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नवीन सूरिंजे के बहाने

 कन्नड़ न्यूज चैनल- कस्तूरी के रिपोर्टर नवीन सूरिंजे पिछले तीन महीने से जेल में हैं. उन्होंने मंगलूर में एक निजी हालीडे-होम में जन्मदिन की पार्टी मना रहे युवा लड़के-लड़कियों के एक समूह पर हमला करने और उन्हें बेइज्जत करने वाले हिंदू जागरण वेदिके के 50 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी को कैमरे में कैद करके उसे चैनल पर दिखाया था. इस कारण मजबूरी में पुलिस को नैतिकता के उन 43 ठेकेदारों को गिरफ्तार करना पड़ा. लेकिन सूरिंजे को इस गलतीकी सजा यह मिली कि पुलिस ने उन्हें इस मामले में 44वां अभियुक्त बना दिया. उन पर आरोप लगाया गया कि वे भी इस साजिश में शामिल थे क्योंकि पूर्व जानकारी के बावजूद सूरिंजे ने पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी. यही नहीं, मंगलूर पुलिस ने सूरिंजे पर वे सभी आरोप लगा दिए जो इस शर्मनाक घटना के लिए जिम्मेदार संगठन और उसके 43 लंपटों पर लगाए गए हैं. हालांकि इनमें से कई आरोप कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हटा दिए हैं, लेकिन उसने सूरिंजे को यह कहते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया है कि उन्होंने पूर्व जानकारी के बावजूद पुलिस को इसकी सूचना क्यों नहीं 

बचाव में सूरिंजे का कहना है कि उन्हें इस घटना की सूचना पहले से नहीं थी. उन्हें उस इलाके के एक नागरिक से इसकी जानकारी मिली. उन्होंने मंगलूर के पुलिस कमिश्नर और स्थानीय सब-इंस्पेक्टर को फोन किया था लेकिन उन दोनों ने फोन नहीं उठाया और न कॉल-बैक किया. इस घटना के दौरान हिंदू जागरण वेदिके के लंपटों की तादाद इतनी अधिक थी कि वे उन्हें रोकने में सक्षम नहीं थे और उस स्थिति में इस गुंडागर्दी का पर्दाफाश करने के लिए उसकी रिकॉर्डिंग के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था. 

साफ है कि यह सिर्फ सूरिंजे का मामला नहीं है. इससे पत्रकारिता के कई बुनियादी सवाल जुड़े हैं.

यह सफाई न पुलिस ने मानी और न ही कर्नाटक उच्च न्यायालय ने. ध्यान रहे कि यह मामला गुवाहाटी की उस शर्मनाक घटना के बाद सामने आया है जिसमें रात में एक पब से बाहर निकल रही एक युवा लड़की के कपड़े फाड़ने और उसके साथ दुर्व्यवहार करने वाले लफंगों-गुंडों को प्रोत्साहित करने और उसकी साजिश रचने वालों में एक स्थानीय चैनल का रिपोर्टर भी शामिल पाया गया था. यह टीवी पत्रकारिता के लिए न सिर्फ गहरे शर्म और कलंक का मामला था बल्कि इसने टीआरपी के लिए चैनलों में सनसनीखेज खबरेंगढ़ने की आपराधिक साजिश रचने तक पहुंच जाने की खतरनाक प्रवृत्ति को उजागर किया था.

पर क्या गुवाहाटी और मंगलूर के मामले एक ही तरह के हैं? रिपोर्टों के मुताबिक, सूरिंजे को वास्तव में गुंडागर्दी के पर्दाफाश की सजा मिली है. पहले के तमाम मामलों की तरह इस बार भी ये गुंडे बच निकलते, लेकिन सूरिंजे की रिपोर्टिंग से ही यह मामला राष्ट्रीय मीडिया में आया और  दबाव में मंगलूर पुलिस को उन गुंडों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी.

पीयूसीएल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले दक्षिण कन्नड़ा जिले में 2007 से अब तक नैतिक पुलिसिंगके नाम पर मारपीट, दुर्व्यवहार और अपमानित करने के 140 मामले सामने आए हैं. लेकिन पिछले साल जुलाई की इस घटना को छोड़कर बाकी किसी मामले में दोषी पकड़े नहीं गए. ऐसे मामलों को सामने लाने और दोषियों की पहचान करने में मदद करने वाले सूरिंजे जैसे पत्रकारों को ही फंसाने की कोशिश की जाएगी तो कितने पत्रकार यह जोखिम उठाएंगे? सवाल यह भी है कि क्या पत्रकारों को ऐसे सभी मामलों की पूर्व सूचना पुलिस को देनी चाहिए? लेकिन पुलिस खुद राजनीतिक कारणों से कार्रवाई करने में अक्षम हो और उसकी अपराधियों से परोक्ष सहमति हो तो पत्रकार क्या करे? क्या पत्रकार पुलिस का एजेंट है या उसका काम सच्चाई को सामने लाना है? अगर पत्रकारों ने ऐसी सूचनाएं पहले पुलिस को देने लगें तो कितने लोग उन्हें सूचनाएं देंगे? क्या यह सच नहीं कई बार पुलिस से निराश लोग पत्रकारों को सूचनाएं देते हैं?

 

मजबूरी के नाथ

यह बात कम लोगों को ही मालूम है कि नितिन गडकरी को पहली दफा भाजपा अध्यक्ष बनवाने में पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की अहम भूमिका रही थी. 2009 में संघ ने दिल्ली के डी-4 यानी सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, वैंकैया नायडू और अनंत कुमार को पार्टी की कमान सौंपने से साफ तौर पर मना कर दिया था. उस वक्त जो नाम अंतिम तौर पर चले उनमें से गडकरी पर मुहर लगाने का काम आडवाणी ने ही किया था.
जब गडकरी पार्टी में आए तो उन्हें शुरुआत में ही इस डी-4 से कई मोर्चों पर मात खानी पड़ी थी. तब पार्टी की जो नई कार्यकारिणी बनी उसमें ऐसे लोगों को शामिल किया गया जो दिल्ली की राजनीति में पहले से स्थापित ‘राष्ट्रीय नेताओं’ के करीबी थे. इनमें से किसी का अपने-अपने राज्यों में कोई खास जनाधार नहीं था. यही एक ऐसी कमजोर कड़ी थी जिसे आधार बनाकर गडकरी ने इन लोगों से स्वतंत्र होकर निर्णय लेने की शुरुआत की. लेकिन गडकरी को नाकाम बनाने का जो खेल डी-4 और उनके कई भरोसेमंद कर रहे थे उसके बारे में आम धारणा यह रही कि इसे आडवाणी का संरक्षण प्राप्त है. धीरे-धीरे स्थिति इतनी बिगड़ती चली गई कि 2012 में मुंबई में हुई पार्टी कार्यकारिणी को बीच में ही छोड़कर आडवाणी और स्वराज दिल्ली वापस आ गए. मिला-जुला कर स्थिति यह हो गई कि कभी गडकरी के नाम पर मुहर लगाने वाले आडवाणी उनके खिलाफ खड़े हो गए.
इसके बावजूद गडकरी का रास्ता साफ माना जा रहा था क्योंकि उनके पक्ष में संघ खड़ा था. हालांकि, संघ में कुछ लोग गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने को लेकर सवाल उठा रहे थे लेकिन जो लोग वहां फैसला करते हैं, वे गडकरी के साथ थे. गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने की पूरी तैयारी हो गई थी. पार्टी के  संविधान में संशोधन करवा लिया गया था. आधे से अधिक राज्य इकाइयों के चुनाव करवा भी लिए गए थे. यहां तक कि जिस दिन गडकरी को दोबारा अध्यक्ष चुने जाने की औपचारिकता पूरी होनी थी उस दिन के लिए प्रदेश इकाइयों के पदाधिकारियों को दिल्ली भी बुला लिया गया था. गडकरी को बधाई देने वाले होर्डिंग तक तैयार हो गए थे.
इन तैयारियों के बीच अचानक टीवी चैनलों पर यह खबर चलने लगी कि गडकरी की पूर्ति समूह की कंपनियों पर आयकर के छापे पड़ रहे हैं. इसके बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा और महेश जेठमलानी की वजह से यह माहौल बना कि यदि  जरूरत पड़ी तो इस पद के लिए चुनाव होगा. तेजी से बदलते इस घटनाक्रम के बीच जब इस संवाददाता ने पार्टी के एक सचिव से वस्तुस्थिति जाननी चाही तो उनका सीधा जवाब था, ‘नहीं-नहीं, कोई दिक्कत नहीं है. ये सब नाटक तो पहले भी हुए हैं. गडकरी का दोबारा अध्यक्ष बनना तय है. थोड़ी देर बाद रविशंकर प्रसाद प्रेस वार्ता करके स्थिति साफ करेंगे.’

लेकिन कुछ ही घंटों के अंदर मुंबई में एक अहम बैठक हुई जिसमें यह निर्णय ले लिया गया कि भाजपा अब आगे का सफर गडकरी के नेतृत्व में नहीं बल्कि राजनाथ सिंह के नेतृत्व में तय करेगी. मुंबई की बैठक में गडकरी, आडवाणी और संघ की तरफ से भैयाजी जोशी और सुरेश सोनी शामिल हुए. भाजपा में जो चर्चा चल रही है उसके मुताबिक इस बैठक की पृष्ठभूमि तैयार करने का काम पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने किया था. इस नेता का नाम भी आखिर तक अध्यक्ष पद के लिए चल रहा था. कहा जा रहा है कि पार्टी के इसी वरिष्ठ नेता ने भारत सरकार के एक मंत्री से बात करके यह सुनिश्चित करवाया कि चुनाव के ठीक एक दिन पहले गडकरी की कंपनियों तक आयकर अधिकारी पहुंचें. गडकरी को कमजोर करना या यों कहें कि विपक्षी दल की आपसी फूट का फायदा भला कौन सत्ताधारी दल नहीं उठाना चाहेगा! यह रहस्य तो बाद में खुला कि जिसे खबरिया चैनल आयकर का छापा बताकर प्रसारित कर रहे थे वह तो आयकर का सर्वेक्षण था. लेकिन इन तकनीकी बातों में न तो आडवाणी जाना चाहते थे और न ही संघ यह साहस दिखा पाया कि इन खबरों के बीच भी वह अपने फैसले पर कायम रहे.

यह फॉर्मूला भी सुझाया गया कि अभी गडकरी को अध्यक्ष बनने दिया जाए और कुछ दिनों के बाद गडकरी खुद इस्तीफा दे देंगे

मुंबई में जो बैठक हुई उसमें गडकरी ने इन तकनीकी बातों को उठाया और खुद को पाक-साफ बताया. लेकिन आडवाणी उनके नाम पर तैयार नहीं थे. यह फॉर्मूला भी सुझाया गया कि अभी गडकरी को अध्यक्ष बनने दिया जाए और कुछ दिनों के बाद गडकरी खुद यह कहते हुए इस्तीफा दे देंगे कि जब तक वे जांच में निर्दोष नहीं साबित हो जाते तब तक वे इस पद से दूर रहेंगे. ऐसे में पार्टी का कामकाज चलाने के लिए एक कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त कर लिया जाएगा. लेकिन आडवाणी के रवैये की वजह से कार्यकारी अध्यक्ष वाला फार्मूला आगे नहीं बढ़ पाया. आडवाणी बार-बार संघ के पदाधिकारियों को समझाते रहे कि अगर वे गडकरी पर अड़े रहे तो यशवंत सिन्हा चुनाव लड़ेंगे और इससे संघ और पार्टी की और अधिक किरकिरी होगी. आडवाणी यह संकेत भी दे रहे थे कि ऐसी स्थिति में उनके सामने यशवंत सिन्हा को समर्थन देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा. इस स्थिति में संघ के पदाधिकारियों को इस बात के लिए तैयार होना पड़ा कि दूसरे विकल्पों पर विचार किया जाए.

