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सबसे बड़ी अदालत में पैरवी के पेंच

न्याय व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने के मकसद से न्यायिक सुधारों की बात चल रही है. न्यायाधीशों की जवाबदेही तय करने के लिए न्यायिक जवाबदेही विधेयक लाने की बात भी हो रही है. लेकिन देश की सर्वोच्च अदालत की स्थितियां देखी जाएं तो साफ लगता है कि सुधार की जरूरत सिर्फ जजों के स्तर पर नहीं बल्कि वकीलों के स्तर पर भी है.

सभी वकीलों को उच्चतम न्यायालय में मुकदमा लड़ने का अधिकार देने वाला कानून एडवोकेट्स ऐक्ट (अधिवक्ता अधिनियम) 1961 में बना था. इस कानून की धारा 30 के तहत सभी वकीलों को बगैर किसी भेदभाव के देश के सभी अदालतों में वकालत करने का अधिकार देने का प्रावधान किया गया था. लेकिन 50 साल बाद भी यह अधिकार दूर की कौड़ी बना हुआ है. इसकी वजह यह है कि 50 साल तक तो इस धारा से संबंधित अधिसूचना जारी नहीं हुई. काफी जद्दोजहद के बाद 2011 में अधिसूचना तो जारी हो गई मगर एक और नियम के पेंच में फंसकर मसला वहीं का वहीं है. यानी सर्वोच्च न्यायालय में बगैर भेदभाव के सभी वकीलों को मुकदमा लड़ने का अधिकार अब तक नहीं मिला है. इसके चलते यहां वकीलों की एक खास श्रेणी का एकाधिकार बना हुआ है. कानून के जानकार बताते हैं कि इस वजह से देश की सर्वोच्च अदालत में वकीलों के स्तर पर कई तरह की गड़बड़ियां हो रही हैं. सम्मानपूर्वक वकालत करने के अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट के हजारों वकील कानूनी संघर्ष कर रहे हैं.

उच्च न्यायालय तक के स्तर तक कोई भी वकील मुकदमा पेश कर सकता है और उसकी पैरवी कर सकता है. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में आपको किसी एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के रूप में पंजीकृत वकील को ही अपना वकील नियुक्त करना होगा. एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड अदालत और आपके बीच का माध्यम होता है. सिर्फ वही अदालत में कोई मुकदमा या आवेदन, दस्तावेज, जवाब आदि पेश कर सकता है. यदि उसी मुकदमे में आपकी तरफ से कोई दूसरा वकील भी बहस के लिए उपस्थित होने वाला है तो उसकी सूचना अदालत को लिखित में आपका एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड ही देगा.

लेकिन ऐसा क्यों है? इसे समझने के लिए उच्चतम न्यायालय के गठन और यहां वकालत करने के नियमों की पृष्ठभूमि जानना जरूरी है. ब्रिटिश राज के दरम्यान काफी समय तक भारत में सर्वोच्च अदालत जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी. भारत से संबंधित मामलों में आखिरी न्यायिक फैसले का अधिकार ब्रिटेन स्थित ज्यूडिशियल कमिटी ऑफ प्रिवी काउंसिल के पास था. इसके काम-काज के लिए पहले 1920 में एक कानून बना और बाद में फिर 1925 में एक कानून बनाया गया. इसके तहत ‘एजेंट’ की व्यवस्था कायम की गई. इस व्यवस्था के तहत होता यह था कि जिसका भी मुकदमा सुनवाई के लिए लंदन जाता था उसका वकील वहां एक ‘एजेंट’ नियुक्त करता था. आसान शब्दों में समझें तो यह ‘एजेंट’ प्रिवी काउंसिल और वकील के बीच की कड़ी होता था. कोई भी दस्तावेज न्यायालय को देना हो या फिर न्यायालय को कोई सूचना संबंधित वकीलों तक पहुंचानी होती थी तो इसका माध्यम ‘एजेंट’ था.

कानून के जानकार बताते हैं कि इस वजह से देश की सर्वोच्च अदालत में वकीलों के स्तर पर कई तरह की गड़बड़ियां हो रही हैं

1937 में भारत में फेडरल कोर्ट की स्थापना हुई. यह दिल्ली में था. उस वक्त दिल्ली में किसी उच्च न्यायालय की कोई पीठ नहीं थी, इसलिए यहां नए सिरे से बार के गठन की जरूरत महसूस की गई. इसके बाद फेडरल कोर्ट ने खुद ही अपने नियम बनाए और वकीलों को तीन श्रेणियों में बांटा–सीनियर एडवोकेट, एडवोकेट और एजेंट. इसमें एजेंट की भूमिका वही रखी गई जो प्रिवी काउंसिल में थी. आजादी के बाद फेडरल कोर्ट को प्रिवी काउंसिल के सारे अधिकार दे दिए गए.

28 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान के अंतर्गत दिल्ली में ही सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई. संविधान के अनुच्छेद 145 के तहत उच्चतम न्यायालय को अपने काम-काज के संचालन के लिए नियम बनाने का अधिकार दिया गया है. इसी अधिकार के तहत शीर्ष अदालत ने 1950 में ‘सुप्रीम कोर्ट रूल्स’ बनाए. वकीलों के काम-काज के लिए यहां भी फेडरल कोर्ट के नियमों को आधार मानकर फेडरल कोर्ट के सारे एजेंटों को सुप्रीम कोर्ट ने भी एजेंट का दर्जा दे दिया. गौरतलब है कि उस समय भी यह व्यवस्था कायम रखी गई कि न तो एजेंट वकील का काम कर सकता है और न ही वकील एजेंट का काम कर सकता है. 1951 में फिर एक कानून बना जिसके जरिए सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे वकीलों को उच्च न्यायालयों में वकालत करने की भी अनुमति दे दी गई. 1954 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने नियमों में संशोधन किया और ‘एजेंट’ का नाम बदलकर ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ कर दिया. दरअसल उस वक्त कई लोग यह मांग उठा रहे थे कि एजेंट शब्द सुनने में अच्छा नहीं लगता इसलिए इसे बदला जाए. इस संशोधन के जरिए एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को वकीलों वाले अधिकार यानी मुकदमा लड़ने का अधिकार भी मिल गया. लेकिन वकीलों को एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड का अधिकार नहीं मिला. इसके बाद 1958 में लॉ कमीशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट आई जिसमें यह सिफारिश की गई कि भारत के हर वकील को हर कोर्ट में वकालत करने का अधिकार दिया जाना चाहिए. इस सिफारिश के आधार पर संसद ने 1961 में एडवोकेट्स एेक्ट बनाया. इसकी धारा 30 के तहत हर वकील को देश की हर अदालत में वकालत करने का अधिकार देने का प्रावधान किया गया. लेकिन 50 साल से अधिक वक्त गुजरने के बावजूद इस प्रावधान को अब तक लागू नहीं किया जा सका है. इसकी वजह यह रही कि कानून बनाने के 50 साल बाद भी पहले तो सरकार ने इसकी अधिसूचना जारी नहीं की. पिछले साल अधिसूचना जारी हुई भी तो इसके बाद मामला एक और कानूनी पेंच में अटका हुआ है.

अपने इस अधिकार को हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने जो संस्था बनाई है उसके एक प्रमुख सदस्य रवि शंकर कुमार आरोप लगाते हैं, ‘धारा 30 की अधिसूचना जारी करने में सरकारों ने तो हीलाहवाली की ही लेकिन सबसे नकारात्मक भूमिका रही सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड की. उनका आरोप है कि इस धारा के लाभ से देश भर के वकीलों को वंचित रखने के लिए एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन तरह-तरह के हथकंडे अपनाती रही है.’

इस बीच 1985, 1988 और 2003 में कम से कम तीन मौके ऐसे आए जब सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान पर टिप्पणी करके इस ओर कार्यपालिका का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश की. इसके बावजूद उस प्रावधान को लागू करने की दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई. 19 अप्रैल, 2011 को वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के उस समय के अध्यक्ष राम जेठमलानी ने कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली को पत्र लिखकर उस प्रावधान की अधिसूचना जारी करने का अनुरोध किया. इस पत्र में जेठमलानी ने लिखा था, ‘देश में वकालत करने वाले सभी लोगों को इस बात पर घोर आपत्ति है कि कानून पारित होने के 50 साल से अधिक वक्त गुजरने के बावजूद धारा 30 लागू नहीं की गई. यह संसद का अपमान है और कानूनी पेशे का गंभीर नुकसान है.’ उन्होंने आगे लिखा, ‘आपके रूप में एक ऐसा कानून मंत्री है जिसने खुद वकालत की है. इसलिए आपसे मुझे यह उम्मीद है कि आप इन आपत्तियों की कानूनी वैधता को समझेंगे और बगैर समय गंवाए इस बारे में जरूरी कदम उठाएंगे.’

जेठमलानी की चिट्ठी के बाद कानून मंत्रालय हरकत में आया और दो महीने के भीतर भारत सरकार ने धारा 30 लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी. तारीख थी नौ जून, 2011. अधिसूचना में कहा गया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा-30 को 15 जून, 2011 से लागू किया जाता है. इसके बाद 1966 के सुप्रीम कोर्ट रूल्स का वह नियम अप्रासंगिक हो गया जिसके तहत एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को विशेष अधिकार दिए गए थे. इसके तहत सीनियर एडवोकेट और अन्य एडवोकेट को सुप्रीम कोर्ट में वकालत का अधिकार तो था लेकिन वे कोई मुकदमा खुद दायर नहीं कर सकते थे और इसके लिए उन्हें एडवोकेट ऑन रिकॉर्डस का सहारा अनिवार्य तौर पर लेना था. जबकि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड मुकदमा दायर करने के अलावा खुद ही उसकी पैरवी भी कर सकते थे

धारा 30 को लागू करवाने के लिए संघर्षरत वकीलों का आरोप यह भी है कि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड का दर्जा देने की प्रक्रिया में भी कई खामियां हैं

अधिसूचना के बाद मसला हल हो जाना था. लेकिन समस्या जस की तस है. सवाल उठता है कि अधिसूचना जारी होने, हजारों वकीलों के संघर्षरत रहने और इस व्यवस्था में इतनी खामी होने के बावजूद नई व्यवस्था क्यों नहीं कायम हो रही है? इस बारे में बात करते हुए रवि शंकर कुमार कहते हैं, ‘आधिकारिक वजह यह है कि धारा-30 लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट रूल्स में संशोधन करना अनिवार्य है और इसके लिए संबंधित सुझावों को रूल्स कमिटी के पास भेजा गया है. लेकिन अनाधिकारिक वजह यह है कि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन अब भी इस बात को लेकर सक्रिय है कि किसी भी तरह इसे लागू नहीं होने दिया जाए ताकि उसका एकाधिकार बना रहे. यही वजह है कि अधिसूचना जारी होने के बाद नौ महीने से अधिक वक्त गुजरने के बावजूद अब तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है.’

मुकदमा दायर करने के मामले में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के एकाधिकार की वजह से कई तरह की दिक्कतें पैदा हो रही हैं. कुमार कहते हैं, ‘कई मौकों पर अदालत ने इस बात को स्वीकार किया है कि इस श्रेणी के वकील याचिका पर दस्तखत करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ले रहे हैं और इसका नतीजा यह हो रहा है कि याचिका दायर करने वाले, उसके वकील और अदालत के बीच में कई मामलों में खाई पैदा हो रही है. मुकदमों को लेकर किसी जिम्मेदारी का अहसास एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड में नहीं रह रहा है.’ इसका खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ रहा है जो न्याय की आस में उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हैं. भारतीय संविधान के तहत हर नागरिक को समान न्याय और अपनी पसंद का वकील रखने का अधिकार मिला हुआ है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के नियम इस अधिकार के आड़े आ रहे हैं. क्योंकि मौजूदा व्यवस्था के तहत न चाहते हुए भी लोगों को एक एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के पास जाना पड़ रहा है, भले ही वह मुकदमा लड़े या नहीं. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट से न्याय हासिल करने में उन पर दोहरा आर्थिक बोझ भी पड़ रहा है. उन्हें पहले तो अपनी पसंद के वकील को फीस का भुगतान करना पड़ रहा है और तकनीकी वजहों से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को भी पैसा देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है.

धारा-30 को लागू करवाने के लिए संघर्षरत वकीलों का आरोप यह भी है कि एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड का दर्जा देने की प्रक्रिया में भी कई खामियां हैं. एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के तौर पर खुद को पंजीकृत करवाने के लिए वकीलों को एक लिखित परीक्षा से गुजरना पड़ता है जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति लेती है. कुमार कहते हैं, ‘इस समिति के कई सदस्य ऐसे हैं जो दशकों से अपने पद पर बने हुए हैं. इस प्रक्रिया की एक सबसे बड़ी खामी यह है कि समिति के सदस्यों की नियुक्ति के लिए कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं हैं. बुक कीपिंग और अकाउंट्स जैसे कई ऐसे विषयों की परीक्षा ली जाती है जिनकी अब कोई प्रासंगिकता नहीं है.’ इन वकीलों का आरोप है कि इन खामियों की वजह से एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की नियुक्ति में मनमानी चल रही है और परीक्षा की पूरी प्रक्रिया में कहीं कोई पारदर्शिता नहीं है. उनका दावा है कि अगर इस परीक्षा की जिम्मेदारी किसी निष्पक्ष एजेंसी को दे दी जाए तो आधे से अधिक एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड फेल हो जाएंगे. इन वकीलों का यह भी आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में जो चैंबर एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को आवंटित किए गए हैं उन्हें किराये पर चढ़ाकर कमाई की जा रही है. उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के नियमों के मुताबिक दस चैंबरों में से सात एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को, एक वरिष्ठ वकील को और दो अन्य वकीलों को आवंटित करने का प्रावधान है. इस नियम की वजह से अधिक चैंबर एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के पास हैं. कुमार कहते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाले वकीलों की कुल संख्या तकरीबन 10,000 है. वहीं सर्वोच्च अदालत में अब तक करीब 2,000 एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बने हैं. इनमें से बमुश्किल अभी 1,200 एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट में सक्रिय हैं. इस तरह से देखा जाए तो देश की सबसे बड़ी अदालत में मुकदमा लड़ने का रास्ता इन्हीं 1,200 लोगों के हाथों से होकर जाता है.’

‘लाल झंडों का एक होना संभव नहीं है’

पार्टी के महाधिवेशन के दौरान निकले जुलूस में समर्थकों की भारी संख्या, उनके जज्बे और अनुशासन ने लोगों को हैरान किया. यह ताकत चुनावी राजनीति में क्यों आपके पक्ष में नहीं बदल पा रही?

