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"अच्छे से खाना खाओगी तो ठीक हो जाओगी…"

 

 

दिनांक- 09/11/1908

कस्तूरबा,

तुम्हारी तबीयत के बारे में श्रीधीर ने आज तार भेजा है, मेरा दिल चूर-चूर हो रहा है. लेकिन तुम्हारी चाकरी करने के लिए आ सकूं, ऐसी हालत नहीं है. सत्याग्रह की लड़ाई में मैंने सबकुछ लगा दिया है. मैं वहां आ ही नहीं सकता. जुर्माना भरूं तभी आ सकता हूं और जुर्माना तो हरगिज नहीं दिया जा सकता.

तुम हिम्मत बांधे रखना. अच्छे से खाना खाओगी तो ठीक हो जाओगी. फिर भी मेरी बदकिस्मती से तुम जाओगी ही. अगर ऐसा होगा तो मैं तुमको इतना ही लिखता हूं कि तुम जुदाई में, पर मेरे जीते जी, चल बसोगी तो मेरी बात न होगी. मेरा प्यार तुम पर इतना है कि मरने पर भी तुम मेरे मन में हमेशा जिंदा रहोगी. यह मैं तुमको पूरे विश्वास से कहता हूं.

अगर तुम्हारा जाना ही हुआ, तो तुम्हारे बाद मैं दूसरी स्त्री नहीं करनेवाला हूं. यह मैंने तुम्हें पहले भी एक-दो बार कहा है. तुम ईश्वर पर यकीन रखकर प्राण छोड़ना. तुम मरोगी तो वह भी सत्याग्रह का एक अंग होगा. मेरी लड़ाई सिर्फ राजनीतिक नहीं है, बल्कि धर्म की लड़ाई है.यानि बहुत ही पवित्र लड़ाई है. इसमें मर भी जाये तो क्या और जीते रहें तो भी क्या? तुम भी ऐसा ही मानकर अपने मन में थोड़ा भी बुरा भाव नहीं लाओगी, ऐसी मुझे उम्मीद है, तुमसे यही कामना है.

गांधी

स्रोतः लव लेटर्स, प्रकाश पंडित.

प्रस्तुति- अनुपमा.

"बापू! आदर्श क्या जमीन पर उतर कर इतना घिनौना होता है"

 

पूज्य बापू,

सादर प्रणाम.

दरभंगा जिले की आज जैसी स्थिति है, कांग्रेसी मंत्रीमंडल में आज जो यहां दमन चक्र चल रहा है, जमींदार और सरकारी कर्मचारियों का गठबंधन जनता और कार्यकर्ताओं पर जिस तरह जुल्म ढ़ा रहा है, आज इसकी ओर कोई आंख उठाकर देखने वाला नजर नहीं आता. चारों ओर अंधकार ही अंधकार है. गवर्नरी शासन में यहां आज की तरह के दमन और जुल्म होते तो इसके विरुद्ध प्रांत के राष्ट्रीय अखबारों के कालम के कालम मोटे अक्षरों से भर दिए गए होते और हमारे नेताओं की भी आवाज इसके विरुद्ध उठी होती, जैसा कि सदा आज के पहले हुआ करता था. लेकिन आज कांग्रेसी मंत्रिमंडल में जहां प्रांतीय राष्ट्रीय अखबारों ने अपना मुंह बंद कर रखा है, हमारे कांग्रेसी नेताओं को भी इस ओर देखने और सोचने की फुर्सत नहीं, जिला कांग्रेस कमिटियों का हाल तो और भी बदतर है. चुनाव की धांधली के कारण आज ऐसे लोग चोटी पर हैं जिन्हें जिला के जन जीवन का भयंकर अकल्याण भी विचलित नहीं करता, ऐसे समय में अगर हमे किसी से उम्मीद है तो वह आप ही हो सकते हैं, जिसने सदा सत्य और न्याय के लिए अपनी जान बाजी पर रखी है. 

गत मार्च से ही इस जिले के अधिकारियों का दमन चक्र हम समाजवादी कार्यकर्ताओं पर चलने लगा, लेकिन अब तो इस क्रूर दमन चक्र का शिकार हम समाजवादियों से प्रभावित किसान मजदूर भी होने लग गए हैं. गत मार्च में जबकि जिले भर में भीषण अन्न संकट प्रारंभ हो गया था, जिले के कोने-कोने में भूखी जनता दाने-दाने को तरस रही थी, चोर बाजार खूब गर्म था और जगह-जगह से भुखमरी की खबरें भी आने लगी थीं तो हमलोगों ने दरभंगा और मधुबनी में भुक्खड़ों के प्रदर्शन का आयोजन किया. सभा करके, जुलूस निकालकर अधिकारियों का ध्यान अन्न संकट की ओर आकृष्ट करने की कोशिश की, पर नतीज उल्ट हुआ. मर्ज के सही इलाज के बजाय सरकार ने दमन नीति को अख्तियार किया. कुछ दिनों की चुप्पी के बाद ही न जाने किस गुप्त मंत्रणा की प्रेरणा से जिला के अधिकारियों ने वार करना प्रारंभ किया. हमारे साथियों को ‘बिहार मेंटीनेंस ऑफ पब्लिक आर्डर एक्ट’ का शिकार बनाया जाने लगा. जिस कानून का निर्माण प्रांत में हिंदू-मुसलमान दंगा रोकने के लिए हुआ था, उसका उपयोग धड़ल्ले के साथ किसान-मजदूरों की सभाओं और रैलियों को रोकने के लिए किया जाने लगा. समाजवादी कार्यकर्ताओं को भी, जिन्होंने दंगा रोकने के लिए खून पसीना एक कर दिया और जिनके सफल प्रयास का लिखित प्रमाण पत्र भी कलक्टर ने दिया, इस कानून की जाल में फंसाया जाने लगा.

इस कानून के असली मकसद को ध्यान में रखे बिना ही, इसकी आड़ में नागरिक स्वतंत्रता का अपहण होने लगा. गांव-गांव में 144 धारा लागू कर सभी प्रकार की सभाओं और जुलूसों पर रोक लगा दी गई. इसी अभियोग में हमारे चुने हुए साथी गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिए गए. फलत: इस अनुचित गिरफ्तारी के विरोध में गत 18 अप्रैल को जिला के अनगिनत किसान मजदूरों ने, जिनमे हिंदू-मुसलमान, औरत मर्द सभी शामिल थे, अत्यंत उत्साह के साथ शांतिमय प्रदर्शन में भाग लिया. इस जिले के प्रदर्शनों में यह पहला मौका था जबकि लोगों ने हजारों की तादाद में हिंदू-मुसलमानों को एक साथ देखा. इतने पर भी सरकार ने इन प्रदर्शनकारियों पर दंगा फैलाने का इल्जाम लगाकर हजारों मर्द और औरतों को लाठियों से पुलिस द्वारा पिटवाया. लारियों में भर-भर कर लोगों को दूर चौरों में फिंकवाया. ठीक 1931 का दृश्य आंखों के सामने उतर आया था. इस तरह के जुल्म किसी भी सरकार के लिए शर्म की बात हो सकती है. सबसे उत्तेजना देने वाली बात तो यह हुई कि  औरतों पर बेरहमी के साथ लाठियां चलाई गई, उन्हें सड़कों पर घसीटा गया और भद्दी-भद्दी गालियां भी दी गई. राष्ट्रिय झंडों को फाड़कर उनसे जूते पोंछे गए और इस सिलसिले में उस दिन 97 व्यक्तियों को गिरफ्तार क जेल में बंद कर दिया गया.

इधर जमींदारी टूटने की चर्चा होने के समय से ही जमींदार किस तरह किसानों को बटाई जमीन से बेदखल करने पर तुले हुए हैं, इसकी जानकारी आपको प्रांतीय किसान सभा के सभापति पं रामानंद मिश्र जी के पत्र से हुई होगी. जहां किसान अपने कानूनी हक को छोड़ना नहीं चाहते, वहां जमींदार लठैतों और किराये के गुंडों के जरिय जबर्दस्ती उन्हें जमीन से बेदखल करने की चेष्टा करते हैं. साथ ही उन किसानों को मुकदमे से लाद देते हैं. जमींदारों के पास रुपए हैं. वे आसानी से इसका उपयोग कर फायदा उठा सकते हैं. इसके अतिरिक्त जमाने में ओर से छोर तक व्याप्त मंहगाई और अभाव ने धनियों के सुखों को भी कुछ काम कर दिया है, इसका असर अफसरों के दिमाग पर बड़ा गहरा है. जो सब दिन से दुखी था, उसके दुख की प्रतिक्रिया तो स्वाभाविक हो गई है, लेकिन जो सदा सुखी था, उसका थोड़ा दुख भी गंभीर प्रतिक्रिया उत्पन्न कर देता है. जमींदार की औरतें अपने पीने के लिए खुद कुएं से पानी भरें, इतना ही हममें से एक समुदाय को द्रवित कर देता है, लेकिन जो औरतें दूसरों के लिए भी अपने बचपन, जवानी और बुढ़ापे भर पानी भरती रहतीं हैं, किसी को नहीं खलता. फिर किसान और मजदूरों में थोड़ी चेतना आ रही है. इससे उन्हें ईर्ष्या होती है. खासकर दरभंगा के सबडीवीजन के एसडीओ का तो यही कहना है कि किसान आंदोलन हम जिस तरह भी होगा दबा कर ही छोड़ेंगे, यही हमें ऊपर से इंसट्रक्शन मिला है. किसानों और किसान कार्यकर्ताओं को परेशान करने के लिए सैकड़ों झूठे मुकदमे अभी जिला भर में उन पर चल रहे हैं, और उस पर से और भी नए-नए मुकदमे गढ़े जा रहे हैं. इन धांधलियों के चलते जिला भर के किसान जिस तरह से तबाह किए जा रहे हैं, उनमें से दो-चार का नमूने के तौर पर उल्लेख कर देना अनुपयुक्त न होगा. 

जगदीशपुर, थाना बहेड़ा, दरभंगा में सन 1939 ईस्वी में ही किसानों ने अपने हकों की लड़ाई की, गोलियां खाई, पंचायती हुई और तत्कालिन जिलाधिकारी ने किसानों की जमीन किसानों को दिला दी. अब किसनों की उन जमीनों को जमींदार दखल करना चाहते हैं, दर्जनों मुकदमे किसानों को तबाह करने के लिए चलाए गए, गोलियों की धमकियां दी गई, लेकिन किसानों के संगठन के आगे जमींदार को मुलायम पड़ना पड़ा. पंचायती के जिम्मे सभी मामले सुपुर्द करने की बात तय हुई. तीन पंच चुने गए. लेकिन एसडीओ बी. चौधरी के आते ही सारा मामला पलट गया. गुप्त मशविरा के बाद जमींदार ने दरख्वास्त किया कि केस का ट्रायल आन मेरिट हो. फिर क्या था? 107 की धार में किसानों से तुरंत ही लगभग डेढ़ लाख का मुचलका मांगा गया. किसानों को पकड़कर जेल में बंद कर दिया गया और उनकी गैरहाजिरी में ही उनके घरों को लूटा जाता, बिना वजन किए ही हर प्रकार का गल्ला उठा लिया जाता और सामानों की सूची भी नहीं दी जाती है. जमींदारों को साथ ले पुलिस अफसर लोगों के घरों में घुस कर उन्हें लुटते और किसानों को आतंकित कर परेशान करने की कोशिश करते हैं. कानूनी कार्यवाई भी इस प्रकार की जाती है कि कानून के बाहर के काम भी उसमें समा सकें. इस तरह की कार्यवाई समूचे जिले में की जा रही है. जिन किसान कार्यकर्ताओं को पकड़ा गया, उन्हें उसी जमींदार बाबू जटाशंकर चौधरी, जिन्होंने सन 1942 ईस्वी में कांग्रेस के श्राद्ध के उपलक्ष्य में भोज का आयोजन किया था, के यहां 24 घंटे तक बिना दाना-पानी दिए कैदी की हैसियत में कोठरी में बंद रखा और खाना मांगने पर दारोगा ने उन्हें लाठियां दी. ऐसा इसलिए किया गया जिससे किसान कार्यकर्ता का आम किसानों से असर कम हो जाए और जमींदारों का रोब उन पर छा जाए.

अटहर और इलमास नगर के भी इससे मिलते-जुलते किस्से हैं. अटहर का खूनी जमींदार जिसने 25 मार्च को एक किसान के बच्चे का चुपके से खून कर डाला, आज मजे में घूमता है, लेकिन सदर दरभंगा के एसडीओ बी. चौधरी ने वहां के किसानों को 107 धारा में जेल में बंद कर दिया है. यहां तक कि एसडीओ ने ऐसे आदमियों को भी जेल में बंद कर दिया है जिसमें दो को केवल देखने मात्र से जिलाधिकारी ने छोड़ देने का वचन दे दिया. हालांकि वे अभी तक छोड़े नहीं जा सके हैं. उनमें से एक तो दोनों आंख का अंधा है और बरसों से इस तरह सुजा हुआ है कि आसानी से चल फिर भी नहीं सकता.

खानपुर, बिक्रमपुर और उससे मिले-जुले दूसरे गांवों में एसडीओ ने 144 धारा लागू कर दी है. मिलिटरी पोस्टिंग है, किसान पीटे गए हैं और सैकड़ों की तादाद में उनकी गिरफ्तारियां हुई हैं और खुद एसडीओ की देख-रेख में किसानों की फसलों को जोत कर बर्बाद कर दिया गया है, ऐसी हालत में, मैं वहां एसडीओ के फैसले के विरुद्ध किसानों को यह सलाह देने गया कि…लेकिन मेरे वहां पहां पहुंचते ही समस्तीपुर एसडीओ बाबू बलराम सिंह भी पहुंचे और उन्होंने मुझे सभा करने का अपराधी बताया. मैंने उन्हें बताया कि सभा करने की बात तो सोलह आने गलत है. इस पर उनकी भवें तन गईं और उन्होंने मुझसे पूछा-एम आई एरेस्ट देन! यह सवाल मुझे बेतुका लगा, मैंने  कहा-दैट मे बी बेस्ट नोन टू योर सेल्फ. बस, मुझे लारी पर सवार होने के लिए मजबूर किया गया और किराए की मेरी कार वहीं पड़ी रही. मुझे ही नहीं, मुझे खाना खिलाने वाले साथी को भी गिरफ्तार किया गया और आज मैं सी क्लास क्रिमनल की जिंदगी व्यतीत कर रहा हूं. क्या यही वो हुकूमत है, जिसके लिए आज सोलह साल वर्षों से कांग्रेस  के एक ईमान्दार सिपाही की हैसियत से लड़ता आया हूं. क्या यह सच नहीं कि जो कुत्ते हमारा मांस नोच कर आज तक मोटे हुए, आज भी मैं उनका शिकार हूं और पहले जहां दुश्मनों की छ्त्र-छाया में वे ऐसा करते थे, आज यह सब हमारे दोस्तों के इशारे पर हो रहा है.

बापू! आदर्श क्या जमीन पर उतर कर इतना घिनौना होता है, जिससे नफरत पैदा हो जाए? आप आशा के आखिरी धागे हैं जिसके टूटते ही उस भयंकर विस्फोट की संभावना मालूम पड़ती है जो बरसों के साथी और मित्र को एक दूसरे का जानी दुश्मन बना देगा. एक के हाथ में सरकारी संगीनें हैं और दूसरे के तलहत्थी पर हजार बार मातृभूमि पर चढ़ाया हुआ उच्छिष्ट सा.

आपका

सूर्यनारायण

(फाइल नं. 6.7.1947. राज्य अभिलेखागार)

देस हुआ बेगाना

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वैसे तो महज बेघर होना ही अपने आप में बहुत बड़ा अभिशाप है, लेकिन उन लाखों लोगों पर क्या बीतती होगी जिनको इस देश में तकरीबन आधी सदी रहने के बाद भी देश का नागरिक तक नहीं माना जाता. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल की सीमा से लगे कई गांव हैं जिनमें रहने वाले लोग देखने में तो आम हिंदुस्तानियों जैसे ही लगते हैं लेकिन तकनीकी तौर पर वे अब भी देश के नागरिक नहीं हैं.

लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़े इस मसले की जड़ें करीब 50 साल पीछे जाती हैं. 1963 में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उथल-पुथल मचनी शुरू हुई तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन लोगों को भारत बुलाकर बसाने का सिलसिला शुरू किया. बांग्लादेश के खुलना, फरीदपुर, ढाका, चटगांव आदि जिलों से आकर हजारों परिवार उत्तर प्रदेश के पीलीभीत और उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर जिलों में बसे. लेकिन आज इन एक लाख से अधिक परिवारों में से बमुश्किल 15-20 हजार के पास ही भारतीय नागरिकता है.

नागरिकता न मिलने से इनकी जिंदगी में कई तरह के दुख हैं. बंगाली समुदाय के इन परिवारों के युवकों को न तो सरकारी नौकरी ही मिल पा रही है और न ही दूसरी अन्य सुविधाएं. हां, लोकसभा और विधानसभा चुनाव के वक्त अचानक नेताओं को इनका ध्यान आता है और उस दौरान इनकी नागरिकता के मुद्दे पर जमकर राजनीतिक रोटियां सेकी जाती हैं. कारण स्पष्ट है. इनके पास नागरिकता भले ही नहीं हो लेकिन मतदाता सूची में इनका नाम है. इनका मतदाता पहचान पत्र बना हुआ है. वैसे तो निर्वाचन आयोग का नियम है कि वही व्यक्ति चुनाव में हिस्सा ले सकता है जो भारत का नागरिक हो. लेकिन यहां यह नियम शायद लागू नहीं होता. लाखों की संख्या में मौजूद इन लोगों के पास भारत की नागरिकता तो नहीं है लेकिन वे चुनाव में वोट जरूर डालते हैं. उनका नाम वोटर लिस्ट में तो है ही, निर्वाचन आयोग की ओर से जारी किया गया पहचान पत्र भी उनके पास है. पूरे बंगाली समुदाय की यही चीज नेताओं व राजनीतिक पार्टियों को लुभाने का काम करती हैं. राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से लोग राशन कार्ड, वोटर आईडी और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे दस्तावेज बड़ी आसानी से बना लेते हैं.

[box]‘स्थानीय नेता बंगाली परिवारों का नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भले ही तत्पर न दिखते हों पर वोटर कार्ड बनवाने में उनकी प्रमुख भूमिका होती है'[/box]

स्थानीय पत्रकार महबूब मियां बताते हैं, ‘स्थानीय नेता बंगाली परिवारों का नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाने के लिए भले ही तत्पर न दिखते हों पर वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने से लेकर वोटर कार्ड बनवाने तक में उनकी प्रमुख भूमिका होती है. इसके लिए नेता अधिकारियों पर दबाव बनाने से लेकर सारे दूसरे हथकंडे तक अपनाते हैं. लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होते हैं नागरिकता और इनकी सुविधाओं व जरूरतों का मुद्दा नेताओं की प्राथमिकता से कोसों दूर चला जाता है.’

ऐसा भी नहीं है कि दुश्वारियां केवल उन्हीं परिवारों के लिए हैं जिनके पास नागरिकता नहीं है बल्कि सरकारी उपेक्षा के कारण वे परिवार भी परेशान हैं जिनके पास नागरिकता है. सरकार ने सन 1964 में पीलीभीत व ऊधमसिंह नगर की सीमा पर शारदा नदी के किनारे इन परिवारों को बसाना शुरू किया था. उस समय जिन परिवारों को भारत सरकार की ओर से नागरिकता दी गई थी उनमें से प्रत्येक परिवार को भरण-पोषण के लिए पांच-पांच एकड़ जमीन, एक जोड़ी बैल, खेती के लिए बीज, जंगल में रहने के कारण जान-माल की सुरक्षा के लिए बंदूकों के लाइसेंस सहित जरूरी राशन तक उपलब्ध कराया गया था. यह सिलसिला कुछ माह तक चला जब तक कि नागरिकता पाए परिवार खुद अपने खेतों में अनाज नहीं उगाने लगे. लेकिन इन परिवारों की खुशियां क्षणिक थीं. 1989 में शारदा नदी में आई भयंकर बाढ़ के कारण पीलीभीत जिले के रमनगरा, गभिया सहराई, कुतिया कबर सहित कई गांवों की खेती योग्य वह जमीन जो सरकार की ओर से आवंटित हुई थी, नदी में ही समा गई. इन गांवों की तो खेती गई लेकिन प्रकृति की सबसे अधिक मार गुन्हान गांव पर पड़ी. करीब 3000 की आबादी वाला यह गांव पूरा ही नदी में समा गया. गुन्हान के लोगों को शारदा नदी व शारदा बैराज के बीच स्थित सिंचाई विभाग की जमीन पर अस्थायी रूप से करीब 23 साल पूर्व बसाया गया था. ये आज भी वहीं रहने को मजबूर हैं. 80 साल के बुजुर्ग जगदीश कहते हैं, ‘अस्थायी रूप से जगह देते समय प्रशासन की ओर से कहा गया था कि कुछ समय बाद सबको स्थायी जगह रहने को दी जाएगी लेकिन वह दिन कभी नहीं आया.’