आडवाणी जो नाम सबसे प्रमुखता से नए अध्यक्ष के तौर पर आगे कर रहे थे, जानकारों के मुताबिक भाजपा के उसी वरिष्ठ नेता पर गडकरी को शक था कि उन्होंने भारत सरकार के एक प्रमुख मंत्री से बात करके यह सब करवाया है. अब अड़ने की बारी गडकरी की थी. फिर तीन नाम अंतिम तौर पर विचार करने के लिए तय किए गए – मुरली मनोहर जोशी, वैंकैया नायडू और राजनाथ सिंह. इनमें से वैंकैया नायडू तो डी-4 की वजह से बाहर हो गए. जोशी पर भी संघ का वही उम्र वाला फाॅर्मूला लागू होता है जिसे आधार बनाकर आडवाणी को सलाहकार की भूमिका में सीमित कर दिया गया है. इसके बाद राजनाथ सिंह का नाम गडकरी ने प्रस्तावित किया और सुरेश सोनी और भैयाजी जोशी सहमत हो गए. मजबूरी में आडवाणी को भी तैयार होना पड़ा.

अगले दिन राजनाथ सिंह को औपचारिक तौर पर एक बार फिर से पार्टी की कमान सौंप दी गई. इसी दिन गडकरी के दिल्ली के आवास पर लोगों की भारी भीड़ लगी. इन लोगों में कई अलग-अलग राज्यों से आए हुए लोग थे. संदेश साफ था कि भाजपा नेताओं को मालूम है कि गडकरी संघ के नुमाइंदे हैं और भले ही वे अध्यक्ष नहीं बन पाए हों लेकिन उन्हें चुका हुआ नहीं माना जा सकता. यह चर्चा भी चलने लगी कि क्लीन चिट मिलते ही गडकरी की वापसी बतौर अध्यक्ष एक बार फिर से हो सकती है क्योंकि राजनाथ सिंह की पहचान एक ऐसे नेता की नहीं है जो संघ की तरफ से मिलने वाले निर्देशों की अनदेखी कर दे.

अब सवाल यह उठता है कि क्या राजनाथ सिंह पार्टी को केंद्र की सत्ता में वापस लाने में मददगार साबित होंगे. जिस दिन राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाया गया, उस दिन की टीवी रिपोर्टिंग को अगर किसी ने देखा हो तो उसे याद होगा कि खबरिया चैनलों के तमाम पत्रकार राजनाथ सिंह की तमाम खूबियों को गिनाते हुए यह बताने में लगे थे भाजपा ने कितना बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेला है. अंग्रेजी की एक बड़ी पत्रकार ने तो उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार भी बता दिया. कोई राजनाथ को गठबंधन की राजनीति का महारथी बता रहा था तो कोई उन्हें कुशल प्रशासक बताते हुए उत्तर प्रदेश के उनके मुख्यमंत्रित्व काल के किस्से सुना रहा था. लेकिन कोई यह सवाल नहीं उठा रहा था कि अगर राजनाथ सिंह इतने ही योग्य थे तो उन्हें 2009 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाया क्यों गया था.

इसी सवाल के जरिए अगर राजनाथ सिंह के प्रदर्शन को समझने की कोशिश करें तो उनकी क्षमताओं का अंदाजा लगता है. इससे धुंधली ही सही लेकिन एक तस्वीर उभरती है कि आगे वे कितने प्रभावी साबित होंगे. 2004 में भाजपा की हार के बाद आडवाणी पार्टी अध्यक्ष बने थे. लेकिन पाकिस्तान में मुहम्मद अली जिन्ना की मजार पर उन्होंने जो बातें कहीं उसने वक्त से पहले ही अध्यक्ष पद से उनकी विदाई करवा दी. उस वक्त वाजपेयी भी सक्रिय थे और प्रमोद महाजन पार्टी में एक बड़ी ताकत थे. परिस्थितियां ऐसी बनीं कि संघ को भी अपने हिसाब का एक आदमी चाहिए था और महाजन को भी एक ऐसा व्यक्ति चाहिए था जो उनके लिए खतरा न बन सके. राजनाथ सिंह दोनों पक्षों को मुफीद लगे. इसके छह महीने के अंदर ही प्रमोद महाजन की असमय मौत हो गई और राजनाथ सिंह का कद बड़ा लगने लगा.

बतौर भाजपा अध्यक्ष अगर राजनाथ सिंह का पहला कार्यकाल देखें तो पता चलता है कि वे कामयाबी के आस-पास भी नहीं रहे. उनके समय में सक्षम नेताओं का पार्टी छोड़ने का सिलसिला काफी तेज हुआ. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने पार्टी छोड़ी. उस वक्त उन्होंने जो पत्र सार्वजनिक किया उससे पता चला कि राजनाथ सिंह ने उन्हें किस तरह से परेशान किया. राजनाथ के पहले कार्यकाल में पार्टी में झगड़ा और गुटबाजी सतह पर दिखने लगी. यह साफ-साफ दिखने लगा कि फलां नेता इस खेमे का है तो फलां नेता उस खेमे का है. 2007 में जब राजस्थान में विधानसभा चुनाव हुए तो उसमें जिन उम्मीदवारों को वहां की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने टिकट दिए उनमें से ज्यादातर जीते लेकिन जिन लोगों को टिकट राजनाथ सिंह ने दिए उनमें से ज्यादातर को हार का मुंह देखना पड़ा. उस वक्त तो भाजपा में लोग यह भी कह रहे थे कि स्वभाव से अंधविश्वासी राजनाथ सिंह ने हर वैसा काम किया जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वसुंधरा राजे की सरकार दोबारा राजस्थान में नहीं बने. राजनाथ सिंह ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को पार्टी के दो महत्वपूर्ण पदों से हटाकर उनके भी पर कतरने की भरसक कोशिश की. उनके ही समय में पार्टी का बीजू जनता दल के साथ लंबे समय से चला आ रहा गठबंधन भी टूट गया.

अगर चुनावी नतीजों को ही आधार बनाएं तो उस मामले में भी राजनाथ सिंह अपने पहले कार्यकाल में नाकामयाब ही साबित हुए हैं. उनके अध्यक्ष रहते उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव 2007 में हुए. इसमें पार्टी के विधायकों की संख्या 88 से घटकर 51 रह गई. इससे पहले 2002 में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हुए थे तो उस वक्त राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. लेकिन उनके नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में भाजपा 176 से सिमटकर 88 सीटों पर पहुंच गई थी. 2009 में भाजपा ने लोकसभा चुनाव राजनाथ सिंह के नेतृत्व में लड़ा, लेकिन इसमें भी पार्टी की सीटों की संख्या 2004 के 138 के मुकाबले घटकर 116 रह गई. राजनाथ की अगुवाई में लड़े गए 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत 2004 के 22.16 प्रतिशत के मुकाबले घटकर 18.80 प्रतिशत रह गया था.

चुनावी राजनीति और संगठन चलाने के मोर्चे पर राजनाथ की नाकामी ने ही 2009 में उनकी विदाई करवाई थी, लेकिन किसी नए को अवसर देने के बजाय अपने एक नाकाम मोहरे को दोबारा मौका देकर भाजपा और संघ ने यह साबित किया है कि या तो उसके पास विकल्प नहीं है या फिर वे विकल्पों पर गौर नहीं करना चाहते. ऐसे में अगर कांग्रेसी नेता राजनाथ के अध्यक्ष बनने पर खुशी जाहिर करते हुए यह सोच रहे हैं कि अब एक बार फिर से कांग्रेस सत्ता में वापस आ जाएगी तो इसे उनका अतिआत्मविश्वास नहीं कहा जा सकता. सियासी गलियारों में इस बात से हर कोई वाकिफ है कि अपनी गाजियाबाद सीट निकालने के लिए राजनाथ सिंह ने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वैसे भाजपा उम्मीदवारों को खड़ा किया जिनसे चौधरी अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के उम्मीदवारों को किसी तरह की मुश्किल न हो. यही वजह है कि भाजपा और भाजपा के बाहर राजनाथ सिंह को अवसरवाद की राजनीति का धुरंधर माना जाता है.

संघ के पदाधिकारियों को रेलवे स्टेशन से लाने से लेकर उन्हें हर जगह ले जाने और फिर वापस छोड़ने तक का काम राजनाथ सिंह खुद किया करते थेराजनीति में राजनाथ के उभार का श्रेय काफी हद तक कल्याण सिंह को जाता है. कल्याण सिंह जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे उस वक्त उन्होंने ही अपने मंत्रिमंडल में राजनाथ सिंह को मंत्री बनाया था. 1991 में मुख्यमंत्री बनते ही कल्याण सिंह अपने पूरे मंत्रिमंडल के साथ अयोध्या गए थे, और वहां जाकर यह वादा किया था कि राम मंदिर यहीं बनाएंगे तो जो लोग वहां गए थे उनमें राजनाथ सिंह भी शामिल थे. वे उस वक्त शिक्षा मंत्री थे. लेकिन जब वे प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और फिर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तो अपने उस वादे को भूल गए जिस पर सवार होकर उन्होंने सियासत में अपनी लंबी पारी की बुनियाद रखी थी. 1991 में वे शिक्षा मंत्री बनाए गए थे लेकिन मंत्री रहते हुए भी वे 1993 में लखनऊ की मोहना सीट से चुनाव नहीं जीत पाए. लेकिन संघ के हर बड़े पदाधिकारी के लखनऊ दौरे से संबंधित हर छोटी-बड़ी सुविधाओं का खयाल रखने वाले राजनाथ ने संघ के पदाधिकारियों से ऐसे संबंध बनाए कि 1994 में उन्हें राज्यसभा भेज दिया गया. उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे लोग बताते हैं कि संघ के पदाधिकारियों को रेलवे स्टेशन से लाने से लेकर उन्हें हर जगह ले जाने और फिर वापस छोड़ने तक का काम राजनाथ सिंह खुद किया करते थे. जब राजनाथ सिंह दिल्ली आए तो उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु कल्याण सिंह के खिलाफ केंद्रीय नेतृत्व को भड़काना शुरू किया. उस वक्त प्रदेश अध्यक्ष कलराज मिश्र थे और कल्याण सिंह के साथ उनकी बन नहीं रही थी. ऐसे में 1997 में राजनाथ सिंह को प्रदेश भाजपा की कमान सौंप दी गई.

राजनाथ सिंह के साथ उस वक्त भाजपा में काम कर रहे एक नेता कहते हैं, ‘1999 में जब कल्याण सिंह को हटाकर रामप्रकाश गुप्त को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया तो उनके बारे में भी राजनाथ सिंह ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि वे अपने अधिकारियों और सहयोगियों का ही नाम भूल जाते हैं.’ संघ ने भी राजनाथ का समर्थन किया और 2000 में उन्हें प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया गया. इसके बाद से उत्तर प्रदेश में भाजपा चुनाव दर चुनाव नीचे जा रही है. राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में राजनाथ के पहले कार्यकाल में भी कुछ ऐसा ही हुआ था. इस बार क्या वे जो अब तक जाने-अनजाने कर चुके हैं उससे कुछ अलग करेंगे? इस सवाल का जवाब कोई साफ हां में देता नहीं दिखाई देता.   

