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चमक के पीछे

किसी फिल्मस्टार से किसी रिपोर्टर की मुलाकात कैसे होगी, इसके कई तरीके हैं. हर तरीका इस पर निर्भर करता है कि वह स्टार कामयाबी की कौन-सी सीढ़ी तक पहुंच गया है. जैसे अगर वह नया है तो पूरी संभावना है कि वह अपना फोन खुद ही उठाए. अगर वह महत्वाकांक्षी है तो फोन उसका कोई एजेंट उठाएगा जो अक्सर यह दिखाने की कोशिश करता है कि सर या मैडम के पास इतना काम है कि उन्हें फोन उठाने की फुर्सत नहीं. होशियार स्टारों के पास पब्लिसिस्ट होते हैं जो आपको बातचीत के लिए न्योता देते हैं. यह अलग बात है कि उनकी इस बातचीत में ज्यादातर वही बातें होती हैं जो उनके लिए उस समय के हिसाब से जरूरी और प्रासंगिक होती हैं. और इनके इतर एक वर्ग ऐसा होता है जो मिलने के लिए आने का हुक्म देता है.

करीना कपूर से तहलका की पहली मुलाकात दो साल पहले हुई थी. गोलमाल रिटर्न्स नाम की फिल्म के सेट पर हुई इस मुलाकात के वक्त करीना इंडस्ट्री की सबसे बड़ी हीरोइनों में शुमार थीं. हमें एसएमएस मिला था जिसमें हमसे हैदराबाद आने को कहा गया था. तब से लेकर अब तक काफी कुछ बदल चुका है. करीना दर्जन भर और फिल्मों में अभिनय कर चुकी हैं. इनमें से तीन थ्री इडियट्स, बॉडीगार्ड और रा वन दशक की सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्में थीं. दो साल पहले की तुलना में आज वे दोगुने ब्रांड्स के विज्ञापन कर रही हैं. बॉलीवुड में सबसे ज्यादा मेहनताना वसूलने वाली यह हीरोइन तब से लेकर अब तक सभी बड़े खान सितारों के साथ एक बार और काम कर चुकी है. उनमें से एक के साथ तो करीना की शादी भी हो चुकी है.

कई साल पहले सिमी ग्रेवाल के एक टीवी शो में फिल्मकार करण जौहर ने उस घटना का जिक्र किया था जब उन्हें पहली बार करीना के स्टार होने का अहसास हुआ था. जौहर की फिल्म कभी खुशी कभी गम की शूटिंग का एक दृश्य था जिसमें करीना शाहरुख खान का परिचय हृतिक रोशन से करवा रही हैं. यह करीब 12 साल पहले की बात है. स्क्रीन पर दोनों बड़े स्टार थे और उनके साथ करीना. मगर सिमी ग्रेवाल के उस शो में कहे गए जौहर के शब्दों पर यकीन करें तो बाजी करीना मार ले गईं. इस सीन को मॉनीटर पर देख रहे जौहर का कहना था, ‘वे इंडस्ट्री के सबसे बड़े सितारों में से दो के साथ खड़ी थीं और हाल यह था कि मैं उन पर से अपनी नजरें नहीं हटा पा रहा था.’

‘जिसे लोग मेरा अतिआत्मविश्वास समझते हैं, वह मेरे लिए बचाव की रणनीति है. मुझे मालूम था कि मेरे पास सफल होने के अलावा और कोई विकल्प है ही नहीं’

सबका ध्यान खींचने की उनकी यही खासियत मधुर भंडारकर द्वारा निर्देशित उनकी पिछली फिल्म हीरोइन में भी दिखाई दी. समीक्षकों ने फिल्म की भले ही आलोचना की हो मगर ढलान के दौर और एक मानसिक बीमारी से गुजर रही माही अरोड़ा के चरित्र को जिस खूबसूरती से करीना ने पर्दे पर निभाया उसके लिए उनकी खूब तारीफ हुई.

करीना से हमारी पिछली मुलाकात बड़ी दौड़भाग के बीच हुई थी. शूटिंग शेड्यूल काफी व्यस्त था और हर तीन-चार टेक के बाद करीना को कपड़े बदलने पड़ रहे थे. इस दौरान वे लगातार सेल फोन पर आ रहे संदेशों का जवाब दे रही थीं. इस बार की मुलाकात में ऐसी कोई हड़बड़ी नहीं है. 32 वर्षीया करीना शांत हैं. उनके चेहरे की चमक पहले से बढ़ी हुई लग रही है. वे हंसते हुए कहती हैं, ‘इन दिनों पत्रकार, एक्टर, प्रोड्यूसर, फैन सबको चिंता है कि शादी के बाद मेरे करियर का क्या होगा. मैं इस घर में पांच साल से रह रही हूं और इंडस्ट्री में शायद मैं इकलौती एक्टर हूं जिसने कभी यह छिपाने की कोशिश नहीं की कि मैं यहां अपने पार्टनर के साथ लिव इन में रह रही हूं.’

करीना के साथ बात करने में एक समस्या यह भी है. अपने स्टारडम को लेकर वे इतनी सहज हैं कि यकीन नहीं होता. उन्हें पता है कि हर कोई उनसे यानी एक स्टार के साथ बात करने की इच्छा इसलिए रखता है ताकि वह उनके बारे में कुछ जान सके. इसीलिए एक स्टार के पीछे छिपी करीना नाम की महिला से बात करना बहुत मुश्किल हो जाता है. दूसरे फिल्म स्टारों के उलट उनमें इस बात को लेकर कोई ओढ़ी हुई नम्रता नहीं दिखती कि नियति ने उन्हें चुना. वे उस परिवार से आती हैं जो भारतीय सिनेमा की पिछली एक सदी के आठ दशक के दौरान मजबूती से अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है. अपने इसी इतिहास में वे एलान के साथ अपना एक अध्याय रच रही हैं.’जब से होश संभाला तब से मैं बस यही चाहती रही कि हिंदी फिल्म की हीरोइन बनूं’, शब्दों पर जोर देते हुए करीना कहती हैं, ‘मैं भी वह सब रोमांस और रोना-धोना करना चाहती थी. मैं कोई दिखावा नहीं कर रही. मैं ऐसी ही हूं.’

एक पल के लिए इस बात के संदर्भ में करीना को देखा जाए तो समझ में आ जाता है कि जब उन्हें घमंडी करार दिया जाता है तो उन्हें हैरानी क्यों होती है. वे खुद को स्मार्ट नहीं दिखाना चाहतीं लेकिन अपने बारे में इस तरह बात करना उनकी शख्सियत का ही हिस्सा है. फिल्म पत्रकार इंदु मिरानी को याद है कि कैसे कई साल पहले एक बार उनकी मुलाकात 15 साल की करीना से हुई थी जो अपनी बड़ी बहन करिश्मा के साथ एक फिल्म के सेट पर आई थी. करीना ने मिरानी से कहा था कि वे उस दिन का इंतजार कर रही हैं जब मिरानी उनका इंटरव्यू लेंगी.  करीना बताती हैं, ‘स्टार बनने से पहले मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करती थी, मगर तब भी हर कोई मुझे पहचान लेता था. लोगों को पता चल जाता था कि मैं कपूर खानदान से हूं, करिश्मा मेरी बड़ी बहन है.’ उनमें यह अपील कहां से आती है, यह पूछने पर वे कहती हैं, ‘मेरी खूबसूरती, मेरा स्टार होना और मेरा काम, इससे ही मेरी अपील बनती है. न कि इससे कि मेरी शादी किसके साथ हुई है या फिर मैं कितने साल की हूं.’ देव से लेकर टशन तक इतनी अलग-अलग तरह की फिल्में वे कैसे चुनती हैं, इस सवाल पर करीना टशन के बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शन के आंकड़ों और साइज जीरो को लेकर हुई दीवानगी का जिक्र करने लगती हैं. और सैफ के साथ अपनी पहली मुलाकात का भी.

इन किस्सों, अपने बढ़िया काम, बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों और विज्ञापनों का जिक्र धीरे-धीरे असली करीना की झलक देने लगता है. फिल्म उद्योग में अपने शुरुआती दिनों में ही करीना ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘यह जगह बहुत खूबसूरत है. लेकिन यह बर्दाश्त के बाहर भी हो सकती है. कभी-कभी मैं खुद को 50 साल की महसूस करती हूं.’ अपनी बहन करिश्मा की तरह करीना भी मानती हैं कि उनके करियर में सबसे बड़ी बाधा अपेक्षाओं का वह बोझ ही रहा है जो कपूर खानदान का कोई सदस्य अपने साथ लेकर चलता है. हालांकि अपनी बेटियों को अभिनय के क्षेत्र में जाने के लिए उनकी मां बबीता को बगावती रुख अख्तियार करना पड़ा, फिर भी करीना मानती हैं कि अगर वे किसी छोटे कस्बे से आई लड़की होतीं तो उनके लिए लड़ाई बनिस्बत आसान ही होती. वे कहती हैं, ‘उन लोगों के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है जो चुनौतियों का सामना करते हुए ऊपर आए हैं. लेकिन जिसे लोग मेरा अतिआत्मविश्वास समझते हैं वह मेरे लिए दरअसल बचाव की रणनीति है. मुझे हमेशा से मालूम था कि मेरे पास सफल होने के अलावा और कोई विकल्प है ही नहीं.’

करीना की पहली फिल्म रिफ्यूजी को समीक्षकों ने काफी सराहा था. इसके बाद करीना को इस फिल्म जैसी ही भूमिकाओं के प्रस्ताव आने लगे. वे बताती हैं, ‘वह एक अलग वक्त था. मेरी कोशिश थी कि जितनी तरह के हो सके, अलग-अलग एक्टरों और निर्देशकों के साथ काम करूं. मुझे जितना हो सके, दिखते रहना था. आंकड़े जरूरी थे.’ आज भले ही वे दावा करें कि वे साल में एक फिल्म करके ही संतुष्ट हैं, लेकिन उन्हें फिर भी चिंता होती है कि जितनी विविधता भरी भूमिकाएं हॉलीवुड में किसी ए ग्रेड हीरोइन को मिलती हैं वैसी भूमिकाएं मुंबई फिल्म उद्योग उन्हें नहीं दे पाएगा. वे कहती हैं, ‘क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि लॉस एंजल्स में कोई इसकी चर्चा करता होगा कि एंजेलीना के छह बच्चे हैं तो इसका उसकी फिल्म पर क्या असर पड़ेगा? हमारी इंडस्ट्री इतने पुराने दौर में जी रही है. हम आज भी अपनी हीरोइनों को 16 साल की और 20 इंच कमर वाली बनाए रखना चाहते हैं.’

करीना यह भी मानती हैं कि कोई भी अभिनेत्री स्क्रिप्ट देखकर शाहरुख या सलमान खान के साथ फिल्म साइन नहीं करती. वह सिर्फ एक स्टार के साथ काम करने के लिए ऐसा करती है. यानी यह एक फॉर्मूला है. लेकिन उनकी हालिया फिल्म हीरोइन भी क्या रटे-रटाए फॉर्मूलों पर आधारित नहीं थी, यह पूछने पर वे कहती हैं, ‘मैं मधुर के साथ काम करना चाहती थी. और इसमें फैशन जैसा कोई खुलासा नहीं हो रहा था. हीरोइन एक निजी कहानी थी और मैं भी एक फिल्म चाहती थी जिसमें मेरे लिए कुछ सीन और तीन गानों से ज्यादा कुछ हो.’