जिन लोगों के पास नागरिकता नहीं है, उनकी परेशानियों का तो कोई पारावार ही नहीं है. 70 साल के हरीपद मांझी तकरीबन 22 साल की उम्र में बांग्लादेश के खुलना जिले से आए थे. वहां के हालात ऐसे थे कि पत्नी व बच्चों की जान बचा कर खाली हाथ ही भागना पड़ा. वे बताते हैं, ‘सरकार ने सबसे पहले मध्य प्रदेश के माना कैंप में रखा. माना कैंप पहाड़ पर था जहां पर खेतीबाड़ी संभव नहीं थी. लिहाजा दो साल बाद परिवार सहित पश्चिम बंगाल के सुंदरबन चले गए. वहां  छह-सात महीने ही रहे थे कि समस्याएं शुरू हो गईं. स्थानीय लोगों ने वहां से हटने का दबाव बनाना शुरू कर दिया.’ वे आगे बताते हैं कि स्थानीय निवासियों का विरोध अभी शांत भी नहीं हो पाया था कि एक दिन पुलिसवालों ने आकर बंगाली समुदाय की झोपड़ियों में आग लगा दी. झोपड़ियां जलाने के बाद भी जब लोग नहीं हटे तो पुलिसवालों ने पिटाई करके सबको भगा दिया. मांझी कहते हैं, सुंदरबन से बेघर होने के बाद कई परिवार पीलीभीत आ गए. यहां आने के बाद भी विपत्तियों ने साथ नहीं छोड़ा. न तो परिवार पालने के लिए जमीन मिली और न ही वे सरकारी सुविधाएं जो उस समय सरकार दे रही थी.’ हरीपद मांझी के पास नागरिकता भले ही नहीं है लेकिन सरकारी कर्मचारियों ने उनका राशन कार्ड जरूर बना दिया है. घास-फूस की झोपड़ी में रहने वाले हरीपद का राशन कार्ड सरकारी कर्मचारियों ने बनाया भी तो गरीबी रेखा से ऊपर का. लिहाजा हरीपद के दो बेटे दिल्ली में सिलाई करके परिवार का पेट पाल रहे हैं.

[box]अपना सब कुछ छोड़कर एक बेहतर जिंदगी की आस में भारत आए ये परिवार एक बार फिर उसी स्थिति में पहुंच गए हैं जिसमें वे बांग्लादेश छोड़ते वक्त थे[/box]

वहीं ऊधमसिंह नगर के नारायण नगर में रहने वाले 61 साल के सुरेन हलधर बांग्लादेश के फरीदपुर जिले से अपने मां-बाप के साथ बेहतर जिंदगी की चाह लिए 1964 में हिंदुस्तान आए थे. लेकिन दिक्कतें खत्म होने के बजाय बढ़ती गईं. सुरेन हलधर के बेटे अधिर बताते हैं, ‘यहां आने के बाद सरकार की ओर से सबसे पहले पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में रोका गया. वहां कुछ दिन रहने के बाद सरकार की ओर से रुद्रपुर कैंप भेजा गया. ‘रुद्रपुर कैंप से जमीन देने की बात कह कर उन्हें नारायणनगर भेजा गया लेकिन यहां न तो जमीन मिली और न ही नागरिकता. उनके मुताबिक सरकार की ओर से बीपीएल कार्ड बनाया गया था लेकिन कुछ माह पूर्व कार्ड यह कहते हुए निरस्त कर दिया गया कि नागरिकता का प्रमाण पत्र नहीं है. नागरिकता न होने के बावजूद बीपीएल कार्ड के आधार पर उन्हें सरकार की ओर से इंदिरा आवास आवंटित किया गया लेकिन उसके लिए भी महज 27 हजार रुपये ही अधिकारियों की ओर से दिए गए. परिवार का पेट पालने के लिए अधिर घर में ही एक छोटी-सी परचून की दुकान चलाते हैं. घर के पास स्थित वन विभाग की जमीन पर ही उनका पूरा मकान बना है. वे हमेशा इस डर में जीते हैं कि पता नहीं कब वन विभाग उन्हें बेघर कर दे. परिवार के छह लोगों का पेट पालने के लिए दुकान जब छोटी पड़ने लगी तो तीन बेटों ने मजदूरी करने के लिए गुजरात का रास्ता पकड़ लिया.

अपना सब कुछ बांग्लादेश में छोड़ कर एक बेहतर जिंदगी जीने की आस लगाए हिंदुस्तान आए ये परिवार एक बार फिर उसी स्थिति में पहुंच गए हैं जिसमें वे यहां आते वक्त थे. रमनगरा के भूदेव दास बताते हैं, ‘सबसे बड़ी विडंबना यह है कि बाढ़ के बाद पानी जब कम हुआ तो नदी की कटान के कारण पूरी जमीन नदी में समा गई लेकिन कुछ साल बाद जब नदी ने अपना रास्ता फिर बदला तो जो खेत नदी में गए थे वो फिर से बाहर आ गए. किसान जब अपनी जमीनों पर दोबारा खेती करने गए तो वन विभाग ने उन्हें रोक दिया.’  वन विभाग का तर्क है कि जो जमीन नदी की कटान के बाद निकली है वह उसकी है. भूदेव कहते हैं, ‘जमीन होने के बावजूद सैकड़ों की संख्या में ये परिवार भूमिहीन होकर दरबदर की ठोकरें खा रहे हैं. जमीन जाने के बाद इन परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या परिवार का पेट पालने की है. बच्चों का पेट पालने की जुगाड़ में कहीं बाहर प्राइवेट नौकरी करने जाते भी हैं तो जैसे ही लोगों को पता चलता है कि ये बांग्लादेश से हिंदुस्तान में रहने आए हैं तो इन्हें शक की निगाह से देखा जाता है.’

अब इन लोगों ने अपने हक की लड़ाई शुरू की है. जमीन की लड़ाई लड़ रहे स्थानीय युवक विवेक बताते हैं, ‘सिंचाई विभाग की 1,171 एकड़ जमीन यहां खाली पड़ी थी. काफी प्रयास के बाद यह जमीन राजस्व विभाग को स्थानांतरित हो गई ताकि उन परिवारों को दी जा सके जिनकी जमीनें नदी में समा गई हैं. राजस्व विभाग को मिली जमीन से बंगाली परिवारों को सरकार की ओर से पट्टों का आवंटन शुरू हुआ ही था कि तहसील का एक कर्मचारी आवंटन के खिलाफ कोर्ट चला गया.’ कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दे दिया, जिसके बाद से पूरा मामला कोर्ट में ही विचाराधीन है.

पढ़ाई के लिए इन परिवारों के बच्चों को प्रशासन की ओर से अस्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र जारी किया जाता है. लेकिन यह भी आसानी से हासिल नहीं होता. दसवीं का छात्र राहुल बताता है कि पिछले साल उसे बोर्ड परीक्षा का फॉर्म भरने के लिए अस्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाना था जिसे हासिल करने के लिए उसने अपने गांव से लेकर तहसील मुख्यालय पूरनपुर, जो करीब 35 किलोमीटर दूर है, तक के चक्कर लगाए. वह बताता है, ‘चार चक्कर लगाए, लेकिन प्रमाण पत्र नहीं बन सका. बिना प्रमाण पत्र के बोर्ड का फार्म भरने के कारण निरस्त कर दिया गया’. इस तरह की स्थिति का सामना हर साल हजारों छात्र-छात्राओं को करना होता है.

लालफीताशाही ने यहां के निवासियों की पूरी जिंदगी को मखौल में तब्दील कर दिया है. पैसा खर्च करके युवक पहले तो स्थायी निवास प्रमाण पत्र बनवाते हैं उसके बाद पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस आदि वे सभी जरूरी कागजात बनवा लेते हैं जिन्हें बनवाने के लिए भारतीय नागरिकता अनिवार्य है. एक-दो नहीं बल्कि हजारों की संख्या में युवकों ने नागरिकता न होने के बावजूद अपना ड्राइविंग लाइसेंस व पैनकार्ड बनवा लिया है. इन कागजात के सहारे युवक नौकरी में भी अपना भाग्य आजमाते हैं. लेकिन अस्थायी निवास प्रमाण पत्र होने के कारण उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है क्योंकि इन प्रमाण पत्रों में साफ-साफ लिखा होता है कि यह शैक्षिक संस्थान में प्रवेश के लिए है, न कि नागरिकता के लिए.

नागरिकता का मामला सिटिजनशिप एक्ट 1955 में वर्णित है तथा यह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है. साफ है कि नागरिकता का मामला भले ही भारत सरकार का हो लेकिन बिना नागरिकता के ही कई परिवार भारत सरकार की योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं. भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना इंदिरा आवास का लाभ सरकारी कर्मचारियों को चंद रुपये देकर बंगाली समुदाय के लोग बड़ी आसानी से उठा लेते हैं. इसका प्रमाण बंगाली कालोनियों में जाकर आसानी से देखने को मिलता है, जहां एक-दो नहीं बल्कि कई कमरे इंदिरा आवास की सरकारी मदद से बने देखने को मिलते हैं.

बंगाली समुदाय के लाखों लोगों की इस बदहाली पर पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी कहते हैं, ‘बांग्लादेश में हालात खराब होने पर मेरी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिंदू परिवारों को यहां बुला कर बसाने का काम शुरू किया था जो बखूबी हुआ. जो लोग शुरू में आ गए, उन्हें तो नागरिकता मिल गई लेकिन 1964 के बाद आगे के 15 सालों तक बंगाली परिवारों का पलायन होता रहा. समस्या इसलिए है कि सभी परिवार एक साथ नहीं आ पाए. जो बाद में आए नागरिकता की समस्या उन्हीं के लिए है.’ वे आगे कहते हैं, संसद में हमने कई बार इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन केंद्र सरकार इस पर ध्यान ही नहीं दे रही, क्योंकि नागरिकता का मामला केंद्र सरकार का है. गृहमंत्री से भी मुलाकात की लेकिन समस्या का हल नहीं निकल सका.’

कैसे मिलती है नागरिकता

भारत की नागरिकता का जिक्र संविधान के अनुच्छेद पांच से 11 में है. इसमें नागरिकता के लिए जिन शर्तों का उल्लेख है उनमें एक प्रावधान नैचरलाइजेशन का भी है. इसके मुताबिक ऐसा कोई भी विदेशी व्यक्ति भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकता है जो 12 साल से देश में रह रहा हो. यह जरूरी है कि आवेदक 14 साल की अवधि में कुल 11 साल के लिए भारत में रहा हो और आवेदन से पहले उसने 12 महीने का समय भारत में बिताया हो.

व्यथा कथा 1: दीपक बाड़ोई

बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) के फरीदपुर जिले के बनगांव से आए दीपक बाड़ोई जीप चलाकर अपनी विधवा मां, पत्नी तथा बच्चों का पेट पाल रहे हैं. दीपक बताते हैं, ‘जीप चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस की आवश्यकता थी, लिहाजा आरटीओ कार्यालय में कुछ रुपये देकर उसे भी हासिल कर लिया.’ इतना ही नहीं, दीपक के पास राशन कार्ड के साथ-साथ चुनाव के लिए फोटो पहचान पत्र भी है जो उनकी नागरिकता को साबित करता है. इसके बावजूद उनके पास स्थायी नागरिकता आज तक नहीं है.

दीपक बताते हैं, ‘2005 में हाईस्कूल का फार्म भरने के लिए अस्थायी नागरिकता प्रमाण पत्र बनवाना था जो 400 रुपये खर्च करने के बाद बना.’ बांग्लादेश से आने के बाद सरकार की ओर से दीपक के परिवार को मध्य प्रदेश के माना कैंप में रखा गया. कैंप में रहने के लिए भारत सरकार के पुनर्वास मंत्रालय की ओर से कार्ड जारी किया गया. दीपक की बुजुर्ग मां सुचित्रा बताती हैं, ‘कैंप के पास पहाड़ पर कुछ जमीन भी आवंटित हुई लेकिन वह खेती के योग्य नहीं थी, इसलिए 1975 में परिवार को लेकर पीलीभीत आ गए. यहां आने के बाद सरकार की ओर से जारी कार्ड के आधार पर नागरिकता हासिल करने का प्रयास शुरू किया लेकिन सफलता नहीं मिली.’ नागरिकता न होने के कारण उन्हें पीलीभीत में सरकार की ओर से न तो खेत ही आवंटित हुआ और न ही दूसरी अन्य सुविधाएं मिलीं. 1964 में पुनर्वास मंत्रालय की ओर से उन्हें जारी कार्ड भी अब जर्जर अवस्था में पहुंच गया है जिसे अपने कलेजे से लगा कर सुचित्रा और दीपक नागरिकता की आस में अधिकारियों की चौखट पर भटकते रहते हैं.

व्यथा कथा 2: धीरेंद्र विश्वास

पीलीभीत जिले में रमनगरा के रहने वाले 24 साल के धीरेंद्र विश्वास के परिवार की एक पूरी पीढ़ी का जीवन बिना नागरिकता के ही गुजर गया है. ग्रैजुएट धीरेंद्र बताते हैं कि 2008 में एसएसबी में सिपाहियों की जगह निकली. इसमें बताया गया था कि बॉर्डर एरिया के युवकों को इसमें वरीयता दी जाएगी. धीरेंद्र का गांव रमनगरा भी नेपाल की सीमा से लगा हुआ है लिहाजा उन्होंने भी अपना फॉर्म भर दिया. फॉर्म के साथ उन्होंने पहचान पत्र के रूप में राशन कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पास बुक की फोटो कॉपी और अस्थायी निवास प्रमाण पत्र  लगाया. इतना सब होने के बावजूद धीरेंद्र का फॉर्म यह कहते हुए रद्द कर दिया गया कि उनके पास भारतीय नागरिकता ही नहीं है.

धीरेंद्र बताते हैं कि सिर्फ एसएसबी में ही नहीं बल्कि कई सरकारी नौकरियों में रुपये खर्च करके फॉर्म आदि भरने के बाद लेकिन हर बार उनका फॉर्म नागरिकता के अभाव में रद्द कर दिया गया. थक हार कर धीरेंद्र घर बैठ गए. परिवार का पेट पालने की जिम्मेदारी उन पर ही है, लिहाजा उन्होंने गांव में ही एक छोटी-सी परचून की दुकान खोल ली है.

कच्ची कॉलोनी पक्का फायदा

कोहरे और धुंध भरी दिसंबर की एक सर्द शाम. दिल्ली के शाहीन बाग इलाके का नजारा ऐसा है मानो कोई भयानक भूकंप यहां सब कुछ तबाह कर गया हो. हाड़ जमाने वाली ठंड में कांपते सैकड़ों परिवार अपने उजड़े मकानों और बिखरे सामान के बीच जमीन पर बैठे हैं. लगभग 500 परिवारों का यह समूह दिल्ली की उस बहुसंख्यक प्रवासी आबादी का हिस्सा है जो देश के दूसरे राज्यों से काम की तलाश में इस शहर तक पहुंचती है और फिर यहीं की होकर रह जाती है. ये 500 परिवार पिछले 10-12 साल से यहां रह रहे हैं जहां आज बर्बादी का मंजर दिख रहा है. यह प्रलय किसी प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं बल्कि दिल्ली सरकार की अवैध बस्तियों को हटाने की मुहिम का नतीजा है. बिना कोई नोटिस दिए ही बीती तीन दिसंबर को दिल्ली सरकार द्वारा यहां बने लगभग 500 घर तोड़ दिए गए, जबकि यहां के लोगों की मानें तो 2010 में सरकार ने उनसे यह वादा किया था कि उनकी बस्ती को नियमित कर दिया जाएगा.

इसी बस्ती में रहने वाले 30 वर्षीय दिलबर कुछ कूड़ा इकट्ठा करके उसे जला रहे हैं. उन्होंने अपने दोनों बच्चों को इस आग की गर्माहट के पास बैठा दिया है. दिलबर लगभग आठ साल पहले असम से यहां आए थे. तब से ही वे कूड़ा बेचने का काम कर रहे हैं. वे बताते हैं कि इस इलाके में अपने रहने लायक जगह पाने के लिए उन्होंने पुलिस को 5,000 रु दिए थे. दिलबर कहते हैं, ‘अब भी मैं हर महीने 500 रु पुलिसवालों को देता हूं.’
पुलिस को नियमित रूप से पैसा देने वालों में दिलबर अकेले नहीं हैं. यहां रहने वाले लगभग सभी परिवार पुलिस को हर महीने 500 से 700 रु दिया करते थे. अब उस पुलिस ने इन परिवारों पर इतना रहम जरूर किया है कि रात होने पर इन्हें झुग्गी लगाने की अनुमति दे दी है. लेकिन साथ ही यह निर्देश भी दिए हैं कि सुबह होते ही ये लोग अपनी झुग्गियां हटा लें. पुलिस के इन निर्देशों के अनुसार ही ये लोग इस भीषण ठंड में बस थोड़ा और अंधेरा हो जाने के इंतजार में बैठे हैं ताकि रात बिताने लायक अपनी झुग्गी बना सकें.

झुग्गी बस्तियों का तोड़ा जाना दिल्ली के लिए कोई नई बात नहीं, लेकिन तीन दिसंबर के दिन जब इस बस्ती को तोड़ा जा रहा था तो उस वक्त यहीं से कुछ किलोमीटर की दूरी पर कई अवैध निर्माण कार्य प्रगति पर थे. अब भी हैं. दरअसल दिल्ली में बड़े बिल्डरों और रसूखदार लोगों द्वारा अवैध कॉलोनियों में बहुमंजिला इमारतें लगातार बनाई जा रही हैं और सरकार उन्हें सिर्फ अनदेखा ही नहीं कर रही बल्कि अपनी मौन सहमति देकर उनका समर्थन भी कर रही है. 2010 में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के चलते जब दिल्ली को सुंदर बनाने के लिए एक तरफ तीन लाख से ज्यादा झुग्गीवालों को बेघर करके उनकी झुग्गियां ध्वस्त की गईं तो उस वक्त भी अवैध कॉलोनियों में लाखों की कीमत वाले भवन बन रहे थे और बिक रहे थे.

कानूनी तौर पर देखा जाए तो अवैध कॉलोनियों का निर्माण भी उतना ही गलत है जितना कि झुग्गी-झोपड़ियों का. लेकिन इन दोनों में एक मूल फर्क यह है कि जहां झुग्गियों को पहली नजर में ही पहचान कर अवैध घोषित किया जा सकता है वहीं अनधिकृत कॉलोनियों को एक नजर में पहचानना मुश्किल होता है. इसके अलावा दिल्ली आने वाले पर्यटकों की नजर में भी अनधिकृत कॉलोनियां वैसे नहीं अखरा करतीं जैसे ये झुग्गियां अखरती हैं और दिल्ली सरकार को शर्मसार करती हैं. अनधिकृत कॉलोनियों का आलम यह है कि पूर्व में कई ऐसी कॉलोनियों को नियमित करने के बाद भी दिल्ली की लगभग 50 लाख आबादी इन्हीं में रह रही है.