असहमति को भी आशीष दें

आशीष नंदी उन समकालीन समाजशास्त्रियों में रहे हैं जिनके यहां भारतीय समाज की विविधताओं और विडंबनाओं की अचूक समझ मिलती है. उन्हें पढ़ते-सुनते हुए जितने जवाब मिलते हैं, उससे ज्यादा सवाल मिलते हैं. नंदी कोई ऐसा सपाट वक्तव्य दे सकते हैं जो अपने आशयों में दलित विरोधी हो, यह मानना बहुत सारे लोगों के लिए मुश्किल है. जयपुर के साहित्यिक समारोह में दिए गए उनके जिस वक्तव्य पर विवाद हुआ है, निस्संदेह उसमें कुछ बातें दलित और पिछड़ा विरोधी लगती हैं, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर हम आशीष नंदी को दलितों और पिछड़ों का विरोधी साबित करने पर तुल जाएंगे तो यह समझ नहीं पाएंगे कि दरअसल उनकी कुल मुराद क्या थी और कहां-कहां उनके वक्तव्य से असहमति होनी चाहिए. 

नंदी का बयान और उनकी सफाई पढ़ते हुए साफ होता है कि हमेशा की तरह उन्होंने एक विडंबनामूलक सच्चाई पर ही उंगली रखी है. वे भारतीय समाज में भ्रष्टाचार को एक तरह की संतुलनकारी शक्ति मानते हैं. यानी उनके मुताबिक हमारी राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक व्यवस्था सबको बराबरी के अवसर नहीं देती. जो कमजोर और छूटे हुए हैं, वे कमजोर और छूटे रहने को अभिशप्त हैं, बशर्ते वे इस व्यवस्था के बाहर जाकर अपने लिए अवसर और साधन न जुटाएं. यहां भ्रष्टाचार पिछड़ों और दलितों को अगड़ों के मुकाबले खड़े होने का अवसर देता है. नंदी यह नहीं कहते कि सवर्ण या साधनसंपन्न लोग भ्रष्ट नहीं हैं. वे बस यह जोड़ते हैं कि उनके भ्रष्टाचार में कई बारीक आयाम जुड़ गए हैं. वे गलत तरीकों से एक-दूसरे की मदद करते हैं, लेकिन इसे भ्रष्टाचार में शामिल करने को तैयार नहीं होते. नंदी यहां तक कहते हैं कि एक भ्रष्टाचारविहीन समाज भारत में किसी तानाशाही व्यवस्था में ही संभव है, लेकिन यह व्यवस्था फिर बराबरी के मौके नहीं देगी.

इस मामले में बीजेपी-बीएसपी-कांग्रेस एक हैं. क्या इसलिए कि बिना किसी वैचारिक बहस के, तुष्टीकरण की आम सहमति सबको रास आती है?

इस कोण से देखें तो सतह पर जो बयान पहली नजर में दलित या पिछड़ा विरोधी लगता है, वह कुछ गहराई में उनके पक्ष में दिया गया बयान नजर आता है- या कम से कम इसमें यह वास्तविक चिंता शामिल दिखती है कि हमारे समाज में बराबरी का जो सबसे जरूरी और बड़ा एजेंडा है वह कैसे पूरा हो. हालांकि उनके इस पूरे वक्तव्य में कम से कम दो बातें ऐसी हैं जो किसी संवेदनशील बुद्धिजीवी को उनकी सख्त आलोचना के लिए मजबूर करती हैं. जब वे कहते हैं कि सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों के यहां दिखता है तो यह न तथ्यसंगत लगता है न तर्कसंगत. उल्टे सच्चाई इसके खिलाफ दिखती है. सरकारी-गैरसरकारी और काॅरपोरेट दुनिया में भ्रष्टाचार का जो विराट उद्योग चल रहा है और जिसकी कमाई स्विस बैंकों के नामी-बेनामी खातों से लेकर तमाम शहरों में बन रही नई रिहाइशों की अट्टालिकाओं में निवेश के नाम पर जमा हो रही है, उसमें बड़ा हिस्सा अगड़ों का भी है. इसी तरह जब वे बंगाल के भ्रष्टाचार मुक्त होने का दावा करते हुए यह याद दिलाते हैं कि वहां पिछले 100 साल में पिछड़े और दलित सत्ता में नहीं रहे तो लगता है कि वे भ्रष्टाचार के उन रूपों को भूले जा रहे हैं जिनकी चर्चा खुद अपने वक्तव्य में उन्होंने की है.

लेकिन ये बातें एतराज के लायक हो सकती हैं, निंदा या भर्त्सना के लायक भी किसी को लग सकती हैं. मगर क्या इसके लिए एससी-एसटी ऐक्ट लगाकर आशीष नंदी को जेल में बंद कर दिया जाना चाहिए?  घनघोर बौद्धिक दारिद्रय की शिकार मुख्यधारा की भारतीय राजनीति से जुड़े नेता मोटे तौर पर यही मांग कर रहे हैं. इस मामले में बीजेपी-बीएसपी-कांग्रेस एक हैं. क्या इसलिए कि वे पिछड़ों और दलितों से इतनी हमदर्दी रखती हैं कि उनके बारे में एक अनर्गल शब्द भी नहीं सुन सकतीं? या इसलिए कि बिना किसी वैचारिक बहस के, तुष्टीकरण की आम सहमति सबको रास आती है और इसीलिए दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों, हिंदुत्ववादियों- किसी के विरुद्ध दिया गया कोई भी वक्तव्य किसी की गिरफ्तारी का सबब बन सकता है?  यह इत्तिफाक नहीं है कि जयपुर के साहित्यिक समारोह पर विवाद की यह तीसरी छाया है- पहली छाया मुस्लिम कट्टरपंथियों की थी जिन्हें यह गवारा नहीं था कि सलमान रुश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेज के अंश पढ़ने वाले लेखक कार्यक्रम में आएं, दूसरी छाया उन भगवा कट्टरपंथियों की थी जिन्हें पाकिस्तान के साथ ताजा तनाव के दौर में पाकिस्तान से लेखकों का भारत आना मंजूर नहीं था.

दरअसल बड़ा संकट यही है. आप बाल ठाकरे के शोक में डूबे शिवसैनिकों के उत्पात पर बोलें तो जेल में डाल दिए जाएंगे, आप ममता बनर्जी का मज़ाक बनाएं तो आपको पुलिस उठाकर ले जाएगी, आप मुस्लिम कट्टरपंथ के खिलाफ बोलें तो सलमान रुश्दी और तसलीमा नसरीन हो जाएंगे, आप सरकारी दमन तंत्र के खिलाफ बोलें तो आप विनायक सेन बना दिए जाएंगे और आप दलितों और पिछड़ों के खिलाफ बोल गए तो आशीष नंदी जैसा सलूक झेलेंगे. इससे पहले अपने एक और लेख की वजह से नंदी नरेंद्र मोदी के समर्थकों का गुस्सा और उनके मुकदमे झेल चुके हैं.

ये सारे उदाहरण बताते हैं कि हमारे सार्वजनिक जीवन में ऐसे सूक्ष्म या तहदार विमर्श की गुंजाइश ही जैसे नहीं बची है जिसमें किसी मुद्दे पर बहस हो, असहमति हो और अपनी असहमति को कायम और स्थापित करने का राजनीतिक साहस हो. जो है सो खानों में बंटा है- इस पार या उस पार खड़ा किए जाने को अभिशप्त.

यह एक खतरनाक स्थिति है जो वैचारिक गतिशीलता को तोड़ती है और जड़ विचारों को स्थापित करती है. हम नंदी से सहमत हों या नहीं, उन्हें अपनी बात कहने का हक है. इसके लिए उन्हें किसी के दबाव में आने की जरूरत नहीं है. और यह सिर्फ उनके हक के लिए नहीं, हमारी विचारशीलता के लिए भी जरूरी है.

दहशत के चंद घंटों के बीच…

जनवरी की वह सुबह ठीक-ठीक कैसी थी-याद नहीं आ रहा I बेशक उस दिन बड़ी ठंढ रही होगी.मगर कुहासा ज्यादा ना रहा होगा क्योंकि हम बहुत पहले तैयार हो गए थे. अब्बा लखनऊ जा रहे थे, शायद चेक-अप के लिए. कार से अम्मी और मैं उनके साथ जा रहे थे. अब्बा की खिदमत के लिए बुद्धू नाम का एक नौकर था. उसे ड्राइविंग आती थी और अब्बा हमेशा उसे अपने साथ ले जाते थे लेकिन अब्बा को खुद कार चलाना पसंद था. पड़ोस में एक पेट्रोल-पंप था, कहीं जाने से पहले वे उस पेट्रोल-पंप पर जरुर जाते . लेकिन उस दिन पहुंचे तो पेट्रोल-पंप बंद मिला.मालिक अभी तक वहीं था, वह कार तक आया और उसी ने खबर सुनायी- किसी ने गांधीजी की हत्या कर दी है. 

इससे ज्यादा उसे पता नहीं था. 

अब्बा ने कार वापस घुमा ली. चेहरा तन गया, मैंने इससे पहले उनको इतना गुमसुम नहीं देखा था.जितनी देर घर पहुंचने में लगे,कार में उन चंद लम्हों तक एकदम चुप्पी रही.उतरते ही शायद उस दिन कार गैराज में रख दी गई.उस दिन सबकुछ बड़ा अटपटा हो रहा था.घर में दाखिल होते ही अब्बा ने बाहर के सारे दरवाजे बंद करके कुंडी चढ़ा दी. उन्होंने सबको घर के अंदर रहने का हुक्म सुनाया- घर के एकदम बीच वाले कमरों में. हाजत से फारिग ना होना हो तो हमें भीतर की दोनों अंगनाइयों में भी आने की इजाजत नहीं थी. घर में सिर्फ अब्बा की आवाज सुनाई दे रही थी-  बाकी लोग कुछ कहना हो तो फुसफुसा के बोल रहे थे. 

अब्बा शिकार के बड़े शौकीन थे, खासकर जाड़ों में जल-मुर्गाबियों के. उनके पास तीन शॉटगन थे और एक राइफल, एक रिवाल्वर भी था. बरसों पहले पुश्तनी जायदाद के मामले में जान पर बन आई थी तभी खरीदा था उन्होंने वह रिवाल्वर. उन्होंने तीनों हथियारों को पेटी से निकालकर तख्त पर रखा, अपने हाथों से जांच के देखा और गोली भर दी.एक बंदूक बुद्धू को दे गई. तबतक बंदूकों को लेकर मेरा कोई तजुर्बा नहीं था- मुर्गाबियों के शिकार पर मैं अब्बा के साथ जाता तो वे मुझे इतना होशियार नहीं मानते कि  हाथों में बंदूक थमा दें. इसलिए, मैं इस वक्त उनके किसी काम का नहीं था. 