हीरोइन में करीना का चरित्र एक बार फैसला करता है कि वह छोटे बजट की एक फिल्म में वेश्या की भूमिका करके अपने बारे में इंडस्ट्री की धारणा बदल देगा. अभिनय को लेकर अपने आम तरीके से अलग रुख अपनाते हुए माही अरोड़ा एक दोस्त के साथ एक कोठे पर जाती है और एक वेश्या के साथ वक्त बिताती है. 2004 में करीना ने भी अपनी छवि तोड़ने का फैसला लिया था. वे चाहती थीं कि चुलबुली हीरोइन के इतर उन्हें एक गंभीर अभिनेत्री भी समझा जाए. सुधीर मिश्रा की फिल्म चमेली में उन्होंने एक वेश्या का किरदार निभाया. फिल्म रिलीज हुई तो करीना की इस भूमिका की काफी तारीफ हुई. तो क्या उन्होंने इस रोल के लिए भी वैसी ही तैयारी की थी जैसी उनका चरित्र हीरोइन में करता है? नहीं. दरअसल अभिनय का उनका तरीका अलग है. वे कहती हैं, ‘मुझे पता नहीं होता कि कल मैं कौन-सा सीन  करने जा रही हूं और ऐसा ही मुझे पसंद भी है. मेरे लिए अभिनय का मतलब है उस क्षण विशेष पर मेरी प्रतिक्रिया. मुझे वह भाव कल फिल्म के सेट पर महसूस करना है, मैं उसे अभी क्यों महसूस करूं? एक मृत व्यक्ति का अभिनय करने के लिए मुझे सच में मरने की क्या जरूरत है?’ चमेली में उनके साथ रहे अभिनेता राहुल बोस भी मानते हैं कि करीना मेथॉडिकल एक्टिंग में यकीन नहीं रखतीं और इसकी भरपाई वे अपनी सहज समझ से कर देती हैं. बोस कहते हैं, ‘वैसे तो सारे अभिनय को ही एक प्रतिक्रिया कहा जा सकता है, लेकिन करीना में एक सहज ज्ञान और बहाव है.’  करीना को लगता है कि कैमरा ही सिर्फ अकेला जरिया है जो उनकी आत्मा में झांक सकता है. वे कहती हैं, ‘जिस क्षण कैमरा रोल होना शुरू होता है वही मेरे लिए दिन का सबसे ईमानदार लम्हा होता है.’

‘मेरे लिए अभिनय का मतलब है उस क्षण विशेष पर मेरी प्रतिक्रिया.  मुझे वह भाव कल फिल्म के सेट पर महसूस करना है, मैं उसे अभी क्यों महसूस करूं?’करीना कपूर को यह बात भी खास बनाती है कि कपूर खानदान की विरासत से होने के बावजूद उन्होंने अपने संबंधों, अपने परिवार या अपनी असफलताओं के बारे में बात करने पर कोई संकोच नहीं दिखाया. मुंबई के एक टेबलॉयड ने एक बार एक साक्षात्कार के दौरान उनसे काफी तीखे सवाल पूछे थे. मसलन, आप शादी क्यों नहीं कर रहीं? क्या आप बस मस्ती करना चाहती हैं? शाहिद के साथ क्या गड़बड़ हुई? क्या आपने उन्हें इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वे उतने कामयाब नहीं थे? क्या आप शाहिद के साथ रहते हुए उन्हें धोखा दे रही थीं? आखिरी सवाल तो बहुत ही तीखा था. अभिषेक ने आपकी बहन को क्यों छोड़ दिया? लेकिन करीना ने बिना संतुलन खोए हुए उतनी ही जानकारी साझा की जितनी उनके हिसाब से जरूरी थी. कई साल पहले टीवी पर उन्होंने अपनी किसी भी सफलता के लिए अपने पिता रणधीर कपूर का शुक्रिया अदा करने से इनकार कर दिया था. इसके बावजूद वे बार-बार कहती हैं कि कपूर परिवार उनकी सफलता की वजह रहा है और आज भी यह करीब से जुड़ा हुआ परिवार है. हम उन्हें थोड़ा और कुरेदते हैं और वे कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि मेरे प्रशंसक जानते हैं अगर मैं किसी सवाल पर खामोश हूं तो उस सवाल में पूछी गई बात सच नहीं है.’

सफलता के शिखर पर बैठी करीना किसी तरह की असुरक्षा के भाव से इनकार करती हैं. वे कहती हैं कि उन्हें ऐसी कोई रात याद नहीं आती जब वे चिंता के मारे सोई न हों, न ही कोई ऐसा क्षण जब उन्होंने खुद को असुरक्षित महसूस किया हो. उन्होंने किसी भी तरह की सोशल नेटवर्किंग से खुद को दूर रखा है. उनका मानना है कि यह एक अतिरिक्त जिम्मेदारी हो जाती है. करीना कहती हैं, ‘मेरे पास 22 ब्रांड हैं. एक एक्टिंग करियर है और एक रिश्ता है जिसका मुझे ख्याल रखना है; इन दिनों वे विश्व इतिहास पर आधारित एक किताब पढ़ रही हैं जो उनके मुताबिक सैफ ने उन्हें यह कहते हुए सुझाई है, ‘यह अच्छी बात है कि तुममें उत्सुकता है और तुम जानना चाहती हो. कभी भी इस बात के लिए झिझकना नहीं. न इसे छिपाना.’

शायद यह सैफ के साथ बिताए पांच साल के दौरान आई भीतर की समृद्धि भी है जिसने करीना को यह खास चमक दी है. एक परिवार और दूसरे मायनों में सांस्कृतिक रूप से इतनी विविध जड़ों से जुड़ने का अहसास ही शायद उस आनंद की वजह है जो उनके चेहरे पर नजर आ रहा है. इससे भी अहम यह है कि इस नए रिश्ते ने उन्हें कपूर खानदान से इतर भी एक पहचान दी है. अब करीना कपूर खान जानती हैं कि फिल्मों के सेट के परे भी एक दुनिया है और  उनके चेहरे की खुशी बता रही है कि उन्हें यह दुनिया भा रही है.

‘दिल्ली के लेखक सत्ता के पिछलग्गू हैं ’

आप एक समर्थ रचनाकार थे. आपकी रचनाओं का हिंदी समाज ने पर्याप्त नोटिस भी लिया है. फिर लेखन को स्थगित करके आप पत्रिका की तरफ क्यों मुड़ गए?
इसका मूल कारण यह है कि हिंदी समाज में अब लेखक के लिए कोई स्थान नहीं बचा है. लेखक की अब कोई हैसियत नहीं रही. कोई भी लेखक के तौर पर समाज में हस्तक्षेपकारी भूमिका नहीं निभा सकता. अत्यंत छोटे-से दायरे में ही उसकी पहुंच और पहचान है. यह स्थिति चाहे जितनी दुखद हो पर यही हिंदी समाज का सच है. अगर हमें समाज में कोई हस्तक्षेपकारी भूमिका निभानी है तो हमें लेखक से इतर भूमिका का चयन करना ही होगा. समाज में हस्तक्षेप करने की मेरी इच्छा शुरू से ही रही. उसी ने मुझे पत्रिका निकालने को प्रेरित किया.

लेकिन ऐसा लगता है कि लेखक से संपादक की भूमिका में आने का असल कारण आपकी रचनात्मकता का चुक जाना था. इसका एक बड़ा प्रमाण 2009 में आया आपका उपन्यास  ‘पंखवाली नाव’  है. इसकी कोई चर्चा नहीं हुई, जबकि आपकी पूर्ववर्ती रचनाओं का व्यापक स्वागत हुआ था.
सरकारी नौकरी छोड़ते समय मैं  ‘आजकल’ का संपादक ही था. मैंने नौकरी अपने उत्कृष्ट दौर में छोड़ी. नई भूमिका में आकर सिर्फ संपादकी करना होता तो वहां क्या बुरा था? मेरे अंदर एक बेचैनी थी कि कुछ ऐसा किया जाए जिससे समाज में हस्तक्षेप हो. यह काम न तो मैं सिर्फ लेखक के रूप में कर सकता था और न ही सरकारी पत्रिका की संपादकी द्वारा. इसीलिए मैंने अपनी पत्रिका निकालने का निर्णय लिया. रचनात्मकता चुकने जैसी कोई बात नहीं है. जहां तक ‘पंखवाली नाव’ का सवाल है तो यह उपन्यास संवेदनशील मानवीय त्रासदी पर है. साहित्य के सत्ता केंद्रों से जुड़े लोग मुझे पसंद नहीं करते. इसलिए उपन्यास भी उपेक्षित हो गया.

क्या यह विचित्र बात नहीं कि जो पंकज बिष्ट व्यापक सरोकारों की बात करते हैं, समाज में हस्तक्षेप की बात करते हैं, वे जब उपन्यास लिखते हैं तो समलैंगिकता को विषय बनाते हैं?
देखिए, किसी रचना का महत्व और मूल्यांकन विषय से नहीं होता, प्रस्तुति और सरोकार से होता है. रचना का संबंध मानवीय मूल्यों से होता है और इसी अर्थ में वह व्यापक प्रश्नों से जुड़ता है. कला से यह अपेक्षा करना कि उसमें यथार्थ सीधे-सीधे अभिव्यक्त हो, गलत है. ‘पंखवाली नाव’ के नायक की जो स्थिति है, उसका एक सामाजिक संदर्भ है. इस उपन्यास में ही नहीं बल्कि मेरी किसी भी रचना में सीधे-सीधे क्रांतिकारिता अभिव्यक्त नहीं हुई है.

आप पर सबसे बड़ा आरोप पहाड़वाद का है. पहाड़ के लोगों का संदर्भ आते ही आपकी सारी प्रतिबद्धताएं किनारे हो जाती हैं. नामवर सिंह द्वारा जसवंत सिंह की पुस्तक का लोकार्पण करने या एक पारिवारिक आयोजन में उदय प्रकाश का आदित्य नाथ के हाथों पुरस्कार लेने पर आप हाय-तौबा मचाते हैं पर वहीं मंगलेश डबराल के आरएसएस के संस्थान में जाकर भाषण देने से आपको कोई समस्या नहीं होती. बल्कि आप उल्टे उनका बचाव करते हैं. आप हिंदी अकादेमी का विरोध करते रहे हैं लेकिन जैसे ही हरि सुमन बिष्ट सचिव बने, अकादमी ठीक हो गई?
मंगलेश डबराल वहां गए और इसके लिए उन्होंने माफी भी मांग ली. मैंने उनका नहीं ‘लेफ्ट’ का बचाव किया. ओम थानवी ने ‘आवाजाही के हक में’ शीर्षक से जो लेख लिखा वह गलत नीयत से लिखा था. वे इसके बहाने लोगों से बदला ले रहे थे और पूरे वामपंथ को कटघरे में खड़ा कर रहे थे. मैं नहीं कहता कि मंगलेश का वहां जाना सही था, पर नामवर सिंह और उदय प्रकाश का मामला बिल्कुल अलग है. नामवर सिंह जसवंत सिंह के पुस्तक लोकार्पण में सिर्फ जातिवादी कारण से गए. दूसरी बात नामवर सिंह हिंदी के बड़े ‘फिगर’ हैं. उनके आचरण का असर नीचे तक होता है. इसलिए भी उनके गलत आचरण का मुखर विरोध जरूरी हो जाता है. इसी तरह उदय प्रकाश और आदित्य नाथ वाला आयोजन भी विशुद्ध पारिवारिक आयोजन नहीं था जैसा कि प्रचारित किया गया. वह एक प्रायोजित पुरस्कार था. उस समय साहित्य अकादमी में हिंदी के कन्विनर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी थे जो गोरखपुर के ही हैं. यह अकारण नहीं है कि अगला साहित्य अकादेमी पुरस्कार उदय प्रकाश को मिला. रही बात अकादेमी से मेरे संबंध की तो मैंने संस्थाओं का अंधविरोध कभी नहीं किया. हमेशा यही चाहा कि संस्थाओं में अच्छे व्यक्ति आएं. हिंदी अकादेमी से भी मेरा विरोध व्यक्ति यानी अशोक चक्रधर से था.

कई बार ऐसा लगता है कि आपकी प्रतिबद्धताएं और सरोकार चयनित हैं. आप लेखकों की सत्तापरस्ती का हमेशा विरोध करते हैं, लेकिन रामशरण जोशी के विरुद्ध आपने समयांतर में एक लाइन भी नहीं लिखी जबकि अर्जुन सिंह से उनके बहुत करीबी संबंध रहे और उसका उन्हें लाभ भी मिला. यह चयनित पक्षधरता क्यों?
पहले तो मैं आपको बता दूं कि रामशरण जोशी पहाड़ी नहीं हैं. इसलिए मुझ पर पहाड़वाद का जो पहले आरोप आपने लगाया है वह गलत है. रामशरण जोशी मेरे मित्र हैं और वे समयांतर में नियमित लिखते रहते हैं. आप मुझे यह बताएं कि अर्जुन सिंह से जुड़ने के कारण उन्होंने कोई प्रतिक्रियावादी काम या लेखन किया है क्या? अगर नहीं तो फिर विरोध किस चीज का किया जाए?

