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पूर्वी सिक्किम में भारी बर्फबारी में फंसे 1000 सैलानियों को सेना ने सुरक्षित जगह पहुंचाया  

भारी बर्फबारी के कारण सिक्किम के ऊपरी इलाके छांगू में फंस गए हज़ार से ज्यादा  सैलानियों सेना ने सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचा दिया है। इन सैलानियों में बड़ी संख्या में   महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। वहां बड़ी संख्या में वाहन अभी भी फंसे हैं।

अधिकारियों के मुताबिक इस हफ्ते में नाथू ला, सोमगो (छांगू) झील और उसके आसपास के इलाकों में जबरदस्त बर्फबारी के बाद तापमान शून्य से नीचे चला गया है। इसके कारण वहां सैलानियों की आवाजाही प्रभावित हुई है।

पूर्वी सिक्किम में बुधवार को जबरदस्त बर्फबारी हुई थी। अधिकारियों के मुताबिक बर्फबारी के कारण वाहन चलाना मुश्किल हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप 15 किलोमीटर के एक हिस्से में 1,000 से अधिक पर्यटक और 200 वाहन फंस गए।  

अधिकारियों ने बताया कि इलाके में तैनात सैनिकों ने बचाव कार्य शुरू किया और आठ घंटे तक चले अभियान के बाद पर्यटकों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया। उनके मुताबिक इन पर्यटकों को आवास, गर्म भोजन, गर्म कपड़े और महत्वपूर्ण चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। 

यूपी के चंदौसी में कोल्ड स्टोरेज के चेंबर की छत गिरने से 8 की मौत, 11 बचाए  

उत्तर प्रदेश में एक बड़े हादसे में 5 लोगों की मौत हो गयी है। यह हादसा  तब हुआ जब चंदौसी इलाके में एक कोल्ड स्टोरेज के चेंबर की छत गिर गयी। उसके भीतर मौजूद लोग इसकी चपेट में आ गए और 8 की जान चली गयी जबकि 11 लोगों को बचा लिया गया।

चंदौसी के इस्लाम नगर मार्ग पर कोल्ड स्टोरेज के चेंबर की छत गिरने के मामले में  पुलिस ने मालिक और दो अन्य नामजद लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पुलिस के मुताबिक उसने चार लोगों को इस मामले में पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है।

पता चला है इस मामले में मुख्य आरोपी फरार हैं जिनकी तलाश की जा रही है। अभी मलबे को पूरी तरह नहीं हटाया जा सका है। मलबा हटाने के बाद बिल्डिंग के गिरने का सही कारण पता चलेगा।

इस बीच मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) ने एक ट्वीट में कहा – ‘मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनपद संभल के चंदौसी में कोल्ड स्टोर में हुई दुर्घटना के दृष्टिगत जिला प्रशासन के अधिकारियों, एनडीआरएफ की टीम को मौके पर जाकर तत्काल राहत और बचाव कार्य करने के निर्देश दिए हैं। प्रभावितों को राहत राशि जारी की जा रही है।’

अधिकारियों के मुताबिक घटना के बाद 11 लोगों को बचाया गया है जबकि 8 की मौत हो गयी है। एनडीआरएफ अपने खोजी कुत्तों की मदद से फंसे लोगों को ढूंढ़ रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक हो सकता है मलबे से और शव मिलें।

यह भारतीय लोकतंत्र की परीक्षा, क्या मुझे संसद में आरोपों का जवाब देने दिया जाएगा – राहुल गांधी

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने गुरुवार को  दिल्ली में प्रेस वार्ता को संबोधित कर कहा कि, “मैंने सदन में बोलने के बारे में लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपना संदेश दिया कि मैं संसद में बोलना चाहता हूं, अपनी बात रखना चाहता हूं। किंतु मुझे ऐसा लगता है कि उन्हें संसद में बोलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। जैसा कि सरकार के चार मंत्रियों ने संसद में मेरे ऊपर आरोप लगाया है और मुझे हक है कि मैं संसद में अपनी बात रख सकता हूं।“

सांसद राहुल गांधी ने आगे कहा कि, “आज संसद में मेरे आने के एक मिनट बाद उन्होंने हाऊस को स्थगित कर दिया। विचार ये है कि जो मैंने कुछ दिन पहले संसद में भाषण दिया और अडानी जी व मोदी जी के रिश्ते के बारे में मैंने सवाल पूछे किंतु उस भाषण को संसद में एक्सपंज (हटा दिया) कर दिया गया। और उस भाषण में ऐसी कोई चीज नहीं थी जो पब्लिक रिकॉर्ड से मैंने नहीं निकाली, अखबारों से मैंने अपना भाषण तैयार किया था किंतु उसे स्पंज कर दिया गया।“

राहुल गांधी ने कहा, “ये पूरा मामला बस ध्यान भटकाने का हैं क्योंकि सरकार और प्रधानमंत्री अडानी जी के मुद्दे से डरे हुए है। इसलिए उन्होंने ये पूरा तमाशा तैयार किया है।  और मुझे लगता है कि वे मुझे संसद में नहीं बोलने देंगे। क्योंकि जो महत्वपूर्ण सवाल है वो ये है कि अडानी-मोदी जी का रिश्ता क्या है? ये सवाल अभी भी टेबल पर है। जो रक्षा ठेके अडानी जी को क्यों दिए जा रहे है? श्रीलंका और बांग्लादेश में जो बात हुई है वो क्यों हुई? किसने की? ऑस्ट्रेलिया में पीएम जी और स्टेट बैंक की चेयरमैन, अडानी जी के साथ उनकी मीटिंग क्यों हुई? उस मीटिंग में क्या चर्चा हुई? ये सब महत्वपूर्ण बात है जिसके जवाब पीएम मोदी जी नहीं दे रहे है।“

“क्योंकि मैं सांसद हूं तो मेरी पहली जिम्मेदारी संसद में जवाब देने की है और मैं चाहता हूं कि पहले मैं संसद में जवाब दें उसके बाद आपसे मैं डिटेल में बात करूंगा।”

बता दें, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में लंदन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अपने एक व्याख्यान के दौरान कहा था कि, “हर कोई जानता है और यह खबरों में भी बहुत है कि भारतीय लोकतंत्र दबाव में है। मैं भारत में एक विपक्षी नेता हूं, हम उस स्थान को नेविगेट कर रहे है। उन्होंने आगे कहा कि, एक लोकतांत्रिक संसद, स्वतंत्र प्रेस, न्यायपालिका के लिए आवश्यक संस्थागत ढाँचा, सिर्फ लामबंदी का विचार, सभी के चारों ओर घूमना विवश हो रहा है। इसलिए, हम भारतीय लोकतंत्र के आधार ढांचे पर हमले का सामना कर रहे हैं।“

आपको बता दें, संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण जारी है। और आज चौथा दिन है। संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के लंदन वाले बयान और विपक्षी दलों की तरफ से अडाणी-हिंडनबर्ग मामले में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच की मांग को लेकर जमकर हंगामा हो रहा है। भाजपा आक्रामक रुख अपनाए हुए है। और लगातार यह मांग कर रही है की राहुल गांधी माफी मांगे। भाजपा का कहना है कि विदेशी धरती पर राहुल गांधी द्वारा भारत विरोधी बयानों के लिए देश से माफी मांगे। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मसले पर कहा है कि – ‘जो माफ़ी की मांग कर रहे हैं, मैं उन लोगों से पूछना चाहता हूं कि पीएम मोदी जी पांच-छह देशों में गए, और वहां उन्होंने यह कहकर देश का अपमान किया कि भारत में जन्म लेना पाप है, और अब यही लोग बोलने की आजादी पर पाबंदी लगा रहे हैं।’

सत्ता के लिए खींचतान

संवैधानिक प्रमुखों में निम्नस्तरीय संवाद दु:खद

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सिंह ‘मान’ और राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित के बीच हुए विवाद ने एक बार फिर दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच की नाजुक कड़ियों को उजागर कर दिया है। इसी तरह अन्य राज्यों में मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच तनाव का माहौल एक चलन-सा हो चुका है। बता रही हैं कुमकुम चड्ढा :-

जब सर्वोच्च न्यायालय ने नीति निर्माताओं को आगाह किया कि वे विमर्श के स्तर को निचले स्तर की दौड़ में न बदलें, तो यह देश में इस तरह के मुद्दे की निराशाजनक स्थिति को प्रतिबिंबित करता था। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य विधानसभा का बजट सत्र बुलाने पर एक मुख्यमंत्री और एक राज्यपाल के बीच टकराव पर अपने फैसले में यह टिप्पणी की।

