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‘ऐसी कोई किताब नहीं जहां जिंदगी के सारे सवालों के जवाब लिखे हों’

गुलजार के बारे में कहा जाता है कि उनके शब्दों पर उनकी मुहर लगी होती है. इस चर्चित शायर, गीतकार और फिल्मकार का कहानी संग्रह ‘ड्योढ़ी’ हाल ही में वाणी प्रकाशन से छपकर आया है. स्वतंत्र मिश्र की उनसे बातचीतः

आपने  ‘ड्योढ़ी’  सलीम आरिफ को समर्पित की है. उनके बारे में कुछ बताएं.

 सलीम आरिफ थियेटर से जुड़े रहे हैं. वे मेरे साथ फिल्मों में सहायक रहे हैं. ‘गालिब’ में भी वे मेरे साथ रहे. नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से वे गोल्ड मेडलिस्ट हैं. बड़े काबिल आदमी हैं. दिल्ली में उनके नाटकों का फेस्टिवल हो चुका है. मेरी कहानी का उन्होंने कोलाज बनाकर नाटक किया. वे जब मेरे पास इस योजना को लेकर आए तब उनकी बात मेरे समझ में नहीं आ रही थी. वे नाटक में मेरी कहानी, कविता और नज्म को शामिल करना चाहते थे. वे दंगों को लेकर मेरी लिखी कहानियों और कविताओं को लेकर कोलाज तैयार करना चाहते थे. मैंने उनसे कहा कि भाई नाटक में मेरी कहानी होगी तो फिर कविता क्यों और अगर कविताएं सुनेंगे तो फिर कहानी क्यों? वे मुस्कुराते रहे. कहते रहे कि आपने इस विषय पर बहुत लिखा है. विभाजन से लेकर गुजरात दंगों को उन्होंने नाटक में समेटा. मैंने सन 1947 के विभाजन से लेकर अब तक हुए दंगों पर हमेशा रिएक्ट किया है. रिएक्ट करने के साथ कुछ लिखता भी रहा हूं. हालांकि जब नाटक देखा तो मैं दंग रह गया. मेरे रिएक्शन हर बार किताब में ही रह जाते थे, लेकिन इस बार जिंदा रिएक्शन लोगों के सामने आया. लोगों ने उस पर रिएक्ट भी किया. मैं समझता हूं कि वे इसके हकदार हैं.

आपने कुछ इस अंदाज में  ‘सलीम आरिफ और सलीम आरिफ और सलीम आरिफ के नाम!’  किताब उन्हें समर्पित की है?

 हां. यह कहने का एक अंदाज है. तीनों एक ही आदमी के नाम हैं. ऐसा नहीं है कि ये तीन अलग-अलग लोग हैं. कबूल करने का एक तरीका है. बांग्ला में भी ‘तीन सोत्ती’ का चलन है. ‘तीन सोत्ती’ का मतलब तीन बार कहो. मैं तुम्हें प्यार करता हूं. मैं तुम्हें प्यार करता हूं. मैं तुम्हें प्यार करता हूं. तीन बार नहीं कहेंगे तो कोई यकीन करने को तैयार नहीं होगा.

एक इंटरव्यू में आपने कहा था कि आपको बांग्ला जुबान से बेहद लगाव है. क्या इस लगाव की वजह सचिन देव बर्मन, हृषिकेष दा आदि के साथ काम करना तो नहीं है?

नहीं, ऐसा नहीं है. बांग्ला देश के लोगों की एक जुबान है. मैं बंगालियों से स्कूल के दिनों से मिलता रहा हूं. स्कूल से ही बांग्ला अच्छी लगती है. बांग्ला पढ़ी है. मैंने सब कुछ फिल्मों से ही नहीं सीखा है. फिल्मों के अलावा भी मेरी जिंदगी में बहुत कुछ है. 

 

‘ड्योढ़ी’  में भारत-पाक के विभाजन का दर्द बयान किया गया है. विभाजन की टीस आपके भी दिल में गहरे उतरी हुई है.

मेरी कहानियों में विभाजन का दर्द बार-बार दिखता है. उसकी वजह यह है कि भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय में मैं कोई ग्यारह-बारह साल का रहा होऊंगा. इस उम्र के जख्म जिंदगी भर नहीं जाते हैं. इस मामले में मैं अपने पिता जी का बड़ा शुक्रगुजार हूं. वे बड़े धर्मनिरपेक्ष आदमी थे. वर्ना मैंने लोगों का कत्ल-ए-आम होते देखा. लोगों को उजड़ते देखा. ऐसे हालात में आदमी कट्टरता की तरफ बढ़ सकता है. मेरे पिता जी बहुत पढ़े-लिखे नहीं थे. लेकिन जिंदगी की तालीम बहुत बड़ी होती है. उन्होंने मुझे पूर्वाग्रही नहीं होने दिया. मां-बाप की प्रवृत्तियों का असर उनके बच्चों पर बहुत गहरा पड़ता है. ऐसे हादसे आपके भीतर पलते-पनपते रहते हैं. वे आपको परेशान करते हैं. उसे अभिव्यक्त करने के लिए कोई-न-कोई साधन चाहिए होता है. मेरी अभिव्यक्ति का जरिया लिखना हो गया और विभाजन की टीस इसके जरिए बाहर आती रही.

संग्रह में बदहवासी का जिक्र है. अपनी एक कविता में भी आप कहते हैं कि एक जिंदगी नौवें आसमान में और दूसरी जिंदगी दलदल में है. गरीबी कम होने की बजाय बढ़ी है.

जी हां, ऐसा हुआ है. लेकिन कहानी की कथावस्तु यह नहीं है. अन्ना हजारे पर जब कहानी लिखूंगा तब इस बारे में कहूंगा. मेरी कहानियां गरीब लोगों के संघर्ष के बारे में हैं. मैं इस जिंदगी के अनुभवों से होकर गुजरा हूं. मैंने उन्हें महसूस किया है. ऐसा नहीं है कि मैंने सिर्फ नोट्स लेकर कहानियां लिखी हैं. इस संग्रह में मेरी ‘शाप’, ‘झड़ी’ और ‘बास’ गरीबी की कहानियां नहीं हंै. गरीबी में लोग कैसे जिंदा रहते हैं, उस बारे में ये कहानियां हैं. झोपड़पट्टी तोड़कर पक्के मकान बना दिए गए हैं. लेकिन वहां भी इन कहानियों के पात्र जिंदगी ढूंढ़ते हैं. वे वहां भी फलियां और करेले ढूंढ़ते हैं. वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यहां मंजी (खटिया) नहीं बिछाई जा सकती है. समझने की बात यह है कि जिंदगी महल और बिल्डिंग में नहीं है. खोई हुई चीज को जिंदगी ढूंढ़ती रहती है. ये आर्थिक तंगी के सवाल नहीं हैं. यहां तो हर हाल में जिंदगी पाने की ख्वाहिश है. ऐसा नहीं है कि किसी के दोनों पैर कट गए हों और पटि्टयां बंधी हों और रेहड़ी पर चलता हो तो वह कभी हंसा नहीं होगा. वे रोते भी हैं, हंसते भी हैं और गालियां भी देते हैं.

कहानी  ‘सारथी’  में मुख्य किरदार मारुति है. उसकी माली हालत बहुत खराब है. काम के बाद घर लौटने पर अपने बेटे को चोटिल देख कहता है –  ‘साला रोज पिट के आता है. घाटी कहीं का. मराठीयांचि नाक कापली.’  ऐसी प्रतिक्रिया का क्या मतलब?

मराठों की नाक कटा दी. आप पाएंगे सरदार भी अपने बच्चों से ऐसे ही कहते हैं. ‘ओए मार खाके आ गया. सरदारां दी बेसती करा दीत्ती.’ लोग ऐसे ही रिएक्ट करते हैं. दूसरी ओर बीवी मना करती है और कहती है कि क्यों उलटा-सीधा सिखाता है. बाप बेटे से कहता है कि चल छोड़. कौन सा तुझे तुकाराम बनना है. मालिश कर. मार खाके आ जाता है. इसमें कोई दर्शन मत ढूंढि़ए. यह जीवन में घटने वाली सामान्य बातें हैं. ऐसा थोड़े ही होता है कि हर समय आप किताब देखकर जवाब ढूंढ़ते हैं. शिव कुमार रे की एक बहुत ही खूबसूरत नज्म है – ‘कि मुझे वह किताब हाथ लग गई जिसमें जिंदगी के हर सवाल का जवाब लिखा हो.’ वे लिखते हैं कि मुझे जब भी मुश्किल पेश आती है तब मैं उसमें जवाब ढूंढ़ लेता हूं. मुश्किल तब हुई जब मेरे पीछे एक पागल सांड लग गया और मैं किताब के पन्ने पलटता रहा. जिंदगी एक सांड की तरह है जो पता नहीं कहां सींग मार बैठे. 

‘तलाश’  कहानी आपने हुमरा कुरैशी को समर्पित की है. हुमरा कौन हैं?

हुमरा कुरैशी एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्होंने कश्मीर के बारे में बहुत लिखा है. वे अंग्रेजी अखबारों में सालों से कॉलम लिखती रही हैं. कश्मीर के बारे में अंग्रेजी में उनकी एक बहुत अच्छी किताब (कश्मीरः द अनटोल्ड स्टोरी) भी है. उनकी कई किताबें छप चुकी हैं. कश्मीर को लेकर मेरी उनसे बातचीत होती रही है. वे बहुत अच्छा लिखती हैं.

कहानी  ‘ओवर’  में राजस्थान के  ‘पोचीना’  गांव का जिक्र है. एक कमरा है जिसमें एक सिपाही बंदूक लिए खड़ा है. आप लिखते हैं कि  ‘खामख्वाह’  खड़ा है. ऐसा क्यों कहते हैं?

सिपाही की ड्यूटी है. हर चार घंटे में बदलती रहती है. बोरे वगैरह रखे हुए हैं. सिपाही पाकिस्तान की ओर बंदूक ताने खड़ा है. ड्यूटी पर जो आदमी है वही सिर्फ वरदी में है. बाकी सब कच्छे और बनियान में घूमते रहते हैं. यहां से वहां तक कोई नहीं दिखता है. लेकिन उसकी ड्यूटी है कि बस नजर रखो. पता नहीं कहां से कौन आ जाए? इधर और उधर दोनों ओर खालीपन पसरा हुआ है. दोनों ओर एक-एक पत्थर लगा दिए गए और एक ओर भारत, दूसरी ओर पाकिस्तान लिखा है. न कोई तार लगी है. कोई लकीर भी नहीं है. कोई दीवार नहीं है. यहां से वहां तक सब कुछ साफ दिखाई दे रहा है. फिर दीवार खड़ी करके उसमें छेद बनाकर सिपाही के खड़े रहने की कोई वजह बनती है? जाहिर-सी बात है कि जिसकी वजह नहीं बनती है उसको हम खामख्वाह ही कहते हैं. बॉर्डर पर बिजली नहीं है. रात भर फौजी लालटेन में पहरा देते हैं. झगड़े कोई नहीं हैं. बस सियासतदानों के झगड़े चलते रहते हैं. इधर का सैनिक उधर जाता है तब एक गोली हवा में चलाई जाती है. उधर से कोई आता है तो दो गोली चलाता है. इशारों में बातचीत होती है. महीने में दोनों ओर के फौजियों के बीच मीटिंग होती है. इस मीटिंग में उनके बीच जानवर की आपसी-वापसी होती है. रात में वे एक साथ बैठकर शराब पीते हैं. बार्डर के दोनों पार एक से गाने गाए जाते हैं. वे आपस में रोटियां भी बांटते हैं. वे बहुत दिलचस्प तरीके से जीते हैं. लोग, लोगों की तरह जीना चाहते हैं. उनके एक तरह के गाने हैं. खाने भी एक तरह के हैं. मैं समझता हूं कि वे जिस तरह जीते हैं, वह बहुत ही खूबसूरत है. हम अखबारों में रोज पढ़ते हैं कि वहां गोलियां चल रही हैं. उनकी सेना हमारी सीमा में घुस आई. वगैरह, वगैरह. लेकिन आप इन सबके बीच झांककर देखिए कि वे कितना खूबसूरत जीवन जीते हैं. जिंदगी ने वहां अपनी खूबसूरती बनाई हुई है. बाकी सुर्खियां हैं. मेरी भूमिका लेखक होने के नाते यह बनती है कि मैं अपने पाठकों को उन खूबसूरत जिंदगियों के बारे में बताऊं.

आपने बहुत सारे फॉर्मेटों पर काम किया है. गाने लिखे. फिल्म की पटकथा लिखी. नज्म लिखे. इस संग्रह में आप कहानियाें के साथ आए हैं. ये सच्ची मालूम पड़ती हैं.

जी हां. संग्रह की सारी कहानियां मेरे अनुभव की कहानियां हैं. पश्चिमी देशों में ‘बायोग्राफिकल नॉवेल’ लिखने का चलन बहुत ज्यादा रहा है. मिसाल के तौर पर, ‘लस्ट फॉर लाइफ’, ‘एगॉनी ऐंड एक्सटेसी’, ‘सेलर ऑन द हॉर्स बैक’. बायोग्राफिकल नॉवेल में तथ्य तो होते हैं लेकिन उसकी तस्वीर भी बना दी जाती है. मैंने मंजरकशी करने की कोशिश की है. मैं समझता हूं कि अगर बायोग्राफिकल नॉवेल लिखे जा सकते हैं तब बायोग्राफिकल शॉर्ट स्टोरीज क्यों नहीं लिखी जा सकती हैं? इससे पहले भी मैंने माइकल एजेंलो पर इस तरह की एक कहानी लिखी थी जो सीबीएससी के पाठ्यक्रम में लगी हुई है.

