंद्रपाल मरकाम ने कहा कि पेसा समन्वयक भर्ती में अनियमितता सामने आयी है, जिसमें एक विशेष पार्टी एवं उससे जुड़े संगठनों के लोगों को नियुक्त किया गया है। जयस संगठन प्रदेश सरकार से माँग करती है कि इस भर्ती प्रक्रिया को तुरन्त निरस्त कर ज़िम्मेदार अधिकारियों एवं नेताओं पर कठोर कार्यवाही प्रस्तावित कर नये सिरे से पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया सुनिश्चित करे, अन्यथा जयस सहित प्रदेश के समस्त आदिवासी समाज भीषण जन आन्दोलन करने पर मजबूर होंगे, जिसकी ज़िम्मेदारी राज्य प्रशासन की होगी।

मध्य प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया ने कहा कि आदिवासियों के हित में पेसा कोऑर्डिनेटर भर्ती योजना एक बड़े घोटाले में बदल गयी है। 89 आदिवासी बाहुल्य ब्लॉक में पेसा क़ानून के प्रचार-प्रसार के लिए भाजपा सरकार ने सेडमैप के ज़रिये आवेदन मँगाये थे। आवेदकों से 500 से 600 रुपये वसूले गये। सरकार को एक करोड़ रुपए राजस्व मिला। आवेदकों की मेरिट लिस्ट बनी। 890 आवेदकों को इंटरव्यू के लिए बुलाया; लेकिन इंटरव्यू कैंसिल करके एमपीकॉन के ज़रिये आउटसोर्स से गोपनीय तरीक़े से एक विचारधारा विशेष से जुड़े 89 ब्लॉक और 20 डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर के पद भर दिये गये। इन चयनित लोगों को सरकारी ख़ज़ाने से जहाँ 25,000 रुपये मासिक वेतन ब्लॉक कोऑर्डिनेटर को और 45,000 रुपये डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर को दिये जाएँगे। ये चयनित लोग पेसा क़ानून का प्रचार करने के बजाय बीजेपी के चुनावी बूथ मैनेजमेंट का काम करेंगे। भाजपा सरकार ने शिक्षित बेरोज़गार युवाओं के साथ छल किया है। 109 नियुक्तियों में एक भी महिला को शामिल नहीं किया गया है।

वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के उपसचिव लक्ष्मणसिंह मरकाम ने पलटवार करते हुए पेसा क़ानून क्रियान्वयन में व्यवधान पैदा करने वाले इसे विपक्ष का दुष्प्रचार बताया। मरकाम ने कहा कि पेसा क़ानून ज़िला समन्वयक को 27,500 रुपये मिलेंगे, न कि 45,000 रुपये। पेसा क़ानून क्रियान्वयन के लिए पेसा क़ानून नियम बनाये जाने के पहले जारी विज्ञप्ति को सेडमैप द्वारा निकाला गया था। तकनीकी कारण से बिना नियम नियुक्ति सम्भव नहीं थी। विज्ञप्ति के पैरा-6 पर स्पष्ट था कि बिना कारण बताये यह विज्ञप्ति निरस्त की जा सकती है। पंचायती राज संचालनालय द्वारा अपने 03/06/2022 के पत्र द्वारा विज्ञप्ति को निरस्त करने की सूचना सभी को दे दी गयी। कुल 109 आदिवासी को अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया है, ये पद जब स्थायी भरे एमपीपीएससी / कर्मचारी चयन आयोग से भरे जाएँगे, तो एसटी को केवल 21 पद मिलेंगे। बाक़ी अन्य को; तो क्या कुछ आदिवासियों को थोड़े दिन कॉन्ट्रैक्ट पद मिलने से सबको दिक़्क़त है?

एक तरफ़ उप सचिव लक्ष्मण सिंह मरकाम का कहना है कि पेसा क़ानून समन्वयक के सभी 109 पदों पर आदिवासी अभ्यर्थियों की भर्ती की गयी है, जो आदिवासियों के हित में है। वहीं विपक्षी पार्टी कांग्रेस एवं आदिवासी संगठनों का आरोप है कि बेरोज़गार आदिवासी युवाओं को नज़रअंदाज़ कर भाजपा एवं उससे जुड़े संगठनों के युवाओं को चयनित किया गया है, जो पेसा क़ानून समन्वयक के बजाय भाजपा के चुनावी बूथ मैनेजमेंट का काम करेंगे। जबकि पूर्व में साक्षात्कार के लिए चयनित 890 अभ्यर्थी इस प्रक्रिया में ख़ुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

पेसा क़ानून समन्वयकों की आउटसोर्सिंग द्वारा की गयी नियुक्ति प्रक्रिया पर अनियमितता एवं भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बावजूद भी शिवराज सरकार इस भर्ती को रद्द करने के मूड में नहीं दिखायी दे रही है। अब देखना यह होगा कि इस संदर्भ में मध्य प्रदेश के आदिवासी संगठनों एवं विपक्षी पार्टियों की आगे की रणनीति क्या होगी?

यूनिक कोड से होगी भूमि की पहचान

उत्तर प्रदेश में भूमि की धोखाधड़ी रोकने की मुहिम स्वामित्व योजना में तीव्रता लायी जा रही है। इससे भूमाफ़िया एवं अतिक्रमणकारियों की पहचान हो सकेगी तथा उनके द्वारा हथियायी गयी भूमि को वापस लिया जा सकेगा। इस धोखाधड़ी एवं अतिक्रमण को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार केंद्र सरकार की स्वामित्व योजना के तहत भूखंडों का 16 अंकों का एक यूनिक आईडी नंबर जारी कर रही है।

माना जा रहा है कि इससे भूमि की क्रम संख्या तय होगी एवं भूमि किसकी है? यह भी आसानी से पता चल सकेगा। भूमि के स्वामी का पता चलते ही भूमि पर अवैध रूप से अपने क़ब्ज़े में करने वालों के हाथ से उसे निकालने में आसानी होगी।

गाटा संख्या की जगह यूनिक कोड

उत्तर प्रदेश में अब तक भूमि की पहचान गाटा संख्या से होती थी। अब योगी आदित्यनाथ सरकार के भूराजस्व विभाग द्वारा भूमि के 16 अंकों के यूनिक कोड बनाने से गाटा संख्या से होने वाली पहचान को एक नये प्रकार से मोबाइल पर भी देखा जा सकेगा, जिससे भूमि क्रेताओं को धोखाधड़ी से बचने में मदद मिल सकेगी।