सवाल के घेरे में पंजाब

नाटकीय व्यक्तित्व : राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित और मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान। न्यायालय पंजाब विधानसभा का बजट सत्र 3 मार्च से बुलाने से राज्यपाल पुरोहित के इनकार के खिलाफ पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कई तर्कों के बीच मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों के बीच संचार में परिपक्व राजनीतिक कौशल और शिष्टाचार की आवश्यकता पर न्यायालय की तरफ से की गयी टिप्पणियाँ सामने आयीं- ‘लोकतांत्रिक राजनीति में राजनीति मतभेद स्वीकार्य हैं और मुद्दों की इस दौड़ को निचले स्तर पर न ले जाएँ। संवाद के स्तर को घटिया होने की अनुमति दिये बिना संयम और परिपक्वता की भावना के साथ काम किये जाने की जरूरत है।’ बेंच ने कहा कि जब तक इन सिद्धांतों को ध्यान में नहीं रखा जाता, तब तक संवैधानिक मूल्यों का प्रभावी कार्यान्वयन खतरे में पड़ सकता है।
ऐसा करते समय न्यायालय ने मान और पुरोहित, दोनों की भूमिका की आलोचना की कि वे दोनों अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में समझदार नहीं हैं। यदि मान को कुछ मुद्दों पर राज्यपाल को जानकारी देने में विफल रहने के लिए फटकार लगायी गयी, तो समान रूप से पुरोहित द्वारा विधानसभा सत्र बुलाने से इनकार करने के फैसले को भी अस्वीकार किया गया।
राज्यपाल को यह याद दिलाते हुए कि वह विधानसभा का सत्र बुलाने के लिए कर्तव्यबद्ध थे, क्योंकि उनकी यह शक्ति विवेकाधीन नहीं थी। न्यायालय ने रिकॉर्ड किया कि ट्वीट की भाषा, तेवर और मुख्यमंत्री के पत्र ने बहुत कुछ वांछित होने के लिए छोड़ दिया।
मान ने पहले राज्यपाल के सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया था और पंजाबी में ट्वीट किया था कि वह राज्यपाल के प्रति जवाबदेह नहीं हैं- ‘संविधान के अनुसार, मैं और मेरी सरकार 3 करोड़ पंजाबियों के प्रति जवाबदेह हैं; न कि केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किसी राज्यपाल के प्रति। इसे मेरा जवाब समझिए।’ मान ने राज्यपाल को लिखे अपने पत्र और अपने ट्वीट दोनों में जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसका उल्लेख करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने असंयमित शब्द का इस्तेमाल किया था।
न्यायालय के अलावा विधानसभा में भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच राजनीतिक खींचतान चली थी। यह बजट सत्र का पहला दिन था, जिसमें विधायकों और राज्यपाल के बीच तीखी नोकझोंक हुई। और इस बार मुख्यमंत्री या उनकी पार्टी नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा थे; जिन्होंने राज्यपाल द्वारा राज्य सरकार को मेरी सरकार के रूप में संदर्भित करने पर आपत्ति जतायी थी।
आधार : आम आदमी पार्टी सरकार ने आपको उनमें से एक के रूप में स्वीकार नहीं किया है और आपके द्वारा उठाये गये मुद्दों पर प्रतिक्रिया नहीं दी है। एक बार जब राज्यपाल ने ‘मेरी सरकार’ का उपयोग करने से मना कर दिया, तो मान ने जोर देकर कहा कि उन्हें इस शब्द का उपयोग करना चाहिए। चाहे जो भी हो, कटुता आज का क्रम है, जैसा कि यह था। और यह पंजाब, मान या पुरोहित तक सीमित नहीं है। ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ राज्यपालों का निर्वाचित मुख्यमंत्रियों के साथ टकराव होता है। जहाँ तक आम आदमी पार्टी की बात है, तो वह दो राज्यों में शासन करती है और दोनों में उसका राज्यपाल से मतभेद है।
हालाँकि पंजाब मुख्यमंत्री बनाम राज्यपाल के इस तरह के भद्दे झगड़ों में नवीनतम उदाहरण है, इसका मंच आप के प्रमुख अरविंद केजरीवाल द्वारा निर्धारित किया गया था, जिन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में केंद्र शासित प्रदेश के उप राज्यपाल के साथ कई मुद्दों पर तलवारें खिंची हैं। राजभवन के रहने वाले बदल गये हैं; लेकिन स्थिति वैसी ही है। नजीब जंग हों, अनिल बैजल हों या विनय कुमार सक्सेना, आरोप-प्रत्यारोप चलते रहते हैं। जहाँ उप राज्यपाल के कार्यालय ने मोहल्ला क्लीनिक सहित आम आदमी पार्टी की कुछ पहल पर सवाल उठाये हैं, वहीं आम आदमी पार्टी ने उप राज्यपाल के कार्यालय पर भ्रष्टाचार और नौकरशाहों के बीच अवज्ञा को प्रोत्साहित करने और सरकार के साथ असहयोग करने का आरोप लगाया है।
नजीब जंग को याद करें, जिसमें केजरीवाल ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान आरोप लगाया था कि उपराज्यपाल ‘अपने राजनीतिक आकाओं के जनादेश का पालन कर रहे थे।’
केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कथित निकटता को लेकर जंग का उपहास उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ा।
यदि केजरीवाल ने तब कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति को असंवैधानिक बताते हुए सवाल उठाया था या किसी अन्य की नियुक्ति के लिए प्रधान सचिव के कार्यालय पर ताला लगाने की हद तक चले गये थे, तो जवाब में जंग ने उनके इस आदेश को अमान्य घोषित कर दिया था। केजरीवाल और उनके डिप्टी रहे मनीष सिसोदिया ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से शिकायत की और उपराज्यपाल पर पद को अपनी जागीर की तरह चलाने का आरोप लगाया था। जंग के इस्तीफा देने और अनिल बैजल के सत्ता संभालने के बाद भी कुछ $खास नहीं बदला। रस्साकशी जारी रही, चाहे वह 26 जनवरी की हिंसा सहित किसानों के विरोध या मंत्रियों को दरकिनार कर बैजल द्वारा किये गये फैसलों के बाद के मामलों के लिए विशेष अभियोजकों के चयन का मामला हो।
बैजल के उत्तराधिकारी विनय कुमार सक्सेना के बाद भी कुछ भी नहीं बदला। केजरीवाल ने कहा- ‘हमारा होमवर्क जाँचने के लिए उप राज्यपाल हमारे प्रधानाध्यापक नहीं हैं। उन्हें हमारे प्रस्तावों के लिए हाँ या न कहना होगा।’ उनका कहना था कि एक निर्वाचित सरकार कभी काम नहीं कर सकती है, यदि उसके पास निर्णय लेने की शक्ति नहीं है। आम आदमी पार्टी ने सक्सेना पर अवैध और अवांछित बाधाओं और हस्तक्षेपों का आरोप लगाया।
राज्यपालों के खिलाफ इस लड़ाई में आम आदमी पार्टी अकेली नहीं है। अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री भी हैं, जो अपने-अपने राज्यों में राज्यपालों के साथ मौखिक द्वंद्व में लगे हुए हैं। दक्षिण में केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना राज्य भी तूफान की चपेट में हैं। विचाराधीन सम्बन्धित मुख्यमंत्रियों में पिनराई विजयन, एम.के. स्टालिन और के. चंद्रशेखर राव हैं, जिनकी क्रमश: राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, आर.एन. रवि और तमिलिसाई सुंदरराजन के साथ तकरार हुई है।


केरल से शुरुआत करते हैं। राज्यपाल खान पर प्रमुख कानून में देरी करने का आरोप है। माकपा द्वारा शासित राज्य सरकार नौ कुलपतियों के इस्तीफे की माँग करने वाले राज्यपाल के आदेश के विरोध में है। यहाँ तक कि लड़ाई न्यायालय तक पहुँच गयी। मुख्यमंत्री ने नाम न लेने का सहारा लिया और कहा कि राज्यपाल आरएसएस का औजार हैं।
मामला आगे बढ़ा, तो राज्यपाल खान ने मुख्यमंत्री पर दोहरे मानदंडों का आरोप लगाया। उन्होंने राज्य के वित्त मंत्री की उस टिप्पणी के लिए बर्खास्तगी की भी माँग की, जिसमें उन्होंने कहा था कि जो लोग उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों से परिचित थे; वे दक्षिण के लोगों के तरीकों को नहीं समझते।
तमिलनाडु में राज्यपाल आर.एन. रवि ने तब सदन से वॉक आउट कर दिया, जब मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के एक प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया। राज्यपाल ने भाषण के कुछ हिस्सों को विशेष रूप से ‘शासन के द्रविड़ मॉडल’ शब्दों को छोड़ दिया था, जिससे सत्ता पक्ष का गुस्सा उभर आया। मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को बाधित किया और बाद में एक प्रस्ताव पेश किया।
कई विधेयकों को मंजूरी देने से राज्यपाल के इनकार करने समेत कई मुद्दों पर डीएमके और उसके सहयोगियों का राज्यपाल से टकराव हो चुका है। राज्यपाल पर भाजपा की हिंदुत्व विचारधारा का प्रचार करने का आरोप लगाते हुए, पार्टी ने उन पर राज्य की राजनीति में हस्तक्षेप करने और ‘साम्प्रदायिक घृणा भड़काने’ का आरोप लगाया है।
तेलंगाना की राज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन ने राज्य सरकार पर उनकी आधिकारिक यात्राओं के दौरान आवश्यक प्रोटोकॉल से इनकार करने की शिकायत की है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि राज्य सरकार के इशारे पर उनके फोन टेप किये जा रहे हैं।
यदि सत्तारूढ़ द्रमुक और उसके सहयोगियों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दरवाजे पर दस्तक दी है और रवि को बर्खास्त करने की माँग की है, तो केरल सरकार ने आरिफ मोहम्मद खान को राज्य के विश्वविद्यालयों के चांसलर के रूप में बदलने के लिए अध्यादेश का मार्ग प्रस्तावित किया है।
पूर्व की ओर देखें, तो ममता बनर्जी हैं, जो कभी न हार मानने वाली राजनेता हैं। वह उनमें से एक हैं, जो अनायास सड़कों पर उतर जाती हैं और पलटवार करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं। जब तक जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे। मजाक में कहें, तो बनर्जी के राज्यपाल के साथ सम्बन्ध ‘मधुर’ थे। वह उन्हें ‘केंद्र की कठपुतली’ कहने की हद तक गयीं। धनखड़ भी कहाँ पीछे रहने वाले थे, जिन्होंने राज्य सरकार पर $कानून व्यवस्था, हिंसा और राज्यपाल के कार्यालय को अर्थहीन करने का आरोप लगाया।
और पुडुचेरी के मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी और उपराज्यपाल किरण बेदी के बीच के विवाद को कौन भूल सकता है? बेदी पर राज्यपाल के कार्यालय भेजी जा रही सभी फाइलों को वापस करने का आरोप लगाते हुए नारायणसामी ने कहा कि बेदी पुडुचेरी के विकास को बाधित कर रही हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र से धन सुरक्षित करने के राज्य सरकार के कदम के खिलाफ बेदी के नकारात्मक रु$ख से राज्य के खजाने को राजस्व नुकसान हुआ है। बेदी पर ‘समानांतर सरकार चलाने और एक मुख्यमंत्री की तरह काम करने” का भी आरोप लगाया गया था। नारायणसामी ने यहीं नहीं रुकते हुए केंद्र पर राज्य में एक ‘राक्षस’ तैनात करने का आरोप लगाया, जो योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधा डाल रहा था।
मौजूदा पदधारकों के विपरीत, चाहे वह रवि हों, खान हों या सुंदरराजन, बेदी को उनके पद से हटा दिया गया था। इस बीच धनखड़ को राज्यपाल पद से भारत के उप राष्ट्रपति के पद पर पदोन्नत किया गया।
यह वर्तमान व्यवस्था के बारे में क्या संकेत करता है? क्या यह राज्यपालों को चिंगारी भड़काने और गैर-भाजपा सरकारों के लिए राज्य चलाने को मुश्किल बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है? क्या ये बाधाएं सम्बन्धित राज्य के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं और इस प्रकार लोगों की कठिनाई का कारण बन रही हैं? क्या राजनीति जो स्वीकार्य स्तर से नीचे चल रही है या सर्वोच्च न्यायालय को उद्धृत करें, तो निम्नस्तर पर जाने की होड़ है? क्या संवाद अपमानजनक है? या घटिया? क्या नाम लेकर बोलना नया तरीका है? क्या राज्यपाल एजेंडा संचालित हैं? क्या वे दिल्ली के आकाओं के अनुकूल हैं? या दिग्गज लालकृष्ण आडवाणी के वाक्य को कहें, तो जब झुकने के लिए कहा जाए, तो घिसटने की इच्छा रखना?
जबकि इस पर बहस जारी है, केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार को सभी बीमारियों की जड़ बताना भी अनुचित होगा। राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच तकरार या यह कहें कि एक राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पदधारियों की तैनाती होती है? जबकि राजनीति चल रही है और भाजपा यह सुनिश्चित करने के लिए दूसरों की तुलना में अधिक आक्रामक है कि उसके विरोधी लाइन पर चलें, यह मान लेना अनुचित होगा कि वास्तव में प्रत्येक राज्यपाल को राज्य सरकारों को काम न करने देने का फरमान होता है।
जैसा कि भाजपा की शैली में ऐसे अनकहे संदेश होते हैं, जिनसे उनके नामित, राज्यपाल या कोई अन्य अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार कूटवचन (डिकोड) या व्याख्या करने की उम्मीद रहती है।
यह कहना कि राज्यपालों और गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों के बीच विवाद एक रणनीति का हिस्सा है; अतिशयोक्तिपूर्ण हो सकता है। लेकिन इसे एक संयोग के रूप में पेश करना भाजपा की राजनीति को कम करके आंकने जैसा होगा। भगवा पार्टी हर गैर-भाजपा सरकार को निष्पक्ष और गलत तरीकों से हटाना चाहेगी। इसलिए राज्यपालों का उसकी लाइन पर चलना कोई आश्चर्य की बात नहीं होना चाहिए। अगर कुछ उसकी मंशा के अनुरूप चले हैं, तो यह दिल्ली में सत्तारूढ़ व्यवस्था को खूब भाता है।
यह कहने के बाद यह साबित करने के लिए पर्याप्त सुबूत हैं कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों ने भी दिल्ली में सत्ता के फरमान का पालन करने के लिए अपने नामितों का इस्तेमाल किया। गैर-विनम्र को पसंदीदा के साथ बदलने या उन लोगों को दरवाजा दिखाने के कई उदाहरण हैं, जो सत्ता में पार्टी के साथ तालमेल नहीं रखते थे।
सौम्य व्यवहार वाले डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चार राज्यपालों को बर्खास्त कर दिया गया था, जब उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री का पद संभाला था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा नियुक्त उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और गोवा के राज्यपालों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। उन्हें वफादारों द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था, जिन्हें चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। इनमें अन्य के अलावा बूटा सिंह शामिल थे, जिन्हें बिहार भेजा गया था। आर.एल. भाटिया को केरल और बलराम जाखड़ को मध्य प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया था।