 

हमने क्या खोया हमने क्या पाया

 

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि बीते दो-तीन दशकों के भीतर हमारे घरों के स्थापत्य कितने बदल गए हैं?  क्या आपको अपने छोटे-छोटे शहरों और कस्बों के वे बड़े-बड़े घर याद आते हैं जिनमें सामने खुला बरामदा होता था, भीतर आंगन और कुआं और फिर पिछवाड़े में अमरूद, अनार, जामुन और मुनगे तक के पेड़? बहुत बचपन में जब पहली बार मैंने बड़े शहरों के ऐसे घरों के बारे में सुना था जिनमें कमरों के साथ ही बाथरूम जुड़ा होता है तो अजीब सी हैरानी हुई थी. फिर जब यह जानकारी मिली कि लोगों को घर के साथ जमीन नहीं मिलती- यानी नीचे वाला हिस्सा किसी और का हो सकता है, ऊपर वाला किसी और का, तो यह हैरानी कुछ और बढ़ गई.

आज 30 साल बाद मैं ऐसे ही फ्लैट में सहजता से रहता हूं जिसकी कल्पना ने कभी मुझे हैरान किया था. कुछ साल पहले जब मेरा बेटा छोटा था तो उसे रांची ले जाकर मैंने कुआं दिखाया. वह जमीन के इतने भीतर छलछलाता पानी देखकर कुतूहल से भरा हुआ था. मैंने उसे बताया कि गर्मियों की सुबह इस कुएं का पानी ठंडा हुआ करता है और सर्दियों की सुबह गर्म- छतों पर लगी हमारी टंकियों से उलट, जहां गर्मी में पानी बिल्कुल खौल जाता है और सर्दी में वह बिल्कुल ठंडा होता है.

इस लेख का मकसद कोई नॉस्टैल्जिया, कोई स्मृतिजीवी उछाह- पैदा करना नहीं है, बस इस तरफ ध्यान खींचना है कि हमारी बेखबरी में हमारा पूरा शहरी जीवन लगभग बदल चुका है. वे आंगन नहीं बचे, जिन्हें किसी ने हार्ट ऑफ द हाउस- घर का हृदय- कहा था. इन आंगनों में दोपहर को अनाज सुखाया जाता था, तार पर कपड़े टांगे जाते थे और सर्दियों की दोपहर और गर्मियों की शाम में परिवार एक साथ बैठा करता था. आंगन के चारों तरफ कमरे होते थे, अलग-सा कोई ड्राइंगरूम या बेडरूम नहीं होता था, जिसमें मेहमान अपनी हैसियत या आत्मीयता के हिसाब से दाखिल हो सकें. घरों के पीछे कोई न कोई ‘बारी’- जो कहीं बाड़ी भी कही जाती है- हुआ करती थी जिसमें कई तरह के पेड़ होते थे. इन पेड़ों पर चढ़ना भी एक कौशल का काम था और जो फुनगी के जितने करीब पहुंचता था वह उतना ही तेज माना जाता था. लोगों को पेड़ों की पहचान बची हुई थी. अब हालत यह है कि पेड़ों से भी हमारा रिश्ता टूटा हुआ है- हमारे लिए सब पेड़ हैं- उलझे हुए हरे धूसर रंग की एक मौजूदगी, जिन्हें बच्चे आम, अमरूद, अनार, इमली, नीम, बेल, पीपल, बड़, मुनगा, सखुआ जैसे नामों से नहीं पहचान पाते.

रसोईघर भी पूरी तरह बदल चुका है. वहां अब डेकची या देगची, लोटे, मथनी, फूल और कांसे की भारी-भरकम थालियों की जगह नहीं है. अब स्टील की नफीस प्लेटें हैं, प्रेशर कुकर है, तरह-तरह के टोस्टर हैं और माइक्रोवेव ओवन भी है. कभी रसोईघर के लिए निहायत जरूरी माना जाने वाला घड़ा गायब हो चुका है और उसकी जगह फ्रिज ने ले ली है. सबसे बड़ा बदलाव यह है कि पुराने चूल्हे खत्म हो गए हैं, उनकी जगह गैस बर्नर और गैस सिलिंडर या पाइपलाइन हैं.

हमारा समय एक विस्थापित समय है. अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ. हमारी ज्यादातर ऊर्जा खुद को इस समय के मुताबिक ढालने में जा रही है

फिर दुहराऊं कि इन पुरानी चीजों की याद दिलाने का मकसद यह बताना नहीं है कि जो पुराना था वह अच्छा था और जो नया है वह बुरा है. सच इसका उल्टा भी है. हमारी समृद्धि ने हमारी सहूलियत बढ़ाई है. गैस चूल्हा आया तो महिलाओं के लिए मुंह अंधेरे उठकर गीली आंखों से सीली लकड़ियों को फूंक मारकर जलाने की मजबूरी खत्म हो गई. रघुवीर सहाय की मशहूर कविता का बिंब जैसे बेकार हो गया- ‘पढ़िए गीता, बनिए सीता, फिर इन सबमें में लगा पलीता, किसी मूर्ख की हो परिणीता, निज घर बार बसाइए. होंय कंटीली अंखियां गीली, लकड़ी सीली, तबीयत ढीली, घर की सबसे बड़ी पतीली भर कर भात पसाइए.‘ अब चावल प्रेशर कुकर में पकता है जिसकी सीटी बता देती है कि खाना तैयार है. फ्रिज ने बार-बार दूध औटाने की मजबूरी खत्म कर दी है और बचपन में जो बर्फ हमें किसी अचरज की तरह दिखती और मिलती थी वह अब बड़ी आसानी से सुलभ है. सिलबट्टे की जगह आ गई मिक्सी की वजह से कई तरह के शेक संभव होने लगे हैं और माइक्रोवेव ओवन के साथ मिलने वाली रेसिपी बुक्स ने डाइनिंग टेबल पर कांटिनेंटल डिशेज की नई गुंजाइश पैदा की है जो हमारे पुराने रसोईघरों में कल्पनातीत थी.

बेशक, इन नए बनते घरों की अपनी सहूलियतें हैं- लोगों को अपना-अपना ‘स्पेस’ मिल रहा है. बच्चे कम हैं और उनके पास सहूलियतें ज्यादा हैं. पहले एक ही मेज पर एक ही टेबल लैंप के नीचे सिर झुकाकर तीन-चार बच्चों को पढ़ना पड़ता था और कई घरों में तो पढ़ने की मेजें भी अलग से नहीं हुआ करती थीं, वहां बिस्तर ही मेज का काम करती थी. अब सबकी अपनी मेज है, और मेज के साथ पूरी व्यवस्था जुड़ी हुई है. इस ढंग से देखें तो जो लोग पुराने दिनों, पुराने घरों, पुरानी रसोई को याद करते हैं वे भावुक स्मृतिजीवी लोग हैं, वे तरक्की को कोसने वाले पोंगापंथी हैं और हर बदलाव को शक की निगाह से देखने वाले परंपराभीरू हैं.

मुश्किल यह है कि यह कह कर हम काम चला नहीं पाते. एक तरफ हम अपना-अपना ‘स्पेस’ बना रहे हैं और दूसरी तरफ पा रहे हैं कि घुटन बढ़ती जा रही है. यह घुटन किस चीज की है?  पारिवारिक या सामाजिक सामूहिकता की जगह जिस निजता का हमने वरण किया था उससे वह एकांत हासिल नहीं होता जिससे सुकून का एहसास हो, उससे अकेलापन मिलता है जो असुरक्षा बोध देता है.

दूसरी बात यह कि हमने जो असबाब जुटा लिया है वह हमारे काम नहीं आ रहा, हमारी जरूरत के मुताबिक नहीं ढल रहा, हम उसके काम आ रहे हैं, उसकी जरूरत के मुताबिक ढल रहे हैं. यह ज्यादातर लोगों का अनुभव है कि जब पहली बार उन्होंने फ्रिज में रखा पानी पिया तो उसके बेस्वाद ठंडेपन ने उन्हें कुछ मायूस किया. इसके मुकाबले सुराहियों और घड़ों में रखा पानी कितना शीतल, मीठा और मिट्टी की खुशबू देने वाला हुआ करता था, अब यह ठीक से याद भी नहीं है. जाड़ों में नौबत यह आ जाती है कि फ्रिज डब्बा हो जाता है और दूध-पानी, फल-सब्जी, आटा, सब मौसम की सहजता के साथ बाहर पड़े रहते हैं.

ऐसे उदाहरण ढेर सारे हैं. रसोईघर की पुरानी जानी-पहचानी खुशबू नहीं बची है. वहां दादी और मां के जमाने में जितनी तरह के व्यंजन चले आते थे, अब नहीं दिखते. सब्ज़ी बनाने की कई विधियां लगता है खत्म होती जा रही हैं. जो नया रेसिपी कल्चर पैदा हो रहा है उसमें उत्सवप्रिय और आयोजनबद्ध उत्साह तो है, वह दैनिक सहजता नहीं है जिसमें कई तरह के मीठे-नमकीन-खट्टे व्यंजनों में खाने की थाली छोटी पड़ जाती थी. फिलहाल यहां मैं सिर्फ स्वाद की बात कर रहा हूं- स्वास्थ्य या साधनों का पक्ष इसमें शामिल नहीं है- क्योंकि मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि क्या यह जीवन हमारे लिए ज्यादा उल्लास, ज्यादा सहजता लेकर आया है, या इसने हमारी मुश्किलें बढ़ाई हैं, हमारा आस्वाद घटाया है.

बेशक, साधनों के हिसाब से कोई कमी आज नहीं है- उल्टे वे बढ़ गए हैं. बच्चों के हाथों में आज इतने और इतनी तरह के खिलौने हैं जिनकी हम कल्पना तक नहीं करते थे. लेकिन अपने सारे अभावों के बावजूद लट्टू नचाते, पतंग उड़ाते, गिल्ली-डंडा से लेकर फुटबॉल, क्रिकेट तक खेलते हुए हमारा जो बचपन कटा, क्या वह आज के मुकाबले कम रचनात्मक या उल्लसित था?  पहले घरों में साइकिल आम होती थी, स्कूटर भी बड़ी बात मानी जाती थी, अब छोटी कार छोटी बात मानी जाती है. लेकिन इन गाड़ियों से हम कहां जाते हैं? ज्यादातर ऐसे दफ्तरों में जिनकी ऊब, यंत्रणा और एकरसता को कोसने में हमारा काफी वक्त जाता है या फिर ऐसे चमचमाते बाजारों में, जहां कोई सामान ख़रीद कर, जहां कुछ खाकर हम अपने भीतर का खालीपन भरने की कोशिश करते हैं.

क्या यह जीवन हमारे लिए ज्यादा उल्लास, ज्यादा सहजता लेकर आया है, या इसने हमारी मुश्किलें बढ़ाई हैं?

लोगों से मिलना-जुलना कम हुआ है. सिर्फ इसलिए नहीं कि हमारे पास समय नहीं है- अगर समय नहीं होता तो हम बाजार और रेस्टोरेंट और सिनेमाघरों में क्यों होते- बल्कि इसलिए कि हमारे पास सरोकार नहीं बचे हैं. न हम किसी को बुलाना चाहते हैं न किसी के घर जाना चाहते हैं- क्योंकि ऐसा आना-जाना हमें अपना और उसका दोनों का वक्त बर्बाद करने जैसा लगता है. आखिर हम एक-दूसरे के बारे में एक-दूसरे को जानकर और बता कर करेंगे भी क्या, क्योंकि वह दूसरा हमारा कोई लगता तो नहीं.

दरअसल कायदे से सोचें तो हमारा समय एक विस्थापित- अपनी जड़ों से उखड़ा हुआ- समय है. हमारी ज्यादातर ऊर्जा खुद को इस समय के मुताबिक ढालने में जा रही है. हम पुराने मकानों को बेच कर छोटे फ्लैट ले रहे हैं, हम घड़ा छोड़कर फ्रिज ले रहे हैं, हम कुओं और आंगनों की जगह बालकनी और गराज जुटा रहे हैं, हम अपनी भाषा छोड़ रहे हैं, अपने गीत-नृत्य, अपनी कलाएं सब भूल रहे हैं- इस भयानक शून्य में हिंदी की औसत फिल्में और टीवी चैनल हमारा इकलौता सहारा रह गए हैं. जीवन बस हमारे लिए शैली है, दृष्टि नहीं.

मैंने यह सब किसी निर्णायक ढंग से नहीं लिखा है. इस दौर में हमने जो पाया है, वह तो बहुत स्पष्ट है. यह लेख इस बात का हिसाब लगाने की कोशिश है कि जो कुछ हमने हासिल किया है उसकी किस-किस रूप में कैसी-कैसी कीमत चुकाई है क्योंकि कोई चीज़ मुफ़्त में नहीं मिलती- कम से कम इस नई अर्थव्यवस्था में तो नहीं ही. अगर सारी तरक्की के बावजूद कोई तनाव हमें तोड़ रहा है, सारी संपन्नता के बावजूद कोई कमी हमें साल रही है तो उसका हिसाब भी लगाना जरूरी है. हो सकता है, यह हिसाब पक्का न हो, या आधा-अधूरा हो लेकिन इसके बारे में सोचिए.