आपकी पत्रिका समयांतर को चटखारे और चाट की तरह लिया जाता है. लोग दरबारी लाल का दिल्ली मेल पढ़ते हैं और पत्रिका को रख देते हैं. इस पर आपका क्या कहना है?
यह बात केवल दिल्ली वालों पर लागू होती है. यहां के बुद्धिजीवी और लेखक सत्ता के पिछलग्गू हैं और दिन-रात जोड़-तोड़ की राजनीति में लगे रहते हैं, इसलिए उनकी दिलचस्पी दिल्ली मेल में होती है वरना बिहार, बंगाल, आंध्र प्रदेश की जेलों में बंद राजनीतिक कैदी तक समयांतर के पाठक हैं. महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा से लेकर पूर्वोत्तर तक समयांतर के ऐसे प्रतिबद्ध पाठक हैं जो एक अंक नहीं मिलने पर भी परेशान हो जाते हैं.

अभी हिंदी में लघु पत्रिकाओं का स्वर्ण युग है. नई पत्रिकाओं का निकलना जारी है. विज्ञापन भरपूर मिल रहे हैं. बावजूद इसके आप समयांतर को लेकर आर्थिक तंगी की बात करते रहते हैं. क्यों?
आप जिस स्वर्ण युग की बात कर रहे हैं वह साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के लिए है. इन पत्रिकाओं के पीछे सरकारी लोग हैं जो विज्ञापन दिलाते हैं और बदले में अपनी रचनाएं छपवाकर साहित्यिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करते हैं. दिक्कत तब होती है जब आप समयांतर जैसी प्रतिबद्ध राजनीतिक पत्रिका निकालते हैं जो सत्ता विरोधी चरित्र के कारण सरकारी संस्थानों को सूट नहीं करती है. इसलिए हमें विज्ञापन नहीं मिलते.
वामपंथ के प्रति आपकी पक्षधरता जगजाहिर है, पर लेखक संगठनों के बारे में आप क्या सोचते हैं? उनकी हस्तक्षेपकारी भूमिका अब समाप्त हो गई है.
मेरा शुरू से यह कहना रहा है कि लेखक संगठनों को ट्रेड यूनियन की तरह काम करना चाहिए और लेखकों कें हितों की लड़ाई लड़नी चाहिए. बड़े-बड़े साहित्यिक समारोहों में लेखक संगठनों की कोई भूमिका नहीं होती. लेखक संगठन अपने को पंजीकृत नहीं करवा रहे हैं. उन्हें डर है कि पंजीकरण के बाद साल भर का हिसाब-किताब देने सहित सरकारी नियंत्रण और कई तरह के दूसरे झमेले न बढ़ जाएं. उन्हें कोई बड़ी भूमिका निभानी है तो ट्रेड यूनियन की तर्ज पर ही काम करना होगा. दूसरी बात यह है कि पूरी हिंदी पट्टी में वामपंथी पार्टियों की भूमिका खत्म हो गई है तो उनसे जुड़े लेखक संगठन कोई बड़ी भूमिका कैसे निभा पाएंगे.

आपने सरकारी नौकरी छोड़कर एक मिशन के रूप में समयांतर का प्रकाशन शुरू किया. क्या आप समयांतर की स्थिति से संतुष्ट हैं?
समयांतर से मैं संतुष्ट हूं कि मुझे पाठकों का प्यार मिला. हमने समयांतर के माध्यम से लेखकों और पत्रकारों की एक नई पीढ़ी तैयार की. हम समाज में जो हस्तक्षेप करना चाहते थे वह भी कर रहे हैं. हमने पेड न्यूज पर पहले पहल प्रेस काउंसिल की रिपोर्ट छापी. मैं सोचता हूं कि मैं नौकरी करता तो मुझे क्या मिलता आज श्रीनगर से केरल तक समयांतर के पाठक मिलेंगे.

‘कमरदर्द को अनदेखा न करें’

‘कमरदर्द’ इतना आम माना जाता है कि हम इस पर खास तवज्जो नहीं देते. कमरदर्द हो रहा हो तो हम  आम तौर पर स्वयं को यह कहकर आश्वस्त करने की कोशिश करते है कि शायद गलत वजन उठा लिया होगा या शायद गद्दा या बिस्तर ठीक नहीं है या हम गलत मुद्रा में बैठकर टीवी देखे थे. ऐसी के ठीक सामने हमारी कुर्सी है न इसलिए कमरदर्द है शायद. इसमें भी औरतों के कमरदर्द को तो हम किसी गिनती में ही नहीं लाते. औरतों को तो कमरदर्द होता ही रहता है, साहब. घर के इतने काम, उठाधरी, झुकना, झुकाना, माहवारी वाले वे कठिन दिन. उनको तो इनमें से किसी भी कारण से कमरदर्द हो सकता है. इसमें क्या ध्यान देना? प्रायः यही सोच होती है हमारी.

परंतु याद रहे कि कमरदर्द इतनी आसान-सी समस्या भी नहीं है. बड़े पेच हैं इसमें. सामान्य-सा प्रतीत होता कमरदर्द भी किसी बड़ी मुसीबत का संदेशवाहक सिद्ध हो सकता है. यह आपको जीवन भर के लिए विकलांग तक बना सकता है, बिस्तर से लगा सकता है. कमरदर्द  की जड़ कमर में न होकर अन्यत्र किसी और बीमारी में हो सकती है. मुसीबत यह है कि प्रायः डॉक्टर भी इसे इतनी गहनता से ध्यान देने लायक बीमारी तक नहीं मानते जब तक कि पानी पहले ही सर से ऊपर न निकल चुका हो. मैं अपने एक रोचक केस का उदाहरण देकर समझाने की कोशिश करता हूं. कोशिश करने में कोई बुराई नहीं है. वैसे, कमरदर्द को समझा पाना अपने आप में एक सिरदर्द है.

मेरे पड़ोसी की पत्नी को तीन माह से कमरदर्द था. अस्पताल में मेरे चेंबर के ठीक बगल में ऑर्थोपेडिक सर्जन का चेंबर था. मैं निकला तो भाभी जी को वहां इंतजार करता पाया. बहुत-से एक्स-रे तथा अन्य जांचों का बंडल लादे जिसे देर तक उठाकर रखो तो उसी से कमरदर्द हो जाए. पूछा तो बताया कि तीन माह से परेशान हैं. कमरदर्द है, जांघों तक जाता है. इलाज से उन्नीस-बीस का फर्क ही पड़ा है बस. अच्छे ऑर्थोपेडिक डॉक्टर देख रहे थे उन्हें. मैंने कहा कि आप पहले गायनी चेकअप और अल्ट्रासाउंड करा लें. वे बहुत आश्वस्त तो नहीं थे पर कहा तो करा लाए. उन्हें वास्तव में ओवरी (अंडाशय) का कैंसर ट्यूमर था जो कमर की नसों को दबा रहा था. ये नसें (नर्वस) पांवों में भी जाती हैं.

दर्द का कारण कहीं और था परंतु इलाज कराते रहते तो कैंसर दूर तक फैल जाता, जान पर बन आती. ओवरी ऑपरेशन हुआ. अब वे पिछले दस साल से एकदम ठीक हैं. इस कहानी से शिक्षा?
शिक्षा यह कि कमरदर्द केवल कमर की हड्डी या नस में किसी बीमारी के कारण हो रहा हो यह जरूरी नहीं. कमरदर्द के कई कारण हो सकते हैं. डिस्क खिसक जाना, स्पोंडिलाइटिस, कमर की हड्डी की चोट के कारण या यूं ही बैठे टूट जाना, कमर की हड्डी (मेरुदंड या बर्टीबा) के पैदाइशी डिफेक्ट, उम्र के साथ इन हड्डियों का कमजोर हो जाना (ऑस्टोपोडोसिस), वहां कोई इन्फेक्शन हो जाना आदि बहुत-से कारण तो वे हैं जो सीधे मेरुदंड की बीमारी से ताल्लुक रखते हैं. परंतु शरीर में कहीं दूर बैठा कैंसर भी ऐसा दर्द पैदा कर सकता है. प्रॉस्टेट, ब्रेस्ट, फेफड़ों, आंतों आदि के कैंसर के बारे में पहली बार तब ही पता चला सकते हैं, जब वे दूरदराज फैलकर इन हड्डियों में फैल जाएं. कैल्शियम मेटाबॉलिज्म का नियंत्रण करने वाले सिस्टम (पैराथायरायड/ विटामिन डी/ किडनी आदि) की गड़बड़ी भी हड्डियों को कमजोर करके कमरदर्द कर सकती है.

फिर? हम क्या करें, डॉक्टर साहब? आपने तो डरा भी दिया और भ्रमित भी कर दिया. हां, मैंने किया. कई बार डराना और उचित भ्रम पैदा करना भी आवश्यक होता है ताकि हम जानें कि बीमारी ऐसी भी नहीं है कि हम उसे नजरअंदाज करें. कमरदर्द में निम्नलिखित बातों का अवश्य ध्यान रखें.

  • कमरदर्द यदि अचानक तथा बहुत तेज हुआ हो, किसी भारी सामान को उठाने में हुआ हो या ऊंची जगह से फिसलने से हुआ हो तो इसे कतई नजरअंदाज न करें. स्वयं दर्द की दवाएं खरीदकर खाते न बैठ जाएं. डॉक्टर को  जाकर दिखाएं.
  • यदि कमरदर्द कई सप्ताह या माह से चल रहा हो, चाहे कितता भी हल्का हो उसके इतना तेज हो जाने के लिए न बैठे रहें जब झक मारकर डॉक्टर को दिखाना पड़े.
  • यदि आप स्त्री हैं और आपको कमरदर्द परेशान करता है तो ऑर्थोपेडिक के अलावा अपना गायनी चेकअप भी अवश्य कराएं. यूटरेस आदि पेल्विस की बीमारियां कमरदर्द पैदा कर सकती हैं.
  • कमरदर्द के साथ बुखार भी आता है तो तुरंत ही (बहुत-सी) जांचों की आवश्यकता हो सकती है. यह टीबी, आस्ट्रिरियोमाईलाइटिस से लगाकर कमर के (मेरुदंड) जोड़ों की आर्थ्राइटिस तक निकल सकता है. बुखार हल्का भी हो तो नजरअंदाज न करें.
  • कमरदर्द यदि लगातार हो, लेटने या आराम करने से भी ठीक न हो तो पूरी जांच की आवश्यकता है क्योंकि कमरदर्द के सामान्य कारणों में प्रायः आराम कर लो तो दर्द कम हो जाता है.
  • कमरदर्द चलने पर हो परंतु आगे थोड़ा झुककर चलें या साइकिलिंग करें तो न हो तो यह लंबर केनाल स्टीनोसिस नामक बीमारी हो सकती है जिसका इलाज ऑपरेशन है.
  • यदि सिटी स्कैन या एक्स-रे में कमर की हड्डी या डिस्क में कोई खराबी दिखे तो जरूरी नहीं कि आपके कमरदर्द का कारण यही हो. कई बार यह होता है कि सिटी या एमआरआई में डिस्क खिसकी तो साफ दिख रही है या हड्डी बढ़ी दिख रही है, या कोई पुराना फ्रैक्चर ही दिख रहा है परंतु कमरदर्द किसी और कारण से हो रहा हो. ऐसे लोग कई बार ऑपरेशन तक करा लेते हैं पर दर्द ठीक नहीं होता तो केवल जांच रिपोर्ट पर न जाएं.
  • कमरदर्द के साथ यदि पांवों में या किसी उंगली, अंगुठे आदि में झुनझुनी हो या वह हिस्सा सुन्न हो जाए या उसमें ताकत कम लगे तो इसे इमरजेंसी मानें, तुरंत डॉक्टर को बताएं. कमरदर्द के साथ इनका होना खतरनाक है.
  • कमरदर्द कई बार कूल्हे की बीमारी से भी हो सकता है. ऐसे में कमर की जांच कुछ नहीं बता सकेगी.

तो लब्बोलुआब यह है कि यदि कमर में दर्द है, बना हुआ है तो उठें और किसी अच्छे डॉक्टर की सलाह अवश्य लें.                                               

‘कहां से आएगा गलत को गलत कहने का साहस?’

रोजमर्रा की जिंदगी में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जो होती तो एकदम आम हैं लेकिन याद रह जाती हैं और साथ छोड़ जाती हैं कुछ सवाल. अभी कुछ ही दिन पहले की बात है, ऑफिस से घर जाने के लिए 540 नंबर की बस में सवार हुआ. शाम का वक्त होने के कारण बस में ज्यादातर वही लोग थे जो अपने-अपने ऑफिस से घर जा रहे थे. कुछ के चेहरे पर सुकून था तो कई अन्य बेहद जल्दी में नजर आ रहे थे. दिल्ली के ट्रैफिक का हाल तो किसी से छिपा नहीं है. बस चल क्या रही थी लगभग रेंग रही थी. बस सावित्री सिनेमा के करीब पहुंची ही थी कि एक पुलिसवाले ने बस को रुकने का इशारा किया हालांकि वहां कोई बस स्टॉप नजर नहीं आ रहा था.