अब्बा और बुद्धू हाथों में बंदूक लेकर घर की औरतों के साथ थे–अम्मा, दादी, दाइयां (इनमें बुद्धू की बीवी भी थी) और फिर बच्चे- मेरी तीन बहनें और बुद्धू के ढेर सारे बच्चे. अब्बा शाह दरवाजे पर मुस्तैद थे, बुद्धू भीतर की अंगनाई में किसी शिकारी के से चौकन्नेपन के साथ टहल लगा रहा था. बाहर, पिछवाड़े की तरफ हमारा चौकीदार भगवानदीन, तेल चुपड़ी और लोहे की टोप वाली लाठी लेकर दरवाजे के नजदीक के एक पेड़ के पास मोर्चा लेने को  तैयार था. ओसारे की तरफ हमारा खानसामा सज्जाद एकदम इसी तैयारी के साथ दूसरे दरवाजे के पास एक झाड़ी में घात लगाये बैठा था. 

पेट्रोल-पंप पर पहली बार जब खबर मिली तो मैं भी लगभग उतना ही भयभीत था जितना मेरे अब्बा-अम्मी. लेकिन अब, घर में, मेरी बदहवाशी की बड़ी वजह थी उनके चेहरे से झांकने वाली दहशतIमैंने पहले कभी अब्बा को ऐसी सूरत में ना देखा था.मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि बात-बात पर तुनक उठने वाले मेरे अब्बा जो अपने ऊंचे ओहदे और उस ओहदे से जुड़ी ताकत को लेकर एकदम निश्चिंत रहते थे, अचानक इतने असहाय और भयभीत हो उठेंगे. आखिर, उनके पास तीन गांवों की जमींदारी थी, खान साहब का ओहदा भी मिला हुआ था, फिर वे ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट और स्पेशल रेलवे मैजिस्ट्रेट भी थे. बंद दरवाजों के पीछे पसरे नीम-अंधेरे में अपने आप को टोहता मैं दहशत में था. यही हालत, अम्मा, बहनों और बाकी सबकी थी यहां तक कि दादी को भी अंदर बुला लिया गया था- अमूमन जाड़े के दिनों में वे रसोई से लगते बरामदे में रहती थीं. कुछ देर बाद उन्होंने मुझे अपने बगल में बैठा लिया, मैं उनका दुलरुआ था- खुद को साधे हुए वे लगातार प्रार्थनाएं बुदबुदा रही थीं. 

कोई दो घंटे का अरसा गुजरा होगा (क्या सचमुच ही इतना वक्त बीत गया था?) तभी हमें सुना कि लाऊडस्पीकर पर कुछ एलान किया जा रहा है. आवाज लगातार पास आते जा रही थी लेकिन दरवाजों के अंदर शब्द साफ सुनाई नहीं पड़ रहे थे. अपने कानों से टोह लेते हम भय से सिकुड़े जा रहे थे. आखिर को अब्बा ने एक दरवाजा खोला और बाहर निकले.  वे बारजे पर खड़े होकर ऐलान सुनने लगे, खुली हुए हिस्से से हमारी फिक्रमंद आंखे उनपर टिकी हुई थीं.अचानक वे गाली बकने लगे- पहले कभी हमने उन्हें इतने जोर से और इतनी भद्दी गालियां देते ना सुना था. वे बारजे पर धूप में पूरे तैश के साथ खड़े थे. उनको पुराने अंदाज में देखकर हमारे हवाश थोड़े दुरुस्त हुए. साहस बटारकर मैंने बगल का एक दरवाजा खोला और बरामदे में आ गया. मेरे पीछे, दरवाजे के पास अम्मा और बहनें आ जुटीं. पुलिस या फिर फौज की कोई जीप या ट्रक रहा होगा.लाऊडस्पीकर इसी पर लगा था और कोई बार-बार ऐलान सुना रहा था. काश, मुझे ठीक-ठीक वही शब्द अब याद होते,लेकिन याद नहीं आ रहा. लेकिन उन लफ्जों का असर मुझे याद रह गया है – तुरंत भीतर तक उतर जाने वाली राहत का भाव. उन लफ्जों को सुनकर हमने चोरी-छिपे एक-दूसरे को मुस्करा कर देखा क्योंकि उन्हीं लफ्जों से हमने जाना कि (गांधी की) हत्या करने वाला एक हिन्दू है- कोई मुसलमान नहीं, बल्कि एक हिन्दू. जकड़ लेने वाली उस दहशत को अब हम पहचान सकते थे और राहत की वजह को भी. उस वक्त मेरी दादी ने बिल्कुल यही किया था. हमने सुना वह अल्लाह का शुक्रिया कर रही थी कि गांधी का हत्यारा एक हिन्दू निकला, अल्लाह की मेहर कि हत्यारा कोई मुसलमान नहीं था.

जल्दी ही हमारी जिन्दगी रोज के ढर्रे पर आ गई. अचानक चंद रोज तक बंद रहने के बाद स्कूल फिर से खुल गया. एक अबूझ अंतर यही दीख रहा था कि हमारे भूगोल के शिक्षक नहीं आ रहे. वे आरएसएस की स्थानीय शाखा के नेता थे. उन्हें कुछ हफ्तों के लिए हिरासत में रखा गया, फिर छोड़ दिया गया. अब्बा का मर्ज जल्दी ही जाहिर हो उठा और फिर अक्तूबर की एक रात इसी मर्ज ने उनकी जान ली. उनकी मौत से मेरी खुद की जिन्दगी भी बुनियादी तौर पर बदल गई. घर में अब अकेला मर्द मैं ही था,अम्मा पर्दे में रहती थीं, इसलिए अब घर में मुझे ही मुखिया के रुप में देखा जाने लगा, लेकिन यही चलन था और इसी की उम्मीद की जा रही थी. कुछ साल बाद सरकार ने जमींदारी खत्म कर दी और हमारी जीविका का बड़ा जरिया जाता रहा- लेकिन यही भी अपेक्षित था. चाहे थोड़े छोटे पैमाने पर मगर हम अब भी अपनी सफेदपोशी बरकरार रख पा रहे थे. मुकामी तौर पर रसूखदारों के बीच चली आ रही छोटाई-बड़ाई में फर्क पडा था लेकिन अब भी हमारी उनसे जान-पहचान थी और इससे भी बड़ी बात यह कि वे भी हमें अपना मान रहे थे. 

नई बात यह हुई कि धीरे-धीरे हमने जाना कि जनवरी के उस दिन जो दहशत हमारी हड्डियों में उतर गया था और लगा कि जल्दी खत्म भी हो गया, दरअसल हमें छोड़कर कभी नहीं गया.

(उपर्युक्त सामग्री का चयन और अनुवाद चंदन श्रीवास्तव ने किया है. वे सीएसडीएस की एक परियोजना im4change के लिए काम करते हैं और उनके आलेख समय-समय पर पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते हैं)

अप्रत्याशित प्रत्याशी

PMवी बालाकृष्णन अगर चुनाव नहीं लड़ रहे होते तो शायद इंफोसिस के अगले मुखिया होते. सॉफ्टवेयर इंजीनियर रवि कृष्ण रेड्डी अमेरिका में अपनी शानदार नौकरी छोड़कर इसलिए भारत चले आए कि अपने समाज में कोई सकारात्मक बदलाव ला सकें. बैंकिंग क्षेत्र में शीर्ष पदों पर रहीं मीरा सान्याल ने राजनीति में शून्य से शुरुआत की है तो चर्चित मलयाली लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता सारा जोजफ को लगता है कि चुनाव लड़ना उनके जैसे लोगों के लिए अनिवार्य हो गया है.

कुछ समय पहले तक सोचना भी मुश्किल था कि ऐसे लोग भी राजनीति में आएंगे और चुनावी मैदान में ताल ठोकेंगे. आज उनकी सूची बहुत लंबी है. कोई सॉफ्टवेयर इंजीनियर है तो कोई वकील, सामाजिक कार्यकर्ता, पूर्व सरकारी अधिकारी, लेखक या फिर पत्रकार. सबका यही मानना है कि देश को जो व्यवस्था चला रही है उसमें बहुत सी खामियां हैं और सिर्फ ड्राइंग रूम बैठकर इसकी आलोचना करने से बेहतर है कि इस व्यवस्था में दाखिल होकर इसे सुधारा जाए.

अपने-अपने क्षेत्रों में ये सभी अपनी उपलब्धियों के लिए चर्चित रहे हैं. लेकिन क्या राजनीति में भी वे ऐसा ही प्रदर्शन कर पाएंगे? या उनका नौसिखियापन उन्हें ले डूबेगा? क्या वे इतने ही पारदर्शी और ईमानदार बने रह पाएंगे और इसके बावजूद उस व्यवस्था में बचे रह पाएंगे जो बड़ी हद तक पैसे और बाहुबल पर ही निर्भर हो चली है? इन सवालों का जवाब तो समय ही दे सकता है. तब तक ऐसे 10 उम्मीदवारों के बारे में उनकी ही जुबानी कि क्यों इन दिनों वे सड़कों और गलियों की धूल छानते फिर रहे हैं.


hardev singh


‘ जब मैं सरकारी नौकरी करते हुए नहीं झुका तो चुनाव जीतने पर तो और भी बेहतर काम करूंगा’

बाबा हरदेव सिंह।  66 ।

पूर्व आईएएस अधिकारी। मैनपुरी, उत्तर प्रदेश


habang pang
‘ हम एक राजनीतिक क्रांति ला रहे हैं और लोग इसकी अहमियत समझते हैं’

हाबंग पेंग ।  56 ।

पूर्व सूचना आयुक्त। अरुणाचल पश्चिम


Dayamani
‘हम जैसे लोगों को लोकसभा जाकर कानून बदलने होंगे’

दयामणि बरला ।  44 ।

सामाजिक कार्यकर्ता। खूंटी, झारखंड


K Arkesh
‘ मैं पांच और 10 रु के टिकट बेचकर अपने चुनाव प्रचार के लिए खर्च जुटा रहा हूं’

के अर्केश। 60 ।

पूर्व डीआईजी, सीआरपीएफ। चिक्कबल्लापुर, कर्नाटक


HS fulka
‘ नेताओं ने प्रशासन को पंगु बना दिया है’

एचएस फुल्का ।  58 ।

वकील। लुधियाना, पंजाब


Meera Sanyaal
‘ईमानदारी से  देशसेवा करने की इच्छा रखने वाले लोगों के पास भी अब एक विकल्प है’ 

मीरा सान्याल । 53 ।

पूर्व सीईओ, आरबीएस। मुंबई दक्षिण


Rajmohan Gandhi
‘बाहरी होना हमें दूसरों पर एक स्पष्ट बढ़त देता है’

राजमोहन गांधी । 79 ।

लेखक, शिक्षाविद्।पूर्वी दिल्ली


Ravi Krishna Reddy
‘लोग जाति और संप्रदाय की राजनीति से तंग आ चुके हैं’

रवि कृष्ण रेड्डी । 39 ।

सॉफ्टवेयर इंजीनियर। बैंगलोर रूरल


B Balakrishanan
‘हम पैसे, बाहुबल और जाति वाली राजनीति बदलने आए हैं’

वी बालाकृष्णन । 49 ।

पूर्व सीएफओ, इंफोसिस। बैंगलोर सेंट्ल


Sara Joseph
‘हमें अपनी जमीन, अपना पानी और अपनी हवा वापस चाहिए’

सारा जोजफ । 68 ।

लेखिका। त्रिसूर, केरल


गांधी एक सोच, एक विचार.