गिनती करें, तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने एक दर्जन से अधिक राज्यों में राज्यपालों की अदला-बदली की और वफादारों को पुरस्कृत करते हुए उनका उनका पुनर्वास किया।
एल.के. आडवाणी के नेतृत्व में लोकसभा में एक चर्चा शुरू की गयी थी, जब भाजपा ने इन राज्यपालों को इस आधार पर हटाने के लिए तत्कालीन सरकार को फटकार लगायी थी कि ‘उन्होंने सत्ता और अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन के दौरान पार्टी की राजनीतिक विचारधारा की तुलना में अलग राजनीतिक विचारधारा की वकालत की थी।’ उन्हें शायद पता ही नहीं होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में भाजपा सन् 2014 में वही करेगी, जिसके लिए आडवाणी ने सन् 2004 में कांग्रेस को फटकार लगायी थी। तब उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ के राज्यपालों ने त्याग-पत्र दिया था, जबकि महाराष्ट्र के राज्यपाल ने कहा था कि वह केवल लिखित आदेश का जवाब देंगे।
सन् 2004 के बिलकुल विपरीत, जब आडवाणी ने राज्यपालों को हटाने की निंदा की थी; 10 साल बाद उनके समकक्ष केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार चाहती थी कि कांग्रेस के नियुक्त लोग चले जाएँ और उनके शब्दों को दोहराएँ, तो कहा था- ‘अगर मैं उनकी जगह होता, तो मैं पद छोड़ देता।’ जब राज्यपालों को चुनने की बात आती है, तो वफादारी एकमात्र योग्यता होती है। हालाँकि यह बुनियादी है। दूसरा है सत्तारूढ़ व्यवस्था के हित के लिए स्थिति में हेरफेर करने की क्षमता।
एक के बिना दूसरा अधूरा-सा है। इसलिए पैकेज डील है- ‘हमारे साथ बने रहने के बाद हमारी बोली बोलें और हालात को हमारे मुताबिक चलाने में हमारी मदद करें।’ जब सरकारों को गिराने की बात आती है, तो राज्यपाल काम आते हैं। जैसा कि वे करते हैं, जब सरकारों में उठापटक करने की बात आती है।
सन् 2015 को याद करें, भाजपा ने विधानसभा सत्र को आगे बढ़ाने के लिए अरुणाचल प्रदेश में राज्यपाल जे.पी. राजखोवा का उपयोग करने और विधिवत निर्वाचित कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने और एक असन्तुष्ट के नेतृत्व वाली सरकार स्थापित करने की कोशिश की थी। आलोचकों को उद्धृत करें, तो यह भाजपा द्वारा समर्थित ‘कठपुतली शासन’ स्थापित करने का एक प्रयास था। याद करें कि राजखोवा ने भाजपा और अन्य के बाहरी समर्थन से विद्रोहियों की सरकार स्थापित करने के लिए कांग्रेस में विद्रोह का इस्तेमाल किया था।
विधानसभा अध्यक्ष पर महाभियोग चलाने की माँग के बाद राजखोवा ने मनमाने ढंग से विधानसभा सत्र एक महीने के लिए आगे बढ़ा दिया। विधायक जब विधानसभा पहुँचे, तो वहाँ ताला लगा मिला। एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए विधानसभा ईटानगर के एक होटल में बुलायी गयी थी। न्यायालय ने हस्तक्षेप किया। राज्यपाल को दोषी ठहराया गया और निर्णय पलट दिया गया।
ठीक ऐसा उत्तराखण्ड में हुआ था, जहाँ राज्यपाल ने संविधान के बजाय एक राजनीतिक फरमान का पालन किया, जिसके परिणामस्वरूप न्यायालय ने कदम बढ़ाया। मणिपुर और गोवा की क्रमश: दो महिला राज्यपालों नजमा हेपतुल्ला और मृदुला सिन्हा ने भी भाजपा के एजेंडे को आगे बढ़ाया।
वे केंद्र के एजेंट के रूप में काम करने के लिए आलोचना का केंद्र बने। उन्होंने विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी कांग्रेस को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए भाजपा सरकार स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त किया। हेपतुल्ला और सिन्हा, दोनों ने ही सबसे बड़ी पार्टी को आमंत्रित करने के व्यापक रूप से स्वीकृत फॉर्मूले की जानबूझकर अनदेखी की। इसकी बजाय उन्होंने चुनाव के बाद के गठबंधनों को प्राथमिकता दी, जिससे स्पष्ट रूप से भाजपा को लाभ हुआ।
संयोग से मणिपुर 10 बार राष्ट्रपति शासन के अधीन रहा है; एक राज्य के रूप में देश में सबसे ज्यादा। सन् 1967 की शुरुआत से राज्य ने दलबदल और अस्थिरता देखी है। बिहार में भी राजद के सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद राज्यपाल ने जद(यू)-भाजपा सरकार स्थापित करने के लिए सबसे बड़ी पार्टी के फार्मूले को नजरअंदाज कर दिया था।
इसी तरह मेघालय में एक साल बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी; लेकिन राज्यपाल ने कोनराड संगमा की एनपीपी को अपना बहुमत साबित करने के लिए आमंत्रित किया। संगमा की पार्टी ने भाजपा और अन्य के साथ गठबंधन किया और उत्तर-पूर्वी राज्य में सरकार बनायी। हालाँकि कर्नाटक में राज्यपाल ने इस आधार पर भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया कि वह सबसे बड़ी पार्टी थी। तब कांग्रेस ने माँग की थी कि या तो मणिपुर, गोवा और मेघालय जैसे पिछले मामलों की तरह ही मानदंड अपनाये जाएँ, या इस तरह बनी सरकारों को खारिज कर दिया जाए। लेकिन सभी बुराइयों को भाजपा पर थोपना एकतरफा होगा। यह साबित करने के लिए पर्याप्त उदाहरण हैं कि पूर्व-भाजपा शासन के दौरान कई राज्यपालों की भूमिका संदिग्ध रही है; यदि यह इस तरह की स्थिति के लिए सही शब्द है। सन् 2005 में राज्यपाल ने 80 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए के 41 विधायकों के दावे की अनदेखी करते हुए झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलायी।