बसवाले ने वर्दी के रुआब में या फिर शायद पुरानी जान पहचान के चलते बस रोक दी. बस का रुकना था कि उसके पीछे तेज गति से आ रहे एक ऑटो चालक ने चीखते हुए ब्रेक लगाया. शायद उसे एहसास नहीं था कि बस यूं अचानक रुक जाएगी. जो पुलिसवाला  बस में चढ़ने जा रहा था, वह न जाने ऑटो चालक की किस गलती पर खफा हो गया. उसने आव देखा न ताव लगा, ऑटोवाले को थप्पड़ों से पीटने. इस बीच वह अपने संस्कारी होने का भी पूरा परिचय दे रहा था. एक से एक गंदी गाली. गालियां देने में वह ऐसी अद्भुत कल्पनाशीलता का प्रयोग कर रहा था कि बड़े-बड़े दिग्गज शरमा जाएं.

ऑटो चालक शायद दूर देश से खाने-कमाने आया कोई परदेसी था और चूंकि उसकी कोई गलती नहीं थी इसलिए उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह इस पूरी घटना पर आखिर कैसे रिएक्ट करे. ऑटो में एक लड़की बैठी थी और पुलिसवाले ने गालियां देते वक्त एक क्षण के लिए उसका भी लिहाज नहीं किया. वह पुलिसवाले से ‘सॉरी सर, सॉरी ‘सर’ की रट लगाए बैठी थी. जबकि उसकी या ऑटो चालक की कोई गलती थी ही नहीं.

इस बीच बसवाला चुपचाप बस रोके खड़ा रहा मानो पुलिसवाला देश हित का कोई बहुत जरूरी काम निपटा रहा हो. लेकिन शायद पुलिसवाले को ही जाने की जल्दी थी. उसने ऑटो को किनारे खड़ा करवाया और पास ही मौजूद बूथ से एक दूसरे पुलिसवाले को बुलाया. अब पहला पुलिसवाला बस में आ चुका था, जबकि दूसरा वापस वही पुरानी कहानी दोहराने में लग गया था. ऐसा लग रहा था मानो वे दोनों एक ही शख्स हैं बस उनकी शक्लें बदल गई हैं.

इलश्ट्रेशन:मनीषा यादव

पुलिसवाला जब तक नीचे अपना राक्षसी हुनर दिखा रहा था तब तक बस में सवार तमाम लोग पुलिसवालों के जुल्मों के किस्से याद कर रहे थे लेकिन जैसे ही वह पुलिसवाला बस में सवार हुआ, सारे लोगों की निष्ठा एक क्षण में बदल गई. अब दिल्ली की सड़कों पर चलने वाले ऑटो चालक दुनिया के सबसे बदतमीज, लुटेरे और डकैत हो चले थे. वे पुलिसवाले को यह कह कर उसका मन बढ़ा रहे थे कि भाई साहब आपने बिल्कुल ठीक किया और अब यह कुछ समय तक आदमी की तरह रहेगा वगैरह…वगैरह.

ऐसा नहीं था कि मैंने इस पूरे घटनाक्रम में कोई हस्तक्षेप किया या फिर किसी तरह का प्रतिरोध दिखाया लेकिन फिर भी मैं पुलिसवाले के साथ-साथ अपने सहयात्रियों के व्यवहार से भी बुरी तरह हतप्रभ था. बस अगले चौराहे से बाएं घूम गई जहां एक बड़े-से होर्डिंग पर दिल्ली पुलिस का विज्ञापन लगा हुआ था- दिल्ली पुलिस सदैव आपके साथ! क्या पुलिस के उच्चाधिकारियों के कानों तक कभी यह खबर पहुंचती होगी कि उनके कर्मचारी किस तरह लोगों के साथ बेजा हरकतें करते हैं या फिर पूरे कुएं में ही भांग घुली हुई है?

पुलिसवाला तो खैर पुलिसवाला ही था… लेकिन मेरे मन में एक सवाल यह भी उठ रहा है कि बस में सवार तमाम लोगों (मुझ समेत) के सामने ऐसी कौन-सी मजबूरी थी कि इतने लोगों में से एक ने भी गलत को गलत कहने का साहस नहीं दिखाया. यह वर्दी का खौफ था या नौकरीपेशा लोगों के खून में समा गई कायरता और चापलूसी का नमूना?

अराफात का शव परीक्षण

यासिर अराफात की मौत पर क्यों विवाद हो रहा है?
1996 में फिलिस्तीनी प्राधिकरण के प्रथम राष्ट्रपति रहे यासिर अराफात ने 35 वर्षों तक फिलिस्तीन मुक्ति संगठन का नेतृत्व किया. फिलिस्तीन के इस लोकप्रिय नेता को 1994 में नोबेल शांति पुरस्कार से भी नवाजा गया था. फिलिस्तीनियों के हितों के लिए लड़ने वाले अराफात को 2001 में इजरायल द्वारा उनके ही मुख्यालय में नजरबंद कर दिया गया था. अक्टूबर, 2004 में अचानक उनकी तबीयत काफी बिगड़ गई जिसके चलते उन्हें इलाज के लिए पेरिस के एक सैन्य अस्पताल में भर्ती करवाया गया. वहीं कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई. उनकी मौत का कारण हमेशा ही विवादों में घिरा रहा. कई लोगों का मानना था कि उनकी मौत के पीछे इजरायल का ही हाथ है.

मौत के आठ साल बाद उनके शव का परीक्षण करने की जरूरत क्यों आन पड़ी?
अरब के समाचार चैनल अल जजीरा द्वारा एक डॉक्यूमेंट्री बनाने के दौरान यासिर अराफात के कपड़ों और अन्य वस्तुओं की जांच में रेडियोधर्मी पोलोनियम 210 पाया गया. स्विट्जरलैंड के विशेषज्ञों द्वारा की गई इस जांच से अराफात की मौत पर सवाल खड़े हो गए. इसी साल अगस्त में फ्रांस ने इस मामले में नए सिरे से हत्या की जांच शुरू कर दी. अराफात की पत्नी सोहा अराफात के आग्रह पर फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने जांच के लिए अराफात के शव के पुन:परीक्षण की अनुमति दे दी है.

कौन करेगा शव का पुन:परीक्षण?
27 नवंबर को फिलिस्तीन के रमल्लाह नगर स्थित अराफात की कब्र से उनका शव निकाले जाने के बाद इसके नमूने फ्रांस, स्विट्जरलैंड और रूस के वैज्ञानिकों को दिए गए हैं. इन तीनों दलों द्वारा शव के नमूनों की स्वतंत्र रूप से जांच की जानी है. निष्पक्ष जांच हेतु रूस को विशेष रूप से इस जांच में शामिल किया गया है. कई लोगों का मानना है कि अराफात की हत्या इजरायल द्वारा इसलिए की गई कि वे शांति स्थापित करने में बाधा बन रहे थे. हालांकि इजरायल इस मामले में किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार कर चुका है.
-राहुल कोटियाल

इंडियन पोस्टल बिल : ज्ञानी जैल सिंह

भारत में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच विवाद का ऐतिहासिक दौर.

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो इसमें कांग्रेस पार्टी से ज्यादा  महत्वपूर्ण भूमिका तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल ने निभाई थी. जैल सिंह तब यमन से लौट रहे थे और हवाई जहाज में ही उन्होंने पत्रकारों को बता दिया था कि वे राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने जा रहे हैं.

लेकिन राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही राष्ट्रपति से उनके रिश्ते बिगड़ने शुरू हो गए. दरअसल दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में चल रहे सिख विरोधी दंगे रोकने में सरकार के सुस्त रवैये पर जैल सिंह काफी नाराज थे और यह संदेश उन्होंने प्रधानमंत्री तक पहुंचा दिया था.  आने वाले दिनों में देश के शीर्ष पद पर बैठे इन दो लोगों के बीच टकराव बढ़ता ही गया.

प्रधानमंत्री जब विदेश यात्रा पर जाते हैं तो उसके पहले और आने के बाद वे औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को इसका विवरण देते हैं लेकिन उस समय यह परंपरा भी तोड़ दी गई. इधर राष्ट्रपति ने भी सरकार के प्रति यही रुख अपना लिया. उन्होंने अपने गृहराज्य पंजाब में सरकार के आग्रह के बाद भी दखल देने से मना कर दिया. यहां तक कि 1985 में जब राजीव गांधी और अकाली दल के लोंगोवाला के बीच संधि हुई तब भी इसमें जैल सिंह की भूमिका कहीं नहीं थी. इसी समय एसएस बरनाला पंजाब के मुख्यमंत्री बने तो सरकार ने संसद में राष्ट्रपति को भाषण देने के लिए आमंत्रित किया लेकिन जैल सिंह ने यह आमंत्रण ठुकरा दिया.

इन सभी घटनाओं के बीच एक ऐसी घटना भी हुई जिसने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच तनाव को चरम पर पहुंचा दिया. राजीव गांधी सरकार ने दिसंबर, 1986 में राष्ट्रपति को उनकी मंजूरी के लिए इंडियन पोस्टल एक्ट- 1898 (संशोधित) बिल भेजा था. इसमें प्रावधान था कि सरकार आम लोगों के पत्राचार की जब चाहे जांच करा सकती है. जैल सिंह के मुताबिक यह आम लोगों की निजता में दखल था इसलिए उन्होंने इस बिल को मंजूरी नहीं दी, साथ ही उन्होंने इसे वापस सरकार के पास पुनर्विचार के लिए भी नहीं भेजा.

इस घटना के बाद राजीव गांधी और जैल सिंह के बीच चल रहा टकराव इतना खुलकर सामने आ गया कि मीडिया में आए दिन ये खबरें चलनी लगीं कि राष्ट्रपति राजीव गांधी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के बारे में सोच रहे हैं और सरकार जैल सिंह पर महाभियोग चलाने के लिए कानूनी विशेषज्ञों की मदद ले रही है. हालांकि ये सारे विवाद बहुत समय तक नहीं चल पाए क्योंकि जुलाई, 1987 में जैल सिंह का कार्यकाल समाप्त हो गया फिर भी इस पूरे दौर को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बीच टकराव के लिए आज भी याद किया जाता है.
-पवन वर्मा

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का एक पत्र…

संदर्भ: भारत के पहले राष्ट्रपति, संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद सादगी और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति थे. यहां हम एक चिट्ठी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे  राजेंद्र बाबू के  पुत्र व पूर्व राज्यसभा सांसद मृत्युंजय प्रसाद ने अपनी किताब ‘पुण्य स्मरण’ में संकलित किया था. मूल रूप से यह चिट्ठी भोजपुरी भाषा और कैथी लिपि में है, क्योंकि राजेंद्र प्रसाद अपनी पत्नी राजवंशी देवी को इसी भाषा में पत्र लिखा करते थे. यह एक निहायत ही निजी पत्र है लेकिन इसका सार्वजनिक महत्व है. राजेंद्र बाबू ने गांव में रह रही अपनी पत्नी को यह चिट्ठी तब लिखी थी, जब वह वकालत के शानदार कैरियर के विकल्प को छोड़कर राष्ट्रसेवा में खुद को समर्पित करने की तैयार कर रहे थे.

इस चिट्ठी के तथ्यों पर गौर करने के साथ ही इस बात पर भी गौर करने की जरूरत है कि राजेंद्र बाबू यह फैसला लेने के पहले अपनी पत्नी को सूचित  करते हैं और उनका मशविरा भी मांगते हैं. इस चिट्ठी के जरिये हम उन नेताओं के जीवन मूल्य को एक बार फिर से याद कर सकते हैं, जिन्होंने इस राष्ट्र के मूल्य गढ़ने में महती भूमिका निभायी थी.

आशीर्वाद,

मैं कुशलपूर्वक हूं और वहां की कुशलता चाहता हूं. बहुत दिनों से वहां का कोई समाचार नहीं मिला,इससे मन में चिंता है. आज मैं पहली बार अपने मन की बात खुलकर लिखना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि तुम ध्यानपूर्वक इसको पढ़ो और इस पर विचार कर के मुझे उत्तर दो. 