 यह सही है कि चुनावी राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टी और बाकी वाम दलों का प्रदर्शन जिस तरह का होना चाहिए, वह नहीं हो पा रहा. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी का काम सिर्फ चुनावी परिणामों से ही नहीं मापा जा सकता. लोगों को संगठित करने, समस्याओं पर उन्हें उतारने, संघर्ष के लिए उन्हें तैयार करने की शक्ति पार्टी में आज भी बरकरार है. बेशक कुछ विभेदकारी आंदोलनों ने मसलन संप्रदायवाद, जातिवाद, प्रादेशिकता की राजनीति आदि ने क्षति पहुंचाई है, लेकिन हम देख रहे हैं कि एक बार फिर नवयुवक पार्टी की तरफ आ रहे हैं. अब कम्युनिस्ट पार्टी में सिर्फ सफेद बाल- दाढ़ीवाले नहीं दिख रहे हैं. उम्मीद है कि दो-एक वर्षों में पार्टी फिर उठ खड़ी होगी.

यह तो अपनी कमी का दोष दूसरे पर मढ़ना हुआ कि क्षेत्रवाद, जातीयता, सांप्रदायिक राजनीति ने कमजोर कर दिया!

 हमारी कमी यही रही कि हम इन सबके खिलाफ सही रणनीति के साथ संघर्ष नहीं कर सके.

आप आंदोलनों में उम्मीद देख रहे हैं. देखा गया है कि कम्युनिस्ट पार्टियों ने रूस, चीन, क्यूबा आदि में युवा अवस्था में ही क्रांति की. भारत में कम्युनिस्ट पार्टी अब 90 पार की है और समाजवाद अब भी  सपना…!

भारत उन देशों की तरह नहीं है. यहां की भाषा, संस्कृति, जाति, मजहब, जीवनशैली आदि में व्यापक विविधता है. इसमें कई विभेदकारी तत्व भी हैं इसलिए यहां वैसी क्रांति संभव नहीं और उन देशों की तरह कम समय में तो कतई नहीं.

बुरे वक्त में एक बार फिर से वाम दलों के एकीकरण की बात कही जा रही है.

एकीकरण से अगर आपका अभिप्राय एक हो जाने का है तो हम समझते हैं कि उस तरह के एकीकरण की फिलहाल कोई संभावना नहीं है. लेकिन ज्वाइंट एक्शन, जनता के मसले पर आंदोलन, जनविरोधी नीतियों का विरोध आदि हम दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां साथ मिलकर करंे, जिसकी बहुत जरूरत है.

बंगाल में सीपीएम श्रेष्ठताबोध की राजनीति करती है. बिहार में भाकपा माले खुद को श्रेष्ठ मानती है. एक-दूजे का स्पेस मारने की होड़ है. क्या ऐसी राजनीति करते हुए वाम दलों में साझे अभियान की गुंजाइश है?

जब तक ये पार्टियां अलग-अलग हैं, तब तक चुनावी अखाड़े में कई बार एक-दूसरे की दुश्मन बनकर भी उतरती रहेंगी. वे भी लाल झंडे लेकर उतरते हैं, हम भी. लोगों में लाल झंडे को लेकर भ्रम भी होता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. हम चाहते हैं कि टकराव कम हो.

महाराष्ट्र के जैतापुर में आप परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे हैं और तमिलनाडु के कोडनकुलम में इसे शीघ्र शुरू करने की मांग कर रहे हैं. यह द्वंद्व क्यों?

यह सही है कि तमिलनाडु में सीपीआई और सीपीएम दोनों यह चाहते हैं कि अगर न्यूक्लियर पावर प्लांट तमाम सुरक्षा उपायों के साथ शुरू हो तो कोई हर्ज नहीं है. लेकिन इसे लेकर अभी भी एक राय नहीं है. जो फंडामेंटलिस्ट हैं वे समझते हैं कि परमाणु ऊर्जा होनी ही नहीं चाहिए. कुछ समझते हैं कि हर किस्म की सावधानी बरतने के बाद यदि हो तो कोई दिक्कत नहीं. इसके बारे में एक राय नहीं बन सकी है. लेकिन इस संबंध में एक राय है कि जोर-जबरदस्ती सरकार ना करे. स्थानीय लोगों की राय को तरजीह दे.

 

संघर्ष और आंदोलन ही यदि आपकी ताकत है तो हिंदी पट्टी में पिछले कई सालों से संभावनाओं के बावजूद आप कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं खड़ा कर पा रहे?

मैं इसे स्वीकारता हूं. हम भी उसी बात पर मंथन कर रहे हैं कि जन आंदोलन क्यों नहीं खड़ा कर पा रहे हैं.

वाम दलों की एकजुटता के अलावा किसी और मोर्चे की बात भी की जा रही है?

मैं तीसरे मोर्चे जैसी किसी अवधारणा विरोध करता रहा हूं. इस तरह के मोरचे में कई दफा यही होता है कि कुछ विरोधी पार्टियां एक जगह बैठती हैं और कुछ सीटों का आदान-प्रदान कर लेती हैं. उसमें जनता की समस्याएं कहां हैं, उसमें क्या भूमिका होगी, इन बातों पर चर्चा नहीं होती. कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर कुनबा बनाने के पक्ष मंे मैं नहीं हूं. इसलिए तीसरा मोर्चा न कहते हुए वाम जनवादी मोर्चे की बात कर रहे हैं जिसके मिलान का आधार संघर्ष होगा. तब जनता को विश्वास होगा कि ये हमारे सवालों पर लड़ने वाले हैं. वरना यह संदेश साफ जाएगा कि सारी लड़ाई सत्ता के लिए ही है.

क्या यह भी मानें कि आगे सत्ता के लिए ही कोई वैकल्पिक मोर्चा जैसा बनता है तो आप उसमें शामिल नहीं होंगे?

जब बनेगा, तब देखेंगे.

हालिया चुनाव में गोवा में भाजपा के टिकट से छह ईसाई विधायक बने. पंजाब में अकालियों ने हिंदुओं को टिकट दिया और वे अच्छी संख्या में जीते भी. यह एक नयी परिघटना मानी जा रही है. क्या राजनीति में सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के मसले की प्रासंगिकता कम हो रही है?

सिर्फ चंद ईसाइयों को गोवा में भाजपा द्वारा टिकट देने से या पंजाब में चंद हिंदुओं को अकालियों द्वारा टिकट देने से उनका जो सांप्रदायिक चरित्र है, वह बदलता नहीं है. वैसे तो भाजपा में भी केंद्रीय स्तर पर दो-चार मुसलमान दिखते ही हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि वे हिंदू-मुसलमान या मंदिर-मस्जिद में झगड़ा नहीं लगाएंगे. वे तो लोगों को लड़ाने के लिए हर मौके की तलाश में लगे रहते हैं. उनकी राजनीति की यही मूल रणनीति भी है और वे समझते हैं कि उनके वोट बैंक का आधार भी यही है.

आपने क्षेत्रवाद की बात की. लेकिन अब तो उसी का जोर है. ममता सिर्फ बंगाल सोचती हैं, नरेंद्र मोदी सिर्फ गुजरात, नीतीश सिर्फ बिहार आदि-आदि. राष्ट्रीय राजनीति तो हाशिये पर है. भविष्य में इसका असर कैसा होगा?

क्षेत्रीय राजनीति में और क्षेत्रीय पार्टियों की इन भावनाओं के पीछे कुछ आंशिक सत्य भी है. केंद्र का दोहरा रवैया अपनाने से ऐसा होता है. कुछ यह भी सच है कि पूंजीवादी व्यवस्था में विकास हमेशा असमतल होता है. महाराष्ट्र को ही देखिए. विदर्भ और मराठवाड़ा अपने हाल में रह गए लेकिन मुंबई में सारा विकास हो गया. यह पूंजीवादी विकास का मार्ग है, इसकी वजह से क्षेत्रीय पार्टियों का और क्षेत्रवाद का उभरना स्वाभाविक है. लेकिन यह पूरी तरह सच भी नहीं है. मैं यह चाहता हूं कि ये जो क्षेत्रीय पार्टियां हैं, वे सारे देश के हित और स्वार्थ को भी ध्यान में रखें. कटु भावनाएं पैदा न करें. बिहारी-बंगाली न करें.

चीन के समाजवादी माडॉल पर क्या कहेंगे?

चीन तो कभी हमारा माॅडल रहा ही नहीं है. हमने तो बहुत पहले ही उसे खारिज कर दिया था. एक समय में पार्टी में बात चली थी कि रूस या चीन का मार्ग अपनाया जाए लेकिन तभी हम लोगों ने मजबूती के साथ कहा था कि न हमको उनका मार्ग अपनना है न इनका. हमें अपने देश के इतिहास, उसकी खूबसूरती, आंदोलन आदि के आधार पर ही आगे बढ़ना है.

देखा तो यह जा रहा है कि कट्टर माओवादी धारा ने लोकतांत्रिक वामपंथ को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया!

आप बिल्कुल सही कह रहे हैं. बंदूक की नोक पर लोग समाजवाद की ओर अग्रसर नहीं होंगे बल्कि यह चेतना और जनजागृति के आधार पर ही संभव होगा. अब हो यह रहा है कि वे एक बंदूक दिखाते हैं तो शासक दल जवाब में दस बंदूक निकालते हैं. दोनों के बीच में लोगों पर दमन बढ़ता है.

झारखंड जैसे राज्य में तो दो दर्जन माओवादी संगठन बन गए हैं. क्या आप मानते हैं कि माओवादियों का चरित्र भी कई जगह अपराधियों जैसा होता जा रहा है?

यह डीजेनेरेशन की प्रक्रिया है. आप लोगों के हाथ में बंदूक थमा देंगे और यह भावना पैदा कर देंगे कि बंदूक की नोक पर सब होता है तो इससे आगे चलकर फिरौती, डकैती, अपहरण, धमकी, वसूली आदि की प्रवृत्तियां पैदा होंगी ही.

मीडिया से वाम दलों को बहुत शिकायत रहती है, लेकिन कहीं न कहीं मीडिया आज एक ताकत के रूप में है. आपके पास लाखों कैडर हैं. बड़ा संगठन है. क्यों नहीं अपना वैकल्पिक मीडिया खड़ा कर पा रहे हैं?

मीडिया की भूमिका बहुत बड़ी है और बढ़ी भी है. लेकिन यह भी सच है कि मीडिया में अब कॉरपोरेट घराने आगे आ गए हैं. मीडिया की जो स्वतंत्रता थी, धीरे-धीरे उसका क्षय हो रहा है. रही बात हमारी तो इस वक्त हमारे पांच दैनिक चल रहे हैं पांच राज्यों में. हिंदी इलाके में एक भी नहीं है, यह अफसोस की बात है. हम चाह रहे हैं कि वहां भी एक दैनिक शुरू करें.

हिंदी इलाके में तो पार्टी का अस्तित्व ही दांव पर लगा दिखता है.

हां यह सही है, लेकिन हमने अपना सम्मेलन इस बार हिंदी इलाके के गढ़ पटना में किया है तो इसे भी एक कदम ही मानिए. हिंदी इलाके में कम्युनिस्ट को बढ़ाने के लिए प्लान और संकल्प दोनों है. 

आरोप लग रहे हैं कि बिहार में सम्मेलन होने के बावजूद सीपीआई बिहार के ठोस मुद्दे इसलिए नहीं उठा रही क्योंकि कल को नीतीश यदि भाजपा का साथ छोड़ेंगे तो आप साथ होंगे.

नहीं, ऐसा नहीं होगा. कम्युनिस्ट पार्टी अपने दम पर, अपनी शक्ति जुटाकर पुराने तेवर में आएगी.

 

लाली बचाने की अकुलाहट में लाल

 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के महासचिव बनाए जाने की घोषणा के ठीक बाद एस सुधाकर रेड्डी मीडिया से रूबरू होने बैठे. सहज सवालों का सिलसिला शुरू हुआ. मसलन, एकताबद्ध आंदोलन चलाने में वाम दलों के लिए क्या परेशानियां फंसती हैं? अगर किसी अन्य पार्टी के साथ मिलकर फ्रंट बनाना चाहते हैं तो ऐसे एक-दो दलों के संभावित नाम भी बताएं जो कांग्रेस अथवा भाजपा के खेमे में न हों, क्षेत्रवाद, जातिवाद से परे राजनीति कर रहे हों और आपके साथ आने को तैयार भी हों? हिंदी इलाके में आपके पास कभी बड़ा आकाश था, अब टिमटिमाते तारे हैं, क्या तैयारी है?

पता नहीं क्यों, इन सहज सवालों से ही रेड्डी असहज-से होते गए. हर सवाल के बाद बगल में बैठे पार्टी नेता अतुल कुमार नए महासचिव के कान में कुछ फुसफुसाते और रेड्डी जवाब दे देते. किसी बच्चे की तरह, जिसे गाय, नदी, हमारा देश आदि पर भाषण रटा दिया जाता है और स्कूल में वह बच्चा चढ़ती-उतरती सांस में उसे जल्दी-जल्दी बोलकर निश्चिंत-सा हो जाता है.

इस प्रसंग के जिक्र का आशय यह कतई नहीं कि भारत की सबसे पुरानी वामपंथी पार्टी का महासचिव बन जाने के बाद भी सुधाकर रेड्डी में राजनीति के ऐसे मसलों की अभी समझ नहीं आ सकी है. भाकपा के कैडर-कार्यकर्ताओं के अलावा अन्य लोग भी जानते और मानते हैं कि रेड्डी कुशल संगठनकर्ता रहे हैं. पिछले चार साल से वे एबी बर्धन के साथ उपमहासचिव के तौर पर पार्टी में काम करते रहे हैं. पार्टी में उनका योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है. लेकिन यह प्रसंग इसका एक इशारा जरूर दे देता है कि खुद में बदलाव लाकर मजबूती की तरफ बढ़ने की इच्छा के बावजूद वाम दलों के पास कोई स्पष्ट खाका नहीं है कि यह होगा कैसे.

27 से 31 मार्च तक पटना में चले भाकपा के 21वें महाधिवेशन में ये संकेत कई बार दिखे. भाकपा, माकपा, आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक और भाकपा माले के शीर्षस्थ नेताओं द्वारा छेड़े गए राग के बाद भाकपा नेता रटते रहे कि अब सभी वामदल एकताबद्ध संघर्ष करेंगे, आंदोलन करेंगे, खोई ताकत वापस पाएंगे. नई जमीन तलाशेंगे. लेकिन यह सब होगा कैसे, इसका कोई स्पष्ट खाका पेश किए बगैर महाधिवेशन निपट गया.