इस यूनिक कोड को देने से पहले पूरे उत्तर प्रदेश में भूमि के हर गाटे की पहचान हो सकेगी एवं उस भूमि के असली स्वामी के बारे में जानकारी मिल सकेगी। इसके अतिरिक्त भूमि के सरकारी या निजी होने की भी पहचान आसानी से हो सकेगी।

आसानी से मिलेगी जानकारी

इस 16 अंकों के यूनिक कोड का लाभ ये होगा कि प्रदेश के लोग घर बैठे मोबाइल पर केवल भूमि की एवं उसके मालिक की सही सही जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। इसके लिए भूराजस्व विभाग की वेबसाइट पर जाकर 16 अंकों का यूनिक कोड दर्ज करना होगा।

भूमि के गाटे का यूनिक कोड के एक से लेकर छ: अंक गाँव की जनगणना के आधार पर होंगे। 7 से 10 तक भूखंड की गाटा संख्या के होंगे। 11 से 14 अंक भूमि के विभाजन के लिए होंगे। 15 से 16 अंक भूमि की श्रेणी के लिए निर्धारित होंगे। इससे किसी भूखंड की पहचान आसानी से हो सकेगी एवं वो आवासीय, कृषि, एवं व्यवसायिक भूमि के रूप में चिह्नित हो सकेगा।

क्या रुक सकेगी धोखाधड़ी?

योगी आदित्यनाथ सरकार का दावा है कि इन 16 अंकों के यूनिक कोड के माध्यम से विवादित भूमि के फ़र्ज़ी बैनामे नहीं हो सकेंगे। किसी की भूमि कोई दूसरा व्यक्ति नहीं हथिया सकेगा। सभी राजस्व गाँवों में अवस्थित भूखंडों को व्यवस्थित किया जा सकेगा।

इसके अतिरिक्त अवैध फ़िब्ज़ें को भी चिह्नित किया जा सकेगा, ताकि उन्हें मुक्त कराया जा सके। मगर प्रश्न ये उठता है कि जो भूमि भूमाफ़िया एवं दबंगों ने पहले ही अतिक्रमण करके उस पर अपना आधिपत्य कर रखा है अथवा उसे बेच दिया है। अगर जाँच की जाए, तो ऐसे लाखों लोग प्रदेश में निकलेंगे, जो अवैध फ़िब्ज़ें करके सरकारी या कमज़ोर लोगों की भूमि अपने नाम करा चुके हैं।

सरकार का कहना है कि इस भूमि के यूनिक कोड योजना के तहत भूमि के नये एवं पुराने स्वामी का भी नाम दर्ज होगा। मगर प्रश्न यह उठता है कि अगर भूमि धोखाधड़ी करके कई-कई बार बिक चुकी है, तो फिर उसकी पहचान से क्या लाभ होगा? क्या भूराजस्व विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से बेची गयी अथवा किसी को चंद पैसों के लालच में सौंपी गयी सरकारी भूमि योगी आदित्यनाथ सरकार वापस ले सकेगी? क्या भूमि की नाप-कूत में की गयी गड़बड़ी में सुधार हो सकेगा?

भौजीपुरा के कमुआँ गाँव के बुजुर्ग रामप्रसाद बताते हैं कि अब तो गाँवों में सरकारी भूमि बची ही नहीं है। अब से कोई 20-30 वर्ष पहले हर गाँव में सरकारी भूमि के पौबारह थे। इस भूमि को ग्राम समाज की भूमि कहा जाता था। उस भूमि में से कुछ भूमि तो भूमिहीनों को और निम्न वर्ग के लोगों को बाँट दिया गया कुछ भूमि पर सरकारी भवन, पंचायत घर एवं स्कूल आदि बन गये, मगर का$फी भूमि दलालों, भ्रष्ट लेखपालों एवं भ्रष्ट क़ानूनगो के माध्यम से पैसे वाले लोगों ने भी हथिया लिया। अब गाँवों में सरकारी भूमि बची ही नहीं है।

पहले से ही चल रहा काम

केंद्र सरकार की पहल के बाद उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने सन् 2021 में ही स्वामित्व योजना पर प्रदेश् स्वामित्व योजना  में कार्य शुरू कर दिया था। मगर तब इस योजना के तहत कार्य पूरा नहीं हो सका, क्योंकि चुनावों के निकट आ जाने के चलते इस पर होने वाला कार्य रुक गया। अब उत्तर प्रदेश में इसकी दोबारा चर्चा है। मगर अब गाटा संख्या के आधार पर इसकी जगह भूमि के किसी टुकड़े का एक यूनिक कोड दिया जा रहा है। स्वामित्व योजना पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के निर्देशों पर अन्य राज्यों में कार्य होना है।

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के आँकड़ों की मानें, तो 2021 तक देश के 3,04,707 सम्पत्तियों के कार्ड जारी किये जा चुके थे। इनमें देश के 35,049 गाँवों का सर्वे ड्रोन द्वारा किया जा चुका था। इन गाँवों के सभी भूखंडों का यूनिक कोड तैयार किया जा रहा है, ताकि भूखंडों एवं लोगों की सम्पत्ति का वर्गीकरण हो सके।

विदित हो कि पूरे देश में 6,55,959 गाँव हैं, जिसमें से 2021 तक 5,91,421 गाँवों के रेवेन्यू रिकॉर्ड का डिजिटाइजेशन हो चुका था एलं 53 प्रतिशत नक्शा भी डिजिटल हो चुका था। इसके अतिरिक्त देश के 13,105 गाँवों में भूलेखों का डिजिटाइजेशन इंटरनेट पर उपलब्ध हो चुका था। सन् 2021 में 51,433 गाँव बचे थे, जिनमें से उत्तर प्रदेश में बचे गाँवों पर दोबारा काम चलने लगा है। मगर सन् 2021 में भूमि रिकॉर्ड डेटाबेस का कंप्यूटरीकरण के लिए 64,538 गाँवों का भूखंड रिकॉर्ड डिजिटल होना शेष था।

स्वामित्व योजना एवं उसके लाभ

स्वामित्व योजना का आरम्भ 24 अप्रैल, 2020 को केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय द्वारा किया गया था। 11 अक्टूबर, 2020 को इस योजना के तहत पहली बार भूमि कार्ड वितरित किये गये थे। इस योजना के पीछे की मंशा गाँवों में रहने वालों को उनके घरों की सम्पत्ति के कार्ड जारी करना है। केंद्रीय सूत्रों की मानें, तो को 2024 तक इस योजना को पूरा करने का प्रयास केंद्र सरकार कर रही है। उत्तर प्रदेश राजस्व विभाग ने योगी आदित्यनाथ सरकार के निर्देशों के अनुरूप इस योजना पर दोबारा कार्य आरम्भ कर दिया है।