सभी जानते हैं कि मैंने बहुत पढ़ा, बहुत नाम हुआ,इसलिए मैं बहुत धन कमाउंगा. सबों को मुझसे उम्मीद है कि मेरा पढ़ना-लिखना सिर्फ रूपया कमाने के लिए है. तुम्हारे मन में क्या है? तुम मुझसे सिर्फ रूपया कमाने की अपेक्षा करती हो या कुछ और कमाने की, लिखना. बचपन से ही मेरा मन धनोपार्जन से विमुख हो गया था. जब पढ़ने-लिखने में मेरा नाम हुआ तो मैं यह कभी नहीं सोचा, न आशा की कि यह सब पढ़ना-लिखना सिर्फ रूपया कमाने के लिए है, इसलिए मैं तुमसे पूछना चाहता हूं कि यदि मैं धनोपार्जन न करूं तो क्या तुम गरीबी में मेरे साथ निर्वाह कर लोगी. मेरा-तुम्हारा जन्म भर का संबंध है. मैं रूपया कमाउं या नहीं, दोनों स्थितियों में तुम मेरा साथ दोगी किंतु मैं यह जानना चाहता हूं कि यदि मैं अर्थोपार्जन न करूं तो क्या तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट होगा? 

मेरा चित्त अर्थ लाभ के लिए काम करने से बिल्कुल हट गया है. मैं धनोपार्जन नहीं करना चाहता हूं. मैं तुमसे यह कहना चाहता हूं कि तुम्हें यह बात कैसी लगती है? यदि मैं धन नहीं कमाउं तो तुम्हें मेरे साथ निर्धन की तरह रहना होगा. गरीबों का भोजन, गरीबों का पहनावा और गरीब ह्रदय से जीना होगा. मैंने इस पर विचार किया है और इस निश्चय पर पहुंचा हूं कि मुझे इसमें कोई कष्ट न होगा, किंतु मैं तुम्हारे मन की बात जानना चाहता हूं. मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी स्त्री सीताजी की भांति, जिस हाल में मैं रहूंगा, मेरे साथ रहेगी-सुख में, दुख में, सब में मेरा साथ देना ही अपना धर्म, अपना सुख और अपनी खुशी समझेगी. 

इस दुनिया में अमीर, गरीब सब धन के लोभ में मरे जा रहे हैं. यह सब कष्ट क्यों? किस लिए? जिसको संतोष है, वही सुख से दिन काट रहा है. सुख-दुख रुपया कमाने से या नहीं कमाने से नहीं मिलता. जो भाग्य में लिखा है, वही होता है. 

अब मैं लिखना चाहता हूं कि यदि मैं रूपया न कमाउं तो क्या करूंगा. सबसे पहले तो वकालत छोड़ दूंगा, परीक्षा नहीं दूंगा, वकालत नहीं करूंगा. मैं अपना सारा समय देश सेवा में लगाउंगा. देश के लिए जीना, देश हित की बात सोचना, देश सेवा करना, यही मेरा काम रहेगा. अपने स्वार्थ का न सोचना, न कराना, पूरी तरह साधु का जीवन जीना होगा.

तुमसे, मां से या परिवार से अलग नहीं रहूंगा, घर-परिवार में ही रहकर भी मैं अर्थोपार्जन नहीं करूंगा, संन्यास नहीं लूंगा, बल्कि घर में ही रहकर यथाशक्ति देश की सेवा करूंगा.कुछ ही दिनों में मैं धर आउंगा तो सारी बातें कहूंगा. यह पत्र तुम किसी को नही दिखलाना, किंतु इस पर विचार कर यथाशीघ्र उत्तर लिखो. मैं तुम्हारे उत्तर की व्यग्रता से प्रतीक्षा करूंगा. फिलहाल ओर अधिक नहीं लिखूंगा.

 राजेंद्र

18 मिरजापुर स्ट्रीट, कलकत्ता

 (भोजपुरी में लिखे गए पत्र का हिंदी में अनुवाद निराला ने किया)

बद-नामधारी!

सुखदेव सिंह नामधारी का अतीत मौका और दस्तूर के हिसाब से पाला बदलने का रहा है. उन्हें जानने वाले बताते हैं कि उनकी इस कला ने ही उन्हें मामूली ट्रक ड्राइवर से उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद तक पहुंचा दिया. नामधारी हाई प्रोफाइल पोंटी चड्ढा-हरदीप सिंह हत्याकांड की महत्वपूर्ण कड़ी हैं.

नामधारी के बारे में कहा जाता है कि वे जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ते थे सबसे पहले उसे ही खत्म करते थे. यही कारण है कि आज उनके कस्बे बाजपुर में उनसे सहानुभूति रखने वाला एक भी व्यक्ति नहीं मिलता.  उत्तराखंड में उधम सिंह नगर जिले के बाजपुर कस्बे के एक व्यापारी नामधारी के परिवार के बारे में विस्तार से बताते हैं, ‘बाजपुर थाने के मुंडिया मनी गांव के निवासी नामधारी के पिता किसानी करते थे. घर की महिलाएं कोल्हू में गुड़ बनाती थीं और पुरुष उसे बाजार ले जाकर बेचते थे. धीरे -धीरे उनका परिवार किसानी के साथ-साथ मंडी समिति में अनाज की ढुलाई और ट्रांसपोर्ट के काम में लग गया.’ 

पंजाब में जब आतंकवाद का जोर था तो उसका असर उत्तराखंड की तराई में भी पड़ रहा था. उस दौर में तराई के बड़े नेता थे पं. गुरुबचन लाल शर्मा जिनकी छवि आतंकवादियों से टक्कर लेने वाले की बन गई थी. बताते हैं कि उन दिनों गुरुबचन लाल और तब के अकाली दल नेता व वर्तमान में भाजपा विधायक हरभजन सिंह चीमा के बीच टकराव चलता था. दोनों गुटों के साथ दंबगों की फौज थी. इस गैंगवार में कई हत्याएं भी हुईं. उस दौर में नामधारी और उनका भाई बलदेव सिंह, चीमा के सुरक्षा गार्ड बन गए थे. कहने को दोनों भाई सुरक्षा गार्ड थे लेकिन वास्तव में उन्होंने अपने मामा के साथ मिलकर अपना एक गुट बना रखा था. चीमा पर इस गुट को संरक्षण देने का आरोप लगता था. इलाके के लोग बताते हैं कि धीरे-धीरे इस गुट ने पैसे लेकर उत्तराखंड और उसके बाहर भी उगाही और संपत्तियों पर कब्जा करने का धंधा शुरू कर दिया.

1994 में गुरुबचन लाल शर्मा की हत्या हो गई. पहली बार नामधारी का नाम इसी अपराध के सिलसिले में सामने आया. बाद में नामधारी इस मामले से बरी हो गए. लेकिन उनकी और चीमा की दोस्ती अधिक दिनों तक नहीं चली. नामधारी ने इलाका बदल लिया. वे पंजाब के कांग्रेसी सांसद राणा गुरजीत के शागिर्द बन गए. राणा गुरजीत का नामदारी के कस्बे बाजपुर में फार्म था. नामधारी यह साथ भी ज्यादा दिनों तक निभा नहीं पाए. कुछ ही दिनों बाद उन्होंने भाजपा विधायक अरविंद पांडे से नाता जोड़ लिया. कहा जाता है कि पांडे के साथ ने नामधारी के भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा पैदा की.

भाजपा से मिली थोड़ी-सी राजनीतिक ताकत और अपने बाहुबल के जरिए नामधारी की धाक उत्तराखंड के तराई इलाके में जम गई थी. 2001-02 में नया राज्य बनने के साथ ही राज्य में बड़े पैमाने पर खनन के पट्टे दिए गए. पोंटी चड्ढा इसमें सबसे बड़े लाभार्थी थे. बताते हैं कि यह मौका पोंटी और नामधारी को करीब लाने में मददगार सिद्ध हुआ. हालांकि नामधारी कुमाऊं के बागेश्वर में पोंटी का खनन का धंधा पहले से ही देखते आ रहे थे, लेकिन नया राज्य बनने के बाद दोनों का काम बड़े पैमाने पर फैला और साथ ही दोनों की नजदीकी भी बढ़ गई. अपनी राजनीतिक पहुंच का इस्तेमाल करते हुए नामधारी ने खनन के कई पट्टे हासिल किए.  पिछली भाजपा सरकार में उधम सिंह नगर के कई खनन पट्टों में नामधारी का हिस्सा था. पोंटी से निकटता और खनन पट्टों में हिस्सेदारी के बाद आई समृद्धि नामधारी के किलेनुमा मकान से झलकती है. अपने चरित्र के अनुकूल नामधारी पांडे से भी अपने रिश्ते कायम नहीं रख सके. उनकी महत्वाकांक्षा उड़ान भर रही थी. फरवरी, 2010 में वे राज्य अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर जा पहुंचे. दबी जुबान में सरकारी अधिकारी इसे पोंटी का आशीर्वाद बताते हैं.

उधम सिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एएस ताकवाले बताते हैं, ‘नामधारी पर जिले में 12 मुकदमे दर्ज हुए जिनमें से पांच में थाने से ही फाइनल रिपोर्ट लगी और छह में वे न्यायालय से बरी हुए. केवल एक मामले में चार्जशीट दाखिल हो सकी है.’ उत्तराखंड कैडर के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि नामधारी राज्य में कई हत्याकांडों में शामिल रहे हैं लेकिन उनके सियासी रसूख और दबंगई के कारण किसी भी मामले में एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई. पोंटी चड्ढा के साथ नाम जुड़ने के बाद भी कई संगीन मामलों में उनका नाम उछला लेकिन वे किसी में नामजद नहीं हुए. इनमें से एक अफजलगढ़ थाना क्षेत्र में अरविंद सिंह हत्याकांड है. इस हत्याकांड में भी नामधारी के शूटरों का नाम आया था. यह हत्या करोड़ों की भूमि पर कब्जा जमाने के लिए हुई थी. बाद में इस जमीन पर नामधारी के गुर्गों ने कब्जा कर लिया.

उत्तराखंड आबकारी विभाग के अधिकारियों की मानें तो पिछले कुछ समय से पोंटी राज्य के शराब व्यापार में घुसने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थे. शराब के ठेके हासिल करने के लिए जरूरी पात्रता पाने के लिए पिछले पांच-छह साल में उन्होंने नामधारी और उनके परिजनों के नाम पर उत्तराखंड में जमकर जमीनें खरीदी हैं. आज ये सारी जमीनें नामधारी परिवार के कब्जे में हैं.

पोंटी चड्ढा हत्याकांड के बाद नामधारी को लेकर उत्तराखंड में भाजपा की भी कलई खुल गई है. बदलते घटनाक्रम के साथ पार्टी नेताओं के बयान बदलते रहे. पहले नामधारी के राजनीतिक उत्पीड़न की संभावना जताई गई. फिर बयान आया कि वे भाजपा के सदस्य ही नहीं हैं. अब उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया है. नामधारी के पुराने साथी रहे भाजपा के एक नेता बताते हैं, ‘नामधारी छोटे-से फायदे के लिए किसी का बड़े से बड़ा नुकसान करने में संकोच नहीं करते हैं.’

चमत्कारिक यात्रा, अविश्वसनीय अंत

पोंटी चड्ढा की चमत्कारिक सफलता को लेकर लोगों में जितनी उत्सुकता थी उनकी मौत पर उससे कहीं ज्यादा संशय छाया हुआ है. जो बातें सामने आ रही हैं उसके मुताबिक 17 नवंबर की दोपहर को पोंटी और उनके एनआरआई भाई हरदीप सिंह के बीच परिवार के फार्महाउस पर हुई गोलीबारी में दोनों भाइयों की मौत हो गई. यह फार्महाउस दिल्ली के चुनिंदा लोगों की स्थली छतरपुर में स्थित है. दुर्घटना के समय पोंटी के साथ उनके साथी और उत्तराखंड अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव सिंह नामधारी अपने अंगरक्षक के साथ मौजूद थे. पुलिस द्वारा दी गई शुरुआती जानकारी के मुताबिक पहले हरदीप ने पोंटी पर गोली चलाई जिसके जवाब में नामधारी के अंगरक्षक ने हरदीप पर गोली चलाई. इसके बाद कहानी में कई मोड़ आ चुके हैं. पुलिस की ताजा अपडेट के मुताबिक हरदीप सिंह पर गोली स्वयं नामधारी ने चलाई थी और जिस हथियार से गोली चली उसे पुलिस ने बरामद कर लिया है. इससे भी ताजा स्थिति यह है कि मामले की जांच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई है.

