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महिलाओं की मुंबई

सेंट्रल मुंबई की संकरी सड़कों पर कार लकड़ी से बनी बालकोनियों वाले भव्य एडवर्ड काल के अपार्टमेंट्स के सामने से गुजरती है. पेड़ों के पत्तों से छनकर आ रही सर्दियों की नर्म धूप 52 साल की सूनी तारापोरवाला के चेहरे को एक सुनहरी आभा प्रदान कर रही है. सूनी सलाम बांबे और मिसिसिपी मसाला सहित कई फिल्मों की स्क्रिप्ट लिख चुकी हैं और बतौर निर्देशिका उनकी पहली फिल्म लिटिल जीजू रिलीज होने के लिए तैयार है. फिलहाल मंजिल है स्लेटर रोड स्थित उनका दफ्तर.

अमेरिका में कोई मुहूर्त शॉट नहीं होता मगर हमारे यहां है. अगर काम धीमी रफ्तार से चलता तो हम कहते थे, अच्छा, वो नारियल लाओ

हम इमारत की लिफ्ट में दाखिल होते हैं और ये ऊपर की तरफ चल पड़ती है. इसमें लगे लकड़ी के पैनल और कई दूसरी चीजें लिफ्ट के काफी पुरानी होने की ताकीद करते हैं. मैं सूनी से सलाम बांबे की तारीफ और उससे जुड़ी दूसरी घिसी-पिटी बातें करने से खुद को रोकती हूं और लिफ्ट की कलात्मक बनावट पर चर्चा करने लगती हूं.

मगर हम दोनों के बीच असहजता का ये माहौल छंटने में ज्यादा देर नहीं लगती. दरअसल सूनी का स्वभाव ही ऐसा है कि आप उनके साथ बात करते हुए जल्द ही सहज हो जाते हैं. ऊपर से उनकी फिल्म के किरदारों जॉन अब्राहम, बोमन ईरानी, महाबानू कोतवाल और सूनी के बेटे व फिल्म में फुटबाल के पीछे पागल छोटे से जीजू की कमरे में लगी तस्वीरें भी इतनी दिलचस्प हैं कि आपको बातें करने के लिए ढेरों चीजें मिल जाती हैं. फिल्म के बारे में बताते हुए सूनी कहती हैं, ‘मेरी फिल्म में काफी किरदार थे. जब मैं स्क्रिप्ट लिख रही थी तभी से मुझे पता था कि मुझे किसे लेना है. मैंने अपने बच्चों जहां और इयाना के लिए भी भूमिकाएं लिखीं और ये उनके स्वभाव से पूरी तरह मेल खाती हैं. ये उनके व्यक्तित्व को ध्यान में रखते हुए लिखी गईं हैं.’

लिटिल जीजू की पूरी शूटिंग मुंबई में ही हुई है और इसे उन जगहों पर फिल्माया गया है जिन्हें पारसियों का इलाका कहा जाता है. ये एक ऐसी दुनिया है जिससे सूनी अच्छी तरह वाकिफ हैं. वो कहती हैं, ‘ये एक तरह से मेरी दुनिया ही है, ये वो बांबे है जहां मैं बड़ी हुई हूं और जहां मैं अब भी रहती हूं. पर हां, ये कहानी काल्पनिक भी है और भले ही इसकी पृष्ठभूमि में पारसी समुदाय है मगर मुझे उम्मीद है कि बाकी समुदायों के लोगों को भी इसमें अपनी जिंदगी से जुड़ी चीजें महसूस होंगी. ऐसा इसलिए क्योंकि फिल्म उन्हीं चीजों से प्रेरित है जो आज हमारी दुनिया में हो रही हैं मसलन धर्म का अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करने वाले और उनका विरोध करने वाले लोगों के बीच का टकराव.’

सूनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी तय समय-सीमा के भीतर काम निपटाना. ‘जिन जगहों पर शूटिंग हुई उनमें एक वो भी थी जहां मेरा बचपन बीता. वहां पर हर सुबह शूटिंग शुरू होने से पहले मंदिर में प्रार्थना करके अपने तनाव को कम करने की कोशिश किया करती थी. ये फिल्म बनाने के बाद मैं समझी कि फिल्म इंडस्ट्री में इतना अंधविश्वास क्यों है. यहां आपको अच्छे भाग्य की ज्यादा से ज्यादा जरूरत महसूस होती है. अमेरिका में कोई मुहूर्त शॉट नहीं होता मगर हमारे यहां है. अगर काम धीमी रफ्तार से चलता तो हम कहते थे, अच्छा, वो नारियल लाओ’ हंसते हुए सूनी बताती हैं.

मैं उनसे पूछती हूं कि क्या वो कभी बॉलीवुड की मुख्यधारा की फिल्म बनाने के बारे में सोचेंगी? सूनी कहती हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि मैं ऐसा ठीक तरीके से कर पाऊंगी और पता नहीं कि कोई ऐसी फिल्म देखना भी चाहेगा दरअसल अब बॉलीवुड में एक नई पीढ़ी उभर आई है जो ज्यादा व्यवस्थित तरीके से काम करने लगी है. यहां तक कि संवेदनाएं भी बदल रही हैं.’

इन फिल्मों में दरअसल मुख्य किरदार बांबे ही है. मगर इन निर्देशिकाओं की फिल्में रामगोपाल वर्मा की सत्या या डैनी बोएल की स्लमडॉग मिलियनेयर के शोर-शराबे और हिंसा से अलग हैं

नई पीढ़ी के इन्हीं फिल्मकारों में से एक हैं जोया अख्तर जिन्हें बदली हुई संवेदनाओं का एक उदाहरण कहा जा सकता है. 36 साल की जोया की पहली फिल्म लक बाय चांस हाल ही में रिलीज हुई है. मुंबई के सांताक्रुज स्थित एक्सेल फिल्म्स के ऑफिस में बैठी जोया कहती हैं, ‘90 के दशक के शुरुआती वर्षो तक हिंदी फिल्मों का स्तर इतना गिर गया था कि मुझे पता ही नहीं था कि मैं इसमें कहां फिट होऊंगी. फिर मैंने सलाम बांबे देखी और इसने मेरी सोच बदलकर रख दी. मुझे लगा कि दिखाने के लिए कई कहानियां हैं और जरूरी नहीं कि उन्हें हमेशा ‘लार्जर देन लाइफ’ बना कर ही दिखाया जाए. मैं सूनी को बहुत पसंद करती हूं और मैंने कामसूत्र के दौरान मीरा नायर के साथ काम किया है. ये दोनों एक तरह से फिल्म जगत में मेरी मम्मियां हैं.’

लक बाय चांस में जोया ने बॉलीवुड को अपना विषय बनाया है. इससे पहले इसी विषय पर बनी ओम शांति ओम को दर्शकों ने बहुत पसंद किया था. जोया की फिल्म भी खासी तारीफें बटोर रही है. मगर मेरे दिमाग में सवाल उठता है कि न सिर्फ जोया बल्कि उनका परिवार भी बॉलीवुड से ही जुड़ा रहा है, फिर उन्हें बॉलीवुड में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे चरित्रों पर फिल्म बनाने की धुन कैसे चढ़ी. जवाब आता है, ‘मैं एक तरह से बॉलीवुड की देहरी पर रही हूं. हमारा बचपन कुछ-कुछ बंजारों की तरह बीता. जब हम छोटे थे तो मम्मी फिल्म स्कूल चली गईं थीं इसलिए हम सप्ताहांत में उनके साथ पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में घूमा करते थे. वहां हमने हिंदी फिल्मों के अलावा अनगिनत विदेशी फिल्में भी देखीं. हमारे पास एक प्रोजेक्टर था और हम दीवार पर फिल्में देखा करते थे. वहां हर कोई फिल्मों के बारे में बात करता और कई कलाकारों, कवियों, लेखकों और सहायक निर्देशकों का जमावड़ा रहता. हालांकि मेरे बहुत से दोस्त ऐसे भी रहे जिनका फिल्मों से कोई संबंध नहीं था.’

लक बाय चांस  की स्क्रिप्ट का पहला ड्राफ्ट जोया ने गोवा में तीन महीनों की छुट्टियों के दौरान लिखा. वो बताती हैं, ‘हमने दिल चाहता है खत्म ही की थी और फरहान और रितेश मेरी फिल्म को प्रोडच्यूस करना चाहते थे. मगर हमें सूझ ही नहीं रहा था कि हीरो के लिए किसे चुना जाए क्योंकि वो एक संघर्ष करने वाला और कैसे भी अपना काम निकालने वाला किरदार था जो लोगों से बहुत ज्यादा सहानुभूति भी नहीं रखता था. उस समय लोगों को लगा कि दर्शक इस तरह की फिल्म को पचा नहीं पाएंगे. इसलिए हमने इसे लंबे समय तक ठंडे बस्ते में डाले रखा. इस दौरान मैं कुछ और चीजें करती रही. जब मल्टीप्लेक्सेज का जमाना शुरू हुआ और कॉरपोरेट्स आ गए तो सब कुछ बदल गया. अचानक ही फिल्म उद्योग में पैसा आ गया था. फिर हनीमून ट्रैवेल्स बना रहीं रीमा कागती ने मुझसे फरहान को लेने के लिए कहा और काम शुरू हो गया.’

उधर, 35 साल की किरण राव की नजर में बंबई का सबसे सही प्रतिनिधित्व करने वाली चीज है धोबी घाट और वो इसी नाम से एक फिल्म बना रही हैं. अपने पॉली हिल स्थित ऑफिस में बैठी किरण कहती हैं, ‘मैंने फिल्म की कहानी लिखने से पहले ही इसका शीर्षक सोच लिया था क्योंकि यहां छोटे-बड़े सभी के कपड़े धुलने के लिए आते हैं. ये एक तरह से सबको बराबरी पर ला खड़ा करता है. बांबे भी तो ऐसा ही है.’

स्वाभाविक ही है कि आप सोचें कि उनकी इस फिल्म में आमिर खान अपनी मसल्स चमकाते हुए कपड़ों को धोबी पटका देते नजर आएंगे. मगर फिर आपको पता चलता है कि धोबी घाट में ये काम राज बब्बर और स्मिता पाटिल के बेटे प्रतीक बब्बर कर रहे हैं. इस फिल्म के दूसरे मुख्य किरदारों में दो लड़कियां हैं जिनमें से एक ने उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली एक पेंटर और दूसरी ने अमेरिका से भारत लौटी एक युवती की भूमिका निभाई है.

किरण बताती हैं, ‘ये फिल्म बांबे के बारे में है जो अलग-अलग वर्गों से ताल्लुक रखने वाले चार किरदारों के जरिए इस शहर को समझने का प्रयास करती है. मैं, उनके रोजमर्रा के अनुभवों के जरिए जहां उनकी जिंदगियां उनके बिना जाने एक-दूसरे को थोड़ा-थोड़ा प्रभावित करती हैं, इस शहर की कहानी को एक धागे में पिरोना चाहती थी. मुझे लगा कि तरह-तरह के दृश्यों का कोलाज बांबे की अलग-अलग परतों को समझने में मदद करेगा.’ किरण बताती हैं कि पहले वो फिल्म का फिल्मांकन खुद ही करना चाहती थीं मगर फिर उन्होंने अपना विचार बदल दिया.

सूनी की तरह ही किरण ने भी फिल्म की शूटिंग के लिए वास्तविक जगहों और असल लोगों का इस्तेमाल किया है. वो कहती हैं, ‘कैमरे के सामने सहज रहने वाले सबसे प्रतिभाशाली लोग वो थे जिन्हें गलियों से उठाकर एक किरदार थमा दिया गया था. ये एक बेहद संवादात्मक फिल्म है जिसमें हमने कोशिश की है कि कोई एक्टिंग न करे. यही वजह है कि हमने लोगों की भूमिकाएं वही रखी हैं जो वे असल जिंदगी में हैं. इसलिए एक नौकरानी को नौकरानी ही बनाया गया है. अगर आप इस तरह की असलियत चाहें तो ये मुश्किल नहीं है.’

हालांकि धोबी घाट एक छोटी फिल्म है मगर उसके बावजूद इसके बनने में आ रहे झंझट किसी मेगा मूवी से कम नहीं हैं. खासकर इसलिए क्योंकि इसमें कहीं-कहीं हिंदी फिल्म उद्योग का एक बड़ा सितारा भी है. किरण कहती हैं, ‘हमने इसे सबसे मुश्किल लोकेशंस पर फिल्माया. माहिम के रेलवे ट्रैक्स के पास एक झुग्गी से लेकर रमजान के दौरान आमिर खान के साथ मोहम्मद अली रोड पर शूटिंग करना किसी आर्मी ऑपरेशन सरीखा रहा.’

इन फिल्मकारों से बातचीत के दौरान पूरे वक्त मैं महिला फिल्म निर्देशकों जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करती. इसकी मुख्य वजह ये है कि कुछ समय से अब महिलाओं द्वारा फिल्म निर्देशन कोई नई बात नहीं रही. फराह खान और रीमा कागती जैसी निर्देशिकाओं की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर खासी कामयाबी भी बटोरी है तो सुहासिनी मणिरत्नम और रेवती ने दक्षिण में कई गंभीर फिल्में बनाई हैं. उधर, मीरा नायर और दीपा मेहता ने ऐसी फिल्में बनाई हैं जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर काफी तारीफ मिली है.

जो बात आपका ध्यान अपनी तरफ खींचती है वो ये है कि इन फिल्मों में दरअसल मुख्य किरदार बांबे ही है. मगर इन निर्देशिकाओं की फिल्में रामगोपाल वर्मा की सत्या या डैनी बोएल की स्लमडॉग मिलियनेयर के शोर-शराबे और हिंसा से अलग हैं. सूनी, किरण और जोया बांबे को पृष्ठभूमि में रखकर इस शहर की सहिष्णुता और भौतिक सफलता के लिए लोगों के संघर्ष जसे वृहत्तर विषयों को समझने की कोशिश करती हैं.

इनमें कहीं मुंबई पारसियों का प्यारा सा घर है तो कहीं रुपहले पर्दे के जरिए अपनी जिंदगी को बदलने का सपना देखने वाले उन लोगों का शहर जो देश के कोने-कोने से इसके आकर्षण में बंधे यहां चले आते हैं.  

सिद्धार्थ- द प्रिजनर : महानगरीय सांचे में ढली नीतिकथा

बचपन में पंचतंत्र की कहानियां सुनकर बड़ी हुई हिंदुस्तानी जनता के लिए सिद्धार्थ-द प्रिजनर  की कहानी अपरिचित नहीं है. लालच बुरी बला का पाठ हम सभी ने सीखा है. इस तरह की कहानियों को हम नीति कथाएं कहते हैं. सिद्धार्थ और मोहन की कहानी एक ऐसी ही नीति कथा का मल्टीप्लेक्सीय संस्करण है जो अपना रिश्ता ऋग्वेद और बुद्धनीति से जोड़ती है. फिल्म के मुख्य किरदार के नाम सिद्धार्थ में भी यही अर्थ ध्वनि व्यंजित होता है. कहानी की सीख है : इच्छाएं ही इंसान के लिए सबसे बड़ा बंधन हैं.

मैंने यह फिल्म पिछले साल ओशियंस में देखी थी जहां रजत कपूर को इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला था. ऑन पेपर इस फिल्म का मूल प्लॉट हिंदी सिनेमा इतिहास में आई थ्रिलर फिल्मों में सबसे आकर्षक था. कुछ ही समय पहले जेल से रिहा हुए और अब अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करने की कोशिश में लगे लेखक सिद्धार्थ रॉय की नई किताब की इकलौती पांडुलिपि सायबर कैफे चलाने वाले मोहन के रुपयों से भरे ब्रीफकेस में बदल जाती है. सिद्धार्थ अपनी किताब को लेकर बेचैन है वहीं मोहन की जान उस रूपयों से भरे ब्रीफकेस में अटकी है जो अब सिद्धार्थ के पास है. 

आगे इस कहानी में प्यार, रोमांच, धोखा, लालच. झूठ और मौत सभी कुछ है. लेकिन इस चमत्कारी प्लॉट के बावजूद कुछ है जो अटका रह जाता है. थ्रिलर होते हुए भी फिल्म अंत में आपके ऊपर एक उदासी का साया छोड़ जाती है. थ्रिलर होने के नाते शुरुआत में आपको फिल्म की रफ्तार धीमी लग सकती है. लेकिन इच्छाओं के पीछे भागती जिस जिंदगी की व्यर्थता को दर्शाने की कोशिश फिल्म कर रही है उस तक पहुंचने के लिए यह कारगर हथियार है. जेल से छूटने के बाद सिद्धार्थ की रिहाइशगाह के दृश्य मन में कभी न उगने के लिए डूबते सूरज का सा प्रभाव छोड़ते हैं. मेरे लिहाज से फिल्म औसत से एक पायदान ऊपर खड़ी है. ये सिनेमाहॉल से चाहे अनपहचानी ही निकल जाए पर आने वाले वक्त में हमारे धीरे-धीरे विशाल होते डीवीडी संग्रह का हिस्सा जरूर बन सकती है. विज्ञापन जगत से आए प्रयास गुप्ता के लिए सबसे बड़ी तारीफ है. लेकिन अदाकारी में कमाल किया है हैपीडेंट व्हाइट फेम सचिन नायक ने. फिल्म की उदासी उनकी भूमिका से ही सबसे बेहतर व्यंजित होती है. कह सकते हैं कि फिल्म जिंदगी की कतरन है जो बात तो छोटी कहती है लेकिन पूरी साफगोई से कहती है. 

मिहिर पंड्या

स्लमडॉग की भारतीय पूंछ

स्लमडॉग मिलियनेर के आठ ऑस्कर और दुनिया भर के बॉक्स ऑफिस पर रेकॉर्ड कमाई से मुझे कोई एतराज नहीं है. शिकायत मुझे उसकी सफलता को भारतीय सिनेमा की विजय मानने और उसके विश्व मंच पर आगमन का उत्सव मनाने से है.

मुझे अल्ला रक्खा रहमान, गुलजार और रेसुल पोकुट्टि के ऑस्कर जीतने पर उतनी ही खुशी है जितनी उन्हें और उनके प्रशंसकों को हुई है. बल्कि पोकुट्टि का अपने देश और उसकी सभ्यता में से ओमकार के निकलने और उसके उच्चार के बाद मौन और शांति के आने का उल्लेख करना बहुत भाया. वे साउंड मिक्सिंग का ऑस्कर स्वीकार कर रहे थे. केरल के मुसलमानी लगते नाम वाले रेसुल ने ही लास एंजिलिस से याद दिलाया कि आज शिवरात्रि है. सत्यम शिवम सुंदरम के शिव की रात्रि उनके लिए ऑस्कर की रात्रि थी. भारत में किसी टीवी चैनल ने ऑस्कर रात्रि को शिवरात्रि से मिलाने की सूझबूझ नहीं दिखाई हालांकि वे शिवरात्रि जैसे पर्वो और उत्सवों को लगातार बेचते रहते हैं.

मुंबई की गंदी बस्तियों में प्रेम, आशा और भविष्य और जीवन की अमरता की कहानियां बॉलीवुड ने स्लमडॉग से बेहतर बनाई हैं. यह बात अलग है कि उन्हें आठ क्या एक भी ऑस्कर बल्कि भारतीय अवार्ड ही नहीं मिले

पोकुट्टि की तकनीकी प्रवीणता पर तो अपन ज्यादा कुछ नहीं कह सकते. लेकिन रहमान ने निश्चित ही इससे बेहतर संगीत अपनी दूसरी फिल्मों में दिया है और उनकी सराहना, प्रशंसा और पुरस्करण भी हुआ है. गुलजार ने तो निश्चित ही ‘जय हो’ से बेहतर गीत लिखे हैं. फिर यह ऑस्कर विजेता गीत तो गुलजार ने स्लमडॉग के लिए लिखा भी नहीं था. सुभाष घई की किसी फिल्म के लिए लिखा था और रहमान के दिए संगीत पर सुखविंदर ने गाया था. घई ने फिल्म में नहीं लगाया डैनी बॉयल ने लगा लिया. लेकिन ऐसा तो संयोग से ही होता है कि अच्छे लिखे, अच्छे गाए और शानदार संगीत दिए गीत पर पुरस्कार मिल जाए वह भी ऑस्कर. कहते हैं यह गीत ऐसा हिट हुआ है कि अमेरिका में भी लोग एक-दूसरे के अभिवादन में ‘जय हो’ कर रहे हैं.