भाकपा के महाधिवेशन में तो फिर भी एकता की बात हुई. सभी प्रमुख वामदल एक मंच पर दिखे भी. लेकिन इसके चार दिन बाद ही केरल के कोझीकोड़ में एकता का यह राग टूटता-सा दिखा. मौका था सबसे बड़ी सत्ताधारी वाम पार्टी माकपा के 20वें महाधिवेशन का. माकपा महासचिव प्रकाश करात यह भूल गए कि चार दिन पहले ही हिंदी पट्टी के अहम गढ़ पटना में भाकपा, आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक औप भाकपा माले के शीर्षस्थ नेताओं के साथ उन्होंने मंच पर हाथ उठाकर कहा था कि सब भेद भुलाकर वे एकता दिखाएंगे. लेकिन अपनी पार्टी के महाधिवेशन में उन्होंने भाकपा माले जैसी पार्टी को न्योता नहीं दिया. यह जानते हुए भी कि पिछले दो दशक से माले ही बिहार-झारखंड में वामदलों का मुख्य चेहरा बनी हुई है और अपने तरीके से संघर्षरत भी है. जानकारों के मुताबिक यह बात भाकपा माले के नेता को न्यौता देने से ज्यादा नजरिये की है. देश के अलग-अलग हिस्से में कई छोटे-बड़े वाम दल अपने तरीके से राजनीतिक आंदोलन चला रहे हैं और जमीन भी तैयार कर रहे हैं. भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य कहते हैं, ‘बंगाल-केरल में सत्ता गंवाने के बाद अब तो माकपा को संकीर्ण नजरिया बदलकर दादागिरी को कम करना चाहिए ताकि एकताबद्ध होने के द्वार खुल सकें.’

फिलहाल वाम दलों ने चुनावी राजनीति में लगातार अपनी जमीन गंवाई है. आगे अंधेरा दिख रहा है. बहुत हद तक इसीलिए दोनों प्रमुख वामदलों में लाल झंडे की लाली बचाए रखने की अकुलाहट और बेचैनी भी परवान पर दिख रही है. लेकिन दोनों दल आज भी आगे की रपटीली राह पर चलने के लिए दुविधा और असमंजस से बाहर नहीं निकल पा रहे. न ही वे अपनी कमजोरियों के आकलन में ईमानदारी दिखा पा रहे हैं.

पटना के भाकपा अधिवेशन में जब आगे संघर्ष के जरिए रास्ता तलाशने की बात हुई तो इसका जवाब नहीं तलाशा जा सका कि जिस बिहार में कभी भाकपा के 30 से अधिक विधायक हुआ करते थे, वहां अपनी किन-किन गलतियों की वजह से अब पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई है. हिंदी पट्टी के सबसे बड़े गढ़ उत्तर प्रदेश में 2002 के बाद से वाम दल खाता भी क्यों नहीं खोल पा रहे हैं. भाकपा ने अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में यह भी याद नहीं किया कि कभी उत्तर प्रदेश में उनकी इतनी पकड़ हुआ करती थी कि 1989 में जब राम मंदिर मुद्दे पर भाजपा उफान मचा रही थी तब भी फैजाबाद से लोगों ने भाकपा का सांसद चुनकर भेजा था और देश को चौंका दिया था. खिसकी हुई मजबूत जमीन फिर कैसे हासिल होगी इसके जवाब में बार-बार रटी-रटाई शब्दावलियों का इस्तेमाल किया जाता रहा. हर बार संघर्ष की बात होती और फिर एक रटा-रटाया वाक्य कि सांप्रदायिकता, क्षेत्रीयता और जातीयता ने हमारी जमीन को मारा. भाकपा के नए महासचिव सुधाकर रेड्डी इस बात का जवाब भी नहीं दे सके कि आज जब देश भर में पंचायत से लेकर संसद तक की राजनीति में महिलाओं को प्रमुखता देने की परंपरा बन रही है तो पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में महिलाओं की संख्या रखने में औपचारिकता-सी क्यों निभाई गई. देश की आबादी में 55 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए एबी बर्धन जैसे नेता ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन और ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन मंच की दुहाई देते रहे. जबकि यह सच वे भी जानते हैं कि युवाओं में एक बड़ी आबादी पेशेवरों की भी है और वह भी इस नवउदारवादी व्यवस्था से त्रस्त है. उसे भी वाम का कोई मंच चाहिए, लेकिन आज के हिसाब से. हाल के वर्षों में उभरा मध्यवर्ग इस धारा से कैसे जुड़ेगा, यह मसला भी दरकिनार रहा. और इस सबके बाद हिंदी इलाके के लिए अलग से कोई कार्यक्रम तक तय नहीं हो सका कि आखिर अपने पुराने गढ़ के लिए क्या रणनीति होगी. इस बाबत पूछने पर भाकपा के नए महासचिव सुधाकर रेड्डी बस इतना भर कहते हैं कि वे महिलाओं को प्रमुखता देंगे, युवाओं के लिए भी अलग से सोचेंगे और हिंदी इलाके के लिए एक अलग प्रोग्राम तैयार करेंगे!

गा-गे-गी यानी भविष्यकाल के वाक्यों में उलझाए रखने की राजनीति वामदलों की परंपरा में नहीं रही है लेकिन भाकपा इसका सहारा लेते हुए साफ दिखी.

कोई भी वाम दल अपने स्पेस में दूसरे वाम दल की सेंधमारी के लिए कतई तैयार नहीं

माकपा के महाधिवेशन में भी वाम दलों के एकताबद्ध आंदोलन का संकल्प दुहराया गया लेकिन वह एक किस्म का भाषण जैसा ही लगा. जानकारों का मानना है कि लगातार सत्ता में रहने की वजह से माकपा अब भी वाम दलों में खुद के श्रेष्ठताबोध से बाहर नहीं निकल पाई है. और यह तय है कि उसकी अकड़ अगर बरकरार रही तो फिर वही वामदल एकताबद्ध होंगे जो वर्षों से सत्ता के लिए एकताबद्ध होते रहे हैं.

भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच कब-कब, किन बिंदुओं पर असहमति के स्वर उभरे और फटाफट अलग पार्टियों का निर्माण हो गया, इस पर नजर दौड़ाने पर दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं. भाकपा से टूटकर माकपा बनी. माकपा से  माले वाया आईपीएफ. फिर उससे 17 अलग-अलग पार्टियां. इसी धारा से माओवादियों वाली पार्टी भी. अब माओवादियों के भी दो दर्जन समूह हैं. सभी अपने-अपने तरीके से जिंदा हैं, अपने-अपने लाल झंडे के साथ. लोकतांत्रिक वाम दलों की बात करें तो चुनाव के दौरान इन सबके घोषणा पत्र देखने पर बहुत हद तक समानता नजर आती है. लेकिन एक ही मूल से निकलने के बावजूद एक महीन रेखा इन्हें अलग-अलग छोर पर बनाए रखती है. भाकपा या माकपा जब एकताबद्ध होने की बात दुहराती हैं तो दो दलों की बात ही प्रमुखता से आती है या अधिक से अधिक फॉरवर्ड ब्लॉक और आरएसपी मिलाकर चार दलों की, जो पश्चिम बंगाल, केरल या यूपीए वन में सत्ता की साझेदार रही हैं. इससे देश के अलग-अलग हिस्से में संघर्षरत छोटे वाम दल खुद को किनारे कर लेते हैं. भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य कहते हैं कि सत्ता और मोल-तोल के लिए वामदल साझा मंच पर तो आते ही रहे हैं लेकिन संघर्ष के लिए साथ आने का स्वरूप अलग होता है. यह देखा भी गया है कि जब देश में चार वाम दल सत्ता की साझेदारी निभा रहे थे तब कई वाम दल एक अलग से कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाकर अलग-अलग हिस्सों में संघर्ष भी कर रहे थे. इसमें बिहार-झारखंड के इलाके में सक्रिय भाकपा माले, पंजाब में सीपीएम पंजाब, दार्जिलिंग के इलाके में सीपीआरएम, महाराष्ट्र में महाराष्ट्र लाल मिशन पार्टी आदि शामिल हैं.

पहचान की राजनीति के युग में वाम दलों के बीच एकताबद्ध होने में जो पहला पेंच फंसता है, उसके मूल में दो-चार बनाम अन्य आड़े आते हैं. दूसरे, एकता के नाम पर कोई वाम दल अपने स्पेस में दूसरे वाम दल की सेंधमारी के लिए कतई तैयार नहीं. भाकपा के एबी बर्धन कहते भी हैं, ‘यही तो सबसे बड़ा असमंजस है कि सभी वाम दल लाल झंडे के साथ उतरते हैं और आपस में लड़ते हैं. जनता लाल झंडे को लेकर दुविधा में पड़ जाती है.’

हालांकि तमाम मुश्किलों के बीच भी संभावनाओं की कई खिड़कियां दिखती हैं. इस साल 28 फरवरी को राष्ट्रव्यापी एक दिन की मजदूरों की हड़ताल हुई तो उससे साफ हुआ कि वाम दलों में अब भी ताकत बची हुई है. उस रोज देश का एक बड़ा हिस्सा ठहर गया था. हालांकि उस हड़ताल में सभी ट्रेड यूनियनें शामिल थीं, लेकिन इसकी अगुवाई वाम संचालित यूनियनें ही कर रही थीं. भाकपा के वरिष्ठ नेता गुरुदास दास गुप्ता कहते हैं, ‘भले ही चुनावी राजनीति में हम पीछे रह गए लेकिन आज ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन बन गई है. इससे संभावना बेहतर दिखती है. ‘वाम विचारधारा वाली पत्रिका जनशक्ति के संपादक यूएन मिश्र कहते हैं, ‘उत्तर प्रदेश में अचानक अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के उभार से यह साफ हुआ है कि नब्ज पर उंगली रखी जाए तो जनता कभी भी करवट लेकर साथ आ सकती है. अगर खेती, रोजगार, भूमि सुधार, विस्थापन आदि सवालों के साथ नव उदारवादी व्यवस्था से नित्य उभर रहे खतरों से जनता को आगाह करने में हम सफल रहे तो जनता फिर हमारे साथ आएगी. समाज में बढ़ती बेचैनी, असमानता, बेरोजगारी और धार्मिकता तथा उग्रवादियों का अतिवाद सेचुरेशन की स्थिति में पहुंच रहा है. ऐसे में वाम एक विकल्प दिखता है.’

मिश्र बात तो सही कहते हैं. आज भारतीय राजनीति में नेताओं और दलों के भ्रष्टाचार का दलदल जिस तरह से बढ़ता दिख रहा है उसमें वाम दल और वाम नेता आज भी कतार से अलग खड़े नजर आते हैं. लेकिन आखिर में फिर वही बात कि बच्चे की तरह रटकर पढ़ने वाला स्टाइल बदलना होगा. सिर्फ संघर्ष-संघर्ष रटते रहने की बजाय सृजन के रास्ते भी दिखाने होंगे. वरना ऊहापोह और भटकाव वाले इस युग में बहुतेरे यह भी समझ बैठेंगे कि समग्रता में 90 की उम्र पार करने के बावजूद भारत में वामपंथी दल उस स्कूली बच्चे की तरह हो गए हैं, जिसे सिर्फ गाय पर लेख लिखना आता है. स्कूल की परीक्षा में नदी पर भी लेख लिखने का प्रश्न आने पर वह घुमा-फिराकर गाय पर ही पहुंचने की कोशिश करता है, जैसे- मेरे गांव के पास एक नदी बहती है, उसके किनारे एक गाय चरने आती है, उसके चार पांव होते हैं, वह घास खाती है..

 

सौदों के बाद शोध में सड़ांध

सेनाध्यक्ष वीके सिंह ने कुछ दिन पहले एक साक्षात्कार में यह स्वीकार किया कि उन्हें विदेशी कंपनी के साथ होने वाले एक रक्षा सौदे में रिश्वत की पेशकश की गई थी. इसके बाद एक बार फिर से हर तरफ यह चर्चा हो रही है कि किस तरह से रक्षा सौदों में दलाली बदस्तूर जारी है और ज्यादातर रक्षा सौदों को विदेशी कंपनियां अपने ढंग से प्रभावित करने का खेल अब भी खेल रही हैं. इसके बाद सेनाध्यक्ष का प्रधानमंत्री को लिखा वह पत्र लीक हो गया जिसमें बताया गया है कि हथियारों से लेकर तैयारी के मामले तक में सेना की स्थिति ठीक नहीं है. नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट भी सेना की तैयारियों की चिंताजनक तस्वीर सामने रखती है.

रक्षा सौदों में दलाली और तैयारी के मोर्चे पर सेना की बदहाली के बीच एक मामला ऐसा है जो इशारा करता है कि विदेशी कंपनियां अपनी पहुंच और पहचान का इस्तेमाल न सिर्फ रक्षा सौदों के लिए कर रही हैं बल्कि इस क्षेत्र के शोध और विकास की प्रक्रिया को बाधित करने के खेल में भी शामिल हैं ताकि उनके द्वारा बनाए जा रहे रक्षा उपकरणों के लिए भारत एक बड़ा बाजार बना रहे.
यह मामला है 1972 में शुरू हुई उस परियोजना का जिसके तहत मिसाइल में इस्तेमाल होने वाला एक बेहद अहम उपकरण विकसित किया जाना था. इसमें शामिल एक बेहद वरिष्ठ वैज्ञानिक का कहना है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पहल पर शुरू हुई यह परियोजना जब अपने लक्ष्य को हासिल करने के करीब पहुंची तो इसे कई तरह के दबावों में जानबूझकर पटरी से उतार दिया गया. इसका नतीजा यह हुआ कि आज भी भारत इस तरह के उपकरण बड़ी मात्रा में दूसरे देशों से खरीद रहा है. इंदिरा गांधी के बाद के चार प्रधानमंत्रियों के संज्ञान में इस मामले को लाए जाने और एक प्रधानमंत्री द्वारा जांच का आश्वासन दिए जाने के बावजूद अब तक इस मामले की उचित जांच नहीं हो सकी है.