 

‘हम पैसे, बाहुबल और जाति वाली राजनीति बदलने आए हैं’

वी बालाकृष्णन. उम्र-49 वर्ष. पूर्व सीएफओ, इंफोसिस. बैंगलोर सेंट्रल
वी बालाकृष्णन. उम्र-49 वर्ष. पूर्व सीएफओ, इंफोसिस. बैंगलोर सेंट्रल.
फोटोः केपीएन

शुरुआत से ही आम आदमी पार्टी का विचार मेरे दिल के बहुत करीब था. दिल्ली विधानसभा चुनावों में पार्टी की सफलता एक अहम मोड़ थी. तभी मैंने सोचा कि मुझे इस नई धारा समर्थन करना चाहिए. यह सिर्फ एक पार्टी नहीं थी. मेरा यकीन कीजिए, मैं किसी पारंपरिक पार्टी में जा ही नहीं सकता था.

मीडिया में कहा जा रहा है कि लोग जाति और दूसरे कई समीकरणों के आधार पर वोट करते हैं. मेरी पृष्ठभूमि मध्यवर्ग की है इसलिए यह मानना कि अलग-अलग वर्गों के लोग मुझे किसी अलग तरह से देखेंगे, गलत होगा. दिल्ली ने चीजें बदल दी हैं और आगे के लिए रास्ते खोले हैं. अब तक राजनीति पैसे, बाहुबल और जाति की ताकत के आधार पर चलती रही. हम उसे बदलने आए हैं.

एक तरफ दो नेता हैं जो खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की तरह पेश कर रहे हैं. यह अमेरिकी शैली है. लेकिन अमेरिका के उलट उनमें आपस में कोई बहस नहीं हो रही. बहस की छोड़िए. हमारे नेता तो एक खुले इंटरव्यू तक के लिए तैयार नहीं होते. कोई उनसे कैसे भी सवाल पूछेगा, इस विचार से ही वे असहज महसूस करते लगते हैं. सवाल उठता है कि ऐसे लोग अपने को नेता कैसे कहते हैं.

इस तरह से देखें तो अरविंद केजरीवाल ने लोगों को दिखाया है कि जवाबदेही क्या होती है. मीडिया में कहा जा रहा है कि हम आर्थिक विकास के खिलाफ हैं. जबकि देखा जाए तो हमारी वित्तीय नीति सबसे उदार है.जहां तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का सवाल है तो वह निश्चित तौर पर एक विवादास्पद मुद्दा है. यहां तक कि भाजपा भी इसका समर्थन नहीं कर रही जैसा हमने राजस्थान में देखा. हम हर उस व्यक्ति के साथ हैं जो ईमानदारी से कारोबार करना चाहता है. हम एक ऐसा माहौल बनाएंगे जहां हर आदमी ईमानदारी से कारोबार कर सके.

यह सिर्फ मुकेश अंबानी और रिलायंस की बात नहीं है. हमें क्रोनी कैपिटलिज्म (कॉरपोरेट और सरकार के गठजोड़) के खिलाफ खड़ा होना होगा. आप ही देखिए. हमसे से कौन जानता है कि राजनीतिक पार्टियों को फंड कहां से मिलता है. यही वह जगह है जहां हमें एक लकीर खींचनी है.

हम यह सुनिश्चित करेंगे कि लोग इज्जत से रह सकें. हम साफ फुटपाथ और बेहतर सड़कें देंगे. हम लोगों की उम्मीदें पूरी करेंगे और इसके लिए हम भाषा, जाति या इस तरह के किसी राजनीतिक पैंतरें का सहारा नहीं लेंगे.

(जी विष्णु से बातचीत पर आधारित)

मंझधार से अखबार तक

2001 भारतीय पत्रकारिता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था. इस साल तहलका ने ऑपरेशन वेस्ट एंड के जरिए तमाम महत्रवपूर्ण लोगों को रक्षा सौदों में दलाली के लिए रिश्वत लेते हुए अपने खुफिया कैमरों में कैद किया. पहली बार ऐसी सच्चाइयां दुनिया के सामने आईं जिन्नेहोंने सबूतों की दुहाई देकर बच निकलने के रास्ते सीमित कर दिए. मगर तब की केंद्र सरकार ने इन उघड़ी सच्चाइयों पर कोई कार्रवाई करने की बजाय उल्टा तहलका के खिलाफ ही एक अभियान छेड़ दिया. तरह-तरह की संस्थाओं से तहलका की हर तरह की जांचें करवाई गईं और उसे बंद होने के लिए मजबूर कर दिया गया. आज ग्यारह साल बाद उसी ऑपरेशन वेस्ट एंड से जुड़े एक मामले में बंगारू लक्ष्मण को अदालत ने दोषी करार दिया है. उन्हें चार साल की सजा सुनाई गई है.

बंगारू लक्ष्मण अकेले नहीं हैं. समता पार्टी की तत्कालीन अध्यक्षा जया जेटली भी रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज के सरकारी आवास में धन लेते हुए कैमरे की जद में आईं. उनकी पार्टी के कोषाध्यक्ष आरके जैन भी पैसा लेते हुए पकड़े गए. घूस का दलदल सिर्फ राजनीति महकमे तक ही सीमित नहीं था. सेना और नौकरशाही के तमाम आला अधिकारी भी पैसे लेते हुए नजर आए. लेफ्टिनेंट जनरल मंजीत सिंह अहलूवालिया, मेजर जनरल पीएसके चौधरी, मेजर जनरल मुर्गई, ब्रिगेडियर अनिल सहगल इनमें से कुछेक नाम हैं. रक्षा मंत्रालय के दूसरे सबसे बड़े अधिकारी आईएएस एलएम मेहता भी इसी सूची में हैं.

इस भ्रष्टाचार की परतें जब उखड़नी शुरू हुई तो सामने आया कि आरएसएस के ट्रस्टी आरके गुप्ता और उनके बेटे दीपक गुप्ता जैसे लोग भी हथियारों की खरीद में दलाली करते हैं. सीबीआई ने तहलका के ऑपरेशन वेस्ट एंड से जुड़े नौ मामले दर्ज कर रखें हैं. इसके अलावा दो मानहानि के दावे तहलका के खिलाफ उन लोगों ने दायर किए हैं जो इस मामले में घूस लेते हुए पकड़े गए थे.

2004 में तहलका की अंग्रेजी अखबार के रूप में वापसी के पहले अंक में इसकी यात्रा पर लिखा गया मैनेजिंग एडिटर शोमा चौधरी का यह लेख तहलका की अब तक की यात्रा और संघर्षों पर समग्र रोशनी डालता है.

तहलका के पहले अंक तक का इंतजार हमारे लिए बहुत लंबा रहा. इंतजार के इस सफर में काफी मुश्किलें भी आईं. दो बार तो ऐसा हुआ कि पूरी तैयारी के बावजूद हम शुरुआत में ही लड़खड़ा गए. महीने गुजरते गए और मुश्किलों का अंधेरा कम होने के बजाय और घना होता गया. लेकिन अब तीस जनवरी को हम फिर एक नई शुरुआत कर रहे हैं. नए ऑफिस में टाइपिंग की खटखट शुरू हो चुकी है.खिड़की से नजर आ रहा अमलतास का पेड़ मुझे पुराने और बंद हो चुके आफिस की याद दिला रहा है. हर किसी को बेसब्री से कल का इंतजार है.कल सुबह लोग जब तहलका अखबार पढ़ रहे होंगे तो यह केवल हमारी जीत नहीं होगी, ये उन हजारों भारतीयों की भी जीत होगी जिन्होंने हम पर भरोसा किया.

इस जीत के मायने महज एक अखबार निकाल लेने की सफलता से कहीं ज्यादा गहरे होंगे.शायद इस जीत का मतलब उस सफर से भी निकलता है जो हमने तय किया. तहलका अब सिर्फ एक अखबार की कहानी नहीं रही. जैसे-जैसे वक्त गुजरता गया, तहलका के साथ हुई घटनाओं ने तहलका शब्द को लोगों के दिल में बसा दिया. तहलका कास‌फर गुस्सा, निराशा, ऊर्जा और स‌पनों के मेल से बना है. ये सिर्फ हमारी कहानी नहीं है. ये उम्मीद, आत्मविश्वास और आदर्शवाद की ताकत की कहानी है.उससे भी ज्यादा ये एकता और सकारात्मक सोच की ताकत का स‌बूत है. तहलका का अखबार के रूप में लोगों तक पहुंचना कोई छोटी बात नहीं है. इससे यह साबित होता है कि आम लोग सही चीजों के लिए लड़ स‌कते हैं, और न केवल लड़ सकते हैं बल्कि जीत भी स‌कते हैं.

तहलका का अखबार के रूप में लोगों तक पहुंचना कोई छोटी बात नहीं है. इससे यह साबित होता है कि आम लोग सही चीजों के लिए लड़ स‌कते हैं, और न केवल लड़ सकते हैं बल्कि जीत भी स‌कते हैं.पिछले दो साल के दरम्यान ऐसे कई ऐसे लम्हे आए जब तहलका का नामोनिशां मिट सकता था. रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार को उजागर करते स्टिंग आपरेशन से हमें सुर्खियां तो मिलीं पर दूसरी तरफ हमें स‌रकार से दुश्मनी की कीमत भी चुकानी पड़ी. जान से मारने की धमकियां, छापे, गिरफ्तारियां और पूछताछ के उस भयावह सिलसिले की याद आज भी रूह में सिहरन पैदा कर देती है. बढ़ते कर्ज के बोझ के बाद ऑफिस भी बस किसी तरह चल पा रहा था. लेकिन जिस चीज ने हमें सबसे ज्यादा तोड़कर रख दिया वो थी ‘बड़े’ लोगों का डर और हमारे मकसद के प्रति उनकी शंका. हमें बधाइयां और तारीफें तो मिलीं लेकिन ऎसे कम ही लोग मिले जिन्हें यकीन था कि हमने ये काम देश और जनता की भलाई के लिए किया. लोग पूछते थे कि हमने इस स्टिंग आपरेशन से कितना मुनाफा बटोरा. कइयों ने ये भी पूछा कि तहलका में किस बड़े आदमी का पैसा लगा है. कोई ये यकीन करने को तैयार नहीं था कि ये काम केवल पत्रकारिता की मूल भावना के तहत किया गया जिसका मकसद है स‌च दिखाना.

स‌रकार ने हम पर सीधा हमला तो नहीं किया लेकिन हमें कानूनी कार्रवाई के एक ऎसे जाल में उलझा दिया जिससे हमारा सांस लेना मुश्किल हो जाए.तहलका में पैसा निवेश करने वाले शंकर शर्मा को बगैर कसूर जेल में डाल दिया गया और कानूनी कार्रवाई की आड़ में उनका धंधा चौपट करने की हर मुमकिन कोशिश की गई. हमने कई बार खुद से पूछा कि तहलका और उसके अंजाम को कौन सी चीज खास बनाती है. जवाब बहुत सीधा है- शायद इसका असाधारण साहस. भ्रष्टाचार को इस कदर निडरता से उजागर करने की कोशिश ने ही शायद तहलका को तहलका जैसा बना दिया.तहलका लोगों के जेहन में रच बस गया. अरुणाचल की यात्रा कर रहे एक दोस्त ने हमें बताया कि उसने एक गांव की दुकान में कुछ साड़ियां देखीं जिन पर तहलका का लेबल लगा हुआ था. एक और मित्र ने हमें बीड़ी के एक विज्ञापन के बारे में बताया जिसमें तहलका शब्द का प्रमुखता से इस्तेमाल किया गया था. हमें ऎसा लगा कि लोग अब हमें कम से कम जानने तो लगे हैं. तहलका नैतिकता की लड़ाई की एक कहानी बन चुका था. हमें लगा कि बिना लड़े और बगैर प्रतिरोध हारने का कोई मतलब नहीं. इसी विचार ने हमें ताकत दी.हालांकि ये काम आसान नहीं था. स‌रकार के हमारे खिलाफ रुख के चलते लोग हमसे कतराते थे.थोड़े शुभचिंतक-जिनमें कुछ वकील और कुछ दोस्त शामिल थे-हमारे साथ खड़े रहे लेकिन ज्यादातर प्रभावशाली लोग तहलका का नाम सुनते ही किनारा कर लेते थे. उद्योगपति, बैंक, बड़े लोग…..हमने स‌ब जगह कोशिश की लेकिन चाय के लिए पूछने से ज्यादा तकलीफ हमारे लिए कोई नहीं उठाना चाहता था.

तहलका का नाम अगर लोगों को खींचता था तो उसका अंजाम हमारे लिए अभिशाप भी बन जाता था. इस बात पर स‌ब एक राय थे कि तहलका एक तूफानी ब्रांड है लेकिन तूफान से दोस्ती कर कौन मुसीबत मोल ले. लगातार मिल रही नाकामयाबी ने हमारे भीतर कहीं न कहीं फिर से वापसी का जज्बा पैदा कर दिया. मुझमें, स‌बमें, लेकिन खासकर तरुण में. तरुण फिर से वापसी के लिए इरादा पक्का कर चुके थे. लेकिन इस काम में कोई थोड़ी सी भी मदद के लिए तैयार नहीं था.हमें बधाइयां और तारीफें तो मिलीं लेकिन ऎसे कम ही लोग मिले जिन्हें यकीन था कि हमने ये काम देश और जनता की भलाई के लिए किया. लोग पूछते थे कि हमने इस स्टिंग आपरेशन से कितना मुनाफा बटोरा.फिर से वापसी के बुलंद इरादे और इसमें आ रही मुसीबतों ने हमारे भीतर कुछ बदलाव ला दिए. मुश्किलें जैसे-जैसे बढती गईं, गुस्से और हताशा की जगह उम्मीद लेने लगी. हर एक मुश्किल को पार कर हम हैरानी से खुद को देखते थे और सोचते थे “अरे ये तो हो गया, हम ऎसा कर स‌कते हैं.”कहानी आगे बढ रही थी. तरुण जमकर यात्रा कर रहे थे. त्रिवेंद्रम, उज्जैन,नागपुर, भोपाल, गुवाहाटी, कोच्चि, राजकोट, भिवानी, इंदौर में वो लोगों से मिलकर स‌मर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे थे.तरुण के जोश की बदौलत तहलका को लोगों की ऊर्जा मिलती गई. यह एक कैमिकल रिएक्शन की तरह हुआ.