ग्रामीणों को मिलेगा घरों का स्वामित्व

अभी तक गाँवों में बसे लोगों के पास उनके घरों की रजिस्ट्री अथवा कोई अन्य कोई काग़ज़ नहीं होता। इसका मुख्य कारण गाँवों में सदियों से चली आ रही बसावट है, जिसके चलते घरों की रजिस्ट्री अथवा अन्य कोई काग़ज़ उन लोगों के पास नहीं होते, जो पुश्तैनी तौर पर उन घरों में रहते आये हैं।

योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश

अब इस योजना से राजस्व विभाग गाँवों में बने घरों की सम्पत्ति को स्वामित्व प्रदान करने में लगा है। इससे भूमि के विवाद सुलझाने में आसानी होगी। मगर इससे विवाद भी बढ़ सकता है। विवाद तब हो सकता है, जब उसी सम्पत्ति अथवा घर के एक से अधिक दावेदार सामने आते हैं। उत्तर प्रदेश राज्य रेवेन्यू बोर्ड इस भूमि रिकॉर्ड, खसरा डॉक्यूमेंट्स और खतौनी नंबरों की खोज करके एक ऑनलाइन पोर्टल पर डाल रहा है। प्रक्रिया को और अधिक बेहतर बनाने के लिए पोर्टल अब 13 कॉलम के बजाय 19 कॉलम में खतौनी का विवरण देगा। जब सभी भूखंडों का यूनिक कोड जारी हो जाएगा, तब हर भूखंड की जानकारी आसानी से प्राप्त की जा सकेगी। लेखपाल राजेश ने बताया कि अगर ये प्रक्रिया ठीक से लागू हो गयी, तो इसके कई लाभ होंगे एवं सम्पत्तियों के स्वामियों को उनकी भूमि छिनने एवं उस पर अतिक्रमण होने का डर नहीं रहेगा। मगर इस प्रक्रिया में अभी कई अड़चनें भी हैं, जिन्हें सुलझाने में देरी लगेगी। लेखपाल राजेश ने बताया कि इस योजना के फलीभूत होने पर भूमि की धोखाधड़ी रुक जाएगी।

प्रश्न यह उठता है कि भूमि विवाद को लेकर जो मुफ़िदमे वर्तमान में चल रहे हैं, उनका विवाद सुलझे बिना यूनिक कोड कैसे दिया जा सकेगा? क्योंकि दो दावेदारों में यूनिक कोड तो एक ही दावेदार के नाम की भूमि दिखाएगा। साथ ही जिन लोगों ने अपनी भूमि किसी के द्वारा हथियाने की रिपोर्ट दर्ज करा रखी है, उनका क्या होगा? ऐसे ही और भी प्रश्न हैं, जिनके उत्तर ढूँढे जाने चाहिए।

अब पर्यटकों को भी लुभाएगा शिक्षा का हब कोटा

स्थापत्य और शिल्प की दृष्टि से अतुलनीय चंबल रिवर फ्रंट ने देश की पुरातन सांस्कृतिक चेतना और परम्पराओं को साकार करते हुए असम्भव को सम्भव बना दिया है। शिल्प और लालित्य की दृष्टि से यह अद्भुत और विकास के पैमाने पर दिलकश अफ़साना बन गया है। राज्यपाल कलराज मिश्र ने अपने कोटा प्रवास में चौंधियाई आँखों से इसे नितांत प्रेरक दास्तान बताया। कोटा सिटी पार्क की तारीफ़ में भावुकता भरे शब्दों में मिश्र ने कहा कि इतना अद्भुत और अनुपम सिटी पार्क राजस्थान ही नहीं, देश में भी दूसरा नहीं होगा।

शाब्दिक अभिव्यंजना को धार देते हुए उन्होंने कहने में संकोच नहीं किया कि यहाँ अद्भुत शिल्प से मानव और प्रकृति के संतुलन को प्रदर्शित किया गया है। यह उद्यान केवल कोटा ही नहीं, अपितु राजस्थान की पहचान बनेगा। आज जब ज़माना बदल रहा है, विकास को दिलचस्प अंदाज़ में गढऩा होता है। तो करिश्माई कीमियागरों में धारीवाल काफ़ी आगे नज़र आते हैं। उन्होंने सौन्दर्य संवर्धन के अथक प्रयास में जिस तरह से ‘मोन्यूमेंटस’ को गढ़ा है, यह हमारी संस्कृति से जुड़ाव रखने और अपणायत को बचाये रखने में बेहतरीन सेतु का काम करेंगे।

धारीवाल स्पष्ट करते हैं कि अगर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत और थाती को बचा नहीं पाये, तो पहचान खो बैठेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि जिस तरह से शहरों में विकास के नवाचार का उजाला फैल रहा है, वह 21वीं सदी में भारत की पहचान बनाएँगे। उन्होंने कहा कि शहरी विकास में शहरी नियोजन और शहरी शासन, दोनों की बड़ी भूमिका है।

इस भूमिका के निर्वाह में राजस्थान के नगरीय विकास मंत्री शान्ति धारीवाल किस क़दर मैदान मार चुके हैं? तो निश्चित है कि प्रधानमंत्री को इस विजन से अभिभूत होना पड़ेगा। प्रधानमंत्री जब विद्यार्थियों को तनाव मुक्त रहकर शिक्षार्जन का मशविरा देते हैं, तो कोचिंग स्टूडेंटस को राज्यपाल का यह संदेश इसकी पुष्टि करता है कि शिक्षा के लिए देश भर में छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध कोटा में कोचिंग के लिए हर साल लाखों बच्चे आते हैं, किन्तु शैक्षिक दबाव में तनावग्रस्त होकर आत्मघात करने की कोशिश भी कर बैठते हैं। सिटी पार्क उनके लिए सुकून की छाँव साबित होगा। यहाँ शैलेन्द्र का यह गीत बहुत कुछ कह देता है कि इठलाती हवा, नीलम सा गगन, कलियों में है $खामोशी की नमी, ऐसे में भी क्यों बेचैन है दिल? सिटी पार्क इसी कमी को पूरा करेगा।