साठ के दशक में चीन से चोट खाने और फिर 1971 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई के बाद यह महसूस किया गया कि रक्षा तैयारियों के मामले में अभी काफी कुछ किए जाने की जरूरत है. फिर से भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस सपने का जिक्र हो रहा था जिसमें उन्होंने कहा था कि वे रक्षा जरूरतों के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं. तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रक्षा से संबंधित अहम स्वदेशी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उन भारतीय वैज्ञानिकों की सेवा लेने पर जोर दिया जो दूसरे देशों में काम कर रहे थे.इन्हीं कोशिशों के तहत अमेरिका की प्रमुख वैज्ञानिक शोध संस्था नासा में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिक रमेश चंद्र त्यागी को भारत आने का न्योता दिया गया. त्यागी ने देश के लिए काम करने की बात करते हुए नासा से भारत आने के लिए मंजूरी ले ली. इसके बाद भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की एक लैब सॉलिड स्टेट फिजिक्स लैबोरेट्री में उन्हें प्रमुख वैज्ञानिक अधिकारी (प्रिंसिपल साइंटिफिक ऑफिसर) के तौर पर विशेष नियुक्ति दी गई. उन्हें जो नियुक्ति दी गई उसे तकनीकी तौर पर ‘सुपर न्यूमरेरी अपवाइंटमेंट’ कहा जाता है. यह नियुक्ति किसी खास पद या जरूरत को ध्यान में रखकर किसी खास व्यक्ति के लिए होती है और अगर वह व्यक्ति इस पद पर न रहे तो यह पद खत्म हो जाता है.

दुश्मन के जहाज को गिराने के लिए भारत उस समय जिस मिसाइल का इस्तेमाल करता था उसमें एक उपकरण होता था ‘इन्फ्रा रेड डिटेक्टर’. इसकी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे आम बोलचाल की भाषा में ‘मिसाइल की आंख’ कहा जाता है. मिसाइल कैसे अपने लक्ष्य तक पहुंचेगी, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि यह उपकरण कैसे काम कर रहा है. पर इस उपकरण के साथ गड़बड़ी यह है कि इसकी उम्र महज छह महीने होती है. मिसाइल का इस्तेमाल हो या न हो लेकिन हर छह महीने में यह उपकरण बदलना पड़ता है. उन दिनों भारत रूस से यह डिटेक्टर आयात करता था. जानकार बताते हैं कि कई बार रूस समय पर यह डिटेक्टर देता भी नहीं था. इंदिरा गांधी ने इस समस्या को समझा और तय किया कि भारत ऐसा उपकरण खुद विकसित करेगा. नासा में काम करते हुए त्यागी ने दो पेटेंट अर्जित किए थे और वहां वे इसी तरह की एक परियोजना पर काम कर रहे थे. सेमी कंडक्टर टेक्नोलॉजी और इन्फ्रा रेड डिटेक्शन पर त्यागी के काम को अमेरिका में काफी सराहा भी गया था. इसी वजह से उन्हें इस परियोजना का कार्यभार सौंपा गया.

1972 में भारत आकर त्यागी ने इस परियोजना पर काम शुरू किया. भारत सरकार ने इस परियोजना को ‘सर्वोच्च प्राथमिकता यानी टॉप प्रायोरिटी’ की श्रेणी में रखा था. औपचारिक तौर पर इसे ‘पीएक्स एसपीएल-47’ नाम दिया गया. त्यागी के सहयोगी के तौर पर अमेरिका के नेब्रास्का विश्वविद्यालय में काम कर रहे वैज्ञानिक एएल जैन को भी भारत लाया गया. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद प्रतिष्ठित समझी जाने वाली फुलब्राइट स्कॉलरशिप हासिल कर चुके जैन भी देश के लिए कुछ करने का भाव मन में रखकर यहां आए थे. जैन के पास अमेरिकी सेना की कुछ ऐसी परियोजनाओं में काम करने का अनुभव भी था. इन दोनों वैज्ञानिकों ने मिलकर कुछ ही महीनों के अंदर वह उपकरण विकसित कर लिया और बस उसका परीक्षण बाकी रह गया था. इसी बीच पहले एएल जैन को विभाग के अधिकारियों ने परेशान करना शुरू किया. डीआरडीओ की मैनेजमेंट इन्फार्मेशन रिपोर्ट (एमआईआर) में भी इस बात का जिक्र है कि उन्हें परेशान इसलिए किया जा रहा था कि उन्होंने केमिकल बाथ मेथड से डिटेक्टर विकसित करने की परियोजना को लेकर आपत्ति जताई थी और इस तथ्य को भी उजागर किया था कि इसकी क्षमता को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है. लेकिन जैन की बात को परखने की बजाय उन्हें इस कदर परेशान किया गया कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया. त्यागी बताते हैं कि कुछ समय के बाद जैन अमेरिका वापस चले गए. इसके बाद तरह-तरह से उन्हें भी परेशान किया जाने लगा. इसकी शिकायत उन्होंने उस वक्त के रक्षा मंत्री वीएन गाडगिल से भी की. त्यागी कहते हैं कि गाडगिल ने उपयुक्त कदम उठाने की बात तो कही लेकिन किया कुछ नहीं.

डीआरडीओ ने उपकरण के परीक्षण की दिशा में काम आगे बढ़ाने की बजाय एक दिन त्यागी को बताया कि आपका स्थानांतरण पुणे के सैनिक शिक्षण संस्थान में कर दिया गया है. इस तरह से रहस्यमय ढंग से उस परियोजना को पटरी से उतार दिया गया जिसके लिए इंदिरा गांधी ने विदेश में काम कर रहे दो वरिष्ठ भारतीय वैज्ञानिकों को विशेष आग्रह करके भारत बुलाया था. इसका नतीजा यह हुआ कि आज भी भारत इस तरह के उपकरणों के लिए काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है. जानकारों का कहना है कि इस तरह के जो उपकरण भारत में बाद में विकसित भी हुए उनकी हालत गुणवत्ता के मामले में बहुत अच्छी नहीं है.
त्यागी कहते हैं,  ‘इस परियोजना को तहस-नहस करने का काम उस लॉबी ने किया जो इस उपकरण के सौदों में शामिल थी. इस उपकरण के आयात पर 20 फीसदी दलाली की बात उस वक्त होती थी. इसलिए इन सौदों में शामिल लोगों ने यह सोचा कि अगर स्वदेशी उपकरण विकसित हो गया तो उन्हें मिल रहा कमीशन बंद हो जाएगा. यह बात तो किसी से छिपी हुई है नहीं कि रक्षा सौदों में किस तरह से दलाली का दबदबा है. लेकिन मेरे लिए सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि रक्षा क्षेत्र से संबंधित शोध और विकास कार्यों पर भी किस तरह से विदेशी कंपनियां, कमीशन खाने वाली लॉबी और उनके इशारे पर काम करने वाले अधिकारी असर डाल रहे थे.’ इसके बाद त्यागी ने तय किया कि वे हारकर अमेरिका नहीं लौटेंगे बल्कि भारत में रहकर ही यह लड़ाई लड़ेंगे.

अब तक इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा कि आखिर वह कौन-सी ताकत थी जिसने त्यागी की अगुवाई में शुरू हुई अहम रक्षा परियोजना का बेड़ा गर्क कर दिया

लंबी लड़ाई के पहले कदम के तौर पर त्यागी ने अपने स्थानांतरण के आदेश को मानने से इनकार कर दिया. वे कहते हैं,  ‘मुझे एक परियोजना विशेष के लिए लाया गया था तो फिर स्थानांतरण स्वीकार करने का सवाल ही नहीं उठता था. खुद पुणे के उस संस्थान के निदेशक ने कहा था कि रमेश चंद्र त्यागी के पास जिस क्षेत्र की विशेषज्ञता है उससे संबंधित वहां कोई काम ही नहीं है.’ बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में इस बात को दोहराया. त्यागी को स्थानांतरण का यह आदेश 1977 की फरवरी में मिला था. इसे मानने से इनकार करने पर उन्हें दो साल के लिए आईआईटी में प्रतिनियुक्ति पर भेजा गया. उन्होंने यहां 1978 से 1980 तक काम किया और इसी दौरान उन्हें बेहद प्रतिष्ठित श्री हरिओम प्रेरित एसएस भटनागर पुरस्कार मिला. यह पुरस्कार उन्हें सोलर कंसन्ट्रेटर विकसित करने के लिए मिला था. यह रक्षा मंत्रालय के किसी वैज्ञानिक को मिलने वाला पहला राष्ट्रीय पुरस्कार था. प्रतिनियुक्ति पूरी होने के बाद उन्हें फिर से पुणे जाने के लिए कहा गया. जब उन्होंने ऐसा करने से मना किया तो उन्हें बर्खास्त कर दिया गया. त्यागी कहते हैं, ‘मैं भारत का पहला ऐसा वैज्ञानिक बन गया था जिसे बर्खास्त किया गया था और मैं इस कलंक के साथ मरना नहीं चाहता था. मैं उस नापाक गठजोड़ को भी उजागर करना चाहता था जिसने भारत की एक प्रमुख स्वदेशी रक्षा परियोजना को सफलता के मुहाने पर पहुंचने के बावजूद ध्वस्त कर दिया था.’

उस समय से लेकर अब तक त्यागी इस मामले को विभिन्न सक्षम अदालतों, एजेंसियों और व्यक्तियों के सामने उठाते रहे हैं लेकिन अब तक इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा है कि आखिर वह कौन-सी ताकत थी जिसने त्यागी की अगुवाई में शुरू हुई उस परियोजना का बेड़ा गर्क कर दिया. इस बात को सिर्फ यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है कि स्थानांतरण और बाद में बर्खास्तगी की खीझ में त्यागी इस तरह के आरोप लगा रहे हैं. सच्चाई तो यह है कि डीआरडीओ की एमआईआर में भी यह माना गया है कि इस परियोजना को जानबूझकर बाधित किया गया. त्यागी की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि रमेश चंद्र त्यागी के साथ अन्याय हुआ. दुनिया के प्रमुख रिसर्च जर्नलों ने भी माना कि त्यागी जिस पद्धति से इन्फ्रा रेड डिटेक्टर विकसित कर रहे थे सिर्फ उसी के जरिए उच्च गुणवत्ता वाला यह उपकरण विकसित किया जा सकता है. ये तथ्य इस ओर इशारा कर रहे हैं कि कोई न कोई ऐसी ताकत उस वक्त रक्षा मंत्रालय और खास तौर पर डीआरडीओ में सक्रिय थी जिसके हित त्यागी की परियोजना की सफलता से प्रभावित हो रहे थे. यह ताकत शायद अब भी डीआरडीओ और रक्षा मंत्रालय में सक्रिय है और इसी वजह से अब तक इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो पाया है.
1977 में डीआरडीओ ने जो एमआईआर तैयार की थी उसे सॉलिड फिजिक्स लैबोरेट्री के निदेशक को 17 जनवरी, 1977 को सौंपा गया था. यह रिपोर्ट उस समय के रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार एमजीके मेनन को भी भेजी गई थी लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. सॉलिड फिजिक्स लैबोरेट्री में टेक्नीकल मैनेजमेंट डिविजन के प्रमुख रहे जीके अग्रवाल द्वारा तैयार की गई एमआईआर बताती है, ‘इस परियोजना को बाधित करने के लिए बार-बार डॉ त्यागी और डॉ जैन को परेशान किया गया. परियोजना पर काम करने के लिए त्यागी खुद के द्वारा अमेरिका में विकसित किया गया जो यंत्र नासा की विशेष अनुमति से लेकर आए थे उसका नाम था इपिटैक्सियल रिएक्टर. सर्वोच्च प्राथमिकता वाली परियोजना में लगे रहने के बावजूद इसका स्थान बदलकर परियोजना को बाधित करने की कोशिश की गई. अतः इस निष्कर्ष से बचा नहीं जा सकता कि किसी षड्यंत्र के तहत जानबूझकर डॉ जैन और डॉ त्यागी को उखाड़ फेंकने की योजना बनाई गई.’ जिस अपरेटस का यहां जिक्र है उसे त्यागी ने अमेरिका में विकसित किया था और भारत में ऐसा अपरेटस नहीं होने की वजह से नासा से विशेष अनुमति लेकर वे उसे अपने खर्चे पर भारत लाए थे.

सामरिक दृष्टि से इस बेहद महत्वपूर्ण परियोजना को मटियामेट करने की पूरी कहानी अपनी रिपोर्ट में बयां करना जीके अग्रवाल पर भारी पड़ा. पहले स्थानांतरण और बाद में उन्हें निलंबित कर दिया गया. यह घटना भी त्यागी के उन आरोपों की पुष्टि करती है कि कोई न कोई अदृश्य शक्ति बेहद प्रभावशाली ढंग से उस वक्त से लेकर अब तक रक्षा मंत्रालय और डीआरडीओ में सक्रिय है जो नहीं चाहती कि भारत रक्षा उपकरणों के मामले में आत्मनिर्भर बने.

जब 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी थी तो उस वक्त कई सांसदों ने सामरिक दृष्टि से बेहद अहम इस परियोजना से संबंधित सभी पहलुओं की जांच करने की मांग करते हुए एमआईआर को सार्वजनिक करने की मांग भी रखी थी. उस समय के रक्षा मंत्री ने मामले की जांच कराने की बात तो कही लेकिन एमआईआर को यह कहते हुए तवज्जो नहीं दी कि यह एक निजी रिपोर्ट है और ऐसी कोई रिपोर्ट तैयार करने के लिए अग्रवाल को नहीं कहा गया था. जबकि डीआरडीओ ने 3 जून, 1976 को बाकायदा चिट्ठी लिखकर अग्रवाल को एमआईआर तैयार करने का काम सौंपा था. जगजीवन राम के ही समय में इस पूरे मामले की जांच के लिए रक्षा क्षेत्रों के शोध से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट पैनल ने जांच का काम जनरल सपरा को सौंपा. त्यागी कहते हैं, ‘सपरा ने भी एमआईआर की बातों को माना. फिर भी न तो किसी की जवाबदेही तय हुई और न ही मुझे दोबारा उस परियोजना पर काम आगे बढ़ाने के लिए बुलाया गया.’

इस बीच कुछ सांसदों ने रक्षा मंत्री से लेकर संसद तक में इस मामले से संबंधित जानकारियां मांगीं जवाब में सरकार ने जिनके चार अलग-अलग जवाब दिए. 27 नवंबर, 1980 को राज्यसभा में सत्य पाल मलिक के सवाल के जवाब में उस समय के रक्षा राज्यमंत्री शिवराज पाटिल ने कहा, ‘इस परियोजना को 1977 के जुलाई माह में बंद कर दिया गया. क्योंकि इसके तहत विकसित किए जा रहे डिटेक्टर की कोई जरूरत ही नहीं थी.’ इसी दिन भाई महावीर समेत तीन अन्य सांसदों के सवाल पर पाटिल ने ही अपना जवाब बदल दिया. उन्होंने कहा, ‘इस परियोजना के तहत विकसित किए जाने वाले इन्फ्रा रेड डिटेक्टर को विकसित करने का काम और बड़े पैमाने पर चल रहा है.’ सरकार की तरफ से विरोधाभासी बयानों का सिलसिला यहीं नहीं थमा. संसद की पिटिशन कमेटी के अध्यक्ष बिपिनपाल दास ने अपनी रिपोर्ट में 13 फरवरी, 1981 को कहा, ‘परियोजना को न तो बाधित और न ही बंद किया गया. इसे सफलतापूर्वक 1977 में पूरा किया गया.’ सांसद संतोष गंगवार ने इस मामले में 1992 में एक पत्र उस समय के रक्षा मंत्री शरद पवार को लिखा. इसके जवाब में शरद पवार ने 6 फरवरी, 1992 को एक पत्र लिखकर बताया, ‘इस प्रोजेक्ट की प्रगति की देखरेख के लिए गठित पैनल की सिफारिश पर वर्ष 1976 में इसे बंद कर दिया गया था.’ अब इसमें यह तय कर पाना किसी के लिए भी काफी कठिन है कि इनमें से किस जवाब को सही माना जाए.