दिल्ली में आज 1,639 अनधिकृत कॉलोनियां हैं. इनमें रहने वाली शहर की एक-चौथाई आबादी यहां की राजनीति को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है

यह समस्या कितनी पुरानी है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब 1957 में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) का गठन हुआ तब भी दिल्ली में कई ऐसी कॉलोनियां मौजूद थीं. 1962-63 में पहली बार 103 अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित किया गया. इसके बाद भी इन कॉलोनियों के बसने का सिलसिला लगातार जारी रहा और 1977 में फिर से 567 अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा कर दी गई. लगभग 670 कॉलोनियों को नियमित करने के बाद भी आज दिल्ली में सरकारी आंकड़ों के ही मुताबिक 1,639 अनधिकृत कॉलोनियां मौजूद हैं. दिल्ली की लगभग एक-चौथाई आबादी इन्हीं बस्तियों में रह रही है जो स्वाभाविक तौर पर यहां की राजनीति को बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है. उदाहरण के लिए, शीला दीक्षित सरकार ने 2008 के विधानसभा चुनावों से ठीक दो महीने पहले यह घोषणा की थी कि यदि कांग्रेस तीसरी बार सत्ता में आती है तो इन कॉलोनियों को नियमित कर दिया जाएगा. सरकार द्वारा उस वक्त इनमें से अधिकतर बस्तियों को नियमितीकरण के अस्थायी प्रमाण पत्र भी बांटे गए. जानकारों का मानना है कि कांग्रेस की जीत के पीछे यही सबसे बड़ा कारण बना क्योंकि यह पहला मौका था जब इन अनधिकृत बस्तियों में रहने वाले लाखों लोगों को नियमितीकरण से संबंधित कोई सरकारी प्रमाण पत्र प्राप्त हुआ हो.

कांग्रेस का यह दांव सफल रहा और वह लगातार तीसरी बार दिल्ली की सत्ता हासिल करने में सफल हो गई. लेकिन 2008 से चार साल बीत जाने तक भी इस संबंध में सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया. जब कुछ महीनों पहले हुए निकाय चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और अगले विधान सभा चुनाव भी नजदीक आने लगे तो दिल्ली सरकार को एक बार फिर से अपने ब्रह्मास्त्र की याद आई और सितंबर में उसने 895 बस्तियों को नियमित करने की घोषणा करके इनकी सूची जारी कर दी. तुगलकाबाद इलाके की रेसिडेंट वेलफेयर असोसिएशन के उपाध्यक्ष सोमवीर चौधरी कहते हैं, ‘नियमितीकरण की ये घोषणाएं मात्र राजनीतिक चाल हैं. दिल्ली के हर क्षेत्र में खुले आम अवैध निर्माण कार्य हो रहा है और सरकार उस पर कोई भी रोक नहीं लगाती. इस अवैध निर्माण से पुलिस से लेकर पार्षद और विधायक तक की मोटी कमाई होती है, इसलिए अनधिकृत बस्तियां अस्तित्व में आती हैं. फिर जब लाखों लोग यहां बस जाते हैं तो सरकार इनके नियमितीकरण को ही मुद्दा बनाकर लंबे समय तक राजनीतिक लाभ लेती है.’

यानी दिल्ली की एक-चौथाई आबादी का निवास बन चुकी इन अनधिकृत बस्तियों का अस्तित्व कोई एक रात का नतीजा नहीं है. यह निरंतर होने वाली प्रक्रिया है. रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों से दिल्ली आकर बसने वालों की संख्या बहुत अधिक रही है. दिल्ली सरकार इन सभी प्रवासियों को रहने लायक मकान देने में हमेशा से विफल रही. ऐसे में भूमाफियाओं ने निजी और सरकारी दोनों ही जमीनों पर भवन बनाकर बेचने का काम शुरू किया. स्थानीय नेताओं ने अपना वोट बैंक बढ़ाने के लिए इन भूमाफियाओं को संरक्षण दिया और लोग इन बस्तियों में बसते चले गए. दिल्ली के नामी आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल कहते हैं, ‘बेईमानी के इस काम में लोक प्राधिकारियों की बड़ी ही ईमानदार साझेदारी है. इन बस्तियों को बसाकर नेताओं ने अपने राजनीतिक हित साधे हैं तो अधिकारियों ने आर्थिक मुनाफा कमाया है.’ चांदनी चौक इलाके का उदाहरण देते हुए सुभाष बताते हैं, ‘एक बार एक इंजीनियर ने इन सभी अवैध निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी थी. उन इंजीनियर साहब को लोग मुल्ला जी के नाम से जानते थे. जब भूमाफिया कई बार रिश्वत की पेशकश से भी मुल्ला जी को नहीं खरीद पाए तो उन पर जानलेवा हमला करवाया गया. उनकी हालत इतनी नाजुक हो गई कि उन्हें लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा. इस बीच किसी नए इंजीनियर को प्रतिनियुक्त कर दिया गया और अवैध निर्माण का धंधा फिर से शुरू हो गया. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे इन भूमाफियाओं को हर तरफ से संरक्षण मिला हुआ है.’

सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी बताती है कि हाल ही में नियमित की गई 895 अनधिकृत बस्तियों में से 583 बस्तियां सरकारी भूमि पर कब्जा करके बनाई गई हैं. जाहिर है कि जब इन बस्तियों को बनाया जा रहा था तो स्थानीय प्रशासन के संज्ञान में भी यह बात जरूर रही होगी. चौधरी बताते हैं, ‘ऐसे निर्माण कार्यों में दिल्ली नगर निगम, स्थानीय पुलिस, पार्षद, विधायक और जिलाधिकारी तक की मिलीभगत होती है. पार्षद की तो कमाई का सबसे बड़ा साधन ही यह अवैध निर्माण होते हैं. इसी कमाई के दम पर तो पार्षद जैसे छोटे-से चुनाव में भी प्रत्याशी करोड़ों रुपये खर्च करने से नहीं हिचकते.’ चौधरी आगे बताते हैं, ‘किसी भी अवैध निर्माण पर पार्षद और अन्य लोगों तक उनका हिस्सा पहुंचा दिया जाता है. यदि कोई निर्माण बिना इनको पैसे दिए हो रहा हो तो पार्षद तक उसके चेले यह खबर पहुंचा देते हैं. पार्षद फिर इंजीनियर और स्थानीय पुलिस को बुला कर अवैध निर्माण करने वाले को धमकाते हैं और अपना हिस्सा वसूल लेते हैं. निर्माण करने वाले भी यह पैसा चुपचाप दे दिया करते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि यह गैरकानूनी काम बिना पैसे दिए नहीं हो सकता.’

संगम विहार भी दिल्ली की एक ऐसी ही अनधिकृत बस्ती है. इसे एशिया की सबसे बड़ी अनधिकृत बस्ती भी कहा जाता है. यहां रहने वाले आम आदमी पार्टी के युवा कार्यकर्ता राहुल बताते हैं, ‘इन बस्तियों में रहने वाले लोगों की कोई भी गलती नहीं है. इन लोगों ने तो अपनी कमाई खर्च करके मकान खरीदे हैं. यदि गलती है तो उन भूमाफियाओं की है जिन्होंने यहां भवन बनाए हैं और बेच रहे हैं.’ अनधिकृत बस्तियों में मकान और जमीन का दाम अपेक्षाकृत कम होता है जिसके चलते आम आदमी यहां आसानी से बस जाता है. पश्चिमी दिल्ली में स्थित ‘भाग्य विहार’ नामक एक अनधिकृत बस्ती में रहने वाले अजीत कुमार सिन्हा बताते हैं, ‘मैं रेलवे में तृतीय श्रेणी का कर्मचारी था. सरकारी वेतन से मैंने तीन बच्चों को पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाया. इसके बाद मेरी हैसियत नहीं थी कि मैं दिल्ली में घर भी खरीद सकूं. ऐसे में बस यहीं मुझे घर बनाने लायक जमीन मिल रही थी तो 1999 में मैंने इस बस्ती में 90 हजार रु में 100 गज जमीन खरीद ली.’ भाग्य विहार नामक इस बस्ती को इस बार भी नियमित नहीं किया गया है, लेकिन यहां के लोगों की मानें तो उनको नियमितीकरण की कोई ज्यादा आवश्यकता भी नहीं है. नियमितीकरण का लाभ यह है कि ये लोग अपनी जमीन की रजिस्ट्री करवा सकें, उस पर लोन ले सकें और उसे आसानी से बेच सकें. इसके अलावा सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नियमित बस्तियों को ही उपलब्ध करवाई जाती हैं. लेकिन दिल्ली की अधिकतर अनधिकृत बस्तियों में सभी मूलभूत सुविधाएं निजी कंपनियों द्वारा आसानी से प्रदान की जा रही हैं. और जहां तक जमीन और मकान बेचने का सवाल है तो यह काम भी मुख्तारनामों द्वारा आसानी से पूरा कर लिया जाता है. भाग्य विहार निवासी विजय कुमार कहते हैं, ‘बस्ती के नियमित होने पर हमें कई तरह के टैक्स भी देने होंगे जिनसे आज हम बचे हुए हैं. इसके अलावा जमीन की रजिस्ट्री पर भी बहुत ज्यादा खर्च होगा.’ इस बस्ती के कुछ लोगों को यह डर जरूर है कि यदि कभी कोई सख्त प्रशासक आया तो इनके घर तोड़े भी जा सकते हैं, लेकिन अधिकतर लोग इससे बेफिक्र हैं और मानते हैं कि चाहे जो भी हो उनके घर टूटेंगे नहीं. यहीं के एक निवासी नारायण देदाश बताते हैं कि दो महीने पहले ही जब वे किसी काम से दिल्ली सचिवालय गए थे तो अनधिकृत कॉलोनी प्रकोष्ठ के उपसचिव ने उनसे कहा, ‘इस बात की तो मैं गारंटी देता हूं कि तुम्हारे घर कोई भी नहीं तोड़ सकता. इसलिए निश्चिंत रहो और अब क्योंकि चुनाव आने वाले हैं तो अपने पार्षद और विधायक को पकड़ो और जितना भी काम कॉलोनी में करवा सकते हो करवा लो.’

अनधिकृत बस्तियों में अधिकतर जगह सड़क और बाकी मूलभूत सुविधाओं संबंधी कार्य क्षेत्रीय विधायक द्वारा अपने निजी खर्च से ही करवाए गए हैं. हालांकि 1998 में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा इन बस्तियों में मूलभूत सुविधाएं प्रदान करने की अनुमति दी गई है लेकिन संगम विहार जैसी कई अनधिकृत बस्तियों में तो लोग इतने बेतरतीब तरीकों से बस चुके हैं कि यहां अब सारी सुविधाएं प्रदान करना लगभग असंभव ही हो चुका है. यहां की सड़कें इतनी संकरी हैं कि रोज घंटों जाम लगना यहां अब आम बात हो गई है. पानी की निकासी की भी कोई व्यवस्था यहां नहीं है और जिस तरह से यहां मकान बन चुके हैं उनमें अब भविष्य में भी यह व्यवस्था कर पाना मुमकिन नहीं लगता. इस अव्यवस्थित बस्ती के बीच ही एक आलीशान ‘हमदर्द पब्लिक स्कूल’ भी है जिसके मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करते ही यह विश्वास नहीं होता कि हम अब भी संगम विहार जैसी अव्यवस्थित अनधिकृत बस्ती में ही हैं. कई एकड़ में फैला यह भव्य स्कूल इस अनधिकृत बस्ती में सालों से चलाया जा रहा है. यहां आज लगभग 2,500 बच्चे पढ़ रहे हैं. नियमों के अनुसार अनधिकृत बस्ती में बने स्कूल को मान्यता नहीं दी जा सकती, लेकिन जब तहलका ने स्कूल की प्रधानाचार्या जाकिया माजिद सिद्दिकी से इस संबंध में बात की तो उनका कहना था, ‘मैं तो कुछ समय पहले ही इस स्कूल में आई हूं, इसलिए इस बारे में ज्यादा बता नहीं सकती.’

‘ऐसी बस्तियों को नियमित करके सरकार अवैध निर्माण करने वालों को प्रोत्साहन दे रही है. कायदे से तो अनधिकृत निर्माणों को तोड़ दिया जाना चाहिएसंगम विहार में पानी की भी भारी किल्लत है. निजी कंपनियों द्वारा प्रदान किए जाने वाले पानी का खर्च यहां के अधिकतर निवासी नहीं उठा सकते जिसके चलते उन्हें सरकारी पानी के टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है. ऐसे में जब भी पानी का टैंकर बस्ती में आता है तो लोग उस पर टूट पड़ते हैं और यह अक्सर आपसी झगड़ों का कारण भी बनता है. लेकिन हमदर्द स्कूल की प्रधानाचार्या बताती हैं कि स्कूल के पास अपने पंप होने के चलते उन्हें पानी की भी कोई समस्या नहीं है. साथ ही वे कहती हैं, ‘इस जगह के नियमित होने या न होने से स्कूल किसी भी तरह से प्रभवित नहीं होता.’

दिल्ली की महंगी और आलीशान अनधिकृत बस्तियों के निवासी भी इस बात से बेफिक्र ही नजर आते हैं कि यह अवैध निर्माण कभी टूट भी सकता है. छत्तरपुर एक्सटेंशन की एक ऐसी ही आलीशान अनधिकृत कॉलोनी में रहने वाली एक महिला नाम न छपने की शर्त पर कहती हैं, ‘हमने यह नया घर 70 लाख रुपये में इसी साल खरीदा है. इतना पैसा हमने इसीलिए लगाया है क्योंकि आज नहीं तो कल यह कॉलोनी भी नियमित हो ही जाएगी. तोड़ने की ताकत तो किसी में नहीं है. अगर दिल्ली के सभी अवैध निर्माणों को सरकार तोड़ने लगी तो आधी से ज्यादा दिल्ली बेघर हो जाएगी और लगभग पूरी दिल्ली खंडहर.’ इस आलीशान कॉलोनी में भी पानी निजी कंपनियों द्वारा उपलब्ध करवा दिया जाता है और यहां के लोग इतने संपन्न भी हैं कि यह खर्च आसानी से उठा सकें. पार्किंग की समस्या वैसे तो पूरी दिल्ली में है लेकिन इस अनधिकृत कॉलोनी में बिल्डरों द्वारा भवन के साथ ही पार्किंग की भी जगह उपलब्ध करवाई जा रही है. इन महिला ने जो घर 70 लाख रु में खरीदा है, उतना ही बड़ा घर दिल्ली की किसी अधिकृत कॉलोनी में आज शायद करोड़ों की कीमत का होगा. इसलिए भी लोग बड़ी संख्या में इन अनधिकृत कॉलोनियों में बस रहे हैं.

दिल्ली की लगभग सभी अनधिकृत कॉलोनियों में प्रॉपर्टी डीलरों की भरमार है जो खुलेआम इन अनधिकृत भवनों को बेच रहे हैं. पुराने भवनों से लेकर नवनिर्मित मकानों तक हर तरह के भवन यहां आसानी से उपलब्ध करवा दिए जाते हैं. नियमितीकरण के जो पैमाने सरकार द्वारा तय किए गए थे उनमें एक शर्त यह भी थी कि 2007 से पहले हो चुके निर्माण कार्यों को ही नियमित किया जाएगा. लेकिन 2007 के बाद भी इन बस्तियों में कई निर्माण कार्य किए गए हैं और आज भी जारी हैं. तहलका ने कई संबंधित अधिकारियों से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई भी इस बारे में कुछ बात करने के लिए तैयार नहीं कि आखिर इन अवैध निर्माणों पर कोई भी रोक क्यों नहीं लग रही है. सूचना के अधिकार के तहत इस संबंध में पूछने पर शहरी विकास विभाग के सूचना अधिकारी बताते हैं कि अनधिकृत कॉलोनी प्रकोष्ठ में इन निर्माण कार्यों से संबंधित कोई भी सूचना उपलब्ध नहीं है. ओखला विधानसभा क्षेत्र में हो रहे निर्माण कार्यों के बारे में वहां के विधायक आसिफ मोहम्मद खान कहते हैं, ‘मेरा विधानसभा क्षेत्र ही अकेला नहीं है. अवैध निर्माण की समस्या तो पूरे दिल्ली में ही है. इसमें सबसे ज्यादा दोष दिल्ली पुलिस का है जो कि स्वयं अवैध निर्माण के धंधे में संलिप्त है. इन निर्माण कार्यों पर रोक तभी लग सकती है जब पुलिस को इस मामले से बिल्कुल अलग किया जाए और यह कार्य पूर्ण रूप से दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विकास प्राधिकरण ही देखे. जो लोग बस चुके हैं, उनको तो हटाया जाना अब संभव नहीं है लेकिन आगे के लिए ऐसे निर्माणों पर रोक लगनी चाहिए.’ उधर, कुछ का मानना है कि अनधिकृत बस्तियों को नियमित करना अवैध कार्य करने वालों को पुरस्कृत करने जैसा ही है. आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष अग्रवाल कहते हैं, ‘इन्हें नियमित करके सरकार अवैध निर्माण करने वालों को प्रोत्साहन दे रही है. कायदे से तो अनधिकृत निर्माण तोड़े जाने चाहिए ताकि लोग खुद भी ऐसी किसी भी जगह संपत्ति खरीदने से डरें. लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह संभव नहीं है क्योंकि दिल्ली का मुख्य वोट बैंक तो इन्हीं बस्तियों में बसता है और कोई भी सरकार उसे खोने का जोखिम नहीं उठा सकती’.

एक अहम सवाल यह भी है कि क्या इन बस्तियों को नियमित करने से यहां के निवासियों की जिंदगी में भी कोई बदलाव आएगा. 1977 में नियमित की गई बस्तियों में से कई ऐसी हैं जहां आज तक सभी सुविधाएं प्रदान नहीं की जा सकी हैं. इसके साथ ही अनधिकृत बस्तियों में बने भवनों के खसरा नंबर ढूंढ़ने में भी राजस्व विभाग को कई दिक्कतें आ रही हैं जिस कारण इन लोगों को आज भी जमीन या भवनों पर स्वामित्व का अधिकार नहीं दिया जा सका है. सरकार के पास फिलहाल बहुस्वामित्व वाले भवनों के पंजीकरण की भी कोई नीति मौजूद नहीं है, जबकि अनधिकृत बस्तियों में बने अधिकतर भवन ऐसे ही हैं जिन पर एक से ज्यादा लोगों का स्वामित्व है. इन तमाम बातों के कारण कई लोग नियमितीकरण की हालिया घोषणा को सिर्फ एक राजनीतिक चाल मान रहे हैं. हालांकि इन कॉलोनियों में बसने वाली दिल्ली की लगभग एक-चौथाई जनता सरकार के इस एलान से बेहद खुश है. आखिर सवाल अपने ही घर पर स्वामित्व के अधिकार का है तो खुश होना बनता भी है. लेकिन इस घोषणा के बाद भी लगभग 744 अनधिकृत बस्तियां सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में मौजूद हैं और जिस तेजी से नए निर्माण हो रहे हैं यह संख्या भविष्य में और ज्यादा होगी. वैसे देखा जाए तो इन अवैध बस्तियों से हर किसी को फायदा ही हुआ है. सरकारी जमीनों पर कब्जा करके भूमाफियाओं को मुनाफा हुआ, उन पर निर्माण की मौन अनुमति देने पर लोक प्राधिकारियों ने भी मोटा मुनाफा कमाया, जो लोग इन बस्तियों में बस गए और बस रहे हैं उन्हें भी सस्ते दामों पर देश की राजधानी में घर मिल गया और फिर बार-बार नियमितीकरण का लालच देकर नेताओं का वोट बैंक भी बढ़ता ही गया.

इस लिहाज से दिल्ली की ये अनधिकृत बस्तियां सोने के अंडे देने वाली मुर्गी साबित हुई हैं और आज भी हो रही हैं. ऐसे में समझना मुश्किल नहीं कि क्यों इन पर रोक नहीं लग रही. फिर जब कभी सरकार को यह दिखाना होता है कि वह अवैध निर्माण और अतिक्रमण के प्रति गंभीर है तो शाहीनबाग की ही तरह कुछ गरीबों की झुग्गियां तोड़ दी जाती हैं. और वैसे भी कोई सरकार क्यों इन बड़े अवैध निर्माणों को रुकवाकर अपना ही चौतरफा नुकसान करेगी? कहावत है न कि सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को मारा नहीं करते.   

सजा से संदेश

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला, उनके बेटे अजय चौटाला एवं उनके अन्य सहयोगियों को मिली 10-10 साल की सजा ने एकतरफ जहां चौटाला परिवार एवं भारतीय राष्ट्रीय लोकदल के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिंह लगा दिया है वहीं दूसरी तरफ कोर्ट के इस फैसले में कई व्यापक संदेश भी छिपे हुए हैं. सबसे पहले कोर्ट का यह फैसला उन राजनेताओं और अधिकारियों के लिए एक वेकअप कॉल है जो खुद को हमेशा कानून से ऊपर मानते आए हैं. जिन्हें लगता है कि कानून के हाथ कितने भी लंबे क्यों न हों, उनके गले तक कभी नहीं पहुंचेंगे. इसी निश्चिंतता के साथ वे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहते हैं.