लोगों की ऊर्जा और उम्मीदों ने हमारे इरादे को ताकत दी. ये अब केवल हमारी लड़ाई नहीं रह गई थी. इसने एक बड़ी शक्ल अख्तियार कर ली थी.मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह याद है जब तरुण ने हमें बुलाया और कहा कि हम अखबार निकालने वाले हैं. ये काफी हिम्मत का काम था. पैसे तो बहुत पहले ही खत्म हो गए थे. जनवरी 2002 तक तो ऎसा कोई भी दोस्त नहीं था जिससे हम उधारन ले चुके हों. मई आते-आते आफिस भी बंद हो गया. उसके बाद कई महीने पैसे जुटाने की भागा दौड़ी और जांच कमीशन से निपटने के लिए कानूनी रणनीति बनाने में निकल गए. अब हम केवल छह लोग रह गए थे. तरुण, उनकी बहन नीना, मैं,हमारे एकाउंटेंट बृज, डेस्कटाप आपरेटर प्रवाल और स्टेनोग्राफर अरुण नायर.स‌बका मकस‌द एक ही था. तहलका का वजूद अब हमारे जेहन में ही स‌ही, पर काफी मजबूत हो चुका था.

तब तक हम पुराने वाले आफिस में ही थे यानी D-1,स्वामीनगर. लेकिन हमारे पास दो छोटे से कमरे ही बचे थे और पेट्रोल का खर्चा चुकाने के लिए हमें कुर्सियां बेचनी पड़ रही थीं. मकान मालिक के भले स्वभाव का हम काफी इम्तहान ले चुके थे. हमें जगह बदलनी थी और कोई हमें रखने के लिए तैयार नहीं था.लेकिन हमारा उत्साह कम नहीं हुआ. हम एक महत्वपूर्ण मोड़ के पार निकल चुके थे. एक हफ्ता पहले हमने जांच कमीशन से अपना पल्ला झाड़ लिया था.राम जेठमलानी ने बड़ी ही कुशलता से तहलका और इसकी निवेशक कंपनी फर्स्टग्लोबल के खिलाफ स‌रकारी केस के परखच्चे उड़ा दिए थे. जस्टिस वेंकटस्वामी अपनी अंतरिम रिपोर्ट तैयार कर चुके थे. डरी हुई स‌रकार ने जस्टिस वेंकटस्वामी को बदलकर जांच की कमान जस्टिस फूकन को थमा दी. खबरें आ रहीं थीं कि जांच एक बार फिर से शुरू होगी. लेकिन हमारे लिए अब और बर्दाश्त करना मुमकिन नहीं था. हमने जांच में पूरा स‌हयोग किया था. लेकिन स‌रकार ये गतिरोध खत्म करने के मूड में ही नहीं थी. हमने फैसला किया कि बहुत हो चुका, अब इस अन्याय को बर्दाश्त करने का कोई मतलब नहीं. हमने नए कमीशन से हाथ पीछे खींच लिए.

ये तहलका की कहानी के पहले अध्याय या कहें कि तहलका-1 का अंत था. इसने एक तरह से हमें बड़ी राहत दी. हम मानो मौत के चंगुल से आजाद हो गए. बचाव के लिए दौड़-धूप करने में ऊर्जा बर्वाद करने की बजाय हम अब अपने मकसद पर ध्यान दे स‌कते थे.पैसा जुटाने के लिए एक साल की दौड़-धूप के बाद तरुण को दो ऑफर मिले जिसमें से हर एक में दस करोड़ रुपये की पेशकश की गई थी. लेकिन तरुण ने उन्हें ठुकरा दिया क्योंकि वे तहलका की मूल भावना के खिलाफ जाते थे. अब तरुण ने कुछ नया करने की सोची. उन्होंने सुझाव दिया कि लोगों के पास जाए और एक राष्ट्रीय अभियान चलाकर आम लोगों से तहलका शुरू करने के लिए पैसा जुटाया जाए. मैंने कमरे में एक नजर डाली. हम सब लोग तो लगान की टीम जितने भी नहीं थे.वो एक अजीब सा दौर था. कुछ स‌मय पहले हमारी जिंदगी में गुजरात के एक व्यापारी और राजनीतिक कार्यकर्ता निरंजन तोलिया का आगमन हुआ था.(तहलका की कहानी में ऎसे कई सुखद पल आए जब अलग-अलग लोगों ने इस लड़ाई में हमारे साथ अपना कंधा लगाया. इससे हमें कम से कम ये आभास हुआ कि हम अकेले नहीं हैं.) तोलिया जी ने साउथ एक्सटेंशन स्थित अपने ऑफिस में हमें दो कमरे दे दिए. तहलका को फिर से शुरुआत के लिए थोड़ी सी जमीन मिली. हम रोज आफिस में जमा होते, चर्चा करते और योजनाएं बनाते. हमें यकीन था कि अखबार शुरू करने के लिए लाखों लोग पैसा देने के लिए तैयार हो जाएंगे.

अब स‌वाल था कि उन तक पहुंचा कैसे जाए. कई आइडिये सामने आए-स्कूलों, पान की दुकानों,एसटीडी बूथ्स और एसएमएस के जरिये कैंपेन, मानव श्रंखला अभियान आदि. रोज एक नया आइडिया सामने आता था. इनमें से कुछ तो अजीबोगरीब भी होते थे,मिसाल के तौर पर गुब्बारे और स्माइली बटन जिन पर तहलका लिखा हो. हमने उनलोगों की सूची बनाना शुरू किया जिनसे मदद मिल स‌कती थी. रोज होती बहस के साथ हमारा प्लान भी बनता जाता था. आखिरकार एक दिन हमारा मास्टर प्लान तैयार हो गया. जोश की हममें कोई कमी नहीं थी. दिल्ली में स‌ब्स‌क्रिप्शन का टारगेट रखा गया 75,000 कापियां. तहलका का नाम अगर लोगों को खींचता था तो उसका अंजाम हमारे लिए अभिशाप भी बन जाता था. इस बात पर स‌ब एक राय थे कि तहलका एक तूफानी ब्रांड है लेकिन तूफान से दोस्ती कर कौन मुसीबत मोल ले.लेकिन अस‌ली इम्तहान तो इसके बाद होना था. हमारे पास न पैसा था और न ही संसाधन. यहां तक कि आफिस में एक एसटीडी लाइन भी नहीं थी. इसके बगैर योजना को अमली जामा पहनाने के बारे में सोचना भी मुश्किल था.

कल जब अखबार निकलेगा तो डेढ़ लाख एडवांस कापियों का आर्डर चार महानगरों के जरिये पूरे देश के पाठकों तक पहुंचेगा. तहलका का पुनर्जन्म बिना थके आगे बढ़ने की भावना की जीत है. देखा जाए तो कर्ज में डूबे चंद लोगों द्वारा दो कमरों से एक राष्ट्रीय अखबार निकालने की बात किसी स‌पने जैसी ही लगती है. लेकिन हमारे भीतर एक अजीब सा उत्साह भरा हुआ था. कभी भी ऎसा नहीं लगा कि ये नहीं हो पाएगा. इसका कुछ श्रेय तरुण के बुलंद इरादों को भी जाता है और कुछ हमारे जोश को. कभी-कभार हम अपनी इस हिमाकत पर खूब हंसते भी थे. स‌च्चाई यही थी कि हमें आने वाले कल का जरा भी अंदाजा नहीं था. तरुण ने एक मंत्र अपना लिया था. वे अक्सर कहते थे- ये होगा, जरूर होगा, शायद उन्होंने स‌कारात्मक रहने की कला विकसित कर ली थी.

लेकिन 26 जनवरी 2003 की तारीख हमारे लिए एक बड़ा झटका लेकर आई. हमारे स्टेनोग्राफर अरुण नायर की एक स‌ड़क हादसे में मौत हो गई. दुख का एक साथी, जिसने तहलका के भविष्य के लिए हमारे साथ ही स‌पने देखे थे, महज स‌त्ताईस साल की उम्र में हमारा साथ छोड़ गया. इस घटना ने हमें तोड़कर रख दिया. अखबार निकालने की तैयारी कर रहे हम लोगों को उस स‌मय पहली बार लगा कि शायद अब ये नहीं हो पाएगा. हमें महसूस हुआ मानो कोई अभिशाप तहलका का पीछा कर रहा है. तहलका की कहानी के कई मोड़ हैं. इनमें एक वो मोड़ भी है जब जनवरी के दौरान बैंगलोर की एक मार्केटिंग कंपनी एरवोन ने हमसे संपर्क किया. कंपनी के पार्टनर्स में से एक राजीव नारंग तरुण के कालेज के दिनों के दोस्त थे. तरुण के इरादों से प्रभावित होकर उन्होंने तहलका को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव रखा. हमारी उम्मीद को कुछ और ताकत मिली. राजीव ने जब हमारा प्लान देखा तो उन्होंने कहा कि इसे फिर से बनाने की जरूरत है. उन्होंने सुझाव दिया कि हम बैंगलोर जाएं और उनके पार्टनर्स को तहलका कैंपेन की जिम्मेदारी लेने के लिए राजी करें.अब कमान एरवोन के प्रोफेशनल्स के हाथ में थी. ये हमारे साथ तब हुआ जब हमें इसकी स‌बसे ज्यादा जरूरत थी. एरवोन के काम करने के तरीके ने हममें नया जोश भर दिया. योजना बनी कि पूरे देश में एक जबर्दस्त स‌ब्सक्रिप्शन अभियान शुरू किया जाए. मार्केटिंग के मामले में अनुभवी एरवोन की टीम ने अनुमान लगाया कि तहलका के नाम पर ही कम से कम तीन लाख एडवांस स‌ब्सक्रिप्शंस मिल जाएंगे. लेकिन कैंपेन चलाने के लिए भी तो पैसे की जरूरत थी. ऎसे में हमारे दोस्त और शुभचिंतक अलिक़ पदमसी ने हमें एकरास्ता सुझाया. ये था- फाउंडर स‌ब्सक्राइबर्स का, यानी ऎसे लोग जो इस कामके लिए एक लाख रुपये का योगदान कर स‌कें.

एक बार फिर तरुण की देशव्यापी यात्रा शुरू हुई. महीने में 25 दिन तरुण ने लोगों से बात करते हुए बिताए. नाइट क्लबों, आफिसों और ऎसी तमाम जगहों में, जहां कुछ फाउंडर स‌ब्सक्राइबर्स मिल स‌कते थे, बैठकें रखी गईं. हालांकि उस वक्त तक भी स‌रकार से पंगा लेने का डर लोगों के दिलों में तैर रहा था. अप्रैल में हमें विक्रम नायर के रूप में पहला फाउंडर स‌ब्सक्राइबर मिला. इसके बाद दूस‌रा फाउंडर स‌ब्सक्राइबर मिलने में तीन हफ्ते लग गए. फिर धीरे-धीरे ये सिलसिला बढने लगा. हालांकि इस दौरान तरुण लगभग अकेले ही थे. मां बनने की वजह से मैं घर पर ही रहती थी. तोलिया जी जगह बदलकर पंचशील आ गए थे इसलिए हमें भी आफिस बदलना पड़ा था. ये जिम्मेदारी नीना के कंधों पर आ गई थी. तरुण की पत्नी गीतन घर संभालने की पूरी कोशिश कर रही थीं. बृज और प्रवाल भी अपनी जिम्मेदारी संभाल रहे थे.इसके बाद मोर्चा संभालने का काम एरवोन का था.हम केवल छह लोग रह गए थे. तरुण, उनकी बहन नीना, मैं, हमारे एकाउंटेंट बृज, डेस्कटाप आपरेटर प्रवाल और स्टेनोग्राफर अरुण नायर. स‌बका मकस‌द एक ही था. तहलका का वजूद अब हमारे जेहन में ही स‌ही, पर काफी मजबूत हो चुका था. धीरे-धीरे एरवोन की योजना रंग लाने लगी. मई के आखिर में जब मैंने फिर से ज्वाइन किया तब तक चौदह अच्छी खासी कंपनियों ने तहलका कैंपेन के लिए मचबूती से मोर्चा संभाल लिया था. इनमें O&M, Bill Junction, Encompass जैसे बड़े नाम शामिल थे. एडवरटाइजिंग कंपनियां, कॉल सेंटर्स, SMS सेवाएं,साफ्टवेयर कंपनियां हमारे इस अभियान को स‌फल बनाने के लिए तैयार थीं. और इसके लिए उन्हें स‌फलता में अपना हिस्सा चाहिए था.