इस बीच न्याय के लिए अदालतों का चक्कर काटते हुए त्यागी के हाथ निराशा ही लगती रही. एक समय ऐसा आया जब उन्हें ऐसा लगा कि अगर न्याय हासिल करना है तो खुद ही कानून को जानना-समझना होगा और नासा में काम कर चुके इस वैज्ञानिक ने बाकायदा एलएलबी की पढ़ाई की. उनका मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंचा और वहां फैसला उनके पक्ष में आया. सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि त्यागी का पुणे में स्थानांतरण किया जाना अनधिकृत था और उनकी बर्खास्तगी भी गैरकानूनी थी. जस्टिस आरएम सहाय और एएस आनंद की खंडपीठ ने 11 फरवरी, 1994 के अपने फैसले में यह उम्मीद जताई थी कि डीआरडीओ त्यागी जैसे वैज्ञानिक की विशेषज्ञता और अनुभव को देखते हुए उनकी सेवाओं पर अधिक सकारात्मक रुख अपनाएगा.

त्यागी कहते हैं, ‘इसके बाद मैं डीआरडीओ गया. उस समय डीआरडीओ के प्रमुख एपीजे अब्दुल कलाम थे. उन्होंने मुझे कोई अहम जिम्मेदारी देने और किसी महत्वपूर्ण परियोजना से जोड़ने का भरोसा दिलाया. लेकिन हुआ इसका उलटा. मैं तो कलाम के आश्वासन के बाद समुद्र के अंदर काम करने वाला डिटेक्टर विकसित करने की योजना का खाका तैयार कर रहा था और इसका प्रस्ताव डीआरडीओ को भी दिया था. लेकिन 2 सितंबर, 1994 को टेलेक्स से मुझे सेवानिवृत्त करने की सूचना दे दी गई. जबकि उस वक्त मेरी उम्र 60 साल हुई नहीं थी.’ अब्दुल कलाम की छवि बेहद साफ-सुथरी रही है लेकिन उनके आश्वासन के बावजूद त्यागी को समय से पहले सेवानिवृत्त किया जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि इस पूरे मामले में कोई न कोई ऐसी शक्ति काम कर रही थी जिस पर न तो कोई   हाथ डालने की हिम्मत जुटा पा रहा है और न ही उस पर से रहस्य का पर्दा उठाने का साहस कर रहा है.

रक्षा मंत्रालय ने इसपर चुप्पी साधकर रहस्य को और गहरा करने का काम किया कि खुद डीआरडीओ और जनरल सपरा की रिपोर्ट पर अब तक क्या कार्रवाई हुई

इसके बाद संतोष गंगवार समेत आधे दर्जन से अधिक सांसदों ने उस समय के प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव को 8 अगस्त, 1995 को पत्र लिखकर जानकारी दी. इन सांसदों ने अपने पत्र में इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील बताते हुए मांग की कि शुरुआत से लेकर अब तक इस पूरे मामले की विस्तृत जांच की जाए और इस पर श्वेत पत्र लाया जाए. इसके जवाब में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने 16 अगस्त 1995 को लिखित में यह कहा, ‘इस मामले की मैं छानबीन कराऊंगा.’ लेकिन इस बार भी कोई नतीजा नहीं निकला.

1996 में प्रधानमंत्री बने एचडी देवगौड़ा ने भी सांसदों द्वारा यह मसला उठाए जाने पर उचित कार्रवाई की बात की लेकिन हुआ कुछ नहीं और जो मामला देशद्रोह का हो सकता है उस पर से रहस्य का पर्दा नहीं हटाया गया. त्यागी कहते हैं कि 1998 में प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी को इस मामले की जानकारी शुरुआती दिनों से ही थी और खुद उनके मंत्रिमंडल में शामिल तकरीबन आधा दर्जन मंत्रियों ने समय-समय पर इस मामले को उठाया था लेकिन वाजपेयी ने भी इस मामले में कुछ नहीं किया. 2004 में जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो उन्हें भी कुछ सांसदों ने विस्तृत जांच की मांग करते हुए 8 दिसंबर, 2004 को पत्र लिखा. मनमोहन सिंह ने इसका जवाब भी 13 दिसंबर, 2004 को दिया. 8 दिसंबर का पत्र लिखने वाले सांसदों में शामिल चंद्रमणि त्रिपाठी ने 21 मार्च, 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को फिर से पत्र लिखकर बताया, ‘अभी तक मुझे कोई और जानकारी नहीं मिल पाई है जिससे मेरे पत्र लिखने का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया है. इस बीच रक्षा मंत्रालय के किसी अधिकारी ने मेरे निवास पर फोन द्वारा यह जानना चाहा था कि आपको प्रेषित मेरा पत्र क्या वास्तव में मेरे द्वारा लिखा गया था. जांच के दायरे में आए संबंधित विभाग द्वारा ऐसी परिस्थितियों में सांसद से संपर्क करना विचित्र लगा.’ रक्षा मंत्रालय का जो व्यवहार चंद्रमणि त्रिपाठी को विचित्र लगा और जिसकी जानकारी उन्होंने शिकायत के लहजे में प्रधानमंत्री को दी वह आरसी त्यागी के उस आरोप को मजबूती देती है कि इस मामले को दबाने के लिए कोई ताकतवर लॉबी अदृश्य तौर पर काम कर रही है.

इस बीच जब उस समय के रक्षा मंत्री प्रणव मुखर्जी को पत्र लिखकर जांच की मांग की गई तो उन्होंने उन्हीं बातों को दोहराया जो बातें 1992 में उस समय के रक्षा मंत्री शरद पवार कह रहे थे. हालांकि 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने त्यागी के पक्ष में फैसला देकर शरद पवार को गलत साबित किया था लेकिन प्रणव मुखर्जी इसके बावजूद रहस्य पर पर्दा डालते रहे और उन्होंने त्यागी पर बेवजह सरकार को परेशान करने का आरोप लगाया. मुखर्जी ने भी शरद पवार की तरह ही इस सवाल पर चुप्पी साधकर रहस्य को और गहरा करने का काम किया कि खुद डीआरडीओ की एमआईआर और जनरल सपरा की रिपोर्ट पर रक्षा मंत्रालय ने अब तक क्या कार्रवाई की. त्यागी कहते हैं, ‘जब एके एंटोनी रक्षा मंत्री बने तो फिर मैंने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक पत्र लिखा लेकिन अब तक मुझे इस पत्र का जवाब नहीं मिला है.’
इतना सब होने के बावजूद सरकार का इस मामले में विस्तृत जांच नहीं करवाना कई सवाल खड़े करता है. क्या विस्तृत जांच के लिए सरकार उस मौके का इंतजार कर रही है जब सेनाध्यक्ष वीके सिंह सरीखा कोई व्यक्ति सामने आकर कहे कि रक्षा सौदों में ही नहीं, रक्षा शोध एवं विकास में भी अदृश्य शक्तियां सक्रिय हैं? क्या मौजूदा प्रधानमंत्री के लिए उस वैज्ञानिक की बातों का कोई महत्व नहीं है जिसे खुद उन्हीं की पार्टी की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने विशेष आग्रह के साथ नासा से भारत वापस बुलाया था?

रमेश चंद्र त्यागी के साथ जो कुछ हुआ उसका खामियाजा देश को कई तरह से भुगतना पड़ रहा है. इसमें मिसाइल के लिए जरूरी डिटेक्टर के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता, बढ़े रक्षा खर्चे और कमजोर सैन्य तैयारी प्रमुख हैं. लेकिन इस घटना की वजह से नासा में काम कर रहे कई भारतीय वैज्ञानिकों ने भारत सरकार द्वारा अपने वतन लौटकर देशप्रेम की भावना के साथ काम करने का प्रस्ताव ठुकरा दिया है. त्यागी कहते हैं, ‘नासा में एक तिहाई भारतीय काम करते हैं. इनमें कई ऐसे हैं जो अपने वतन के लिए काम करते हैं. सरकार समय-समय पर इनमें से कुछ को भारत वापस लाने की कोशिश भी करती है. लेकिन जिस वैज्ञानिक को भी मेरा हाल पता चलता है वह नासा में ही बने रहने का विकल्प चुनता है.’ खुद रक्षा मंत्री एके एंटोनी ने 2008 में संसद में एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी थी कि डीआरडीओ हर साल तीन-चार बार विदेशों में काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिकों को यहां लाने की कोशिश करता है.

और भी हैं आसमां…

 
अपना सौवां अंतरराष्ट्रीय शतक पूरा करने के बाद सचिन तेंदुलकर ने अपने संभावित रिटायरमेंट के बारे में जो बात कही वह किसी सूक्ति जैसी लगती है, ‘यह बेहद स्वार्थी विचार होगा कि जब आप अच्छा खेल रहे हों तब रिटायर हो जाएं, जब आप अच्छा खेल रहे हों वह समय देश के लिए योगदान करने का होता है न कि अपने रिटायरमेंट को सजाने का.’ निश्चित तौर पर सचिन को बोलते हुए सुनना भी उनकी बल्लेबाजी देखने जितना ही सुखद होता है. शायद इसलिए कि सचिन भोगे हुए यथार्थ को स्वर देने में यकीन रखते हैं. उनकी शख्सियत की सच्चाई और खुलूस का रहस्य इसी में छिपा है, और इसी की कमी उनके सारे आलोचकों को झूठा साबित कर देती है. फिर चाहे उनमें पहली विश्व-विजेता टीम के कप्तान कपिल देव ही क्यों न हों. हालांकि कपिल जैसे खिलाड़ी के बारे में कोई बात कहना थोड़ा छोटापन होगा लेकिन इतने बड़े खिलाड़ी से उतने ही बड़े व्यवहार की अपेक्षा भी रहती ही है. बात ये थी कि वे सचिन को सौवें शतक का मोह छोड़कर संन्यास के बारे में सोचने की सलाह दे रहे थे लेकिन अपने करियर के आखिरी दौर में सिर्फ हेडली का रिकॉर्ड तोड़ने की गरज से वे खुद टीम पर बोझ बने रहे थे.

2011 विश्वकप विजय के बाद (जब सचिन 99 शतकों के साथ महाशतक के मुहाने पर थे,) एकाएक मीडिया में सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने की मुहिम शुरू हो गई. खेल मंत्रालय ने जब भारत रत्न के लिए सचिन का नाम नहीं भेजा तो इसे ‘भगवान के साथ धोखा’ तक कहा गया. लम्बे वक्त तक मीडिया में इस अभियान को लेकर लामबंदी रही और फिर आस्ट्रेलिया के खिलाफ टीम का प्रदर्शन बिगड़ते ही यही लामबंदी अपने ही भारत-रत्न को टीम से बाहर करवाने या संन्यास दिलवाने के लिए दिखने लगी. तमाम छोटे बड़े विशेषज्ञ टीवी चैनलों पर आकर सचिन को सौवे शतक का मोह छोड़ने और सम्मानजनक विदाई की सलाह देने लगे. चयनकर्ताओं पर भी उंगलियां उठाई गई कि आखिर क्यों खराब प्रदर्शन के बावजूद सीनियर खिलाड़ी (मुख्यत: सचिन) टीम में बने हुए हैं.

लेकिन सचिन यूं ही कीर्तिमानों के पहाड़ पर नहीं बैठे हैं. एशिया कप में बांग्लादेश के खिलाफ उन्होंने अपना महाशतक पूरा किया और इसके तुरंत बाद यह साफ कर दिया कि वे फिलहाल संन्यास लेने नहीं जा रहे. सचिन के मुताबिक अब भी मैदान में उतरने पर जब राष्ट्रगान बजता है तो वे रोमांचित हो जाते हैं. जिस दिन देश के लिए खेलने के इस जुनून में लेशमात्र भी कमी आई वे बल्ला टांग देंगे. हकीकत भी यही है. पिछले 23 साल से हम देखते आए हैं कि आउट होने के बाद सचिन बड़ी सहजता से पैवेलियन की ओर लौट जाते हैं. ऐसे में जब उन्हें लगेगा कि वे आउट हो चुके हैं, उन्हे मैदान छोड़ने में देर नहीं लगेगी.

सचिन के विरोधी सवाल कर सकते हैं कि तकरीबन 39 साल के सचिन अब टीम में क्यों बने रहना चाहते हैं. जबकि वे 23 साल क्रिकेट खेल चुके हैं, रिकॉर्डों के शीर्ष पर बैठे हैं और विश्वविजेता टीम का हिस्सा भी बन चुके हैं. यह सवाल करने वालों को पहले इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि सचिन आखिर टीम में क्यों न हों? न तो रिकार्ड किसी खिलाड़ी का ध्येय होते हैं और न ही इस ध्येय के साथ इतने साल क्रिकेट खेली जा सकती है. तकनीक के स्तर पर आज भी सचिन के खेल में कोई कमी नज़र नहीं आती. इस उम्र में भी वे बच्चों जैसे उत्साह के साथ विकेटों के बीच दौड़ते हैं. उनका फ्रंटफुट कवर ड्राइव, बैकफुट पंच या स्ट्रेट डाइव आज भी उतना ही शानदार होता है जितना नौजवानी के दिनों में हुआ करता था. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वनडे सीरीज में इसे सचिन की बदकिस्मती ही कहा जाएगा कि बार-बार अच्छी शुरूआत के बाद भी वे लम्बा स्कोर नहीं बना पाए. लेकिन टेस्ट सीरीज़ में विराट कोहली को छोड़ दें तो अकेले सचिन ही थे जिनके बल्ले से रन निकल रहे थे. खेल पत्रकार हेमंत सिंह मानते हैं कि टेस्ट मैचों में आगामी कुछ समय तक टीम इंडिया के लिए सचिन अनिवार्य हैं. वे कहते हैं, ‘द्रविड़ जा चुके हैं, लक्ष्मण जाने वाले हैं, सहवाग अनिश्चितताओं में घिरे हैं और धोनी यहां उतने कामयाब नहीं हैं. इसके साथ ही ज्यादातर युवा खिलाड़ियों को अभी टेस्ट क्रिकेट में खुद को साबित करना बाकी है, इसलिए सचिन का टेस्ट टीम में होना बेहद जरूरी है.’