ओमप्रकाश चौटाला, उनके बेटे और इस भ्रष्टाचार में शामिल रहे राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को मिली सजा से और कुछ हो न हो. इससे आम जनता का न्यायपालिका में विश्वास जरुर मजबूत हुआ होगा. इतिहास में बहुत कम ऐसे मौके आए हैं जहां आम जनता ने भ्रष्ट नेता और अधिकारियों को उनके किए की सजा भुगतते देखा हो. आम जनता के मन में यह आम भावना है कि कानून, पुलिस और सजा सिर्फ आम लोगों के लिए होते हैं. इससे वे डरते हैं कथित तौर पर बड़े लोग नहीं. इस केस ने न्याय व्यवस्था में आम आदमी की आस्था को फिर से पुनर्स्थापित किया है.

चौटाला को मिली सजा में तुष्टिकरण की राजनीति के लिए भी संदेश है. सीबीआई ने अपनी जांच में इस बात को कहा कि शिक्षकों की भर्ती में गड़बड़ी चौटाला ने अपने लोगों को उसमें फिट करने के लिए की थी. ऐसा कहा जाता रहा है कि अपने समर्थकों को इस बात का अहसास दिलाने के लिए कि वे उनके परिवार के सदस्य जैसे ही हैं, चौटाला ने फर्जी लिस्ट बनवाकर उन्हें नियुक्ति दी. ऐसे में चौटाला का केस उन नेताओं के लिए भी एक उदाहरण और सबक है जो अपने समर्थकों को बनाए रखने के लिए वैध-अवैध के अंतर को भूल जाते हैं.

चौटाला पिता-पुत्र को सजा मिलने के बाद जिस तरह से उनकी पार्टी इंडियन नेशनल  लोकदल (आईएनएलडी) के भविष्य को लेकर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, वे उन सभी राजनीतिक दलों के लिए एक सबक है जो व्यक्ति या परिवार केंद्रित हैं. और खासकर जिनके मुखिया भ्रष्टाचार जैसे मामलों में फंसे हुए हैं. आज आईएनलडी के सामने ये प्रश्न खड़ा हुआ है कि पार्टी सुप्रीमों ओमप्रकाश चौटाला और अजय चौटाला के जेल जाने के बाद भविष्य में पार्टी का क्या होगा. अगर कल सपा, बसपा, राजद, डीएमके, झामुमों के नेताओं के साथ भी ऐसा कुछ होता है तो इनका भविष्य भी आईएनएलडी के समान ही होने के आसार हैं. ऐसे में उन नेताओं और परिवार आधारित दलों को अपने और अपने परिवार के सदस्यों के अलावा ऐसे नेताओं को तैयार करने की भी जरुरत है जो उनकी अनुपस्थिति में पार्टी को आगे बढ़ा सकें.

कोर्ट का यह निर्णय उन ईमानदार अधिकारियों के साहस और मनोबल को और भी बढ़ाने वाला है, जो नेताओं की गलत मांग को मानने से इंकार कर देते हैं.

रजनी सिब्बल. यही नाम है उस महिला आईएएस अधिकारी का जो उस समय प्राथमिक शिक्षा विभाग में बतौर निदेशक कार्यरत थीं. सिब्बल को चौटाला यह सोच कर लाए थे कि वे उनके कहे अनुसार लिस्ट बदलने अर्थात फर्जी लिस्ट बनाने के लिए तैयार हो जाएंगी. लेकिन उन्होंने चौटाला की लिस्ट बदलने की मांग को न सिर्फ मामने से इंकार कर दिया बल्कि लिस्ट गायब होने या चुरा लिए जाने जैसी स्थिति से निपटने के लिए उसे अलमारी में सील करा दिया. उस पर ऑफिस के अन्य कर्मचारियों के हस्ताक्षर लिए फिर उसकी चाभी को भी सिल कर दिया. सिब्बल की हरकत से पार्टी के नेता और चौटाला समर्थक अधिकारी इतने नाराज हुए कि उन्होंने सिब्बल को काफी भला बुरा कहा.

उस समय उन्हें तमाम साथी अधिकारियों और लोकदल के नेताओं की खरी-खोटी सुननी पडी थी. यहां तक कि लोकदल के एक नेता उनके ऑफिस में आकर सरेआम उनके साथ गाली गलौज कर गए थे. वे सबके सामने फफक-फफक कर रोईं लेकिन टूटी नहीं. उस समय यह साहसी महिला उन सभी 55 लोगों से लड़ी जिन्हें आज कोर्ट ने सजा सुनाई है. समय ने आज उस महिला के साहस और ईमानदारी पर अपनी मोहर लगाई और ये साबित किया कि न्याय का सूरज भ्रष्टाचार के अंधेरे पर हमेशा भारी पड़ता है.

गांधी के आदि अनुयायी

DSCN1846_606147157हे धर्मेश, दुनिया में शांति बनाए रखना. हिंसा, झूठ और बेईमानी की जरूरत मानव समुदाय और समाज को न पड़े. धर्मेश, हमें छाया देते रहना, हमारे बाल-बच्चों को भी. खेती का एक मौसम गुजर रहा है,  दूसरा आने वाला है. हम खेती के समय हल-कुदाल चलाते हैं. संभव है हमसे, हमारे लोगों से कुछ जीव-जंतुओं की हत्या भी हो जाती होगी. हमें माफ करना, धर्मेश. क्या करें, घर-परिवार का पेट पालने के लिए अनाज जरूरी है न! समाज-कुटुंब का स्वागत नहीं कर पाएं, उन्हें साल में एक-दो बार भी अपने यहां नहीं बुलाएं तो अपने में मगन रहने वाले जीवन का क्या मतलब होगा? इन्हीं जरूरतों की पूर्ति के लिए हम खेती करते हैं. खेती के दौरान होने वाले अनजाने अपराध के लिए हम आपसे क्षमा मांग रहे हैं. धर्मेश, हमें कुछ नहीं चाहिए, बस बरखा-बुनी समय पर देना, हित-कुटुंब-समाज से रिश्ता ठीक बना रहे, सबको छाया मिलती रहे, और कुछ नहीं’

झारखंड में गुमला जिले के रोगो नामक गांव में यह टाना भगतों की नियमित आराधना है. इस दौरान आदिवासी भाषा कुड़ुख में जो प्रार्थना होती है, खेड़ेया टाना भगत उसका हिंदी में कुछ ऐसा ही अर्थ समझाते हैं. गांधी टोपी पहने पुरुष और रंगीन पाड़े वाली सफेद साड़ी में महिलाएं जब सस्वर और सामूहिक तौर पर ये वाक्य फिर दोहराते हैं तो रोम-रोम में सिहरन पैदा होती है. घंटी बजाने और हाथ-पांव धोकर दीप जलाने के बाद चरखे वाले तिरंगे के सामने अपने धर्मेश यानी ईश्वर की आराधना की यह पद्धति एक अजूबे की तरह लगती है.

इस समुदाय की जीवन शैली से बहुत हद तक अनजान अजनबियों के रोम-रोम में सिहरन पैदा होने की एक साथ कई वजहें हो सकती हैं. पहली तो यही कि 21वीं सदी में भी कोई समुदाय है जिसकी आकांक्षा दुनिया मंे शांति कायम रखने, समाज की समरसता बने रहने, घर-परिवार-समुदाय को छाया मिलने, हित-कुटुंब से रिश्ते बनाए रखने भर की है. जतरा टाना भगत को अपना नायक और गांधी को अपना आदर्श मानने वाला टाना भगत समुदाय चरखाछाप तिरंगे की पूजा करता है, सत्य-अहिंसा को जीवन का मूल मंत्र मानता है, मांस-मदिरा से दूर रहता है, इतनी जानकारी तो पहले से थी. लेकिन टाना भगतों के इलाके में दो दिन बिताने के बाद अहसास होता है कि ये लोग सिर्फ दिखावे के लिए आराधना के दौरान कुड़ुख भाषा में एक मंत्र जपकर परंपराओं का निर्वाह भर नहीं करते. उनके समुदाय का एक बड़ा हिस्सा वैसा ही जीवन जीता भी है.

टाना भगतों को करीब से देखने की शुरुआत हम रांची के बारीडीह गांव से करते हैं. दो-दो पूर्व विधायकों का गांव. दोनों टाना भगत. दोनों कांग्रेसी. एक पूर्व विधायक भेल्लोर इलाज के लिए गए होते हैं. उनसे मुलाकात नहीं हो पाती. दूसरे पूर्व विधायक गंगा टाना भगत से हम अनुरोध करते हैं कि हमें टाना भगतों से सामूहिक तौर पर मिलना है. वे तुरंत अपनी मोपेड निकालते हैं और फिर हमारे पथ प्रदर्शक की तरह आगे-आगे चलते हुए हमें उस रोगो गांव में ले जाते हैं जहां हम सामूहिक आराधना का वह नजारा देखते हैं जिसका जिक्र रिपोर्ट की शुरुआत में आया है.

‘हमारे पूर्वज गांधीजी के पहले से ही अंग्रेजों से और सत्य-अहिंसा की लड़ाई लड़ रहे थे. जतरा टाना भगत ने आदिवासियों से अलग सामुदायिक परंपरा चलाई थी’

गंगा टाना भगत कहते हैं, ‘आप किसी भी गुरुवार को आ जाइए, नियमित तौर पर हम टाना भगतों की सामूहिक बैठक होती है. या फिर साल भर में तीन बार होने वाले हमारे समुदाय के विशेष सामूहिक आयोजन में आइए जब हम लोग अपने-अपने घरों में तिरंगा बदलते हैं. वही तीन बार बदला हुआ तीन तिरंगा, तीन अलग-अलग बांसों में हर टाना भगत के घर के बाहर या आराधना स्थल पर देखने को मिलेगा.’ वे आगे बताते हैं कि तिरंगा बदलने का पहला आयोजन आषाढ़ के महीने में होता है. जिस दिन तिरंगा बदला जाना होता है, उस रोज समुदाय के दूसरे लोग भी पहुंचते हैं. सामूहिक उपवास होता है, फिर सामूहिक आराधना और तब तिरंगा बदलकर भजन-कीर्तन और उसके बाद सामूहिक भोज. दूसरे झंडे को कार्तिक महीने में दीपावली के 15 दिन पहले से बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है. इस बार भी कमोबेश वही प्रक्रिया दोहराई जाती है. तीसरा झंडा होलिकादहन के पहले बदला जाता है. इस तरह तीन तिरंगे झंडे तीन लोकों यानी धरती, आकाश और पाताल का प्रतिनिधित्व करते हैं. हर बार महिला-पुरुष सात धागों वाला जनेऊ बदलते हैं. सात धागों वाले जनेऊ के पीछे की धारणा यह है कि वह सतयुग कभी तो आएगा, जब समाज में सत्य का ही बोलबाला होगा. गंगा टाना भगत यह भी बताते हैं, ‘यदि दूसरे किस्म का आयोजन देखना हो तो दो अक्तूबर यानी गांधी जयंती को खक्सीटोला गांव आइए जहां 74 स्वतंत्रता सेनानी टाना भगतों का स्मारक है. या फिर 10 अगस्त को, उस रोज टाना भगत मुक्ति दिवस मनाया जाता है.’

गंगा टाना भगत से हम मुक्ति दिवस के बारे में पूछते हैं. वे बताते हैं, ‘तीन साल पहले इसी दिन हम लोगों को जमीन का अधिकार मिल सका. उन जमीनों का, जो आजादी की लड़ाई के दौरान ही अंग्रेजों ने नीलाम कर दी थीं और आजादी के बाद 1947 में ही उनकी वापसी के लिए विशेष एक्ट बनने के बावजूद हमें नहीं मिल पा रही थीं. हमारे समुदाय के नाम से पुस्तिका तैयार करने का काम शुरू हुआ.’ गंगा आगे कहते हैं, ‘ब्रिटिश काल में 875 टाना भगत परिवारों की 4,332 एकड़ 66 डिसमिल जमीन नीलाम हुई थी. उसमें अभी सिर्फ 172 टाना भगत परिवारों की 1,836 डिसमिल जमीन ही वापस करवाई जा सकी है. लेकिन हम मुक्ति दिवस इसलिए मनाते हैं कि चलिए इतनी देर में ही सही, जमीन वापसी की प्रक्रिया शुरू तो हो सकी.’ उन्हें यह भी कसक है कि सरकारी फाइलों में वे अब तक एक अलग समुदाय के रूप में पूरी तरह नहीं स्वीकारे जा सके हैं.

आराधना के आयोजन में दूसरे गांवों से आए कई टाना भगत बतकही में इतिहास की बातें बताते हैं. खेड़ेया टाना भगत कहते हैं, ‘हमारे पूर्वज गांधीजी के पहले से ही अंग्रेजों से और सत्य-अहिंसा की लड़ाई लड़ रहे थे. हमारे नायक व पुरोधा जतरा टाना भगत ने आदिवासी होते हुए आदिवासियों से अलग एक सामुदायिक परंपरा की शुरुआत अहिंसा मार्ग अपनाते हुए ही की थी.’ वे आगे कहते हैं कि आदिवासियों में बलि आदि की परंपरा है, हंडिया-दारू भी पारंपरिक चीजें हैं, लेकिन वीर जतरा टाना भगत ने 20वीं सदी के आरंभ में ही आदिवासी होने के बावजूद मांसाहार, बलि और नशे के खिलाफ अभियान चलाया था और तब आदिवासियों का एक बड़ा हिस्सा उनका अनुयायी बन गया था. झारखंड के छोटानागपुर, संथाल, मानभूम, सिंहभूम से लेकर पलामू और उड़ीसा, छत्तीसगढ़ आदि इलाकों में भी इस अभियान का गहरा असर पड़ा और अलग-अलग नाम से इस तरह का आंदोलन चला. अनुयायी बनते गए.

खेड़ेया इतिहास की बातें बताते हैं. टाना भगत समुदाय के पुरोधा जतरा टाना भगत और गांधीजी में मुलाकात तक नहीं हुई थी. जब गांधीजी झारखंड पहुंचकर बेड़ो में तीन दिन के लिए रुके थे, उसके बहुत पहले ही जतरा टाना भगत दुनिया से विदा हो चुके थे. गांधी बेड़ो पहुंचे तब उन्हें इस समुदाय की गतिविधियों के बारे में मालूम हुआ, जो बहुत पहले से ही अपने तरीके से सत्य-अहिंसा के प्रयोग के साथ अंग्रेजों को लगान न देकर देशभक्ति की लड़ाई लड़ रहा था. खेती में कपास उगाकर अपने कपड़े भी खुद तैयार करता था. खेड़ेया कहते हैं, ‘पहले हमारे समुदाय का झंडा सादा हुआ करता था, वेश भी साधा, जीवन भी सादा, लेकिन गांधीजी के आग्रह पर हमारे समुदाय ने सादे झंडे को चरखाछाप तिरंगे में बदला और बाद में हम गांधी के ही हो गए, अब तक हैं, कोशिश होगी कि हमेशा रहें भी.’

खेड़ेया आखिरी वाक्य भी एक लय में बोल जाते हैं कि कोशिश करेंगे कि गांधी की राह पर ही समुदाय की आने वाली पीढ़ी भी चले और उन्हीं की होकर रहे. लेकिन उनके इस कहे में भविष्य के प्रति एक आशंका का भाव दिखता है. टाना भगत समुदाय के लोग नहीं बताते लेकिन हमें जानकारी मिलती है कि नई पीढ़ी का जुड़ाव अपनी परंपरा से कम होता जा रहा है. इसकी कई वजहें बताई जाती हैं. एक तो  ये आदिवासी समुदाय से आते हैं, आदिवासियों के बीच ही रहते हैं जिनमें बलि प्रथा की एक महत्वपूर्ण विधि है. हालांकि टाना भगतों के प्रभाव में आकर कई आदिवासी भी अब दूध-अनाज की बलि देने लगे हैं, लेकिन यह संख्या बहुत कम है. दूसरा, आदिवासी समुदाय में हंड़िया पीना भी एक परंपरा है, जिससे बचना नई पीढ़ी के लिए इतना आसान नहीं. इन सबके साथ इस खास समुदाय को बचाने-बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर वह नहीं हुआ जिसकी दरकार थी. आजादी के इतने साल बाद नीलाम जमीन मिलने की प्रक्रिया का शुरू होना एक बड़ी विडंबना तो दिखाता ही है, और भी कई चीजें हैं जिनसे इनकी उपेक्षा का अनुमान लगाया जा सकता है.

1982 में सीसीएल कंपनी द्वारा टाना भगत समुदाय के बेरोजगार नौजवानों को प्रशिक्षित करने के लिए आईटीआई की शुरुआत हुई थी, लेकिन यह संस्थान तीन साल चलकर अचानक बंद हो गया. क्यों, इसका जवाब किसी के पास नहीं. रांची जिले के सोनचिपी, गुमला जिले के चापाटोली और लोहरदगा जिले के बमनडीहा में एक समय टाना भगत आवासीय विद्यालयों की स्थापना हुई थी लेकिन बकौल गंगा टाना भगत, अब वे विद्यालय भी सामान्य आदिवासी आवासीय विद्यालय की तरह चल रहे हैं और वहां टाना भगत समुदाय के बच्चों की संख्या न के बराबर है. इस समुदाय की ऐसी ही कई अन्य समस्यााएं और चुनौतियां हैं. जाहिर-सी बात है कि यदि परंपरा से नई पीढ़ी को जोड़ने वाली कोई योजना नहीं रहेगी तो इस समुदाय का इतिहास बनना तय है. इनकी संख्या अभी कितनी है, यह पक्का नहीं लेकिन अखिल भारतीय टाना भगत विकास परिषद के अनुसार इनकी जनसंख्या 44 हजार है.

‘टाना भगत समुदाय की बसाहट जहां-जहां है, वहां नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ है. कई नक्सली इनके प्रभाव में आकर गांधी की राह अपना चुके हैंसमाजशास्त्री डॉ एस नारायण ने टाना भगतों की जमीन वापसी में अहम भूमिका निभाई है. उन्हें टाना भगत भी बहुत सम्मान देते हैं. इस समुदाय पर व्यापक सामाजिक शोध करने वाले डॉ नारायण कहते हैं, ‘बात इनकी संख्या की नहीं, इनमें संभावनाओं की है. सरकार उन संभावनाओं को नहीं देख रही है. यह गांधी के सिद्धांत सत्य, अहिंसा आदि को जीवंतता के साथ आज भी जीने वाला दुनिया का इकलौता समुदाय है.’ डॉ नारायण आगे बताते हैं, ‘इस समुदाय की बसाहट जहां-जहां है, वहां नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ है. कई नक्सली इनके प्रभाव में आकर गांधी की राह अपना चुके हैं और यह तय है कि अगर इन टाना भगतों को समूह में नक्सल प्रभावित इलाकों में ले जाकर बसाया जाए तो ये अपनी जीवनशैली, निष्ठा से नक्सल प्रभाव कम करने में सक्षम हैं.’ नारायण कहते हैं कि उन्होंने इस बाबत केंद्रीय गृह मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपकर सलाह दी है. इस पर आगे क्या होता है, यह देखा जाना बाकी है.

टाना भगतों से और भी ढेरों बातें होती हैं. आखिर में हम खक्सीटोली गांव पहुंचते हैं, जहां एक टोली में जतरा टाना भगत की बड़ी प्रतिमा लगी है. सामने तीन चरखाछाप तिरंगे वाला बांस है. खक्सीटोली के बाहरी हिस्से में जाते हैं, जहां हरिवंश टाना भगत समेत 74 स्वतंत्रता सेनानी टाना भगतों के नाम के पत्थर कतार में दिखते हैं. इसी जगह टाना भगत समुदाय के लोग गांधी जयंती हर्षोल्लास से मनाते हैं.