स्लमडॉग की यह आलोचना भी अपने गले नहीं उतरती कि इसमें भारत की गरीबी का नंगा और भयावह चित्रण चटकारे ले कर किया गया है. समृद्ध पश्चिम में भारत की गरीबी बिकती है. इसे देख कर यूरोप और अमेरिका के खाते-पीते और अपने को बेहतर मानने वाले लोगों को अधम आनंद मिलता है. मिले. यह गरीबी हमारा यथार्थ है. हमारी सच्चाई है. हमारी गंदी बस्तियों में हिंसा, यौनाचार, गंदगी और सभी तरह की विकृतियों का जीवन है. उससे मुंह चुराने या उस पर मखमल की लाल जाजम डाल के उसे छुपाने की क्या जरूरत है. हमारे महानगर पश्चिमी औद्योगिक सभ्यता की ही उपज हैं जिनमें गंदी बस्तियां अनिवार्य रूप से बनती और बसती हैं. दुनिया में सब जगह हैं. अमेरिका में भी हैं. अमेरिका अपनी गंदी बस्तियों के जीवन को अपने राष्ट्रीय जीवन का प्रतिनिधि नहीं मानता क्यों वह समृद्ध है.

हम अपनी गंदी बस्तियों से डरते हैं क्योंकि वे हमारी समृद्धि की पोल खोलती हैं. हम जानते हैं कि हमारा विकास और हमारी समृद्धि भारत की असलियत नहीं है. हम अपनी समृद्धि को चमकाने के लिए गंदी बस्तियों पर परदा डालते हैं. इसलिए हमें बुरा लगता है कि कोई उन्हें उघाड़ कर लाल गोले में दिखा रहा है. भूलना नहीं चाहिए कि अपने सबसे सर्जनात्मक फिल्मकार सत्यजित राय पर भी अपनी कलाकार अभिनेत्री नर्गिस दत्त ने भरी राज्यसभा में यही आरोप लगाया था कि वे भारत की गरीबी दिखा कर यूरोप में वाहवाही लूट रहे हैं. गरीबी और गंदी बस्तियां सत्यजित राय, बिमल राय ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी आदि सभी ने दिखाई है. हमारे ये फिल्मकार गरीबी बेच कर यश और पैसा लूटने नहीं आए. डैनी बॉयल अंग्रेज है तो उसके मुंबई के धारावी चित्रण से हमारी ऐसी क्या बदनामी हो गई कि हम मारे शरम के मर जाएं.

मुंबई की गंदी बस्तियों पर स्लमडॉग के पहले मीरा नायर की ‘सलाम बांबे’ ही एक फिल्म नहीं है. कई फिल्में बनी हैं. बॉलीवुड ने ही बनाई हैं जिनमें गंदी बस्तियों का जीवन ज्यादा तटस्थता, क्रूरता और कलात्मकता से दिखाया गया है. स्मिता पाटिल जैसी अप्रतिम अभिनेत्री भी स्लम की बाई बनी हैं और अमिताभ बच्चन का एंग्री यंगमैन भी इन्हीं बस्तियों से निकला है. मुंबई की गंदी बस्तियों में प्रेम, आशा और भविष्य और जीवन की अमरता की कहानियां बॉलीवुड ने स्लमडॉग से बेहतर बनाई हैं. यह बात अलग है कि उन्हें आठ क्या एक भी ऑस्कर बल्कि भारतीय अवार्ड ही नहीं मिले.

 अमेरिका के लोग और वहां की अकादमी महामंदी के इस जमाने में एक ऐसी फील गुड फिल्म की तलाश में थे जो कंगाल से करोड़पति के अमेरिकी सपने को जीवित रखती हो

डैनी बॉयल ने स्लमडॉग अच्छी फिल्म बनाई है लेकिन भारत जहां हॉलीवुड से ज्यादा फिल्में बनती हैं – ऐसी और इस फिल्म को अपना सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार नहीं देता. इसका कारण यह नहीं कि उसमें कलात्मक समझ नहीं है और बॉलीवुड सिर्फ बॉक्स ऑफिस की चिंता करता है. भारत में फिल्मों की उत्कृष्टता को जांचने के पैमाने अलग हैं. और वे हॉलीवुड से कोई कमतर नहीं हैं.

हमारी समस्या यह है कि हमारे यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो हॉलीवुड के ऑस्कर ही नहीं, अमेरिकी-यूरोपीय जीवन की लगभग सभी बातों, मूल्यों और चलन को भारत की चीजों से बेहतर मानते हैं. इन लोगों को ऑस्कर नोबेल, बुकर, पुलित्जर आदि पुरस्कार विश्व के सबसे बड़े पुरस्कार लगते हैं. इनके लिए अब अमेरिका तो पहले पश्चिम यूरोप ही विश्व हुआ करता था. इन लोगों के लिए स्लमडॉग का विकास स्वरूप के अंग्रेजी उपन्यास – क्यू एंड ए – पर आधारित होना और उसका मुंबई की गंदी बस्तियों में शूट किया जाना और उन्हीं के एक लड़के जमाल की कहानी होना इस फिल्म के भारतीय होने का पक्का सबूत है. जिसमें रहमान का संगीत हो गुलजार के गाने हों वह तो भारतीय सिनेमा ही है. फिर भारत का जो भी अमेरिका और यूरोप को मंजूर हो और जिसे वे पुरस्कार के लायक समझते हों – वही भारत का सच्चा, प्रामाणिक और सर्वश्रेष्ठ है. भारत, अमेरिका-यूरोप में चमक कर ही भारतीय और धन्य होता है. यही उसके होने की सार्थकता है. इसी में वह धन्य है.

यही लोग मनाते फिर रहे हैं कि स्लमडॉग के आठ ऑस्कर भारतीय सिनेमा उद्योग की सफलता है. स्लमडॉग ये ऑस्कर जीता तो इसका मतलब है कि भारतीय सिनेमा विश्व सिनेमा के मंच पर उदित हो गया है. सच? स्लमडॉग बनाने वाले डैनी बॉयल ने सर्वश्रेष्ठ निदेशक का ऑस्कर जीतने के बाद कहा कि ‘मैं बहुत खुश हूं कि जो भी भारतीय मुझे मिलता है खुशी से फटा पड़ रहा है. इससे बड़ी प्रशंसा और क्या होगी कि भारत में लोग स्लमडॉग को भारतीय फिल्म मानते हैं. लेकिन असलियत में यह एक ब्रिटिश फिल्म है. यह शुरू से ही बहुत धीरे और बहुत यथार्थवादी है. हमारी सिने संस्कृति एक ऐसे यथार्थवाद पर आधारित है जो दरअसल न बॉलीवुड की फिल्मों में होता है न हॉलीवुड की फिल्मों में.

दरअसल स्लमडॉग एक ब्रिटिश-अमेरिकन फिल्म है. इसमें पैसा अमेरिकी लगा है. निदेशक डैनी बॉयल ब्रिटिश हैं. चित्रपट कथा भी अंग्रेज ने लिखी है. इतनी आसानी से यह अमेरिका और यूरोप में मार्केट की गई और हॉलीवुड की अकादमी ने इसे हाथों-हाथ ले कर सिर पर बैठा लिया तो इसका कारण भी इसमें अमेरिका का पैसा लगना और अमेरिकी प्रोत्साहकों का इसे आगे बढ़ाना है. तीन-चौथाई यह अंग्रेजी में है और एक-चौथाई हिंदी में क्योंकि मुंबई की गंदी बस्तियों के बच्चों का यथार्थवादी चित्रण करना हो तो उन्हें हिंदी में ही बात करते ओर मां भेन की गालियां खाते हुए दिखाना पड़ेगा. कौन बनेगा करोड़पति उसके जरिए करोड़पति बन गया लेकिन करोड़पति बनने वह इस ‘शो’ पर नहीं आया था. वह तो इस पर दिखना चाहता था ताकि खोई हुई उसकी प्रेमिका लतिका उसे देख ले और वह उसे ढूंढ ले. इससे यह कंगाली से करोड़पति और प्रेम कहानी बन गई जो एकदम और एक साथ बॉलीवुड और हॉलीवुड की परीकथा जैसी लगने लगी.

ऑस्कर दरअसल अमेरिका का फिल्मी पुरस्कार है. यह सिनेमा का विश्व पुरस्कार नहीं है. जैसा कि कमल हासन ने कहा – यह ओलिंपिक नहीं है. अमेरिकी है. अमेरिका के लोग और वहां की अकादमी महामंदी के इस जमाने में एक ऐसी फील गुड फिल्म की तलाश में थे जो कंगाल से करोड़पति के अमेरिकी सपने को जीवित रखती हो. ब्रिटिश-अमेरिकी स्लमडॉग इसी जरूरत को पूरी कर रही थी. इसलिए उसे आठ ऑस्कर मिल गए. उसमें न सर्वश्रेष्ठ अभिनेता था न सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री. अल्ला रक्खा रहमान उसमें मामूली संगीत दे कर भी श्रेष्ठ मौलिक संगीत का पुरस्कार जीत गए. गुलजार का लिखा ‘जय हो’ गीत भी इसलिए श्रेष्ठ माना गया कि वह स्लमडॉग का होने के कारण ऑस्कर के योग्य हो गया. भारत की जो प्रतिभा ब्रिटिश-अमेरिकी फिल्म व्यवस्था में चमकती है वही ऑस्कर के योग्य होती है. नहीं तो बेहतर संगीत दे कर और बेहतर गीत लिख कर भी रहमान गुलजार कहीं ऑस्कर के आसपास भी नहीं थे.

एटनबरो गांधी बनाए और वह आठ ऑस्कर समेट ले जाए. डैनी बॉयल स्लमडॉग बनाए और उसे भी आठ ऑस्कर मिल जाएं. लेकिन सत्यजित राज से ले कर आमिर खान तक एक से एक बढ़िया कलात्मक और प्रामाणिक भारतीय फिल्म बनाएं और उन्हें हॉलीवुड की अकादमी पूछे तक नहीं. क्या वही भारतीय फिल्म है जिसे ब्रिटेन और अमेरिका की व्यवस्था भारत में भारतीय कथावस्तु पर बनाए? और क्या भारत विश्व सिनेमा के मंच पर तभी प्रकट होता है जब वह लॉस एंजिलिस के कोडक थिएटर पर ऑस्कर लेने आए. नहीं सर, स्लमडॉग भारतीय फिल्म नहीं है और उसकी सफलता भारतीय फिल्म उद्योग की सफलता नहीं है. भारतीय सिनेमा विश्व सिनेमा के मंच पर तभी चमकेगा और प्रतिष्ठत होगा जब भारतीय सिने पुरस्कार मुंबई में मिलेंगे और हॉलीवुड वाले उन्हें पाने को तरसेंगे. बॉलीवुड, हॉलीवुड का प्रतिद्वंद्वी है. गाउन से घिसटता जरी का पल्ला नहीं है. 

राजनीतिक चरमपंथ

19 फरवरी को लोकसभाध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी संसद सदस्यों के असंसदीय व्यवहार से इतना तंग आ गए कि उन्होंने ये तक कह डाला कि संसद के वर्तमान सदस्यों को न तो जनता का एक भी पैसा दिया जाना चाहिए और न ही उन्हें अगली बार चुना ही जाना चाहिए. उससे कुछ दिन पहले दस फरवरी को उत्तर प्रदेश की विधानसभा में सदस्यों द्वारा राज्यपाल पर काग की गेंदों की बौछार कर दी गई जिससे उन्हें उल्टे पांव सदन से जाना पड़ गया. इसके एक-या दो दिन बाद ही उड़ीसा के सदन में अध्यक्ष के साथ छीना-झपटी और धक्का-मुक्की के दृश्य टीवी पर दिखाई दे रहे थे. अगर आंकड़ों पर जाया जाए तो जाती हुई 14वीं लोकसभा का 25 फीसदी हिस्सा यानी कि करीब 400 से ज्यादा घंटे या करीब 67 दिन सांसदों के गुल-गपाड़े की भेंट चढ़ गए. गौरतलब है कि पिछले साल संसद में काम ही कुल 46 दिन हुआ था.

कई बार देखा भी गया कि इधर अध्यक्ष ने कैमरों को बंद करने का आदेश दिया नहीं कि सदन में घंटों से चल रहा गुल-गपाड़ा मिनटों में बिना किसी अध्यक्षीय हस्तक्षेप के समाप्त हो गया

दूसरी ओर 13 दिसंबर को संसद पर हुए हमले की आठवीं बरसी थी जिसमें हमारे माननीय सांसदों की रक्षा करते हुए 8 जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे. कुछ दिन पहले ही मुंबई पर हमला हो चुका था इसलिए उम्मीद थी कि ज्यादा से ज्यादा नेतागण शहीदों को श्रद्धांजलि देने और एकजुटता दिखाने के लिए संसद भवन में आयोजित सभा में हिस्सा लेंगे. परंतु दोनों सदनों के कुल करीब 700 सदस्यों में से मात्र 10 ही वहां मौजूद थे.

पिछले साल अप्रैल में संसद में मंहगाई के मुद्दे पर बहस होनी थी. इससे पहले संसद कई दिनों तक इसलिए नहीं चल पाई थी क्योंकि विपक्ष बाकी सब काम छोड़कर संसद से मंहगाई जैसे एक सबसे जरूरी मुद्दे पर चर्चा की उम्मीद रखता था. अब ऐसे में ये अपेक्षा स्वाभाविक ही थी कि उस दिन पक्ष और विपक्ष पूरे फौज-फांटे के साथ पुरजोर तरीके से अपनी बात रखेंगे. किंतु लोकसभा चलते रहने के लिए जरूरी 45 सदस्य तक वहां नहीं थे. इससे पहले कृषि क्षेत्र की समस्याओं और किसानों की आत्महत्याओं पर हुई बहस के दौरान भी ऐसा ही हुआ था.

2004 में जब संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होना शुरू हो रहा था तो तर्क दिया गया था कि ऐसा होने से सदस्यों का व्यवहार मर्यादित रहेगा और उनकी सदन में उपस्थिति भी बढ़ेगी. मगर ऐसा तो कुछ हुआ नहीं उल्टा हमारे प्रतिनिधियों ने चारों ओर लगे कैमरों का एक अलग ही इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. अब सांसदों की सदन के भीतर की क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं सदन की कार्यवाही की जरूरतों से संचालित न होकर कुछ दूसरे ही उद्देश्यों से संचालित होने लगीं. कई बार देखा भी गया कि इधर अध्यक्ष ने कैमरों को बंद करने का आदेश दिया नहीं कि सदन में घंटों से चल रहा गुल-गपाड़ा मिनटों में बिना किसी अध्यक्षीय हस्तक्षेप के समाप्त हो गया.

दोष हमारा है! हमने अपने नुमाइंदों को धिक्कारने और उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने की अपनी शक्ति का उपयोग करने की बजाय आज खुद को इतना बेबस, बेपरवाह और अंजान बना लिया है कि जो भी चाहता है, कभी इस तो कभी उस बात का झूठा हव्वा या सब्जबाग खड़ाकर हमारे साथ कैसे भी खेल खेल लेता है.

संजय दुबे 

 

छापे, पूछताछ, हिरासत, गिरफ्तारी और जेल भाग-2

26 सितंबर 2001 को जब वो मुंबई पहुंचे तो एक आदेश उनका इंतजार कर रहा था. इसमें उन पर 149.35 करोड़ की अघोषित संपत्ति रखने का आरोप लगाया गया था जिसकी वजह से उन पर 89 करोड़ का टैक्स बकाया बनता था. शंकर और देविना ने तर्क दिया कि आरोप बेबुनियाद है और इस संदर्भ में उन्हें कोई नोटिस नहीं मिला है. आदेश में कहा गया था कि शहर से बाहर जाने से पहले उन्हें इसकी मंजूरी लेनी होगी. इस तरह से उन पर 25 सितंबर 2001 को बिना मंजूरी लिए चेन्नई जाने का आरोप भी लगाया गया था जबकि आदेश 26 सितंबर को जारी हुआ था.

17 दिसंबर 2001 को ईद की छुट्टी थी. प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी सुबह छह बजे शंकर के दिल्ली स्थित घर पहुंचे. शंकर को जगाकर उन्हें बताया गया कि उन्हें पूछताछ के लिए चलना होगा. अधिकारी उन्हें अपने लोकनायक भवन स्थित दफ्तर लेकर पहुंचे. शंकर के वकील राम जेठमलानी बाहर इंतजार करते रहे क्योंकि किसी वकील को पूछताछ के दौरान अंदर रहने की इजाजत नहीं थी. फिर शुरू हुआ विचित्र से सवालों का सिलसिला : ‘स्टॉक मार्केट क्या होता है?’, ‘ये कैसे काम करता है?’ वगैरह, वगैरह. पूछताछ दिन भर चलती रही. कानून कहता है कि गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना जरूरी है. उत्पीड़न को लंबा करने के लिए ये तरीका अपनाया जाता है कि व्यक्ति को गिरफ्तार न कर उसे हिरासत में लिया जाए और काफी बाद में गिरफ्तारी का वारंट जारी किया जाए. अधिकारियों ने रात को आठ बजे देविना को घर भेजने की कोशिश की जो बाहर इंतजार कर रही थीं. उनका तर्क था कि उनकी वजह से एक महिला अधिकारी को भी रुकना पड़ रहा है जिसके घर पर बो हैं. देविना घर न जाने की जिद पर अड़ी रहीं. उन्होंने देविना को बताया कि सूरज छिपने के बाद किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता इसलिए वो घर जा सकती हैं. शंकर की गिरफ्तारी का वारंट देर रात 12:40 पर जारी किया गया. इसमें उन पर फेरा की धारा 19 के उल्लंघन का आरोप था. इस सेक्शन के तहत आदमी को शक के आधार पर ही बिना सबूत गिरफ्तार किया जा सकता है. अधिकारियों ने फिर शंकर को बिना अदालत में पेश किए दो दिन तक हिरासत में रखने का फैसला किया. यही वो वक्त था जब देविना फट पड़ीं.

इन मुश्किलों के बीच भी तिहाड़ में अन्य कैदियों से मिल रहे आत्मीय व्यवहार से शंकर अभिभूत थे. सब उन्हें सांत्वना देते कि ये स्थितियां हमेशा ऐसी ही नहीं रहने वालीं

‘मैं उन सब पर चिल्लाई. मैंने कहा, ऊपर से नीचे तक आप सब लोग यहां हैं और आपमें से किसी में भी ये कहने की हिम्मत नहीं है कि मैं गलत काम नहीं करूंगा. मैंने उनसे कहा, आप भगवान से डरने की बात करते हैं और फिर ऐसा करते हैं.’ अधिकारी शर्मिंदा दिखे और उन्होंने नजरें फेर लीं.

 इसके बाद शंकर उस रात दिल्ली के तुगलकाबाद रोड स्थित पुलिस लॉकअप भेज दिए गए. यह लॉकअप खुली जगह पर बना है. 17 दिसंबर 2001 की जिस रात शंकर को यहां भेजा गया था रिकॉर्ड बताते हैं उस रात दिल्ली का तापमान 10 डिग्री था. ठिठुरा देने वाले ऐसे मौसम में भी शंकर को ओढ़ने के लिए रजाई या चादर नहीं दी गई. हिरासत में लेने और कोर्ट में पेश करने के बीच शंकर को खाने की भी इजाजत नहीं मिली. पुलिस का तर्क था कि शंकर प्रवर्तन निदेशालय की हिरासत में हैं और बिना उसकी अनुमति के उन्हें खाना नहीं दिया जा सकता. निदेशालय का कोई अधिकारी उपलब्ध नहीं था. दोपहर 3 बजे शंकर को पटियाला कोर्ट में पेश किया गया..

कोर्ट मे प्रवर्तन निदेशालय के वकील ने कहा कि वे शंकर को मुंबई ले जाना चाहते हैं ताकि उनकी उपस्थिति में उनका घर खोला जा सके. इस बीच देविना भूमिगत हो गईं क्योंकि दोस्तों ने उन्हें चेताया था कि उन्हें भी हिरासत में लिया जा सकता है. शंकर की बहन रीता उनके लिए घर का खाना ले जातीं थीं. एक शाम जब रीता लोकनायक भवन पहुंचीं तो उन्हें बताया गया कि शंकर को मुंबई ले जाया जा चुका है. वहां शंकर के कपड़े बिखरे पड़े थे. रीता वहीं पर रो पड़ी. वो कहती हैं कि वो उनकी जिंदगी की सबसे बुरी रात थी.