कोर्ट के फ्लोर टेस्ट का आदेश देने और सोरेन के बहुमत साबित करने में नाकाम रहने के बाद ही भाजपा के अर्जुन मुंडा ने मुख्यमंत्री के रूप में उनका स्थान लिया। उसी वर्ष बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह ने जद(यू) और भाजपा के अधिकतम संख्या में विधायकों के समर्थन के दावे को खारिज करते हुए विधानसभा को भंग करने की सिफारिश की थी।
एक या दो दशक पहले की बात करें, तो कहानी बहुत अलग नहीं है। सन् 1996 में जब गुजरात में भाजपा के विधायकों ने मुख्यमंत्री सुरेश मेहता के खिलाफ बगावत कर दी, तो तत्कालीन राज्यपाल ने आदेश दिया कि वह सदन के पटल पर बहुमत साबित करें। उन्होंने किया; लेकिन राज्यपाल आगे बढ़े और राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की।
आठ साल पहले कर्नाटक के राज्यपाल ने जनता दल के मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने का अवसर नहीं दिया। अस्सी के दशक में जहाँ आंध्र प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल ने राज्य के वित्त मंत्री के मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव के खिलाफ विरोध का समर्थन किया। वहीं हरियाणा की तत्कालीन राज्यपाल ने लोकदल और भाजपा गठबंधन सरकार को बर्खास्त कर दिया और कांग्रेस को राज्य में सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया।
पद के दुरुपयोग की बात करते हुए यह स्वीकार करना होगा कि राज्यपाल के पद का राजनीतिकरण भाजपा की देन नहीं है। मोदी सरकार भले ही इस मुद्दे पर आरोपों में घिरी हो; लेकिन क्या केंद्र की किसी पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को इसी तरह की मूर्खता के लिए दोषमुक्त किया जा सकता है? इसलिए जब प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में कहा कि केंद्र की कांग्रेस सरकारों ने संविधान के अनुच्छेद-356 का दुरुपयोग करके 90 राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया है, तो वह गलत नहीं थे।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर एक तीखे हमले में मोदी ने कहा कि उन्होंने राज्य सरकारों को मन मुताबिक बर्खास्त कर दिया था और क्षेत्रीय नेताओं को कमजोर कर दिया था। मोदी ने कहा- ‘वे (कांग्रेसी) कहते हैं कि हम राज्यों को परेशान करते हैं; लेकिन उन्होंने 90 बार निर्वाचित राज्य सरकारों को गिरा दिया। एक कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने निर्वाचित राज्य सरकारों को बर्खास्त करने के लिए अनुच्छेद-356 का 50 बार इस्तेमाल किया। वह इंदिरा गाँधी थीं।’ मोदी ने कहा कि उन्होंने राज्य सरकारों को बर्खास्त करके अर्धशतक बनाया था।
अपने तीखे हमले को जारी रखते हुए मोदी ने याद किया कि कैसे केरल में वाम मोर्चा सरकार, आंध्र प्रदेश में एनटीआर, महाराष्ट्र में शरद पवार और एम.जी. रामचंद्रन की सरकारों को तमिलनाडु में इंदिरा गाँधी के शासन ने बर्खास्त कर दिया गया था। मोदी ने कहा- ‘मैं आज इस भरे सदन में उन्हें बेनकाब करना चाहता हूँ।’ मोदी गाँधी पर ही नहीं रुके, बल्कि उनके पिता जवाहरलाल नेहरू को भी विवाद में घसीट लिया।
नेहरू ने केरल में अब तक की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार को अपदस्थ कर दिया था। सन् 1959 तक उन्होंने छ: बार अनुच्छेद का प्रयोग किया, जबकि साठ के दशक में इसे 11 बार इस्तेमाल किया गया था। इंदिरा गाँधी के सत्ता में आने के बाद सन् 1967 से सन् 1969 के बीच कई बार अनुच्छेद-356 का इस्तेमाल किया; उन्होंने सन् 1970 से सन् 1974 के बीच 19 बार राष्ट्रपति शासन लगाया। एक बार सत्ता में आने के बाद जनता पार्टी ने भी इस उपकरण का खुलकर इस्तेमाल किया और सत्ता में आते ही नौ राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया।
सन् 1980 के बाद इंदिरा गाँधी के शासन में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, ओडिशा और बिहार सहित नौ राज्य विधानसभाओं को भंग कर दिया गया था। कथित तौर पर इन विधानसभाओं के जीवन को कम करने का निर्णय उनके मंत्रिमंडल द्वारा लिया गया था। सत्ता में आने के बाद 1992-93 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भाजपा की तीन सरकारों को बर्खास्त कर दिया। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार को भी बर्खास्त कर दिया गया था।
संसद में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा- ‘कांग्रेस देश को गुमराह कर रही है; लेकिन इस देश के लोग उनकी वास्तविकता जानते हैं। पार्टी को अपनी राजनीति की ज्यादा चिंता है।’
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि इसमें सभी शासन एक साथ हैं। राजनीतिक लाभ के लिए संवैधानिक कार्यालयों का दुरुपयोग किया गया है और सभी शासनों के तहत संस्थागत पवित्रता का क्षरण हुआ है। लिहाजा किसी का भी एक दूसरे पर आरोप लगाना खुद को उजला दिखाने की कोशिश भर है। लेकिन केवल राज्यपाल ही क्यों? राष्ट्रपति के कार्यालय के बारे में क्या, जिसमें पसंदीदा और लचीले लोग अक्सर चुने जाते हैं? जनता की याददाश्त कम हो सकती है; लेकिन इतिहास गवाह है वी.वी.गिरि का राष्ट्रपति के रूप में चुनाव में राजनीति पूरे उफान पर थी।
मई, 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना था। कांग्रेस ने नीलम संजीव रेड्डी को मैदान में उतारा था; लेकिन देश के उप राष्ट्रपति वी.वी. गिरि ने निर्दलीय उम्मीदवारी की घोषणा करते हुए दावा ठोक दिया। कई लोगों ने उनके इस कदम की व्याख्या इंदिरा गाँधी द्वारा समर्थित कदम के रूप में की।
इसका प्रमाण इस तथ्य से मिलता है कि गाँधी ने रेड्डी के नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर करने के बावजूद व्हिप जारी करने से इनकार कर दिया था। बल्कि उन्होंने रेड्डी के लिए प्रचार से दूर रहते हुए भी कांग्रेस सदस्यों से विवेक का इस्तेमाल करने को कहा था। एक बार जब गिरि चुनाव जीत गये, तो उन्होंने उन लोगों पर पलटवार किया, जिन्होंने उनकी 75 से अधिक उम्र के आधार पर उनका विरोध किया था। गिरि ने कथित तौर पर कहा था- ‘जो लोग कहते हैं कि मैं बहुत बूढ़ा हूँ, उन्हें इसका फायदा उठाने दो।’
इसके अलावा गिरि की जीत ने इंदिरा गाँधी को कांग्रेस पार्टी के निर्विवाद नेता के रूप में उभरने में मदद की। वह अपने समाजवादी और राजनीतिक एजेंडे को लागू करने के लिए पूरी ताकत से जुट गयीं। इस बीच गिरि ने इंदिरा गाँधी की बात मानी। उन्हें व्यापक रूप से ‘प्रधानमंत्री के राष्ट्रपति’ के रूप में जाना जाता था।
इस संदर्भ में भारत के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह और उनकी इंदिरा गाँधी की अधीनता को कोई नहीं भूल सकता। कई लोग उनके कुख्यात उद्धरण को याद करते हैं कि ‘अगर इंदिरा गाँधी उनसे कहें, तो वह फर्श पर झाड़ू लगाने के लिए भी तैयार हैं।’ इसलिए जब विपक्ष मौजूदा व्यवस्था पर संस्थानों को नष्ट करने का आरोप लगाता है, तो उसे सोचकर अपने भीतर भी झाँकना चाहिए।
हालाँकि यह किसी भी तरह से मोदी सरकार के कृत्यों और चूक को सही नहीं ठहराता और न ही इसके सहारे संविधान निर्माताओं के श्रमसाध्य से जोड़ी गयी ईंटों को नष्ट करने की इजाजत देता है। शासन के संरक्षक उस संविधान की रक्षा के लिए कर्तव्यबद्ध हैं, जिसकी वे शपथ लेते हैं। एक राजनीतिक उद्देश्य के लिए इसकी गलत व्याख्या करना उनके द्वारा धारण किये गये कार्यालय, विशेष रूप से संवैधानिक पदों के लिए एक अपकार होगा।
शासन के संरक्षक उस संविधान की रक्षा के लिए कर्तव्यबद्ध हैं, जिसकी वे शपथ लेते हैं। एक राजनीतिक उद्देश्य के लिए इसकी गलत व्याख्या करना उनके द्वारा धारण किये गये कार्यालय, विशेष रूप से संवैधानिक पदों के लिए एक अपकार होगा। समान रूप से मौजूदा मोदी सरकार को चिह्नित करना और अतीत में दूसरों ने जो किया है, उसे करने के लिए उसे सूली पर चढ़ाना अन्यायपूर्ण होगा। कोई भी मोदी को इस मामले में एक खलनायक के रूप में चित्रित कर सकता है; लेकिन वह अकेले इसमें नहीं हैं। उनके चाकू तेज हो सकते हैं; लेकिन उनके पूर्ववर्ती भी संत नहीं थे। उनके भी हाथ खून से सने हुए हैं

राज्यपाल बनाम मुख्यमंत्री

पिछले सात दशकों में कई राज्यों ने राज्यपालों की भूमिका पर विवाद देखे हैं, जिन पर यह आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने निर्णय लेने की अपनी शक्तियों में कथित तौर पर स्वतंत्रता नहीं बनाये रखी। हाल में सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब के राज्यपाल के कैबिनेट की सिफ़ारिश के बाद भी विधानसभा को नहीं बुलाने के मामले में राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों से कहा कि राज्य सरकार राज्यपाल द्वारा माँगी गयी जानकारी प्रस्तुत करने के लिए बाध्य है और साथ ही राज्यपाल को विधानसभा सत्र बुलाने की मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश को स्वीकार करना होगा।

इसके बाद ख़बर आयी कि तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि ने ऑनलाइन जुए पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा दिया है। बेशक उनके पास विधेयक को वापस करने की शक्ति है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन द्वारा एक प्रस्ताव पेश करने के बाद राज्यपाल विधानसभा से बाहर चले गये, जिसमें कहा गया था कि सदन के शीतकालीन सत्र के पहले दिन सरकार द्वारा केवल परम्परागत भाषण ही रिकॉर्ड में जाएगा। राज्यपाल द्वारा ‘शासन के द्रविड़ मॉडल’ सहित कुछ शब्दों को छोड़ देने के बाद विवाद शुरू हो गया। हाल के दिनों में दिल्ली, पंजाब, पुडुचेरी, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में राज्यपालों की भूमिका पर सवाल उठाये गये हैं।

हाल के महीनों में तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल को वापस बुलाने की माँग की थी। उधर केरल में सरकार ने राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को राज्य के विश्वविद्यालयों के चांसलर के रूप में बदलने के लिए एक अध्यादेश का प्रस्ताव दिया था। तेलंगाना में राज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन ने उनके फोन टेप किये जाने का संदेह व्यक्त किया था। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री और टीएमसी नेता ममता बनर्जी और तत्कालीन राज्यपाल, जगदीप धनखड़ के बीच सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध दूर की कौड़ी बन गये थे और राज्य विधानसभा ने राज्यपाल की जगह 17 राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में मुख्यमंत्री की नियुक्ति के लिए एक विधेयक पारित किया था। दिल्ली में, जो एक पूर्ण राज्य नहीं है; सत्तारूढ़ दल आम आदमी पार्टी (आप) और उप राज्यपाल 2014 से लड़ रहे हैं, जब आम आदमी पार्टी पहली बार राष्ट्रीय राजधानी में सत्ता में आयी थी। पुडुचेरी में एक पूर्व उप राज्यपाल की उनके कथित हस्तक्षेप के लिए राज्य सरकार द्वारा आलोचना की गयी थी। ये घटनाएँ सम्बन्धों में खटास और संविधान के अनुच्छेद-163 के अनुसार राज्यपालों की भूमिका के बारे में बहुत कुछ बताती हैं।

अवॉर्ड विजेता पत्रकार और लेखक कुमकुम चड्ढा, जो अपने बेरोकटोक लेखन के लिए जानी जाती हैं; ने ‘तहलका’ की आवरण कथा ‘सत्ता के लिए खींचतान’ इसी विषय पर की है। इसमें बताया गया है कि शीर्ष अदालत ने नीति निर्माताओं को आगाह किया कि वे आपसी संवाद के स्तर को निम्न स्तर पर न जाने दें। महत्त्वपूर्ण विधेयकों के मामले में राज्यपालों की ओर से जानबूझकर टालमटोल का प्रयोग विधिवत् निर्वाचित सरकारों के बीच चिन्ता पैदा करने की चाल के रूप में देखा जाता है। राज्यों में तसत्ताधारी दलों का आरोप है कि केंद्र की व्यवस्था कथित तौर पर पार्टी के विस्तार के रूप में राज्यपालों के माध्यम से शासन करने की कोशिश कर रही है। राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के बीच सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध किसी भी राज्य की प्रगति के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही यह सलाह देकर साफ़ किया है कि संवैधानिक संवाद को मर्यादा और राजकीय कौशल के साथ संचालित किया जाना चाहिए।

तेज़ी से फैल रहा एच3एन2 फ्लू

इन्फ्लुएंजा-ए वायरस के सब-टाइप एच3एन2 से पहली बार दो मौतें, सैकड़ों नये मामले आने से स्वास्थ्य विभाग अलर्ट

कोरोना के कई वेरिएंट के बाद अब इन्फ्लूएंजा-ए वायरस के सब टाइप एच3एन2 कहर बनकर टूट पड़ा है। पहली बार इस वायरल से हुई दो मौतों ने केंद्र्र सरकार तक को इस फ्लू से निपटने के लिए सतर्क किया है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इन्फ्लुएंजा-ए वायरस के सब-टाइप एच3एन2 से देश में दो लोगों की जान गयी है, जिसमें एक व्यक्ति हरियाणा था और दूसरा कर्नाटक का रहने वाला था। अभी तक एच3एन2 के देश भर में 100 से अधिक मामले सामने आ चुके हैं।