शराब किंग और उनके भाई की मौत को लेकर कयासों की बाढ़-सी आ गई है. एक कहानी के मुताबिक दोनों भाइयों के बीच छतरपुर के फार्महाउस को लेकर झगड़ा था जिसके नतीजे में दोनों मौतें हुई हैं. लेकिन परिवार के एक करीबी बताते हैं, ‘जिसके पास हजारों करोड़ की संपत्ति है वह 13 एकड़ के फार्महाउस के लिए क्यों लड़ेगा. लोग गलत बातें फैला रहे हैं.’  कहा जा रहा है कि 15 नवंबर को दोनों भाइयों ने दो साल से चले आ रहे झगड़े को निपटा लिया था. हरदीप काफी समय से पोंटी से अलग होने की मांग कर रहे थे. जिन शर्तों पर दोनों भाइयों के बीच समझौता हुआ था (इसके मुताबिक करीब 1,000 करोड़ की संपत्ति हरदीप के हिस्से में आनी थी), बाद में हरदीप उनसे मुकर गए. उनके नजदीकियों ने उन्हें यह कहकर भड़का दिया था कि उनके हिस्से में काफी कम संपत्ति आई है. हरदीप के इस कदम से पोंटी भी तिलमिला गए थे. इसी गुस्से के चलते वे 17 तारीख को छतरपुर फार्महाउस और बिजवासन फार्ममहाउस (पश्चिमी दिल्ली) से हरदीप के लोगों को बाहर निकालने के लिए पहुंचे थे. उनका साथ उनके लठैत और पंजाब पुलिस द्वारा उन्हें दिए सुरक्षाकर्मी दे रहे थे. इसकी जानकारी मिलने पर हरदीप भी गुस्से से तमतमाए हुए फार्महाउस जा पहुंचे. दोनों भाइयों का आमना-सामना हो गया. गुस्से में कहासुनी हुई और बाद की घटना के बारे में यकीन से कोई कुछ नहीं बता पा रहा है.

पोंटी के करीबी और उन्हें जानने वालों के मुताबिक हरदीप बेहद महत्वाकांक्षी हो गए थे. समूचा वेव समूह (जिसकी कुल कीमत 6,500 करोड़ से 30,000 करोड़ रुपये के बीच कुछ भी हो सकती है) पोंटी की उद्यमिता और चतुराई की नींव पर खड़ा हुआ है. चखने के मामूली ठेले से इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा करने के बीच पोंटी ने तमाम उतार-चढ़ाव देखे हैं. अधिकारियों से लेकर सरकारों के बीच उनकी धाक थी. शराब से बढ़कर उन्होंने अपना व्यवसाय रियल एस्टेट, शुगर मिल, पेपर मिल और खनन तक फैलाया था.

पोंटी चड्ढा लोगों की निगाह में तब चढ़े जब उत्तर प्रदेश की पिछली मायावती सरकार ने राज्य की आबकारी नीति में बड़ा फेरबदल करते हुए उन्हें राज्य के शराब कारोबार (देसी और अंग्रेजी दोनों) की पूरी लगाम ही पकड़ा दी. मेरठ, आगरा, सहारनपुर, मुरादाबाद और बरेली जोन के अंतर्गत कुल 45 जिलों के शराब कारोबार का थोक और फुटकर कारोबार पोंटी के हवाले हो गया. इसके अलावा पूरे राज्य में थोक शराब का कारोबार भी पोंटी चड्ढा के हवाले कर दिया गया. उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के 80 फीसदी से ज्यादा शराब के कारोबार पर कब्जा जमाने के बाद पोंटी रुके नहीं. बहनजी की कृपा उन पर बरस रही थी. राज्य सरकार के स्वामित्व वाली चीनी मिलों को औने-पौने दामों पर मायावती सरकार ने चड्ढा के हवाले कर दिया. राज्य लोकायुक्त की रिपोर्ट में पोंटी को बेची गई चीनी मिलों से सरकारी राजस्व को 124 करोड़ रुपये हानि की बात सामने आई. मेरठ जोन के एक पुराने शराब व्यवसायी जो पोंटी के एकाधिकार के चलते आजकल बेरोजगारी के आलम में हैं, कहते हैं, ‘शराब के धंधे की एक चेन है. गन्ना, चीनी मिल, गन्ने से चीनी, चीनी से शीरा और शीरे से शराब. जो आदमी लोगों को शराब पिलाने का काम करता था, वह अब खेत में गन्ना पैदा करने से लेकर शराब पिलाने तक के पूरे कारोबार पर कब्जा कर चुका है. ऐसे में आगे अगर राज्य की आबकारी नीति बदलती भी है तो भी इस पूरी चेन पर पोंटी का जिस तरह से कब्जा हो गया है उसमें दूसरे लोगों को पैर जमाना असंभव होगा.’

सिर्फ मायावती ही पोंटी के उपर मेहरबान रही हों ऐसा नहीं है. राजनीतिक जमात में पोंटी के मुरीद पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक फैले हुए हैं. यूपी में पोंटी के उत्कर्ष की कहानी नब्बे के दशक के पूर्वार्ध से शुरू होती है. उस समय पोंटी मुरादाबाद में शराब के ठेके चलाते थे. इस काम में उनके एक साझेदार थे जोगिंदर अनेजा. 1992-93 में जब प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार बनी तब अनेजा समाजवादी पार्टी से एमएलए बने. सपा के साथ पोंटी के जुड़ाव की यह औपचारिक शुरुआत थी. रिश्ते बनाने में माहिर पोंटी के बारे में माना जाता है कि अनेजा के जरिए वे पहली बार मुलायम सिंह के संपर्क में आए. मेरठ जोन के एक अन्य पूर्व शराब व्यवसायी कहते हैं, ‘मायावती ने भले ही पोंटी को तीस हजार करोड़ का आदमी बनाया हो लेकिन उन्हें शून्य से पांच सौ करोड़ तक ले जाने में मुलायम सिंह की भूमिका सबसे बड़ी है.’
2003 से 2007 के बीच मुलायम सिंह एक बार फिर से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. इस दौरान उन्होंने  दो महत्वपूर्ण नीतियां बनाई. हाईटेक सिटी पॉलिसी और मल्टीप्लेक्स पॉलिसी. हाईटेक सिटी नीति के जरिए निजी बिल्डरों को टाउनशिप बनाने के लिए आसानी से भूमि उपलब्ध कराने और दूसरी छोटी-मोटी अड़चनें दूर करने का काम सरकार ने अपने हाथ में ले लिया. इसके नतीजे में प्राइवेट बिल्डर खूब फले-फूले. इसी तरह से मल्टीप्लेक्स नीति के कारण लखनऊ में बने पहले मल्टीप्लेक्स वेव का उद्घाटन करने 2003 में मुलायम सिंह यादव स्वयं पहुंचे थे. इन दोनों नीतियों के सबसे बड़े लाभार्थी पोंटी रहे. आज प्रदेश में पोंटी की कंपनी वेव के पास सबसे ज्यादा मल्टीप्लेक्सों का स्वामित्व है और राज्य में रियल एस्टेट के क्षेत्र में भी उन्हीं की कंपनी की तूती बोलती है.

2007 से 2012 के बीच उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार रही. इस दौरान पोंटी मायावती के बेहद नजदीक पहुंच गए थे. 2012 में सत्ता परिवर्तन हो गया. मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश यादव सत्ता में आ गए. पोंटी पर मायावती की मेहरबानियों को देखते हुए राज्य के कई अखबारों ने उनका सूरज अस्त होने की घोषणा कर दी. पर सब के सब तब बगलें झांकने लगे जब 15 अप्रैल को हुए शपथ ग्रहण समारोह में पोंटी चड्ढा की सीट रिजर्व थी. जानकार बताते हैं कि अखिलेश यादव से निजी मुलाकात के लिए पोंटी लखनऊ में पूरे आठ दिन तक डेरा डाले रहे और अंतत: उनसे मिलकर ही वापस लौटे थे. कह सकते हैं कि मकसद कैसा भी रहा हो पोंटी उसके लिए खासे जुनूनी थे.

थोड़ा-सा पीछे जाएं तो हम पाते हैं कि जितना फायदा उन्हें सपा-बसपा ने पहुंचाया उतना ही उनके काम भाजपा भी आई. 2000 से 2002 के बीच राजनाथ सिंह सूबे के मुख्यमंत्री थे और सूर्य प्रताप शाही आबकारी मंत्री. इस दौरान भी राज्य की आबकारी नीति में एक बड़ा फेरबदल हुआ था जिसका सीधा लाभ चड्ढा की कंपनी को हुआ था. इस समय तक खुदरा ठेकों की बड़ी संख्या पर पोंटी का कब्जा हो चुका था. राजनाथ सरकार ने नई नीति बनाई जिसे मॉडल शॉप के नाम से जाना जाता है. इस नीति में शराब के खुदरा ठेकों के साथ ही शराब पीने के लिए रेस्टोरेंट जैसी सुविधा देने का प्रस्ताव था. इस नीति के लागू होने के बाद शराब के ठेकों पर दिनों-दिन भीड़ बढ़ने लगी.

इन सालों के दौरान दुनिया उनके कारोबार को सिर्फ पोंटी के नाम से पहचानती रही है. कहीं भी उनके भाइयों का नाम या काम सामने नहीं आता. पोंटी को करीब से जानने वाले एक पत्रकार के मुताबिक, ‘अपने दम पर खड़े किए गए व्यापारिक साम्राज्य का पोंटी किसी भी कीमत पर बंटवारा नहीं करना चाहते थे. बड़ी मुश्किल से परिवार और रिश्तेदारों के दबाव में वे इसके लिए तैयार हुए थे.’ पिछले कुछ सालों से उनके बेटे मनप्रीत सिंह उर्फ मोंटी का नाम वेव के रियल एस्टेट के धंधे में जरूर सामने आने लगा था. जिस दौरान दोनों भाइयों के बीच जानलेवा गोलीबारी हुई, उस समय मोंटी हिंदुस्तान टाइम्स अखबार के सालाना कार्यक्रम लीडरशिप समिट में हिस्सा ले रहे थे.

इस घटना के बाद दोनों परिवारों ने असाधारण एकजुटता दिखाई है. केंद्रीय दिल्ली के रकाबगंज गुरुद्वारे में आयोजित प्रार्थना सभा के दौरान दोनों भाइयों की विधवाएं एक साथ दिखीं. और तो और, जिस सुखदेव सिंह नामधारी पर हरदीप की हत्या का आरोप है वह भी उस प्रार्थना सभा में शिरकत करने पहुंचा. ये सारी स्थितियां मिलकर मामले की जटिलता को बढ़ा रही हैं. इतने बड़े व्यापारिक साम्राज्य को संभालने और आगे बढ़ाने की मजबूरी भी इस एकता की बड़ी वजह मानी जा रही है. समझौते का मौजूदा फॉर्मूला यह है कि पोंटी के मंझले भाई रजिंदर सिंह वेव इंक के मैनेजिंग डायरेक्टर होंगे जबकि पोंटी के बेटे मोंटी ज्वाइंट मैनेजिंग डायरेक्टर होंगे. हरदीप सिंह के परिजनों की इस पूरी व्यवस्था में क्या स्थिति रहेगी इस बारे में अभी कुछ साफ नहीं हो पाया है. 

अपनी मृत्यु से एक पखवारे पहले पोंटी चड्ढा दिल्ली के पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार से मिलकर आए थे. उन्होंने अपने ऊपर जानलेवा हमले का खतरा जताया था और अतिरिक्त सुरक्षा की मांग की थी. हालांकि उनके साथ पंजाब पुलिस के जवानों का सुरक्षा घेरा रहता था. जवाब में पुलिस प्रमुख ने उनसे एक लिखित आवेदन जमा करने के लिए कहा था और साथ ही उन संभावित लोगों के नाम भी बताने को कहा था जिनसे उन्हें जान का खतरा हो सकता था. मगर पोंटी इसके लिए कभी समय नहीं निकाल पाए.

पोंटी के एक करीबी हमें बताते हैं कि पोंटी बचपन में जब पंतग उड़ाते थे तो अक्सर अपनी पतंग कटने से खीज जाते थे. यह बात उन्हें पसंद नहीं थी. एक दिन उन्होंने एक तरीका निकाला, पतंग के साथ वे धातु का एक पतला तार जोड़कर अपनी पतंग उड़ाने लगे. यह तार बिजली के हाई टेंशन तार में उलझ गई. यह रोमांच और जिद उनके ऊपर भारी पड़ी, उनकी जान जाते-जाते बची मगर एक हाथ और दूसरे हाथ की तीन उंगलियां जाती रहीं. इसके बावजूद जिद और रोमांच के खतरे को पोंटी भांप नहीं पाए, इसका नतीजा आज हमारे सामने है.