11 बजे शंकर मुंबई पहुंचे और यहां से सीधे उन्हें आजाद मैदान स्थित पुलिस लॉकअप ले जाया गया. रीता भी फ्लाइट पकड़कर मुंबई आ चुकीं थीं. जब वो यहां खाना लेकर पहुंचीं तो उनसे कहा गया यहां घर के खाने की अनुमति नहीं दी जाएगी क्योंकि ये व्यवस्था सिर्फ दिल्ली के लिए थी..लॉकअप में बिछाने के लिए बिस्तर या चटाई कुछ भी नहीं था. यहां सोने के लिए शंकर को अखबार बिछाने पड़े. घर की तलाशी के बाद 31 दिसंबर को शंकर को वापस दिल्ली लाया गया. उसी शाम को रीता ने उनसे मिलने की कोशिश की. अधिकारियों ने रीता को तीन घण्टे इंतजार कराया और आखिर में उनसे कहा गया कि उस दिन मिलने की अनुमति नहीं दी जा सकती. रात 10.30 बजे शंकर को खुली जगह में बने हुए तुगलक रोड स्थित उसी लॉकअप में भेज दिया गया. उस रात तापमान 8 डिग्री था. देविना को जब ये पता चला तो उन्होंने अपने भाई को बुलाकर शंकर के लिए कुछ गर्म कपड़े ले जाने को कहा. अगली सुबह जब देविना शंकर से मिलनी गईं तो उस सुबह इतनी ठंड थी कि कोहरे की वजह से सिर्फ दो फीट दूरी तक ही देखा जा सकता था. शंकर की हिरासत के पहली बार देविना उनसे मिलने गई थीं. उस समय शंकर को बुखार था. उसके बाद शंकर को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. चूंकि 14 दिन रिमांड की समाप्त हो गई थी इसलिए उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया.

तिहाड़ में शंकर को चार रातों के लिए आम बैरक में रखा गया. यह एक बड़ा हॉल था जिसमें एक साथ 50 लोग रह रहे थे. 300 कैदियों के लिए सिर्फ एक टॉयलेट की व्यवस्था थी. यहां पर सोने के लिए जगह खोजना भी एक बड़ा काम था. लेकिन इन मुश्किलों के बीच भी तिहाड़ में अन्य कैदियों से मिल रहे आत्मीय व्यवहार से शंकर अभिभूत थे. सब उन्हें सांत्वना देते कि ये स्थितियां हमेशा ऐसी ही नहीं रहने वालीं. जेल का पहला दिन शंकर के लिए अवसाद से भरा था.14 दिन तक पुलिस हिरासत के दौरान तो वे हौसला बनाए रहे. लेकिन जेल पहुंच जाना उनकी कल्पना से बाहर था. पर कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने खुद पर काबू पाते हुए यहां के माहौल में रुचि लेना शुरू कर दिया. अब शंकर को दलालों, नशाखोरों, बलात्कारियों, हत्यारों और आतंकवादियों के साथ रहना था. कुछ ही दिनों में शंकर जेल के तौर-तरीके सीख गए. पैसे देकर उन्हें उप जेल अधीक्षक के बाथरूम में गर्म पानी से नहाने की सुविधा मिल जाती थी. यहां संबंधियों और वकीलों से मुलाकात का समय बढ़वाने के लिए निगरानी करने वाले सुरक्षाकर्मी को पैसे देने पड़ते थे. यदि कोई कानूनी कागजात सौंपे जाने हैं तो सुरक्षाकर्मी को और पैसे देने की जरूरत होती थी. इस समय तक देविना इस दुविधा में थी कि उन्हें शंकर से मिलने जाने के लिए जाना चाहिए कि नहीं. कई वकीलों ने उन्हें सलाह दी कि वे ऐसा न करें क्योंकि हो सकता है कि वे भी गिरफ्तार न कर ली जाएं.

पहले दिन देविना का भाई और रीता शंकर से मिलने गए थे. जब वे वापस लौटे तो उन्होंने देविना को बताया कि शंकर उनसे मिलना चाहते हैं. इस जेल में मीटिंग हॉल के भीतर मिलने वालों के बीच दो फीट की दूरी रहती है जिसके बीच में एक जाली होती है. ये जाली प्लास्टिक की शीट से ढकी रहती है. कैदी और उससे मिलने आए परिचित अपनी अपनी कुर्सियों पर रखे टेलीफोन से बात करते हैं. लेकिन अक्सर फोन खराब रहते हैं. देविना भी जब शंकर से मिलने गईं तो फोन खराब था. फिर उन्होंने देखा कि प्लास्टिक शीट बस उनकी कमर तक ही है और अगर वो घुटने के बल बैठ जाएं तो मेज के नीचे से बात हो सकती है. फोन खराब हो तो बाकी लोग भी ऐसा ही करते हैं. देविना ने भी यही किया. गिरफ्तारी के बाद शंकर से ये उनकी पहली मुलाकात थी. दोनों भावुक हो गए. शंकर ने देविना से कहा कि वो उन्हें किसी भी तरह वहां से बाहर निकालें. देविना को बताया गया कि ये मामला 60 दिन से सुनवाई कर रहे कोर्ट के अधिकारक्षेत्र में नहीं है और इसलिए वो जमानत नहीं दे सका. जमानत के लिए शंकर को मुंबई कोर्ट में पेश होना था. यहां शंकर के वकील ने ट्रांजिट बेल की दलील दी लेकिन एडीशनल सा¬लीसिटर जनरल ने इसके खिलाफ तर्क दिए. शंकर को जमानत नहीं मिला और उन्हें मुंबई की आर्थर रोड जेल भेज दिया गया.

यहां पर बात करने का सिर्फ एक तरीका था कि आप चिल्लाकर बात करें. यहां मुलाकातियों से मिलने के लिए सिर्फ पांच मिनट दिए जाते थे

पेशी के लिए कोर्ट में पेश होने के अनुभवों के बारे में शंकर बताते हैं, ‘जिस बस में    कैदियों को ले जाया जाता था उसमें वे ठूंस-ठूंसकर भरे होते थे. कोर्ट के लॉकअप में पानी तक नहीं होता था. और टा¬यलेट ऐसे थे जिनको देखकर ही कोई उल्टी कर दे. सारे कैदी तब तक बैठे रहते थे जब तक सुनवाई के लिए उनका नाम न पुकारा जाए. शाम 7:30 बजे कै दियों को वापस जेल लाया जाता था.’ शंकर बताते हैं कि पुलिस बसों से कोर्ट आना-जाना भी खतरे से खाली नहीं था क्योंकि यदि कैदियों में दंगा हो जाए, जो कि आम बात है, तो भी गाड़ी जेल पहुंचने पर ही रुकती है. बाद में शंकर ने कोर्ट आने का सुरक्षित जरिया ढूंढ़ लिया. उन्होंने खुद को अति सुरक्षित क्षेत्र में स्थानांतरित करवा लिया.

इसके बाद उन्हें उन लोगों के साथ कोर्ट ले जाया जाता था जिनके ऊपर आतंकवाद के  आरोप है. जिस बस में इन्हें ले  जाया जाता था वो कैदियों से उतनी भरी नहीं होती थी. यहां शंकर को वो सब लोग देखने को मिले जिनके बारे में उन्होंने अब तक सिर्फ अखबारों में ही पढ़ा था.

मुंबई की आर्थर रोड जेल को याद कर शंकर बताते हैं कि इसकी तुलना में तिहाड़ किसी बढ़िया होटल जैसी है. यहां शंकर को पांच दूसरे कैदियों के साथ एक छोटी सी सेल में रखा गया था. खाना बेहद घटिया था और बाहर का खाना खाने की अनुमति नहीं थी, जबकि तिहाड़ में कैदी के रिश्तेदार उसे खाने के साथ-साथ कपड़े भी दे सकते थे. यहां पर कैदी से मुलाकात वाले कमरे में भी प्लास्टिक शीट वाली जाली थी मगर फोन नहीं था. यहां पर बात करने का सिर्फ एक तरीका था कि आप चिल्लाकर बात करें. यहां मुलाकातियों से मिलने के लिए सिर्फ पांच मिनट दिए जाते थे वो भी रिश्वत देने के बाद. हिरासत के 68 वें दिन शंकर को बांबे सेशन कोर्ट में पेश किया गया. यहां भी अभियोग पक्ष ने हिरासत अवधि बढ़वाने का खेल जारी रखा..

गुलाम वाहनवती सरकार द्वारा इस दंपति के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के गवाह रहे हैं. वाहनवती 2001 में बजट के बाद बाजार में आई अचानक  गिरावट के समय महाराष्ट्र के महाअधिवक्ता थे..फरवरी-मार्च 2004 में जब एनडीए की सरकार सत्ता में थी तब केंदीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने शंकर-देविना के खिलाफ फिर से केस शुरू करने की कोशिश की. हालांकि पहले उनके खिलाफ पुराना मामला खत्म कर दिया गया था. वाहनवती हमें इस बारे में बताते हैं कि किस तरह मामला उन्हें सौंपने के लिए सेबी ने उसे संपर्क किया था.

वाहनवती : उन्होंने मुझसे कहा था. लेकिन मैं इस बारे में बात करना नहीं चाहूंगा..मैं ये सब ऑफ रिकॉर्ड कहूंगा.

मधु : ऑफ द रिकॉर्ड कुछ न कहें. वो बात बताएं जिसे हम छाप सकें.

वाहनवती : ठीक है. बीच में कुछ समय तक तो मैं सेबी की तरफ से लड़ ही नहीं रहा था.

मधु : क्या आपने ऐसा करने से मना कर दिया था?

वाहनवती : जब ये मामला आया तो मैंने सोचा कि ये वही पुराना मामला होगा. पहले मौके पर तो मैं मौजूद रहा क्योंकि मैं समझना चाहता था कि आखिर सेबी इस कार्रवाई को कैसे न्यायोचित बता रही है. इस बीच मैंने कोर्ट में कहा कि नोटिसों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी. उसके बाद मैंने अखबारों में इस मामले के बारे में पढ़ा. मेरी अंतरात्मा ने मुझे रोक लिया. मैंने बस ये कहा कि मैं इस केस के लिए उपलब्ध नहीं हो सकूंगा.

मधु : कभी भी आपको लगा कि उनके साथ अन्याय हो रहा था और पेश किए जा रहे तथ्य गलत थे.

वाहनवती : नहीं, न्याय के सिद्धांत के हिसाब से कहूं तो वो जो भी कर रहे थे वो सब गलत था.

मधु : क्या किसी भी वक्त आपको ऐसा लगा कि ये कहना बेहतर होता कि वे जो कर रहे हैं गलत है?

वाहनवती : नहीं, बतौर वकील मैं ऐसा नहीं कर सकता था. मेरे पास सिर्फ ये विकल्प था कि चुपचाप मामले से हट जाऊं और मैंने यही किया. मैंने बहाना बनाया और कहा कि मैं केस के लिए उपलब्ध नहीं हो पाऊंगा. ऐसा कहकर मैंने केस के पेपर वापस कर दिए. आपको समझना चाहिए कि मैं उस समय महाराष्ट्र सरकार का महाधिवक्ता था. ये एक जिम्मेदारी का पद है और मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता था जो राजनीतिक मुद्दा बन जाए. मैं गैरराजनैतिक व्यक्ति हूं. मैंने वही किया जो मुझे लगा कि सही है. (भर्राए गले से) में मानता हूं कि शंकर और देविना के साथ बहुत बुरा हुआ. कुछ लोगों के पीछे सारी सरकार पड़ जाती है. मुझे वो एक बार रास्ते में मिले थे उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं ठीक हूं. मंने उनसे कहा, ‘नहीं, मैंने सारे पेपर लौटा दिए. मैं बस यही कर सकता था.’ (अपनी भावनाओं और आंसुओं पर काबू पाने की कोशिश करते हैं).

मधु : आपने भीतर से देखा कि कैसे फर्स्ट ग्लोबल को बर्बाद करने के  लिए काम किया जा रहा था.

वाहनवती : हां. मैं देख रहा था. कृपया मुझे संयत होने के लिए कुछ वक्त दीजिए (चेहरा घुमा लेते हैं और कुछ मिनट तक भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश करते हैं) मैं इसे सत्ता का सबसे बड़ा दुरुपयोग मानता हूं. आप बहुत असहाय महसूस करते हैं. आप कुछ नहीं कर सकते.

मधु : उस पद पर बैठे आप जैसे किसी भी व्यक्ति के लिए ये बेहद हतोत्साहित करने वाली घटना रही होगी.

वाहनवती : मैं इसके लिए सहमति नहीं दे सकता था. मामले में एक बार पेश हो जाने के बाद मेरे पास कहने के लिए सिर्फ यही सम्मानजनक शब्द थे कि मैं फिर से पेश नहीं हो सकूंगा. इसलिए मैं उनसे मिला और ये बात कह दी.

मधु : तो ऐसी चीजें रोकने के लिए व्यवस्था में क्या सुधार किए जाने की जरूरत है?

वाहनवती : जब व्यवस्था चरमराने लगती है तो जिन लोगों के हाथ में कमान होती है वो ऐसा होने देते हैं. यही समस्या है. हमारी व्यवस्था में कई खामियां हैं.

मधु : जहां सबूत नहीं हैं वहीं ऐसे अदृश्य आदेश दिए जाते हैं.

वाहनवती : मुझे ऐसे कई मामलों के बारे में पता है, जहां आदेश तो होता है लेकिन आपको पता नहीं होता कि ये आदेश किसने दिया.

मधु : क्या आपको कोई और केस याद है जिसमें किसी को शंकर और देविना जितना उत्पीड़न ङोलना पड़ा हो

वाहनवती : मैं उम्मीद करता हूं कि नहीं..

मधु : अब जबकि आप सॉलिसिटर जनरल हैं तो तहलका आयोग में आपका काम क्या होगा? इससे पहले के अटॉर्नी जनरल और और सॉलीसिटर जनरल ने तहलका आयोग में कुछ ज्यादा ही रुचि ली थी.

वाहनवती : मैं किसी भी तरह से तहलका आयोग में शामिल नहीं होऊंगा.

मधु : आप वहां नहीं जाएंगे?

वाहनवती : मैं वहां नहीं जाऊंगा जब तक कि मुझे ऐसा करने के निर्देश न दिए जाएं. मैं ऐसी किसी भी चीज को सही ठहराने के लिए नहीं जाउंगा. मैं राजनैतिक व्यक्ति नहीं हूं.

मधु : पर क्या आप मानते हैं कि ये सही है? क्या संविधान के मुताबिक सॉलीसिटर जनरल को इस तरह की सुनवाइयों में शामिल होना चाहिए?

वाहनवती : सॉलीसिटर जनरल का पद संवधानिक पद नहीं है. पद पर रहने के दौरान हर आदमी अपने हिसाब से काम करता है. जसे कि मैं काम करने के अपने मानक खुद बनाना पसंद करूंगा. उनकी सीमाएं क्या थीं ये जानने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं. मैं ये भी नहीं जानता कि उन्होंने उस समय क्या खेल खेला और मैं जानना भी नहीं चाहता.

मधु : आपके पूर्ववर्तियों ने तो इसमें बेहद सक्रिय भूमिका निभाई थी.

वाहनवती : हां, पर मेरी ये जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है. मामला चाहे गुजरात का हो या मेरे पाए आए सभी मामलों का, मैं अपने हिसाब से चल रहा हूं. मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पहले क्या हुआ था. मेरे हिसाब से मेरा ये कहना ठीक नहीं होगा कि ये गलत था या वो गलत था क्योंकि इसका मतलब होगा कि मैं अपने आप को प्रमोट कर रहा हूं. लेकिन तहलका को मैं कभी नहीं छूने वाला. मैं उस आयोग में नहीं जाऊंगा.

 

छापे, पूछताछ, हिरासत, गिरफ्तारी और जेल

किताब का ये अंश उस भयानक अनुभव की बानगी भर है एक फैसला किस तरह से जिंदगी की कश्ती को मुश्किलों के तूफान में पटक सकता है इसे शंकर शर्मा और देविका मेहरा से बेहतर भला कौन समझेगा. शंकर और देविका ने जब तहलका में पैसा लगाने का फैसला किया तो उन्हें अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि ये उनकी तबाही की वजह बन जाएगा. एक छोटे से निवेश की कीमत उन्हें अपने कारोबार की बर्बादी, पुलिस के छापों, पूछताछ, अदालतों के चक्कर और आखिर में जेल के रूप में चुकानी पड़ी. शंकर को जेल एक ऐसे कानून के तहत हुई जिसे संसद डेढ़ साल पहले खत्म कर चुकी थी. एक साल के भीतर ही उन्हें  अलग-अलग विभागों और एजेंसियों द्वारा पूछताछ के लिए 300 से भी ज्यादा सम्मन भेजे गए, प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, आबकारी विभाग, कंपनी मामले विभाग और रिजर्व बैंक सबने शंकर और देविना को हर तरह से जांचा. आयकर विभाग ने उनके घर पर 15 बार छापा मारा. कंपनी एक्ट के तहत उन पर 22 मामले दाखिल किए गए. एक मामला फेरा के तहत भी दर्ज हुआ. शंकर का पासपोर्ट जब्त कर लिया गया जबकि देविका ने अपना पासपोर्ट जब्त होने से बचाने के लिए स्टे ऑर्डर या दूसरे शब्दों में कहें तो कुछ और अदालती चक्कर मोल ले लिए.

आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये शंकर शर्मा और देविना मेहरा हैं कौन? और अगर तहलका कांड के बाद भी इनका नाम ज्यादा लोग क्यों नहीं जानते?

 वो दोनों नए और उभरते भारत का उदाहरण हुआ करते थे मगर उनके साथ जो हुआ वो इसका उदाहरण बन गया कि इस देश की व्यवस्था में क्या गड़बड़ है

साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखने वाले शंकर और देविना ने मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद 1994 में फर्स्ट ग्लोबल स्टॉकब्रोकिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक कंपनी शुरू की थी. वे दोनों कंपनी के निदेशक थे. अगले सात साल में फर्स्ट ग्लोबल भारत में शेयरों का कारोबार करने वाली सबसे बड़ी कंपनियों में से एक बन गई. तहलका कांड से पहले तक देश के अलग-अलग शहरों में इसकी 18 शाखाएं थी जिनमें 300 से भी ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ था. लंदन और न्यूयॉर्क में भी उनके ऑफिस थे. फर्स्ट ग्लोबल ग्रुप लंदन स्टॉक एक्सचेंज की सदस्यता हासिल करने वाली पहली भारतीय कंपनी थी और एशिया मनी मैगजीन द्वारा इसे भारत के तीन सबसे बड़े ब्रोकरेज हाउसेज में से एक कहा गया था. जनवरी 2001 में भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने फर्स्ट ग्लोबल को विदेशी संस्थागत निवेशक का दर्जा दिया था. इससे ये कंपनी विदेशों से भी पूंजी इकट्ठा कर सकती थी. वर्ष 1999-2000 में फर्स्ट ग्लोबल ग्रुप का ट्रेडिंग टर्नओवर 7432 करोड़ रुपये का था. शंकर और देविना व्यक्तिगत रूप से भारत से सबसे बड़े करदाताओं की सूची में थे और उन पर या उनके कारोबार के दामन पर कभी भी टैक्स चोरी या कानून का उल्लंघन जसा कोई दाग नहीं लगा था.

मगर सफलता की उड़ान भर रहे शंकर और देविना अप्रैल 2001 में तब जमीन पर आ गिरे जब फर्स्ट ग्लोबल को जबर्दस्ती बंद करवा दिया गया. वो दोनों नए और उभरते भारत का उदाहरण हुआ करते थे मगर उनके साथ जो हुआ वो इसका उदाहरण बन गया कि इस देश की व्यवस्था में क्या गड़बड़ है. शंकर और देविना जब उन घटनाओं के बारे में बताते हैं जो तहलका कांड के बाद उनके साथ हुईं तो अहसास होता है कि कैसे जांच की आड़ में किसी इंसान को नर्क में झोंका जा सकता है.