दरअसल इन दिनों में मौसम के बदलाव के कारण आमतौर पर सर्दी-खाँसी होती है। इसी के चलते संक्रमित लोगों को यही ग़लतफ़हमी रही कि उन्हें मौसम बदलने के चलते सर्दी, खाँसी और बुख़ार है। लेकिन जाँच में पता चला कि ये साधारण सर्दी, खाँसी और बुख़ार नहीं है, बल्कि इन्फ्लुएंजा-ए वायरस की सब-टाइप एच3एन2 वायरल है, जो कि जानलेवा साबित हो रहा है। दरअसल इस वायरल से पहली बार देश में दो मौतें हुई हैं, इसलिए केंद्र्र सरकार भी सतर्क हुई है। एच3एन2 कई इन्फ्लूएंजा के प्रकोप की वजह बन रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि ये फ्लू सर्दी के बाद अचानक आयी गर्मी के कारण फैल रहा है। मौसम में इतनी तेज़ी से बदलाव बीमारी को बढ़ाने वाला होता है।

डॉक्टरों का कहना है कि इन्फ्लूएंजा वायरस रेस्पिरेटरी इंफेक्शन की वजह बनता है। स्वास्थ्य विभाग ने आशंका व्यक्त की है कि यह वायरस पक्षियों और मेमल्स में भी फैल सकता है, क्योंकि ये वायरस पक्षियों और जानवरों में कई स्ट्रेन्स में बदल चुका है। इससे इसके और ख़तरनाक होने की आशंका है। रोग नियंत्रण केंद्र्र (सीडीसी) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताज़ा रिपोर्ट में इस वायरस को एच3एन2 इन्फ्लुएंजा-ए वायरस का सबटाइप बताया गया है, जो मानव इन्फ्लूएंजा की एक बड़ी वजह है।

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, मनुष्यों में एच3एन2 के लक्षण एवियन, स्वाइन, जूनोटिक इन्फ्लुएंजा इंफेक्शन, हल्का अपर रेस्पिरेटरी इंफेक्शन (बुख़ार और खाँसी), निमोनिया, सदमा, ठंड लगना, जी मिचलाना, उल्टी, गले में दर्द, ख़राश, शरीर में दर्द, दस्त, ज़्यादा छींकें, नाक बहना आदि हैं। ऐसे में अगर तीन-चार दिन तक न जाने वाली खाँसी हो, जुकाम हो, बुख़ार हो, सीने में दर्द हो, बेचैनी हो, खाना खाने पर उलटी हो, गले में दर्द हो, शरीर में दर्द हो या साँस लेने में तकलीफ़ हो, तो तुरन्त डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

ध्यान रखें कि एच3एन2 एक से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैल सकता है, क्योंकि एच3एन2 अत्यंत संक्रामक इन्फ्लुएंजा है। इसलिए ध्यान रखें कि अगर आपके आसपास ऊपर दिये गये लक्षणों वाला कोई व्यक्ति खुले मुँह से खाँसता है। छींकता है। थूकता है या मुँह की तरफ़ साँस छोड़ता है। मुँह के पास आकर बात करता है; तो उससे दूर रहें और उसे मास्क लगाकर रखने को कहें। डॉक्टरों का कहना है कि एच3एन2 इन्फ्लुएंजा फैलने का ख़तरा गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों, बुजुर्ग, वयस्कों सबमें में आसानी से फैलता है।

अगर किसी में एच3एन2 इन्फ्लुएंजा के लक्षण दिखते हैं, तो सबसे पहले उसका ऑक्सीजन लेवल देखें और अगर ऑक्सीजन लेवल 95 प्रतिशत से कम है, तो ऐसे व्यक्ति को तुरन्त अस्पताल ले जाएँ। अगर अस्पताल या डॉक्टर तक पहुँचने में देरी हो रही हो, तो संक्रमित व्यक्ति को तत्काल बुख़ार कम करने, दर्द कम करने की सामान्य दवा दे सकते हैं; लेकिन सावधानी से। मरीज़ को आराम करने, ऑक्सीजन जोन में रखना बहुत ज़रूरी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि संक्रमित होने पर या होने से पहले या आम लोगों के बीच में रहने की दशा में हाथों को नियमित रूप से पानी और साबुन से धोएँ, सेनेटाइजर का उपयोग करें, मास्क लगाएँ, भीड़-भाड़ वाली जगहों से बचें, अपनी नाक और मुँह को छूने से बचें, खाँसी या छींक आए, तो अपने मुँह और नाक को ढक लें। हाइड्रेटेड रहें, पानी और तरल (लिक्विड) ख़ूब पीएँ। इसके अलावा नियमित व्यायाम करें, हर रोज़ कम से कम आधा-एक घंटे हरी-भरी जगह पर रहें और अगर सम्भव हो तो योगा करें।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने डॉक्टरों के मुताबिक, जब तक यह पता नहीं चल जाए कि मरीज़ को एच3एन2 इन्फ्लुएंजा का संक्रमण है, तब तक उसे एंटीबायोटिक्स नहीं दिया जाना चाहिए, वरना रेजिस्टेंस पैदा हो सकता है। बुख़ार, खाँसी, जुकाम, गले में ख़राश और शरीर में दर्द सामान्य स्थिति में भी होता है। हालाँकि सतर्क रहने की ज़रूरत है; क्योंकि एच3एन2 इन्फ्लुएंजा के संक्रमण में अचानक बढ़ोतरी हो रही है।

डॉक्टरों का कहना है कि एच3एन2 इन्फ्लुएंजा का वायरस हर साल म्यूटेशन करता है और बूंदों के ज़रिये फैलता है। हालाँकि हर साल मौसम के बदलाव के दौरान इन्फ्लुएंजा होने का ख़तरा बढ़ जाता है। लेकिन इस बार इसका संक्रमण का$फी ख़तरनाक है; क्योंकि इस बार यह वायरस तेज़ी से और कोरोना की तरह एक व्यक्ति से दूसरे में और दूसरे से तीसरे में या एक व्यक्ति से कई अन्य व्यक्तियों में फैल रहा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत में कोरोना के मामले तो कम हो रहे हैं; लेकिन एच3एन2 इन्फ्लुएंजा वायरस के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। हालाँकि कोरोना के मामलों में भी कहीं-कहीं बढ़ोतरी हुई है; लेकिन कोरोना से मौत के आँकड़े नहीं बढ़े हैं। वहीं एच3एन2 इन्फ्लुएंजा से दो मौतों ने डॉक्टरों से लेकर केंद्र्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, स्वास्थ्य विभागों और सीडीसी से लेकर डब्ल्यूएचओ तक को सचेत किया है।

डॉक्टर की राय

जनरल फिजिशियन डॉक्टर मनीष कुमार कहते हैं कि एच3एन2 के लक्षण मांसपेशियों में दर्द, शरीर में अकडऩ के साथ खाँसी, जुकाम, बुख़ार और उल्टी का मन होना आदि सब होता है। ऐसे लक्षणों में धूप में रहना, समय पर उपचार करना ज़रूरी है। लेकिन जब तक मरीज़ में एच3एन2 के संक्रमण की जाँच न हो और यह पता न चले कि संक्रमण बैक्टिरियल है या नहीं, तब तक मरीज़ को एंटीबायोटिक न दें। क्योंकि अगर बिना जाँच के गलत दवाएं दे दीं, तो इससे मरीज़ को आराम की जगह नुकसान हो सकता है।

कुछ लोग खाँसी, जुकाम, बुख़ार की स्थिति में घर में ही इलाज करने लगते हैं। ऐसा न करें; क्योंकि अगर संक्रमण हुआ, तो साधारण दवाओं से उसे कम नहीं किया जा सकेगा और ऐसी स्थिति में मरीज़ की बीमारी तो गम्भीर होगी ही, वो घर में भी अन्य लोगों को संक्रमित करेगा। इसलिए सर्दी, खाँसी, बुख़ार, गले में दर्द, ख़राश आदि होने पर तुरन्त डॉक्टर को दिखाएँ।

अमीर क्यों छोड़ रहे हैं भारत?

साल 2022 में सवा दो लाख भारतीय अमीर देश छोडक़र चले गये विदे

देश के पाँच ट्रिलियन की इकोनॉमी बनने की चर्चाओं के बीच ख़बर है कि 2022 में देश के 2,25,000 भारतीयों ने देश की नागरिकता छोड़ दी है। पिछले 11 साल में यह सबसे बड़ी संख्या है, क्योंकि 2011 में इससे लगभग आधे 1,22,819 लोगों, जिनमें अधिकतर अमीर हैं; ने देश की नागरिकता छोड़ दी थी। देश छोडऩे वाले भारत के इन अमीरों में ज़्यादातर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, दुबई और सिंगापुर जैसे देशों में बसने को तरजीह दे रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण हाल के वर्षों में भारत में ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों का बढ़ता शिकंजा भी है।

निश्चित ही भारत के लिए यह अच्छी ख़बर नहीं कही जा सकती है। विशेषज्ञों का मत है कि असमानता के कारण यह अमीर देश छोडक़र जा रहे हैं। असमानता को लेकर हाल में एक रिपोर्ट आयी थी, जिसमें दुनिया भर में भारत को ग़रीब और असमानता वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश की कुल पूँजी का 57 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ़ 10 फ़ीसदी अमीरों के हाथों में है, जबकि देश की कुल पूँजी में देश की आबादी के 50 फ़ीसदी के पास महज़ 13 फ़ीसदी ही हिस्सा है। निश्चित ही यह आँकड़े विचलित करने वाले हैं।

वल्र्ड इनिक्वैलिटी लैब की रिपोर्ट में भारत को ग़रीब और असमान देश बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का मध्य वर्ग अमीरों की तुलना में लगभग ग़रीब है। देश की कुल कमायी में मध्य वर्ग का हिस्सा 29.5 फ़ीसदी है और 33 फ़ीसदी पूँजी सबसे अमीर 10 फ़ीसदी लोगों के हाथ में है। कमायी में सबसे अमीर एक फ़ीसदी लोगों का हिस्सा 65 फ़ीसदी है।

एक और रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के लाखों अमीर बेहतर व्यापार माहौल और बेहतर जीवन (लाइफ स्टाइल) के लिए देश छोड़ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अमीरों के पलायन की संख्या देखें, तो भारत का स्थान चीन के बाद दूसरा नंबर हैं। हाल के वर्षों में, ख़ासकर नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद अक्सर यह कहा गया है कि विदेशों से भारत में निवेश बढ़ा है। ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि जब विदेशी निवेशक भारत की तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं, तो भारत के अमीर क्यों देश छोडक़र विदेश जा रहे हैं?