वक्त उनसे तकाजा भी करेगा कि जो कुछ उन्हें अपने गुरु से मिला, मैदान से विदा होने पर वे उसे अगली पीढ़ी को सौंप दंे. फिलहाल अच्छी बात यह है कि वे खेल रहे हैं और अच्छा खेल रहे हैं

विश्वकप के बाद से सचिन की योजना भी टेस्ट मैचों को तरजीह देने की है. अब वे सिर्फ चुनिंदा एक-दिवसीय मैच ही खेल रहे हैं. अच्छी बात यह है कि अपने संन्यास के सन्दर्भ में उन्होने किसी समय-सीमा का खुलासा नहीं किया है. इसका मतलब यह है कि वे अगली सीरीज के बाद भी संन्यास ले सकते हैं और 2015 के विश्वकप तक भी खेल सकते हैं. जैसा कि उनके सारे फैन्स चाहते हैं. यह भी मुमकिन है कि वे किसी सीरीज से पहले ही उस सीरीज के  आखिरी होने की घोषणा कर दें, जैसा कि मुरलीधरन ने किया था. सचिन के लिए तो यह स्थिति ज्यादा सहज होगी ही उनके फैन्स के लिए भी इसमें एक अलग तरह का रोमांच होगा.

लेकिन इस सबके बीच हमें वह बात ध्यान रखनी होगी जो मुख्य चयनकर्ता श्रीकांत ने कही, ‘संन्यास के फैसले का अधिकार खिलाड़ी में ही निहित होना जरूरी है, इसलिए सचिन को इस बारे में स्वतंत्र रखना चाहिए.’ पिछले दिनों जो लोग पोंटिंग की तर्ज पर सचिन को टीम से बाहर किए जाने के हिमायती थे उन्हंे ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय क्रिकेट-समाज में सचिन का जो मुकाम है, ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट-समाज में उसके समकक्ष सिर्फ और सिर्फ डॉन ब्रैडमैन हैं, पोंटिंग बिल्कुल नहीं. ब्रैडमैन खुद 40 साल की उम्र तक खेलते रहे थे. रही बात पोंटिंग की तो उनके हाशिए पर जाने का सिलसिला विश्वकप के बाद ही शुरू हो गया था जबकि सचिन बेहद उम्दा फार्म में थे.

हर कहानी का कोई न कोई अंत होता है, इस लिहाज से सचिन का रिटायरमेंट भी एक सच्चाई है. लेकिन उससे बड़ी सच्चाई यह भी है कि भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का एक बड़ा वर्ग सचिन के बिना क्रिकेट की कल्पना भी नहीं करता. उनकी गैर मौजूदगी में क्रिकेट का मैदान सूना लगता है. सचिन को खुद क्रिकेट से मोहब्बत है और उनके कद्दावर प्रदर्शन का रहस्य भी इसी दीवानगी में छिपा है. ऐसे में सवाल यह भी है कि जब सचिन रिटायर हो जाएंगे तब उनकी नई भूमिका क्या रहेगी. रिटायरमेंट के बाद अमूमन क्रिकेटर अभिनय, राजनीति, व्यापार या दूसरी जगह हाथ आजमाते हैं.

सचिन के संदर्भ में यह थोड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि बकौल मजरूह सुल्तानपुरी, ‘शायर शायरी से किनारा करने पर फिल्मी नगमे तो लिख सकता है लेकिन बिरयानी का ठेला नहीं लगा सकता.’ उसी तरह सचिन रिटायर होने के बाद भी मैदान से शायद ही दूर हो पाएं. ऐसे में दूसरे महान खिलाड़ियों माराडोना, ध्यानचंद, गोपीचंद और केडी सिंह बाबू की तरह वे कोच के रूप में अपनी दूसरी पारी शुरू कर सकते हैं. कोचिंग के बारे में महान हॉकी खिलाड़ी केडी सिंह बाबू कहा करते थे, ‘खिलाड़ी वह होता है जो खिलाड़ी पैदा करे.’ उनकी कोचिंग ने देश को कई उम्दा अंतरर्राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी दिए. उसी तरह का कुछ सचिन क्रिकेट को दे सकते हैं. वक्त उनसे तकाज़ा भी करेगा कि जो कुछ उन्हें अपने गुरु रमाकांत आचरेकर से मिला, मैदान से विदा होने पर वे उसे अगली पीढ़ी को सौंप दंे. कोचिंग के अलावा सचिन कमेंट्री के क्षेत्र में भी जा सकते हैं. अपने दोस्तों शूमाकर और सैंप्रास की तरह सामाजिक उद्देश्य के प्रदर्शनी मैचों में खेल सकते हैं और आईसीसी की किसी कमेटी के मुखिया भी बन सकते हैं.

फिलहाल अच्छी बात यह है कि सचिन खेल रहे हैं और अच्छा खेल रहे हैं. जब तक वे खेलेंगे उनका शीर्षारोहण जारी रहेगा. जल्दी ही फैन्स उन्हेंवनडे में पचासवां शतक और सौवां अर्धशतक लगाते देख सकते हैं. इसके अलावा सचिन एक टेस्ट की दोनों पारियों में शतक बनाने का कारनामा भी अभी तक नहीं कर पाए हैं, जिस पर क्रिकेट प्रेमियों की नज़र रहेगी. उनसे टेस्ट में तिहरे शतक की उम्मीद भी कायम रहेगी. अगर वे 2015 तक खेलें तो वन डे में 20 हज़ार रन भी बना सकते हैं. इसके अलावा सचिन अगर लगातार अच्छा खेलें तो टेस्ट मैचों में 60 के औसत के आस पास भी जा सकते हैं, जिसे ब्रैडमैन के अलावा सिर्फ तीन बल्लेबाज़ों ने छुआ है. गोया कहा यह भी जा सकता है कि इतनी अपेक्षाएं ठीक नहीं, लेकिन सच यही है कि सचिन से अपेक्षाएं रखना और उनके आउट होने पर टीवी बंद कर देना इस देश की राष्ट्रीय परंपरा रही है.

उस दिन जब सचिन मैदान से अंतिम विदाई ले रहे होंगे देश के करोड़ों टीवी सेट न जाने कब तक के लिए बंद हो जाएंगे.

आगे रास्ता खराब है

अपना ही खेल बिगाड़ना कोई कांग्रेस से सीखे. उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों और फिर नतीजों के बाद जो हुआ उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है. अपनी चूकों से पार्टी ने पहले तो एकतरफा लग रहे मैच को रोमांचक बना दिया. फिर किसी तरह भाजपा से एक सीट ज्यादा जीतकर मैच उसके हाथ आया भी तो उसके बाद उसने ऐसे फैसले लिए कि उसकी खासी फजीहत होगई है. फिलहाल अंदरूनी खींचातानी के बावजूद भले ही विजय बहुगुणा सरकार के पास बहुमत दिख रहा हो, लेकिन घटनाएं जिस तरह से घटी हैं उससे साफ लगता है कि मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के लिए आगे की राह मुश्किल होगी.

सबसे पहले तो बहुगुणा को छह महीने के भीतर विधानसभा का चुनाव लड़ना है. पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद चुनाव हार गए थे. इसलिए मुख्यमंत्री की जीत सुनिश्चित मान कर चलना अब कठिन है. अगले ही साल यानी 2013 में राज्य में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव होंगे. इनमें भी नए मुख्यमंत्री की परीक्षा होगी. इसके बाद सबसे बड़ी चुनौती का नंबर है यानी 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव. इस समय राज्य की पांचों सीटों पर कांग्रेसी सांसद हैं. गौरतलब है कि पिछली बार भाजपा की खंडूड़ी सरकार के खिलाफ पहले दिन से चल रहा आंतरिक असंतोष सत्ता परिवर्तन में तभी बदला जब लोकसभा चुनाव के नतीजे पार्टी के खिलाफ गए.

बहुगुणा के सामने सभी गुटों और निर्दलीयों के बीच संतुलन बैठाना भी बड़ी समस्या होगी. उनकी कैबिनेट में अनुभवी इंदिरा हृदयेश, यशपाल आर्य, सुरेंद्र सिंह नेगी और प्रीतम सिंह जैसे कद्दावर नेता हैं. पिछली विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता रहे हरक सिंह रावत के कैबिनेट में शामिल होने के बाद तो स्थितियां और भी चुनौतीपूर्ण होंगी. हाल के घटनाक्रमों से साफ है कि पार्टी के भीतर हरीश रावत गुट को तरजीह दी जा रही है. सूत्रों के मुताबिक इसकी वजह से बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने में समर्थन देने वाले कांग्रेस नेता सतपाल महाराज और राज्य में पार्टी के अध्यक्ष यशपाल आर्य के गुट खुलेआम अपना असंतोष प्रकट करने लगे हैं. उधर, मझोले कद के दर्जन भर कांग्रेसी विधायकों के दिल में मंत्री न बन पाने की कसक भी है. इसके अलावा बहुगुणा को सबसे पहले समर्थन देने वाले निर्दलीय दिनेश धनै भी मंत्री न बन पाने के बाद असंतुष्टों की भाषा बोल रहे हैं.

उत्तराखंड राज्य का निर्माण विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हुआ था. लेकिन नए मंत्रिमंडल में राज्य के 13 में से छह धुर पहाड़ी जिलों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है

भले ही हरीश रावत और विजय बहुगुणा अब बयान दे रहे हों कि सरकार पूरे पांच साल चलेगी, लेकिन महीने भर की घटनाओं और इस दौरान आए असंतुष्ट कांग्रेसियों के बयानों से किसी को भी सरकार के स्थायित्व की गारंटी वाले नए बयानों पर भरोसा नहीं हो रहा. 12 मार्च को कांग्रेस आलाकमान ने विजय बहुगुणा को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में मनोनीत किया था. इसके अगले ही दिन ही केंद्र में मंत्री हरीश रावत अपने समर्थक विधायकों सहित कोप भवन में चले गए थे. 15 मार्च को विधानसभा में जब नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाई गई तो वहां कांग्रेस के 32 में से सिर्फ 15 विधायक मौजूद थे. शपथ न लेने वाले दिग्गजों में इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष हरक सिंह रावत और नए विधानसभा अध्यक्ष बने गोविंद सिंह कुंजवाल भी थे. हरक सिंह ने तो बयान भी दे डाला था कि यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी.

एक सप्ताह की अनिश्चितता के बाद मुख्यमंत्री और असंतुष्ट खेमे में बातचीत का दौर शुरू हुआ.  इस बीच कांग्रेस आलाकमान ने हरीश रावत के समर्थक महेंद्र सिंह माहरा को उत्तराखंड से राज्यसभा  के लिए कांग्रेस का उम्मीदवार घोषित कर दिया. हालांकि 19 मार्च को राज्यसभा के नामांकन के समय भी न तो हरीश रावत और न ही उनके कैंप के 11 विधायक पहुंचे. अगले दिन मुख्यमंत्री कैबिनेट में विस्तार करके दिल्ली चले गए. दिल्ली में हरीश रावत और विजय बहुगुणा की फिर बातचीत हुई . कैबिनेट में अपने समर्थकों के लिए जगह पक्की करने के बाद रावत ने नरमी का संकेत दिया.उनका कहना था, ‘मेरी ओर से संकट खत्म हो गया है, लेकिन विजय बहुगुणा को कुछ कदम उठाने होंगे.’ संकेत साफ था कि रावत अपने खेमे के लिए अधिक-से-अधिक पद सुनिश्चित कराना चाहते थे. जानकार बताते हैं कि उनके सामने अपने समर्थकों को राजनीतिक रूप से पदस्थापित करने के साथ-साथ हरक सिंह को भी सम्मानपूर्वक कांग्रेस की राजनीति में जिंदा रखने की चुनौती थी.

खबर लिखे जाने तक इस मामले में कुछ भी फैसला नहीं हुआ है. सूत्रों के अनुसार हरीश रावत खेमा हरक सिंह को उपमुख्यमंत्री बनाने की जिद कर रहा है लेकिन आलाकमान छोटे-से राज्य में सत्ता के दो केंद्र नहीं चाहता. रावत यह भीचाहते हैं कि कांग्रेस के अध्यक्ष पद से यशपाल आर्य को हटवा कर यह कुर्सी उनके समर्थक और सांसद प्रदीप टम्टा को दे दी जाए.

बहुगुणा को चिंता है कि राज्य गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है. उन्हें यह भी लगता है कि राज्य में क्षेत्रीय असंतुलन है और इस कारण पलायन हो रहा है. हरीश रावत की भी चिंता सीमांत क्षेत्रों से होने वाला पलायन है. लेकिन उनकी पार्टी की सरकार का आगाज जैसे हुआ है वही ढर्रा अगर जारी रहा तो साफ है कि ये चिंताएं बस जुबानी कवायद बनकर रह जाएंगी.

मौत से उठते सवाल

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में तैनात पुलिस कप्तान राहुल शर्मा की  खुदकुशी के मामले ने कई तरह के सुगबुगाते सवालों को जन्म दे डाला है. राहुल के परिजन उनकी मौत को हत्यारी व्यवस्था का परिणाम मानते हैं तो राजनीतिक दलों को पूरे प्रकरण में गहरी साजिश नजर आती है.  भारतीय पुलिस सेवा 2002 बैच के राहुल ने अपने एक मित्र हरिमोहन ठाकुरिया से फेसबुक पर बातचीत के दौरान यह स्वीकारा था कि उन्हें चुनावी खर्चों का टारगेट दिया गया था. इस बातचीत ने प्रदेश की रमन सरकार को भी आरोपों के कटघरे में खड़ा कर दिया है.

गौरतलब है कि राहुल शर्मा बीती 12 मार्च को बिलासपुर स्थित पुलिस ऑफिसर्स मेस में मृत पाए गए थे. उन्हें नजदीक से जानने-समझने वाले एक साहित्यकार गोपनीयता की शर्त पर बताते हैं, ‘बड़े साहब जीपी सिंह (आईजी) ने उनके तमाम अधिकार छीन लिए थे. यहां तक कि उन्हें किसी की छुट्टी को मंजूर करने का अधिकार भी नहीं रह गया था. परेशान होकर राहुल शर्मा ने नवीन जिंदल के यहां नौकरी करने की बात कही थी.’ साहित्यकार ने अपनी बातचीत में एक जज का उल्लेख तो किया ही यह भी बताया कि जमीन हथियाने के एक मामले में राहुल शर्मा ठोस कार्रवाई करना चाहते थे लेकिन आला अफसरों और नेताओं के दबाव की वजह से वे कुछ कर नहीं पा रहे थे.