शंकर और देविना के पास खानदानी दौलत नहीं थी. न ही उन पर किसी नेता या बड़े आदमी का हाथ था. वो दोनों उन मध्यवर्गीय परिवारों से आते थे जहां बच्चों की बेहतरी के लिए सबसे अच्छी चीज शिक्षा को माना जाता है. देविना ने कॉलेज में आठ स्वर्ण पदक जीते थे और लखनऊ विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई के दौरान सर्वाधिक अंकों के मामले में 60 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया था. भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद में भी देविका गोल्ड मेडेलिस्ट थीं और उन्हें दोनों साल स्कॉलरशिप मिली थी. उधर, शंकर ने अपना एमबीए मनीला स्थित एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट से किया था जहां वो सबसे प्रतिभाशाली छात्रों में गिने जाते थे. पढ़ाई खत्म होने के बाद देविना ने सिटीबैंक के साथ अपना करिअर शुरू किया मगर उनकी दिलचस्पी रिसर्च में ज्यादा थी. 1990 में उन्हें कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी में पीएचडी के लिए दाखिला मिल गया मगर फिर उन्हें लगा कि फाइनेंस में पीएचडी करके ज्यादा फायदा नहीं. 1993 में जब भारतीय बाजार विदेशी निवेश के लिए खुला और स्टॉक मार्केट में उद्योगों और कंपनियों से संबंधित रिसर्च की अहमियत बढ़ी तो देविना ने शंकर के साथ मिलकर काम शुरू किया.

 तहलका से संबंध ने उनके लिए जो मुसीबतें खड़ीं कीं उन पर भी उनका नजरिया किसी बुद्धिजीवी जैसा ही है

काम चल निकला. शंकर और देविना ने खूब तरक्की की. दोनों ने साथ-साथ कंपनी खड़ी की. कंपनी की बर्बादी के दौरान भी दोनों साथ-साथ रहे और अब दोनों साथ-साथ ही इसे फिर से खड़ा कर रहे हैं. किसी सवाल का जवाब दोनों अक्सर एक ही तरीके से और एक जैसे शब्दों में देते हैं. हालांकि इन समानताओं के बावजूद शंकर और देविना में कई चीजें ऐसी हैं जो उन्हें एक-दूसरे से अलग व्यक्तित्व भी बनाती हैं. मसलन बात करते हुए शंकर जहां बेहद बेफिक्र नजर आते हैं वहीं देविना शब्दों के चयन में सावधानी बरतती हैं. वो इस बारे में कहीं ज्यादा सजग दिखती हैं कि वो किससे बात कर रही हैं और उनके शब्दों का परिणाम क्या हो सकता है, खासतौर पर उनके छपने के बाद. शंकर और देविना को कारोबार की दुनिया के बुद्धिजीवियों के तौर पर देखा जाता है. उनके कई लेख अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुके हैं. तहलका से संबंध ने उनके लिए जो मुसीबतें खड़ीं कीं उन पर भी उनका नजरिया किसी बुद्धिजीवी जैसा ही है. ये बात उस लंबी बातचीत के इन हिस्सों से भी झलकती है जो मैंने उनसे इस बारे में की.

देविना मेहरा : अब हमें महसूस हो गया है कि किसी का भी (जेल के) बाहर होना इस वजह से है क्योंकि कोई आपको भीतर नहीं भेजना चाहता. अगर वो कोई ऐसा चाहे तो किसी भी पल आप सलाखों के पीछे हो सकते हैं. भारत में क्रूरता अक्सर खुलेआम नहीं होती. इसकी योजना इस तरह से बनाई जाती है कि ऊपर से ऐसा लगे कि सब कुछ अपने तरीके से हो रहा है और कानून बिना भेदभाव अपना काम कर रहा है. ठीक वैसे ही जैसे अपनी बहू के खिलाफ जहर पाले कोई सास दिन भर पूजा करती हुई नजर आती है और जब परिवार के बाकी लोग देख न रहे हों तो बहू पर अप्रत्यक्ष छुरियां चलाती रहती है. जब इस तरह का कोई (सरकारी) अभियान चलता है तो कभी भी लिखित निर्देश नहीं दिए जाते, न ही फोन पर कोई बात की जाती है. ये निर्देश आमने-सामने की मुलाकात के दौरान दिए जाते हैं जिसका कोई गवाह नहीं होता. ये स्थिति खुले तौर पर तानाशाही वाले शासन से कहीं बदतर होती है…

13 मार्च 2001 की सुबह पहले जब शंकर ने तरुण तेजपाल से बात की तो उस समय उनकी चिंता सिर्फ ये थी कि तरुण उनका पैसा बर्बाद करने वाले हैं और तहलका से बाहर निकलने की उनकी योजना खटाई में पड़ने वाली है. हालांकि शंकर का उस समय भी मानना था कि तरुण को तहलका में सुभाष चंद्रा के निवेश तक इंतजार करना चाहिए था जो जल्द ही होने वाला था. उधर, तरुण को सरकार की ताकत का पता था और उनके पास कोई विकल्प नहीं था.

शंकर शर्मा : अगर आपने कोई स्टिंग ऑपरेशन किया और इसके सार्वजनिक होने से पहले ही इन गुंडों को इसका पता चल गया तो इसका मतलब है कि आपको जासूसी के आरोप में जेल की हवा खानी पड़ेगी. कल्पना कीजिए कि अगर ये सावर्जनिक नहीं हुआ होता और इन लोगों को मैथ्यू सैमुअल या किसी और की असलियत का पता चल जाता तो उन्होंने उसे सीधे रास्ते से हटा दिया होता, वो उसे सीधे आईएसआई का जासूस या मुजाहिदीन करार दे देते.

मधु त्रेहन : तहलका  में पैसा लगाने के परिणाम आपको पहली बार कब महसूस होने शुरू हुए?

शंकर : तब जब द इकॉनॉमिक टाइम्स  के दिल्ली संस्करण में मनगढ़ंत खबरें छपनीं शुरू हुईं. 15 मार्च से अजीब-सी कहानियां सामने आने लगीं. हमें लगने लगा कि कुछ न कुछ खिचड़ी पक रही है. फिर बंगारू के जाने के बाद भाजपा के अध्यक्ष बने जन कृष्णमूर्ति का बयान आया कि ये साजिश है. फिर किसी ने कहा कि ये कांग्रेस की साजिश है

देविना : बीजेपी ने बैंगलोर में मोर्चा निकाला और मांग की कि तहलका के पीछे कौन है इसका पता लगाया जाए.

शंकर : तहलका के वित्तीय स्रोत के बारे में सवाल उठाए जा रहे थे. हमें डर लगने लगा. 16 मार्च 2001  को हमने मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस की. हमने अपने सौदों के सभी रिकॉर्ड्स दिखाए. हमने कहा कि इनकी हर तरह से जांच कर ली जाए. अपने 10 साल के कारोबार में हमने काफी सम्मान कमाया था…

शंकर और देविना की अप्रैल के पहले हफ्ते तक न्यूयॉर्क में रहने की योजना थी मगर उनके मुंबई दफ्तर से आए एक फोन ने इसे बदल दिया

प्रेस कांफ्रेंस करने के बाद उसी रात शंकर और देविना न्यूयॉर्क रवाना हुए जहां उन्हें अमेरिकी स्टॉक एक्सचेंज नैस्डेक की मान्यता हासिल करने के लिए इंटरव्यू देने थे. उड़ान के दौरान उन्होंने इस पर चर्चा की कि उनके लिए इस प्रकरण से क्या मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. शंकर बताते हैं, ‘हमें लगा कि बुरे से बुरा ये हो सकता है कि आयकर विभाग का छापा पड़ जाए. मगर यदि उन्हें कुछ नहीं मिलेगा तो फिर वो भी क्या कर सकते हैं? भारत में हर कंपनी को पता होता है कि आज नहीं तो कल इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट के लोग आएंगे ही. इसका मतलब किसी भी तरह से ये नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया.’

शंकर और देविना की अप्रैल के पहले हफ्ते तक न्यूयॉर्क में रहने की योजना थी मगर उनके मुंबई दफ्तर से आए एक फोन ने इसे बदल दिया. ये फोन इन्कम टैक्स ऑफिसर ए ए शंकर का था जिन्होंने लगभग हड़काने वाले अंदाज में शंकर को बताया कि उनका घर सील कर दिया गया है और चूंकि चाबियां उनके पास हैं इसलिए वो तुरंत वापस लौट आएं ताकि घर खोलकर उसकी तलाशी ली जा सके. शंकर और देविना अगली ही फ्लाइट पकड़कर मुंबई पहुंचे. कोलाबा स्थित घर चूंकि सील था इसलिए उन्हें नजदीक के एक होटल में ठहरना पड़ा.

शंकर : मुझे याद है कि ये बड़ा ही अजीब सा अनुभव था. आप अपने घर के बाहर खड़े हैं और आपको अपने घर में सोने की इजाजत नहीं है. मुझे बहुत गुस्सा आया. मैं अपने ही घर में नहीं घुस सकता यार.

देविना : विडंबना ये थी कि उससे पिछले ही साल हमने 20 करोड़ रुपये से भी ज्यादा राशि का टैक्स भरा था. अगर इतना टैक्स भरने के बाद भी आपके साथ ऐसा हो तो टैक्स भरने का मतलब क्या है?

अगली सुबह उन्होंने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को फोन किया. थोड़ी ही देर में उनके घर पर आधा दर्जन अधिकारी आ धमके और उन्होंने घर खंगालना शुरू कर दिया. कपड़े, किताबें, अलमारियां इधर-उधर बिखरने लगे. इसी दौरान समाचार चैनल स्टार न्यूज पर खबर चलने लगी कि शंकर और देविना को मुंबई एयरपोर्ट पर गिरफ्तार कर लिया गया है. शंकर कहते हैं,‘ये खबर चलवाई गई थी. हर तरह की ऊटपटांग खबरें छपवाई जा रही थीं. हम लोग सोच रहे थे कि परिवार में कोई ये खबर पढ़ेगा तो घबरा जाएगा. ये आपकी इज्जत की भी बात होती है यार. गिरफ्तार होना, छापे..बाद में आप पक्के होकर इन चीजों के आदी हो जाते हैं मगर उस समय ये एक बड़ी बात थी.’

शंकर और देविना से नौ दिन तक पूछताछ की गई जो 12 घंटे लंबी भी खिंच जाती थी. एक इनकम टैक्स अधिकारी ने अनौपचारिक तौर पर उन्हें बताया कि छापों का संबंध सिर्फ तहलका से है

उन्होंने अपने परिवार को फोन कर बताया कि वो गिरफ्तार नहीं हुए हैं बल्कि घर पर हैं. शंकर ने फिर स्टार न्यूज में राज रॉय को फोन लगाया और कहा, ‘आप ये क्या बकवास चला रहे हैं? मैं अपने घर पर बैठा हूं.’ रॉय ने शंकर को बताया कि ये रिपोर्ट दिल्ली से आई है. फिर रात नौ बजे के बुलेटिन में ये गलती सुधार ली गई. इनकम टैक्स का छापा आधी रात तक जारी रहा.

शंकर: उन्होंने खाने का ऑर्डर दिया. मेरा गुस्सा बढ़ता जा रहा था. कोई आपके घर आता है और आपका हर सामान उलट-पुलट कर रख देता है.

देविना: बिल्कुल. निजी तौर पर उन सबका कहना था कि ये सब तहलका की वजह से हो रहा है.

शंकर: वो कह रहे थे. हम क्या कर सकते हैं. हमें दिल्ली से ऑर्डर मिले हुए हैं. हम ऐसा करने के लिए मजबूर हैं. मैंने कहा, ठीक है, जो मन में आए करो.

देविका: जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि घर में कुछ नहीं है. वास्तव में कुछ था भी नहीं. घर में ज्यादातर किताबें ही हैं, और कुछ नहीं.

शंकर: सिर्फ एक चीज जिस पर हमें गर्व है वो है हमारी लाइब्रेरी.

शंकर और देविना से नौ दिन तक पूछताछ की गई जो 12 घंटे लंबी भी खिंच जाती थी. एक इनकम टैक्स अधिकारी ने अनौपचारिक तौर पर उन्हें बताया कि छापों का संबंध सिर्फ तहलका से है और इनका अघोषित संपत्ति का पता लगाने से कोई वास्ता नहीं. उसका कहना था कि तहलका पर कोई मामला बनाना जरूरी है.

सेबी अधिकारियों ने शंकर और देविना को आश्वस्त किया कि उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है क्योंकि दो मार्च 2001 के जिस दिन शेयर बाजार में भारी गिरावट आई थी उस दिन उन्होंने खरीदारी ज्यादा की थी. इसलिए गिरावट से उनका संबंध नहीं जोड़ा जा सकता था जो जांच का ऊपरी मकसद दिख रहा था.

इसके बाद के दिनों में पूछताछ के लिए इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने शंकर और देविना को 230 के करीब सम्मन भेजे. कुछ बार तो ऐसा हुआ कि उन्हें सुबह 11 बजे तीन अलग-अलग जगहों पर पेश होने के सम्मन मिले. उनकी जिंदगी पर डर का घना कोहरा छा गया था. तीन दिन तक उनके घर के बाहर सफेद रंग की एक मारुति वन खड़ी रही. उनके हर कदम पर निगाह रखी जा रही थी. शंकर और देविना आज हंसते हुए बताते हैं कि उस समय उन्होंने सबसे पहला काम ये किया कि ऐसी किताबें खरीद लाए जो तलाशी व जब्ती और भारत के नागरिक के अधिकारों से संबंधित जानकारी पर आधारित थीं.

उनके दफ्तर पर इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट के छापे के दौरान 25 साल के एक कर्मचारी को 24 घंटे तक एक कमरे में बंदकर धमकाया गया और इस दौरान उसे न खाना मिला और न पानी. फर्स्ट ग्लोबल के लिए कंसल्टेंट का काम करने वाले नीरज खन्ना से सारी रात पूछताछ की गई. उन्हें सोने नहीं दिया गया जबकि कई अधिकारी अपनी नींद पूरी करते हुए बारी-बारी से उनसे सवाल करते रहे. खन्ना को धमकी दी गई कि अगर उन्होंने शंकर और देविना के खिलाफ लिखे गए बयान पर दस्तखत नहीं किए तो उनका कारोबार लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा. स्टाफ के दूसरे लोगों को भी परेशान किया जा रहा था. जब शंकर और देविना ने उन्हें तलाशी और जब्ती से संबंधित कानून गिनाने शुरू किए तो अधिकारी और भी गुस्से में आ गए. उन्होंने सबसे पहले जो सवाल पूछे वो सब के सब तहलका के बारे में थे. जब शंकर ने उन्हें बताया कि कानून के मुताबिक उन्हें सिर्फ आय से संबंधित सवाल पूछने का अधिकार है तो अधिकारियों का पारा आसमान पर चढ़ गया और वो आईपीसी की धारा 179 के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने की धमकी देने लगे. शंकर भी इस पर अड़े रहे कि वो सिर्फ उन्हीं सवालों का जवाब देंगे जो आयकर कानूनों के तहत आते हैं.

पूछताछ तीन से 17 अप्रैल तक चलती रही. मुख्य तौर पर ये तहलका के बारे में थी. जब्त किया गया सब पत्राचार भी तहलका से ही संबंधित था. फर्स्ट ग्लोबल के किसी दूसरे निवेश को लेकर कोई सवाल नहीं पूछा गया जबकि उनके पूरे कारोबार को देखा जाए तो तहलका में उन्होंने अपने बाकी निवेशों की तुलना में शायद सबसे कम निवेश किया था.

फिर रिजर्व बैंक, जिसे पक्षपातरहित संस्था माना जाता है, की तरफ से भी उत्पीड़न शुरू हो गया. नौ अप्रैल 2001 को बैंक ने फर्स्ट ग्लोबल से कहा कि वह लंदन स्थित अपनी इकाई की सालाना प्रदर्शन रिपोर्ट दे जो नियमों के हिसाब से उस साल 31 जुलाई के बाद दी जानी थी. बैंक ने ये भी धमकी दी कि अगर तय दिन तक रिपोर्ट न सौंपी गई तो वो इस मामले को प्रवर्तन निदेशालय को सौंप देगा. समयसीमा के भीतर ये रिपोर्ट बैंक को दे दी गई.

फिर 17 अप्रैल को शंकर को एक आयकर अधिकारी का फोन आया जिसमें कहा गया कि वो अगली सुबह उनके सामने पेश हों. जब शंकर ने ये कहते हुए इसका विरोध किया कि उन्हें कुछ बैठकों में हिस्सा लेना है तो अधिकारी का जवाब था कि उन्हें पेश होना ही होगा. शंकर अगली सुबह 11 बजे उपनिदेशक आर लक्ष्मण के दफ्तर में पहुंचे. कमरे में एक अन्य व्यक्ति नोटपैड और पेन लेकर बैठा हुआ था. लक्ष्मण ने शंकर को बताया कि उनका बयान रिकॉर्ड किया जाएगा. शंकर ने उनसे पूछा कि उन्हें बिना सम्मन दिए उनका बयान कैसे रिकॉर्ड किया जा सकता है तो लक्ष्मण ने कहा कि उन्हें सम्मन भेजने की जरूरत नहीं है. शंकर ने जवाब दिया कि उन्हें भी कानून की जानकारी है और उसके मुताबिक सम्मन जरूरी है. तकरीबन डेढ़ घंटे तक बहस चलती रही और आखिरकार लक्ष्मण ने एक सम्मन तैयार करवाकर शंकर को दिया. शंकर ने फिर पूछा कि कोने में नोटपैड और पेन लेकर बैठा व्यक्ति कौन है. लक्ष्मण ने कहा कि उन्हें कमरे में मौजूद किसी दूसरे आदमी की पहचान बताने की जरूरत नहीं है. शंकर अड़ गए कि वो किसी ऐसे आदमी के सामने अपना बयान दर्ज नहीं करवाएंगे जिसके बारे में उन्हें कुछ भी पता न हो.

18 अप्रैल को रात के साढ़े नौ बजे शंकर को अपने दफ्तर से फोन आया कि कोई फैक्स आया है जो किसी लेटरहेड पर तो नहीं है पर लगता है कि जैसे सेबी ने भेजा हो

शंकर: मैंने कहा, ठीक है, हम यहां दिन भर बैठे रहकर अपना वक्त बर्बाद करते रहेंगे मगर आपको मुझसे कोई जानकारी नहीं मिलेगी. मगर वो उस व्यक्ति की पहचान बताने को तैयार नहीं थे. आखिरकार उस आदमी को कमरे से बाहर जाना पड़ा. मुझे लगता है कि वो आईबी या किसी दूसरी जगह से था. वो बड़ा अजीब सा आदमी दिखता था. उसके जाने के बाद लक्ष्मण ने बयान रिकॉर्ड करना शुरू किया.

देविना: जब हम बयान दर्ज करवाने के दौरान ऐसा भी होता था कि हम एक पेज रिकॉर्ड करते और वो आदमी बाहर जाता और गर्व से अपने बॉस को वो बयान फैक्स कर देता. फिर उधर से फोन आता कि ये वो फलां फलां सवाल हैं जो जरूर पूछने हैं. तो कुल मिलाकर बात ये थी कि हर पेज दिल्ली जा रहा था और वहां से वापस आ रहा था..