और यहीं अगली कतार में लगे कुछ पत्थर टाना भगतों के साथ राजनीति का खेल भी बयान करते हैं. एक बड़ा शिलापट्ट धाकड़ आदिवासी नेता शिबू सोरेन के नाम का दिखता है जो मुख्यमंत्री रहते हुए शिलान्यास करने आए थे. दूसरे शिलापट्ट पर बड़े गैरआदिवासी कांग्रेसी नेता व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय का नाम दिखता है, जो अनावरण करने गए थे. इसी तरह कई नेताओं के नाम दिखते हैं. वहां तकली से धागा बना रहे बुधुआ टाना भगत मिलते हैं. जिरगा टाना भगत भी मिलते हैं. जिरगा कहते हैं, ‘जिन-जिन नेताओं के नाम लगे हैं, सबने कहा था कि इसे महत्वपूर्ण स्थल बनाएंगे, लेकिन अपने नाम का पट्ट लगाने के बाद इस जगह को याद तक नहीं किया उन्होंने. महत्वपूर्ण स्थल क्या बनाएंगे, एक बाउंड्री वाल तक नहीं दिलवा सके.’

टाना भगतों के साथ राजनीति आगे क्या करेगी, यह अब भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. टाना भगत पारंपरिक तौर पर कांग्रेस के मतदाता और समर्पित कांग्रेसी कार्यकर्ता रहे हैं. वे कहते हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा तवज्जो इंदिरा गांधी ने दी थी. बाद में राजीव गांधी तक टाना भगतों को पार्टी तवज्जो देती रही. लेकिन उसके बाद जंगल में बसे टाना भगतों और दिल्ली में बैठी कांग्रेस की आलाकमानों के बीच संवाद में दूरी आ गई. गंगा टाना भगत कहते हैं, ‘अबकी राहुल गांधी झारखंड आए थे तो दिल्ली बुलाए हैं. जाएंगे, उम्मीद है कि फिर संवाद कायम होगा.’

किसका आशियाना किसका बसेरा?

कभी यह एशिया की सबसे बड़ी गोखुर झील हुआ करती थी. लेकिन इंसानी दखल और सरकारी उपेक्षा ने कावर झील और इस पर आश्रित पक्षी अभयारण्य को खात्मे के कगार पर ला दिया है. निराला की रिपोर्ट, फोटो:विकास कुमार

पैरों के दलदल में धंस जाने का डर हमें मजबूर कर रहा है कि हम अगला कदम देखभाल कर और बच-बचा कर रखें. लेकिन 60 की उम्र पार कर चुके अली हसन जब दौड़-दौड़ और उछल-उछलकर हमें तरह-तरह के पक्षी दिखाते हैं तो लगता है जैसे उनके भीतर सोया कोई बच्चा जाग उठा हो. बिल्कुल चिड़ियों की मानिंद फुदकते हुए कभी यहां तो कभी वहां. घने कोहरे में जब कुछ भी साफ नजर नहीं आता है तब वे थोड़ा जोर देकर कहते हैं, ‘देखिए, इधर देखिए मीडियम इग्रेट, उधर लैटिन इग्रेट. वो आकाश में व्हाईट ब्रेस्टर केनफिशर क्रो… पानी में स्नेक बर्ड देखिए. वह रहा पेडी फिल्ड पिपिट और इंडियन रौलर.’

 माइग्रेटरी ग्रीनपाइपर, पौंड हिरण, जंगल क्रो, व्हाईट एविश, पैरिया कैट, पनविल स्टॉक, ओपेन बिल स्टॉक, हप्पी, फेंटिल… न जाने कितने नाम बताते जाते हैं हसन. यह अलग बात है कि ये वैज्ञानिक नाम हमारी समझ से परे हैं. खैर, उनकी निगाहें जहां एक के बाद एक चिड़ियों की तलाश कर रही हैं वहीं हमारी नजर गन्ने और सरसों की लहलहाती फसलों के बीच एशिया की सबसे बड़ी गोखुर झील की विशालता का बचा हुआ अंश देखने के लिए भटक रही है. गोखुर झील यानी किसी नदी के रास्ता बदलने के बाद उसके पुराने मार्ग में छूटे पानी का विशाल भंडार.

झील बहाल होगी तो खेतिहर किसानों का वोट गड़बड़ होगा. झील के खत्म होने से बड़ी आबादी में बसन वाले सहनियों यानी मछुआरों का वोट गड़बड़ हो सकता है

अली हसन अपनी धुन और दिलचस्प अंदाज में चिड़ियों के सौंदर्य और उनकी खासियतें बयान करते रहते हैं. हम उन्हें बीच में ही रोककर पूछते हैं कि असली झील कहां है. वे कहते हैं, ‘जो दिखा रहे हैं, वही देखिए न अभी! जो विशेष था, वह खत्म हुआ, जो शेष है उसे तो देखिए!’ उनकी बात जारी रहती है, ‘पहले बहुत किस्म के पक्षी सैकड़ों-हजारों मील की उड़ान भरते हुए यहां आया करते थे. कम से कम 100 किस्म के लैंड बर्ड, 50 किस्म के वाटर बर्ड, दर्जनों किस्म के प्रवासी पक्षी. अब वही आते हैं, जो अपने पुराने और परिचित बसेरे का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं, या इंसानों के बीच उन्हें कहीं नया बसेरा मिल नहीं रहा. जो आए हैं, उन्हें ही देख लीजिए, उनके बारे में ही जान लीजिए, कुछ सालों बाद शायद ये भी न दिखें.’

इतना कहते-कहते अली के चेहरे पर निराशा की छाया पसरने लगती है. हम कुछ कहें इससे पहले वे कहते  हैं, ‘आप पत्रकार हैं. इसलिए मैं आपको दिखाना चाहता हूं. इनके बारे में बताना चाहता हूं ताकि आप लोगों को बताएं कि पक्षियों का बचे रहना इस प्रकृति के लिए, इंसानों के लिए कितना जरूरी है.’अली लगभग रुआंसे दिखने लगे हैं. कहते हैं,  ‘पता नहीं पक्षियों के इस स्वर्ग का क्या होगा?’

‘पक्षियों के स्वर्ग का क्या होगा?’ इस सवाल का जवाब तलाशने के पहले कुछ बातें अली हसन और इस झील के बारे में. इस झील को कावर झील कहते हैं.  यह बिहार के बेगूसराय जिले में है. तथ्य बताते हैं कि यह एशिया की सबसे बड़ी गोखुर झील रही है. प्रवासी पक्षियों को देखने और उनका अध्ययन करने इस वीराने में दुनिया के मशहूर पक्षी विज्ञानी सलीम अली भी आया करते थे. उन्होंने ही 1971 की एक यात्रा के बाद इसे पक्षियों का स्वर्ग कहा था. पक्षियों का यह स्वर्ग तो वर्षों पहले से ही था. सलीम अली ने कहा तो इसे एक वैज्ञानिक आधार मिला और 1989 में सरकार ने भी इसे कागजी तौर पर अमली जामा पहनाकर करीब 6,311 हेक्टेयर दायरे में पक्षी विहार बना दिया. नाम हुआ कावर झील पक्षी विहार.

झील बहुत छोटे से हिस्से में शेष है. झील के बड़े भूभाग पर अब खेती होती है.

तब से लेकर अब तक करीब 24 साल का वक्त गुजर चुका है. इस दौरान पक्षियों का स्वर्ग कही गई कावर झील आहिस्ता-आहिस्ता मरती गई है. जहां झील का विस्तार हुआ करता था, वहां अब गन्ना, सरसों, मेंथोल की फसलें लहलहाती हैं. जो दायरा देसी और विदेशी पक्षियों के लिए मशहूर हुआ करता था, अब उसकी पहचान सबसे उर्वर जमीन के रूप में स्थापित हो रही है अथवा करवाई जा रही है. झील का दायरा सिमटकर एक तालाब का रूप लेता जा रहा है. और उसमें भी जो पानी है, उसे खेतों तक पहुंचाने के लिए दिन-रात एक कर पंपिंग सेट चलाए जा रहे हैं. इस इलाके से गुजरते हुए कई खेतों की मिट्टी में नावें धंसी नजर आती हैं. ये बताती हैं कि कभी यहां पानी ही पानी था.

अली हसन के बारे में संक्षिप्त जानकारी यह है कि एक समय में वे चिड़िया मारने वाले शिकारी हुआ करते थे. सलीम अली के संपर्क में आने के बाद पक्षियों को पकड़ने वाले विशेषज्ञ बने और अब उनकी पहचान चिड़ियों को बचाने वाले, उनके बारे में लोक, वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान रखने वाले पक्षी विशेषज्ञ के रूप में भी है. अली ने कभी स्कूल में जाकर अक्षर ज्ञान नहीं लिया, लेकिन वे सभी पक्षियों और पेड़-पौधों का वैज्ञानिक नाम अंग्रेजी में धड़ाधड़ बता सकते हैं, सबके बारे में विस्तार से जानकारी भी दे सकते हैं. वे वर्षों से बांबे नैचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से भी जुड़े हुए हैं.

आखिर पक्षियों के इस स्वर्ग का भविष्य क्या होगा? आज के हालात देखकर अगर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की जाए तो लगता है कि कुछ सालों बाद इस इलाके की पहचान दूसरे रूप में होगी. झील का इलाका उर्वर भूमि के रूप में जाना जाएगा, उसके बीच में स्थित जयमंगला गढ़ की देवी मंदिर के लिए जाना जाएगा और बिहार में चल रही बुद्ध की लहर की वजह से पास में ही अवस्थित हरसाईं स्तूप के लिए भी जाना जा सकता है. पक्षी अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ सकते, इसलिए वे अपना रास्ता बदल रहे हैं. अब उनके बसेरे में इंसानों की लड़ाई चल रही है. सरकार और किसान जमीन किसकी है, इस पर लड़ाई लड़ रहे हैं. किसान और मछुआरों के बीच हकमारी का विवाद सतह पर न हो लेकिन भीतर ही भीतर एक सवाल की तरह बना हुआ है. नेताओं में इतना साहस नहीं कि वे खुलकर कह दें कि झील को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए या झील को फिर से आबाद कर देना चाहिए. झील बहाल होगी तो खेतिहर किसानों का वोट गड़बड़ होगा. झील के खत्म होने से बड़ी आबादी में बसने वाले सहनियों यानी मछुआरों का वोट गड़बड़ हो सकता है. ऐसे ही तमाम किस्म के पंच-प्रपंच और गुणा-गणित के बीच अली जैसे गिने-चुने लोग हैं, जो चिड़ियों की जुबान समझते हैं, उनकी पीड़ा समझते हैं. लेकिन वे सिवाय चिड़ियों पर बात करने के कुछ और कर नहीं सकते.

फसल बुआई के लिए तैयार खेत के किनारे पड़ीं पुरानी और उपेक्षित नावें झील के बर्बाद होने की पूरी कहानी कह देती हैं

सवाल यह भी है कि जिन जमीनों पर कई वर्षों से जमकर खेती होने लगी है, किसान अपना हक जता रहे हैं, साक्ष्य पेश करते हुए सरकार से लड़ाई लड़ रहे हैं, उचित मुआवजे के एवज में जमीन देने को तैयार होने की बात कह रहे हैं, वहां अब पानी पहुंचाना या झील को आबाद करना क्या इतना आसान रह गया है. बेगूसराय जिले के मंझौल अनुमंडल, जिस इलाके में यह झील आती है, के अनुमंडलाधिकारी सुमन प्रसाद कहते हैं, ‘15,600 एकड़ इलाके में झील के लिए 1989 में गजट हुआ था. अब भी करीब 500 एकड़ में झील है. दक्षिणी हिस्से को बूढ़ी गंडक नदी से जोड़ने की योजना है ताकि झील में पानी बना रहे.’ सुमन प्रसाद कहते हैं कि 1,400 एकड़ जमीन वन विभाग को भी दी गई है ताकि वहां पौधारोपण हो. बेगूसराय के जिला मजिस्ट्रेट मनोज श्रीवास्तव कहते हैं, ‘पक्षी विहार की जमीन पर कैसे कब्जा हुआ, वह वैध है या अवैध, अभी नहीं कह सकते और कहना भी नहीं चाहते क्योंकि मामला कोर्ट में है. इस  बीच डीएम ने 11 जनवरी को एक नोटिस जारी किया है जिसमें बताया गया है कि अगली व्यवस्था तक कावर झील के आस-पास की जमीन न कोई खरीद सकता है और न ही बेच सकता है. क्योंकि यह सरकारी जमीन है. जो जमीनों को जोत रहे हैं वे जोतें लेकिन खरीद-बिक्री का अधिकार किसी को नहीं है. इस पर बेगूसराय के बलिया लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद रामजीवन सिंह ने कहा कि अगर सरकार किसानों की जमीन पर कोई कार्यवाही करती है तो यह दूसरा नंदीग्राम और सिंगूर बनेगा.

पिछले दिनों राज्य के उपमुख्यमंत्री सह वन एवं पर्यावरण मंत्री सुशील कुमार मोदी जब यहां आए थे तो उन्होंने कहा है कि पक्षी विहार को विकसित करने के लिए एक एक्सपर्ट कमिटी बनेगी, जिसकी रिपोर्ट पर यह तय होगा कि कावर में कितनी जमीन पक्षी विहार के लिए चाहिए. उसी के आधार पर आगे का खाका तैयार होगा.’  यह पूछने पर कि जमीन सरकार की है या नहीं, श्रीवास्तव कहते हैं कि सुनवाई चल रही है और इस दौरान कई किसानों की मांग गलत साबित हुई है. श्रीवास्तव उपमुख्यमंत्री की बातों का हवाला देते हुए अपनी बात कहते हैं, उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का मानना है कि जो जमीन पक्षी विहार में है, उसके दस्तावेजों की जांच-पड़ताल कर उसके डिनोटिफिकेशन का भी काम होगा लेकिन सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि वहां पक्षी विहार के लिए कितनी जमीन चाहिए. उपमुख्यमंत्री यह कहते हुए शायद भूल जाते हैं कि एक बार नोटिफिकेशन हो जाने के बाद किसी भी जमीन का डिनोटिफिकेशन इतना आसान नहीं होता.

कानूनी पेंच की बात चाहे जो हो लेकिन जो किसान वहां जमीन जोत रहे हैं, उनके अपने मजबूत तर्क हैं. मंझौल के बड़े किसान चितरंजन जी कहते हैं कि सरकार जब पक्षी विहार के लिए जमीन का नोटिफिकेशन जारी कर रही थी तो उसने यह ध्यान नहीं दिया कि इस मामले में बहुत असावधानी बरती जा रही है. सब कुछ कागज पर ही होता रहा. कावर झील पक्षी विहार के लिए जितने दायरे को तय किया गया है उसमें तो नेशनल हाइवे तक की जमीन और कई गांवों की आबादी तक आ जाती है.’ वे आगे कहते हैं, ‘हमने भरतपुर पक्षी विहार भी जाकर देखा है. वह भी 2,200-2,500 एकड़ में है और खूब अच्छे से है फिर यहां इतना बड़ा दायरा कैसे तय कर दिया गया था और उसकी क्या दरकार है?’

कांवर झील को कभी एशिया की सबसे बड़ी गोखुर झील कहा जाता था. लेकिन आज झील की दशा बेहद खराब है. प्रवासी पक्षियों के लिए स्वर्ग कही जाने वाली इस झील से आज पक्षियों का भी मोहभंग हो रहा है.

किसान तो अपनी जमीन रक्षा की बात स्वाभाविक तौर पर मजबूती से रखते हैं लेकिन स्थानीय स्तर पर नेताओं का रुझान भी पक्षी विहार की ओर ज्यादा नहीं दिखता. राज्य के पूर्व कृषि मंत्री और बेगूसराय के बलिया लोकसभा क्षेत्र के पूर्व सांसद रामजीवन सिंह कहते हैं,  ‘किसान उस जमीन से साल भर में एक लाख रुपया प्रति एकड़ कमा रहे हैं. झील पिछले पांच-छह साल से बहुत हद तक जलविहीन हो गई है. 90 प्रतिशत जमीन खेती से आबाद है. अब तो कृषि वैज्ञानिकों की एक्सपर्ट कमिटी आए तो उसका भी मन कृषि विहार बनाने के लिए ललच जाएगा.’

रामजीवन सिंह कहते हैं कि 1988-89 में सरकार ने बंद कमरे में पक्षी विहार के लिए जमीन अधिसूचित करने का काम कर लिया जो व्यावहारिक नहीं था. उनका मानना है कि पक्षी विहार के लिए ढाई-तीन हजार एकड़ जमीन बहुत ज्यादा है. झील रहेगी तभी आस-पास के इलाके में जलस्तर भी ठीक रहेगा लेकिन बाकी पर खेती हो. यह पूछने पर कि झील खुद जलविहीन हुई या खेती के लिए कर दी गई, उनका जवाब होता है, ‘यहां के बाशिंदों ने नहीं बल्कि कुछ कुदरत ने और कुछ सरकार ने मिलकर झील को खत्म किया. पहली पंचवर्षीय योजना में ही इस झील में नहर बना दी गई थी. फिर इधर चार-पांच बार बाढ़ आने के कारण गाद भरने की प्रक्रिया तेज हुई, जिससे झील खत्म हुई.’ उधर, यह सवाल हाशिये पर ही रहता है कि अगर झील खत्म हो जाए तो पक्षियों का जो होना होगा. वह तो होगा ही, झील किनारे पीढ़ियों से बसे और झील से मछली मारकर ही पीढ़ी दर पीढ़ी जीवनयापन करने वाले मछुआरा समुदाय का क्या होगा.

किसान तो अपनी जमीन रक्षा की बात स्वाभाविक तौर पर मजबूती से रखते हैं लेकिन स्थानीय स्तर पर नेताओं का रुझान भी पक्षी विहार की ओर ज्यादा नहीं दिखता

किसान चितरंजन जी कहते हैं, ‘मछुआरों का कभी कोई हक तो उस पर था नहीं, वे तो पानी भरे रहने की वजह से स्वत: पेशे के तौर पर मछली मारने का काम किया करते थे.’ जब इस बाबत रामबालक सहनी से बात होती है तो वे कहते हैं, ‘झील के इलाके का बंदोबस्ती सहनी समाज को होते रहा है, हमारे समुदाय के लोग उसके एवज में जलकर देते रहे हैं.  जितने हिस्से का जलकर दिया जाता है उतने में पानी नहीं रहने पर खेती का भी अधिकार सहनी समाज का ही बनता है.’  रामबालक से यह पूछने पर कि जो जोत रहे हैं वे क्या आपके जलकर देने भर की वजह से आपके समुदाय के लिए जमीन छोड़ देंगे. वे कहते हैं, ‘कोला नदी के इलाके में 305 एकड़ जमीन पर सहनी खेती करने लगे हैं. दीघा में भी 70-80 एकड़ जमीन पर सहनी समुदाय के लोग खेती करने लगे हैं. जहां सहनी टैक्स देते हैं, वहां अगर सरकार जमीन बंदोबस्ती का भी टैक्स ले रही है तो हम अदालत में भी लड़ाई लड़ रहे हैं और हमारी जीत भी हुई है.’

पेशे से पत्रकार और कावर नेचर क्लब के संयोजक महेश भारती कहते हैं, ‘सरकार पक्षी विहार बनाने के बाद अब तक सीमांकन ही नहीं करवा सकी है, इसीलिए यह सारा पेंच फंसा हुआ है. सरकार सीमांकन ही करवा दे तो कई झगड़े खत्म हो जाएंगे.’ संभव है सरकार सीमांकन करवाने में रुचि ले और जमीन का पेंच सुलझ भी जाए. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या तब तक प्रवासी और देसी पक्षी भी अपने इसी मिटते हुए आशियाने में इंसानी लड़ाई के फैसले का इंतजार करते रहेंगे. शायद नहीं.  

महिला तस्करी की देवभूमि

2013 उत्तराखंड के लिए नंदा देवी राजजात का वर्ष है. हर 12 साल बाद राज्य के चमोली जिले में होने वाली इस विश्वप्रसिद्ध यात्रा में गढ़वाल और कुमाऊं के हजारों लोग 18 दिन में 280 किमी चलकर होमकुंड तक जाते हैं. नंदा-घुंघटी पर्वत की तलहटी तक की यह यात्रा नंदा (पार्वती) को ससुराल विदा करने के लिए होती है जो लोकमान्यताओं के अनुसार पर्वतराज हिमालय की पुत्री थीं और जिनका बाद में भगवान शिव से विवाह हुआ. उत्तराखंड के लोग नंदा को अपनी बहन की तरह मानते हैं. हर बहन की तरह नंदा को भी मायके की याद आती है. वह प्रतीकात्मक रूप में मायके आती है. मायके से ससुराल यानी कैलाश के लिए नंदा की विदाई ही ‘नंदा देवी राजजात’ है. गांव-गांव से गुजरती राजजात के दौरान नंदा को भावविह्वल विदाई मिलती है.