इधर राहुल शर्मा के परिजनों ने उनकी खुदकुशी के लिए उनके बॉस और एक जज को दोषी माना है. परिजनों का आरोप है कि राहुल शर्मा अपने बॉस के व्यवहार से प्रताड़ित तो थे ही, जज ने भी उन्हें ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार के लिए फटकारा था. राहुल शर्मा के पिता राजकुमार शर्मा  कहते हैं, ‘ मेरा बेटा अक्सर यह कहता था कि बॉस का व्यवहार अच्छा नहीं है.’ राहुल शर्मा की पत्नी और रेलवे अधिकारी गायत्री शर्मा का भी कहना है कि बेहद दबाव की वजह से उनके पति स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पा रहे थे. वैसे पुलिस ने जो सुसाइड नोट बरामद किया है उसमें राहुल शर्मा ने यह लिखा है, ‘हद से ज्यादा अड़चनें पैदा करने वाले बॉस और हठधर्मी जज ने शांति छीन ली है और उनके परिवार को मुश्किल में डाल दिया है.’ राहुल ने अपने सुसाइड नोट में अपने बॉस और जज के नाम का उल्लेख तो नहीं किया है लेकिन उनकी पत्नी ने सिविल लाइन थाने के प्रभारी आरआर कश्यप को दिए गए बयान में हाई कोर्ट के एक जज का नाम लिखवाया है. इस बात की पुष्टि थाना प्रभारी आरआर कश्यप ने भी तहलका से की है.

राहुल शर्मा की मौत के बाद कई सवाल रहस्य के आवरण में लिपटे हुए नजर आ रहे हैं. हादसे से एक दिन पहले यानी 11 मार्च, 2012 की रात आठ से नौ बजे के बीच राहुल ऑफीसर्स मेस में रहने के लिए आ गए थे. सवाल उठ रहा है कि जब उनकी पत्नी का घर रेलवे कालोनी में मौजूद था तो फिर उन्हें आफीसर्स मेस में रहने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके जवाब में उनकी पत्नी कहती हैं, ‘पता नहीं किसने यह प्रचारित कर दिया था कि हमारे बीच कुछ अनबन चल रही है. सच्चाई यह है कि  वे मुझे मेस में रुकने की जानकारी देकर ही गए थे.’ गायत्री विलंब से दी गई सूचना को लेकर भी सवाल उठाती हंै. वे कहती हैं, ‘जब घटना एक से डेढ़ बजे के आसपास की बताई जा रही है तब मुझे लगभग तीन बजे इसकी सूचना क्यों दी गई? इस बीच पुलिस क्या करती रही?’ मनोनीत सांसद इंग्रिड मैक्लाड भी घटना के बाद आनन-फानन में की गई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर संदेह जताती हैं. पुलिस पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए मैक्लाड आशंका जताती हैं कि मामला खुदकुशी की बजाय हत्या का भी हो सकता है.

राहुल शर्मा का शव 12 मार्च को मेस के बाथरूम में मिला. पुलिस ने उनका सुसाइड नोट 13 मार्च की शाम एक  सूटकेस से बरामद किया. लेकिन इस नोट की बरामदगी से पहले ही पुलिस ने 12 मार्च को यह मान लिया था कि उन्होंने आइने के सामने खड़े होकर खुद को गोली मार ली है? शर्मा ने कब गोली चलाई? मेस में मौजूद कर्मचारियों ने गोली चलने की आवाज क्यों नहीं सुनी? इन सवालों पर भी रहस्य कायम है. पिस्टल से खुद को खत्म कर लेने के तरीके और सुसाइड नोट के सूटकेस में रखे होने को लेकर भी कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं. सुसाइड नोट किसी खुली जगह की बजाय सूटकेस के भीतर से मिलने से भी सवाल उठ रहे हैं.  पुलिस ने मौके पर जिन सामानों की जब्ती बनाई है उसे लेकर भी संदेह कायम है. पुलिस को मौके पर पिस्टल तो मिल गई है लेकिन उसका होल्स्टर ( कवर ) नहीं मिला है. इसी तरह लैपटॉप के कवर की बरामदगी दिखाई गई है,  लेकिन लैपटाप कहां है इसे लेकर कोई भी अफसर कुछ बोलने को तैयार नहीं है. गायत्री शर्मा लैपटॉप में महत्वपूर्ण दस्तावेज होने की संभावना से इनकार नहीं करतीं.

राहुल शर्मा प्रकरण से जुड़ा एक अबूझ तथ्य यह भी है कि पुलिस ने अब तक किसी के खिलाफ भी आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करने का मामला दर्ज नहीं किया है

एसपी राहुल शर्मा और आईजी जीपी सिंह के बीच टकराव को लेकर भी कई तरह की बातें सामने आ रही हंै. तहलका ने इस संबंध में कई पुलिस कर्मियों और अफसरों से चर्चा करनी चाही तो ज्यादातर इससे बचते नजर आए. एक-दो अफसरों ने दबी जुबान में माना कि सिंह और शर्मा के बीच सब कुछ ठीक नहीं था. एक अफसर की मानें तो इन दोनों अधिकारियों के बीच तनाव की शुरुआत तभी हो गई थी जब दोनों नक्सल प्रभावित क्षेत्र बस्तर में तैनात थे. दोनों के बिलासपुर आने के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा.

इधर राहुल शर्मा से चुनावी फंड के लिए रकम जुटाने के संबंध में एक बातचीत के सार्वजनिक हो जाने के बाद राजनीतिक भूचाल आ गया है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का यह आरोप है कि सरकार ने अफसरों को उगाही करने वाले कार्यकर्ताओं में तब्दील कर दिया है.  विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष एवं कांग्रेस विधायक धर्मजीत सिंह का आरोप है कि सरकार ने चंदा उगाही करने वाले तत्वों का सेल गठित कर रखा है जिसमें कुछ अफसर और नेता शामिल हैं. हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि प्रदेश के किस नेता या अफसर ने राहुल शर्मा से चुनावी फंड के लिए तैयार रहने को कहा था लेकिन राहुल शर्मा ने अपने एक मित्र हरिमोहन ठाकुरिया से फेसबुक पर बातचीत करते हुए जो कुछ लिखा उसके चलते सरकार कटघरे में जरूर खड़ी हो गई है. इस मामले में सरकार की तरफ से कोई सफाई तो प्रस्तुत नहीं की गई है अलबत्ता सीबीआई जांच की घोषणा कर आरोपों की आंच को कम करने की कोशिश जरूर हुई है. राहुल ने फेसबुक पर जो टिप्पणी की थी वह कुछ इस तरह से है –  ‘यार बहुत बेगार करवाते हैं. कोई सेल्फ रिसपेक्ट है ही नहीं. इलेक्शन के खर्चों का टारगेट अभी से दे दिया है. क्या इसलिए इतनी पढ़ाई करके आईपीएस बना था.’ ठाकुरिया ने बातचीत के इस अंश को अपने वाल पर चस्पा भी किया था. जब इस मामले में कांग्रेस ने हो-हल्ला मचाया तब सनसनीखेज अंश डिलीट कर दिया गया. ठाकुरिया कहते हैं, ‘मैंने वॉल पर जो कुछ चस्पा किया था दरअसल वह मेरा अपना निजी विचार था कि शायद राहुल शर्मा को चुनावी खर्चों का लक्ष्य पूरा करने के लिए कहा गया था. विवाद के बाद इसे डिलीट कर दिया गया.’

हालांकि छत्तीसगढ़ कांग्रेस के मीडिया विभाग के मुख्य प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी इसे दबाव में दिया गया वक्तव्य मानते हैं. वे कहते हैं, ‘घटना के पहले दिन से सबूतों को नष्ट करने वाली ताकतें सक्रिय हैं. यदि ठाकुरिया के वक्तव्य का निहितार्थ कुछ अलग था तो उन्हें किसी दूसरी टिप्पणी के जरिए यह साफ करना था कि उनके कथन का गलत अर्थ निकाला जा रहा है.’ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं, ‘ठाकुरिया की बात सही है या गलत इसकी जांच होनी चाहिए और यह देखने की कोशिश भी होनी चाहिए कि इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल हैं.’
वैसे राहुल शर्मा प्रकरण का एक खौफनाक सच यह भी है कि पुलिस ने अब तक ज्ञात-अज्ञात किसी भी शख्स के खिलाफ आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करने का मामला दर्ज नहीं किया है. एक वरिष्ठ पुलिस अफसर बीएस मरावी कहते हैं, ‘किसी भी मामले को दर्ज करने के पहले सभी पहलुओं पर विचार करना होता है. राहुल शर्मा के मामले में यह तो देखना ही होगा कि उन्हें आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करने का काम किसने और किसके सामने किया था. यदि शर्मा किसी तनाव में चल रहे थे तो छुट्टी ले सकते थे अथवा स्थानांतरण के लिए आवेदन लगा सकते थे.’ मरावी यह भी कहते हैं कि जब सरकार ने सीबीआई को प्रकरण सौंप ही दिया है तो फिर अब मामला सीबीआई ही दर्ज करेगी.

साफ है कि पुलिस ने कौन -सा ट्रैक पकड़ लिया है. राहुल शर्मा की खुदकुशी को खुदकुशी की बजाय सिस्टम के द्वारा की गई हत्या मानने वाले सामाजिक कार्यकर्ता आंनद मिश्रा मरावी के कथन को दोषियों को बचाने का एक तरीका मानते हैं. अंचल के वरिष्ठ लेखक मोहन राव का भी मानना है कि व्यक्ति के भीतर आत्महत्या की परिस्थितियां अपमान से ज्यादा आत्मसम्मान पर किए गए चोट पर निर्भर करती हैं. राव मानते हैं कि पूरे प्रकरण में यह देखना भी बेहद  जरूरी है कि आखिर ऐसी कौन सी बात थी जिसने राहुल शर्मा की गैरत को रोने के लिए मजबूर कर दिया था. जिस रोज इस बात का पता चल जाएगा उस दिन मामला पूरी तरह साफ हो जाएगा.

महिलाओं का मध्य युगीन प्रदेश

हाल ही में मध्य प्रदेश के गृह मंत्री उमा शंकर गुप्ता ने विधानसभा में जानकारी दी थी कि पिछले तीन साल के दौरान राज्य में कुल 9926 बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गईं. 2009 में 3,071, 2010 में 3,220 और 2011 में बलात्कार के 3381 मामले. ये सरकारी आंकड़े हैं और सच छिपाने की अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति के बावजूद बेहद भयावह. एक सामान्य गुणा भाग के बाद ही आप समझ सकते हैं कि प्रदेश महिलाओं के रहने के लिए किस हद तक खतरनाक जगह बन चुका है. इन आंकड़ों के हिसाब से आज राज्य में हर दिन तकरीबन 10 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं.

सरकारी आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि पिछले तीन साल में यौन उत्पीड़न की शिकार 1,961 महिलाओं की हत्या भी की गई. इस चलन का ताजा उदाहरण 24 मार्च को देखने को मिला जब बैतूल की एक 50 वर्षीय, महिला की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि उसने अपनी नाबालिग बेटी के साथ हुए बलात्कार की शिकायत दर्ज करवाई थी. यह मामला राष्ट्रीय स्तर के मीडिया में काफी समय से सुर्खियों में है. इसके अलावा भी महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़ी ऐसी कई घटनाएं बीते दिनों में हुईं जिनकी वजह से प्रदेश लगातार चर्चा में रहा है. इसी साल 18 फरवरी को इंदौर के पास एक कस्बे बेतमा में 16 लोगों द्वारा दो युवतियों के साथ सामूहिक बलात्कार की बात सामने आई थी. आरोपितों में भाजपा व कांग्रेस पार्षदों के बेटे और स्थानीय दुकानदारों से लेकर खेतों में काम करने वाले अधेड़ किसानों तक सभी शामिल थे.

राज्य सरकार इस घटना पर सफाई देने की पूरी स्थिति में आ भी नहीं पाई थी कि देपालपुर क्षेत्र में एक 36 वर्षीय मूक-बधिर महिला के साथ चाकू की नोक पर किए गए सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आ गया. राज्य में महिलाओं के यौन उत्पीड़न और उनके प्रति अपराध की एक अनवरत श्रंखला चल रही है. और इनको रोक पाने में सरकार की यह असफलता ही है जिसके चलते महिलाओं के खिलाफ अपराधों की सूची में मध्य प्रदेश पिछले तीन साल से पहले स्थान पर बना हुआ है. इस साल के आंकड़ों पर ही गौर करें तो पता चलता है कि जनवरी से लेकर अभी तक राज्य में बलात्कार के तकरीबन 797 मामले सामने आए हैं. इनमें से 76 मामलों में महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था. इस पूरी तस्वीर का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि इनमें से 414 नाबालिग लड़कियां थीं.

कमोबेश एक शांत राज्य की छवि वाले मध्य प्रदेश में ऐसी घटनाएं कई सवाल खड़े कर रही हैं. पहला तो यही कि मध्य प्रदेश बलात्कार या महिला के खिलाफ हिंसा के सबसे दुर्दांत अपराध में अव्वल क्यों है? क्यों राज्य के लगभग हर जिले से इस तरह की घटनाओं की खबरें आ रही हैं?  यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि राज्य सरकार की महिला कल्याण के लिए चलने वाली बेहद प्रचारित-प्रसारित योजनाओं के बावजूद इन घटनाओं पर रोक नहीं लग पा रही है.

‘बुंदेलखंड और चंबल में बलात्कार के आरोपित इसलिए छूट जाते हैं कि उनमें से ज्यादातर को राजनीतिक प्रश्रय मिला हुआ होता है’

जब हमने इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश की तो हमें कमजोर पुलिस-प्रशासन, अपराधियों को मिल रहे राजनीतिक प्रश्रय और आपराधिक मानसिकता को संबल प्रदान करने वाले ‘लो कन्विक्शन रेट (आरोपितों के दोषी साबित होने की दर) ‘ जैसे कई कारणों का पता चला. ये सारी वजहें राज्य को एक मध्य युगीन कबीलाई समाज में तब्दील कर रही हैं. इस मसले पर खुल कर आवाज उठाने वाले मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक दिनेश जुगरान इन हालात के लिए राज्य में बढ़ रही अराजकता को जिम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं, ‘ पिछले 2 -3 साल के दौरान पूरे राज्य में एक अजीब तरह की अराजकता फैल गई है. ऐसा लगता है जैसे कानून का कोई भय ही नहीं बचा. और ऐसे सामंती मानसिकता के अपराधी जब अपराध करने के बाद भी छूट जाते हैं तो नए अपराधियों के हौसले बुलंद हो जाते हैं. जाहिर है महिलाएं समाज का सबसे कमजोर तबका हैं और इसलिए इस बढ़ती अराजकता का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव भी उन्हीं पर पड़ रहा है.’