18 अप्रैल को रात के साढ़े नौ बजे शंकर को अपने दफ्तर से फोन आया कि कोई फैक्स आया है जो किसी लेटरहेड पर तो नहीं है पर लगता है कि जैसे सेबी ने भेजा हो. शंकर और देविना खाना छोड़कर दफ्तर की तरफ भागे. शंकर बताते हैं कि फैक्स बड़ा अजीब था. ये किसी लेटरहेड पर नहीं था, इसमें किसी के दस्तखत नहीं थे और ये अधूरा लगता था. उन्हें लगा कि ये फर्जी भी हो सकता है क्योंकि इसमें सेबी एक्ट की धारा 11बी का हवाला देते हुए फर्स्ट ग्लोबल को उसके खिलाफ जांच के चलते अपना कारोबार बंद करने का आदेश दिया गया था. शंकर जानते थे कि किसी बोर्ड को ऐसा फैसला करने का अधिकार नहीं है और सिर्फ सेबी अध्यक्ष किसी सूचीबद्ध कंपनी को अपना कारोबार बंद करने का आदेश दे सकता है. इस कानून का इस्तेमाल आपात स्थिति में किया जाता है. इसलिए देखा जाए तो तत्कालीन सेबी अध्यक्ष डी आर मेहता ने कानून का अधिकतम इस्तेमाल कर डाला था. शंकर और देविना सेबी के दफ्तर पहुंचे जहां एक गार्ड ने उन्हें बताया कि सभी अधिकारी अभी-अभी निकले हैं. शंकर के पास एक अधिकारी के घर का फोन नंबर था और उन्होंने उसे फोन लगाया. शंकर बताते हैं, ‘उसका व्यवहार अच्छा था. उसने कहा, ऑर्डर मिल गया आपको? मैंने पूछा, ऐसा क्यों किया जा रहा है. उसने जवाब दिया, कोई कारण हो तो बताऊं. मैंने कहा कि मैं आपसे मिलना चाहता हूं. उसने कहा, मैं इतना शर्मिंदा हूं कि आपसे नहीं मिल सकता. अपने करिअर में मैंने ये सबसे बुरा काम किया है. क्योंकि ये अंतरिम आदेश है इसलिए इसे चुनौती नहीं दी जा सकती और अपना कारोबार चलाने के लिए आपको तत्काल राहत मिलना नामुमकिन है.’ शंकर और देविना अब ये चर्चा करने लगे कि कैसे 300 लोगों को नौकरी से निकाला जाएगा और अपने आफिसों को बंद किया जाएगा…

संयोग की बात है कि ये तब हुआ कि जब फर्स्ट ग्लोबल नैस्डेक की सदस्यता प्रक्रिया से गुजर रही थी. नैस्डेक की टीम अमेरिका से भारत आई हुई थी और उन्होंने फर्स्ट ग्लोबल से इस बारे में सवाल पूछे कि क्यों उनका अपना नियामक ही उन्हें कारोबार बंद करने का आदेश दे रहा है. नैस्डैक टीम ने बारीकी से फर्स्ट ग्लोबल के दस्तावेजों की जांच की और निष्कर्ष दिया कि शंकर और देविना को अपने कारोबार से जुड़ी किसी भी गलती के लिए नहीं सताया जा रहा है. उसने ये भी कहा कि अगर अमेरिका में नैस्डेक ने इस तरह का कोई आदेश दिया होता तो उल्टे ऐसा आदेश देने वालों को लेने के देने पड़ जाते.

घबराए शंकर और देविना लगातार वकीलों से बात कर अगले कदम के बारे में सोच रहे थे. दोपहर तीन बजे सादे कपड़ों में तीन पुलिस सब इंसपेक्टर उनके केबिन में पहुंचे. उन्होंने पूछा कि क्या शंकर का एक दिन पहले किसी इनकम टैक्स डिपार्टमेंट वाले से झगड़ा हुआ है. जब शंकर ने कहा कि नहीं तो उन्होंने कहा कि उनके पास तो यही सूचना है. उसके बाद पुलिसकर्मियों ने शंकर को बताया कि एक अधिकारी ने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है और उन्हें तारदेव पुलिस थाने में चलना होगा. शंकर इसके लिए तैयार हो गए क्योंकि उन्हें पता था कि इस बात में कोई सच्चाई नहीं है. कार में उनके साथ बैठे पुलिसकर्मी ने उन्हें बताया कि उन्हें गिरफ्तार किया गया है और उन पर एक इनकम टैक्स अधिकारी को जान से मारने की धमकी देने का आरोप है. शंकर को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ. देविना का जिंदगी में पहली बार वकीलों से वास्ता पड़ रहा था और उन्हें समझ में नहीं आया कि किस वकील से संपर्क किया जाए.

शंकर को तारदेव थाने लाया गया. दोस्तों की सलाह पर देविना ने क्रिमिनल लॉयर गिरीश कुलकर्णी को फोन लगाया और उनसे मदद मांगी. कार में मौजूद पुलिसकर्मी पहले ही शंकर को बता चुके थे कि इनकम टैक्स कमिश्नर ने पुलिस कमिश्नर को फोन कर कैसे भी उन्हें उसी दिन गिरफ्तार करने को कहा है. शंकर बताते हैं कि पुलिसकर्मियों का व्यवहार अच्छा था और उन्होंने भरोसा जताया कि ऐसी कोई वजह नहीं है कि रात से पहले उन्हें जमानत न मिले. पुलिस शंकर को मजिस्ट्रेट के पास ले गई. पुलिस ने जमानत का विरोध नहीं किया मगर मजिस्ट्रेट ने फिर भी जमानत की अपील ठुकरा दी और शंकर को जेल भेज दिया.

मधु त्रेहन: जेल में घुसते हुए क्या लग रहा था?

शंकर: ये अजीब और डरावना अहसास था. वो मुझे पीछे की तरफ ले गए. फिर हम सीढ़ियों से ऊपर चढ़े जहां लॉकअप था. वहां चार-पांच लोग थे जो किसी दलाल या तस्कर जैसे लग रहे थे. रोशनी बहुत कम थी. फर्श पत्थर का था और जगह-जगह से टूटा हुआ था. तीन तरफ दीवारें थीं और सामने सलाखें. एक खिड़की थी जो काफी ऊंचाई पर थी और आप बाहर नहीं देख सकते थे. सब जेलों में छत बहुत ऊंची होती है. दीवारें गंदी थीं, वहां कोई पंखा नहीं था. मैं फर्श पर बैठा रहा.

मधु : सबसे पहले आपके मन में क्या ख्याल आया?

शंकर: मैं खुद से कह रहा था, आखिर ये सब कहां जाकर खत्म होगा? या आगे क्या होगा? ये कैसे हो गया? शायद ये कोई बुरा सपना हो? फिर एक घंटे बाद मुझे बाहर निकालकर फिर से थाने ले जाया गया…

25 सितंबर 2001 को शंकर और देविना चेन्नई एयरपोर्ट पर लंदन के लिए अपनी फ्लाइट का इंतजार कर रहे थे. इमिग्रेशन ऑफिसर ने शंकर का पासपोर्ट देखा और उन्हें रोक दिया. फिर उसने फोन पर किसी से बात की. इसके बाद उसने पूछा, ‘क्या आप वही शंकर शर्मा हैं जिन्होंने तहलका में निवेश किया है?’ शंकर ने पूछा कि इसका इमिग्रेशन क्लियरेंस से क्या लेना-देना है. अधिकारी ने उन्हें बताया कि उन्हें तब तक इंतजार करना होगा जब तक उसे दिल्ली स्थिति वित्त मंत्रालय से अगला निर्देश नहीं मिलता. इंतजार में कई घंटे बीत गए और अधिकारी कुछ भी बताने से इनकार करता रहा. आखिरकर उनका सामान जहाज से उतार दिया गया. अब वो 15 अधिकारियों के बीच खड़े थे जो आपस में खुसर-फुसर करते हुए उनके सामान की तरफ इशारा कर रहे थे. आखिरी अंतर्राष्ट्रीय उड़ान भी जा चुकी थी और एयरपोर्ट लगभग खाली हो चुका था. उनके पासपोर्ट अधिकारियों के कब्जे में थे, उन्हें फोन करने की इजाजत नहीं जा रही थी और दिल्ली से अगले आदेश का इंतजार किया जा रहा था. शंकर और देविना बताते हैं कि ऐसा लग रहा था जसे वो किसी बाहरी देश में हैं. उन्हें ये भी डर लग रहा था कि उनके सामान में ड्रग्स या कोई अवैध चीज रखकर कहीं उन्हें फंसाने की साजिश न हो रही हो. चेन्नई में अपने आफिस के पांच सदस्यों के सिवा वो किसी को भी नहीं जानते थे जिनसे मिलने वो इस शहर में आए थे. शंकर बताते हैं कि वो दोनों इतने डर गए थे कि अगर उनकी उम्र 15 साल ज्यादा होती तो उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता. जब शंकर ने कहा कि अब वो और इंतजार नहीं करने वाले तो अधिकारी ने कहा कि जब तक वित्त मंत्रालय से उसे कोई निर्देश नहीं मिलता वो कहीं नहीं जा सकते. तड़के साढ़े तीन बजे एक सीनियर ऑफिसर पहुंचा और उसने कहा कि शंकर के खिलाफ एक लुकआउट नोटिस जारी हुआ है ताकि वो देश से बाहर न जा सकें. आमतौर पर इस तरह का नोटिस सारे हवाई अड्डों के लिए जारी होता है ताकि भगोड़े अपराधी देश से बाहर न जा सकें. शंकर ने कहा कि जब वह मुंबई स्थित अपने घर में किसी आम आदमी की तरह रह रहे हैं तो नोटिस का क्या मतलब है. जब शंकर ने उस अधिकारी से ये नोटिस दिखाने को कहा तो उसने इससे इनकार कर दिया. सुबह पांच बजे दो इनकम टैक्स अधिकारी एयरपोर्ट पहुंचे. उन्होंने अपने नोटपैड निकाले और शंकर और देविना से कहा कि वो उनसे पूछताछ करेंगे. जब शंकर ने उनसे पूछा कि वो किस नियम के तहत ये कर रहे हैं तो उनका जवाब था कि वो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से हैं और कोई भी सवाल पूछ सकते हैं. उनका पहला सवाल था, आप दोनों का नाम क्या है. शंकर ने कहा, ‘अगर आप पहले मेरा नाम पूछते हैं और फिर मेरी तलाशी लेते हैं तो बात समझ में नहीं आती. मेरी तलाशी से पहले आपको मेरा नाम पता होना चाहिए.’ फिर शंकर ने उन्हें आयकर कानून गिनाए और पूछा कि आखिर उनसे किस कानून के तहत पूछताछ की जा रही है. आखिरकार अधिकारियों ने घुटने टेक दिए और कहा कि वो अपने बॉस के आने का इंतजार करेंगे. जल्द ही उनका बॉस भी एक सर्च वारंट के साथ प्रकट हो गया और उसने कहा कि शंकर और देविना के सामान में कुछ कीमती चीजें होने की सूचना मिली है. अधिकारियों ने सामान खंगालना शुरू किया. हर सामान की उलट-पुलट कर तलाशी ली गई. कुछ नहीं मिला. फिर लैपटॉप को खंगाला गया. उसमें भी कुछ नहीं मिला. थकहारकर 11 बजे उन्होंने पंचनामे पर दस्तखत किए और शंकर और देविना को आखिरकार जाने देने का फैसला किया. 30 घंटे तक लगातार जागे रहे और बुरी तरह थके शंकर और देविना ने एयरपोर्ट के सबसे नजदीक स्थित होटल में जाकर आराम करने का फैसला किया. उनकी योजना दिन भर आराम कर शाम को मुंबई की फ्लाइट पकड़ने की थी.

देविना : और फिर फोन की घंटी बजी.

शंकर : देविना ने फोन उठाया

देविना : हां, और आवाज आई, क्या मैं शंकर शर्मा से बात कर सकता हूं?

शंकर : चेन्नई में किसी को भी मालूम नहीं था कि हम थोड़ी ही देर पहले ट्राइडेंट होटल में आए हैं. हमें आए 10 मिनट ही हुए थे. यहां तक कि हमारा अपना स्टाफ भी ये बात नहीं जानता था.

देविना : उसने कहा, प्रदीप सक्सेना. मैंने कभी ये नाम नहीं सुना था इसलिए मैंने पूछा कि आप कौन हैं? उसने कहा कि वो शंकर का पुराना दोस्त है. मुझे अजीब लगा. मैंने कहा कि पुराने दोस्त का मतलब क्या है? आप उन्हें कैसे जानते हैं? उसने कहा कि वो उनके कालेज के दिनों का दोस्त है. मैंने पूछा कि कौन सा कालेज? वो रूम नंबर जानना चाहता था क्योंकि होटल के स्टाफ ने उसे ये नहीं बताया था. आखिर मैंने फोन रख दिया. पांच मिनट बाद 12 लोग कमरे के दरवाजे पर खड़े थे. उन्होंने कहा कि उनके पास सर्च वारंट है और वो कमरे की तलाशी लेंगे.

शंकर: इनमें कुछ लोग वही थे जो एयरपोर्ट पर थे. मैंने उससे कहा कि आप लोग पहले ही मेरी तलाशी ले चुके हैं. एयरपोर्ट पर आपके सामने ही मैंने होटल में कमरा बुक किया था और अब मुझे होटल के इस कमरे में फिर से अपना सामान बिखराना पड़ेगा ये .

देविना: बहुत अजीब था.

अधिकारियों ने होटल के कमरे और उनके सामान की फिर से तलाशी ली. इस बार उनके साथ एक कंप्यूटर विशेषज्ञ भी था जिसने शंकर के लैपटॉप की जांच की. शंकर ने पूछा कि जब उसी लैपटॉप की पहले भी जांच हो चुकी है तो ये कवायद दोहराने का क्या मतलब है. विशेषज्ञ ने ऐलान किया कि लैपटॉप में कुछ नहीं है.

शंकर : मैं पहले ही कह चुका था कि इसमें कुछ भी नहीं है. उस अधिकारी को झटका लगा क्योंकि उनकी नजर में मैं जेम्स बांड की तरह था.(हंसते हैं) मैं एक सूटकेस लेकर चल रहा हूं, मेरे पास एक सिगरेट लाइटर है, एक लैपटॉप है और लैपटॉप में कुछ नहीं है. उनका कहना था कि ये नामुमकिन है.

मैंने कहा कि ऐसा ही है…फिर भी वे लैपटॉप ले गए…

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छापे, पूछताछ, हिरासत, गिरफ्तारी और जेल भाग-2

 

कृतज्ञता और आक्रोश

Tarun J palसितंबर 2001 की एक खुशनुमा शाम थी. दक्षिण मुंबई के एक आलीशान होटल में एक मीडिया अवॉर्ड्स समारोह का आयोजन था. मैं इसमें एक छोटी-सी समाचार वेबसाइट के प्रतिनिधि की हैसियत से शामिल था जो बमुश्किल साल भर पहले ही वजूद में आई थी, पर जिसके नाम की चर्चा हर तरफ हो रही थी. आयोजन खत्म होते-होते कुल 14 में से छह अवार्ड्स इसी वेबसाइट की झोली में गए थे. इनमें मीडिया ब्रांड ऑफ द ईयर का अवार्ड भी शामिल था जिसकी दौड़ में इसने स्टार प्लस और एमटीवी जैसे बड़े खिलाड़ियों को भी पछाड़ दिया था. मगर जिस खबर के लिए ये वेबसाइट आज दुनियाभर में मशहूर है उसका इन पुरस्कारों से कोई लेना-देना नहीं था. इसकी वजह ये थी कि ये अवॉर्ड्स साल 2000 के लिए थे और वो बड़ी खबर मार्च 2001 की थी.

छोटे शहरों में पले-बढ़े और अपने बूते जिंदगी में अपार कामयाबी बटोरने वाले एक युवा जोड़े को अचानक उसकी गर्दन के इर्द-गिर्द सरकार की फौलादी पकड़ का अहसास कराया जा रहा था

एक तरफ हम पर पुरस्कारों की बरसात हो रही थी और दूसरी तरफ चेन्नई के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमसे जुड़ा एक डरावना वाकया घट रहा था. छोटे शहरों में पले-बढ़े और अपने बूते जिंदगी में अपार कामयाबी बटोरने वाले एक युवा जोड़े को अचानक उसकी गर्दन के इर्द-गिर्द सरकार की फौलादी पकड़ का अहसास कराया जा रहा था. एक ओर मैं तारीफें बटोरने के बाद खाने-पीने में व्यस्त था और दूसरी तरफ किसी दुश्मन की तरह इस दंपत्ति को घेरे अधिकारी उन्हें जहाज में चढ़ने नहीं दे रहे थे. मैं पुलिस की सुरक्षा में सोया और इस दंपत्ति से सारी रात पूछताछ हुई. उसका जाना-अनजाना अपराध ये था कि उसने एक इंटरनेट कंपनी में निवेश किया था जो एक वेबसाइट चलाती थी जिसका नाम था तहलकाडॉटकॉम.

सेना में हथियारों की खरीद में हो रही धांधली का भंडाफोड़ करने वाले ऑपरेशन वेस्ट एंड की सबसे बड़ी कीमत जिन्हें चुकानी पड़ी वो न नेता थे, न नौकरशाह, न सेना के अधिकारी और न दलाल. न ही ये वो पत्रकार थे जो ये खबर जनता के सामने लाए थे. दरअसल सबसे बड़ी गाज तो उन दो लोगों पर गिरी थी जिनका इस ऑपरेशन से कोई लेना-देना ही नहीं था. ये दोनों लोग थे, शेयरों का कारोबार करने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक फर्स्ट ग्लोबल के मालिक शंकर शर्मा और उनकी पत्नी देविना मेहरा. उनकी भयावह कहानी बताती है कि एक उदारवादी लोकतंत्र किस तरह अचानक उस नर्क में तब्दील हो सकता है जहां सरकार के इशारे पर नाचने वाली कठपुतलियां हर कानून और कायदे की सीमाओं से परे जाकर काम करती हैं.

शंकर से जुड़ी मेरी सबसे पहली याद कॉलेज के दिनों की है. तब की जब लंबे कद और मजबूत कदकाठी वाला ये शख्स क्रिकेट सितारे युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह की निगरानी में लंबे रनअप के साथ गेंदबाजी किया करता था. शंकर की दोस्ती मेरे छोटे भाई के साथ थी और वो उन सैकड़ों छात्रों में से एक था जो अपनी पढ़ाई करने बिहार से चंडीगढ़ आते हैं. ये 1981 की बात रही होगी. मुझे याद है कि साधारण होते हुए भी उसमें कुछ खास सी बात थी. क्रिकेट के अलावा उसे आम लोगों से जुदा करने वाली बात ये अफवाह थी कि छोटी उम्र में ही उसने स्टॉक मार्केट में पैसा लगाना शुरू कर दिया है. उस दौर में हममें से ज्यादातर लोगों को स्टॉक मार्केट के बारे में कुछ खास पता नहीं था, शायद आज भी ऐसा ही है.

शंकर से जुड़ी मेरी दूसरी याद उन दिनों की है जब हम पढ़ाई खत्म कर नौकरी शुरू कर चुके थे. मेरा क्षेत्र पत्रकारिता था और उसका कंप्यूटर मार्केटिंग. हाथ में एक बैग लिए शंकर से मैं एक शाम चंडीगढ़ के सेक्टर 17 में टकराया था. हमने कुछ बातें कीं. न मुझे उसका कहा समझ आया और न ही शायद उसे मेरा. मेरे हाथ में एक उपन्यास था. उसने थोड़ी देर तक इसे उलटा-पलटा और फिर इसके बारे में पूछा. मैंने बताने की कोशिश की और मुझे महसूस हुआ कि वो शायद थोड़े अचरज में था – कॉलेज खत्म होने के बाद भी कोई उपन्यास जैसी चीज में उलझ हुआ है. मैंने बैग के बारे में पूछा तो उसने कहा कि सेल्स की ये नौकरी कुछ ही दिन के लिए है और उसने अपने लिए कुछ दूसरी और बड़ी योजनाएं बनाई हुई हैं.

इसके बाद दस साल बीत गए. इस दौरान कभी-कभार अपने छोटे भाई से मैं शंकर के बारे में थोड़ा-बहुत सुनता रहा मसलन उसने सिटीबैंक में नौकरी कर ली, उसने सिटीबैंक की नौकरी छोड़ दी, उसकी शादी हो गई, वो दक्षिण मुंबई में रह रहा है, उसने स्टॉक मार्केट में कामयाबी हासिल की है वगैरह वगैरह. मेरे भाई के मुताबिक शंकर ने जम के पैसा कमाया था मगर उसकी जीवनशैली से इसका जरा भी अंदाजा नहीं होता था. उसका रहन-सहन, पहनना-ओढ़ना, खाना-पीना सब कुछ साधारण था. उसके सिगार भारतीय होते थे. वो जब खाने का निमंत्रण देता था तो इसका मतलब ये था कि खाना सड़क किनारे चल रहे किसी ढाबे से भी आ सकता है. और उसके व्यवहार की गर्मजोशी अभी भी वैसी ही थी. वो अभी भी जोर से दिल खोलकर हंसता था.