शान्ति धारीवाल, मंत्री, राजस्थान सरकार

सूरत-ए-हाल को एक्स-रे रिपोर्ट की मानिंद बयाँ करें, तो ख़ुदकुशी के मंसूबों से निजात दिलाकर कोटा को बेपनाह मोहब्बत का शहर बनाने की धारीवाल की कोशिशों को जिस तरह राज्यपाल ने मुहरबंद किया है, उन्हें और ज़्यादा मक़बूलियत देता है। ऑक्सीजोन का एक एक दृश्य प्रकृति से जोडऩे का दायित्व निभाता लगता है। सिटी पार्क में मॉन्यूमेंट्स की मौज़ूदगी प्रकृति के साथ हमारे भावनात्मक रिश्ते को दर्ज करती नज़र आती है। पुरातत्वेत्ताओं का कहना है कि ताइवान के सबसे बड़े शहर न्यू ताइपे सिटी में स्थित येल्यू जिओपार्क समुद्रतट पर भूमि का एक बड़ा हिस्सा समुद्र में निकलने से बना है। भू-विज्ञानियों का कहना है कि यहाँ पर प्राकृतिक रूप से बनी अनेक संरचनाएँ हैं, जो दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करती है। लेकिन यह बात तब निरर्थक हो जाती है, जब यहाँ क़ुदरत के साथ भावनात्मक रिश्ता दूर दूर तक नज़र नहीं आता।

कोटा का सिटी पार्क देखने के बाद वैल्यू सिटी पार्क के लिए वाह की जगह आहा निकलती है। धारीवाल ने राज्यपाल के साथ हाऊसबोट में बैठकर हैरतअंगेज़ अंदाज़ में घुमा-घुमाकर रिवर फ्रंट को क़रीब से दिखाया राज्यपाल को बेसाख़्ता कहना पड़ा- ‘कोटा रिवर फ्रंट के मुक़ाबले में कोई और फ्रंट कहीं नहीं ठहरता। इस इलाक़े में राज्यपाल मिश्र बोटिंग का एक अनूठा अनुभव लेकर लौटे, यहाँ गोस्वामी तुलसीदास की यह पंक्ति याद आ जाती है, गिरा अनयन, नयन बिनु बनी।’ सघन हरियाली के बीच मोटर बोट में चलते हुए प्रकृति के सौंदर्य से राज्यपाल किस क़दर अभिभूत हुए कि उन्हें तुलसीदास का दोहा स्मरण हो गया।

बेशक कोटा रिवर फ्रंट धारीवाल के सोच को साकार करने वाली श्रेष्ठतम कृति है। इसका सौंदर्य मानो सौंदर्य का प्रतिमान है। फ़िलहाल इसका ज़िक्र यहीं तक। अलबत्ता इसका विस्तृत बखान आगे के पन्नों पर केंद्रीय आवासन और शहरी मंत्री हरदीप सिंह पुरी बेशक आज दुहाई देते हैं कि शहरीकरण को सतत विकास का उत्प्रेरक बनाना होगा। लेकिन कितने प्रदेश ऐसा कर पाये?

कलराज मिश्र, राज्यपाल, राजस्थान

जबकि पुरी यहाँ तक कह चुके हैं कि हम क़ानूनी तंत्र और शासन के ढाँचे पर पुनर्विचार करें, ताकि रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। जबकि फ़िलहाल तो लक्ष्य संधान का काम सिर्फ़ राजस्थान के कोटा में ही हो सका है और जो हुआ है, उस पर एक शोर जायज़ है- ‘फ़रहत की खिली कलियाँ, पखेरुओं की सदा से भरी गलियाँ दिलबर से कहा हमने, छोडि़ए रंगबलियाँ।

प्रसंगवश श्रीकृष्ण का उद्धव ज्ञान समझें, तो चमत्कारों से भरे विराट संसार की रचना के लिए श्रद्धा और धैर्य दोनों आवश्यक है। कहने की ज़रूरत नहीं कि धारीवाल इस पर कितने खरे उतरे हैं। प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्र के आख्याता देवदत्त पटनायक का कहना है कि कुरुक्षेत्र युद्ध को लेकर श्रीकृष्ण ने अपने साथी उद्धव को सहज भाव से सब कुछ बताया, तो उद्धव का प्रश्न था कि आप इतने शान्त कैसे रह सकते हैं? इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें जो गीता बतायी, उसे हंस गीता कहते हैं। श्रीकृष्ण ने उन्हें हंस जैसा बनने की सीख दी, जो पानी में तैरता है; किन्तु पानी को पंखों पर नहीं चिपकने देता है। धारीवाल ने हंस नीति का अनुगमन करते हुए श्रेष्ठतम् कृति की रचना किन्तु आक्षेपों को हावी नहीं होने दिया।

अतिथि देवो भव: हमारी सांस्कृतिक परम्परा रही है। किसी भी अतिथि की अगवानी करते हुए हम प्रसन्नता व्यक्त करते हैं कि अहोभाग्य कि आप हमारे घर आये। किन्तु बदलते कोटा को देखकर राज्यपाल मिश्र के मुँह से बेसाख्ता निकला- ‘मेरा अहोभाग्य कि मैं यहाँ आ गया।’ उनका बेलाग कथन था- ‘यहाँ जो सौन्दर्यकरण के कार्य हुए हैं, उनमें किसी तरह का बनावटीपन नहीं है। यही इसकी सुंदरता है। आबादी के विस्तार के साथ यहाँ पयार्वरण आवश्यकताओं की भी पूर्ति की गयी है। शिल्प और धरोहर के आलोक में यहाँ बहुत कुछ महत्त्वपूर्ण है।’

विश्वस्तरीय स्मारक एवं नौका में बैठकर चंबल रिवर फ्रंट पर बने विभिन्न घाटों को निकट से देखकर उन्होंने कहा कि इसके प्राचीन सौन्दर्य को बरकरार रखते हुए अत्याधुनिकता का समावेश किया गया है। राज्यपाल ने कहा कि नयी संस्कृति का शहर कोटा करवट बदल रहा है। कोचिंग के बाद अब यह शहर पर्यटन से पहचान बनाएगा। अपने अनुभवों को शाब्दिक अभिव्यक्ति देते हुए उन्होंने कहा जीर्ण-शीर्ण और विलुप्त होती हमारी प्राचीन धरोहर को लौटाने का यह अभिनव प्रयास है। उन्होंने चर्मण्यवती के एतिहासिक उद्भव का बखान करते हुए कहा कि महाकवि कालिदास ने मेघदूत में इस नदी का बहुत सुंदर वर्णन करते हुए कहा है कि वन संस्कृति में तीर्थ यात्रा से जुड़ी यह पुण्य सलिला है।