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निराला

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आज 30 जनवरी है. आज ही के दिन 1948 में गांधी का शरीर दुनिया से विदा हुआ था. आज ही के दिन कुछ लोगों ने गांधी को मारकर खुद को शूरवीरों की श्रेणी में शामिल करवाने की कोशिश की थी और एक गलतफहमी की पराकाष्ठा पर पहुंचे थे कि अगर वे गांधी को मार देंगे तो उनके विचारों का असर भी खत्म हो जाएगा. लेकिन समय ने उनकी सोच को गलत साबित किया. गांधी देश की परिधि लांघ दुनिया के कई दूसरे मुल्कों के लिए भी अंधेरे समय से पार पाने के लिए एक रोशनी, एक उम्मीद का मॉडल बनते गए. दुनिया में गांधी के तेजी से फैले प्रभाव का एक असर इस साल देखने को मिल रहा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने अब गांधी की शहादत दिवस को हर साल मनाने का फैसला किया है. संयुक्त राष्ट्र संघ के स्थायी देश भारत को वह भाव देने को तैयार नहीं लेकिन गांधी से वे प्रभावित हैं. क्यों! यह एक सवाल है, जवाब किसी ग्रंथ, पुस्तकों में तलाशने की जरूरत नहीं. अपने आस-पास नजर दौड़ाइए, रोजाना जवाब मिलेगा. एक ओर दुनिया गांधी के सिद्धांतों में मुश्किलों से पार पाने की राह खोज रही है, दूसरी ओर गांधी का खुद का देश भारत उन्हें जयंती-पुण्यतिथि में समेटने की कोशिश में लगा हुआ है. बहरहाल, यह सवाल पेंच भरा है, इसके फेरे में पड़े बगैर इस बार गांधी की शहादत दिवस पर उन्हें हम परंपरानुसार याद नहीं करना चाहते.

परंपरानुसार किसी चीज को याद करना धीरे-धीरे उसे जड़ बना देता है और फिर एक बार जो चीज जड़ हो जाए उसे गतिशील बनाना इतना आसान नहीं होता. हम यह नहीं बताना चाहते कि गांधी कौन थे, उनका जन्म कब-कहां हुआ था, वे बैरिस्टरी की पढ़ाई करने के बाद राष्ट्रसेवी कैसे बन गए, उनका नाम महात्मा कैसे पड़ा, किसने उन्हें नंगा फकीर कहा, उन्होंने किन-किन आंदोलनों का नेतृत्व किया, उनकी जान किसने ली, क्यों ली… आदि-आदि. आज गांधी को हम दूसरे रूप में याद करने की कोशिश कर रहे हैं. उनके लिखे दो पत्रों के जरिए निजी जीवन के गांधी को देखने की कोशिश कर रहे हैं कि अपनी पत्नी कस्तूरबा के गांधी कैसे थे. वे बा को कितना प्रेम करते थे और उनके प्रेम का स्तर और स्वरूप क्या था, यह एक पत्र से पता चलेगा, जिसे यहां प्रकाशित कर रहे हैं. और अपने बेटे मणिलाल के गांधी कैसे थे, यह प्रिटोरिया जेल से बेटे को लिखे पत्र से पता चलता है.

गांधी सिर्फ दुनिया को ही उपदेश नहीं देते थे, अपने घर में भी वे महात्मा की तरह ही थे. मनु बहन, जो उनके साथ हमेशा रहा करती थीं और गांधी जिनके लिए मां के समान थे, उनके एक संस्मरणात्मक लेख को पढ़ते हुए हम जानेंगे कि गांधी रोजमर्रा की जिंदगी में बारीकियों को बरतकर ही महात्मा या राष्ट्रपिता बने थे. गांधी देश की राजनीतिक व्यवस्था में एक आखिरी उम्मीद की तरह थे और उनके सामने कोई कुछ भी कह सकता था, यह महान समाजवादी नेता सूर्यनारायण सिंह के एक पत्र से साफ जाहिर होता है, जिसे हम प्रकाशित कर रहे हैं. और इन सबके साथ मशहूर पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का एक सदाबहार आलेख, जो दो साल पहले तहलका के लिए लिखा गया था लेकिन आज भी उसकी ताजगी और प्रासंगिकता उसी तरह बनी हुई है. 

गांधी की पुण्यतिथि पर तहलका के इस खास संपादकीय आयोजन का एकमात्र मकसद है कि भटकाव के इस दौर में गांधी को अधिक से अधिक रूपों में जानने की कोशिश करना. पूंजीवाद का क्रूर रूप देखने के बाद गांधी का आर्थिक फॉर्मूला उम्मीद दिखा रहा है. प्रेम और रिश्तों का भी तकनीकीकरण होने के इस युग में गांधी के प्रेम को जानना सुकून देता है. असहमति के लिए घटते स्पेस के दौर में गांधी का विराट व्यक्तित्व उम्मीद जगाता है कि सहमति के विवेक के साथ समाज में असहमति का साहस जरूर होना चाहिए. अब भी गांधी ही देश में एकमात्र प्रतीक हैं, जिनके नाम पर देश राख से भी चिंगारी की तरह उठ खड़ा होता है. अन्ना के आंदोलन को पूरे देश ने देखा. वर्षों बाद अन्ना ने राह दिखाई तो अब गांधीवादी तरीके से आंदोलनों की गति तेज हो रही है. इस मायने में यह सुकून देने वाला दौर भी है.

आलेख

अनुपम मिश्र:सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा

चौधरी मोहम्मद नईम:दहशत के चंद घंटों के बीच…

पत्र

कस्तूरबा गांधी के नाम महात्मा गांधी का पत्र 

पुत्र मणिलाल गांधी के नाम महात्मा गांधी का पत्र

जेल से एक समाजवादी नेता का महात्मा गांधी को पत्र

किताब से अंश

“सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा” से

“बापू-मेरी मां” से

रिपोर्ट

गांधी के आदि अनुयायी

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा

आत्मकथाएं कौन लोग लिखते हैं? जो लोग कुछ अच्छे कामों के कारण समाज का प्यार पाते हैं या फिर जो बुरे कामों के कारण बदनाम हो जाते हैं. एक तीसरी श्रेणी ऐसे लोगों की भी है जो दूसरों की कुछ पोलपट्टी खोल सकने वाले पदों पर रहे होंगे. तीनों तरह के लोगों में राजनेता, अभिनेता, तानाशाह, पत्रकार, साहित्यकार, मंजे हुए या पिटे हुए खिलाड़ी, उद्योगपति और उच्च अधिकारी शामिल हैं.

आत्मकथा लोग अक्सर जीवन के उतार पर पहुंचकर लिखते हैं. अच्छे बुरे कामों का तेल तब तक खत्म हो चलता है, तब ऐसे लोगों की आत्मकथा थोड़ा और तेल जुटा देती है. ज्यादातर मामलों में ऐसे दीए बुझने से पहले थोड़े समय के लिए भभक कर जल उठते है. अखबारों में इनके विवादास्पद लेख छपते हैं, टीवी पर बहस होती है. फिर सब खत्म हो जाता है.

आत्मकथाओं के इस ढेर से अलग है गांधीजी की आत्मकथा जो अधूरी होते हुए भी पूरा सच बयान करती है. इसका शीर्षक बड़ा अटपटा है – सत्य के साथ मेरे प्रयोग अथवा आत्मकथा. यहां सत्य के प्रयोग का वर्णन मुख्य था. इसलिए नाम में भी उसे आगे रखा गया आत्मकथा को पीछे. निकट के साथियों के खूब आग्रह करने पर गांधीजी ने आत्मकथा लिखना तय किया. शुरू तो किया लिखना, लेकिन उन्हीं के शब्दों में ‘फुलस्केप का एक पन्ना भी पूरा नहीं हो पाया था कि इतने में बंबई में ज्वाला प्रकट हुई औऱ मेरा शुरू किया हुआ काम अधूरा रह गया.’

ये बात 1921 की है. उसके बाद गांधी जी की व्यस्तता दिनोंदिन बढ़ती ही गई. बीच में उन्हें गिरफ्तार करके यरवदा जेल, पुणे में रखा गया. पर गांधीजी के पास वक्त कहां था. उनके बारे में कहा जाने लगा था कि ये व्यक्ति अपने समय का मालिक था, अपनी घड़ी का गुलाम था, समय का एकदम पाबंद. अपनी कुटिया में साधरणजनों से लेकर ऊंचे दर्जे के नेताओं से दिनभर मिलते, हर दिन अनगिनत पत्र, नोट लिखते. एक हाथ लिखते-लिखते थक जाता तो दूसरे से भी लिखने का अभ्यास कर डाला था.

ये वो दौर था जब गांधीजी देश को एक नई भूमिका के लिए तैयार करने में दिन-रात लगे हुए थे. अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उनके पास अख़बार भी थे जिनके लिए हर हफ्ते कुछ न कुछ लिखना होता था. हल निकाला गांधीजी ने ‘तो फिर क्यों न आत्मकथा लिखूं।’ इस तरह ये विचित्र कथा मूल गुजराती में 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929 तक नवजीवन अख़बार में साप्ताहिक रूप से छपी. फिर अंग्रेज़ी अनुवाद 3 दिसंबर 1925 से 7 फरवरी 1929 तक ‘यंग इंडिया’ के अंको में छपा.

हिंदी पुस्तक के रूप में सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली ने इसे सबसे पहले सन् 1928 में प्रकाशित किया. लेकिन गांधीजी की तमाम रचनाओं का कॉपीराइट रखने वाला नवजीवन ट्रस्ट हिंदी संस्करण पहली बार 1957 में छाप सका. इन तीन भाषाओं में इस पुस्तक की करीब 14,56,000 प्रतियां पाठकों तक पहुंची है. इसके अलावा तमिल, कन्नड़, मराठी, तेलगू, उड़िया, असमी, बंगला और उर्दू में इसकी करीब पांच लाख प्रतियां छप चुकी हैं. सत्य के इस विचित्र प्रयोग को दुनिया की तमाम दूसरी भाषाओं में भी अनूदित किया जा चुका है. अंग्रेज़ी में यहां भी छपी और विदेशों में भी. फिर स्पेनी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, इतावली, जर्मन, पोलिस स्विस, तुर्की के अलावा अरबी भाषा में भी इसका अच्छा स्वागत हुआ है. चीनी, जापानी और तिब्बती भाषाओं में भी इसके संस्करण हैं.

कोई 80 वर्षों से लगातार पाठकों को लुभा रही इस आत्मकथा में ऐसा क्या है? सच पूछा जाय तो इसमें गांधीजी की कहानी तो बस सूत्र के रूप में चलती है. मुख्य तो उस धागे में पिरोये गए उनके सत्य के प्रयोग हैं. खुद गांधीजी के शब्दों में ‘मुझे आत्मकथा कहां लिखनी है?  मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के साथ मैंने जो प्रयोग किए हैं उनकी कथा लिखनी है.’ इस आत्मकथा में ब्रितानी राज, कांग्रेस, हिंदू-मुसलमान या दक्षिण अफ्रीका के दौरे में वहां के शासकों के खिलाफ रत्ती भर ज़हर नहीं मिलेगा, जो है वह है सत्य, अमृत जिसके कारण उन्हें इस गंदी से गंदी राजनीति में भी बहुत कुछ कर जाने की शक्ति मिली. इसमें तो उन्होंने अपने दोषों का भी वर्णन किया है.