उन्हें अहसास कराया गया कि लोकतंत्र का चोला ओढ़ सबको न्याय देने की बात करने वाले इस देश का स्वभाव अब भी सामंती है

फरवरी 2000 में मैंने आउटलुक  मैगजीन छोड़ी जहां मैं बतौर मैनेजिंग एडिटर काम कर रहा था. हम चार लोगों ने एक समाचार वेबसाइट शुरू करने का फैसला किया. उस समय डॉटकॉम बूम अपने चरम पर था और अनुभव और नए विचार के साथ कोई काम शुरू करने वाले लोगों के लिए पैसा लगाने वालों की कमी नहीं थी. सोहेल सेठ, अनिरुद्ध बहल, मिंटी तेजपाल और मैं निवेश के लिए बात करने मुंबई गए जहां हमें इनवेस्टमेंट बैंकिग के क्षेत्र में काम कर रहे एंबिट ग्रुप के अशोक वाधवा से मिलना था. एक कांफ्रेस रूम में बैठे हम उस व्यक्ति का इंतजार कर रहे थे जो पैसा लगाने वाला था. आखिर पूरी तड़क-भड़क के साथ वो आए. सफेद बोर्ड पर हिसाब-किताब लिखते हुए सोहेल और अशोक ने आम तर्क-वितर्क किए. जल्द ही प्रस्ताविक वेबसाइट की कुल कीमत 80 लाख डॉलर तय हो गई. नाम के लिए सहमति बनी तहलकाडॉटकॉम पर. ये नाम अनिरुद्ध ने पहले ही रजिस्टर करवा लिया था. निवेश की रकम किश्तों में आनी थी. पहली किश्त के लिए वाधवा ने एक हफ्ते का समय मांगा और अपने काम की फीस के तौर पर कंपनी में अपनी पांच फीसदी हिस्सेदारी तय की.

इसके बाद हम चारों होटल ताज के रेस्टोरेंट की तरफ रवाना हुए जहां सोहेल ठहरे हुए थे. यहां एक पेपर नैपकिन पर प्रस्तावित कंपनी की हिस्सेदारी बांटी गई. सौदा निपटने के बाद सोहेल ने विदा ली और मिंटी ने शंकर से मिलने और इस सौदे पर बात करने का सुझाव दिया. शंकर के अलावा और कोई दूसरा नहीं था जिससे हम जल्दी से कोई सलाह ले सकते थे. शंकर और देविना का घर पास ही था. उन्होंने लंच पर बेस्वाद राजमा-चावल बनाए थे जो हमने भी खाए. उनका फ्लैट साधारण ही था जहां पैसे और रुचियों की अधिकता के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे. हमने क्रिकेट और सिनेमा पर बात की और जो कुछ भी सुबह से तब तक हुआ था उसमें शंकर को सब कुछ ठीक ही लगा.

हफ्ते भर बाद एक दिन इतवार को शंकर ने दिल्ली में मुझे फोन किया. दिन का खाना साथ खाने का प्रोग्राम बन गया. शाम को मैं शंकर को छोड़ने एयरपोर्ट जा रहा था कि उसने वाधवा वाली शर्तों पर ही हमारी वेबसाइट में पैसा लगाने की पेशकश की. मैंने उससे वादा किया मैं जल्द ही उसे जवाब दूंगा. मुझे वाधवा से बात करनी थी. कुछ दिन बाद मैं दिल्ली के ताज मानसिंह होटल में वाधवा से मिला. उसने कहा कि वो दो-तीन दिन में मुझे कोई जवाब देगा. कुछ दिन गुजर गए और कोई जवाब नहीं आया. हमने आपस में विचार-विमर्श किया और शंकर की पेशकश स्वीकार कर ली. शंकर ने हमारी कंपनी में 14.40 फीसदी का छोटा सा हिस्सा ले लिया.

शंकर और देविना हर तरह से आदर्श निवेशक साबित हुए. उनके निवेश की किश्तें बिल्कुल ठीक समय पर आईं. उन्होंने कभी हमारे काम में दखलअंदाजी नहीं की. वेबसाइट चल निकली. हमने मैच फिक्सिंग घोटाले का पर्दाफाश किया. बेहतरीन लेखक और स्तंभकार हमारे लिए लिखने लगे. अगले निवेशक की तलाश में मैंने और शंकर ने कई बैठकें कीं. 16 फरवरी को हमने जी समूह के सुभाष चंद्रा से हाथ मिलाया जो कंपनी में 26 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने को तैयार थे. 13 मार्च को ऑपरेशन वेस्ट एंड लोगों के सामने आया.

उस सुबह मैंने शंकर को फोन किया और बताया कि हम एक बड़ी खबर चलाने वाले हैं जो सरकार को हिला सकती है. शंकर ने मुझसे ऐसा न करने की सलाह दी. उसे डर था कि निवेश के लिए हुए समझोते पर इसका बुरा असर पड़ सकता है.

तब तक बतौर पत्रकार हम व्यापारिक फायदे-नुकसान जैसी चीजों से आगे निकल चुके थे. खबर प्रसारित हुई और कुछ ही दिन के भीतर हमारे काम और हमारी जिंदगी पर हमले शुरू हो गए.

हमें खुलेआम निशाना बनाया गया. मगर हमें तारीफें भी मिलीं. मगर शंकर और देविना की किस्मत इतनी अच्छी नहीं थी. उनकी जिंदगी को इस तरह से तार-तार कर दिया गया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. अपनी पीढ़ी के सबसे प्रतिभाशाली और कामयाब प्रोफेशनल्स में शामिल शंकर और देविना भगोड़े बनकर रह गए. हताशा में हमने उन्हें वकीलों और बाबाओं के चक्कर लगाते देखा. उन्हें कई दिल दहलाने वाले सबक मिले. उन्हें अहसास कराया गया कि लोकतंत्र का चोला ओढ़ सबको न्याय देने की बात करने वाले इस देश का स्वभाव अब भी सामंती है, ये अभी भी औपनिवेशिक काल में ही जी रहा है. उन्हें सबक मिला कि सत्तारुपी पशु के पास कोई अंतरात्मा नहीं होती. उनके उत्पीड़न के मायने इस लिहाज से भी कई गुना ज्यादा बड़े हो जाते हैं कि वो निर्दोष थे और उनका इस प्रकरण से कोई लेना-देना ही नहीं था. वो न राजनीति चमका रहे नेता थे, न अपना काम कर रहे पत्रकार और न संघर्ष कर रहे आदर्शवादी. इसके बावजूद जब उन पर हमला हुआ तो उन्होंने असाधारण हौसला दिखाया. आगे के पन्नों पर लिखा एक-एक शब्द ध्यान से पढ़ेंगे तो आप समझ जाएंगे कि भारत में व्यवस्था नाम का गिरगिट किस हद तक खतरनाक है और साहस क्या चीज होती है.

तहलका ने भले ही शंकर और देविना की जिंदगी को नर्क बना दिया मगर उन्होंने इसके लिए एक बार भी हमें नहीं कोसा. ये अपने आप में एक असाधारण बात है. उनसे हमें एक कठोर शब्द तक सुनने को नहीं मिला. तहलका की हिस्सेदारी छोड़े उन्हें एक अर्सा हो चुका है मगर हम आज भी उनके ऋणी हैं.

समझ बूझ बन चरना, हिरना

सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री आनंद शर्मा को जब करना होता है तो तेजी से काम करते हैं. अब देखिए कि सात फरवरी को उनने कहा कि मीडिया उद्योग के लिए हम जल्द ही राहत पैकेज ला रहे हैं. और चार दिन बाद ही ग्यारह फरवरी को सरकार ने अखबारी कागज और पत्रिकाओं के छपने के चिकने कागज से सीमा शुल्क खत्म कर दिया.

कई जगह तो देखा गया कि मीडिया पत्रकारिता छोड़ कर मनोरंजन के उद्योग में लग गया. कई अखबारों और चैनलों में खबरों और विज्ञापनों का भेद जान-बूझकर मिटा दिया गया

पता नहीं यह राहत पैकेज का ही एक काम था या जल्दी में राहत देने का कोई फौरी कदम. लेकिन इससे मीडिया उद्योग को कुछ राहत तो मिलेगी. सरकार और क्या-क्या करने जा रही है यह उसने बताया नहीं है. लेकिन देश भर के उद्योगों को वित्तीय संकट से बचाने के जितने उपाय वह कर रही है उससे कुछ ज्यादा ही मीडिया उद्योग के लिए करने को तत्पर होगी. मीडिया उद्योग को सबसे बड़ी चिंता तो मंदी के कारण विज्ञापनदाताओं के घटते विज्ञापन बजट की ही होगी. विज्ञापन से आने वाला राजस्व घट जाए तो बाकी सब चीजों पर होने वाला खर्च अखरने लगता है. कई मीडिया संस्थानों ने आने वाले समय के अंदेशे में काम करने वालों की छंटनी शुरू कर दी है. कई अखबारों ने अपने पेज घटा दिए हैं. लागत में कटौती के दूसरे और उपाय भी किए जा रहे हैं.

कुल अर्थव्यवस्था और उद्योग व्यापार मंदी में हो और दुनिया में चारों तरफ वित्तीय संकट हो तो मीडिया उद्योग बचा नहीं रह सकता. उसका उद्योग तो प्रभावित होगा ही. पिछले पंद्रह वर्षो में मीडिया का उद्योग देश के दूसरे उद्योग-व्यापार की तरह ही तेजी से बढ़ा था. विज्ञापन आखिर बम बम करती अर्थव्यवस्था में से ही निकल कर आते हैं. इसलिए मीडिया उद्योग खूब पनपा. उसमें काम करने वालों की तनखाएं खूब बढ़ीं. मीडिया घरानों के मुनाफे बढ़े. जो अखबार घाटे में या पतली हालत में चला करते थे वे मुनाफे में न भी आएं हों तो बिना नफे-नुकसान के चलने लगे. मीडिया के इस औद्योगीकरण और व्यापारीकरण से कुल मिलाकर उसमें पूंजी लगाने वालों और उसमें काम करने वालों की माली हालत सुधरी ही. उसमें निवेश बढ़ा क्योंकि कमाई भी होने लगी. इस कारण उसमें ऐसे लोग भी आए जिनका प्रभाव मीडिया के लिए स्वास्थ्यवर्धक नहीं है.

लेकिन मीडिया के उद्योग और व्यापार के बढ़ने का मतलब मीडिया के सकारात्मक प्रभाव का बढ़ना नहीं है. कई जगह तो देखा गया कि मीडिया पत्रकारिता छोड़ कर मनोरंजन के उद्योग में लग गया. कई अखबारों और चैनलों में खबरों और विज्ञापनों का भेद जान-बूझकर मिटा दिया गया. इससे बाजार की तो सेवा हुई पर पाठकों और दर्शकों के भरोसे में कमी हुई. विश्वसनीयता और लाभदायिता के चुनाव में मीडिया का बहुत बड़ा हिस्सा विश्वसनीयता के बजाए लाभदायिता में लग गया. पत्रकारिता में अब तक जो लोक हित और लोक सेवा का तत्व था वह कम हुआ और लाभ के लिए कुछ भी छापने और दिखाने का चलन बढ़ गया. संपादक की भूमिका और पूछ घट गई और प्रबंधक मालिक हो गया.

मीडिया के उद्योग और व्यापार के बढ़ने का यह अनिवार्य परिणाम था. कुछ लोक सेवकों ओर लोक सेवी पत्रकारों और समाज के एक छोटे जागरुक तबके के अलावा इस स्थिति से किसी को कोई खास शिकायत नहीं थी. मीडिया की सत्ता प्रतिष्ठान प्रशासन और उद्योग-व्यापार पर निगरानी और चौकरदारी की भूमिका लगातार घटती गई. कई क्षेत्रों में तो मीडिया उद्योग व्यापार का सहायक और भागीदार हो गया. कई जगह वह पब्लिसिटी एजंट होने के नाते मुनाफे में अपने हिस्से की मांग करने लगा. उसकी मांग कुछ इलाकों में उचित भी मानी गई क्योंकि अगर आप

पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं तो आपके तटस्थ और निस्वार्थ पर्यवेक्षक बने रहने में तुक क्या है. आप भी आखिर मुनाफे के लिए मीडिया में हैं जैसे कि दूसरे उद्योग और व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं.

लेकिन मीडिया के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसका उद्योग और व्यापार तो है लेकिन वह शुद्ध उद्योग और व्यापार नहीं है. कार बनाने या टूथ पेस्ट का उत्पादन करने वाले समाज के लिए उपयोगी काम करते हैं लेकिन अपने काम के जरिए वे लोगों को जानकारी देने और देश का लोकमत बनाने के कर्तव्य का निर्वाह नहीं करते. अखबार और चैनल भले ही खबरों और मतों को बेच कर चलते हों वे निर्मूल्य और महज विक्रेता होकर नहीं रह सकते. उन्हें जिम्मेदारी लेनी पड़ती है और पाठक और दर्शक उन्हें जिम्मेदार और बना कर चलता है. अपने उत्पाद की जिम्मेदारी तो उत्पादक और विक्रेता को भी लेनी पड़ती है. लेकिन मीडिया की जिम्मेदारी अपने उत्पाद से परे जाती है क्योंकि वह प्रभाव के काम में है. इसलिए उसे किसी भी उत्पादक की तुलना में नीर क्षीर विवेक का इस्तेमाल करना ही पड़ता है और यह तटस्थता, निस्वार्थता और न्यायशीलता के बिना संभव ही नहीं है.

इसलिए अपनी तटस्थता और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मीडिया को विचार करना पड़ता है कि वह किससे क्या ले और किन शर्तो पर ले. उसका लेन देन शुद्ध व्यापारिक नहीं हो सकता. जगव्यापी वित्तीय संकट और मंदी का असर मीडिया पर होगा ही और वह मुश्किल में पड़ेगा ही. लेकिन क्या इससे मुक्ति या राहत वह अपनी तटस्थता और स्वतंत्रता की कीमत पर ले सकता है? भारत में मीडिया का अनुभव है कि राज्य अपनी शक्ति से उसे अपनी तरफ रखने की कोशिश लगातार करता रहता है. और मीडिया जरूरी कीमत चुका कर अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में सफल होता आया है. मीडिया का आग्रह रहा है कि राज्य को उसके काम में दखल नहीं देना चाहिए. लेकिन अपने संकट में वह राज्य को पुकारेगा तो मदद करने वाला राज्य क्या लक्ष्मण रेखा का सम्मान करेगा? राज्य तो प्रेस की स्वतंत्रता की सीता का अपहरण करने के लिए हमेशा ही रावण की तरह कोशिश में लगा रहता है? क्या सीता खुद ही अपने संकट से निपटने के लिए लक्ष्मण रेखा लांघ कर आएगी?

फिर नवउदार पूंजीवादी विचार को मानने वाला अपना मीडिया क्या किसानों को राज्य की तरफ से दिए गए राहत पैकेज का विरोध और उसकी आलोचना नहीं करता रहा है? सरकार ने जब देश के देहात में फैली आम बेरोजगारी से लोगों को राहत दिलाने के लिए राष्ट्रीय रोजगार योजना बनाई थी तो हमारे अखबारों ने नहीं लिखा था कि रोजगार देना सरकार का काम नहीं है. और इससे न रोजगार मिलेगा न कोई निर्माण होगा. करदाता का पैसा लोक लुभावन काम के भ्रष्टाचार में जाएगा. क्या मीडिया दलील नहीं देता रहा है कि राज्य के संसाधन ऐसी अनुत्पादक योजनाओं में बरबाद नहीं किए जाने चाहिए?

क्या यह सिद्धांत भारत जसे गरीब देश को बताया नहीं जा रहा था कि राज्य का पैसा पूंजी के ऐसे कामों में लगना चाहिए जिससे और पूंजी पैदा की जा सके. राज्य के संसाधन उद्योग और व्यापार की सेवा में हो और गरीब-गुरबों के हित बाजार पर छोड़ देने चाहिए?

फिर देश में टीवी के दर्शकों की गणना और उनकी पसंदगी पर संसद की स्थायी समिति की रपट पर भी ध्यान देने की जरूरत है. रपट में समिति ने बार-बार कहा है कि सूचना प्रसारण मंत्रालय को अच्छी तरह से मालूम है कि टीआरपी में कितनी धोखाधड़ी, झूठ और फरेब का धंधा होता है. टीवी वाले बारह करोड़ घरों में से सिर्फ शहरों के मात्र तेरह हजार घरों में नापने-गिनने के उपकरण लगे हैं और उनसे निकली जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की जाती. इसी फरेबी टीआरपी से कार्यक्रमों की विषयवस्तु, समय और प्राथमिकता तय होती है. इसी से विज्ञापन मिलते हैं. यह दर्शकों और लोक हित की सरासर आपराधिक अनदेखी है. सूचना प्रसारण मंत्रालय के पास अधिकार हे लेकिन दर्शक और देश हित में उसने कभी हस्तक्षेप कर के इसे ठीक नहीं किया. इस बात को मानने के बावजूद कि टीआरपी उद्योग को विनियमित करने के लिए कुछ सरकारी पर्यवेक्षण अनिवार्य है – मंत्रालय की अकर्मण्यता ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है – समिति का निष्कर्ष है.

जो सूचना प्रसारण मंत्रालय इतने वर्षो से टीवी को बिगड़ने दे रहा है वह मुंबई पर आतंकवादी हमले के कवरेज के बाद केबल टेलीविजन नेटवर्क्र्स रूल्स में नौ दमनकारी संशोधन ले कर क्यों आ गया? और संशोधन अगर लोक हित में जरूरी थे तो चैनलों के हल्ला मचाते ही पीछे क्यों हट गया? क्योंकि टीवी वालों को अपने लालच में ही गलतियां करने देना चाहता है ताकि उनकी गर्दन उसके हाथ में रहे. क्या मीडिया उद्योग को राहत देने की तत्परता इससे कोई भिन्न प्रयोजन के लिए हो सकती है? मीडिया को सोच लेना चाहिए.  

विधान सबके, अर्थ अपने-अपने

चुनाव आयोग से साबका रखने वाले संविधान के अनुच्छेद 324 के कुछ मुख्य बिंदु कहते हैं:

> चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा संसद की इच्छा के अनुरूप नियुक्त किए गए चुनाव आयुक्त होंगे.

> जब चुनाव आयोग बहुसदस्यीय होगा तो मुख्य चुनाव आयुक्त उसके अध्यक्ष की तरह कार्य करेगा.

> मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के लिए जरूरी वजहों की बिना पर उसी तरीके से हटाया जा सकता है और उसके काम की परिस्थितियों में नियुक्ति के बाद कोई भी नकारात्मक बदलाव नहीं लाया जा सकता.

> संविधान ये भी कहता है कि किसी भी चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना हटाया नहीं जा सकता.

मुख्य चुनाव आयोग द्वारा स्वयं भी ऐसी सिफारिश करना तार्किक जान पड़ता है. मगर ऐसी निर्बाध शक्तियां किसी के भी पास हों तो उसके निरंकुश होने का खतरा भी सदैव मंडराता रहेगा

इस संवैधानिक व्यवस्था से कुछ बातें नये-नकोर शीशे की तरह साफ हैं. पहली ये कि भले ही आज चुनाव आयोग बहुसदस्यीय हो और उसका कोई भी फैसला सभी की सहमति या बहुमत का होता हो पर संविधान मुख्य चुनाव आयुक्त को दूसरे आयुक्तों से अलग एक विशेष दर्जा देता है.

ध्यान देने वाली दूसरी बात ये है कि सरकार किसी चुनाव आयुक्त को अपने दम पर बिना मुख्य चुनाव आयुक्त की संस्तुति के हटाने की योग्यता तो नहीं रखती पर वो संसद के माध्यम से सभी चुनाव आयुक्तों का पद ही समाप्त करके उन्हें एक साथ हटाने की क्षमता जरूर रखती है.