मिश्र ने कहा कि आज जब सबसे ज़्यादा प्रहार हमारी संस्कृति पर ही हुआ है। ऐसे में चंबल रिवर फ्रंट इसकी पुनस्र्थापना का सार्थक प्रयास माना जाएगा। लोकनृत्य करती बालाओं के नृत्य से सम्मोहित हुए मिश्र ने कहा कि लोकनृत्य का प्रदर्शन को समझें, तो यह हमारे विचारों को अभिव्यक्ति देने का एक सार्थक माध्यम है। ज़ाहिर है इससे लोक संस्कृति को संबल मिलेगा।

फुटबॉल के गोल्डन ब्वॉय मेस्सी

अपने खेल से उन्होंने फुटबॉल को भक्ति जैसा बना दिया

अर्जेंटीना के महान् खिलाड़ी लियोनल आंद्रेस मेसी फुटबॉल में सोने-सी चमक वाली प्रतिभा के स्वामी हैं। विश्व फुटबॉल में सुनहरी बूट (गोल्डन बूट) से सम्मानित हुए हैं और मार्च के पहले हफ़्ते उन्होंने अपनी राष्ट्रीय टीम के फीफा वल्र्ड कप 2022 जीतने वाले साथियों और स्पोर्ट स्टाफ को 24 कैरेट सोने से जड़े आई फोन गिफ्ट किये। कह सकते हैं कि मेस्सी दिल भी सोने-सा रखते हैं। उनकी प्रतिभा पुरस्कारों की मोहताज नहीं; लेकिन हाल में उन्हें किलियन एम्बाप्पे और करीम बेंजेमा जैसे दिग्गजों पर तरजीह देते हुए फीफा (फुटबॉल संघों का अंतरराष्ट्रीय महासंघ) का 2022 का सर्वश्रेष्ठ पुरुष खिलाड़ी पुरस्कार मिलने से ज़ाहिर हुआ है कि फुटबॉल में मेस्सी उस असाधारण प्रतिभा के खिलाड़ी हैं, जो मैदान में अपनी कला से खेल को भक्ति जैसा बना देने की क्षमता रखते हैं। इसी भक्ति की भावना से फुटबॉल प्रेमियों ने उन्हें फुटबॉल के भगवान का दर्जा दे दिया है।

लियोनल आंद्रेस मेसी

मेस्सी के क़ब्ज़े में बॉल आते ही वे किसी दूसरी दुनिया के मानव दिखने लगते हैं। चपलता ऐसी कि कब विरोधी खिलाडिय़ों की रक्षा पंक्ति को भेदकर गोलपोस्ट के क़रीब पहुँच जाते हैं, पता ही नहीं चलता। और उनकी सबसे बड़ी ख़ूबी यह नहीं कि वे ख़ुद ही गोल करना चाहते हैं। बहुत चतुराई से वे उस ऐंगल में खड़े खिलाड़ी को पास दे देते हैं, जहाँ से गोल करने की अधिकतम संभावना हो। अर्थात् उनकी आँखें हर तरफ़ रहती हैं और यह बात हमेशा उनके दिमाग़ में रहती है कि यह एक गोल उनकी टीम को जीत के मंच पर खड़ा कर सकता है। ड्रिवल करते हुए जब वे गोल पोस्ट की तरफ़ बढ़ते हैं, तो ऐसा लगता है कि फुटबॉल मानों उनके पाँव से चिपक गयी हो।

उन्हें कुछ लोग बार्सिलोना का जादूगर भी कहते हैं। बचपन में मेस्सी ग्रोथ हार्मोन के शिकार थे और कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन वे इतने महान फुटबॉलर हो जाएँगे। जुनून तो उन्हें बचपन से ही था फुटबॉल का। अपनी कप्तानी में मेस्सी ने 2022 में अर्जेंटीना को 37 साल बाद फीफा विश्व कप में जीत भी दिला दी, जिसके बाद निश्चित ही उनका क़द और ऊँचा हो गया है। मेस्सी ने अर्जेंटीना को वल्र्ड कप चैंपियन बनाने के अलावा 2021-22 में देश और क्‍लब के लिए कुल 49 मैचों में 27 गोल दाग़े।

मेस्सी की पहचान उनकी गति, सटीकता, ड्रिब्लिंग कौशल और खेल के प्रति समर्पण से है। दुनिया के किसी भी एथलीट को अपने फिटनेस के लिए कई त्याग करने पड़ते हैं और मेस्सी को भी करने पड़े हैं। उनकी दिनचर्या जानने वालों के मुताबिक, मेस्सी मेसी वर्कआउट सेशन में मुख्य रूप से गति और चपलता पर ध्यान देते हैं। इसके लिए वे कई तरीक़े अपनाते हैं, जिसमें एक रस्सी कूदना भी शामिल है। उनके दिन की शुरुआत ढेर सारा पानी पीने से होती है। चीनी, तले खाद्य पदार्थ और प्रसंस्कृत काब्र्स से परहेज़ करने वाले मेस्सी की पसंदीदा रेसिपी रूट वेजीज के साथ भुना हुआ चिकन है।

निश्चित ही मेस्सी दुनिया में फुटबॉल सीखने वाले लाखों युवाओं के आदर्श बन चुके हैं। मार्च में उन्हें फीफा ने वर्ष 2022 का सर्वश्रेष्ठ पुरुष खिलाड़ी चुना। यह दूसरी बार है, जब मेसी को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार प्रदान किया गया है। पहली बार उन्हें 2019 में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया था। याद रहे क़तर में 2022 का विश्व कप जीतने वाली मेस्सी की चैंपियन टीम अर्जेंटीना को फीफा के इस समारोह में चार ट्राफियाँ  मिलीं, जिनमें टीम के मुख्य कोच लियोनेल स्कालोनी सर्वश्रेष्ठ कोच, एमिलियानो मार्टिनेज सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर और अर्जेंटीना के प्रशंसकों को पहली बार सर्वश्रेष्ठ प्रशंसक का अवॉर्ड मिला।

समारोह में मेस्सी सर्वश्रेष्ठ पुरुष खिलाड़ी पुरस्कार से नवाज़े गये। निश्चित ही एक बड़े खिलाड़ी के होने से पूरी टीम को लाभ मिलता है और मेस्सी ने इसे साबित किया है। हालाँकि यह आलेख मेस्सी को समर्पित है, फिर भी यदि हम इस समारोह में स्पेन की अलेक्सिया पुटेलस को सर्वश्रेष्ठ फीफा महिला खिलाड़ी चुने जाने का ज़िक्र न करें, तो नाइंसा$फी होगी। दिलचस्प यह है कि उन्होंने लगातार दूसरी बार यह पुरस्कार जीता।