मायके की महिलाएं और पुरुष रोते हुए अपनी बहन/बेटी की तरह उसे भी कुछ न कुछ भेंट देकर विदा करते हैं. राजजात के अंतिम गांव बाण से आगे दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में नंदा की रक्षा के लिए उनके धर्म भाई ‘लाटू देवता’ जाते हैं. मान्यता है कि ‘लाटू देवता’ बोल नहीं सकते या वे ससुरालियों के भय से कुछ बोलते ही नहीं हैं. उत्तराखंड के हर पहाड़ी जिले में राजजात जैसे कई त्योहार और मेले हैं. ये सारे त्योहार बेटियों या बहनों को मायके बुलाने का सबसे बड़ा माध्यम हैं. देश के और हिस्सों की तरह उत्तराखंड में भी लोग भावी ससुराल की कई तरह से जांच-परख करने के बाद वहां अपनी बेटी को ब्याहते हैं. फिर बेटियों को साल में कई त्योहारी मौकों पर मायके बुलाया जाता है. कठोर से कठोर ससुराल वाले भी लोक-लाज और दैवी प्रकोप की आशंका के चलते अपनी बहुओं को इन मौकों पर मायके जाने से नहीं रोकते. लेकिन पहाड़ की सैकड़ों बेटियों के लिए इन तीज-त्योहारों-मौकों-मायके का कोई मतलब ही नहीं क्योंकि इनको शादी के नाम पर हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश ओर देश के अन्य हिस्सों में बेचा जा रहा है. इसके बाद कैसे त्योहार और कौन-सा मायका.

तहलका ने ‘कन्यादान’ के बजाय पैसा लेकर की जा रही इन शादियों की हकीकत जानने की कोशिश की. हमने मायके के इलाके से बहुत दूर रहने को मजबूर इन ‘नंदाओं’ की दुर्दशा की गहराई से पड़ताल की तो पता चला कि इन्हें जीते जी नरक भोगना पड़ रहा है. कहीं उनके साथ शादी के नाम पर बलात्कार होता है तो कहीं उनसे वेश्यावृत्ति करवाई जाती है. जब उनका शरीर देह व्यापार के काम का नहीं रहता तो जानकारों के अनुसार उसका कई और अमानवीय तरीकों से पैसे कमाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इनका सौदा करने वाले दलालों के मुताबिक पहाड़ से एक लाख में खरीदी गई लड़की उन्हें कई-कई लाख कमा कर देती है. हैरत की बात यह है कि उत्तराखंड के लगभग हर पहाड़ी जिले में फैली इस समस्या के बावजूद इस गंभीर मुद्दे पर उत्तराखंड की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में जरा भी संवेदना या हलचल नहीं. उल्टे यहां के जनप्रतिनिधि क्षेत्र की बदनामी होगी, कहकर मामले में कुछ भी कहने-सुनने से बचते हैं.

चमोली जिले में एक सुंदर-सा गांव है बूरा. कल्पेश्वरी यहीं रहती थी. उसके घर के हालात ठीक-ठाक थे. दादा और चाचा सेना में नौकरी कर चुके थे. शहरों की चकाचौंध और मैदानी इलाकों की सुविधाओं के बारे में सुन-सुन कर कल्पेश्वरी के मन में भी यह इच्छा जग रही थी कि शादी के बाद उसका पति उसे पहाड़ के गांव में न छोड़कर अपने उस शहर में ले जाए जहां वह नौकरी कर रहा हो. कल्पेश्वरी के मन में हिलोरें ले रही इच्छाओं को उसके गांव की सुपली देवी भी ताड़ रही थी. सुपली दो बार बूरा गांव की प्रधान रह चुकी थी.

इस तरह हो रही शादियों में अधिकांश लड़कियों के माता-पिता नहीं जानते कि जिस व्यक्ति के साथ उनकी बेटी की शादी हो रही है वह कौन है, किस गांव का है और उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है

14 सितंबर, 2012 को कल्पेश्वरी अचानक अपने घर से गायब हो गई. असहाय पिता ने उसे आस-पास के गांवों और रिश्तेदारी में तलाशा. लेकिन वह नहीं मिली. हारकर उसने राजस्व पुलिस में शिकायत दर्ज कर दी. लापता होने के छह दिन बाद राजस्व पुलिस ने कल्पेश्वरी को तहसील मुख्यालय विकास नगर (घाट) के पास घूनी गांव के 63 वर्षीय कुताली राम के कब्जे से बरामद किया.

कल्पेश्वरी ने जब गुमशुदगी के छह दिन की आपबीती सुनाई तो सभी को जो जो हुआ उसकी भयावहता का अंदाजा लगा. नादान कल्पेश्वरी को सुपली देवी मुजफ्फरनगर के किसी खाते-पीते किसान परिवार में शादी कराने का झांसा देकर भगा कर लाई थी. उसे भरमाया गया कि लड़का पंजाब में किसी सरकारी बैंक में काम करता है. घाट के नायब तहसीलदार (राजस्व पुलिस में पुलिस उपाधीक्षक के समकक्ष अधिकारी) भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘जांच में पता चला कि कल्पेश्वरी का सौदा एक लाख रुपये में हुआ था. इसमें से दलालों ने 40 हजार रुपये पेशगी ले रखे थे. बाकी बचे हुए 60 हजार रुपये कुताली राम को हरिद्वार में कल्पेश्वरी को सौंपते ही मिलने वाले थे.’
जांच में पता चला कि कल्पेश्वरी को बेचने के काम में एक पूरा गिरोह लगा था. गिरोह का मुखिया घूनी गांव का कुताली राम उर्फ ‘भादू’ था. इस मामले में कुताली राम, उसकी बेटी शाखा देवी के अलावा पांच और आरोपित गिरफ्तार हुए. कुताली के कहने पर ही सुफली देवी, कल्पेश्वरी को उसके घर से भगा कर लाई थी. गिरोह के सदस्यों ने पांच दिन तक कल्पेश्वरी को अलग-अलग गांवों में छिपा कर रखा.

मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 के बयानों से पहले किए गए मेडिकल में कल्पेश्वरी के साथ बलात्कार की भी पुष्टि हुई. पूछताछ के दौरान कल्पेश्वरी ने राजस्व पुलिस को रोते हुए बताया कि उसे छिपा कर इधर-उधर भगाते समय बूढ़े कुताली राम ने उसके साथ दो बार दुष्कर्म किया. कुताली की इस दरिंदगी के बाद कल्पेश्वरी की आंखें खुल गईं. भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘इसीलिए कल्पेश्वरी ने बरामदगी के बाद राजस्व पुलिस को जांच में सहयोग देते हुए गिरोह के सदस्यों को जेल भिजवाने में मदद की.’ जांच के दौरान कल्पेश्वरी की सुपली द्वारा उसके लिए प्रस्तावित लड़के से मोबाइल पर बात कराई गई. भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘भाषा, लहजे और गालियों से वह आदमी निपट अनपढ़ और अपराधी लग रहा था.’ फिलहाल कल्पेश्वरी अपने गांव में सुरक्षित है.

लेकिन हर लड़की की किस्मत कल्पेश्वरी जैसी नहीं होती. घाट विकासखंड के पूर्व प्रमुख सुदर्शन कठैत बताते हैं, ‘गिरोह के सदस्य और उनके एजेंट गांवों की भोली-भाली लड़कियों और उनके परिजनों को इस हद तक बरगलाते हैं कि वे उन पर भरोसा कर अपना सब कुछ खो बैठते हैं.’ घाट के ही कनोल गांव की सरिता की कहानी इसका उदाहरण है. बेहद खूबसूरत कनोल गांव राजजात यात्रा का अंतिम पड़ाव है. सरिता को उसके गांव में सुनार का काम करने वाली दलाल सीता ने अच्छी नौकरी दिलवाने का लालच देकर पहले गांव से भगाया और फिर उसे अपने वन तस्कर भाई राजू को बेच दिया. यह तीन साल पहले की बात है. तब वह नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी. सीता ने गांव में यह अफवाह भी फैला दी कि सरिता किसी दूसरी जाति के लड़के के साथ भाग गई है. बदनामी के डर से सरिता के पिता ने उसे खोजने के बजाय चुप्पी साध ली. अधेड़ राजू की पहले ही दो शादियां हो चुकी थीं और उसके सात बच्चे थे. तीन साल तक राजू नाबालिग सरिता का शारीरिक शोषण करता रहा.

वह हमेशा सरिता को कैद में रखता ताकि वह भाग न जाए. पिछले साल राजू का गिरोह घनसाली में बाघ की खाल के साथ पकड़ा गया. सरिता भी उसके साथ थी. वह भी जेल भेज दी गई. छह महीने जेल में रहने के बाद पिछले दिनों राजू की जमानत हो गई. दो दिन बाद उसने सरिता की भी जमानत करा दी. बाहर आने के बाद सरिता ने राजू के साथ जाने-रहने से मना कर दिया. अब सरिता को इस गिरोह से अपनी जान का खतरा है. महिला सशक्तीकरण के लिए चलाई जा रही योजना महिला समाख्या से जुड़ी रीना पंवार बताती हैं, ‘हमने सरिता के घर कई संदेश भेजे लेकिन उसके पिता उसे घर ले जाने को तैयार नहीं हैं.’ सरिता फिलहाल टिहरी में महिला समाख्या की व्यवस्था में रह रही है. तीन साल तक नरक भोगने के बाद वह फिर से अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ हंस-खेल कर पुराने बुरे दिनों को भूलने की कोशिश कर रही है.

हाल ही में दिल्ली में हुई बलात्कार की घटना के बाद उत्तराखंड के हर शहर-कस्बे में मोमबत्तियां जलाने वालों को आज भी यह पता नहीं कि अपने राज्य की जिस लड़की का फोटो उन्होंने एक साल पहले वन तस्कर के रूप में देखा था वह एक बेकसूर नाबालिग थी. एक ऐसी बच्ची जो मानव तस्करी का शिकार बनी और जिसके साथ तीन साल तक शादी के नाम पर बलात्कार होता रहा. चमोली स्थित स्वयंसेवी संगठन ‘जनक समिति’ के सचिव सुरेंद्र भंडारी बताते हैं, ‘लड़कियों की तस्करी में लगे गिरोहों ने पिछले साल जिले की विकासनगर तहसील से 27 लड़कियां शादी के नाम पर हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में बेची हैं.’ उनकी संस्था के अध्ययन के अनुसार इनमें से कोई लड़की शादी के बाद वापस मायके नहीं आई है. कई मायके वालों को तो यह भी पता नहीं है कि उनकी लड़कियां कहां ब्याही गई हैं और अब किस हाल में हैं.

‘कड़ी पूछताछ में दलालों ने बताया कि पहले ये लड़कियां बच्चे पैदा करने की मशीन होती हैं. फिर इन्हें या तो वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है या इनमें से अधिकांश के साथ घर पर ही देह व्यापार कराया जाता है’

चमोली में गैरसैंण की पूर्व जिला पंचायत सदस्य गीता बिष्ट ने 2006 में  आदि-बदरी के पास एक ऐसे ही गिरोह के तीन सदस्यों को तत्कालीन जिलाधिकारी अजय नब्याल की मदद से पकड़वाया था. गीता बताती हैं, ‘पकड़े जाने पर ये दलाल शादी हुई है, यह दिखला कर पुलिस को भी झांसा दे देते थे.’ इन दलालों की गाड़ी से दूल्हे का सेहरा और दुल्हन का शादी का जोड़ा भी बरामद हुआ था. इस मामले में एक दलाल गैरसैंण के गांवली गांव का मूल निवासी था. मेरठ कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी का यह कर्मचारी भोली-भाली लड़कियों का शादी के नाम पर सौदा करता था. गीता का मानना है कि गैरसैंण विकास खंड के हर गांव की कोई न कोई लड़की शादी के नाम पर बाहर बेच दी गई है. वे बताती हैं, ‘यदि ये शादियां हैं भी तो बेमेल हैं और लड़कियां किसी भी रूप में खुश और सुरक्षित नहीं हैं.’

इस तरह हो रही शादियों में अधिकांश लड़कियों के माता-पिता नहीं जानते कि जिस व्यक्ति के साथ उनकी बेटी की शादी हो रही है वह कौन है, किस गांव का है और उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि क्या है. इन क्षेत्रों में रिश्तेदारी तो दूर इनका नाम तक भी लड़की के घरवालों को पता नहीं होता है. तहलका की तहकीकात के दौरान अधिकांश मामलों में मायके वाले यह भी नहीं बता पाए कि उनकी बेटी जिस गांव में ब्याही है वह हरियाणा में है या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में. गीता बिष्ट बताती हैं, ‘इनमें से अधिकांश लड़कियां तो पहली बार हरिद्वार या हल्द्वानी से आगे जाती हैं.’ दलाल यह भी जानते हैं कि इन अबलाओं के गरीब और असहाय परिवारों में उनके खिलाफ कुछ करने-बोलने वाला कोई नहीं है.

उत्तराखंड में इस कुप्रथा की जड़ें बहुत पीछे तक जाती हैं. इतिहासकार योगंबर सिंह बर्त्वाल ‘तुंगनाथी’ बताते हैं, ‘जौनसार-बाबर और त्यूणी-आराकोट के बीच स्थित बंगाण इलाके की लड़कियों को अपने अच्छे नैन-नक्श के लिए जाना जाता है. इतिहास में ऐसे भी उदाहरण हैं कि देश के कई रजवाड़ों सहित अपने समय के माने हुए परिवारों ने इस क्षेत्र की लड़कियों से शादी कर अपनी नस्लों को सुधारा. फिर भी ये शादियां वैध थीं, उन्हें पूरी सामाजिक मान्यता थी और इन महिलाओं का सम्मान था.’ लगभग एक सदी पहले पत्रकार विशंभर दत्त चंदोला ने गढ़वाली नामक मासिक अखबार में गढ़वाल से खरीद कर बंबई ले जाकर ब्याही या रखी महिलाओं पर विस्तार से काम किया था. उन्होंने नवंबर 1913 के अंक में ऐसी महिलाओं का एक फोटो भी प्रकाशित किया था (इस स्टोरी का आखिरी पन्ना देखें). तुंगनाथी बताते हैं,  ‘उत्तरकाशी जिले के रवांई इलाके में बाजगी जाति की लड़कियां पिछली शताब्दी की शुरुआत से वेश्यावृत्ति के पेशे के लिए महानगरों की ओर जाने लगी थीं. लेकिन उनकी भी ऐसी दुर्दशा नहीं थी जैसी शादी के नाम पर बेची जा रही इन लड़कियों की है.’ वेश्यावृत्ति पेशे के लिए जाने वाली वे लड़कियां अपने गांव जाती रहती थीं. वे अपनी मर्जी की मालिक थीं और कुछ समय पेशा करने के बाद अपनी पसंद से शादी भी करती थीं. स्थानीय पत्रकार प्रेम पंचोली बताते हैं, ‘कोठों में गई इन औरतों ने ही अपने ग्राहकों के माध्यम से गरीब लड़कियों के रिश्ते मैदानी क्षेत्रों में तय करवाने शुरु किए थे.’

लगभग एक शताब्दी पहले यमुना घाटी से शुरू हुई यह कुप्रथा अब पूरे उत्तराखंड में सुरसा के मुंह की तरह पैर पसार चुकी है. पैसे के लेन-देन को मुख्य तत्व मानकर की गई इन शादियों में से 80 प्रतिशत बिखर जाती हैं. दरअसल ये शादियां केवल नाम के लिए होती हैं. इन असफल कहानियों के उदाहरण और लड़कियों के साथ हुई ज्यादतियों के किस्से पहाड़ के हर गांव-कस्बे में कुछ दिनों तक चर्चाओं में रहते हैं और फिर खो जाते हैं. पंचोली बताते हैं, ‘पहले ये लड़कियां बच्चे पैदा करने की मशीन होती हैं. फिर इन्हें या तो वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है या इनमें से अधिकांश के साथ घर पर ही देह व्यापार कराया जाता है.’ पंचोली कई सालों से लड़कियों की मानव तस्करी का विरोध कर रहे हैं, उन्होंने कई मामलों में लड़कियों को दलालों से बचाया भी है. वे बताते हैं, ‘शादी के नाम पर बेची गई लगभग 10 प्रतिशत लड़कियां वापस पहाड़ आ जाती हैं.’ हालांकि किसी तरह भागकर घर लौटने में सफल हो जाने वाली इन लड़कियों की जिंदगी में इससे कुछ अच्छा हो जाता हो, ऐसा नहीं है. वे सामाजिक बहिष्कार और प्रताड़ना की शिकार होती हैं.

जानकारों के मुताबिक सिर्फ 10 प्रतिशत मामलों में लड़कियों के मन मारकर समझौता करने पर उनकी शादियों को सफल माना जा सकता है. पंचोली बताते हैं, ‘इन सफल मामलों में भी लड़कियों के रिश्ते उन परिवारों में होते हैं जिनकी अपने इलाकों में सामाजिक पृष्ठभूमि इतनी खराब होती है कि उन परिवारों से उस इलाके, समाज या जाति का कोई परिवार अपनी लड़की ब्याहने को तैयार नहीं होता. या फिर ये शादियां बिल्कुल उम्र या किसी अन्य लिहाज से बेमेल होती हैं.’

पहाड़ों में महिलाओं को जीवन भर हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. ऐसे में मैदानी क्षेत्रों में शादी करके लड़कियों को घर में केवल खाना बनाना और झाड़ू-पोंछा करना कोई काम ही नहीं लगता. लेकिन मैदानी क्षेत्रों में जिन परिवारों में ये लड़कियां ब्याहने के नाम पर बेची जाती हैं वहां उनके सामने अलग ही तरह की तरह-तरह की समस्याएं आती हैं. पंचोली बताते हैं, ‘जिन परिवारों में ये लड़कियां ब्याही जाती हैं उनका सामाजिक या आर्थिक स्तर भी उतना अच्छा नहीं होता है.’ इसलिए जिन सुख-सुविधाओं के सपनों के साथ लड़की ससुराल पहुंचती है वहां हकीकत में उसके साथ बिल्कुल उल्टा होता है. पहाड़ों में खुले वातावरण में पली-बढ़ी लड़कियां ससुराल की खापों, जातियों, पर्दे और संकीर्णताओं वाले समाज के बंधनों में फंस कर घुट-घुट कर जीती हैं. पंचोली बताते हैं, ‘जहां ये लड़कियां ब्याही जाती हैं वहां का परिवेश पहाड़ों के विपरीत होता है. ऐसे में वहां इनका जिस्मानी रिश्ते के अलावा कोई और रिश्ता नहीं होता.’ इसलिए पहाड़ के खुले समाज में पली-बढ़ी ऐसी लड़कियों को घुट-घुट कर मौत का इंतजार करना होता है.

उत्तराखंड के आठ पहाड़ी जिलों में प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या अधिक है.  महिलाओं की यह अतिरिक्त संख्या, खूबसूरती, गोरा रंग और कमजोर पारिवारिक पृष्ठभूमि उन्हें दलालों का आसान शिकार बनाती है

लड़कियों को ब्याहने के नाम पर बेचने वाले इन गिरोहों ने अपना जाल इस तरह फैला दिया है कि जिस लड़की पर इनकी नजर पड़ती है उसे ये किसी न किसी कुचक्र में फंसा कर ले ही जाते हैं. उत्तरकाशी जिले के कफनौल की मीना बेहद खूबसूरत थी. पति नादान और अनपढ़ था. ससुराल वालों के ताने सुनकर मीना मायके आ गई.  आठ-नौ महीने वह मायके में क्या रही कि दलालों की नजर उस पर पड़ गई. गांव के प्रधान और बिजली के लाइनमैन ने 65 हजार रुपये में उसका सौदा कर दिया. बात राज्य महिला आयोग और थाने तक गई. मीना के चचेरे भाई ने दलालों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज कराया. लेकिन दलाल कहां मानने वाले थे, उन्होंने मीना के पति को इतना प्रताड़ित किया कि उस बेचारे ने डर कर आत्महत्या कर ली. अब विधवा मीना कहीं भी शादी कर सकती थी. दलाल मीना को गहनों से लाद कर नौगांव नाम के एक कस्बे तक लाए. प्रस्तावित दूल्हा अपनी स्कॉर्पियो कार में वहीं मौजूद था. राज्य महिला समाख्या की राज्य परियोजना निदेशक, गीता गैरोला बताती हैं कि मीना के मामले में वे राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुशीला बडोनी के साथ उसके गांव गई थीं. वे बताती हैं, ‘साफ दिख रहा था कि वह बेची जा रही थी. लेकिन दलालों ने अपने प्रभाव से इसे शादी का रूप दे दिया था इसलिए हम इस मानव तस्करी को नहीं रोक पाए.’ पंचोली बताते हैं, ‘किसी को भी पता नहीं है कि मीना अब कहां और किस हाल में है. मीना के मां-बाप भी नहीं हैं. होते भी तो क्या कर लेते. अब यह व्यापार संगठित माफिया का रूप ले चुका है. दलालों के पास कानून के रखवालों को भरमाने के हर तरीके हैं.’