आत्मकथा में गांधीजी के विभिन्न सत्याग्रहों और संघर्षों का वर्णन भी है. वो लिखते हैं “सत्याग्रह में संघर्ष व्यक्तियों अथवा पक्षों के बीच नहीं माना जाता, सत्य और असत्य, सही और गलत के बीच माना जाता है.”  ऐसे मौकों पर अपने हिस्से की सच्चाई को नहीं, पूरी सच्चाई को ठीक से पकड़ लो और उसके सहारे झूठ को, असत्य को पराजित करने के काम में लग जाओ. उन्ही के शब्दों में ‘इस तरह न कोई जीतता है, न कोई विजेता होता है. किसी को भी ऐसा नहीं लगता कि हम हार गए, हमने कुछ खो दिया है या हमारा अपमान हो गया है.’

गांधीजी ने इस आत्मकथा में 1921 तक का ही वर्णन किया है. पर यह उनकी कहानी का अंत नहीं है. यह आत्मकथा हमें बताती है कि चम्पारण सत्याग्रह में गांधीजी ने नील की खेती को लेकर अंग्रेजों के अत्याचारों में कैसे सत्य को पकड़ा और फिर अंत तक उसे पकड़े रहे. ‘नील का धब्बा’ नामक शीर्षक से लिखा यह अंश इस बात को बताता है कि गांधीजी ने ये मामला यूं ही नहीं उठा लिया था. एक पक्ष था अत्याचार करने वाले अंग्रेजों का तो  दूसरा था भोले-भाले किसानों का. तीसरा पक्ष ऐसे प्रसिद्ध वकीलों का था जो इन गरीब किसानों के मुकदमें

लड़ते थे. गांधीजी लिखते हैं “इन भोले किसानों से मेहनताना सभी लेते थे, त्यागी होते हुए भी ब्रजकिशोर बाबू या राजेंद्र बाबू मेहनताना लेने में संकोच नहीं रखते थे. उनकी दलील यह थी कि पेशे के काम में मेहनताना न लें तो घर का खर्च नहीं चल सकता और हम लोगों की मदद भी नहीं कर सकते. उनके मेहनताने तथा बंगाल और बिहार के बैरिस्टरों को दिए जाने वाले मेहनताने के कल्पना में न आ सकने वाले आंकड़े सुनकर मैं दंग रह गया.”

सारी बात जान लेने के बाद गांधीजी की पहली राय थी “अब ये मुकदमें लड़ना तो हमें बंद ही कर देना चाहिए. जो रैयत इतनी कुचली हुई हो जहां सब इतने भयभीत रहते हों, वहां कचहरियों के जरिए थोड़े ही इलाज हो सकता है. लोगों का डर निकालना उनके रोग की असली दवा है. यह तिनकठिया प्रथा (जबरन नील की खेती) न जाय, तब तक हम चैन से नहीं बैठ सकते.”

गांधीजी चम्पारण की इस भयानक समस्या को देखने-समझने बस दो दिनों के लिए आए थे पर सत्य के प्रयोग ऐसे ही नहीं होते. उन्होंने यहां आकर जो देखा उससे उन्हें लगा “ये काम तो दो साल भी ले सकता है. इतना समय लगे तो भी मैं देने को तैयार हूं.” सत्य के प्रयोग भत्ते लेने से नहीं चलते. गांधीजी ने सभी प्रसिद्ध वकीलों का मेहनताना खत्म करवाया. खुद पेशे से वकील होते हुए भी उनसे कहा कि “इस बड़े काम में आपकी वकालत की योग्यता का थोड़ा ही उपयोग होगा. आप जैसों से तो मैं मुहर्रिर और दुभाषिए का काम चाहूंगा.” ये भी कहा कि वकील का धंधा अनिश्चित काल के लिए छोड़ देना पड़ेगा. जेल जाने की भी तैयारी रखें.

उधर गांधीजी ने हजारो किसानों से जो बात की उसमें भी सच्चाई का पूरा ध्यान रखा. हर किसान का बयान लेते समय, अंग्रेजों के खिलाफ शिकायत लिखवाते समय एक अच्छे वकील की तरह जिरह की जाती थी. जिस किसी भी शिकायत में झूठ या अतिश्योक्ति की गंध आती उस मामले को वहीं छोड़ दिया जाता था. झूठ के पुलिंदों के सहारे सच की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. गांधीजी का सच, गांधीजी के राम, दो पक्षों के बीच कैसा मजबूत सेतु बन जाता था- ऐसे अनेक प्रयोगों से भरी पड़ी है ये आत्मकथा. इसमें 1921 तक का ही वर्णन है इसके बाद गांधीजी का जीवन और भी सार्वजनिक होता गया. उन्हीं के शब्दों में “शायद ही कोई ऐसी चीज हो जिसे लोग न जानते हों.” इसलिए यहां आकर वे पाठकों से विदा लेते हैं. जिस सत्य के आग्रह पर उन्होंने आत्मकथा लिखना शुरू किया था, उसे इन सब विवरणों के बाद वे और भी गहरे उतर कर लिखते है “सत्य को जैसा मैंने देखा है, जिस मार्ग को देखा है उसे बताने का मैंने सतत प्रयत्न किया है. क्योंकि मैंने यह माना है कि उससे सत्य और अहिंसा के विषय में अधिक आस्था उत्पन्न होगी.”

पूरे सच की ये अधूरी कथा ज़हर से घुली इस दुनिया में दूध से धुली है इसीलिए आज 80 सालों बाद भी खामोशी से तहलका मचा रही है.

(गांधी शान्ति प्रतिष्ठान से सम्बद्ध अनुपम मिश्र स्वयं एक कालजयी पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब के लेखक हैं.)

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा

आत्मकथाएं कौन लोग लिखते हैं? जो लोग कुछ अच्छे कामों के कारण समाज का प्यार पाते हैं या फिर जो बुरे कामों के कारण बदनाम हो जाते हैं. एक तीसरी श्रेणी ऐसे लोगों की भी है जो दूसरों की कुछ पोलपट्टी खोल सकने वाले पदों पर रहे होंगे. तीनों तरह के लोगों में राजनेता, अभिनेता, तानाशाह, पत्रकार, साहित्यकार, मंजे हुए या पिटे हुए खिलाड़ी, उद्योगपति और उच्च अधिकारी शामिल हैं.

आत्मकथा लोग अक्सर जीवन के उतार पर पहुंचकर लिखते हैं. अच्छे बुरे कामों का तेल तब तक खत्म हो चलता है, तब ऐसे लोगों की आत्मकथा थोड़ा और तेल जुटा देती है. ज्यादातर मामलों में ऐसे दीए बुझने से पहले थोड़े समय के लिए भभक कर जल उठते है. अखबारों में इनके विवादास्पद लेख छपते हैं, टीवी पर बहस होती है. फिर सब खत्म हो जाता है.

आत्मकथाओं के इस ढेर से अलग है गांधीजी की आत्मकथा जो अधूरी होते हुए भी पूरा सच बयान करती है. इसका शीर्षक बड़ा अटपटा है – सत्य के साथ मेरे प्रयोग अथवा आत्मकथा. यहां सत्य के प्रयोग का वर्णन मुख्य था. इसलिए नाम में भी उसे आगे रखा गया आत्मकथा को पीछे. निकट के साथियों के खूब आग्रह करने पर गांधीजी ने आत्मकथा लिखना तय किया. शुरू तो किया लिखना, लेकिन उन्हीं के शब्दों में ‘फुलस्केप का एक पन्ना भी पूरा नहीं हो पाया था कि इतने में बंबई में ज्वाला प्रकट हुई औऱ मेरा शुरू किया हुआ काम अधूरा रह गया.’

ये बात 1921 की है. उसके बाद गांधी जी की व्यस्तता दिनोंदिन बढ़ती ही गई. बीच में उन्हें गिरफ्तार करके यरवदा जेल, पुणे में रखा गया. पर गांधीजी के पास वक्त कहां था. उनके बारे में कहा जाने लगा था कि ये व्यक्ति अपने समय का मालिक था, अपनी घड़ी का गुलाम था, समय का एकदम पाबंद. अपनी कुटिया में साधरणजनों से लेकर ऊंचे दर्जे के नेताओं से दिनभर मिलते, हर दिन अनगिनत पत्र, नोट लिखते. एक हाथ लिखते-लिखते थक जाता तो दूसरे से भी लिखने का अभ्यास कर डाला था.

ये वो दौर था जब गांधीजी देश को एक नई भूमिका के लिए तैयार करने में दिन-रात लगे हुए थे. अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उनके पास अख़बार भी थे जिनके लिए हर हफ्ते कुछ न कुछ लिखना होता था. हल निकाला गांधीजी ने ‘तो फिर क्यों न आत्मकथा लिखूं।’ इस तरह ये विचित्र कथा मूल गुजराती में 29 नवंबर 1925 से 3 फरवरी 1929 तक नवजीवन अख़बार में साप्ताहिक रूप से छपी. फिर अंग्रेज़ी अनुवाद 3 दिसंबर 1925 से 7 फरवरी 1929 तक ‘यंग इंडिया’ के अंको में छपा.

हिंदी पुस्तक के रूप में सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली ने इसे सबसे पहले सन् 1928 में प्रकाशित किया. लेकिन गांधीजी की तमाम रचनाओं का कॉपीराइट रखने वाला नवजीवन ट्रस्ट हिंदी संस्करण पहली बार 1957 में छाप सका. इन तीन भाषाओं में इस पुस्तक की करीब 14,56,000 प्रतियां पाठकों तक पहुंची है. इसके अलावा तमिल, कन्नड़, मराठी, तेलगू, उड़िया, असमी, बंगला और उर्दू में इसकी करीब पांच लाख प्रतियां छप चुकी हैं. सत्य के इस विचित्र प्रयोग को दुनिया की तमाम दूसरी भाषाओं में भी अनूदित किया जा चुका है. अंग्रेज़ी में यहां भी छपी और विदेशों में भी. फिर स्पेनी, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, इतावली, जर्मन, पोलिस स्विस, तुर्की के अलावा अरबी भाषा में भी इसका अच्छा स्वागत हुआ है. चीनी, जापानी और तिब्बती भाषाओं में भी इसके संस्करण हैं.

कोई 80 वर्षों से लगातार पाठकों को लुभा रही इस आत्मकथा में ऐसा क्या है? सच पूछा जाय तो इसमें गांधीजी की कहानी तो बस सूत्र के रूप में चलती है. मुख्य तो उस धागे में पिरोये गए उनके सत्य के प्रयोग हैं. खुद गांधीजी के शब्दों में ‘मुझे आत्मकथा कहां लिखनी है?  मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के साथ मैंने जो प्रयोग किए हैं उनकी कथा लिखनी है.’ इस आत्मकथा में ब्रितानी राज, कांग्रेस, हिंदू-मुसलमान या दक्षिण अफ्रीका के दौरे में वहां के शासकों के खिलाफ रत्ती भर ज़हर नहीं मिलेगा, जो है वह है सत्य, अमृत जिसके कारण उन्हें इस गंदी से गंदी राजनीति में भी बहुत कुछ कर जाने की शक्ति मिली. इसमें तो उन्होंने अपने दोषों का भी वर्णन किया है.