ब्राजील के दिग्गज दिवंगत पेले को एक वीडियो श्रद्धांजलि के साथ यह समारोह शुरू हुआ और उनकी पत्नी मर्सिया आओकी को दिग्गज फुटबॉलर रोनाल्डो और राष्ट्रपति इन्फेंटिनो ने विशेष पहचान पुरस्कार भेंट किया। समारोह में इंग्लैंड की मैरी एप्र्स सर्वश्रेष्ठ महिला गोलकीपर, इंग्लैंड टीम की सरीना विगमैन सर्वश्रेष्ठ महिला कोच बनीं, जबकि फेयर प्ले अवॉर्ड जॉर्जिया के लुका लोचशविली के हिस्से रहा। मेस्सी की पहचान उनकी गति, सटीकता, ड्रिब्लिंग कौशल और खेल के प्रति समर्पण से है। दुनिया के किसी के किसी भी एथलीट को अपने फिटनेस के लिए कई त्याग करने पड़ते हैं और मेस्सी को भी करने पड़े हैं। उनकी दिनचर्या जानने वालों के मुताबिक, मेस्सी मेसी वर्कआउट सेशन में मुख्य रूप से गति और चपलता पर ध्यान देते हैं। इसके लिए वे कई तरीक़े अपनाते हैं, जिसमें एक रस्सी कूदना भी शामिल है। उनके दिन की शुरुआत ढेर सारा पानी पीने से होती है। चीनी, तले खाद्य पदार्थ और प्रसंस्कृत काब्र्स से परहेज़ करने वाले मेस्सी की पसंदीदा रेसिपी रूट वेजीज के साथ भुना हुआ चिकन है।

निश्चित ही मेस्सी दुनिया में फुटबॉल सीखने वाले लाखों युवाओं के आदर्श बन चुके हैं। मार्च में उन्हें फीफा ने वर्ष 2022 का सर्वश्रेष्ठ पुरुष खिलाड़ी चुना। यह दूसरी बार है जब मेसी को सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार प्रदान किया गया है। पहली बार उन्हें 2019 में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी चुना गया था। याद रहे क़तर में 2022 का विश्व कप जीतने वाली मेस्सी की चैंपियन टीम अर्जेंटीना को फीफा के इस समारोह में चार ट्राफियाँ मिलीं, जिनमें टीम के मुख्य कोच लियोनेल स्कालोनी को सर्वश्रेष्ठ कोच, एमिलियानो मार्टिनेज को सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर और अर्जेंटीना के प्रशंसकों को पहली बार सर्वश्रेष्ठ प्रशंसक का अवॉर्ड मिला।

समारोह में मेस्सी सर्वश्रेष्ठ पुरुष खिलाड़ी पुरस्कार से नवाज़े गये। निश्चित ही एक बड़े खिलाड़ी के होने से पूरी टीम को लाभ मिलता है और मेस्सी ने इसे साबित किया है। हालाँकि यह आलेख मेस्सी को समर्पित है, फिर भी यदि हम इस समारोह में स्पेन की अलेक्सिया पुटेलस को सर्वश्रेष्ठ फीफा महिला खिलाड़ी चुने जाने का ज़िक्र न करें तो नाइंसा$फी होगी। दिलचस्प यह है कि उन्होंने लगातार दूसरी बार यह पुरस्कार जीता। ब्राजील के दिग्गज दिवंगत पेले को एक वीडियो श्रद्धांजलि के साथ यह समारोह शुरू हुआ और उनकी पत्नी मर्सिया आओकी को दिग्गज फुटबॉलर रोनाल्डो और राष्ट्रपति इन्फेंटिनो ने विशेष पहचान पुरस्कार भेंट किया। समारोह में इंग्लैंड की मैरी एप्र्स सर्वश्रेष्ठ महिला गोलकीपर, इंग्लैंड टीम की सरीना विगमैन सर्वश्रेष्ठ महिला कोच बनीं, जबकि फेयर प्ले अवॉर्ड जॉर्जिया के लुका लोचशविली के हिस्से रहा।

दूसरी बार फीफा के सर्वश्रेष्ठ पुरुष खिलाड़ी का खिताब जीतने के बाद मेस्सी ने कहा- ‘यह शानदार है। यह शानदार साल रहा और मेरे लिए यहाँ आकर अवॉर्ड हासिल करना सम्मान की बात है। मेरे टीम साथियों के बिना मैं यहाँ नहीं होता। मैंने लंबे समय से देखा सपना हासिल किया। कुछ ही लोग इसे हासिल कर पाते हैं और मैं भी ऐसा करके भाग्यशाली महसूस कर रहा हूँ। टीम को अपनी सफलता का श्रेय देने से मेस्सी की महानता ज़ाहिर होती है, क्योंकि सभी जानते हैं कि मेस्सी की उपस्थिति ने अर्जेंटीना को विश्व विजेता टीम बना दिया है।

मेस्सी जिस पुरस्कार के लिए चुने गये, उसका फ़ैसला फीफा के 211 सदस्य देशों के कोच और कप्तान के साथ चुनिंदा पत्रकारों की समिति ने किया। अंतिम सूची में तीन खिलाडिय़ों चुने गये, जिसमें मेसी को 52 अंक, विश्व कप के गोल्डन बॉल विजेता एम्बाप्पे को 44 और बेंजेमा को 34 अंक मिले। दो साल में फीफा पुरस्कार जीतने वाले रॉबर्ट लेवांडोव्स्की और दिग्गज क्रिस्टियानो रोनाल्डो को इस साल के पुरस्कार के लिए 14 खिलाडिय़ों की शुरुआती सूची में ही जगह नहीं मिली। मेस्सी के लिए उपलब्धि यह रही कि उन्होंने 16वीं बार पुरुषों की सर्वश्रेष्ठ एकादश में जगह बनायी और रोनाल्डो के रिकॉर्ड को तोड़ दिया।

एफबीयू भ्रष्टाचार आरोपों पर गृह मंत्रालय की सिसोदिया के खिलाफ जांच को मंजूरी

दिल्ली के पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के खिलाफ भ्रष्टाचार का एक मामला दर्ज करने की मंजूरी गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दे दी। यह मामला दिल्ली सरकार की फीड बैक यूनिट (एफबीयू) के गठन से जुड़ा है जिसमें अवैध नियुक्तियों में भ्रष्टाचार का आरोप है।