भारत के अमीर व्यक्ति भारत छोडक़र ऐसे देशों में जाना चाहते हैं, जहाँ वह सुरक्षित महसूस कर सकें। कुछ रिपोर्टर यह भी दावा करते हैं कि अपोलो टायर्स के वाइस चेयरमैन और एमडी नीरज कँवर जैसे लोग पिछले 10 साल में भारत छोडक़र विदेश जाने वालों में शामिल हैं। सिर्फ़ सन् 2020 एक ऐसा साल रहा, जब भारतीय अमीरों के विदेश जाने की संख्या एक लाख से कम, 85,256 थी। हालाँकि इसका कारण कोरोना से लगी पाबंदियाँ थीं।

भारतीयों अमीरों के देश छोडक़र विदेश जाने के यह आँकड़े हाल में सामने आये, जब संसद में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक सवाल के लिखित जवाब में साल-दर-साल भारतीयों के देश की नागरिकता छोडऩे की सूची जारी की। जानकारों के मुताबिक, भारतीय देश छोडक़र विदेश में बसने के लिए रेसिडेंस बाई इंवेस्टमेंट का रास्ता अपनाते हैं। अर्थात् वे जिस देश में जाते हैं, वहाँ निवेश के लिए उन्हें नागरिकता मिलती है।

इन भारतीय अरबपतियों को एचएनआई या डॉलर मिलिनेयर्स कहा जाता है। इन लोगों के भारत छोडऩे के कई कारण सामने आये हैं, जिनमें भारत में ईडी, इनकम टैक्स के छापे भी एक कारण हैं; क्योंकि बहुत-से बिजनेसमैन मानते हैं कि यह छापे राजनीतिक कारणों से ज़्यादा होते हैं।

इसके अलावा यह अमीर इन देशों में बेहतर अवसर मिलने की उम्मीद करते हैं। साथ ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ, बेहतर लाइफस्टाइल और बच्चों के बेहतर शिक्षा शामिल हैं। हाल में हेनले वैश्विक नागरिक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में हाई नेट वर्थ (एचएनआई) ग्रुप के $करीब 3.55 लाख के $करीब लोग हैं। भारत से बाहर जाने वाले ज़्यादातर लोगों में वे लोग शामिल हैं, जो दिल्ली और मुंबई जैसी जगहों में रहते हैं। हैरानी की बात है कि दिल्ली से बाहर जाने वालों का एक मुख्य कारण प्रदूषण है। इसके अलावा कोलकाता, बेंगलूरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, गुडग़ाँव, अहमदाबाद जैसे शहर भी अमीरों को ज़्यादा नहीं भाते।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, एचएनआई अमीरों के मामले में भारत के अमेरिका, चीन और जापान के बाद चौथा नंबर है। विशेषज्ञों के मुताबिक, हाल के वर्षों में निवास के ज़रिये निवेश की माँग में बढ़ोतरी हुई है और इस मामले में यूएस के ईबी-5 वीजा की माँग तेज़ी से बढ़ी है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया का ग्लोबल टैलेंट इंडिपेंडेंट वीजा, पुर्तगाल का गोल्डेन वीजा और ग्रीस का रेसिडेंस बाई इंवेस्टमेंट प्रोग्राम भी भारतीय अमीरों में काफ़ी लोकप्रिय है।

भारत पिछले साल पुर्तगाल गोल्डन वीजा लेने वालों में  तीसरे स्थान पर रहा। इन देशों में रेजिडेंट बनने का आधार आवेदक की प्रॉपर्टी की वैल्यू (न्यूनतम धन) और आप कितने लोगों को रोज़गार दे सकते हो, इस पर निर्भर करता है। इन देशों के इस मामले में अपने-अपने क़ायदे हैं, जिनके अनुसार ही आपको निवासी का अधिकार हासिल हो सकता है। इन देशों के नियमों के मुताबिक, एक निश्चित अवधि के बाद उस देश का पासपोर्ट आवेदक को मिलता है। पुर्तगाल के मुक़ाबले आवेदक को अमेरिका में ज़्यादा धन निवेश करने की ज़रूरत रहती है और वहाँ ईबी-5 वीजा होता है। अमेरिकी नागरिकता के मामले में भारत तीसरे नंबर पर है।

भारत पर असर

निश्चित ही इसका व्यापक असर देश की इकोनॉमी पर पड़ता है। भारत से विदेश जाने वाले इन लोगों में कई काफ़ी प्रतिभाशाली भारतीय होते हैं। उनके देश छोडऩे के कारण उनकी ऊर्जा और योग्यता से भारत वंचित रह जाता है। मोदी सरकार लगातार कह रही है कि भारत पाँच ट्रिलियन की इकोनॉमी की तरफ़ बढ़ रहा है; लेकिन अमीरों के इस तरह देश छोडक़र विदेशों में जा बसने से निश्चित ही भारत की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। बहुत-से विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्तमान हालत में देश की इकोनॉमी को पाँच लाख करोड़ डॉलर तक पहुँचाने में शायद लक्ष्य से कहीं ज़्यादा वक़्त लगे।

इसका असर स्टार्टअप्स इकोसिस्टम पर भी होगा। साथ ही तेज़ी से बिलियन डॉलर वैल्यूएशन वाली कम्पनियाँ ऊपर नहीं उठ पाएँगी। देश छोडक़र विदेश में जाने वाले अमीरों की जो संख्या सरकार के आँकड़ों से सामने आयी है, उससे तो सरकार के बेहतर इकोनॉमी के दावों पर सवालिया निशान लगता है। सरकार लगातार कह रही है कि देश में व्यापार करना पहले से सुगम हुआ है। देश की आर्थिक रफ़्तार तेज़ है और यहाँ उन्नति के पहले से बेहतर अवसर हैं। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि सरकार के दावे यदि सही हैं, तो लाखों की संख्या में अमीर भारत छोडक़र क्यों जा रहे हैं?

ग्लोबल वेल्थ माइग्रेशन रिव्यू की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि साल 2020 में देश छोडऩे वालों की सूची में भारत से ऊपर सिर्फ़ चीन था। उसके बाद रूस था। सरकार का दावा रहा है कि देश में रहन-सहन में बेहतरी आयी है। यदि यह सही है, तो फिर क्यों इतने लोग देश छोड़ गये? चीन और रूस के अमीर यदि देश छोड़ते हैं, तो बात इसलिए समझ आती है कि उन देशों में राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं है। चीन के जैक मा जैसे बड़े व्यापारी को देश छोडक़र जाने को इसी कारण से मजबूर होना पड़ा था। इन देशों में अमीरों पर स$ख्ती करने और उन्हें दबाये जाने की रिपोर्ट हाल में काफ़ी आयी है।

भारत में पहले माहौल अलग था; लेकिन अब माना जाता है कि आप सरकार के $िखलाफ़ नहीं बोल सकते। तो क्या भारत भी चीन और रूस जैसी स्थितियों की तरफ़ बढ़ रहा है? वैसे भारत में दशकों से व्यापारियों को सरकार ने संसाधन उपलब्ध करवाये हैं। उनके हिसाब से नियम तक बनाये गये हैं। सस्ती ज़मीन दी गयी, ताकि वे कारोबार कर सकें। बैंकों से आसान शर्तों पर ऋण मिला है। यहाँ तक कि सत्ता में बैठे लोगों तक उनकी बेहतर पहुँच रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि कुछ तो कारण होगा कि यह अमीर भारत छोडक़र जा रहे हैं।

कब, कितने अमीर गये विदेश?

वर्ष    संख्या

2011       1,22,819

2012       1,20,923

2013       1,31,405

2014       1,29,328

2015       1,31,489

2016       1,41,603

2017       1,33,049

2018       1,34,561

2019       1,44,017

2020         85,256

2021       1,63,370

2022       2,25,620

अमेरिकी बैंकिंग संकट से हडक़ंप

जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने घोषणा की कि अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली सुरक्षित थी और कठोर बैंक विनियमन की बात कही थी, उस समय अमेरिकी नियामकों को सिलिकॉन वैली बैंक और सिग्नेचर बैंक के पतन के बाद उपायों की एक शृंखला के साथ क़दम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा था, जिससे  व्यापक संकट पैदा होने का ख़तरा था। संदेश स्पष्ट था कि यह अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता और विश्वसनीयता के बारे में शेख़ी बघारने का एक अति उत्साही प्रयास था।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट सावधानी और उचित परिश्रम की क़ीमत पर लालच और अतिभोग की सीमा लाँघने का एक उदाहरण है। अमेरिकी बैंकों ने कथित तौर पर वित्तीय नियमों की धज्जियाँ उड़ायीं और बाज़ारों के चढऩे, ऋण का अत्यधिक लाभ उठाने, क्रेडिट बूम, जोखिमों का ग़लत अनुमान लगाने, बैंकों द्वारा ऑफ-बैलेंस शीट संचालन से एक बड़ा संकट उत्पन्न हुआ। विनियमन का पालन नहीं करना, मुद्रास्फीति को कम करने के लिए जोखिम भरी मौद्रिक नीति दोषी थे। बाइडेन ने कहा- ‘अमेरिकी भरोसा कर सकते हैं कि अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली सुरक्षित है। आपकी जमा राशि आपके लिए हर समय उपलब्ध होगी, जब भी आपको इसकी ज़रूरत होगी।’

बाइडेन ने कहा- ‘इस गड़बड़ी के लिए ज़िम्मेदार लोगों को पूरी तरह से जवाबदेह ठहराने और बड़े बैंकों की निगरानी को मज़बूत करने के हमारे प्रयासों को जारी रखने के लिए वे प्रतिबद्ध हैं, ताकि हम फिर से इस स्थिति में न जाएँ। उन्होंने कहा- ‘मैं बैंकिंग नियामकों को कहने जा रहा हूँ कि बैंकों के लिए नियम मज़बूत किये जाएँ, ताकि इस तरह की नाकामी की दोबारा गुंजाइश न बचे और अमेरिकियों की छोटे व्यापार में रोज़गार की रक्षा हो सके।’ 

भारत पर प्रभाव

अब यह भारत जैसे अन्य देशों के लिए है कि वे इसका आकलन करें कि इसका उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? सिलिकॉन वैली बैंक पिछले साल तक शीर्ष 20 अमेरिकी वाणिज्यिक बैंकों में से एक था। यह सन् 2008 के वित्तीय संकट के बाद से अमेरिका में बन्द होने वाला सबसे बड़ा बैंक है, जिसने अर्थव्यवस्था को लगभग पंगु बना दिया था।

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस के अनुसार, अमेरिका में सिग्नेचर बैंक और सिलिकॉन वैली बैंक की विफलताएँ, जो क्रिप्टो क्षेत्र के प्रमुख ऋणदाता थे; संरचनात्मक कारकों के कारण भारत और एशिया-प्रशांत पर सीमित प्रभाव पडऩे की सम्भावना थी। हालाँकि एक तेज़ी से अन्योन्याश्रित वित्तीय दुनिया में वैश्विक वित्तीय संकट का राष्ट्रों में अर्थव्यवस्थाओं और वित्त पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। वैश्वीकरण के आगमन और बाहरी वित्त पोषण के लिए भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र की पहुँच के साथ यह संकट की चपेट में आ सकता है।