मीना जैसा ही हाल विकास नगर के पडेर गांव की 27 वर्षीया कमला का भी हुआ. कमला का भी सौदा एक स्थानीय गिरोह ने हापुड़ में किया था. खबर मिलने पर राजस्व पुलिस ने कमला को खरीद कर ले जाने वाले गिरोह को रंगे हाथों विकास नगर में पकड़ लिया. कमला का सौदा करने वालों में उसके दो रिश्ते के भाई, दो स्थानीय दलाल और चार हापुड़ निवासी थे. नायब तहसीलदार भूपेंद्र सिंह बताते हैं, ‘इस मामले के मुख्य आरोपी संजय राठी ने जमानत पर बाहर आते ही कमला से कोर्ट मैरिज कर ली और उसे हापुड़ ले गया. शादी के नाम पर कमला बिक कर हापुड़ चली गई.’

बेटियों के व्यापार के मामले कुमाऊं कमिश्नरी में भी कम नहीं हैं. नैनीताल जिले की धारी तहसील का ही उदाहरण लीजिए. यहां डालकन्या गांव के कुंवरदेव पनेरू की 14 साल की बेटी भगवानी का सौदा अप्रैल, 2011 में गांव के ही चंद्रमणि भट्ट ने मथुरा के एक 35 साल के व्यक्ति के साथ करा दिया था. डालकन्या गांव नैनीताल जिले के सबसे दूरस्थ गांवों में से एक है. नाबालिग लड़की की अनजान जगह शादी की बात जब महिला संगठनों को पता चली तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज करानी चाही. लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई. बाद में जिलाधिकारी के दखल से यह शादी रुकी. जांच के दौरान पनेरू ने बताया कि चंद्रमणि ने उसे 20 हजार रुपये दे कर यह शादी तय करवाई थी. महिला समाख्या, नैनीताल की बसंती पाठक बताती हैं, ‘डालकन्या ग्राम सभा के 20 परिवारों की 35 लड़कियों को भगवानी की तरह शादी के नाम पर मथुरा, बरेली, सितारगंज, अलीगढ़, खटीमा और मुरादाबाद में बेचा गया है.’ शादी के बाद अधिकांश लड़कियां वापस नहीं आई हैं. जो वापस आती भी हैं, वे बताती हैं कि उनसे बहुत बुरा व्यवहार किया जाता है. पैसे से खरीद कर ले जाने वाले लोग इन लड़कियों के साथ बहुत अत्याचार करते हैं. बसंती पाठक कहती हैं, ‘लेकिन लड़कियों के जीवन की विडंबना यह है कि वे मायके आकर अपने मां-बाप की खुशी के लिए यह बताती हैं कि वे ससुराल में खुश हैं.’

इस मुद्दे पर तत्कालीन जिलाधिकारी नैनीताल ने डालकन्या गांव में सामूहिक बैठक रखी थी. इसमें दलालों द्वारा कराई जा रही इन शादियों की हकीकत सामने आई. गांव के ही रेवाधर पनेरू ने बताया कि उसकी दो बेटियों की शादी भी इन्हीं बिचौलियों ने छह साल पहले 30 हजार रुपये में उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के गदरपुर में कर दी थी. ससुराल में परेशान ये लड़कियां शादी के दो साल बाद वापस मायके आ गई थीं. उस दिन से ससुराल वाले इनका फोन ही नहीं उठा रहे. बसंती पाठक कहती हैं, ‘ये हाल जब अपने राज्य में शादी के नाम पर बेची गई लड़कियों के हैं तो बाहरी राज्यों में बेची गई लड़कियां किस हाल में होंगी, भगवान ही जानता है.’ जिलाधिकारी द्वारा रखवाई गई इस बैठक में पता चला कि आस-पास के गांवों की लगभग 60 लड़कियां शादी के नाम पर मैदानी क्षेत्रों में बेची गई हैं. नैनीताल के डालकन्या गांव की खरीदने-बेचने वाली शादियां कुमाऊं के हर जिले के दूरस्थ गांव में हो रही हैं.

हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में 1,000 पुरुषों की तुलना में 800 से भी कम महिलाएं हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड के आठ पहाड़ी जिलों में प्रति हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या अधिक है. अल्मोड़ा जिले में तो हजार पुरुषों पर 1,142 स्त्रियां हैं. महिलाओं की यह अतिरिक्त संख्या, उनकी खूबसूरती, गोरा रंग और कमजोर परिवारिक पृष्ठभूमि उन्हें दलालों का आसान शिकार बनाती है. दलालों ने इस व्यापार के लिए दूरस्थ पहाड़ी इलाकों के राजस्व पुलिस वाले क्षेत्रों को चुना है. प्रदेश के पहाड़ी जिलों का 80 प्रतिशत भाग राजस्व पुलिस के अधीन है. लेकिन आरोप लगते हैं कि हर तरह से कमजोर राजस्व पुलिस इन मामलों को अपराध तक नहीं मानती या ले-देकर इन मामलों को निपटा देती है.

एक सदी पहले पत्रकार विशंभर दत्त चंदोला ने गढ़वाली नामक मासिक अखबार में गढ़वाल से खरीद कर बंबई ले जाकर ब्याही या रखी महिलाओं के बारे में लिखा था. नवंबर 1913 के अंक में उनकी एक तस्वीर भी छपी थी

ब्याह के नाम पर बेची गई लड़कियों की कथित ससुराल में क्या हालत है, यह जानने के लिए उत्तरकाशी जिले की बड़कोट तहसील की 22 साल की मीता की दर्दनाक कहानी काफी है. पूर्व सैनिक पिता ने उसकी शादी पास के ही गांव में की थी. शादी के कुछ ही महीने बाद हरिद्वार स्थित एक फैक्टरी में नौकरी करने गए उसके पति की दुर्घटना में मृत्यु हो गई. शादी की उम्र से पहले ही मीता विधवा हो गई. ससुरालियों ने भी मीता को परेशान करके भगा दिया. मीता के पास मायके के अलावा कोई ठिकाना नहीं था. लड़कियों की खरीद-फरोख्त में लगे दलाल गिरोहों की नजर ऐसी ही लड़कियों पर होती है. यहां मीता की दुश्मन नई टिहरी में रहने वाली उसके गांव की रिश्ते की बुआ अंबिका निकली. अंबिका ने भोली मीता को समझाना शुरू किया कि इतनी लंबी उमर है अकेले क्या करोगी. उसने मीता से कोई अच्छा लड़का देखने की बात कहते हुए उसे आश्वस्त किया कि उसने पहले भी ऐसी कई शादियां करवाई हैं.

अंबिका मीता को लेकर मेरठ गई. यहां उसने उसे दरौला के पास बंशीपुरम इलाके के पिंटू नाम के लड़के और उसके रिश्तेदारों से मिलवाकर पिंटू के साथ शादी के नाम पर छोड़ दिया. पिंटू के मां-बाप बचपन ही में मर गए थे, उसे उसके जीजा विजेंद्र ने पाला था जो आपराधिक प्रवृत्ति का दबंग आदमी था. इस शादी की हकीकत जल्द ही मीना के सामने आ गई. वह बताती है, ‘पिंटू का जीजा और उसके कई दोस्त मेरे साथ जबरदस्ती करते थे.’ जीजा के टुकड़ों पर पल कर बड़ा हुआ मजदूर और मजबूर पिंटू विरोध में कुछ नही कह पाता था. मीता के विरोध करने पर विजेंद्र उसे धमकाता था कि उसे दो लाख रुपये में अंबिका से खरीदा गया है इसलिए वे उसके साथ कुछ भी कर सकते हैं. मीता ने मायके जाने के लिए मिन्नतें कीं तो विजेंद्र ने उसे बताया कि मां और भाई से मिलने की इच्छा है तो वह उन्हें यहीं बुला ले और अब वापस पहाड़ जाने की बात भूल जाए. बाहर जाते समय विजेंद्र मीता को कमरे में ताला बंद करके रखता था ताकि वह भाग न सके.

आखिर एक दिन किसी तरह मीता वहां से भाग कर नई टिहरी पहुंची. अगले ही दिन विजेंद्र भी उसे खोजते हुए वहां पहुंच गया. मीता ने पुलिस की महिला हेल्प लाइन में रिपोर्ट लिखवाई पर कुछ नहीं हुआ. कई दिनों तक विजेंद्र 12 लोगों के साथ उसे वापस ले जाने की जिद के साथ बेखौफ टिहरी में डटा रहा और मीता अपने मायके के क्षेत्र में उसके डर से इधर-उधर भागती रही. बाद में मीता महिला समाख्या के पास गई, जहां उसे, पिंटू और उसके जीजा को काउंसलिंग के लिए बुलाया गया. महिला समाख्या, टिहरी की रिसोर्स पर्सन रीना पंवार बताती हैं, ‘मीता के आरोप सही थे. उसका बुरी तरह शारीरिक शोषण और मानसिक उत्पीड़न हो रहा था.’ महिला समाख्या ने विजेंद्र और पिंटू को आगे मीता को परेशान न करने की हिदायत दी. मीता बताती है, ‘अंबिका ने पहले भी मेरी तरह तीन परेशान लड़कियों को बेचा है.’

ऐसी ही कहानी चमोली जिले की पोखरी तहसील से सात किमी दूर के एक गांव की रीना की भी है. रीना की बहन के मुताबिक हरियाणा के पानीपत में ब्याही गई रीना को उसका नशाखोर पति पैसे के लिए दोस्तों के सामने परोसता है. कुछ समय पहले वह अपने मायके आई थी. रीना की बहन बताती है, ‘हाल ही में रीना के पति के दोस्तों ने उसके बैंक खाते में पैसे डाले और उसे फिर ले गए हैं.’ बहन को भरोसा नहीं है कि रीना की जान और इज्जत-आबरू उसकी कथित ससुराल में सुरक्षित है. रीना के पिता की भी मौत हो चुकी है और उसका कोई भाई भी नहीं है.

तहलका ने बाहर ब्याही लड़कियों के वास्तविक हालात के बारे में कई माध्यमों से गहराई से जांच-पड़ताल की और पाया कि अच्छे घरों में ब्याहने के नाम पर बेची गई अधिकांश लड़कियों से कई तरीकों की वेश्यावृत्ति कराई जाती है. नायाब तहसीलदार भूपेंद्र सिंह तो स्थितियों को और भी भयावह बताते हैं. वे कहते हैं, ‘दो मामलों में कड़ी पूछताछ में दलालों और खरीददारों ने बताया कि पहले इन लड़कियों से बच्चे पैदा कराए जाते हैं. फिर पत्नी की तरह रख कर वेश्यावृत्ति कराई जाती है या बेच दिया जाता है. जब उनका शरीर देह व्यापार के काम का नहीं रहता तो इनसे खून बिकवाया जाता है और अंत में कई बार इनके किडनी जैसे अंग भी बेचे जाते हैं.’ कड़ी पूछताछ में दलालों ने पुलिस के सामने स्वीकारा कि पहाड़ से एक लाख में खरीदी गई लड़की उन्हें कई लाख कमा कर देती है और उसके मायके वालों से किसी किस्म के विरोध और कानूनी परेशानी का भी उन्हें डर नहीं रहता है. राज्य में मानव तस्करी रोकने के लिए पुलिस क्षेत्र में एक सेल बनाया गया है. लेकिन यह बस नाम का ही है. कुमाऊं के आईजी दीपक ज्योति घिल्डियाल बताते हैं, ‘नैनीताल में मानव तस्करी सेल खुला है, अब उसका दायरा बढ़ा कर उधम सिंह नगर जिले तक कर दिया गया है.’ इस सेल के पास अभी केवल एक शिकायत रामनगर में दर्ज हुई है. घिल्डियाल बताते हैं, ‘यदि राजस्व क्षेत्र से भी इस तरह के मामले हमारे पास आते हैं तो हम उन्हें लेंगे.’

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद लड़कियों को ब्याहने के नाम पर बेचने के हजारों मामले हुए हैं. लेकिन आज तक एक भी मामला विधान सभा में नहीं उठा है. हर पर्वतीय विधायक के क्षेत्र में यह काला-व्यापार हो रहा है लेकिन उन्होंने इन मामलों का कोई संज्ञान नहीं लिया. अधिकांश जनप्रतिनिधि इलाके की बदनामी के नाम पर इन सामाजिक व्यापार-व्यवहारों को प्रचारित न करने की सलाह देते हैं. बहुत-से दलाल किसी न किसी पार्टी के ‘सम्मानित कार्यकर्ता’ भी हैं. विधायकों को डर है कि ये दबंग उनकी जीत को कुछ सौ वोटों से तो प्रभावित कर ही सकते हैं.

उत्तराखंड में हर आंदोलन की अगुवाई महिलाएं करती हैं, लेकिन बेटियों के इस कुत्सित और घृणित व्यापार के विरोध में राज्य बनने के बाद कोई आंदोलन होना तो दूर एक संगठित आवाज तक नहीं उठी. देहरादून में नित होने वाले बौद्धिक सम्मेलनों में भी कभी इस दर्द को मंचों पर साझा नहीं किया गया. शायद इसलिए कि बिक रही ये बेटियां उन गरीबों और असहाय लोगों की थीं जो किसी प्रचार माध्यम को प्रभावित नहीं करते.
राज्य आंदोलनकारी और राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुशीला बलूनी बताती हैं, ‘हमें राज्य के दूर-दराज के क्षेत्रों में इस तरह की बिक्री की बातें तो सुनने में मिलती हैं, लेकिन आज तक कोई लिखित शिकायत हमारे सामने नहीं आई है और न ही किसी जनप्रतिनिधि या संगठन ने इस बारे में उन्हें पत्र लिखा है.’ गीता गैरोला बताती हैं, ‘कोई भी महिला संगठन मानव तस्करी करने वाले इन सशक्त गिरोहों को मुकाबला नहीं कर सकता क्योंकि इन्हें किसी न किसी रूप से प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है.’

शारीरिक शोषण, उत्पीड़न और बिक कर ब्याहने की पीड़ा जैसे बड़े कष्टों के अलावा अपरिचित इलाकों में बेच कर ब्याही इन बेटियों के जीवन में कई गहरी भावनात्मक पीड़ाएं भी हैं. पहाड़ में ससुराल के कठिन और अनुशासित जीवन के बीच मन को हल्का करने के लिए मायके आने के लिए अनेकों मौके और परंपराएं हैं. लोकमान्यता है कि इन मेलों या त्योहारों में यदि लड़कियों को मायके न भेजा जाए तो लड़की के मायके की नंदा देवी ससुरालियों पर कुपित हो कर कहर बरपाती हैं. इस पारंपरिक डर से कठोर से कठोर दिल वाले ससुराली भी कम से कम इन मेलों के समय अपनी बहुओं को उनके मायके भेजते ही हैं. मैदानी इलाकों में ब्याही गई इन लड़कियों के ससुरालियों को इन परंपराओं से कोई मतलब ही नहीं होता. 

चमोली-रुद्रप्रयाग जिले में तुंगनाथ मंदिर से जुड़े गांवों में हर तीसरे साल नंदा देवी को गांव आने का न्यौता दिया जाता है. इस तरह के मेलों में नंदा के साथ-साथ गांव की बेटियों को भी मायके बुलाया जाता है. ऐसे ही एक गांव की बेटी थी सोनम. उसका गांव रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि विकास खंड में है. सोनम के पिता गांव के लोहार थे. अपने पिता के साथ गांव भर के घरों में घूमती-हंसती-खेलती बड़ी हो रही सोनम अपने पिता के अलावा पूरे गांव की भी बेटी थी. चार साल पहले पिता के मरने के बाद मां ने 15 वर्षीया सोनम की शादी रुड़की तहसील के झबरेड़ा थाने के एक गांव में एक 45 वर्षीय किसान के साथ तय कर दी. तहलका ने किसी तरह सोनम से बात की. उसने बताया, ‘ससुराल आ कर पता चला कि पति की पहली पत्नी भी थी जो मर गई थी. पहली शादी की लड़की उम्र में मेरे ही बराबर है.’ वह आगे कहती है,‘यदि मां शादी करने से पहले मुझे हकीकत बताती तो मैं कभी इसके लिए तैयार नहीं होती.’

शादी के कुछ दिनों बाद ही सोनम को पता चल गया कि उसकी मां ने उसे 70 हजार रुपये में बेचा था. अब उसकी सास हमेशा ताने देती है कि जितने रुपयों में उसे  खरीदा गया है उस हिसाब से उसे शऊर नहीं है. सोनम की एक देवरानी मुजफ्फर नगर और दूसरी शामली की है. सोनम बताती है, ‘मेरी दोनों देवरानियों के मायके वाले हर महीने उनसे मिलने आते हैं, मेरे मायके में कोई नहीं है.’ मायूस सोनम कहती है, ‘यदि कोई होता भी तो इतनी दूर और अनजाने माहौल में डर के मारे मुझसे मिलने नहीं आता.’

शादी के एक साल बाद ही सोनम की एक लड़की भी हो गई. हर लड़की की तरह सोनम को भी मायके की याद आई. मिन्नतें करने पर भी ससुराली नहीं माने. आखिर सोनम भाग कर अपने मायके आ गई. मायके में भी मां-बाप थे नहीं, सो अधिक दिन किसके पास रहती. तीन महीने बाद ताऊ-चाचा ने भी ताने देने शुरु किया तो सोनम थक-हारकर एक बार फिर मजबूर होकर मायके से खुद को खरीदने वाली ससुराल चली गई. अब वह 19 साल की है और इतनी सी उम्र में इतना कुछ भुगत लिया है. मोबाइल पर बात करते हुए रुआंसी होकर सोनम कहती है, ‘मेरे जैसा बिना मायके वाला दुर्भाग्य किसी और लड़की का न हो और बेच कर मुझे  दूसरे मुल्क में ब्याहने वाली मां का भी कभी भला न हो.’ सोनम के गांव की 17 साल की कुंती को उसके पिता ने 40 साल के आदमी के हाथों गाजियाबाद बेच दिया है. उसी गांव की पांच और लड़कियों का सौदा उनके मां-बापों या दलालों ने मैदानी क्षेत्रों में किया है. सोनम के मायके के आस-पास के पांच गांवों की करीब 30-32 लड़कियों को उनके माता-पिता ने हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश या मैदानी जिलों में शादी के नाम पर बेचा है.

पहाड़ में जानवरों को खरीदने-बेचने वाले दलालों को पहले ‘गलदार’ कहते थे. गलदार इतना चालाक होता था कि यदि उसकी नजर किसी के अच्छे-खासे दूध देने वाले या स्वस्थ जानवर पर पड़ जाती थी तो उस जानवर का बिकना निश्चित था. स्थानीय पत्रकार देवेंद्र सिंह रावत कहते हैं, ‘अब मासूम लड़कियों की खरीद-फरोख्त करने वाले गलदारों ने सारे पहाड़ में जाल फैला दिया है.’ गीता बिष्ट कहती हैं, ‘देश के किसी भी भाग की तुलना में सीमाओं की रक्षा में उत्तराखंड के अधिक जवान लगे हैं. लेकिन दुश्मनों को किसी भी हाल में धराशायी करने का इतिहास रखने वाले ये वीर भाई भी दलालों से अपनी बहनों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं. और यहां के राजनेता और नौकरशाह इस मामले में ‘लाटू देवता’ की तरह मौन हैं.’

(पीड़ित लड़कियों और परिवार के सदस्यों के नाम बदले हुए हैं. अपराधियों, दलालों या आरोपितों के नाम यथावत हैं)

(महिपाल कुंवर के सहयोग के साथ)

‘गिरोहों की जकड़बंदी से मुक्ति हो साहित्य ’

उदय प्रकाश हिंदी के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले लेखकों में से हैं.  अपने रचनात्मक जीवन तथा मौजूदा सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों पर पूजा सिंह से उनकी बातचीत.