आत्मकथा में गांधीजी के विभिन्न सत्याग्रहों और संघर्षों का वर्णन भी है. वो लिखते हैं “सत्याग्रह में संघर्ष व्यक्तियों अथवा पक्षों के बीच नहीं माना जाता, सत्य और असत्य, सही और गलत के बीच माना जाता है.”  ऐसे मौकों पर अपने हिस्से की सच्चाई को नहीं, पूरी सच्चाई को ठीक से पकड़ लो और उसके सहारे झूठ को, असत्य को पराजित करने के काम में लग जाओ. उन्ही के शब्दों में ‘इस तरह न कोई जीतता है, न कोई विजेता होता है. किसी को भी ऐसा नहीं लगता कि हम हार गए, हमने कुछ खो दिया है या हमारा अपमान हो गया है.’

गांधीजी ने इस आत्मकथा में 1921 तक का ही वर्णन किया है. पर यह उनकी कहानी का अंत नहीं है. यह आत्मकथा हमें बताती है कि चम्पारण सत्याग्रह में गांधीजी ने नील की खेती को लेकर अंग्रेजों के अत्याचारों में कैसे सत्य को पकड़ा और फिर अंत तक उसे पकड़े रहे. ‘नील का धब्बा’ नामक शीर्षक से लिखा यह अंश इस बात को बताता है कि गांधीजी ने ये मामला यूं ही नहीं उठा लिया था. एक पक्ष था अत्याचार करने वाले अंग्रेजों का तो  दूसरा था भोले-भाले किसानों का. तीसरा पक्ष ऐसे प्रसिद्ध वकीलों का था जो इन गरीब किसानों के मुकदमें

लड़ते थे. गांधीजी लिखते हैं “इन भोले किसानों से मेहनताना सभी लेते थे, त्यागी होते हुए भी ब्रजकिशोर बाबू या राजेंद्र बाबू मेहनताना लेने में संकोच नहीं रखते थे. उनकी दलील यह थी कि पेशे के काम में मेहनताना न लें तो घर का खर्च नहीं चल सकता और हम लोगों की मदद भी नहीं कर सकते. उनके मेहनताने तथा बंगाल और बिहार के बैरिस्टरों को दिए जाने वाले मेहनताने के कल्पना में न आ सकने वाले आंकड़े सुनकर मैं दंग रह गया.”

सारी बात जान लेने के बाद गांधीजी की पहली राय थी “अब ये मुकदमें लड़ना तो हमें बंद ही कर देना चाहिए. जो रैयत इतनी कुचली हुई हो जहां सब इतने भयभीत रहते हों, वहां कचहरियों के जरिए थोड़े ही इलाज हो सकता है. लोगों का डर निकालना उनके रोग की असली दवा है. यह तिनकठिया प्रथा (जबरन नील की खेती) न जाय, तब तक हम चैन से नहीं बैठ सकते.”

गांधीजी चम्पारण की इस भयानक समस्या को देखने-समझने बस दो दिनों के लिए आए थे पर सत्य के प्रयोग ऐसे ही नहीं होते. उन्होंने यहां आकर जो देखा उससे उन्हें लगा “ये काम तो दो साल भी ले सकता है. इतना समय लगे तो भी मैं देने को तैयार हूं.” सत्य के प्रयोग भत्ते लेने से नहीं चलते. गांधीजी ने सभी प्रसिद्ध वकीलों का मेहनताना खत्म करवाया. खुद पेशे से वकील होते हुए भी उनसे कहा कि “इस बड़े काम में आपकी वकालत की योग्यता का थोड़ा ही उपयोग होगा. आप जैसों से तो मैं मुहर्रिर और दुभाषिए का काम चाहूंगा.” ये भी कहा कि वकील का धंधा अनिश्चित काल के लिए छोड़ देना पड़ेगा. जेल जाने की भी तैयारी रखें.

उधर गांधीजी ने हजारो किसानों से जो बात की उसमें भी सच्चाई का पूरा ध्यान रखा. हर किसान का बयान लेते समय, अंग्रेजों के खिलाफ शिकायत लिखवाते समय एक अच्छे वकील की तरह जिरह की जाती थी. जिस किसी भी शिकायत में झूठ या अतिश्योक्ति की गंध आती उस मामले को वहीं छोड़ दिया जाता था. झूठ के पुलिंदों के सहारे सच की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती. गांधीजी का सच, गांधीजी के राम, दो पक्षों के बीच कैसा मजबूत सेतु बन जाता था- ऐसे अनेक प्रयोगों से भरी पड़ी है ये आत्मकथा. इसमें 1921 तक का ही वर्णन है इसके बाद गांधीजी का जीवन और भी सार्वजनिक होता गया. उन्हीं के शब्दों में “शायद ही कोई ऐसी चीज हो जिसे लोग न जानते हों.” इसलिए यहां आकर वे पाठकों से विदा लेते हैं. जिस सत्य के आग्रह पर उन्होंने आत्मकथा लिखना शुरू किया था, उसे इन सब विवरणों के बाद वे और भी गहरे उतर कर लिखते है “सत्य को जैसा मैंने देखा है, जिस मार्ग को देखा है उसे बताने का मैंने सतत प्रयत्न किया है. क्योंकि मैंने यह माना है कि उससे सत्य और अहिंसा के विषय में अधिक आस्था उत्पन्न होगी.”

पूरे सच की ये अधूरी कथा ज़हर से घुली इस दुनिया में दूध से धुली है इसीलिए आज 80 सालों बाद भी खामोशी से तहलका मचा रही है.

(गांधी शान्ति प्रतिष्ठान से सम्बद्ध अनुपम मिश्र स्वयं एक कालजयी पुस्तक आज भी खरे हैं तालाब के लेखक हैं.)

"ऐसी गंदगीमें काँग्रेसकी बैठक अधिक दिनों तक जारी रहती, तो आवश्य बीमारी फैल जाती…"

हिंदुस्तान पहुंचने पर थोड़ा समय मैंने घूमने-फिरनेमें बिताया. यह 1901 का जमाना था. उस सालकी काँग्रेस कलकत्तेमें होने वाली थी. दीनाशा एदलजी वाच्छा उसके अध्यक्ष थे. मुझे काँग्रेसमें तो जाना था ही. काँग्रेसका यह मेरा पहला अनुभव था.

बम्बईसे जिस गाड़ीमें सर फिरोजशाह मेहता रवाना हुए उसीमें मैं भी गया था. मुझे उनसे दक्षिण अफ्रिकाके बारेमें बातें करनी थीं. उनके डिब्बेमें एक स्टेशन तक जानेकी मुझे अनुमति मिली थी. उन्होंने तो खास सलूनका प्रबंध किया था. उनके शाही खर्च और ठाठ-बाटसे मैं परिचित था. जिस स्टेशन पर उनके डिब्बेमें जानेकी मुझे अनुमति मिली थी, उस स्टेशन पर मैं उसमें पहुंचा. उस समय उनके डिब्बेमें तबके दीनशाजी और तबके चिमनलाल सेतलवाड़ बैठे थे. उनके साथ राजनीतिक चर्चा चल रही थी. मुझे देखकर सर फिरोजशाह बोले, “गांधी, तुम्हारा काम पार न पड़ेगा. तुम जो कहोगे सो प्रस्ताव तो हम पास कर देंगे, पर अपने देशमें ही हमें कौनसे अधिकार मिलते हैं? मैं तो मानता हूं कि जब तक अपने देशमें हमें सत्ता नहीं मिलती, तब तक उपनिवेशोंमें तुम्हारी स्थिति सुधर नहीं सकती”

मैं तो सुनकर दंग ही रह गया. सर जिमनलालने हां-में-हां मिलायी. दीनशाने मेरी ओर दयार्द्रा दृष्टिसे देखा. मैंने समझाने का कुछ प्रयत्न किया, परंतु बम्बई के बेताजके बादशाहको मेरे समान आदमी क्या समझा सकता था? मैंने इतनेसे ही संतोष माना कि मुझे काँग्रेसमें प्रस्ताव पेश करने दिया जाएगा.

सर दीनशा वाच्छा मेरा उत्साह बढ़ानेके लिए बोले, “गांधी, प्रस्ताव लिखकर मुझे बताना भला!” मैंने उनका उपकार माना. दूसरे स्टेशन पर ज्यों ही गाड़ी खड़ी हुई, मैं भागा और अपने डिब्बेमें घुस गया.

हम कलकत्ते पहुंचे. अध्यक्ष आदि नेताओंको नागरिक धूमधाम से ले गए. मैंने किसी स्वयंसेवक से पूछा, “मुझे कहां जाना चाहिए?” वह मुझे रिपन कॉलेज ले गया. वहां बहुतसे प्रतिनिधि ठहराये गए थे. मेरे सौभाग्यसे जिस विभागमें मैं था, उसी में लोकमान्य तिलक भी ठहरे हुए थे. मुझे याद पड़ता है कि वो एक दिन बाद पहुंचे थे. जहां लोकमान्य हों वहां छोटा-सा दरबार तो लग ही जाता था. मैं चित्रकार होता , तो जिस खटिया पर वो बैठे थे, उसका चित्र खींच देता. उस जगह का और उसकी बैठकीका आज भी मुझे इतना स्पष्ट स्मरण है. उनसे मिलने आनेवाले अनगिनत लोगोंमें से मुझे एक ही का नाम अब याद है-‘अमृतबाजार पत्रिका’ के मोतीबाबू. उन दोनोंका खिलखिलाकर हंसना और राज्य कार्यकर्ताओंके अन्यायके विषयमें उनकी बात भूलने योग्य नहीं है.

लेकिन वहांकी व्यवस्था को थोड़ा देखें.

स्वयंसेवक एक-दूसरेसे टकराते रहते थे. जो काम जिसे सौंपा जाता, वह स्वयं उसे नहीं करता था. वह तुरंत दूसरेको पुकारता था. दूसरा तीसरेको. बेचारा प्रतिनिधि  तो न तीनमें होता, न तेरहमें.

मैंने अनेक स्वयंसेवकोंसे दोस्ती की. उनसे दक्षिण अफ्रीकाकी कुछ बातें कीं. इससे वे जरा शरमिंदा हुए. मैंने उन्हें सेवाका मर्म  समझानेका प्रयत्न किया. वे कुछ समझे. पर सेवा की अभिरुचि कुकुरमुत्तेकी तरह बातकी बातमें तो उत्पन्न नहीं होती. उसके लिए इच्छा चाहिए और बादमें अभ्यास. इन भोले और भले स्वयंसेवकोंमें इच्छा तो बहुत थी, पर तालीम और अभ्यास वे कहांसे पाते? काँग्रेस सालमें तीन दिनके लिए इकट्ठा होकर फिर सो जाती थी. सालमें तीन दिनकी तालीमसे कितना सीखा जा सकता था?

जैसे स्वयंसेवक थे, वैसे ही प्रतिनिधि थे. उन्हें भी इतने ही दिनोंकी तालीम मिलती थी. वे अपने हाथसे अपना  कोई भी काम न करते थे. सब बातों में उनके हुक्म छूटते रहते थे. ‘स्वयंसेवक, यह लाओ; स्वयंसेवक, वह लाओ’ चला ही करता था.

अखा भगत(गुजरताके एक भक्तकवि. इन्होंने अपने एक छप्पयमें छुआछूतको ‘आभडछेट अदकेरो अंग’ कहकर उसका विरोध किया है और कहा है कि हिंदू धर्ममें अस्पृश्यताके लिए कोई स्थान नहीं है)  के ‘अदकेरा अंग’-‘अतिरिक्त अंग’ का भी ठीकठीक अनुभव हुआ. छुआछूत को मानने वाले वहां बहुत थे. द्राविड़ी रसोई बिलकुल अलग थी. उन प्रतिनिधियों को तो ‘दृष्टिदोष’ भी लगता था! उनके लिए कॉलेजके अहातेमें चटाइयोंका रसोईघर बनाया गया था. उसमें धुआं इतना रहता था कि आदमीका दम घुट जाए. खाना-पीना सब उसीके अंदर. रसोईघर क्या था, एक तिजोरी थी. वह कहींसे भी खुला न था.