मध्य प्रदेश में महिला अधिकारों के लिए लंबे समय से काम कर रही सामाजिक कार्यकर्ता सारिका सिन्हा का मानना है कि वर्तमान भाजपा सरकार महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा को गंभीरता से नहीं लेती. प्रदेश में सक्रिय इस राजनीतिक-आपराधिक कॉकटेल की ओर इशारा करते हुए वे कहती हैं, ‘जब भी बलात्कारों के बढ़ते आंकड़ों पर सवाल उठाओ, सरकार रटा-रटाया जवाब दे देती है कि हमारे यहां मामले दर्ज ज्यादा होते हैं इसलिए नजर भी ज्यादा आते हैं. पर हमारी ग्राउंड रिपोर्ट के आधार पर फर्क बस इतना आया है कि पहले 100 में से चार मामले दर्ज होते थे और अब लगभग 10 दर्ज हो जाते हैं. वर्तमान भाजपा सरकार महिलाओं के मामले में काफी फासीवादी रही है. बुंदेलखंड और चंबल जैसे क्षेत्रों में सरकारी संरक्षण की वजह से ही अपराधी लगातार छूट रहे हैं.’

मध्य प्रदेश में अपराधों के इस चलन के लिए जानकार कई भौगोलिक और सामाजिक कारणों को भी दोषी ठहराते हैं. गौर करने वाली बात है कि मध्य प्रदेश में भारत के कुछ सबसे पिछड़े इलाके आते हैं. लगभग 22 प्रतिशत आदिवासी जनसंख्या वाले इस राज्य में बुंदेलखंड और चंबल जैसे सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े क्षेत्र भी शामिल हैं. जातिगत द्वेष और पुरातन परंपराओं में जकड़े समाज को महिलाओं के साथ हो रही हिंसा की प्रमुख वजह बताते हुए अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की प्रदेश अध्यक्ष संध्या शैली कहती हैं, ‘ज्यादातर मामलों में एक जाति या समाज को नीचा दिखाने  या फिर बदला लेने के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है. इन लोगों का मानना है कि किसी भी जाति को शर्मसार करना हो तो उनकी औरतों का बलात्कार कर दो.’

राज्य महिला आयोग ने हाल की घटनाओं को देखते हुए कुल 11 सिफारिशों का एक ड्राफ्ट प्रदेश सरकार को सौंपा है. आयोग की अध्यक्ष उपमा राय तहलका से बातचीत में कड़ी पुलिसिंग और सख्त जांच प्रक्रिया की पैरोकारी करते हुए कहती हैं, ‘ ज्यादातर मामलों में अपराधी सबूतों की कमी की वजह से छूट रहे हैं. गवाहों और पीड़ित महिला को भी डरा-धमका कर पक्षद्रोही बना दिया जाता है. वजह यह भी है कि पुलिस सामने दिखने वाले सबूतों को भी नजरंदाज कर देती है. कड़ी जांच और सघन तहकीकात से दोषियों को सजा दिलवाई जा सकती है. और यही किसी भी बलात्कार पीड़ित महिला के लिए सबसे बड़ी सांत्वना है.’

धर्म से हारी राजनीति

कहते हैं पंजाब में धर्म और राजनीति का चोली दामन का साथ रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों में राजनीति ने धर्म से अलग हटकर अपनी एक पहचान स्थापित की. दोनों अलग होकर अपने-अपने रास्ते पर बढ़ते गए. उसी के उदाहरण के तौर पर हम पाते हैं कि शिरोमणि अकाली दल (बादल) इस बार विधानसभा चुनाव में पिछले 46 साल के सत्ता विरोधी चलन को समाप्त करते हुए दोबारा सत्ता में आया. एक पंथिक पार्टी होने के अपने इतिहास के बावजूद  पंथ को पीछे छोड़ते हुए उसने विकास और सुशासन के आधार पर इस बार चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. पूरे चुनाव में पार्टी ने किसी तरह का पंथिक मामला नहीं उठाया. ऐसा लग रहा था मानो अब पंजाब में भावनात्मक और पंथिक राजनीति के दिन पूरे हो गए हैं. लेकिन जल्द ही यह भ्रम टूट गया.

पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के आरोपित बलवंत सिंह राजौना के मामले ने पंजाब की राजनीति और उस राजनीति की रगों में बह रहे धर्म रक्त के प्रभाव और उसके वर्चस्व को भी रेखांकित किया है. जब से राजौना का मामला प्रकाश में आया प्रदेश की पूरी राजनीतिक व्यवस्था एक अंजाने से भय से ग्रसित दिखी. नेता धर्मगुरुओं के फरमानों पर फड़फड़ाते देखे गए.

चंड़ीगढ़ की एक स्थानीय अदालत ने जिस दिन राजौना को फांसी की सजा सुनाई, उसी दिन से ही राज्य में राजौना की फांसी को लेकर छोटे स्तर पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था. शुरुआत में इसमें सिर्फ कुछ कट्टर सिख संगठन ही शामिल दिखे लेकिन जैसे-जैसे 31 मार्च का दिन जब पटियाला जेल में बंद राजौना को फांसी दी जानी है, करीब आया वैसे-वैसे पूरे राज्य में मामला फैलता गया.

हाल में गठित हुई प्रदेश की नई सरकार ने इस मामले में शुरुआत में कोई रुचि नहीं दिखाई. लेकिन सिख धर्म की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरुबचन सिंह के पटियाला जेल में राजौना से मिल कर आने के बाद तो मानो राजनीतिक दलों (खासकर अकाली दल (बादल)) के हाथ पांव फूल गए. राजौना से मिलकर आने के बाद मीडिया से मुखातिब ज्ञानी गुरबचन सिंह ने सरकार और विशेष तौर पर उसके मुखिया प्रकाश सिंह बादल को आदेश देते हुए कहा कि वे राष्ट्रपति से तुरंत मिलें और राजौना की फांसी पर रोक लगाने की मांग करें.

गुरुबचन के इसी बयान के बाद प्रदेश की राजनीति ने हरकत में आने में ही अपनी भलाई समझी. अकाली दल ने अपनी कोर कमिटी की मीटिंग बुलाकर मामले को आगे बढ़ाने अर्थात राजौना की फांसी रुकवाने संबंधी मुहिम की शुरुआत की.  दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस, जिसके मुख्यमंत्री की हत्या का राजौना के ऊपर आरोप है,  शुरु-शुरु में कानून अपना काम करेगा सरीखी बातें करती दिखी.

एक वर्ग का मानना है कि राजौना के फैसले के बाद उन लोगों के अभियान को जरूर बल मिलेगा जो अफजल गुरू के लिए भी माफी की मांग कर रहे हैं

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष एवं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता बलराम जाखड़ के पुत्र सुनील जाखड़ ने राजौना को माफी दिए जाने संबंधी मुद्दे पर शुरुआत में कानून की दुहाई दी. लेकिन जैसे ही मामले ने धार्मिक और भावनात्मक रंग लिया वैसे ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पार्टी की तरफ से एक पत्र जारी कर कहा कि प्रदेश कांग्रेस राजौना को माफी दिए जाने की मांग का समर्थन करती है. यहां तक कि बेअंत सिंह के परिवारवालों ने बयान देकर राजौना को माफी दिए जाने पर कोई आपत्ति न होने की बात की. इस पूरे मामले पर भाजपा का ही रुख अलग रहा जिसने कानून प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करने की बात की. इस मामले में एक तरफ धर्म का प्रदेश की राजनीति पर वर्चस्व स्थापित होते दिखा तो दूसरी तरफ पूरे मामले में एक संवैधानिक संकट भी खड़ा होते दिखाई दिया.

यह स्थिति तब पैदा हुई जब पटियाला जेल अधीक्षक लखविंदर सिंह जाखड़ ने कई कानूनी अड़चनों का हवाला देते हुए चंडीगढ़ की उस स्थानीय अदालत का फैसला मानने से इनकार कर दिया जिसमें उसने राजौना को 31 मार्च को फांसी देने की बात की थी. कोर्ट ने दो बार अपना आदेश जेल अधीक्षक को भेजा और दोनों बार अधीक्षक ने उसे वापस लौटा दिया. अधीक्षक को अदालत ने अवमानना का नोटिस भी जारी किया. लेकिन अधीक्षक का कहना था, ‘हम नोटिस का जवाब देंगे, लेकिन राजौना को फांसी नहीं.’
अधीक्षक ने मामले को लेकर हाई कोर्ट में अपील करने की बात कही. कोर्ट और जेल अधीक्षक के बीच के विवाद ने एक नई बहस को जन्म दिया. सवाल उठने लगे कि क्या कोई कार्यपालिका अदालत का आदेश लागू करने से इनकार कर सकती है. जानकारों का मानना है कि पंजाब का यह उदाहरण भविष्य में अन्य राज्यों तथा संस्थाओं के लिए नज़ीर बन सकता है. अगर ऐसा हुआ तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न होते देर नहीं लगेगी और फिर न्याय के शासन का स्थान ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ में बदल जाएगा. चूंकि न्यायालयों के पास कानून का पालन कराने या उसे लागू कराने के लिए कोई बल नहीं है ऐसे में न्यायालय का जो फैसला राज्यों के खिलाफ होगा उसे लागू करने में वे वर्तमान उदाहरण का सहारा ले सकते हैं.

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा है कि जिस बलवंत सिंह राजौना की फांसी की सजा को माफ करवाने के लिए प्रदेश के विभिन्न धार्मिक और राजनीतिक संस्थाओं के प्रमुख लगे थे वह खुद माफी नहीं चाहता था.  राजौना को जब चंडीगढ़ की स्थानीय अदालत ने फांसी की सजा सुनाई तो उसने इसके खिलाफ अपील करने से साफ इंकार कर दिया. उसने कहा कि उसने जो किया उसकी पूरी जिम्मेदारी वह लेता है. उसने यह भी कहा कि वह आगे इस मामले में कोई अपील नहीं करना चाहता, उसे सजा मंजूर है. वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या में सह-अभियुक्त जगतार सिंह हवारा जिसे अदालत ने राजौना के साथ ही फांसी की सजा सुनाई थी, ने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की और अदालत ने उसकी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया. कानून के जानकार बताते हैं कि अगर राजौना ने अपनी फांसी के खिलाफ अपील की होती तो उसकी सजा भी उम्रकैद में बदल गई होती.

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि ऐसा व्यक्ति जिसके पास अपनी सजा को उम्र कैद में बदलवाने का कानूनी विकल्प मौजूद है लेकिन वह फिर भी फांसी पर चढ़ना चाहता है, उस व्यक्ति को लेकर इतनी बेचैनी कहां तक उचित है. राजौना ने न केवल माफी संबंधी किसी भी तरह की मांग भारतीय राज्य के सामने करने से साफ इनकार दिया बल्कि उसने यहां तक कहा कि उसे भारतीय राज्य एवं संविधान पर कोई विश्वास नहीं और किसी को उसके लिए माफी की भीख मांगने की जरूरत नहीं है. यहां तक कि राजौना ने उन विभिन्न राजनीतिक दलों के उन लोगों की आलोचना भी की जो उसे माफी दिलाने को लेकर अभियान चलाए हुए थे. शिरोमणि अकाली दल (बादल) जिसके मुखिया प्रकाश सिंह बादल के राष्ट्रपति से मिलने के बाद राजौना की फांसी पर रोक लगी है, उन्हीं बादल को राजौना ने काफी भला बुरा कहा.

ऐसा माना जा रहा है कि राजौना को फांसी की सजा पर रोक लगाकर केंद्र सरकार ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया है. पिछले कुछ समय में कई अपराधियों की इसी आधार पर सजा माफ करवाने की कोशिश की गई है कि अगर सजा दी गई तो शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. अफजल गुरु का उदाहरण हमारे सामने है जिसको लेकर जम्मू कश्मीर की विधानसभा में आए दिन बवाल होता रहता है. वहां एक वर्ग ऐसा है जिसका तर्क है कि अफजल को फांसी की सजा से माफी दी जानी चाहिए. क्योंकि अगर उसे फांसी पर लटकाया गया तो राज्य में अमन चैन प्रभावित हो सकता है. इसी आशय से संबंधित एक प्रस्ताव भी वहां की विधानसभा में पास कराने का प्रयास किया गया. एक वर्ग का मानना है कि राजौना के फैसले के बाद उन लोगों के अभियान को जरूर बल मिलेगा जो अफजल के लिए भी माफी की मांग कर रहे हैं. तमिलनाडु की विधानसभा ने राजीव गांधी के हत्यारों को माफी देने संबंधी प्रस्ताव को पहले ही पारित कर दिया है. बाकी मामलों और राजौना के मामले में एक बड़ा अंतर यह है कि अन्य मामलों में अपराधियों के मामले विभिन्न न्यायिक प्रक्रियाओं से गुजर कर अंतिम पड़ाव अर्थात राष्ट्रपति के पास पहुंचे हैं. यानी उन्होंने पूरी न्यायिक प्रक्रिया का पालन किया. लेकिन राजौना के मामले में ऐसा नहीं है. राजौना ने पहली अदालत के फैसले के बाद आगे अपील करने से ही इनकार कर दिया. जिस माफीनामे की अर्जी पर विचार करने हेतु स्वीकारते हुए राष्ट्रपति ने फांसी पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा दी है उस माफी का आवेदन भी राजौना ने नहीं पेश किया है बल्कि उसकी जगह दूसरे लोगों ने माफी की अर्जी राष्ट्रपति को दी है.

यह मामला इस मायने में बहुत खास है कि इसमें जो कुछ भी हो रहा है, चाहे राष्ट्रपति के पास दया याचिका लेकर जाना, या फिर पुलिस अधीक्षक का हाईकोर्ट में निचली अदालत के फांसी संबंधी निर्णय को चुनौती देना. यह सबकुछ न तो बलवंत सिंह राजौना कर रहा है और न ही उसकी इस मामले में कोई लिखित सहमति है. यहां तक कि उसने उसे लेकर चलाई जा रही माफी संबंधी प्रक्रिया का विरोध करते हुए बार-बार आगे अपील न करने (राष्ट्रपति के सामने भी नहीं) की बात कही है. ऐसे में यह मामला कानूनी रूप से और अधिक जटिल बन जाता है.

कुल मिलाकर इस वाकये ने यह पुरानी बहस फिर जिंदा कर दी है कि भावना बड़ी है या कानून. अहम बात यह भी है कि इस मामले ने न सिर्फ व्यवस्था का खोखलापन दिखाया है बल्कि राजनीति पर धर्म का वर्चस्व फिर से स्थापित भी किया है.