जानकारी के मुताबिक एफबीयू मामले में सीबीआई ने नवंबर 2016 में एफआईआर दर्ज की थी। इसके बाद उसने अपनी जांच में पाया कि एफबीयू के गठन में कथित तौर पर भ्रष्टाचार हुआ है। आरोपों के मुताबिक इस यूनिट का गठन कथित रूप से नियमों को ताक पर रख कर किया गया।

सीबीआई ने यह जांच दिल्ली सरकार के तत्कालीन डिप्टी सेक्रेटरी, विजिलेंस केएस मीणा की शिकायत के आधार पर की थी। दिल्ली सरकार ने फरवरी 2016 में दिल्ली सरकार के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के भ्रष्टाचार और कामकाज पर नजर रखने के लिये एफबीयू का गठन किया था और इसे दिल्ली केबिनेट ने 29 सितंबर 2015 की बैठक में मंजूरी प्रदान की थी।

इसके बाद तत्कालीन सेक्रेटरी विजिलेंस ने 28 अक्टूबर, 2015 को दिल्ली के मुख्यमंत्री को एफबीयू गठन का प्रस्ताव दिया, जिसे मंजूर कर लिया गया था। इस नोट के मुताबिक एफबीयू को सेक्रेटरी विजिलेंस को रिपोर्ट करना था। फरवरी 2016 में इस यूनिट का गठन कर।

यूनिट में शुरूआत में 20 भर्तियां  होनी थीं जिनके लिए  दिल्ली सरकार के उद्योग विभाग के 22 पदों को खत्म कर के लिया जाना था, लेकिन बाद में दिल्ली सरकार की एंटी करप्शन ब्यूरो की 88 पोस्ट में से 20 भर्तियां एफबीयू  में करने का फैसला किया क्योंकि एसीबी भी विजिलेंस विभाग के अधीन काम करता है। हालांकि, एसीबी में जिन 88 पोस्ट भरने की बात की जा रही थी, उसका भी सिर्फ प्रस्ताव भर था और उप राज्यपाल की तरफ से मंजूरी नहीं ली गयी थी।

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में चल रहा था और 4 अगस्त, 2016 को उसका फैसला आया। इसके बाद एफबीयू की मंजूरी के लिए दिल्ली सरकार ने उप राज्यपाल को मंजूरी के लिये फाइल भेजी लेकिन उपराज्यपाल ने इस मामले में नियमों की अवहेलना और पूरी जांच के लिये मामला सीबीआई को भेज दिया जिसने जांच में काफी अनियमितता पाईं।

राहुल गांधी के बयान, अडाणी मामले पर संसद में खूब हंगामा, कार्यवाही स्थगित

संसद के दोनों सदनों में गुरुवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लंदन में दिए गए बयान और विपक्षी दलों की तरफ से अडाणी-हिंडनबर्ग मामले को उठाए जाने पर जबरदस्त हंगामा हुआ। इसके चलते दोनों सदनों में कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई है।

सत्ता पक्ष के सदस्यों ने जहाँ राहुल गांधी के लंदन में दिए गए भाषण को लेकर हंगामा किया वहीं विपक्ष ने अडाणी-हिंडनबर्ग मामले में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच कराए जाने की मांग की। दोनों ही पक्षों ने जमकर शोर किया जिससे लोकसभा और राज्य सभा दोनों में कामकाज नहीं हो पाया।

यह लगातार चौथा दिन है जब संसद का कामकाज बाधित हुआ है। आज भी शुरू होने के कुछ ही देर बाद कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लंदन में दिए गए बयान पर भाजपा के सदस्यों ने हंगामा किया।

उधर संसद की कार्यवाही से पहले विधि मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस नेता (राहुल गांधी) पर लंदन में झूठ बोलने और देश की आलोचना करने का आरोप लगाया।  पत्रकारों से बातचीत में रिजिजू ने कहा – ‘वह शख्स, जो देश में सबसे ज्यादा बोलता है, और दिन-रात सरकार पर निशाना साधता है, वह विदेश जाकर कहता है कि उसे भारत में बोलने की आजादी नहीं है।’

उधर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मसले पर कहा – ‘जो माफ़ी की मांग कर रहे हैं, मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं कि (पीएम) मोदी जी पांच-छह देशों में गए, और वहां उन्होंने यह कहकर देश का अपमान किया कि भारत में जन्म लेना पाप है, और अब यही लोग बोलने की आजादी पर पाबंदी लगा रहे हैं।’

चार महीने बाद देश में पहली बार एक ही दिन में कोविड के 700 से ज्यादा मामले

देश में कोरोना वायरस संक्रमण के एक ही दिन में 754 नए मामले आने के बाद सरकार अलर्ट हो गयी है। इस साल में पहली बार कोविड के एक दिन में इतने मामले सामने आये हैं।

सरकार की तरफ से गुरुवार को जारी किये गए आंकड़ों के मुताबिक देश में अब  संक्रमित हुए लोगों की संख्या बढ़कर 4,46,92,710 हो गई है। नवंबर, 2022 के बाद भारत में कोविड संक्रमण के 700 से अधिक दैनिक मामले सामने आए हैं। देश में उपचाराधीन मरीजों की संख्या बढ़कर 4,623 हो गई है। देश में पिछले साल 12 नवंबर को संक्रमण के 734 दैनिक मामले सामने आए थे।

स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक कर्नाटक में संक्रमण से एक मरीज की मौत के बाद देश में मृतक संख्या बढ़कर 5,30,790 हो गई है। आंकड़ों के अनुसार, भारत में अभी तक कुल 4,41,57,297 लोग संक्रमण मुक्त हो चुके हैं, जबकि कोविड-19 से मृत्यु दर 1.19 फीसदी है। मरीजों के स्वस्थ होने की दर 98.80 फीसदी है।

उधर देश में राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत अभी तक कोविड-19 रोधी टीकों की 220.64 करोड़ खुराक लगाई जा चुकी हैं। भारत में सात अगस्त 2020 को कोरोना वायरस संक्रमितों की संख्या 20 लाख, 23 अगस्त 2020 को 30 लाख और पांच सितंबर 2020 को 40 लाख से अधिक हो गई थी। 

इंसान का धर्म

सबसे बड़ा धर्म क्या हो सकता है? यह सवाल उन लोगों के लिए हैं, जिनकी तोंदें गले तक ठसाठस भरी पड़ी हैं और तिजोरियों में इतना पैसा, ज़ेवर है कि समा नहीं रहा है। यही वे लोग हैं, जो धर्मों की मुहिमों को बढ़ाने के लिए दिन-रात एक किये हुए हैं। धर्मों के ये नये-नये ठेकेदार विशाल जन समर्थन के दम पर किसी भी हद से गुज़र जाने को तैयार हैं और ख़ुद को श्रेष्ठ धर्माचार्य सिद्ध करने की होड़ में लगे हैं।