अमेरिका और अन्य विकसित देशों की तुलना में संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर मामूली प्रभाव पड़ सकता है। भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सबप्राइम मोर्टगेज सम्पत्तियों या विफल संस्थानों का कोई प्रत्यक्ष जोखिम नहीं है। इसका बहुत सीमित ऑफ बैलेंस शीट एक्सपोजर है। भारत का विकास मुख्य रूप से घरेलू खपत और निवेश से प्रेरित है। भारतीय वित्तीय प्रणाली भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से काफ़ी हद तक बच सकती है। बैंकिंग प्रणाली सुरक्षित और लचीली है, उच्च पूँजीकरण और सिकुड़ते अंतर-बैंक लिंकेज के कारण; लेकिन चिन्ता का एकमात्र कारण ग़ैर-निष्पादित सम्पत्ति (एनपीए) है।

कुल मिलाकर भारतीय बैंकिंग और ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों ने कई झटकों के लिए लचीलापन प्रदर्शित किया है। अर्थव्यवस्था के लक्षित क्षेत्रों के लिए महामारी के बाद के सार्वजनिक नीति उपायों के प्रभावी वितरण की सुविधा प्रदान की है और भारतीय अर्थव्यवस्था की व्यापक-आधारित वसूली का समर्थन करते हुए वित्तीय सुदृढ़ता को संरक्षित किया है। आरबीआई ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि वित्त के क्षेत्र में तकनीकी नवाचारों की वर्तमान लहर और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के तहत 14 उद्योगों को आपूर्ति शृंखलाओं और घरेलू समर्थन के वैश्विक पुनर्सन्तुलन से उत्पन्न होने वाले नये विकास के अवसर नये व्यापार के रास्ते खोलते हैं। तकनीक के नेतृत्व वाले जटिल नेटवर्क, वैकल्पिक वित्त विकल्प और भू-राजनीतिक विकास से उभरते जोखिमों के प्रति सचेत रहना महत्त्वपूर्ण है।

वित्तीय क्षेत्र को भी जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों और अनिश्चितताओं के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता है। रिजर्व बैंक की विनियामक और पर्यवेक्षी नीतियाँ वित्तीय स्थिरता को बनाये रखते हुए एक गतिशील, मज़बूत, लचीला और प्रतिस्पर्धी वित्तीय प्रणाली को बढ़ावा देने का प्रयास करेंगी। हालाँकि भारत के लिए महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मज़बूत नियामक प्रणाली के बावजूद कोई भी चेतावनी के संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है।

प्रदूषित क्यों होते जा रहे हमारे शहर?

भारत दुनिया का आठवाँ सर्वाधिक प्रदूषित देश बन चुका है। दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रदूषित 50 शहरों में से 39 शहर भारत के हैं। रैंकिंग स्विस फर्म की वल्र्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट में ख़ुलासा हुआ है कि देश की हवा में पीएम2.5 लेवल 53.3 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर तक गिर गया है, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से 10 गुना भी ज़्यादा है। यह 2022 की रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें 131 देशों के 7,300 से ज़्यादा शहरों के 30,000 से ज़्यादा ग्राउंड बेसड सरकारी, ग़ैर-सरकारी मॉनिटरों से प्रदूषण जाँच के आँकड़े जुटाये गये थे। 2021 में भारत प्रदूषण के मामले में दुनिया में पाँचवें पायदान पर था। पीएम2.5 अति प्रदूषण वाली स्थिति है। वल्र्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट के अनुसार, टॉप 100 प्रदूषित शहरों में भी भारत के शहर बहुत ज़्यादा हैं।

देश की राजधानी दिल्ली दुनिया की दूसरी सबसे ज़्यादा प्रदूषित राजधानी रही है। दिल्ली के पड़ोसी शहर गुडग़ाँव, नोएडा, ग़ाज़ियाबाद और फ़रीदाबाद में प्रदूषण स्तर में गिरावट आयी है। हालाँकि दिल्ली में आठ फ़ीसदी की गिरावट की गयी है। और  पिछली बार के नंबर एक से दूसरे नंबर पर है। लेकिन दुनिया 50 शहरों में सबसे ज़्यादा भारतीय शहर हैं, जो कि चिन्ता का विषय है। सवाल यह है कि भारत के शहरों में प्रदूषण लगातार बढ़ क्यों रहा है? भारत में दिल्ली के अलावा राजस्थान का भिवाड़ी सबसे प्रदूषित शहर है। वहीं दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर चाड की राजधानी नदजामेना है। भारत में सबसे तेज़ी से प्रदूषण में गिरावट ताजनगरी आगरा में दर्ज की गयी है।

हालाँकि दुनिया में सबसे प्रदूषित शहर पाकिस्तान का लाहौर है। दूसरा सबसे प्रदूषित शहर चीन का होटन, तीसरा भारत का भिवाड़ी है। ज़ाहिर है बढ़ते वाहनों, तरल ईंधन के उपयोग, कंस्ट्रक्शन, कार्बन, बढ़ती आबादी, घटता वन क्षेत्र और बढ़ती गंदगी इसके मुख्य कारण हैं। अगर अभी से प्रदूषण को कम करने की कोशिश नहीं की गयी, तो भारत के घनी आबादी वाले बड़े शहर आने वाले 40 वर्षों में रहने लायक नहीं बचेंगे। पिछले साल दुनिया में पीएम2.5 की वजह से हर साल 20 लाख से ज़्यादा असामयिक मौतें हुई हैं।

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने प्रदूषण को नियंत्रण में लाने के लिए हाल ही में दिल्ली और एनसीआर में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी। एनजीटी ने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान को प्रदूषण से निपटने के लिए साथ आने को कहा है। आख़िर देश में कब तक किसानों को पराली जलाकर प्रदूषण फैलाने की राजनीति होती रहेगी? क्यों न सरकारें अपने स्तर पर प्रदूषण से निपटने के बारे में सोचती हैं? दिल्ली सरकार सडक़ों पर पानी छिडक़कर प्रदूषण कम करने की जो कोशिश कर रही है, उससे प्रदूषण की समस्या कुछ देर के लिए कम तो हो सकती है; लेकिन हमेशा के लिए हल नहीं होने वाली। इसके लिए सभी तरह के प्रदूषणों से निपटने के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करना होगा। वाहनों की संख्या घटानी होगी। लोगों से सार्वजनिक वाहनों में चलने की अपील करनी होगी। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी वाहनों का सही विकल्प इलेक्ट्रिक वाहन हैं, उनका इस्तेमाल बढ़ाना होगा। धूम्रपान और धुआँ पैदा करने वाले अन्य संसाधनों पर रोक लगानी होगी। लोगों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करना होगा।

पिछले 30 वर्षों में जिस तेज़ी से भारत में वन क्षेत्र कम हुए हैं और शहरों का क्षेत्रफल बढ़ा है, उसने प्रदूषण तेज़ी से बढ़ाया है। यह डिजिटलाइजेशन का दौर है, इस दौर में जब हर काम करने के लिए इलेक्ट्रानिक उपकरण हैं, इलैक्ट्रिक वाहन भी बन चुके हैं, प्रदूषण को आसानी से कम किया जा सकता है। लेकिन कुछ पूँजीपतियों के स्वार्थ के चलते यह सम्भव नहीं हो पा रहा है, जिसके पीछे सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव भी बड़ा कारण है। पर पूँजीपतियों के मुनाफ़ा कमाने के लालच को सरकारें इसी तरह समर्थन देती रहीं, तो इसके घातक परिणाम सभी को झेलने होंगे।

न्यायपालिका को बख़्श दीजिए हुजूर!

शिवेंद्र राणा

राजनीतिक चिंतक लास्की के अनुसार, ‘एक राज्य की न्यायपालिका, अधिकारियों के ऐसे समूह के रूप में परिभाषित की जा सकती है, जिनका कार्य राज्य के किसी क़ानून विशेष के उल्लंघन या तोडऩे सम्बन्धी शिकायत, जो विभिन्न लोगों के बीच या नागरिकों व राज्य के बीच एक दूसरे के विरुद्ध होती है; का समाधान वह फ़ैसला करना है।’

संवैधानिक नियमों के व्याख्याकार एवं न्याय के अधिष्ठाता होने के कारण न्यायपालिका का देश में न्यायपालिका और सेना दो ऐसी संस्थाएँ है; जिनके प्रति आम भारतीयों के मन में अगाध श्रद्धा है। आज भी देश का आम नागरिक किसी सरकार के बजाय भारतीय सेना के भरोसे ही राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति आश्वस्त होता है। उसी प्रकार जब दमन-शोषण से पीडि़त आम आदमी का यह विश्वास होता है कि न्यायपालिका उसे न्याय देगी और उसके अधिकारों की रक्षा करेगी।

उच्चतम न्यायालय का ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जय:’ है। न्याय-धर्म का यह मंदिर पिछले कुछ समय से नकारात्मक कारणों से चर्चा में है। कारण है- न्यायपालिका का राजनीतिकरण। वर्तमान सत्तारूढ़ दल का नौकरशाही प्रेम बढ़ते हुए अब न्यायपालिका तक प्रसारित होने लगा है। न्यायाधीश ए.के. गोयल, न्यायाधीश आर.के. अग्रवाल, न्यायाधीश पी. सदाशिवम, न्‍यायाधीश रंजन गोगोई जैसे इसके कई उदाहरण हैं। सरकार यह समझने के लिए तैयार नहीं है कि उसकी कृपादृष्टि नौकरशाही की भाँति न्यायपालिका को भी दूषित और पथभ्रष्ट करेगी। उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायधीश दीपक गुप्ता ने पिछले दिनों ठीक ही कहा था कि न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद कोई लाभ नहीं दिया जाना चाहिए; क्योंकि यह जारी रहा, तो न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लिखते हैं- ‘जो आदमी राजनीति में सही ढंग से सोचता है, उसकी प्राथमिकताएँ नहीं बदलतीं।’

सन् 2014 में देश के बदलाव के नाम पर आयी हुई सरकार की प्राथमिकताएँ देश का बदलाव था, न कि न्यायपालिका में अनाधिकृत हस्तक्षेप की ग़लत परम्परा का निर्वहन। लेकिन ऐसा हुआ है। न्यायपालिका के राजनीतिकरण का विशेष मामला लक्ष्मणा चंद्रा विक्टोरिया ग़ौरी का है, जिनकी नियुक्ति फरवरी, 2023 में मद्रास उच्च न्यायालय में बतौर न्यायमूर्ति हुई। मद्रास उच्च न्यायालय में वकील रहीं विक्टोरिया ग़ौरी का नाम कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित करने के बाद से ही ख़ासा विवाद हुआ। इस विवाद से जुड़ी दो कारण थे; पहला- ग़ौरी का सत्तारूढ़ भाजपा से जुड़ाव, और दूसरा- घृणापूर्ण भाषण (हेट स्पीच) का मामला। हालाँकि एल. ग़ौरी को अतिरिक्त न्यायाधीश बनाये जाने के ख़िलाफ़ उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका पीठ ने ख़ारिज़ कर दी। वैसे भी किसी राजनीतिक दल से सम्बन्ध न्यायधीश के रूप में नियुक्ति हेतु अयोग्यता नहीं माना जाता, परन्तु तब भी ग़ौरी के सार्वजनिक द्वेषपूर्ण वक्तव्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए थी। मूल प्रश्न है कि ऐसे विवादों को समझने में सरकार और कॉलेजियम से भूल हुई या यह प्रायोजित नियुक्ति थी? दोनों ही मामलों में न्यायपालिका के सम्मान पर प्रश्नचिह्न लगा।