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सेना बिन सेनापति

जब पार्टी का नाम शिवसेना रखा गया शायद तभी स्पष्ट हो गया था कि आने वाले समय में उसका चाल-चरित्र और चेहरा कैसा होगा, और यह भी कि इसे कौन तय करने वाला है. हर साल की तरह इस बार भी दशहरे के मौके पर शिवसैनिक शिवाजी पार्क में होने वाले उस कार्यक्रम का इंतजार कर रहे थे जिसमें अपने सेनापति की दहाड़ सुनने के बाद उनके सारे संशय मिट जाते थे, यह स्पष्ट हो जाता था कि उन्हें आगे क्या करना है. शिवसैनिक, जिनके लिए बाल ठाकरे के मुंह से निकली एक-एक बात देश के संविधान और कानून से भी ऊपर थी, जिनके लिए ठाकरे ही सत्ता और सम्मान के एकमात्र केंद्र थे, उन्हें उस वक्त घोर आश्चर्य और निराशा हुई जब इस बार दशहरे की रैली में ठाकरे नहीं आए.

कारण बताया गया कि बाला साहब की तबीयत ठीक नहीं है. मगर उन्होंने शिवसैनिकों के लिए वहां अपना संदेश भिजवाया था. पार्क में एक बड़ी स्क्रीन पर ठाकरे का वह वीडियो संदेश प्रसारित किया गया. उस संदेश में जो बाल ठाकरे शिवसैनिकों के सामने मौजूद थे वे उस व्यक्ति से बिल्कुल अलग थे जिसे शिवसैनिक पिछले कई दशकों से देखते और सुनते आए थे. वीडियो में ठाकरे न सिर्फ बेहद कमजोर और थके हुए दिखाई दे रहे थे बल्कि अपने संदेश में शिवसैनिकों को संबोधित करते हुए उन्होंने जो बातें कहीं उनका मोटा अर्थ यह था कि वे अब अपनी जीवन यात्रा के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हैं और आगे उनका साथ नहीं रहेगा. अपने वीडियो संदेश में ठाकरे ने अपने बेटे और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव तथा अपने पोते आदित्य का साथ देने की अपील नहीं बल्कि याचना की. आदेश देने वाले बालासाहब ठाकरे को हाथ जोड़े देखना शिवसैनिकों के लिए चौंकाने वाला था.

आज बाल ठाकरे दुनिया में नहीं हैं. 17 नवंबर को हुए उनके निधन के बाद जैसे-जैसे समय गुजर रहा है, मुंबई, महाराष्ट्र और कुछ हद तक देश के सामाजिक-राजनीतिक गलियारों में ठाकरे के निधन के बाद बनने वाले शून्य एवं प्रभावों की चर्चा गर्म होती जा रही है.

सेनापति बिना सेना का भविष्य
बालासाहब ठाकरे की मृत्यु के बाद जो सबसे बड़ा सवाल चर्चा में है वह यह कि शिवसेना का भविष्य क्या रहने वाला है. पिछले चार दशक से सेना की कमान पूरी तरह से उसे जन्म देने वाले बाल ठाकरे के हाथों में ही रही है. उन्होंने पूरी पार्टी को अपनी व्यक्तिगत सेना के तौर पर चलाया जहां वे आदेश देते और शिवसैनिक उसका किसी भी हद तक जाकर पालन करते. खुद को सत्ता का रिमोट कंट्रोल मानने वाले ठाकरे शिवसेना के पर्याय थे. पार्टी में न कोई चर्चा होती न कोई बहस. पार्टी के अंदर न कोई चुनाव होता और न ही किसी को असहमति जताने का अधिकार था. जो असहमति जताता, पार्टी में नहीं रहता.

बिना किसी संविधान, घोषित कार्यक्रम या नीति वाली उस पार्टी को बाल ठाकरे ने अपने जुबानी आदेशों से चलाया. शिवसेना शायद भारत की एकमात्र ऐसी पार्टी थी जो लंबे समय तक चुनावों में बिना किसी मेनिफेस्टो के जाती थी क्योंकि ठाकरे को घोषणापत्र झूठ के पुलंदे से अधिक कुछ नहीं लगते थे.

क्या जानकार और क्या आम लोग, सभी इस बात को एक सिरे से स्वीकार करते हैं कि शिवसेना के प्रति जो भी आज तक समर्थन रहा है वह पार्टी को नहीं बल्कि बालासाहब ठाकरे के लिए रहा है. ऐसे में सवाल यह है कि ठाकरे के जाने के बाद शिवसेना का भविष्य क्या होगा. पार्टी में कोई ऐसा नेता नहीं है जो बाल ठाकरे के कद के इर्द-गिर्द भी पहुंच सकता हो. न किसी का लोगों पर उस तरह का प्रभाव है और न ही आम जनता बाल ठाकरे की तरह किसी और शिवसैनिक की दीवानी है. राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र जोंधाले कहते हैं, ‘उद्धव ठाकरे को राजनीति में आए एक लंबा समय हो गया है लेकिन अभी भी वे उस मराठी मानुष से संपर्क स्थापित नहीं कर पाए हैं जिसकी राजनीति उनके पिता ने जीवन भर की.’

ऐसा माना जा रहा है कि सीनियर ठाकरे के नेतृत्व का अभाव शिवसेना के लिए घातक साबित होने जा रहा है. जिस आक्रामक नेतृत्व की आदत शिवसैनिकों को है, उसके अभाव में यह संभव है कि बड़ी संख्या में शिवसैनिक शिवसेना छोड़कर राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण की तरफ रुख कर लें. चूंकि राज अपने पूरे व्यक्तित्व, व्यवहार और हाव-भाव में अपने चाचा बाल ठाकरे के काफी निकट हैं, ऐसे में संभव है कि शिवसैनिक राज के साथ हो लें. जानकारों का ऐसा मानना है कि जब पहले छगन भुजबल, नारायण राणे, संजय निरुपम जैसे शिवसैनिक बाला साहब के नेतृत्व के बावजूद शिवसेना छोड़कर बाहर चले गए तो फिर अब तो बाल ठाकरे भी नहीं हैं. हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्य सभा सांसद अनिल देसाई सुरेंद्र की बातों से इत्तिफाक नहीं रखते, ‘उद्धव ठाकरे जी बालासाहब ठाकरे जी के नेतृत्व में सन 95 से काम कर रहे हैं. उनके नेतृत्व में पार्टी ने मुंबई नगरपालिका का चुनाव लगातार चौथी बार जीता है. ऐसे में उनकी क्षमता पर प्रश्न नहीं खड़ा किया जा सकता है.’ वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद शिवसेना पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में कहते हैं, ‘देखिए जिस पार्टी का जन्म ही लोकप्रियता पर हुआ है वह पार्टी अपने करिश्माई नेता के बिना बहुत लंबे समय तक जिंदा नहीं रह सकती.’

क्या राज और उद्धव एक साथ आएंगे
2006 में शिवसेना से अलग होकर बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई. लंबे समय तक दोनों दलों ने एक-दूसरे के प्रति अपनी नफरत दिखाने में कोई कमी नहीं की. उद्धव और राज के बीच चलने वाले जुबानी हमलों के साथ ही दोनों सेनाओं के कार्यकर्ता एक-दूसरे से सड़क पर दो-दो हाथ करने से भी नहीं चूके. लेकिन इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज ने कभी अपने चाचा बाल ठाकरे के बारे में कोई अपशब्द नहीं कहा. हालांकि उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु बाला साहेब तथा चचेरे भाई उद्धव से लंबे समय तक दूरी बनाए रखी. कुछ महीने पहले जब उद्धव ठाकरे की तबीयत खराब हुई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया उस समय बाल ठाकरे ने एक बहुत लंबे अंतराल के बाद राज को फोन किया था. राज के लिए बाल ठाकरे का वह फोन बेहद चौंकाने वाला था. आनन-फानन में वे लीलावती अस्पताल पहुंचे. जब अस्पताल से उद्धव को छुट्टी दी गई तब एक-दूसरे पर जुबानी तेजाब फेंकने वाले राज-उद्धव को एक साथ देखकर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. जुलाई में हुई इस घटना के बाद राज  पिछले महीनों में कई बार मातोश्री गए. बाल ठाकरे और उद्धव से कई बार मुलाकात की. बाल ठाकरे ने पूर्व में कई बार यह इच्छा व्यक्त की कि राज को वापस अपने घर अर्थात शिवसेना में आ जाना चाहिए. अब उनके निधन के बाद और पिछले कुछ महीनों में राज-उद्धव के बीच पिघलती बर्फ के कारण यह संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में दोनों भाई फिर से एक साथ आ जाएंगे.

वहीं दूसरी तरफ जानकारों का एक वर्ग मानता है कि राज को लेकर बालासाहब के मन में एकाएक  ‘उमड़ा प्रेम’ स्वाभाविक नहीं वरन विकल्पहीनता की उपज था. ठाकरे पिछले कुछ समय से उद्धव की खराब तबीयत के कारण काफी चिंतित रहे. उद्धव की सेहत के कारण उन्हें धीरे-धीरे यह महसूस होने लगा कि शायद भविष्य में उद्धव की स्थिति ऐसी न रहे कि वे पार्टी को नेतृत्व दे पाएं. ऐसे में दूसरा उत्तराधिकारी ढूंढ़ना जरूरी है. उद्धव नहीं तो फिर कौन? इस सवाल के साथ जब बाल ठाकरे ने अपनी नजर दौड़ाई तो ठाकरे परिवार के जिस दूसरे व्यक्ति की तरफ उनकी नजर गई उसकी उम्र केवल 23 साल की थी – रिश्ते में उनका पोता आदित्य ठाकरे. आदित्य ठाकरे जिसे कविता और कहानियों का शौक है और जिसे उद्धव इस हिसाब से तैयार कर रहे थे कि वे आगे जाकर राज ठाकरे की काट बनने के साथ ही युवाओं को पार्टी से जोड़ सकेंगे. लेकिन 23 वर्षीय आदित्य की उम्र इतनी नहीं थी कि उसके ऊपर पार्टी की जिम्मेदारी डाली जा सके. ऐसे में बाल ठाकरे को शायद इस बात का अहसास था कि शिवसेना और अपनी पारिवारिक विरासत को अगर आगे बढ़ाना है तो आखिरी विकल्प राज ठाकरे ही हैं.

शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे अपने बेटे उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे के साथ

स्वास्थ्य खराब होने के अलावा एक और बड़ा कारण था जिसकी वजह से बाल ठाकरे उद्धव को लेकर चिंतित थे. 2004 में बाल ठाकरे ने सभी को चौंकाते हुए अपने छोटे भाई श्रीकांत ठाकरे के बेटे राज ठाकरे की जगह उद्धव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. उस वक्त उन्हें उम्मीद थी कि उद्धव न सिर्फ पार्टी की पूरी जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाल लेंगे बल्कि उनके अंदर धीरे-धीरे वह स्टाइल और करिश्मा भी आ जाएगा जो उनके अंदर है और जिसे लोगों ने खूब सराहा है. उन्हें उम्मीद थी कि लोग उद्धव को भी उसी गंभीरता से लेने लगेंगे जैसे उन्हें लेते रहे हैं. उन्हें उम्मीद थी कि वे उद्धव को दूसरा बाल ठाकरे बना देंगे. इसके बाद राज ने शिवसेना छोड़ दी. उस वक्त चौतरफा हुई अपनी आलोचना पर सामना में छपे एक साक्षात्कार में बाल ठाकरे का कहना था, ‘मैं काला चश्मा जरूर पहनता हूं लेकिन मैं धृतराष्ट्र नहीं हूं. मैंने और उद्धव ने उसकी हर बात मानी है. वो फिर भी क्यों चला गया मैं नहीं जानता.’