जिस अंधेरी सुरंग से हम गुजर कर आए थे उसे देखते हुए ये उम्मीद की किरण नहीं बल्कि आशाओं की बड़ी दीवाली थी. मैंने थोड़ा राहत की सांस ली. हमने अपनी नियति को कुशल प्रोफेशनल्स के हाथ में सौंप दिया था. आखिरकार हम उस अंधेरी सुरंग के बाहर निकल आए थे. कैंपेन की तारीख 15 अगस्त 2003 तय की गई. फिर शुरू हुआ तैयारी का दौर.प्लान बना कि इस मिशन को अंजाम तक पहुंचाने के लिए चार हजार जागरूक नागरिकों की फौज तैयार की जाए. इन लोगों को हमने ‘क्रूसेडर’ नाम दिया यानी अच्छाई के लिए लड़ने वाले लोग. क्रूसेडर्स को ट्रेनिंग दी जानी थी और तहलका के प्रचार के साथ उन्हें स‌ब्सक्रिप्शन जुटाने का काम भी करना था जिसके लिए कमीशन दिया जाना तय हुआ. अभियान सात शहरों में चलाया जाना था. हवा बनने लगी. ट्रेनिंग मैन्युअल्स, प्रोडक्ट ब्राशर, टीशर्ट जैसी प्रचार सामग्रियां तैयार की गईं. उधर फाउंडर स‌ब्सक्राइबर्स अभियान भी ठीकठाक चल रहा था. यानी अभियान को स‌फल बनाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई.तारीख कुछ आगे खिसकाकर 22 अगस्त कर दी गई. अखबार 30 अक्टूबर को आना था.21 अगस्त को दिल्ली में कुछ होर्डिंग्स लगाए गए. उन पर लिखा था कि तहलका एक अखबार के रूप में वापस आ रहा है. हम पूरी रात शहर में घूमे और इनहोर्डिंग्स को देखकर बच्चों की तरह खुश होते रहे. अगले दिन प्रेस कांफ्रेंस के बाद हम एक स्कूल आडिटोरियम में इकट्ठा हुए. जोशो खरोश के साथ 1200 क्रूसेडर्स की टीम को संबोधित किया गया. अगले दो दिन तक हमें स‌ब्सक्रिप्शंस का इंतजार करना था.लेकिन हमारी सारी उम्मीदें औंधे मुंह गिरीं. 1200 क्रूसेडर्स की जिस टीम को बनाने में छह महीने लगे थे वह जल्द ही गायब हो गई. किसी भी कंपनी का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा. आने वाले हफ्तों में हम लांच अभियान के तहत चंडीगढ़, मुंबई, पुणे, बेंगलौर, चेन्नई गए मगर स‌ब जगह वही कहानी देखने को मिली. आशाओं का महल भर भराकर गिर गया. इससे बुरा हमारे साथ कुछ नहीं हो स‌कता था. हर एक ने अपना हिस्सा मांगा और अलग हो गया.

हालांकि एरवोन हमारे साथ खड़ी रही. लेकिन तहलका का दूसरा अध्याय पहले से ज्यादा कष्टकारी था. एक साल बीत चुका था और हमारा आत्मविश्वास लगभग टूट चुका था. हमें लगा कि हम और भी अंधेरी सुरंग में फंस गए हैं. ये सुरंगपहली वाली से कहीं ज्यादा लंबी थी.

तहलका-3, यानी अखबार शुरू होने की कहानी के तीसरे भाग की अवधि सिर्फ तीन महीने है. किसी को भी पूरी तरह ये अंदाजा नहीं था कि हार कितनी पास आ गई थी.मंझधार से अखबार तक भाग-3 ये सितंबर का आखिर था. और हम स‌भी अब भी यकीन नहीं कर पा रहे थे कि हमारा कैंपेन नाकामयाब हो चुका है. सच्चाई तो ये थी कि कैंपने ढंग से शुरू ही नहीं हो पाया था. तहलका में पहली बार ऎसा दौर आया था कि जी हल्का करने के लिए हंसना भी बड़ी हिम्मत का काम था. हमें मालूम था कि अब हमारे पास कोई मौका नहीं है. धीरे-धीरे हमारी ताकत खत्म हो रही थी. हालात काफी अजीब हो गए थे. अब ऎसा कोई नहीं था जिसका दरवाजा खटखटाया जाए. एरवोन ने दिल से हमारे लिए काम किया था. वे ऎसे वक्त में हमसे जुड़े थे जब कोई भी हमारे पास आने की हिम्मत नहीं कर रहा था. बिना कोई फीस लिए उन्होंने हमारे लिए काफी कुछ करने की कोशिश की थी. लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ. लड़ाई जारी थी और हमारे हथियार खत्म हो चुके थे. अक्टूबर आते-आते हम ग्रेटर कैलाश स्थित अपने आफिस में जस्टिस वेंकटस्वामी अपनी अंतरिम रिपोर्ट तैयार कर चुके थे. डरी हुई स‌रकार ने जस्टिस वेंकटस्वामी को बदलकर जांच की कमान जस्टिस फूकन को थमा दी. खबरें आ रहीं थीं कि जांच एकबार फिर से शुरू होगी. लेकिन हमारे लिए अब और बर्दाश्त करना मुमकिन नहीं था. दलदल में गहरे धंसने के बावजूद हमें आगे बढ़ना था. इसलिए कि हमें अपने वादों की लाज रखनी थी. कुछ अच्छे पत्रकार हमारे साथ जुड़े. फाउंडर स‌ब्सक्राइबर्स से अब भी कुछ पैसा आ रहा था. लेकिन ज्यादातर पैसा कैंपेन में खर्च हो चुका था.

15 अक्टूबर को तरुण ने हम स‌बको बुलाया और कहा कि हम 15 नवंबर को अखबार निकालेंगे. तब ये मानना मुश्किल था लेकिन अब लगता है कि ये हताशा में उठाया गया हिम्मत भरा कदम था. हमें लग रहा था कि अब इस लड़ाई का अंत निकट है. लेकिन हमारे लिए और उन स‌भी लोगों के लिए जिन्होंने हम पर भरोसा जताया था, अखबार का एक इश्यू निकालना तो कम से कम जरूरी था. दिल के किसी कोने में ये उम्मीद भी थी कि किसी तरह अगर हम अखबार निकालने में कामयाब हो जाएं तो शायद कोई चमत्कार हो जाए. आशावाद को हमने जीवन का मंत्र बना लिया. एरवोन ने प्लान बी का सुझाव दिया लेकिन तब तक हम बंद कमरे में लैपटाप पर बनाए गए प्लान के नाम से ही डरने लगे थे. हमारे पास सिर्फ योजनाओं के बूते अच्छे स‌पने देखने की ऊर्जा खत्म हो गई थी. हम 15 नवंबर की तरफ बढते गए. अचानक तरुण के एक दोस्त स‌त्याशील का हमारी जिंदगी में आगमन हुआ. दिल्ली के इस व्यवसायी ने बुरे वक्त के दौरान कई बार तरुण की मदद की थी. स‌त्या को ये जानकर धक्का लगा कि हम कहां पहुंच गए थे. उन्होंने तरुण को सुझाव दिया कि तीन साल की मेहनत और मुसीबतों को यूं ही हवा में उड़ाना ठीक नहीं और बेहतर है कि एक नए प्लान पर काम किया जाए. हमने स‌भी पार्टनर्स के साथ एक मीटिंग की.स‌त्या इसमें मौजूद थे. ये शोर शराबे से भरी मीटिंग थी जिसके बाद हमारे कुछ दिन बेकार की दौड़-धूप में बीते. हालांकि इसका एक फायदा ये हुआ कि हमारी अफरातफरी और डर खत्म हो गया. एक बार फिर हमारा ध्यान बड़े लक्ष्य पर केंद्रित हो गया. तहलका के अनुभव इससे जुड़े हर एक शख्स के लिए कई मायनों में कायापलट की तरह रहे. इन अनुभवों ने हमें कई चीजें सिखाईं. तहलका-2 से स‌बसे महत्वपूर्ण बात जो हमने सीखी वो ये थी कि बड़े स‌पनों को साकार करने के लिए अच्छी योजनाओं के साथ-साथ काम करने वाले लोग भी चाहिए. हमने इसी दिशा में काम शुरू किया.

अक्टूबर के आखिर तक हम अपने बिखरे स‌पनों के टुकड़े स‌मेटने में लगे थे.एरवोन भी अब तक जा चुकी थी. हमने फिर से लांच की एक नई तारीख तय की-30जनवरी 2004. धीरे-धीरे, कदम दर कदम काम शुरू होने लगा. अफरा तफरी का दौर अब पीछे छूट चुका था. संसाधन बहुत ज्यादा नहीं थे लेकिन अब हमारे साथ कई लोगों की किस्मत भी जुड़ी थी. तरुण ने एक बार फिर हमें बिना थके आगे बढने का संकल्प याद दिलाया. हम स‌ब ने फिर कंधे मिला लिए. पत्रकारों,डिजाइनर्स, प्रोडक्शन-प्रिंटिंग-सरकुलेशन एक्सपर्ट्स, एड सेल्समैन आदि की एक टीम तैयार की गई. ये एक जुआ था. लेकिन इसमें जीत की अगर थोड़ी सी भी संभावना थी तो वो तभी थी जब हम मैदान छोड़े नहीं. हमें लग रहा था कि अब इस लड़ाई का अंत निकट है. लेकिन हमारे लिए और उन स‌भी लोगों के लिए जिन्होंने हम पर भरोसा जताया था, अखबार का एक इश्यू निकालना तो कम से कम जरूरी था. दिल के किसी कोने में ये उम्मीद भी थी कि किसी तरह अगर हम अखबार निकालने में कामयाब हो जाएं तो शायद कोई चमत्कार हो जाए.फाउंडर स‌ब्सक्राइबर्स का सिलसिला बना हुआ था. ये स‌चमुच किसी ऎतिहासिक घटना की तरह हो रहा था. अक्सर हमें तहलका में भरोसा जताती चिट्ठियां मिलती थीं. एक रिटायर कर्नल ने तो फाउंडर स‌ब्सक्राइबर बनने के लिए अपने पेंशन फंड से एक लाख रुपये दे दिये. दूसरी तरफ चांदनी नाम की एक बीस सालकी लड़की ने स‌ब्सक्रिप्शंस कमीशन से मिलने वाली रकम से फाउंडर स‌ब्सक्राइबर बनने जैसा अनूठा कारनामा कर दिखाया. इन अनुभवों ने हमें आगे बढने की ताकत दी. हमें महसूस हुआ कि हम अकेले नहीं हैं. नए साल की शुरुआत के साथ ही हमारी किस्मत के सितारे भी फिरने लगे. अब काम ज्यादा कुशलता से होने लगा था.

17 जनवरी यानी पहला एडिशन लॉंच होने से ठीक बारह दिन पहले हमें एक युवा जोड़ा मिला जो तहलका के विचारों से प्रभावित होकर इसमें पैसा लगाना चाहता था. कुछ दूसरे निवेशकों की भी चर्चा चल रही थी. लगने लगा था कि बुरे दिन बीत चुके हैं. कल तहलका का विचार एक अखबार की शक्ल अख्तियार कर लेगा. कौन जाने वक्त के साथ ये कमजोर पड़ जाए या फिर धीरे-धीरे, खबर दर खबर, इश्यू दर इश्यू इसकी ताकत बढ़ती जाए. हालांकि अभी ये ठीक वैसा नहीं है जैसा हमने सोचा था, लेकिन ये काफी कुछ वैसा ही है जैसा इसे होना चाहिए. हम फिर एक नए स‌फर की शुरुआत कर रहे हैं और अंधेरी सुरंग पीछे छूट चुकी है. फिलहाल हमारे लिए उम्मीद का ये हल्का उजाला ही किसी बड़ी जीत से कम नहीं ….

शोमा चौधरी, जनवरी 2004

राजा ने लूटी रंकों की रोटी

यह किसी केंद्रीय मंत्री और बड़े औद्योगिक घराने के बीच हुए अनैतिक लेन-देन की कहानी नहीं है. यह कहानी है हमारे समाज के सबसे वंचित और शोषित तबके के मुंह से निवाला छीनने की. यह कहानी राजनीति, अपराध और भ्रष्टाचार के गंदे गठजोड़ की है. करीब डेढ़ महीने पहले उम्मीद की साइकिल पर सवार होकर अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल की थी. जब उन्होंने डीपी यादव को पार्टी का टिकट देने से मना किया तो लोगों में उनके सुशासन के दावों के प्रति विश्वास की लहर पैदा हो गई थी. मगर उन्होंने राजा भैया को जेल और खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री बना कर उस लहर की तीव्रता को खत्म-सा कर दिया है. जिस खाद्य और आपूर्ति विभाग की जिम्मेदारी राजा भैया को सौंपी गई है उसी विभाग में पिछली बार उन्होंने ऐसा कारनामा किया था कि उन्हें किसी भी विभाग का मंत्री बनाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता. इस कहानी में तहलका उनके कारनामों के जिन पुख्ता सबूतों का जिक्र करने जा रहा है, उन्हें देखने के बाद स्पष्ट है कि उनकी सही जगह जेल में है, जेल मंत्री के ऑफिस में नहीं.