आपके लेखन या कहें रचनात्मक जीवन की शुरुआत कब हुई?
मैं काफी लंबे समय से लिख रहा हूं. जब मैं करीब 6-7 साल का था तभी से लिख रहा हूं. उस समय कविता और पेंटिंग का शौकीन था. एक पुराना कैमरा था, उससे फोटोग्राफी करता था और खूब घूमता था. कविताएं मैंने छंदों और गीतों में लिखीं. पढ़ता खूब था क्योंकि वहीं मेरी दुनिया थी. किताबों और चित्रों की दुनिया में रहता था. मेरे पिता जी बीमार थे और कोमा में जाने से पहले उन्होंने मेरी मां को लिखा था कि वो सबसे अधिक मुझे लेकर परेशान रहते हैं कि इसका क्या होगा. एक लेखक का दुनिया को देखने का अलग बोध होता है. वो अपनी क्रिएटिविटी के जरिए दुनिया को देख और समझ पाता है.

हिंदी साहित्य के सांस्थानिक स्वरूप से आपका विरोध जगजाहिर है. यह विरोध क्यों है? इसका आपको क्या खामियाजा उठाना पड़ा?
विरोध इसलिए है क्योंकि मैंने वहां की स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी है. मैंने जाति व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया. मैं हिंदी समाज की आंखों का तारा कभी नहीं रहा. मुझे हाशिये से भी धकेलने की हर संभव कोशिश की गई. अगर आप पीली छतरी वाली लड़की कहानी पढ़ें तो आप पाएंगे कि आज हमारे देश में कोई ऐसी जाति नहीं है जो यह दावा कर सके कि वह शुद्ध है. मेरी उस रचना को लेकर इतना विष वमन किया गया कि मैं आपको बता नहीं सकता. हिंदी में इन लोगों का पूरा गिरोह है. वे अगर ठान लें तो आपको कहीं काम नहीं करने देंगे. आप अगर पहले से कहीं काम कर रहे हैं तो आपको निकलवा दिया जाएगा. मुझे जेएनयू में करीब 25 साल की उम्र में दाखिला मिला. पीली छतरी वाली लड़की किसी दूसरे की कहानी नहीं है. उसमें मेरे खुद के अहसास हैं. लेकिन मुझे मेरी ही भाषा से लगातार निष्कासित करने की कोशिश की गई. मुझे निरंतर अपमानित किया गया. लेकिन मैं लगातार उनके खिलाफ मुखर रहा. आज भी मैं अपनी प्रिय भाषा को उनकी जकड़बंदी से मुक्त कराने में लगा हूं.

इन सब बातों के बावजूद आप हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों में से हैं.
यह तो आम पाठकों का स्नेह है जिसके भरोसे मैं खड़ा हूं. उस वक्त की एक बात आपको बताता हूं. उस कहानी को लेकर मुझे जो समस्या हुई है उसके बारे में केवल मैं ही महसूस कर सकता हूं. कुछ साल पहले की बात है. मुझे जेएनयू से नौकरी ऑफर हुई लेकिन ऐन वक्त पर अड़ंगा लगा दिया गया कि यह नौकरी तो एससी एसटी के लिए है. अगर मैं इसका विरोध करता तो मुझे एंटी एससी एसटी मान लिया जाता. इसके बाद डीयू में मेरी नौकरी की बात चली तो एचआरडी मिनिस्टर तक को साधा गया ताकि मुझे नौकरी न मिल सके. तो यह नेक्सस इतना करप्ट हो चुका है कि क्या कहूं? इसी के बाद मैंने मोहनदास लिखी.

एक लेखक या कहें एक रचनाकार की संवेदनशीलता अन्य लोगों से किस तरह अलग होती है?
एक लेखक का दुनिया को देखने का अलग बोध होता है. वो अपनी क्रिएटिविटी के जरिए दुनिया को देख और समझ पाता है. यही वजह है कि वह स्वभाव से क्रांतिकारी होता है. वह बेहद संवेदनशील होता है और एक तितली की मौत से भी विचलित हो सकता है. इतना ही नहीं, उस मौत के पीछे वह न केवल पर्यावरण संबंधी खामियों को बल्कि पूरी व्यवस्था की असफलता को पहचान सकता है. यह पॉलिटीशियन नहीं समझेगा. आपको याद होगा किसी कवि ने कहा है कि जो सरकारें बाघ को बचाने का दावा करती हैं वे झूठ बोलती हैं क्योंकि वे घास के बारे में चुप हैं. क्योंकि घास बचेगी तभी बाघ बचेगा. हम सबका जीवन बहुत छोटी-छोटी चीजों से बना है…

आप पर आरोप है कि आप अपने आस-पास के लोगों पर रचनाएं लिखते हैं. कहानी राम सजीवन की प्रेम कथा के बारे में कहा जाता है कि वह मशहूर कवि गोरख पांडेय पर केंद्रित है.
मुझे सच बोलने के लिए तमाम यातनाओं से गुजरना पड़ा है. उनमें से एक हैं ये आरोप. मोहनदास से लेकर पीली छतरी वाली लड़की और राम सजीवन की प्रेम कथा तक पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मेरे निजी अनुभवों पर हैं. गोरख मेरे बहुत अच्छे मित्र थे. यह कहानी पढ़कर हम दोनों खूब हंसा करते थे. वैसे भी राम सजीवन की प्रेम कथा को जो लोग किसी का मजाक उड़ाने वाली कहानी मानते हैं उनकी समझ में समस्या है. 

गोरखपुर जाकर योगी आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कार लेने का विवाद भी जब तब प्रेत की तरह उठ खड़ा होता है.
यह अनायास नहीं है कि मैं यहां पुरस्कार लेता हूं और वहां हिंदी साहित्य जगत के खेमेबाज मुझ पर टूट पड़ते हैं. मैं एक बार फिर कहता हूं. मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जिस पर मुझे सफाई देनी पड़े. वह एक नितांत पारिवारिक समारोह था. कुंवर नरेंद्र प्रताप सिंह मेरे फुफेरे भाई थे और उनकी मौत के बाद पहली बरसी पर पहला नरेंद्र स्मृति सम्मान मुझे दिया गया और यह उनके परिवार की इच्छा थी. हां, मेरी गलती यह जरूर रही कि मैं एक नितांत पारिवारिक आयोजन के व्यावहारिक राजनीतिक पक्ष के बारे में नहीं सोच सका.

‘आप जिन्हें हिंदी के बड़े आलोचक कहते हैं वे छोटी-छोटी चीजों पर बिक जाने वाले लोग हैं. वे किसी को भी प्रेमचंद, मुक्तिबोध या टैगोर कह सकते हैं’

आप देश के आदिवासी बहुल इलाके से आते हैं. इस वक्त आपकी नियुक्ति भी इंदिरा गांधी जनजातीय विश्वविद्यालय, शहडोल में है. तो प्राकृतिक संसाधनों को लेकर आदिवासियों के साथ ज्यादती का जो सिलसिला है उस पर एक लेखक के रूप में आपका क्या नजरिया है?
जो लोग आज आदिवासी इलाकों में बॉक्साइट या कोयले के लिए अतिक्रमण कर रहे हैं वे यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वे बॉक्साइट तो निकाल लेंगे लेकिन उसकी कीमत कितनी ज्यादा होगी. आप सोच रहे हैं कि केवल आदिवासियों का ही विस्थापन हो रहा है तो ऐसा नहीं है. विस्थापन और भी कई चीजों का हो रहा है जिसे आम तौर पर लोग देख नहीं पाते हैं. जब मैं जाता हूं तो रास्ते में बाण सागर परियोजना पड़ती है, जिसके लिए सोन नदी को पहाड़ों के बीच में रोक दिया गया है. इसकी वजह से बहुत-से जानवर गए, वनस्पतियां गईं. लेकिन जो विस्थापन हुआ वह वहां के लोगों के साथ-साथ बंदरों का भी हुआ. आज अगर आप रीवा से शहडोल के लिए निकलें तो रास्ते में आप पाएंगे कि लंगूर अपने पूरे कुनबे के साथ सड़क पर बैठे हैं. आप हॉर्न दीजिए, वे नहीं भागते हैं. ऐसा लगता है उन्होंने ड्रग ले लिया है. रोज सड़क पर कई बंदर आपको मरे हुए मिलेंगे. यह एक किस्म की आत्महत्या है जो विस्थापित होने के दुख से उपजी है. इस पर किसी का ध्यान नहीं है. जंगल तो डूब गया वे कहां जाएंगे. वे गांवों में आते हैं और दलहन और फल-सब्जियों को खाते हैं. तो पैटर्न इतना चेंज हुआ है कि अब वहां कोई दलहन नहीं उगाता. वह नकदी फसल थी लेकिन बंदरों के कारण बंद हो गई. अब फलदार पेड़ों की रक्षा नहीं हो पा रही. लोगों ने अब बंदरों की वजह से खपड़े की छत का इस्तेमाल बंद कर दिया क्योंकि वे तोड़ देते थे. अब उनकी वजह से टिन या एस्बेस्टस की छत इस्तेमाल हो रही है. तो आप देखिए कि महज एक बांध बनाने से क्या-क्या बदला? आपका खान-पान बदल गया क्योंकि आपने दलहन व फल उगाने बंद कर दिए. कुंभकार का पेशा खत्म हो गया क्योंकि आपने खपरैल व मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल करने बंद कर दिए. आप आंदोलन करते हैं केवल आदिवासियों के लिए. वह ठीक है, अपनी जगह जरूरी है लेकिन इस पर किसी का ध्यान नहीं है कि एक पूरी जीवनशैली खत्म हो रही है.

आपके लेखकीय जीवन की बड़ी चुनौतियां कौन-सी रहीं?
मेरा तो पूरा जीवन ही चुनौतियों से भरा रहा. मैं तो एक आम मेहनतकश मजदूर हूं अपनी भाषा का. आप देखिए कि हिंदी पर किसका कब्जा है. हम जैसे लोग कहीं नहीं हैं. 90 के बाद सबसे ज्यादा शोषण भाषा का हुआ है. पूरा कारोबार भाषा का है. मीडिया भाषा का दोहन कर रहा है, विज्ञापन में, इंटरनेट पर हर जगह भाषा का ही खेल है. राजनीति से लेकर पॉप कल्चर तक हर जगह भाषा का इस्तेमाल है, लेकिन लेखक की आवाज इसमें गायब है. जो बात अरविंद केजरीवाल या शरद पवार बोलेंगे, उसको तो पूरा कवरेज मिलेगा. एक लेखक अपने दुख बयान करेगा या एक तितली के मरने की बात करेगा तो उसे कौन सुनेगा. तो भाषा एक कमोडिटी में बदल गई है.

आपने अभी कहा कि मीडिया भाषा का शोषण कर रहा है. इस बात को थोड़ा स्पष्ट करेंगे?
देखिए, एक कविता है जिसका अनुवाद करें तो वह कहती है कि शब्दों को बबलगम की तरह चबाया जा रहा है और गुब्बारे की तरह फुलाया जा रहा है. खूबसूरत एंकर शब्दों को चबाती हैं और राजनेता उनसे दांत मांजते हैं और कुल्ला करते हैं. मास मीडिया झूठ का कारोबार है. वह सच दिखाने नहीं सच को छिपाने का काम करता है. आप सुधीर चौधरी का मामला देखिए या नीरा राडिया का. यह सारा काम भाषा के जरिए ही तो हो रहा है. मीडिया के बारे में किसी को कोई गलतफहमी नहीं है. रोम्यां रोलां कहते हैं कि अथॉरिटी शब्द ऑथर से ही बना है. जो भाषा पर अधिकार रखता था, वह ऑथर था. क्राइस्ट, प्रोफेट मोहम्मद, वेदव्यास ये ऐसे ही लोग थे. लेकिन जब प्रिंट आया तो भाषा पर अचानक बहुतों का कब्जा हो गया. वकील, नेता, डॉक्टर सबका. यही वह वक्त था जब ऑथर की जगह राइटर ने ले ली. ऑथर व राइटर में फर्क है. ऑथर बोलता था और राइटर लिखता था. यह मुश्किल काम था, इसीलिए ऑथर का इतना अधिक सम्मान था. आप अपने यहां ही देखिए कि गांधी और टैगोर को एक ही धरातल पर रखा जाता था. आज क्या स्थिति है? लेखक एक पुलिसवाले के पीछे चापलूस की तरह दौड़ रहा है. आप जिन्हें हिंदी के बड़े आलोचक कहते हैं वे छोटी-छोटी चीजों पर बिक जाने वाले लोग हैं. वे किसी को भी प्रेमचंद, मुक्तिबोध या टैगोर कह सकते हैं. लेखक की अथॉरिटी नहीं रही. आज अगर हम ये सोचें कि सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह आकर कहें कि उदय प्रकाश आप कैसे हैं, आपकी तबीयत तो खराब नहीं तो यह नहीं होने वाला. आज स्थिति यह है कि आप कलेक्टर से मिलने जाएंगे तो आपको चपरासी
रोक लेगा.

पिछले दो दशक में सबसे बड़ा बदलाव आपने क्या महसूस किया है?
आर्थिक असमानता को छोड़ दें तो मनुष्य की मनुष्य से भावनात्मक दूरी बहुत बड़ी है. मेरी कहानी तिरिछ अगर आपने पढ़ी हो तो वह यही कहती है. यह बात सन 82 की है. मैं उस वक्त अशोक विहार से आईटीओ आता था- टाइम्स ऑफ इंडिया. मैं गौर से देख रहा था विकास बहुत तेजी पर था. बड़ी-बड़ी इमारतें बन रही थीं और दिल्ली का नक्शा बदल रहा था. मैं एक मोपेड से आता था. मैंने देखा कि पहाड़गंज के आस-पास ऐसे पोस्टर लगने लगे कि किसी अपरिचित से बात न करें. अपने सामान की खुद देखभाल करें. तो संदेह संदेह संदेह. हर किसी पर संदेह करो. इसकी शुरुआत वहीं से हुई. लोगों ने एक-दूसरे की परवाह करनी बंद कर दी. आज देखिए उस राह पर हम कितना आगे निकल आए हैं.

‘तैने सौ नंबर डायल किया था?’

दिल्ली पुलिस का एक नारा है– दिल्ली पुलिस सदा आपके साथ. दिल्ली पुलिस का यह सूक्त वाक्य गली-चौराहों और आए दिन अखबारों में साया होने वाले विज्ञापनों के बावजूद जनता में क्यों नहीं पैठ बना पाया है… इसका अनुभव आखिरकार पिछले दिनों हो ही गया. उसी दिन समझ में आया कि राह चलते घायलों को देखने के बाद मददगार भावों के बावजूद दिल्ली का नागरिक क्यों सौ नंबर पर फोन करने से बचता है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बगल से गुजरते वक्त एक दिन शाम को सड़क पर दूर से ही नजर आई भीड़ ने बता दिया कि वहां कोई अनहोनी हो गई है. नजदीक जाने पर भयावह नजारा था.

एक ऑटो सड़क के ठीक बीचोबीच पलट गया था. उससे कुछ दूर एक साइकिल ठेला उलटा पड़ा था. ठेलावाला एक तरफ बेसुध सड़क पर ही गिरा पड़ा था… नजदीक जाने के बाद पता चला कि ऑटो में लहूलुहान एक महिला और ऑटो ड्राइवर फंसे पड़े हैं. कुछ लोग उस ऑटो को उठाने की जुगत में लगे हुए थे. मैंने भी मदद की नीयत से अपनी कार एक किनारे खड़ी कर दी… घायलों की सहायता में भी ऊंच-नीच का भाव साफ नजर आ रहा था. ऑटो में फंसी संभ्रांत-सी महिला की मदद में कई हाथ उठे. लेकिन साइकिल ठेलेवाले के पास कोई नहीं था. भागकर मैंने एक व्यक्ति की मदद से उसे उठाया और सड़क के किनारे ले जाकर बैठाया. उसकी बुरी हालत देख सौ नंबर को डायल भी कर दिया. जब मैं सौ नंबर डायल कर रहा था तो कई लोगों ने मुझे टोका भी- भइया, मुसीबत क्यों मोल रहे हो? मैंने सोचा- इसमें भला कैसी मुसीबत. लेकिन सौ नंबर डायल क्या किया मुसीबत मेरे पीछे दौड़ने लगी. दिल्ली पुलिस का दावा है कि वह पांच मिनट में पहुंच जाती है.

लेकिन पांच मिनट में पुलिस तो नहीं पहुंच पाई, अलबत्ता पांच नंबरों से पांच फोन आ भी गए. हर बार डांटने जैसी आवाज में पूछा जाता- कहां है ये जगह. मैं जगह की तफसील से जानकारी देना खत्म करता कि दूसरा फोन आ जाता- तैने सौ नंबर डायल किया था… कहां है ये जगह? बहरहाल कोई बीस-पच्चीस मिनट बाद पुलिस की गाड़ी आई. इंचार्ज एक हेड कांस्टेबल थे. उन्हें सारी बात बताकर मैंने उनसे इजाजत ली और अपने गंतव्य की तरफ निकल पड़ा. अभी कार स्टार्ट कर ही रहा था कि अगला नंबर आ गया- पहला सवाल वही- तैने सौ नंबर डायल किया था… क्या हुआ… कहां है ये जगह… मैंने जवाब दिया- पुलिस आ गई है और घायल को ले गई. अभी कुछ दूर और गया कि फिर दूसरा फोन आ गया.

‘कई लोगों ने सौ नंबर न मिलाने की सलाह भी दी, लेकिन मैंने सौ नंबर डायल क्या किया मुसीबत मेरे पीछे दौड़ने लगी’

फिर वही सवाल- कहां है ये जगह, क्या हुआ… किसको कितनी चोट लगी. मेरा जवाब था- भैया, चोट तो अस्पताल बताएगा. बहरहाल सौ नंबर वाले घायलों को अस्पताल ले गए. तब दन से दूसरा सवाल- किस अस्पताल ले गए? अपनी रिरियाती आवाज में जवाब दिया- भइया, मुझे क्या पता. सौ नंबर वाले जानें. शाम साढ़े पांच बजे की इस घटना की जानकारी मैं साढ़े सात बजे तक देता रहा. फोन पर ये जानकारी दे-देकर मैं परेशान हो गया था. आठ बजे तक फोन नहीं आया तो मुझे लगा कि पुलिस महकमा अब संतुष्ट हो गया. लेकिन यह क्या, अपनी सारी खुशी काफूर हो गई. सवा आठ बजते-बजते फोन आ गया- पहला सवाल तो वही- तैने सौ नंबर डायल किया… फिर अगला सवाल- ये कहां हुआ… उसका जवाब देते ही अगला सवाल – लेकिन यहां तो कुछ नजर नहीं आ रहा. अब अपना धैर्य जवाब दे गया था. मैंने कहा कि हादसे के तीन घंटे हो गए. अभी तक क्या लोग वहीं रहेंगे. लगा मैंने सौ नंबर डायल करके गुनाह कर दिया और पुलिसवाले नए-नए नंबरों से इस गुनाह की सफाई मांग रहे हैं. चूंकि मेरा धैर्य चुक गया था, लिहाजा मैंने भी उल्टे सवाल दाग दिया- क्या पुलिस के बीच कोई कोऑर्डिनेशन नहीं है.

इतना सवाल पुलिसवाले के कान में पहुंचा तो ऐसा लगा जैसे उसके वजूद को चुनौती ही दे डाली- ज्यादा भाषण ना दे… नहीं होता कोऑर्डिनेशन… साफ-साफ बता कहां हुआ ये हादसा… उसके बाद मुझे भी अपनी वाली पर उतरना पड़ा. बहरहाल उसके बाद एक और फोन आया और उस छोर पर सफाई मांग रहे सब इंस्पेक्टर साहब से भी बकझक हुए बिना नहीं रही.
इसके बाद समझ में आ गया कि आखिर लोग क्यों सौ नंबर पर डायल करने से बचते हैं. आखिर इतनी पूछताछ के बाद कोई यह गुनाह करने का जोखिम क्यों उठाए. बहरहाल राहत की बात यह है कि इस गुनाह-ए-जिल्लत के बावजूद उन घायलों की हालत सुधर रही है.