संविधान इस मामले में कुछ नहीं कहता कि मुख्य चुनाव आयुक्त किसी सहयोगी चुनाव आयुक्त को हटाने की सिफारिश अपने-आप ही कर सकता है या सरकार द्वारा राय मांगे जाने पर ही उसे ऐसा करना होगा. चुप्पी इस बात पर भी है कि क्या सरकार मुख्य आयुक्त की अनुशंसा मानने के लिए बाध्य है. पर जिस तरह की गोपनीयता के साथ आयोग को देश में चुनाव जसे महत्वपूर्ण काम को अंजाम देना होता है उस पर सोचें तो सहज बुद्धि कहती है कि कोई भी चुनाव आयुक्त अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक कर रहा है या नहीं इसका सही ज्ञान सरकार की बजाय मुख्य चुनाव आयुक्त को ज्यादा होगा. यानी कि मुख्य चुनाव आयोग द्वारा स्वयं भी ऐसी सिफारिश करना तार्किक जान पड़ता है. मगर ऐसी निर्बाध शक्तियां किसी के भी पास हों तो उसके निरंकुश होने का खतरा भी सदैव मंडराता रहेगा. तो इससे बचने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के सभी बिंदुओं पर ठीक से विचार कर सरकार द्वारा किसी नतीजे पर पंहुचा जाना भी बेहद जरूरी है

यानी कि एन. गोपालस्वामी अगर नवीन चावला को हटाने की सिफारिश करते हैं तो ये उनका अधिकार होना चाहिए और उन पर सरकार के कानून मंत्रालय जैसे किसी विभाग के मुखिया को हद दर्जे तक जाकर कीचड़ उलीचने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. मगर सरकार को भी ये अधिकार होना चाहिए कि अगर सिफारिश तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है तो वो उसे बिना कोई बड़ा झमेला खड़ा किए नकार सके.

परंतु राजनीतिक नफे-नुकसान की सर्वोच्चता वाले इस दौर में सहज बुद्धि और विवेक की बातें नक्कारखाने की तूती से भी असहाय हैं.

संजय दुबे 

रूहानी रचयिता

विलक्षण प्रतिभा के जन्म से पहले ही उसके आने की भविष्यवाणी की जा चुकी थी. तमिल संगीतकार आरके शेखर और उनकी पत्नी कस्तूरी के यहां जब पहली संतान एक बेटी ने जन्म लिया तो बेटे की बाट जोह रहे इस परिवार को ज्योतिषियों ने बताया कि जल्द ही उनके घर एक ऐसा असाधारण पुत्र पैदा होगा जिसका नाम दसों दिशाओं में गूंजेगा और जिसके रचे संगीत को सुनकर सारी दुनिया मंत्रमुग्ध हो जाएगी.

लगभग एक साल बाद छह जनवरी 1966 को शेखर और कस्तूरी के घर एक बालक ने जन्म लिया. मां-बाप ने उसका नाम रखा दिलीप कुमार. यही दिलीप आगे चलकर एआर रहमान कहलाने वाला था. बेटे के तीन साल का होते-होते शेखर और कस्तूरी को उसकी विलक्षणता और ज्योतिषियों की भविष्यवाणी सही होने के संकेत दिखने लगे. ठीक से बोलना शुरू करने से पहले ही ये प्रतिभाशाली बालक हारमोनियम बजाने लगा था और रहस्यमय रूप से उसके जन्म के साथ ही उसके पिता के दिन भी फिरने लगे थे.

धीरे-धीरे बालक दिलीप मशहूर होने लगा. रहमान की बहन कंचना याद करती हैं कि चार साल के दिलीप को जब उसके पिता दक्षिण के मशहूर संगीतकार सुदर्शन के पास लेकर गए तो उन्होंने लगभग चुनौती भरे अंदाज में कहा था, ‘सुना है कि तुम्हारा बेटा कुछ भी बजा सकता है. चलो देखते हैं कि इसमें कितना दम है.ये कहने के बाद सुदर्शन ने हारमोनियम पर एक बेहद मुश्किल धुन बजाई. इसके बाद उन्होंने हारमोनियम पर एक धोती डाल दिलीप के काम को और मुश्किल बनाया और दिलीप से धुन दोहराने के लिए कहा. मगर जब छोटे से बो ने इस धुन को आराम से हूबहू बजा दिया तो सुदर्शन को अहसास हो गया कि ये कोई साधारण बालक नहीं है. वे उठे और नन्हें दिलीप को गले से लगा लिया.

विलक्षणता की ये यात्रा अब तक निर्बाध जारी है. 11 जनवरी 2009 को जब रहमान चर्चित हॉलीवुड फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर  में अपने संगीत के लिए गोल्डन ग्लोब पुरस्कार जीतने वाले पहले भारतीय बने तो करोड़ों देशवासियों के लिए ये गर्व और खुशी का दिन था. वैसे तो टाइम  मैगजीन द्वारा मोजार्ट ऑफ मद्रास कहे गए इस संगीतकार को अभी तक पदमश्री, चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, 12 स्क्रीन और 21 फिल्मफेयर अवार्डस सहित न जाने कितने सम्मान मिल चुके हैं मगर इस सम्मान ने उनके नाम को एक अलग ही ऊंचाई तक पहुंचा दिया है. अभी इस पड़ाव पर रहमान ने जरा ठहरकर सांस भी नहीं ली थी कि 22 जनवरी 2009 को उन्हें दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कारों की एक नहीं तीन श्रेणियों में नामित किए जाने की घोषणा ने देश को उत्साह से भर दिया है.

लॉस एंजेल्स की चमक-चमक से दूर चेन्नई में हम रहमान के संगीत की कुछ और गहरी परतों से रूबरू होते हैं. अवार्ड मिले तीन दिन हो चुके हैं मगर रहमान अभी वापस नहीं लौटे हैं. आमतौर पर भीड़भाड़ वाला ये शहर आज शांत नजर आ रहा है. दुकानें बंद हैं और सड़कें खाली. दरअसल आज पोंगल का त्यौहार है और सब लोग छुट्टी का आनंद ले रहे हैं. रहमान का एएम स्टूडियोज, जो एशिया का सबसे अत्याधुनिक साउंड स्टूडियो है और जहां आमतौर पर दर्जनों संगीतकार, निर्देशक और साउंड इंजीनियर्स नजर आते हैं, में भी आज निस्तब्धता छाई हुई है.

लकड़ी के फर्श वाली इस सफेद चार मंजिला इमारत के भीतर जाने पर आपको किसी प्रार्थनाघर सा अहसास होता है. स्टूडियो के बीचोंबीच एक विशाल कमरा है जिसमें 30 वाद्ययंत्रों वाला एक ऑरकेस्ट्रा आराम से समा सकता है. इसके सामने शीशे की दीवार के पार कंट्रोल रूम है जहां लगभग चार करोड़ रुपये की कीमत का एक विशाल मिक्सिंग कंसोल (तरह-तरह की आवाजों को साधने वाली एक मशीन) है जिसमें इतनी घुंडियां लगी हैं कि जैसे इससे समूचे ब्रह्मांड के सुर ठीक किए जा सकते हैं. इमारत में और  भी कई साउंडप्रूफ कमरे हैं जिनमें चमचमाते पियानो, सिंथेसाइजर, वायलिन, हारमोनियम और ड्रम्स रखे  हैं. छत पर एक विशाल हॉल है जहां दुनिया का लगभग हर वाद्ययंत्र मौजूद होगा. ऐसा लगता है मानो ये अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं कि कब संगीत का ये जादूगर ऐसी धुन रचेगा जिसमें वे भी अपना योगदान दे सकेंगे.

स्टूडियो में पसरी शांति हमें रहमान के उस अद्भुत संगीत को कुछ अलग तरह से, कुछ और पास से समझने का मौका देती है जो समय के साथ पुराना होने की बजाय कुछ और ताजा होता जाता है. बाज लुरमन, डैनी बोएल और शेखर कपूर जैसे सिनेमा के उस्ताद कहते हैं कि उन्होंने ऐसा संगीत पहले कभी नहीं सुना. इसका रहस्य रहमान की आध्यामिकता में छिपा है.

जब रहमान (तब दिलीप) केवल नौ साल के थे तो कुछ ऐसे हालात पैदा होने लगे कि ज्योतिषियों की भविष्यवाणी गलत लगने लगी. उनके पिता की अचानक  मृत्यु हो गई. वो भी उस दिन जब बतौर स्वतंत्र संगीतकार उनकी पहली फिल्म रिलीज हो रही थी. परिवार के लिए ये एक बड़ा झटका था. आय का जरिया जाता रहा था और अब परिवार को संभालने और चलाने की जिम्मेदारी मां-बेटे पर आ गई थी. ये बड़ा मुश्किल दौर था. दिलीप को समझ ही नहीं आता था कि क्या किया जाए. मां ने कुछ समय तक वाद्ययंत्रों को किराए पर देकर घर का खर्च चलाया. 11 साल का होते-होते बालक दिलीप नियमित रूप से कई संगीतकारों के ऑरकेस्ट्रा में काम करने लगा था. इस वजह से स्कूल में उसकी हाजिरी और प्रदर्शन में काफी गिरावट आ गई. उसे स्कूल छोड़ने के लिए कह दिया गया. इसके बाद एक साल तक दिलीप एक दूसरे स्थानीय स्कूल में गया और फिर उसने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में दाखिला ले लिया. मगर लगभग वही सब यहां भी हुआ और 15 साल की उम्र में दिलीप ने औपचारिक शिक्षा को अलविदा कह दिया. इसके बाद उसने टेलीविजन कार्यक्रमों में पियानो और गिटार बजाए और कई मलयाली, तमिल और तेलुगु संगीतकारों के ऑरकेस्ट्राओं में काम किया. इनमें से एक इलयराजा भी थे जिनके यहां दिलीप ने करीब एक साल का वक्त बिताया.

देखा जाए तो खेलकूद और पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा दिलचस्पी न रखने वाले दिलीप को ये किसी झंझट से छुटकारा पाने जैसा लगना चाहिए था मगर ऐसा था नहीं. कंचना के मुताबिक उनका भाई किसी आम लड़के की तरह ही जीना चाहता था. उसे देर तक सोना और कैरम खेलकर वक्त बिताना अच्छा लगता था. कंचना ये भी बताती हैं कि पियानो की प्रैक्टिस के लिए सुबह सात बजे जगाए जाने पर दिलीप बहुत झुंझलाता था. मगर मां कस्तूरी को ज्योतिषियों की भविष्यवाणी पर विश्वास था और वो मंदिरों, मस्जिदों और चर्चो के दरवाजे पर दस्तक देती रहती थीं.

जब दिलीप 11 साल का हुआ तो एक रेलवे स्टेशन पर इस परिवार को सूफी पीर करीमुल्ला शाह कादरी मिले. करीमुल्ला ने दिलीप के पूरे जीवन को लेकर भविष्यवाणी की और कहा कि ये बालक 10 साल बाद फिर से उन्हें मिलने आएगा. कुछ समय पहले समाचार चैनल सीएनएन को दिए गए इंटरव्यू में रहमान भी ये बात मानते हुए कहते हैं, ‘वह एक निर्णायक मोड़ था. हर चीज वसे ही हुई जसी उन्होंने भविष्यवाणी की थी.

अपने संगीत शिक्षक जॉन जैकब की जिद पर संगीत की पढ़ाई करने के लिए दिलीप ने ऑक्सफोर्ड के ट्रिनिटी कॉलेज में स्कॉलरशिप के लिए आवेदन किया. ये उनकी जिंदगी का बेहद अहम दौर था जिसमें उन्होंने पाश्चात्य संगीत की बारीकियों को समझ. 1987 में जब वह मात्र 21 साल का ही था, दिलीप, मां कस्तूरी और दो छोटी बहनों ने इस्लाम अपना लिया – कंचना ने ऐसा कुछ समय बाद किया था. ऐसा करने के पीछे वह सब कुछ था जो उसकी जिंदगी में अब तक हुआ था और जिसका उसके मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था. दो साल बाद दिलीप ने अपने घर के पिछवाड़े पंचतन रिकार्ड्स स्थापना की. इसका शिलान्यास करीमुल्ला शाह ने किया. अब तक दिलीप ने एड जिंगल्स बनाना शुरू कर दिया था. 1991 में मणिरत्नम ने इस नौजवान को अपनी फिल्म रोजा के संगीत का जिम्मा सौंपा. मणिरत्नम को दिलीप की प्रतिभा पर विश्वास तो था पर ये उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि ये प्रतिभा उनकी फिल्म के जरिए संगीत के तब तक के सारे कायदे-कानूनों को तोड़ने जा रही है.

इसी दौरान दिलीप को सात नए नामों की पेशकश की गई जिसमें से उन्होंने चुना, अल्लाह रक्खा रहमान, अल्लाह के 1000 नामों में से पहला. रोजा रिलीज हुई और जैसा कि पीर ने भविष्यवाणी की थी – इसई पुयल  –  एआर रहमान नाम के तूफान ने जन्म लिया. रहमान का आना किसी ज्वालामुखी के विस्फोट जैसा था जो यकायक हर चीज को बौना बना देता है.

इतिहास हमें ऐसी प्रतिभाओं के बारे में बताता है जिन्होंने अलग-अलग दौर में जन्म लेकर इतिहास को ही बदलकर रख दिया. रहमान भी उन्हीं में से एक हैं. रोजा जैसा संगीत किसी ने भी पहले कभी नहीं सुना था. हर तरफ उनके नाम की चर्चा होने लगी और उसी साल उन्होंने इस फिल्म के संगीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीत लिया. ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी संगीतकार को अपनी पहली ही फिल्म के लिए ये पुरस्कार दिया गया हो. 2005 में टाइम मैगजीन ने जब 10 सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ फिल्म संगीत की सूची बनाई तो उनमें रोजा का नाम भी शामिल था.

रहमान के मित्र और गीतकार प्रसून जोशी कहते हैं, ‘रहमान एक बुनकर की तरह हैं. रोजा  में उन्होंने ऐसी महीन और जटिल ध्वनियां रचीं जिन्हें रचने की कोशिश इससे पहले किसी ने नहीं की थी. भारतीय संगीत और फिल्म उद्योग हमेशा से असाधारण धुनों, गायकों, मुखड़ों और अंतरों पर निर्भर रहा है. मगर रहमान ने इस पारंपरिक ढांचे के साथ कई प्रयोग किए. उन्होंने धुन को आवाजों के कई रेशों के साथ गूंथ दिया. उन्होंने इस ढांचे में ऐसी जगहें पैदा की जहां आप एक-एक झंकार और एक-एक ताल को सुनकर उसका आनंद ले सकते हैं. उनका संगीत किसी नदी की तरह है जिसमें कई धाराएं हैं और आप कहीं पर भी डुबकी लगा सकते हैं. इससे पहले कभी भी ऐसी कोई चीज नहीं हुई थी.

रोजा  से लेकर आज तक करीब दो दशक बीत चुके हैं और संगीत की ये अनूठी धारा पहले जैसी ही निर्बाध बही जा रही है. निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा को रहमान 2000 साल पहले के उन चीनी यात्रियों की तरह लगते हैं जो दुनिया भर में घूमते थे और हर संस्कृति के प्रवाह और प्रभाव को महसूस करते थे. पाश्चात्य, भारतीय, लोक, हिपहॉप, रैप, रॉक, पॉप, जज, ऑपरा, सूफी, अफ्रीकी, अरबी ..ऐसा कोई संगीत नहीं है जिसे रहमान ने अपनी रचनाओं में न गूंथा हो.

किस्से कई हैं. हज के दौरान रहमान को एक आदमी दिखा जो मैय्या मैय्या (अरबी में पानी) चिल्लाता हुआ पानी बेच रहा था. उन्हें आवाज में कुछ लगा और मणिरत्नम की फिल्म गुरू में उन्होंने इसी शीर्षक से एक गाना कनाडाई गायक मरियम टोलर से गवाया जो काफी लोकप्रिय हुआ. इसी तरह चैनल वी टैलेंट हंट में जिस नरेश अय्यर नाम के गायक को अदनान सामी जैसे जजों ने दरकिनार कर दिया था उससे रहमान ने रंग दे बसंती का लोकप्रिय गीत रूबरू गवाया. मेहरा की अगली फिल्म दिल्ली 6 में उन्होंने एश किंग नाम के एक गायक को लंदन की गलियों से ढूंढ निकाला और हिंदी का एक शब्द न आने के बावजूद उससे दिल गिरा दफ्फतन गवाया तो सिर्फ इसलिए कि उसकी आवाज ही उन्हें इस गाने के लिए सबसे ज्यादा माकूल लगती थी. रहमान ने

सुखविंदर, मधुश्री विजय येसुदास जैसी अनगिनत आवाजों को मौका दिया है. मगर ऐसा उन्होंने किया केवल तब जब उनके पास ऐसा करने की वजहें थीं. यहां तक कि अपनी बहन कंचना (अब रेहाना) तक को गाने का मौका उन्होंने अपनी पहली फिल्म रोजा के 17 साल बाद शिवाजी  में दिया. क्योंकि उससे पहले उन्हें ये लगा ही नहीं कि उनके किसी गाने के लिए रेहाना की आवाज उपयुक्त थी.

किस्से कई हैं. मगर जो बात कम ही लोग जानते हैं वह है अपनी अद्भुत प्रतिभा के बारे में रहमान की सोच. टाइम  मैगजीन ने जिस मोजार्ट से उनकी तुलना की थी उस अत्यधिक प्रतिभाशाली मोजार्ट का अहम बहुत बड़ा था. लेकिन रहमान को जानने वाले बताते हैं कि अहम शायद उनके पास से होकर भी नहीं गुजरा है. कुछ मायने में वे पिछली सदी में हुए प्रतिभाशाली गणितज्ञ रामानुजम जैसे हैं जो कहते थे कि गणित की मुश्किल से मुश्किल पहेलियों के समाधान उन्हें देवी नामगिरी सुझती हैं और वह सिर्फ साधन मात्र हैं. रहमान भी मानते हैं कि वह सिर्फ एक जरिया हैं. जैसा कि निर्देशक शेखर कपूर कहते हैं, ‘रहमान नहीं मानते कि संगीत उनमें बसता है बल्कि उनका विश्वास है कि वे इसे चेतना के एक ऐसे क्षेत्र से ग्रहण करते हैं जो सनातन है. रहमान ये भी मानते हैं कि उस क्षेत्र तक पहुंचने के लिए आपको बहुत पवित्र होने की जरूरत होती है. मेरे हिसाब से जब तक वह स्वयं को माध्यममात्र मानते रहेंगे तब तक उनकी सीमाएं अनंत होंगी.

पवित्रता की इसी जरूरत के चलते रहमान के लिए उनका जीवन किसी दोहरी यात्रा जैसा रहा है. एक तरफ इसका बाहरी पहलू था जिसमें उन्हें अपने हुनर को लगातार तराशना और नई तकनीक के इस्तेमाल में पारंगत होना था. दूसरी यात्रा स्वयं के भीतर की थी जिसमें उन्हें खुद को ईश्वर की इच्छा के आगे समर्पित और स्वयं की तुच्छता का अनुभव करना था.

इस यात्रा के केंद्र में दो व्यक्तित्व हैं. इनमें पहले हैं आरिफुल्ला मोहम्मद अल हुसैनी चिश्ती उल कादिरी, जिन्होंने अपने पिता करीमुल्ला शाह के देहावसान के बाद रहमान के आध्यात्मिक गुरू की जगह ली है. कादिरी को हजरत मोहम्मद का वंशज कहा जाता है और आंध्र प्रदेश के कड़प्पा शरीफ स्थित उनकी दरगाह तक जाना रहमान के लिए कभी तीर्थयात्रा जैसा रहा है और कभी शरण पाने के लिए की गई यात्रा जैसा. रहमान उन्हें मालिक बाबा कहते हैं. 2005 में स्थापित उनके एएम स्टूडियोज का नाम भी शायद उनके नाम के ही शुरुआती अक्षरों पर रखा गया है. हालांकि रहमान के कई करीबी सहयोगी भी इसकी पुष्टि नहीं कर सकते.

मगर हम देखते हैं कि मालिक बाबा की एक छोटी-सी तस्वीर स्टूडियो के प्रवेशद्वार की शोभा बढ़ा रही है. खिड़कियों और दीवारों पर कई जगह चंदन के गुटकों पर छपे हाथ के निशान बताते हैं कि रहमान एक धार्मिक व्यक्ति हैं. उनकी बहन रेहाना कहती हैं, ‘भाई अपनी ही दुनिया में रहने वाले आदमी हैं. अगर मैं उनसे एक घर मांगूं तो वे मुङो खरीद कर दे देंगे. अगर मैं एक स्टूडियो की फरमाइश करूं तो वो भी पूरी हो जाएगी. वे बस यही कहेंगे कि ले लो, पर मेरे वाले में मत घुसना.