मुझे यह वर्णधर्म उलटा लगा. काँग्रेसमें आनेवाले प्रतिनिधि जब इतनी छुआछूत रखते हैं, तो उन्हें भेजनेवाले लोग कितनी रखते होंगे? इस प्रकारका त्रैराशिक लगानेसे जो उत्तर मिला, उस पर मैंने एक लंबी सांस ली.

गंदगीकी हद नहीं थी. चारों तरफ पानी ही पानी फैला था. पाखाने कम थे. उनकी दुर्गंधकी याद आज भी मुझे हैरान करती है. मैंने एक स्वयंसेवकको यह सब दिखाया. उसने साफ इनकार करते हुए कहा, “यह तो भंगीका काम है.” मैंने झाडू मांगा. वह मेरा मुंह ताकता रहा. मैंने झाडू खोज निकाला. पाखाना साफ किया. पर यह तो मेरी अपनी सुविधाके लिए हुआ. भीड़ इतनी ज्यादा थी और पाखाना इतने कम थे कि हर बारके उपयोगके बाद उनकी सफाई होनी जरूरी थी. यह मेरी शक्ति के बाहरकी बात थी. इसलिए मैंने अपने लायक सुविधा करके संतोष माना. मैंने यह देखा कि दूसरों को यह गंदगी जरा भी अखरती न थी.

पर बात यहीं खतम नहीं होती. रातके समय कोई-कोई तो कमरेके सामनेवाले बरामदेमें ही निबट लेते थे. सवेरे स्वयंदेवकोंको मैंने मैला दिखाया. कोई साफ करनेको तैयार नहीं था. उसे साफ करने का सम्मान भी मैंने ही प्राप्त किया. यद्दपि अब इन बातोंमें बहुत सुधार हो गया है, फिर भी अविचारी प्रतिनिधि अब तक काँग्रेसके शिबिरको जहां-तहां मलत्याग करके गंदा करते हैं और सब स्वयंसेवक उसे साफ करनेके लिए तैयार नहीं होते. 

मैंने देखा कि अगर ऐसी गंदगीमें काँग्रेसकी बैठक अधिक दिनों तक जारी रहती, तो आवश्य बीमारी फैल जाती.

(“सत्यके प्रयोग अथवा आत्मकथा” के भाग तीन के ‘देश में’ चैप्टर से)

मनुबहन की नजर में उनकी मां गांधी

 

30 मार्च 1947 को पूज्य बापू पहले-पहल लॉर्ड माउंटबेटन से मिलने जा रहे थे. नोवाखली और बिहार के ऐक्य यज्ञ में पड़ने के बाद यह पहला सफर था. वायसराय की ओर से सूचना तो यह थी कि बापू हवाई जहाज से दिल्ली पहुंचे. मगर बापू ने यह कहकर हवाई जहाज में जाने से इंकार किया कि, ‘‘जिस वाहन में करोड़ों गरीब सफर नहीं कर सकते, उसमें मैं कैसे बैठ सकता हूं?’’ और निश्चय किया कि ‘‘ मेरा काम तो रेल से भी अच्छी तरह से चल जाता है. मैं रेल से ही आउंगा.’’

गर्मी बहुत थी. सहन नहीं की जा सकती थी. 24 घंटे का रास्ता था. फिर हर स्टेशन पर राष्ट्र के पिता के दर्शन के लिए हजारों की भींड़ जमती थी. पर बापू को इन सब तकलीफों की फिकर ही कहां थी. उन्होंने मुझे बुलाया और कहने लगेः-

‘‘ देखो, इस यज्ञ में अकेले ही तुम मेरे साथ हो. यज्ञ में लगने के बाद यह पहली बार मैं दिल्ली जा रहा हूं. नोवाखली जाते वक्त मैंने निश्चित किया था कि वहीं ‘ करना या मरना’. और इसीलिए सब साथियों को अलग कर दिया था. सिर्फ तुम्हें मैंने अपने यज्ञ में शामिल होने दिया. लेकिन तुम्हें मैं नहीं छोड़ सकता, न तुम ही यह चाहती हो. इसीलिए तुम्हें मेरे साथ जाना है. सामान कम से कम लेना और छोटे से छोटा तीसरे दरजे का एक डब्बा पसंद कर लेना. मगर देखना, इसमें तुम्हारी कड़ी परीक्षा है, खयाल रखना!’’

मैंने सामान तो कम से कम लिया, मगर डब्बा पसंद करते समय खयाल हुआ कि हर स्टेशन पर दर्शन करनेवालों की भींड़ के कारण बापू घड़ी भर भी आराम नहीं ले पायेंगे. फिर हरिजन फंड भी मुझे गिनना पड़ेगा और उसकी आवाज होगी. इसलिए मैंने दो भाग वाला एक डब्बा पसंद किया. एक में सामान रख लिया, दूसरे में बापू के सोने- बैठने का इंतजाम कर दिया.

पटने से दिल्ली की गाड़ी सुबह 09.30 को चलती थी. बापू और मैं 09.25 को स्टेशन पर आये. वहां लोगों की भींड़ बहुत थी. फिर भी हम गाड़ी पर चढ़ गये. बापू तो ठहरे मिनट-मिनट का उपयोग करनेवाले. उन्होंने पांच मिनट में ही हरिजन फंड इकट्ठा कर लिया. 09.30 को गाड़ी रवाना हुई.

गर्मी के दिनों में बापू दस बजे भोजन करते थे. मैं सब तैयारियां करने के लिए डब्बे के दूसरे हिस्से में गयी. थोड़ी देर के बाद बापूजी के पास आयी. बापूजी लिखने में लगे थे. मुझे पूछने लगे- ‘‘कहां थी?’’

मैंने कहा-‘‘ यहां खाना तैयार कर रही थी.’’. तब उन्होंने खिड़की के बाहर नजर डालकर उन्होंने मुझे देखने को कहा. मुझे भी जरा सा खयाल हो आया कि मेरी कुछ न कुछ भूल हो गयी है. मैंने बाहर देखा तो मुझे लोग लटके हुए दिखायी दिये.

मीठी-सी झिड़की देकर बापू मुझसे कहने लगे-‘‘ क्या इस दूसरे कमरे के लिए तुमने कहा था?’’ मैंने कहा-‘‘ जी हां. मेरा खयाल था कि अगर इसी कमरे में मैं अपना काम करूं, बरतन मलूं, स्टोव पर दूध गरम करूं, तो आपको तकलीफ होगी. इसलिए मैंने दो कमरे का डब्बा लिया.’’

बापूजी कहने लगे- ‘‘ कितनी कमजोर दलील है. इसी का नाम है अंधा प्रेम. तुम जानती हो न कि मेरी तकलीफ बचाने के लिए हवाई जहाज का उपयोग करने से इंकार करने के बाद स्पेशल रेलगाड़ी से सफर करने की सूचना दी गयी थी. लेकिन एक स्पेशल ट्रेन के पीछे कितनी गाड़ियां रूकें और हजारों का खर्च हो जाये, यह मुझसे कैसे सहा जाये? मैं तो बड़ा लोभी हूं. आज तो तुमने सिर्फ दूसरा कमरा ही मांगा, लेकिन अगर सलून भी मांगती तो वह भी तुझे मिल जाता. मगर क्या यह तुम्हें शोभा देता? तुम्हारा रेल का यह दूसरा कमरा मांगना सलून मांगने के बराबर है. मैं जानता हूं कि तुम मेरे प्रति अत्यंत प्रेम की वजह से यह सब करती हो. लेकिन मुझे ता तुम्हें उपर चढ़ाना है. नीचे नहीं गिराना है. तुम्हें भी यह समझ लेना चाहिए. और अगर तुम समझती हो तो मैं इधर कह रहा हूं और उधर तुम्हारी आंखों से पानी बह रहा है, वह नहीं बहना चाहिए. अब इन बातों का प्रायश्चित यही है कि तुम सब सामान इस कमरे में ले लो और अगले स्टेशन पर स्टेशन मास्टर को मेरे पास बुलाना.’’

मैं तो थरथर कांप रही थी. सामान तो हटाया मगर मुझे बापू की फिकर बनी ही रही कि अब क्या होगा? कैसे होगा? दूसरे, यह फिकर थी कि कई बार बापू दूसरों की ऐसी छोटी भूलों को अपनी ही समझकर उनके लिए उपवास करते हैं, वैसे ही कहीं इसके लिए भी एकाध बार का भोजन न छोड़ दें. इसके अलावा घर के सब काम- पढ़ना, लिखना, मिट्टी के लेप लगाना, कातना, मुझे पढ़ाना- जैसे घर में, वैसे ही ट्रेन में भी होते थे!

आखिर स्टेशन आया. बापू ने स्टेशन मास्टर को बुलाया और कहने लगे-‘‘ यह लड़की मेरी पोती है. बेचारी भोलीभाली है. शायद वह अभी मुझे समझी नहीं, इसलिए उनसे दो कमरे पसंद किये. इसमें इसका दोष नहीं, मेरा ही दोष है. क्योंकि मेरे शिक्षण में कुछ अधूरापन रह गया होगा. अब उसका प्रायश्चित तो हमदोनों को करना ही होगा. हमने दूसरा कमरा खाली कर दिया है. जो लोग गाड़ी पर लटक रहे हैं, उनके लिए इस कमरे का उपयोग कीजिए, तभी मेरा दुख कम होगा.’’

स्टेशन मास्टर ने बहुत मिन्नतें कीं पर बापूजी कहां माननेवाले थे? स्टेशन मास्टर ने तो यहां तक कहा कि उन लोगों के लिए मैं दूसरा डब्बा जुड़वा देता हूं. बापू ने कहा- ‘‘ हां दूसरा डब्बा तो जुड़वा ही दीजिए, मगर इस कमरे का भी इस्तेमाल कीजिए. जिस चीज की हमें जरूरत न हो, वह ज्यादा मिल सकती हो तो भी उसका उपयोग करने में हिंसा है. मिलनेवाली सहूलियतों का उपयोग करवाकर आप क्या इस लड़की को बिगाड़ना चाहते हैं?’’ 

बेचारे स्टेशन मास्टर शर्मिंदा हो गये. उन्हें बापू का कहना मानना पड़ा.

बापू तो सारे हिंदुस्तान के पिता ठहरे. वे आराम से बैठें और उनके बच्चे लटकते हुए सफर करें, यह उनसे कैसे सहा जाता. इससे लटकते हुए लोगों को जगह मिली और मुझे अमूल्य सबक मिला कि जो सहूलियतें मिल सकती हैं, उनमें से भी कम से कम अपने उपयोग में लेनी चाहिए. उस समय वह झिड़की कड़ी तो मालूम हुई थी लेकिन आज उसकी कीमत मेरी जीवन में लगायी नहीं जा सकती. बापू ने ऐसे बारिकी भरे अहिंसा पालन से अपने जीवन को गढ़ा था. और उसमें जो थोड़ा भी फायदा उठाने का मौका मुझे मिला, वह सारी उम्र मेेरे साथ रहेगा. 

प्रस्तुतिः अनुपमा