खैर, राज की जगह उद्धव को तरजीह देने का निर्णय सही साबित नहीं हुआ. बाल ठाकरे की लाख कोशिशों के बाद भी उद्धव अपने पिता जैसे नहीं बन पाए. उद्धव का व्यवहार, उनका व्यक्तित्व अपने आक्रामक पिता से बिल्कुल अलग रहा है. धीरे-धीरे बाल ठाकरे को भी यह समझ में आने लगा कि जिस तरह की उनकी पार्टी है, उसके जो वोटर और समर्थक और उनकी अपेक्षाएं हैं उनके मुताबिक बन पाना उद्धव के लिए संभव नहीं है.
अब बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद शिवसेना के तमाम खैरख्वाहों और राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि यदि उसे महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी जगह बना कर रखनी है तो उसके पास फिलहाल एक ही विकल्प है – राज और उद्धव के बीच सुलह और जुड़ाव. भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपीनाथ मुंडे कहते हैं, ‘मैं चाहता हूं कि राज और उद्धव एक साथ आएं. बालासाहब के सपने को पूरा करना उन दोनों ही की जिम्मेदारी है. महाराष्ट्र को संभालना दोनों की जिम्मेदारी है. स्वेता पारुलेकर, जो कभी राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना में थीं और आज शिवसेना के मुखर नेताओं में से एक हैं, मुंडे की बात का समर्थन करते हुए कहती हैं कि व्यापक हित में दोनों भाइयों को साथ आ जाना चाहिए.

इस दिशा में पारिवारिक स्तर पर शुरुआत भी हो चुकी है. शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के साले और राज-उद्धव के मामा चंद्रकांत वैद्य ने दोनों को फिर से मिलाने की कोशिश शुरू कर दी है. बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार के बाद मिड डे अखबार से बातचीत में 66 वर्षीय चंद्रकांत वैद्य का कहना था, ‘मैं दोनों भाइयों को फिर से मिलाने की पूरी कोशिश करूंगा. मराठी मानुष की खातिर दोनों भाइयों को फिर से एक साथ आना ही होगा. मैंने साहेब से वादा किया है.’

चंद्रकांत वैद्य भले ही साहेब से किए गए अपने वादे के तहत दोनों भाइयों को साथ लाने में जुटे हुए हैं लेकिन सूत्रों की मानें तो निकट भविष्य में दोनों भाइयों के पूरी तरह से एक होने की संभावनाएं लगभग नहीं के बराबर हैं.
शिवसेना की जीवनी ‘द सेना स्टोरी’ लिखने वाले वैभव पुरंदरे, राज और शिव-सेना के बीच मेल-मिलाप के तीन तरह के स्वरूपों की बात करते हैं. पहला- राज और उद्धव में चुनाव पूर्व गठबंधन. दूसरा- चुनाव के बाद होने वाला गठबंधन, जहां कई सीटों पर फ्रेंडली फाइट होगी और एक दल उस जगह पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगा जहां दूसरे का प्रत्याशी मजबूत है. तीसरा- दोनों भाई एक हो जाएं. मगर वैभव यह भी मानते हैं कि तीसरे की संभावना सबसे कम है. सांसद और शिवसेना के वरिष्ठ नेता अनंत कहते हैं, ‘अभी इस विषय पर बात करने का वक्त नहीं आया है. हमने इस बारे में अभी कुछ नहीं सोचा है.’ हालांकि वे इस बात को रेखांकित करते हैं कि राज और उद्धव के बीच अब पहले जैसी कड़वाहट नहीं रही.

मगर राज और उद्धव ठाकरे के एक होने में आखिर इतनी मुश्किलें क्यों हैं? दरअसल राज ठाकरे को पता है कि इस समय उनको शिवसेना की जरूरत नहीं है बल्कि शिवसेना को उनकी जरूरत है. 2006 में शिवसेना से अलग होकर अपनी पार्टी बनाने के बाद राज ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक अच्छी शुरुआत की है. बड़ी संख्या में शिवसैनिक शिवसेना से टूटकर उनकी पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) से जुड़े. पार्टी ने इतने समय में एक मजबूत ढांचा तैयार कर लिया है. दोनों भाइयों के मिलने में अड़चनें तो हैं ही, दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के मिलने में भी हैं. सिर्फ दो ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से राज शिवसेना के साथ जुड़ सकते हैं. पहला यह कि उन्हें ऐसा लगे कि शिवसेना से जुड़कर देर-सवेर पार्टी की कमान उनके हाथ में आ सकती है और वे अपने चाचा बाल ठाकरे की तरह मराठी मानुष की राजनीति कर सकते हैं. उन्हें पता है कि जब तक शिवसेना से वे अलग हैं तब तक मराठी मतों का विभाजन दोनों दलों में हमेशा होता रहेगा. शिवसेना ब्रांड का अपना महत्व भी है. ऐसे में संभव है कि देर सवेर उस ब्रांड को हासिल करने और बाल ठाकरे के जाने के बाद ही सही उनका उत्तराधिकारी बनने का शायद एक ही तरीका है कि वे शिवसेना में शामिल हो जाएं और ऐसी परिस्थितियां निर्मित हों जिससे पार्टी की कमान उनके हाथ में आ जाए.
अगर वे चाह लें तो भी शिवसेना में शामिल होना केवल राज ठाकरे के हाथ में नहीं है. जाहिर-सी बात है कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और क्षमताओं को लेकर उद्धव को भी कोई संशय नहीं रहा होगा जिसके चलते राज ठाकरे की शिवसेना में सम्मानजनक वापसी की संभावना बेहद क्षीण है. और ऐसा न होने की स्थिति में राज के लिए शिवसेना में कुछ नहीं रखा है. जाहिर-सी बात है कि राज कभी भी उद्धव के नेतृत्व में काम करना पसंद नहीं करेंगे. ऐसे में एक और विकल्प यह भी है कि पार्टी में किसी दूसरे को यह न लगे कि उसका महत्व दूसरे से कम है. मगर ऐसी कोई व्यवस्था पार्टी में बना पाना और बनाए रखना बेहद चुनौतीपूर्ण और काफी हद तक असंभव कार्य है.

खैर, एक और संभावना है जिससे राज शिवसेना में शामिल हो जाएं. वह संभावना यह है कि जब परिवार के प्रति प्रेम की भावना राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर भारी पड़ जाए. हालाकि यह भी असंभव जैसा ही है. ऐसे में राज- उद्धव के साथ आने की संभावना लगभग नहीं के बराबर है. लेकिन किसी कारण से यदि ऐसा हो जाता है तो यह शिवसेना के लिए बेहद फायदेमंद होगा. सुरेंद्र कहते हैं, ‘देखिए, अगर दोनों भाई साथ आते हैं तो कम से कम एक चीज तो होगी ही कि शिवसेना अपना राजनीतिक विस्तार करने की सोच सकती है.’ जानकारों का मानना है कि अगर राज ठाकरे शिवसेना के साथ आ गए तो एक तरफ वे बाल ठाकरे के जाने से बना वैक्यूम भर देंगे, वहीं दूसरी तरफ मराठी मानुष की राजनीति का बंटवारा नहीं होगा और न ही शिवसेना के पारंपरिक वोटों का. 2009 के लोकसभा चुनावों में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन को कई सीटों पर एमएनएस के कारण ही हार का सामना करना पड़ा था. सिर्फ मुंबई, ठाणे और नासिक में ही गठबंधन को नौ लोकसभा सीटों पर हार का सामना करना पड़ा. पिछले विधानसभा चुनाव में मुंबई में जहां मनसे को 24 फीसदी वोट मिले थे वहीं शिवसेना को मात्र 18 फीसदी मिले. मुंबई जो शिवसेना का गढ़ रहा है वहां शिवसेना के चार विधायकों के मुकाबले मनसे के छह विधायक जीत कर आए. ऐसे में एक ही संभावना है जो शायद यथार्थ का रूप ले सकती ह,ै वह यह कि दोनों दल राजनीतिक गठबंधन कर लें. लेकिन यह कब होगा, कैसे होगा, होगा भी कि नहीं, इन प्रश्नों का जवाब शायद राज और उद्धव के पास भी नहीं होगा.

नफे-नुकसान का गणित
अगर राज और उद्धव में किसी तरह का सुलह-समझौता नहीं होता है तब क्या होगा? कुमार केतकर कहते हैं, ‘बाल ठाकरे के जाने के बाद शिवसेना को कमजोर होने से कोई नहीं बचा सकता. हां, कुछ लोग लगातार शिवसेना में बने रहेंगे और बाला साहब की छवि और नाम का प्रयोग करते हुए अपनी राजनीति जिंदा रखने की कोशिश करेंगे. वहीं कुछ राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की तरफ रुख कर लेंगे. बाकी एनसीपी से डील करते हुए नजर आएंगे. और कुछ गिनती के कांग्रेस की ओर भी जाते हुए दिखाई दे सकते हैं.’

जानकारों की राय में ठाकरे के निधन का अगर सबसे अधिक राजनीतिक लाभ किसी को मिलने वाला है तो वे राज ठाकरे हैं. उनके अलावा दूसरी पार्टी जिसे सबसे अधिक राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना है वह शरद पवार की एनसीपी है जिसे लेकर कहा जा रहा है कि बड़ी संख्या में नेता और कार्यकर्ता एनसीपी से जुड़ सकते हैं. एनसीपी भी पूरे राज्य में अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए काफी आक्रामक तौर पर काम कर रही है. ऐसे में उसकी नजर शिवसेना के उन नेताओं (खासकर विधायक) पर है जो 2014 के लोकसभा और उसके बाद के विधानसभा चुनाव में उसे और मजबूत कर सकते हैं. ठाकरे की मृत्यु के बाद महाराष्ट्र के सारे बड़े अखबारों में बाला साहब को दिए गए पूरे पन्ने के श्रद्धांजलि वाले विज्ञापनों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है. राजनीति के इतिहास में यह पहली बार था जब एक राजनीतिक पार्टी ने दूसरी राजनीतिक पार्टी के किसी व्यक्ति के निधन पर इस तरह से अखबारों में विज्ञापन देकर शोक व्यक्त किया हो. सूत्र बताते हैं कि अखबार में विज्ञापन देने के पीछे मकसद था महाराष्ट्र और खासकर मुंबई के शिवसेना समर्थकों तक अपनी बात पहुंचाना. उन्हें यह अहसास दिलाना कि वे एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं जिसमें एनसीपी भी शामिल है.  

भाजपा-शिवसेना संबंध

भाजपा और शिवसेना के संबंधों की बात करें तो भले ही यह बेहद पुराना हो लेकिन संबंधों का संतुलन हमेशा शिवसेना की तरफ ही झुका रहा. एक राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद भाजपा महाराष्ट्र में शिवसेना के जूनियर पार्टनर के तौर पर ही नजर आई. महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन बाल ठाकरे के इच्छानुसार ही चला. यहां तक कि शिवसेना सुप्रीमो ने पिछले दो राष्ट्रपति चुनावों में भाजपा को शर्मिंदा करने में

कोई कसर बाकी नहीं रखी. साथी वे भाजपा के थे लेकिन जब 2007 के राष्ट्रपति चुनावों में भैरोसिंह शेखावत राष्ट्रपति पद के लिए खड़े हुए तो शिवसेना ने उन्हें वोट देने के बजाय मराठी मानुष कार्ड खेलते हुए प्रतिभा पाटिल का साथ दिया. 2012 में जब भाजपा ने पीए संगमा को राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन दिया उस समय शिवसेना प्रणब मुखर्जी की काबिलियत की कायल हो गई.

खैर, ये सब इतिहास की बातें हैं. यहा राजनीतिक हिटलरगर्दी उस शख्स के बूते की बात थी जो शेर कहलाना और दिखना पसंद करता था. जिसे हिटलर पसंद था और जिसे लोकतंत्र के बजाय तानाशाही में राष्ट्र का सुनहरा भविष्य दिखता था. वह कद और तबीयत किसी और शिवसैनिक में नहीं है. ऐसे में यह तो कहा जा सकता है कि शिवसेना के आदेश देने के दिन अब लद गए. दूसरी तरफ ये भी खबरें आ रही हैं कि भाजपा राज ठाकरे को भी लुभाने में जुटी है. पार्टी को पता है कि बाल ठाकरे के जाने के बाद उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में भविष्य में कुछ करिश्मा करने की क्षमता अगर किसी में है तो वह राज ठाकरे ही है. राज ने भी अपनी तरफ से कदम बढ़ा दिया है. गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी की लगातार तारीफ और मोदी की सद्भावना यात्रा पर मोदी की तरफ से राज को मिले विशेष निमंत्रण को राजनीतिक गलियारों में भविष्य में साथ आने के एक मजबूत लक्षण के रूप में देखा जा रहा है.