मेहरा कहते हैं, ‘मेरी जिंदगी में अब तक जो लोग आए हैं उनमें मुझे रहमान सबसे ज्यादा आध्यात्मिक लगते हैं. उनमें अहम नहीं है, बिल्कुल भी नहीं, उनमें मैं या मेरा जसी कोई बात नहीं है.पिछले 16 साल से रहमान के दोस्त और उनकी दुनियाभर में होने वालीं कंसर्ट्स में से अधिकांश की जिम्मेदारी संभालने वाले दीपक गट्टानी इससे सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘ये सच है. उन्होंने मुझे सिखाया कि हमारी आंखें जो देखती हैं जिंदगी उससे ज्यादा कुछ है. वे कभी भी किसी बात पर तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देते.रहमान के साथ कई टुअर करने वाले गायक कैलाश खेर कहते हैं, ‘उन्हें ईश्वर ने भेजा है. कुदरत ने उनको बनाया है.

वाकई रहमान एक अनोखे व्यक्तित्व हैं. एक दिन वे फॉक्स स्टूडियो के मालिकों के साथ लॉस एंजल्स में नजर आते हैं तो अगले ही दिन ऐसा भी हो सकता है कि वे फकीरों और दरवेशों के साथ किसी दरगाह पर बैठे हों. उनकी बहन बताती हैं, ‘उनकी आध्यात्मिकता को दूसरे नहीं समझ सकते. मैं उनके प्रति बहुत आदर की भावना रखती हूं. उन पर ऊपरवाले का हाथ है. उन्होंने खुद को उसके आगे समर्पित कर दिया है. उनका हर कदम, हर काम, हर विचार उसे समर्पित है.

इस समर्पण के कई रूप हैं. मसलन सादगी से रहना, अक्सर दरगाहों पर जाना, गरीबों को उदारता से दान देना और जरूरत पड़े तो नंगे फर्श या रेत पर ही सो जाना. कभी-कभी समर्पण का ये तरीका लोगों को बेहद अतार्किक और अबूझ लगता है. उदाहरण के लिए जन्म के समय उनकी बेटी के दिल में छेद था मगर रहमान ने उसका आ¬परेशन करवाने से इनकार कर दिया. उनका मानना है कि भक्ति नियति को बदल सकती है इसलिए उन्होंने खुद को अपने पीर के हवाले कर दिया. इसे चमत्कार ही कहा जा सकता है कि दो साल की होते-होते बच्ची बिल्कुल ठीक हो गई.

रहमान की बहन मुस्कराते हुए कहती है, ‘ईश्वर हमेशा उसका ख्याल रखता है. इसे शब्दों में समझना बड़ा मुश्किल है. जो चीज लोगों को मांगनी पड़ती है वह रहमान को अपने आप ही मिल जाती है. जसे कि आप विदेश में हों और आपको बहुत भूख लगी हो, आपका कुछ गर्मागर्म खाने का मन हो. हम जैसे लोग ये सोचकर परेशान हो जाते हैं कि ठंड में बाहर जाना होगा, टैक्सी पकड़नी पड़ेगी, कायदे की जगह ढूंढनी पड़ेगी. मगर रहमान बस बैठे रहकर प्रार्थना करते रहेंगे और अचानक कोई उनके पास आकर पूछेगा, आप क्या खाना पसंद करेंगे, उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय?’

गट्टानी भी इस बात से सहमति जताते हुए कुछ समय पहले बंगलुरू में आयोजित एक म्यूजिक कंसर्ट का उदाहरण देते हैं. ये बहुत बड़ा कंसर्ट था और शहर के पैलेस ग्राउंड्स में करीब तीस हजार लोगों की भीड़ जमा थी. कार्यक्रम शुरू ही होने वाला था कि अचानक मूसलाधार बरसात शुरू हो गई. स्टेज क्षतिग्रस्त हो गया और कंपाउंड में पानी भर गया. रहमान ने आधे घंटे के लिए खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. निकलने पर उन्होंने अपने साथियों से कहा कि वे जनता से पूछें कि वो क्या चाहती है. ये शो होना चाहिए या फिर इसे टाल दिया जाए. जवाब आया कि कंसर्ट होना चाहिए. कार्यक्रम शुरू हुआ और जसे ही रहमान ने ऑरकेस्ट्रा की तरफ पहला इशारा किया, बारिश रुक गई. मानो ये उसके लिए भी एक इशारा हो. फिर तो एक के बाद एक गाने बजते रहे. और जब रहमान आखिरी गाना वंदे मातरम खत्म कर रहे थे तो बारिश शुरू हो गई. गट्टानी कहते हैं, ‘मैं यह देखकर चकित रह गया.

इसी तरह कई मौकों पर फैसला लेते वक्त रहमान ये कहते हुए एकांत में चले जाते हैं कि वे इजाजतलेंगे. कुछ दिनों बाद वे हां या ना कहते हैं जो किसी दैवीय संपर्क पर निर्भर करता है. केएम कंजर्वेटरी इसका उदाहरण है. संगीत की ये पाठशाला उनका सपना थी जो वो कई सालों से देखते आ रहे थे. लंबे समय तक इस प्रोजेक्ट में सरकारी भागीदारी की चर्चा होती रही. आखिरकार रहमान ने कहा कि वे इस साङोदारी के लिए इजाजतमांगेंगे. ये नहीं मिली और रहमान ने अपने बूते ही काम शुरू करने का फैसला किया. संगीत के प्रति जुनून और अथाह पैसे से बनी ये पाठशाला पिछले साल उनके जन्मदिन के मौके पर शुरू हुई.

मालिक बाबा उनके समर्पण का सबसे सजीव रूप हैं. रहमान मार्गदर्शन के लिए अक्सर उनकी तरफ मुड़ते हैं. आलोचकों को ये आस्था किसी बंधन जैसी लग सकती है मगर लगता है कि रहमान के लिए इसने अपना काम बखूबी किया है. सुपरस्टार आमिर खान कहते हैं, ‘हर कोई ये नहीं समझ सकता और हर किसी के लिए ये इस तरह से काम भी नहीं कर सकती. मगर रहमान एक बेहद आध्यात्मिक व्यक्तित्व हैं और ये दिलचस्प है कि आस्था के प्रति उनका संपूर्ण समर्पण उन्हें पूरी तरह से बंधनमुक्त कर देता है. उनकी आस्था उन्हें काम करने की आजादी देती है.

रहमान के सफर में दूसरा सबसे अहम किरदार रही हैं उनकी मां कस्तूरी या करीमा बेगम. खेर कहते हैं, ‘उनका रिश्ता किसी भगवान और भक्त सरीखा है. वे उनकी इच्छा का पालन बिना कोई सवाल किए पूरी आस्था से करते हैं. अगर उन्होंने रहमान से कहा होता कि गोल्डन ग्लोब पुरस्कार के लिए लॉस एंजेल्स जाने की बजाय किसी फकीर की दरगाह पर जाओ तो मुझे यकीन है कि वे ऐसा ही करते.

हम करीमा बेगम से उनके बेटे के बारे में पूछते हैं और वो कहती हैं, ‘वो दिन में पांच बार नमाज पढ़ता है. वह अल्लाह का तोहफा है.करीमा की बेटियां मजाक में उन्हें पुराने जमाने की महिला कहती हैं. उनकी बातों से कभी-कभी उस उपेक्षा की मीठी सी शिकायत भी मिलती है जो प्रतिभाशाली पुत्र के होने पर परंपरागत परिवारों में लड़कियों को झेलनी होती है. वे मजाक  में कहती भी हैं, ‘हम तो बस होने के लिए वहां थे.’ 

अवार्ड के बाद ये चौथा दिन है. वक्त आधी रात का है. संगीत का जादूगर घर पहुंचता है. बाहर इंतजार करते हुए पत्रकारों का भारी जमावड़ा है. हवा में अगरबत्तियों की भीनी खुशबू घुली हुई है. उनके स्वागत कक्ष की खिड़कियों पर सफेद परदे लगे हैं और दीवारों पर कालीन. इस तरह की सजावट रहमान के घर, स्टूडियो, कंजर्वेटरी, सब जगह देखने को मिलती है.

पंचतन रिकॉर्ड इनरहमान का निजी स्टूडियो है. ये एक तरह से उनका साधना कक्ष भी है. लाल और सफेद रंग के परदों से सजे इस हॉल में वाद्ययंत्र और हाइटेक उपकरण कुछ वैसे ही बिखरे दिखते हैं जैसे किसी पढ़ाकू बच्चे के कमरे में किताबें.

जब तक हमारी मुलाकात होती है तब तक वक्त काफी हो चुका है. एक पत्रकार होने के नाते मुझे एक निश्चित समय सीमा के भीतर स्टोरी खत्म करके देनी है. मैं जल्दी में हूं क्योंकि समय कम है और मेरा दुर्भाग्य देखिए रहमान लंबी बातचीत के लिए तैयार हैं. रहमान से थोड़ी-सी बातचीत में ही मुझे अहसास हो जाता है कि उनके बारे में जो कुछ भी सुना या पढ़ा था उसके सहारे उनसे बात करने की तैयारी करना बेकार गया है. वे किसी किशोर जैसे हैं – ऊर्जा से भरपूर, चुलबुले और खुले स्वभाव के. मैंने जो कुछ भी उनके बारे में सुना या पढ़ा था उससे लगता था कि वे कम बोलते होंगे. पर यहां तो रहमान न सिर्फ हर चीज के बारे में बात करने के लिए तैयार थे बल्कि कई बार लग रहा था कि वे मजाकिया मूड में भी हैं.

हम दोबारा उनकी जिंदगी के सफर पर निकलते हैं और पाते हैं कि ये संगीत, प्रार्थना या सीधे-सादे समर्पण से कहीं ज्यादा जटिल है. वे कहते हैं, ‘मैंने रातों-रात इस्लाम नहीं अपनाया न ही किसी ने मुझे इसके लिए मजबूर किया. ये बहुत लंबी प्रक्रिया थी. मुझे सूफियों को देखकर काफी जिज्ञासा होती थी इसलिए मैंने बहुत गहराई से सूफीवाद का अध्ययन किया. इसके लिए मैंने रोज तीन घंटे खर्च कर अरबी भाषा सीखी. सूफीवाद में न कोई बंधन है, न कोई नियम, न हिंदू-मुसलमान के बीच भेदभाव. सूफी सीधे आपके दिल में झंकते हैं और देख लेते हैं कि आप के दिल में औलिया यानी हजरत के नूर के लिए कितनी मुहब्बत है. इसलिए मेरा झुकाव इसकी तरफ हुआ.

समर्पण का भी संगीत के साथ एक जटिल संबंध है. रहमान कहते हैं, ‘जब आप किसी रचनात्मक क्षेत्र में होते हैं खासतौर से फिल्म या संगीत के तो आप अक्सर अच्छे और बुरे के बीच झूलते रहते हैं. कभी वक्त अच्छा होता है तो कभी खराब. तो ऐसे में संतुलित रहने के लिए आपको सारी चीजों से अलग होकर खुद को पूरी तरह से संगीत के सहारे छोड़ देना होता है. इसके लिए अहं का खत्म होना जरूरी है. मगर फिर दिक्कत ये है कि अगर आपके पास ऐसा अहम नहीं है जो आपकी मर्जी के मुताबिक खत्म और पैदा हो सके तो आप संगीत नहीं रच सकते. आप कुछ असाधारण नहीं कर सकते. आपको अपने द्वारा स्थापित मानकों से आगे जाने की सोच भी रखनी होती है. इसलिए अहम अच्छा भी होता है और बुरा भी. संगीत जैसी चीज आपको पैसा, प्रसिद्धि, औरत जसी चीजों की तरफ भी खींचती है. लंबे समय तक ये चीजें कई तरह से मुझे अपनी तरफ खींचती रहीं छोड़ने और हासिल करने की इस इच्छा में संतुलन साधना नामुमकिन सा काम है. मगर आखिरकार अब मुझे महसूस होता है कि मैं इन दोनों इच्छाओं के साथ संतुलन साधकर चल रहा हूं

पिछले दो दशकों में कई बार ऐसा वक्त आया जब रहमान को लगा कि उनमें जड़ता आ रही है, उनका संगीत एकरस हो रहा है, करने के लिए कुछ नया नहीं बचा और अब उन्हें ये काम छोड़ देना चाहिए. मुस्कराते हुए रहमान बताते हैं कि जब भी वे ऐसा सोचते थे कुछ ऐसा हो जाता था कि उन्हें नए क्षितिज दिख जाते थे. जब उन्हें रोजा का ऑफर मिला तो उस वक्त तक वे जिंगल्स और मलयालम, तेलुगु और तमिल संगीतकारों के साथ रिकार्डिंग्स करते हुए बुरी तरह से ऊब चुके थे. रहमान कहते हैं, ‘मैं मणिरत्नम का बहुत आदर करता था और उनके साथ काम करना मेरा सपना था. मैंने सोचा कि ये मेरा आखिरी साउंडट्रैक होगा इसलिए मैंने जो मन में आया कर दिया. मैं इसका आनंद लेना चाहता था. मेरे मन में कोई सीमाएं नहीं थीं. उन दिनों युवा पाश्चात्य संगीत सुन रहे थे. यहां तक कि मैं भी. इसलिए मैंने सोचा कि आखिर समस्या क्या है? क्या हम पर्याप्त प्रयोग नहीं कर रहे? और मैंने खुद को बंधनमुक्त छोड़ दिया.

रोजा का संगीत सबके दिलोदिमाग पर छा गया. मगर दो-एक साल बाद ही रहमान को फिर से गतिहीनता का अहसास होने लगा. वे कहते हैं, ‘मैंने सोचा, हो गया, मैंने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत लिया है. अब मैं अपने स्टूडियो से होने वाली कमाई से आराम से जिंदगी गुजार सकता हूं.

मगर इसके बाद हिंदी फिल्म जगत में काम करने का आकर्षण और उसकी चुनौतियां उनके सामने आ गईं. पहले रंगीला आई और फिर दूसरी कई हिट फिल्में. और जब यहां पर भी जड़ता का आभास होने लगा तो एलिजाबेथ, बांबे ड्रीम्ज और लॉर्ड ऑफ द रिंग के रूप में उनके क्षितिज का फिर से विस्तार हो गया. जब तक यहां ऊब पैदा होना शुरू हुई तब तक के एम कंजर्वेटरी और गरीबी के खिलाफ रहमान्स फाउंडेशन का विचार पैदा हो चुका था. रहमान मुस्कराते हुए कहते हैं, ‘इन सब घटनाक्रमों के साथ मुझे सब कुछ छोड़-छाड़कर चल देने के विचार के साथ कम संघर्ष करना पड़ता है. मैंने जिंदगी के नए मायने और जीवन के नए कर्तव्य पा लिए हैं. मैं ये बात सिर्फ अपने नए प्रोजेक्ट्स के नहीं बल्कि अपने परिवार और अपने संगीत के संदर्भ में भी कह रहा हूं. अब मैं संगीत सिर्फ प्रेम और मानवता की सेवा के तौर पर देखता हूं. अब मेरे लिए संगीत के मायने हैं जीवन के आनंद को सारे इंसानों के साथ बांटना.

रहमान के परिवार-उनकी पत्नी सायरा बानो, बेटियां कथीजा और रहीमा और बेटा रुमी को  दुर्लभता से ही उनके साथ सार्वजनिक जगहों पर देखा जाता है. रहमान कहते हैं, ‘मैं सोच रहा हूं कि अब उन्हें और भी ज्यादा मौकों पर अपने साथ ले जाऊं. चाहे वो मेरा स्टूडियो हो या विदेशी दौरा या फिर मेरी आध्यात्मिक यात्राएं. मैं नहीं चाहता कि वे मुझसे अलग महसूस करें. मेरे पिता का हम पर इतना ज्यादा असर इसलिए पड़ा क्योंकि हम हमेशा उनके साथ होते थे. उनके बिना हमारी जिंदगी में संगीत जैसी कोई चीज नहीं होती.

जैसा कि रहमान के साथ ही हो सकता है, पश्चिम के संगीत जगत में उनके आगमन के सफलता और पुरस्कारों से कहीं ज्यादा गहरे मायने हैं. रहमान कहते हैं, ‘पहले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के बाद मेरे लिए सबसे अहम उपलब्धि गोल्डन ग्लोब पुरस्कार ही है क्योंकि मैं पूरब और पश्चिम के बीच के फर्क को खत्म करना चाहता था. मैं उस तथ्य को बदलना चाहता था कि किसी भारतीय ने ये अंतर्राष्ट्रीय फिल्म और संगीत पुरस्कार नहीं जीते हैं.

पश्चिमी जगत के अनुभव ने रहमान की चेतना का विस्तार किया है. वे कहते हैं, ‘जब मैं बांबे ड्रीम्ज के सिलसिले में पहली बार लंदन गया था तो मैं अपने ही कमरे में बंद, किसी से मिले-जुले बगैर संगीत बनाता रहता था. मैं पांच बार नमाज पढ़ता था और कोशिश करता था कि रोजे रखूं. मेरे चारों ओर पब थे और नशे में धुत लड़के मेरी खिड़कियों पर पेशाब कर देते थे. हर बार जब मैं घर से बाहर जाता था तो वापस आकर नहाता था. धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ कि प्रेम भरी दृष्टि इन सभी समस्याओं को हल कर सकती है. आपको एक बड़े परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत होती है, एक ऐसी नजर जो पूरब और पश्चिम, मुसलमान और गैरमुसलमान जसी चीजों के पार देख सके.

रहमान का संगीत इन्हीं खाइयों को जोड़ने वाला पुल है. कड़ी व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और होड़ के इस दौर में जहां शिखर तक पहुंचने और फिर अचानक गुमनामी में खो जाने में ज्यादा वक्त नहीं लगता, चीजों की असली योग्यता पहचानना मुश्किल काम हो गया है. सवाल उठता है कि क्या रहमान हमारे वक्त के मोजार्ट हैं? हम कह नहीं सकते. मगर ये निश्चित है कि उनका संगीत, ज्ञात और उस विराट अज्ञात के बीच के अंतर को पाटता है जिससे धरती की सुंदरता जन्म लेती है.

रहमान के घर से एक ब्लॉक दूर समाज और जीवन के प्रति कर्तव्य का उनका ये अहसास एक नई पीढ़ी की जिंदगी में रोशनी ला रहा है. पोंगल वाले दिन हमें एएम स्टूडियो के फस्र्टफ्लोर पर कुछ लड़के-लड़कियां मिलते हैं. ये लोग रहमान के ड्रीम प्रोजेक्ट यानी संगीत विद्यालय केएम कंजर्वेटरी के छात्र हैं. इनमें भी रहमान के संगीत जितनी ही विविधताएं है. मिसाल के तौर पर 16 साल का अनुराग पढ़ाई छोड़कर दिल्ली से चेन्नई आ गया है और यहां अपनी मां के साथ किराए  के एक कमरे में रह रहा है. हैदराबाद की अंग्रेजी से पोस्टग्रेजुएट और 23 वर्षीय आश्रिता अरोक्यम संगीत की स्कॉलरशिप के लिए विदेश जाने की जद्दोजहद में थीं तभी उन्हें देश में ही ये अवसर मिल गया. 32 साल के सौरव सेन कोलकाता में कंप्यूटर इंजीनियर थे. फाउंडेशनल कोर्स के लिए चुने गए 40 छात्रों चयन से पहले हरेक को ऑडिशन देना होता है – में से तीन तो रहमान के साथ अप्रेंटिशिप भी करने लगे हैं. अनुराग कहते हैं, ‘हम हर हफ्ते एक कंसर्ट का आयोजन करते हैं. जब भी रहमान सर यहां आते हैं वे भी इसमें हिस्सा लेते हैं.

इससे पहले कि यहां भी जड़ता का आभास होने लगे, एक नया मुकाम रहमान का इंतजार कर रहा है – ये है पहला भारतीय सिंफनिक ऑरकेस्ट्रा तैयार करना. रहमान कहते हैं, ‘हम एक अरब से ज्यादा आबादी वाला देश हैं जहां प्रतिभाओं की भरमार है. तो भारत का अपना एक भी ऑरकेस्ट्रा क्यों नहीं है?’ केएम कंजर्वेटरी ये सपना पूरा कर सकती है. और प्यार व मेहनत से इसे सींच रहे रहमान इन छात्रों को देखकर शायद उन दुश्वारियों की टीस भूल सकते हैं जो उन्हें अपने बचपन में ङोलनी पड़ीं थीं.

यह आलेख रहमान को ब्रिटिश फिल्म अकादमी (बाफ्टा) में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिलने से पहले लिखा गया है.