हर धर्म में ऐसे लोगों की अलग-अलग जमातें हैं। भले ही इन जमातों के कथित धर्माचार्य अपने ही धर्म के दूसरे कथित धर्माचार्यों से मतलब नहीं रखते हों; उन्हें पसन्द नहीं करते हों; लेकिन दूसरे धर्म से आगे निकलने की होड़ में लगे हुए हैं। कहने का अर्थ यह है कि दूसरे धर्मों को निकृष्ट बताकर अपने धर्म को भी श्रेष्ठ घोषित करना चाहते हैं। ये कथित धर्माचार्य अपने धर्म में भी अग्रणी सर्वश्रेष्ठ, सर्वपूज्यनीय और महानतम् धर्माचार्य होने के लिए आतुर हैं।

श्रेष्ठ बनने की खोखली मंशा पाले बैठे घमण्ड और अल्प ज्ञान के मद में चूर इन कथित धर्माचार्यों को यह भी नहीं ज्ञात नहीं रहा है कि इनके पास सिवाय पाखण्ड और रटी-रटायी बातों के कुछ और है ही नहीं। संसार के ज़्यादातर लोगों को भटकाकर रखने वाले इन कथित धर्माचार्यों की साँठगाँठ राजनीतिक लोगों से कितनी है? अगर यह देखना हो, तो इनके राजनीतिक लोगों से मधुर सम्बन्धों में अन्दर तक झाँकने की ज़रूरत है। स्वार्थ और भोग-विलास के भूखे ये पाखण्डी भूल चुके हैं कि धर्म समाज और राजनीति को सही मार्ग दिखाने के लिए है। लेकिन यही धर्म नेताओं के सुर में सुर मिलाने लगे, तो समाज के साथ अन्याय तय है। इसके विपरीत अगर धर्म समाज के हित में सोचने लगे, तो नेताओं का दिमाग़ ठिकाने लगा रहें। धर्म का ताक़तवरों के साथ ख़ड़े होने का अर्थ यही है कि उसमें लोभियों,  भोगियों, कामियों और अपराधियों का धर्माचार्यों के रूप में दख़ल हो चुका है। धर्म किसी के विमुख हो ही नहीं सकता। उसे बनाया ही लोक कल्याण के लिए गया है; ताक़तवरों, अत्याचारियों के समर्थन के लिए नहीं। लेकिन सत्ता की जूतियाँ चाटने वाले कथित धर्माचार्य अपनी वासनामय स्वार्थसिद्धियों की पूर्ति के लिए पूरी दुनिया में धर्मों को कोठे की वेश्या की तरह इस्तेमाल करते जा रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि सभी धर्मों के लोग अपने-अपने पाखण्डी धर्माचार्यों के पीछे आँखें बन्द करके ऐसे चल रहे हैं, जैसे कोई बच्चा कुछ पाने की लालसा में किसी झूठे, मक्कार के पीछे-पीछे चल पड़े।

इसी का नतीजा है कि धर्मों में अपराध बढऩे के मामले सामने आने लगे हैं। क्योंकि ये कथित धर्माचार्य हर अपराध करते हुए भी अपनी सुरक्षा के लिए हो चुके हैं। उन्हें पता है कि उनके पीछे मूर्खों की एक ऐसी भीड़ खड़ी है, जो उनके लिए हिंसा भी कर सकती है; मर सकती है। हर हाल में उनका विश्वास करने वाली ये भीड़ उनकी सुरक्षा ही करेगी। दरअसल ये भीड़ इन कथित धर्माचार्यों की बिना पैसे की सुरक्षा $फौज है। जिसे दर्मों की अ$फीम ने विचारहीन बना दिया है। तनिक सोचिए कि ये लोग धर्मों के सहारे रहने की बजाय ख़ुद की रक्षा के लिए बाउंसर रखते हैं। गनमैन रखते हैं। बुलेटप्रूफ गाडिय़ों में चलते हैं। ऐश-ओ-आराम की ज़िन्दगी गुजारने के लिए राजा-महाराजाओं की तरह महलों में रहते हैं। फिर ये किस बात के धर्माचार्य हुए?

 अगर धर्मों के इन कथित धर्माचार्यों के हाथों से धर्मों की ठेकेदारी छीन ली जाए, चार दिन भूखा रखा जाए, तो इन्हें समझ आयेगा कि रोटी से बड़ा धर्म और कोई हो ही नहीं सकता। एक मेहनतकश इंसान का यही धर्म होता है। भरे पेट पर कोई भी चौधरी और ज्ञानी बन जाता है। लेकिन अगर पेट ख़ाली हो, तो उसे न कोई ईश्वर दिखायी देता है और न कोई धर्म। और ये कथित धर्माचार्य कौन-सा किसी धर्म के लिए इतना ड्रामा कर रहे हैं? इन्हें अपनी झूठी शान और पैर-पुजाई का जो भूत सवार है, उसी के चलते ये सब लगे हुए हैं। अगर ये बात ग़लत लगती हो, तो किसी भी कथित धर्माचार्य को महीने भर के लिए भूखा-प्यासा कड़ी तपस्या के लिए बैठा दीजिये। अगर उसकी पाखण्डवाद भरी सारी की सारी ड्रामेबाज़ी चार दिन में हवा न हो जाए, तो कहना।

भूख इंसान को बताती है कि उसका धर्म पेट भरने के लिए कर्म करना है। जब तक इंसान का पेट न भरा हो, उसके लिए ये सुन्दर संसार भी व्यर्थ लगने लगता है। भूखे आदमी की रोटी की प्रबल इच्छा बताती है कि वह जीवन चाहता है। और जीवन बिना भोजन के, बिना पानी के, बिना हवा के सम्भव नहीं है। जब ये सब मिल रहे हों, तो इंसान बा$की ज़रूरतें पूरी करता है। सब कुछ मिलने के बाद वह धर्म को समझने की चेष्ठा करता है। या फिर सब कुछ पाने के लिए वह धर्म की शरण में जाता है। ऐसे लोगों को एक पवित्र, सन्त प्रवृत्ति, ज्ञानी और अच्छे धर्माचार्य की ज़रूरत होती है। लेकिन दुर्भाग्य से अब सभी धर्मों में लोगों को भटकाने वाले पाखण्डियों की भरमार है।