राजा भैया के बेहद करीब रहे उनके एक सहयोगी ने सीबीआई और सर्वोच्च न्यायालय के सामने चौंकाने वाले रहस्योद्घाटन किए हैं. उनका कहना है कि अपनी पिछली पारी में राजा भैया ने एक बेहद व्यवस्थित अवैध तंत्र की मदद से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अनाज आदि की जमकर लूटपाट की. राजा भैया के इस सहयोगी का दावा है कि इस अनाज की अवैध बिक्री से उन्होंने 4 साल में करीब 100 करोड़ रुपये बनाए. अपने दावे को सच्चा साबित करने के लिए इस गवाह ने एक सनसनीखेज डायरी  भी सीबीआई को दी है जिसमें बड़ी तरतीब से अवैध धन के लेन-देन को दर्ज किया गया है. सबसे ज्यादा विस्फोटक बात यह है कि इस गवाह का दावा है कि अवैध धन की हर प्रविष्टि के नीचे राजा भैया की पत्नी के हस्ताक्षर भी हैं.

बीते साल के दिसंबर महीने की बात है. 38 वर्षीय राजीव यादव लखनऊ के हजरतगंज में स्थित सीबीआई दफ्तर पहुंचे. यादव कुछ साल पहले तक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के जनसंपर्क अधिकारी हुआ करते थे. उन्होंने वहां सीबीआई अधिकारियों को एक डायरी की प्रति सौंपी. यह डायरी यादव और सचिवालय के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी अशोक कुमार ने साल 2004 से 2007 के बीच तैयार की थी. उस वक्त ये दोनों राजा भैया के आधिकारिक स्टाफ का हिस्सा हुआ करते थे. राजा भैया तब मुलायम सिंह यादव की सरकार में खाद्य और आपूर्ति विभाग के काबीना मंत्री थे.

लगभग चार साल तक यादव और अशोक पूरी सावधानी से डायरी में उस पैसे का हिसाब-किताब लिखते रहे जो राशन की दुकानों को मिलने वाले रियायती अनाज और केरोसिन आदि की चोरी के बाद उन्हें बेचने से मिला करता था. विभाग का मंत्री होने के नाते राजा भैया की यह जिम्मेदारी थी कि वे सार्वजनिक वितरण विभाग के काम-काज पर नजर रखते और अनाज आदि की पहुंच ईमानदारी से शहरी और ग्रामीण गरीबों तक सुनिश्चित करते. जिस तबके के लिए यह सुविधा है उसका ज्यादातर हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करता है. ‘चोरी का यह राशन या तो बांग्लादेश और नेपाल में तस्करी के जरिए भेजा जाता था या फिर पड़ोसी राज्यों में बेच दिया जाता था’, यादव सीबीआई को दिए शपथपत्र में कहते हैं.

यादव के मुताबिक सारा पैसा राजा भैया के चार सहयोगी अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल सिंह (ये उस वक्त प्रतापगढ़ से सपा के सांसद थे), यशवंत सिंह (तत्कालीन एमएलसी), जयेश प्रसाद और रोहित सिंह (राजा भैया का ड्राइवर) इकट्ठा करते थे. यह सारा पैसा लाकर चारों यादव को सौंप देते थे. तब यादव अक्सर राजा भैया के लखनऊ स्थित शाहनजफ रोड वाले आधिकारिक आवास में रहा करते थे.

राजा भैया के करीबी रहे राजीव यादव ने सीबीआई को एक डायरी सौंपी है जिसमें उनके अवैध लेन-देन का लेखा-जोखा हैं. इस पर राजा भैया की पत्नी के हस्ताक्षर भी हैं

अखिलेश यादव के साफ-सुथरी सरकार के दावों के बावजूद राजा भैया एक बार फिर से उसी खाद्य और आपूर्ति विभाग के मंत्री बना दिए गए हैं. ‘2004 में मंत्री बनने के बाद मंत्री जी ने मुझसे कहा कि हर महीने के पहले हफ्ते में उक्त चारों व्यक्ति वितरण विभाग के अधिकारियों और माफियाओं से इकट्ठा की गई रकम मुझे सौंपेंगे. मुझे यह सारा पैसा मंत्री जी की पत्नी भान्वी कुमारी को सौंपना था’, यादव  तहलका को बताते हैं.

कुमारी को पैसा सौंपने से पहले यादव सारे पैसे का लेखा-जोखा एक डायरी में दर्ज कर लेते थे. ‘हिसाब-किताब दुरुस्त रखने और किसी तरह के विवाद से बचने के लिए जो भी पैसा दर्ज होता था उस पर भान्वी कुमारी अक्सर दस्तखत भी कर दिया करती थीं’, यादव ने सीबीआई के एसपी संजय रतन को यह बात पिछले साल दिसंबर में बताई थी. इसके तीन महीने बाद यादव ने अंदर तक हिला देने वाली यह कहानी तहलका को सुनाई.

डायरी में दर्ज आंकड़ों के मुताबिक राजा भैया ने 2006 से 2007 के बीच 15 महीनों के दौरान अनाज और मिट्टी के तेल की तस्करी, अपने विभाग के अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण और माप-तौल विभाग से मिलने वाली एक निश्चित रकम को मिलाकर करीब 40 करोड़ रुपये कमाए. राजा भैया लगभग 40 महीने तक मंत्री रहे. अगर पंद्रह महीनों में 40 करोड़ के आंकड़े को मानक मानें तो अपने मंत्रित्वकाल में उन्होंने गरीबों के लिए जारी किए गए अनाज और मिट्टी के तेल की चोरी करके कम से कम 100 करोड़ रुपये तो कमाए ही होंगे.

यादव के मुताबिक पैसा मिलने के बाद तुरंत ही इसे भान्वी कुमारी को सौंपना पड़ता था. जब तहलका ने यादव से पूछा कि पैसा सीधे-सीधे कुमारी को क्यों नहीं दिया जाता था तो उनका जवाब था कि राजा भैया के परिवार में महिलाएं बाहरी लोगों के साथ बातचीत नहीं करती हैं. इसीलिए इस काम के लिए उसे इस्तेमाल किया जाता था. ‘इसके अलावा शायद राजा भैया को यह ठीक नहीं लगता होगा कि उनकी पत्नी इस तरह के लेन-देन में शामिल हो’, यादव कहते हैं.

इस पैसे का कुछ हिस्सा अचल संपत्ति और कारें खरीदने में लगाया गया. यादव ने ऐसी दो संपत्तियों की जानकारी दी है. नई दिल्ली के ग्रीन पार्क में एक बंगला और एक लखनऊ के एमजी रोड पर.

‘2004-05 में रामजानकी नाम से एक ट्रस्ट का पंजीकरण इलाहाबाद में करवाया गया. इसमें राजा भैया और उनके परिजन ट्रस्टी थे. कुछ पैसा इस ट्रस्ट के नाम ट्रांसफर कर दिया गया जिससे एमजी मार्ग पर स्थित 214 नंबर के बंगले को लीज पर लिया गया. 2007 में दिल्ली के ग्रीन पार्क एक्सटेंशन में राजा की पत्नी भान्वी कुमारी के नाम से 7-बी नंबर का बंगला खरीदा गया’, यादव ने अपने शपथपत्र में बताया है.

कथित तौर पर राजा ने इस काले धन में से कुछ को सफेद बनाने का एक नायाब तरीका भी ईजाद कर रखा था. यादव ने अपने शपथपत्र में फर्जी जीवन बीमा पॉलिसी और बैंक खातों का जिक्र किया है जो राजा भैया और उनके परिवार द्वारा चलाए जा रहे निजी स्कूलों के अध्यापकों और दूसरे कर्मचारियों के नाम पर हैं. ‘इन बीमा पॉलिसियों में चार सालों के दौरान 7.5 करोड़ रुपयों का निवेश किया गया जिसे  अवधि पूरा होने पर राजा के परिजनों को सौंप दिया गया. ऐसी ही एक पॉलिसी मेरे नाम पर भी थी’, यादव ने यह बात सीबीआई के समक्ष पेश अपने शपथपत्र में कही है. यादव ने सीबीआई को उस बीमा कंपनी और एजेंट के नाम भी बताए हैं जिनसे ये पॉलिसियां ली गई थीं.

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दर्ज है जिसमें कोर्ट की निगरानी में इस घोटाले की जांच की मांग की गई है. यह शपथपत्र अब उसी याचिका का हिस्सा है. इसी शपथपत्र में यादव ने बताया है कि इस पैसे से राजा भैया ने लेक्सस, फोर्ड एंडेवर, टोयटा फॉर्चुनर और मित्शुबिशी पजेरो जैसी लग्जरी गाड़ियां खरीदीं जिनमें से ‘अधिकतर कारें फर्जी नामों से खरीदी गई थीं.’

डायरी के मुताबिक राजा भैया ने 2006 से 2007 के बीच 15 महीनों के दौरान अनाज, चीनी और मिट्टी के तेल की तस्करी से करीब 40 करोड़ रुपये बनाए

यह सनसनीखेज डायरी भी अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुकी है. तहलका के पास भी इस डायरी की एक कॉपी है. इसमें अलग-अलग जिलों से मिले पैसों का तारीख दर तारीख विवरण है. डायरी में अलग-अलग कॉलम में अलग-अलग स्रोतों से मिले पैसे का जिक्र है. उदाहरण के तौर पर डायरी का एक पेज चार कॉलम में बंटा है. इसका शीर्षक है पीडीएस यानी जन वितरण प्रणाली. इस पन्ने पर लखनऊ, मुरादाबाद, कानपुर और बरेली डिवीजन से आए पैसे का ब्यौरा है. इसके मुताबिक जनवरी से जुलाई 2006 के दौरान रियायती अनाज की चोरी करके लखनऊ, मुरादाबाद और कानपुर से 58 लाख रुपये वसूले गए. उसी पन्ने पर बरेली से फरवरी से जुलाई, 2006 के बीच वसूली गई रकम थी 13.6 लाख रुपये. अगले पन्ने पर फरवरी से जुलाई, 2006 के बीच मेरठ, सहारनपुर, इलाहाबाद और वाराणसी डिवीजन से इकट्ठा किए गए 13.5 लाख रुपये का जिक्र है. इसके अगले पन्ने पर गोरखपुर, बस्ती और देवीपाटन जिलों से मिले 40.70 लाख रुपये दर्ज हैं.

एक और पन्ने पर माप-तौल विभाग से आने वाले  धन का विवरण है. इसके मुताबिक मई से दिसंबर, 2006 के बीच प्रति महीने चार लाख रुपये मिले. एक पन्ने पर लखनऊ के रीजनल मार्केटिंग अधिकारी द्वारा दी गई मासिक रकम का विवरण है.

रीजनल मार्केटिंग अधिकारी का काम है राज्य सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से की जा रही चावल और गेहूं की खरीद की निगरानी करना. इस खरीद का मकसद है छोटे किसानों की उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद कर उनकी सहायता करना.

लेकिन यादव के मुताबिक राजा भैया के दौर में किसानों से ज्यादातर खरीद सिर्फ कागजों पर हुई. ‘तरीका बहुत आसान था. जिन मिल मालिकों के ऊपर छोटे किसानों से अनाज खरीदने की जिम्मेदारी थी वे या तो फर्जी खरीद की एंट्री करवा देते थे या फिर कभी-कभी वितरण विभाग से चुराए गए अनाज को खरीद के रूप में दिखा दिया जाता था. इसके एवज में मिल मालिक को सरकार चेक दे देती थी और मिल मालिक मंत्रीजी को उनका हिस्सा पहुंचा देते थे’ यादव ने तहलका को बताया.

तहलका ने राजा भैया के दफ्तर में फोन करके पूरी स्टोरी उन्हें बताई और उनसे इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा. पर राजा भैया ने खुद जवाब देने की बजाय अपने जनसंपर्क अधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह की मार्फत जवाब देना उचित समझा. ‘यह सच है कि यादव पिछले कार्यकाल में मंत्री जी के जनसंपर्क अधिकारी थे. पर उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था. कोई अपनी डायरी में कुछ भी लिख सकता है. वो दुर्भावना के चलते ऐसा कर रहे हैं’, सिंह ने तहलका को बताया.

जब तहलका ने उनसे पूछा कि क्या कोई राजा भैया की पत्नी के हस्ताक्षर भी कर सकता है, तो सिंह का जवाब था कि यह जांच का विषय है.

यादव प्रतापगढ़ के गोतनी गांव के रहने वाले हैं. यह गांव राजा भैया के पैतृक गांव बेंती से छह किलोमीटर दूर है. यादव के मुताबिक वे राजा भैया के साथ 1993 से जुड़े हुए हैं. तहलका ने उनके इस दावे की जांच की. उत्तर प्रदेश पुलिस के रिकॉर्ड बताते हैं कि यादव 1993 से राजा भैया के सक्रिय सहयोगी रहे थे. इसी साल राजा भैया पहली बार विधायक बने थे.

राजा भैया और उनके लोगों पर चल रहे तमाम आपराधिक मामलों में यादव भी नामजद हैं. इनमें गैंगस्टर ऐक्ट से लेकर हत्या तक के मामले शामिल हैं. तहलका ने अपनी पड़ताल में पाया कि यादव को 2004 में राजा भैया के काबीना मंत्री बनने के साथ ही उनका जनसंपर्क अधिकारी नियुक्त किया गया था. तब से लेकर 2007 तक वे राजा भैया के जनसंपर्क अधिकारी बने रहे.

यादव को लगातार सरकारी खाते से मासिक वेतन मिलता रहा. (तहलका के पास यादव के एसबीआई बैंक वाले उस खाते की जानकारी है जो सिविल सेक्रेटरिएट ब्रांच लखनऊ में है. इस खाते में हर महीने सचिवालय प्रशासनिक विभाग द्वारा वेतन जमा किया जाता था).

यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि यादव का राजा से मोहभंग कब और कैसे हुआ. यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है कि इतने सालों बाद अब यादव ने अपना मुंह क्यों खोला. यादव तहलका को सफाई में बताते हैं कि उन्होंने ऐसा अपनी अंतरात्मा की आवाज पर किया क्योंकि गरीब और बेसहारा लोगों का हक मार कर इकट्ठा की गई संपत्ति उनके मन पर बोझ बन गई थी.

मौजूदा वित्त वर्ष में भारत सरकार ने देश से भूख मिटाने के लिए 75,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी अनाज पर दी है. देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा हिस्सा पाता है. जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत उत्तर प्रदेश को 2001 से 2011 के बीच एक लाख करोड़ का अनुदान केंद्र सरकार ने दिया है. पीडीएस के अलावा अन्त्योदय, मिडडे मील, बीपीएल और एपीएल के तहत राज्य सरकारों को केंद्र सरकार सब्सिडी देती है.

दिसंबर, 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पीडीएस और अनाज वितरण में व्यापक भ्रष्टाचार को देखते हुए कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच के आदेश जारी किए

संपूर्ण रोजगार योजना जिसका नाम बाद में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) कर दिया गया था और काम के बदले अनाज योजना को यदि छोड़ दिया जाए तो उपर्युक्त सभी योजनाओं को लागू करने और निगरानी करने की जिम्मेदारी सीधे खाद्य और आपूर्ति विभाग की है.

यादव ने तहलका को बताया कि पीडीएस और दूसरी योजनाओं के तहत आने वाले गेहूं और चावल को चुराकर या तो खुले बाजार में बेच दिया गया या फिर उन्हें तस्करी के जरिए नेपाल और बांग्लादेश में बेच दिया गया. खुले बाजार में चुराए गए चावल की कीमत 20-35 रुपये प्रति किलो और गेंहू की कीमत 20-25 रुपये प्रति किलो तक वसूली गई.

‘हर महीने मंत्री जी जिले के अधिकारियों की एक मीटिंग लिया करते थे. जो अधिकारी ज्यादा पैसा देते थे वे कम पैसा देने वालों से बेहतर माने जाते थे. इन अधिकारियों के ट्रांसफर और उनकी पोस्टिंग उनकी पैसा इकट्ठा करने की क्षमता के आधार पर किए जाते थे’, यादव तहलका को बताते हैं. उन्होंने ऐसे चार अधिकारियों के नाम अपने हलफनामे में शामिल किए हैं जिन्हें भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों और विभागीय कार्रवाइयों की सिफारिशों के बावजूद पदोन्नतियां दे दी गई यादव के मुताबिक, ‘रीजनल मार्केटिंग अधिकारी वीके सिंह, जिला आपूर्ति अधिकारी(डीएसओ) रामपलट पांडेय, डीएसओ छत्तर सिंह और मार्केटिंग इंस्पेक्टर वीवी सिंह को उनके खिलाफ लंबित विभागीय जांचों के बावजूद पदोन्नति दे दी गई.’

इस घोटाले के संबंध में 2004 से लेकर अब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में जितनी भी जनहित याचिकाएं दायर हुई हैं उनके हिसाब से कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का घपला हुआ है. मायावती के शासनकाल में इस घोटाले को आंशिक तौर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष स्वीकार किया गया और राज्य सरकार 2007 के अंत में इस मामले की सीबीआई जांच कराने के लिए राजी हो गई थी.

वर्ष 2002 से लेकर 2007 तक यानी मुलायम सिंह यादव और मायावती के मुख्यमंत्रित्व काल में यह घोटाला अपने चरम पर था (राज्य में बहुजन समाज पार्टी की सरकार मई, 2002 से लेकर अगस्त, 2003 तक रही. उसके बाद मई, 2007 के मध्य तक मुलायम सिंह का शासन रहा).

लखनऊ के सामाजिक कार्यकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है, ‘यह ठीक है कि घोटाला बीएसपी और एसपी की देन है. लेकिन इसके लिए कांग्रेस भी बराबर की जिम्मेदार है क्योंकि सब्सिडी का आवंटन उसी ने किया है. एफसीआई के गोदामों की व्यवस्था करने और राज्य के निगमों को अनाज आवंटन के मामले में कांग्रेस सीधे-सीधे जिम्मेदार है. हतप्रभ करने वाली बात तो यह है कि केंद्र सरकार ने 2004 में घोटाला सामने आने के बाद से लेकर अब तक इस मामले में अपने रुख को स्पष्ट करने वाला एक भी शपथपत्र दाखिल नहीं किया है.’

यह घोटाला पहली बार 2004 में एक अधिकारी के साहस की वजह से उजागर हुआ था. वर्ष 2004 के नवंबर में खाद्य और सार्वजनिक आपूर्ति विभाग के विशेष सचिव एचएस पांडेय ने एक विभागीय जांच की थी. इस जांच में उन्होंने पाया कि गोंडा जिला प्रशासन के रिकॉर्ड में वर्ष 2001 से 2004 के बीच संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना और बीपीएल के तहत आवंटित 457 करोड़ रुपये के अनाज का कोई हिसाब-किताब ही नहीं था. हालांकि कागजों में जिले के 14 प्रखंडों को अनाज दिए जाने का विवरण था, मगर इसके बाद वह अनाज कहां गया इसका कोई अता-पता नहीं था.

हैरत तो यह है कि जिले के जिम्मेदार अधिकारियों मसलन परियोजना विकास अधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी ने गायब अनाज के उपयोग का  प्रमाण-पत्र भी जारी कर दिया था. इस प्रमाण-पत्र का सीधा मतलब होता है कि खरीदा गया अनाज पूरी तरह से जरूरतमंदों और योग्य लोगों के बीच वितरित कर दिया गया है. इन प्रमाण-पत्रों को वरिष्ठ अधिकारियों मसलन आयुक्त, उपायुक्त और खाद्य और सार्वजनिक आपूर्ति विभाग के विशेष सचिवों से सत्यापित करवाने के बाद केंद्र सरकार को भेज दिया गया.

पांडेय की रिपोर्ट ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया था. चारों ओर से दबाव बनने के बाद मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. लेकिन कुछ ही हफ्तों के बाद उन्होंने जांच के आदेश को वापस ले लिया. लेकिन जब चतुर्वेदी इस मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में लेकर चले गए और इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की तब सरकार के लिए स्थिति हास्यास्पद हो गई. मुलायम सरकार कोर्ट को इस बात का कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई कि उसने एक बार सीबीआई जांच का आदेश देने के बाद उसे वापस क्यों ले लिया. इसकी बजाय सरकार ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर दिया.

एसआईटी का कभी हिस्सा रहे एक अधिकारी ने तहलका को बताया कि एसआईटी असल में अधिकारियों को सजा देने का जरिया बन गया है. अधिकारी के अनुसार, ‘एसआईटी के पास न तो इतने संसाधन हैं और न ही वह इतने बड़े घोटाले की जांच कर पाने में सक्षम है. यह घोटाला 2001 से चल रहा है और इसका दायरा पूरे प्रदेश में फैला हुआ है.’ न्यायालय समय-समय पर एसआईटी जांच की सुस्त रफ्तार पर अपनी नाराजगी व्यक्त करता रहा है.

राजा भैया के दौर में किसानों से सिर्फ कागजों पर अनाज खरीदा गया. कभी-कभी वितरण विभाग से चुराए गए अनाज को खरीद के रूप में दिखा दिया गया

दिसंबर, 2007 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सभी जिलों में अनाज घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दे दिए. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से सीबीआई ने ऐसा करने में अपनी असमर्थता जताते हुए केवल तीन जिलों- बलिया, लखीमपुर खीरी और सीतापुर- की जांच शुरू कर दी.

इस बीच उत्तर प्रदेश की जन वितरण प्रणाली में व्याप्त भयंकर भ्रष्टाचार और माफिया, नेता व  नौकरशाहों के बीच बने मजबूत गठजोड़ से जुड़े सबूत सामने आते रहे. दिसंबर, 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट की दो जजों की पीठ ने पीडीएस और अनाज वितरण से जुड़ी तमाम योजनाओं में व्यापक भ्रष्टाचार को देखते हुए कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच के आदेश जारी किए. कोर्ट ने सीबीआई को अपनी जांच का दायरा बढ़ाकर इसमें तीन अन्य जिलों- गोंडा, लखनऊ और वाराणसी- को भी शामिल करने का आदेश दिया. अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन मामलों में एसआईटी को राज्य या देश से बाहर तस्करी के सबूत मिले हैं उन्हें सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाए. कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार अधिकारियों की जांच और उन पर मुकदमे चलाने के लिए जरूरी अनुमति देने में आनाकानी करके जांच की राह में बाधा खड़ी कर रही है.  इसलिए जांच को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए कोर्ट ने इस मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि सीबीआई और राज्य एजेंसियों को इस मामले में सरकार से किसी तरह की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है. कोर्ट के आदेश से लैस सीबीआई ने अपनी जांच के दायरे में गोंडा, लखनऊ और वाराणसी को भी शामिल कर लिया लेकिन जांच की रफ्तार सुस्त की सुस्त बनी रही.

आज की तारीख तक सीबीआई ने इस मामले में सिर्फ दो आरोप पत्र दाखिल किए हैं जिनमें सिर्फ निचले स्तर के अधिकारियों को मात्र दो मामलों में आरोपित बनाया गया है (सिर्फ ओपी गुप्ता नाम के पूर्व विधायक की गिरफ्तारी को छोड़कर).

इस मामले को लटकाने में सिर्फ सीबीआई की  भूमिका नहीं है. पिछली मायावती सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. सरकार को पहली दिक्कत कोर्ट की निगरानी में जांच से थी, इसके अलावा उसे सरकारी आज्ञा के बिना सरकारी कर्मचारियों की जांच और उन्हें गिरफ्तार करने के कोर्ट के आदेश से भी परेशानी थी. सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल, 2011 में उच्च न्यायालय के आदेश पर स्टे लगा दिया है. तब से जांच जहां की तहां अटकी हुई है.

हाल में याचिकाकर्ता चतुर्वेदी ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष याचिका दायर करके मांग की है कि सीबीआई राजनीतिक दबावों के चलते इस मामले की जांच में हीलाहवाली कर रही है लिहाजा पूरे मामले की जांच कोर्ट की निगरानी में करवाई जाए. यादव के शपथपत्र को चतुर्वेदी ने अपने आवेदन का हिस्सा बनाया है. मामले की सुनवाई इस हफ्ते किसी दिन हो सकती है. इस बीच सीबीआई ने सत्ता में बैठे लोगों पर दो बार छापे मारे हैं.

पिछले साल दिसंबर में सीबीआई ने वरिष्ठ सपा नेता विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह के दफ्तर और आवास पर छापे मारे थे. पंडित इस समय राजस्व मंत्री हैं. इसके बाद फरवरी महीने में सीबीआई ने दलजीत सिंह के खिलाफ छापे की कार्रवाई की. दलजीत उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य हैं.

अनाज घोटाले की जांच में हो रही देरी की अगर कोई एक वजह ढूंढ़ी जाए तो शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि इस मामले में लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के हाथ काले हैं. कोई भी सरकार, चाहे वह केंद्र की हो या राज्य की इस मामले की जांच को आगे नहीं बढ़ाना चाहती है.

पिछले महीने जब अखिलेश यादव ने सूबे की सत्ता संभाली थी तब उन्होंने तमाम जन दबावों और विरोधों को दरकिनार करते हुए राजा भैया को काबीना मंत्री के तौर पर अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया था. उनका जवाब था कि राजा भैया के खिलाफ सारे आरोप पूर्ववर्ती मायावती सरकार ने दुर्भावना के तहत लगाए  हंै. लेकिन यह स्टोरी किसी विपक्षी खेमे से नहीं छपी है, यह विशुद्ध प्रमाणों और अंदरूनी लोगों की जुबानी पर आधारित है.

अगर नए मुख्यमंत्री इतने पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज करते हैं तो उनके साफ-सुथरे और ईमानदार होने के दावे का क्या होगा? (वीरेंद्रनाथ भट्ट के सहयोग के साथ)

 

आंदोलन की आंच

सालाना परीक्षाएं अनिश्चितकाल के लिए टल गई हैं और सारा काम-काज ठप पड़ा है. यह हाल उत्तराखंड स्थित हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय का है जो पिछले एक पखवाड़े से आंदोलन की आग में जल रहा है. विश्वविद्यालय के छात्रों और कर्मचारियों के बाद अब सामाजिक संगठन और राजनीतिक दल भी इस आंदोलन में कूद गए हैं. नतीजा यह है कि इस विश्वविद्यालय से जुड़े डेढ़ लाख से भी ज्यादा छात्र परेशान हैं.

आंदोलनकारी संगठनों का आरोप है कि ये हालात कुलपति प्रो एसके सिंह की हठधर्मिता के कारण हुए हैं. हालांकि सिंह इससे इनकार करते हुए कहते हैं कि वे नियमों के हिसाब से काम कर रहे हैं. स्थिति जिस तरह की है उससे लगता है कि अब यह आग उच्चस्तरीय राजनीतिक हस्तक्षेप के बिना शांत होने वाली नहीं.