इसी प्रकार 2014 में उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशिवम सेवानिवृत्ति के तुरन्त बाद केरल के राज्यपाल बनाये गये थे। पुन: मुख्य न्यायाधीश तरुण गोगोई सेवानिवृत्ति के तुरन्त बाद 2020 में राज्यसभा के लिए नामित किये गये, जिसके बाद विवाद प्रारम्भ हो गया। वैसे क़ानूनन उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को राज्यसभा भेजने में कोई भी संवैधानिक दिक़्क़त नहीं है। अनुच्छेद-80 के तहत राज्यसभा की सदस्यता के लिए नामित किये जाने वालों में कला, साहित्य, विज्ञान आदि के साथ विधि विशेषज्ञ भी शामिल हैं। हालाँकि सामान्य तौर पर महत्त्वपूर्ण पदों से सेवानिवृत्त हुए लोगों की अन्य नियुक्तियों के लिए दो साल तक प्रतिबंध रहता है। इस लिहाज़ से देखें, तो गोगोई को नामित करने में नि:संदेह जल्‍दबाज़ी की गयी है।

वैसे भी नौकरशाही की तरह ही भ्रष्टाचार का रोग न्यायपालिका को भी अपनी गिरफ़्त में ले चुका है। अभी सीबीआई ने जुलाई, 2020 में सेवानिवृत्त हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस.एन. शुक्ला के विरुद्ध आय से अधिक सम्पत्ति का केस दर्ज किया है। किसी पूर्व न्यायाधीश के ख़िलाफ़ दर्ज भ्रष्टाचार का यह दूसरा मामला है। इससे पहले जाँच एजेंसी द्वारा दिसंबर, 2019 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश एस.एन. शुक्ला के साथ आई.एम. कुद्दुसी, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और चार अन्य के ख़िलाफ़ लखनऊ स्थित मेडिकल कॉलेज के पक्ष में पैसे लेकर आदेश प्राप्त करने के आरोप में मुक़दमा दर्ज किया गया।

न्यायपालिका की अधोगति के पाश्र्व में दूसरा गम्भीर मुद्दा कॉलेजियम सिस्टम है। बाक़ी तकनीकी विषय को छोड़ भी दें, तो न्यायधीशों का स्वयं अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने के परिपेक्ष्य में परिवारवाद-वंशवाद को प्रश्रय देने का मोह विशुद्ध अनैतिकता है। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के प्रति उच्चतम न्यायालय का रवैया उसका संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग ही कहा जाएगा। यह दुनिया का एकमात्र लोकतंत्र है, जहाँ न्यायाधीश संसद यानी जनप्रतिनिधि शासन के नियमों को अस्वीकृत करने को तत्पर है। इसी कारण उच्चतम न्यायालय पर हाल के कुछ वर्षों में न्यायिक निरंकुशता का आरोप निरंतर लगता रहा है। ऐसे में क्या परिवारवाद के समर्थक न्यायधीशों को सामाजिक-राजनीतिक शुचिता पर बोलने का नैतिक अधिकार है?

न्यायपालिका के राजनीतिकरण के अतीत पर दृष्टिपात करें, तो देखेंगे कि स्वतंत्र भारत में आज़ादी के बाद मात्र अगले दो दशकों में ही न्यायपालिका में दूषित राजनीतिक स्वार्थ का आरोपण शुरू हो गया था। मार्च, 1973 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ। वरिष्ठता क्रम की अनदेखी करते हुए ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया। यह शासन सत्ता द्वारा न्यायपालिका को नियंत्रित करने का पहला प्रत्यक्ष प्रयास था। इससे पूर्व कांग्रेस सरकार के तत्कालीन क़ानून मंत्री एच.आर. गोखले ने सम्पत्ति के अधिकार के मसले पर कहा था कि न्यायालय का रवैया सरकार की प्रतिबद्धता की राह में एक बड़ी बात है। ऐसा ही एक बयान इंदिरा गाँधी के क़रीबी पी.एन. हक्सर ने देते हुए न्यायाधीशों को सरकार की नीतियों और दर्शन के प्रति प्रतिबद्ध होने को कहा था। उसी समय मुंबई में एक जन समारोह में न्यायमूर्ति के.एस. हेगडे ने चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा था कि राजनीतिक व्यवस्था और नेताओं के निजी स्वार्थ ने प्रशासनिक मशीनरी के कार्यों को विकृत कर दिया है।

उस दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने ए.एन. रे की नियुक्ति का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में ‘नियमों से बाहर जाकर की जा रही पदोन्नतियों के द्वारा उच्चतम न्यायालय को सरकार के अधीन किये जाना’ कहा था। जिस पर इंदिरा गाँधी ने इसे हल्का निष्कर्ष निकाला जाना कहकर इस आलोचना को ख़ारिज कर दिया था। संविधान विशेषज्ञ ए.जी. नूरानी ने भी इसे न्यायपालिका के राजनीतिकरण का प्रयास कहते हुए चेतावनी दी थी कि अगर इन चुनौतियों से नहीं निपटा गया, तो लोगों की व्यक्तिगत आज़ादी ख़तरे में पड़ सकती है। वहीं 15 मार्च, 1975 को नई दिल्ली में एक सेमिनार में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. सुब्बाराव ने कहा था- ‘निरंकुश सत्ता हर जगह स्वयं को स्थापित कर लेती है और सार्वजनिक हित के नाम पर स्वयं को सत्ता में बनाये रखती है।’

नूरानी एवं सुब्बाराव सही साबित हुए और देश को इंदिरा गाँधी के आपातकालीन तानाशाही का सामना करना पड़ा। आपातकाल के दौरान भी न्यायपालिका राजनीतिक गतिविधियों से दूषित होती रही। इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर न्यायालयी नियुक्ति में अनाधिकृत हस्तक्षेप किया था। न्यायमूर्ति एच.आर. खन्ना ने तब भारत के न्यायिक इतिहास के विख्यात और प्रेरणादायी एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) मामले में तानाशाह सरकार के विरुद्ध जाकर नागरिक स्वतंत्रता को सुरक्षित करने वाला फ़ैसला दिया था। इससे क्रुद्ध इंदिरा गाँधी ने पुन: नियमों का अतिक्रमण किया तथा न्यायमूर्ति खन्ना पर अधिक्रमण (सुपरसीड) करते हुए कर न्यायमूर्ति एच.एम. बेग को प्रधान न्यायधीश नियुक्त करवाया, जो सरकार समर्थक थे।

ध्यातव्य है कि 1957 में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य के.एस. हेगड़े भी इस्तीफ़ा देकर मैसूर उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बने थे। इसके अतिरिक्त कांग्रेस शासन-काल में ही सन् 1970 में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे मोहम्मद हिदायतुल्ला को सन् 1979 में उपराष्ट्रपति बनाया गया। वहीं उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा कांग्रेस के ही टिकट पर सन् 1998 में राज्यसभा सदस्य बने। लेकिन न्यायपालिका में न्यायमूर्ति इस्लाम की सार्वजनिक जीवन यात्रा भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के घालमेल का सबसे भद्दा उदाहरण है।

उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता बहरुल इस्लाम को कांग्रेस ने सन् 1962 तथा सन् 1968 में राज्यसभा भेजा। लेकिन दूसरा कार्यकाल पूरा करने के पूर्व ही उन्हें असम और नगालैंड (अब गुवाहाटी) उच्च न्यायालय का न्यायधीश नियुक्त किया गया। बाद में वह उच्चतम न्यायालय पहुँचे। सन् 1983 में न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्ति के तुरन्त बाद कांग्रेस ने पुन: उन्हें तीसरी बार राज्यसभा भेजा। कहा जाता है कि इस कृपा की मुख्य वजह न्यायमूर्ति इस्लाम का बिहार के कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र को विवादस्पद अर्बन को-आपरेटिव बैंक घोटाले में क्लीन चिट देना था। इसी प्रकार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी पर भ्रष्टाचार के पर्याप्त प्रमाणों के पश्चात् मई, 1993 में लाया गया महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया, क्योंकि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने इसमें हिस्सा नहीं लिया।

कांग्रेस द्वारा प्रारम्भ की गयी न्यायपालिका में राजनीति के दूषित आरोपण की अशोभनीय परम्परा को अब भाजपा निभा रही है और कुतर्कों से इसका औचित्य साबित करने पर लगी है। इस देश की राजनीति में एक कुत्सित परम्परा स्थायी हो चुकी है। हर अनैतिक कार्य के समर्थन में पिछली सरकारें भी तो ये कर चुकी हैं; का कुतर्क स्थायी हो चुका है। अगर पिछली सरकारों की गलतियाँ ही जारी रखनी थीं, तो आपकी क्या आवश्यकता थी? पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अपनी आत्मकथा ‘जीवन जैसा जिया’ में लिखते हैं- ‘जनमत लहर की तरह चलता है। एक बार जो राय बन जाती है, वह मज़बूत होती जाती है।’ फ़िलहाल जनमत की राय इस दिशा में बन रही है कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं राजनीतिकरण कर रही है। हो सकता है कि अभी सत्ता को बहुमत की लहर और जन-समर्थन के चलते ऐसे विरोधी तर्क समझ न आते हों; लेकिन देर-सबेर इनका दुष्परिणाम आना तय है। रही बात जनमत के लहर की, तो ऐसी लहर के सामने जब जन-विरोध का कहर टूटता है, तो अर्श और फ़र्श के बीच का अन्तर बिलकुल स्पष्ट समझ आने लगता है।

ऐसे जन-कोप ने इंदिरा गाँधी के अहंकार को ज़मीन दिखायी थी। राजीव गाँधी भी अपनी कुर्सी गँवा बैठे। ऐसे ही फीलगुड शाइनिंग इंडिया के नारों के विरुद्ध जनमत लहर ने अटल सरकार की सत्ता में वापसी की सारी संभावनाएँ ध्वस्त कर दी थीं। इसलिए ऐसे जनमत क्रोध को नज़रअंदाज़ करना कम-से-कम राजनीतिक जीवन के लिए तो ख़तरनाक साबित हो सकता है। सरकार को समझना होगा कि न्यायपालिका में व्याप्त संदूषण न्याय और न्यायिक प्रक्रिया दोनों को दूषित करेगा। लेकिन जिस राष्ट्र में न्याय प्रक्रिया दूषित होती है, वहाँ शनै:-शनै: अराजकता व्याप्त हो जाती है। इस अप्रिय स्थिति से बचना ही सरकार का ध्येय होना चाहिए।

(लेखक पत्रकार हैं और ये उनके अपने विचार हैं।)