आंदोलन का फौरी कारण बनीं विश्वविद्यालय में नियुक्तियों के लिए हो रही परीक्षाएं और साक्षात्कार. 28 मार्च को सहायक कुलसचिव के पांच और जनसंपर्क अधिकारी के एक पद के लिए लिखित परीक्षा होनी थी. इसके नतीजे भी उसी दिन आने थे. अगले दिन साक्षात्कार होना था. परीक्षार्थियों को लिखित परीक्षा में कई खामियां नजर आईं. उन्होंने फौरन इस बारे में कुलपति को एक लिखित ज्ञापन दे दिया. परीक्षार्थियों का आरोप है कि देर शाम लिखित परीक्षा के नतीजे घोषित होते ही साफ-साफ नजर आने लगा कि इन खामियों का संबंध भाई-भतीजावाद से है.

इस परीक्षा का समन्वयक प्रो एके श्रीवास्तव को बनाया गया था. श्रीवास्तव मूल रूप से विश्वविद्यालय में कॉमर्स के प्रोफेसर हैं. विश्वविद्यालय में कोई पूर्णकालिक वित्त नियंत्रक नियुक्त नहीं है और उन्हें ही इस ताकतवर और मलाईदार पद का भी अतिरिक्त भार दिया गया है. छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और अब विश्वविद्यालय में ही काम कर रहे मनोज नेगी ने कुलपति को भेजे ज्ञापन में आरोप लगाया है कि लिखित परीक्षा का पैटर्न विश्वविद्यालय द्वारा जारी किए गए विज्ञापन में बताए गए पैटर्न से उलट था. ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया है कि आवेदकों की न तो स्क्रूटनी की गई थी न ही उन्हें रोल नंबर दिए गए थे. विश्वविद्यालय ने  परीक्षार्थियों को भेजे प्रवेश पत्रों पर न तो उनके नाम लिखे थे और न ही फोटो चिपकाए थे. यानी परीक्षार्थी की सही पहचान के लिए कुछ भी सुनिश्चित नहीं किया गया था. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी के बदले कोई और भी आसानी से परीक्षा दे सकता था. परीक्षा में शामिल हुए कई लोग आशंका जताते हैं कि यह सब समन्वयक ने अपने चहेते प्रत्याशियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया.

विज्ञापन के अनुसार परीक्षा में सारे प्रश्न बहुविकल्पीय आने थे. लेकिन परीक्षार्थियों के मुताबिक प्रश्नपत्र में खाली स्थान भरो और सही व गलत के विकल्प वाले प्रश्न भी थे. प्रश्नपत्र के फोटो स्टेट होने से भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं. इस परीक्षा के उत्तर का विकल्प भरने के लिए दी गई ओएमआर शीट में रोल नंबर के साथ-साथ नाम भी लिखे गए. जबकि इस शीट का मकसद ही परीक्षार्थी की पहचान को हर तरह से छिपाना होता है. एक परीक्षार्थी कहते हैं, ‘जब बहुविकल्पीय प्रश्नों के अलावा अन्य प्रश्नों के उत्तर  प्रश्नपत्र पर ही लिखने थे तो ओएमआर शीट देने का नाटक क्यों किया गया?

यह परीक्षा उन पदों के लिए हो रही थी जिन पर चुने जाने वाले परीक्षार्थी भविष्य में विश्वविद्यालय में होने वाली हर परीक्षा की जिम्मेदारी संभालेंगे. यही वजह है कि विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्रोफेसर मायूसी के साथ कहते हैं, ‘इस तरह पास होकर आए लोग कैसे परीक्षा की गोपनीयता और मर्यादा को समझ पाएंगे?’

आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि परीक्षा समन्वयक श्रीवास्तव ने इस परीक्षा में अपने करीबियों को पास कराने के लिए यह सब किया था. यह भी एक संयोग ही था कि सहायक कुलसचिव और जनसंपर्क अधिकारी दोनों पदों पर लिखित परीक्षा में अच्छे अंक पाने वाले कुछ अभ्यर्थी श्रीवास्तव ही थे. आरोप लग रहे हैं कि इन प्रशासनिक पदों पर अपने नजदीकियों को घुसा कर एक लॉबी भविष्य में भी विश्वविद्यालय प्रशासन पर अपना कब्जा जमाए रखना चाहती है.

29 मार्च को परीक्षार्थियों ने साक्षात्कार होने नहीं दिए और विश्वविद्यालय में तालाबंदी कर दी. इसके बाद कुलपति ने लिखित परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के लिए एक जांच समिति बना दी. शाम को जांच समिति ने परीक्षा में गड़बड़ी की आशंका को तो नकार दिया लेकिन स्वीकार किया कि प्रश्नपत्र का  पैटर्न अलग था. इस रिपोर्ट के आधार पर कुलपति ने इस परीक्षा की प्रक्रिया को निरस्त कर दिया.

लेकिन इससे लोगों का गुस्सा शांत होने की बजाय और भड़क गया. परीक्षार्थियों ने 30 मार्च से आंदोलन का एलान कर दिया. कर्मचारी संघ, संविदा पर काम करने वाले अध्यापकों और विश्वविद्यालय के अध्यापकों का एक बड़ा वर्ग भी अपनी-अपनी मांगों के साथ आंदोलन में कूद पड़ा. वित्त नियंत्रक श्रीवास्तव को उनके अतिरिक्त पदभार से हटाने के अलावा आंदोलनकारियों की मांगें में नौ और मांगें जुड़ गईं. 31 मार्च को वित्त नियंत्रक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

सूत्रों के मुताबिक राजनीतिक आकाओं के हस्तक्षेप से नियुक्ति पाए एक-एक परिवार के कई कर्मियों के समूह विश्वविद्यालय में मौजूद हैं

अब स्थिति यह है कि विश्वविद्यालय बचाओ आंदोलन एक सूत्रीय कुलपति हटाओ आंदोलन में बदल गया है. आंदोलनकारियों का आरोप है कि कुलपति हठधर्मी हैं और उन्हें एक चौकड़ी ने घेर रखा है, जिसमें शामिल होने की शर्त योग्यता नहीं बल्कि चाटुकारिता है. पूर्व छात्र नेता और आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष इंद्रेश मैखुरी आरोप लगाते हैं कि कुलपति ने संदेहास्पद अंक तालिका वाले प्रो एलजे सिंह को परीक्षा ओएसडी बना रखा है. वे कहते हैं, ‘संदेहास्पद अंक तालिका के बल पर नौकरी पाने वाले व्यक्ति से निष्पक्ष परीक्षा संपन्न कराने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?’

हालांकि तहलका से बातचीत में कुलपति सिंह इन आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘विश्वविद्यालय में कई पदों पर पूर्णकालिक अधिकारी नियुक्त नहीं हैं. इसलिए जो भी इन अतिरिक्त जिम्मेदारियों को कार्यकुशलता और निष्पक्षता के साथ निबाहे मैं उसे जिम्मेदारी देने को तैयार रहता हूं.’ सिंह आगे कहते हैं कि वे खुद के ऊपर लगने वाले आरोपों की जांच सीबीआई तक से कराने के लिए तैयार हैं.

आंदोलनकारियों ने कुलपति के विरुद्ध 18 आरोपों वाली एक चार्जशीट जारी करके उसे ज्ञापन के रूप में राष्ट्रपति भवन और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय भेजा है. चूंकि यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है, इसलिए कुलपति को उनके पद से हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को ही है. आंदोलनकारी संगठनों ने नौ अप्रैल, 2012 को मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से मिलकर आरोप पत्र उन्हें भी सौंपा. मुख्यमंत्री ने उनकी मांगों पर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल से वार्ता करके निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया.

वैसे गहराई से देखा जाए इस आंदोलन की जड़ें, सहायक कुलसचिव के पदों के लिए परीक्षा दे रहे  500 लोगों की शिकायत से कहीं आगे जाती हैं. 1976 में खुला गढ़वाल विश्वविद्यालय 36 साल तक राज्य विश्वविद्यालय था. तब दाखिले से लेकर नियुक्ति और प्रमोशन तक हर नियम यहीं बदला जा सकता था. हर आंदोलन की सुनवाई राज्य में ही हो जाती थी. लेकिन 15 जनवरी, 2009 को इसके केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद ऐसा होना संभव नहीं रह गया. अब अनियमितताओं की शिकायत राज्य की बजाय दिल्ली में ही हो सकती थी.

केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद विश्वविद्यालय में छात्रों ने उत्तराखंड मूल के छात्रों के लिए दाखिले में निश्चित कोटा रखे जाने की मांग को लेकर भी आंदोलन किए. स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार नियुक्तियों को लेकर भी कई बार मांगें उठीं और आंदोलन हुए. लेकिन आंदोलनकारियों के पास ऐसा कोई माध्यम नहीं था जिसके जरिए वे दिल्ली तक अपनी बात दमदार तरीके से पहुंचा पाते. जानकार बताते हैं कि तीन साल के दौरान कई गलत फैसलों से अंदर ही अंदर पनप रहे गुस्से का लावा इस बार धमाके से फूट पड़ा है.

मौजूदा आंदोलन के कुछ तार गुटबंदी से भी जुड़ते हैं. जानकार बताते हैं कि राज्य विश्वविद्यालय के समय अनेक पद भाई-भतीजों को दिए गए. सूत्रों के मुताबिक पूर्व कुलपतियों के नातेदारों और राजनीतिक आकाओं के हस्तक्षेप से नियुक्ति पाए एक-एक परिवार के कई कर्मियों के समूह विश्वविद्यालय में मौजूद हैं. इस सिफारिशी लॉबी को भी केंद्रीय विश्वविद्यालय के कड़े कानून पसंद नहीं हैं.

एक वर्ग का मानना है कि इस विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने के फैसले में ही खामी थी. गढ़वाल विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष डॉ हेमंत बिष्ट बताते हैं, ‘इसकी बजाय तब एक नया केंद्रीय विश्वविद्यालय किसी दूरस्थ पर्वतीय स्थान पर  बनाया जाना चाहिए था. इसलिए ताकि केंद्र सरकार के पैसे से बनने वाला वह विश्वविद्यालय कार्यकाल की शुरुआत से ही केंद्र के कड़े मानकों का पालन करता.’ गढ़वाल विश्वविद्यालय के साथ उस समय 13 नए केंद्रीय विश्वविद्यालय बने थे और केवल दो अन्य को राज्य से केंद्रीय विश्वविद्यालय में बदला गया. केंद्रीय विश्वविद्यालय में गढ़वाल विश्वविद्यालय की लगभग 18,00 करोड़ रु की संपत्ति भी शामिल की गई है, जबकि नए बनने वाले विश्वविद्यालयों को पूरा धन केंद्र ने दिया. इसलिए भी स्थानीय स्तर पर आक्रोश है.

फिलहाल सभी पक्ष अपनी-अपनी शिकायतों पर सुनवाई की बाट जोह रहे हैं और डेढ़ लाख से ज्यादा छात्र विश्विविद्यालय खुलने की.

कैग पर कोहराम

 

केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों को संकट में डालने के बाद अब लग रहा है कि नियंत्रकमहालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्टों से छत्तीसगढ़ सरकार की जान सांसत में फंसने वाली है. कैग की हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि सूरजपुर जिले में भटगांव स्थित दो कोल ब्लॉकों के ठेके पर राज्य को भविष्य में 1052.20 करोड़ रुपये की हानि होगी. छत्तीसगढ़ में इन ब्लॉकों की नीलामी से हुए नुकसान पर जितना बवाल मच रहा है उससे ज्यादा सरकार इस वजह से संकट में है कि यह ठेका एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर-सोलार एक्सप्लोसिव को मिले हैं. नागपुर की इन दोनों कंपनियों के संयुक्त उपक्रम में से एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर के मालिक अजय संचेती हैं. महाराष्ट्र विधानसभा से राज्यसभा सांसद संचेती भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के व्यापारिक मित्र और भाजपा के करीबी माने जाते हैं. राज्य की भाजपा सरकार के सामने एक और बड़ी दिक्कत यह है कि खुद पार्टी के एक मजबूत धड़े ने रमन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

हाल ही में इस मसले ने राजनीतिक स्तर पर इतना तूल पकड़ा कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी सफाई देनी पड़ी है. पार्टी के बचाव में पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद का तर्क था कि जब कोयला खनन के लिए टेंडर निकाला गया था तब न तो नितिन गडकरी अध्यक्ष थे और न ही अजय संचेती सांसद बने थे.

हालांकि तहलका के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि संचेती की कंपनी को ठेके मिलने की प्रक्रिया में ऐसे कई अनुत्तरित सवाल हैं जो भाजपा सरकार के खुद को पाकसाफ बताने के दावों की पोल खोलते हैं.

25 जुलाई, 2007 को भारत सरकार ने छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपपमेंट कॉर्पोरेशन को अनुशंसा की थी कि इन कोल ब्लॉकों के दोहन और विपणन के लिए किसी सरकारी अथवा कोल मांइस एेक्ट 1973 के तहत काम करने वाली कंपनी को खनन का काम सौंपा जाए या उसे इस काम में भागीदार बनाया जाए. इसके तहत कॉर्पोरेशन ने तीन जुलाई, 2008 को निविदाएं आमंत्रित कीं. दोनों कोल ब्लॉकों को हासिल करने के लिए कुल 34 कंपनियों द्वारा तीन करोड़ दस लाख के कुल 62 निविदा प्रपत्र खरीदे गए. कॉर्पोरेशन ने जब 25 जुलाई, 2008 को निविदा खोली तो भटगांव-दो के लिए नागपुर की कंपनी एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर-सोलार एक्सप्लोसिव तथा रायपुर के जिंदल स्टील पावर लिमिटेड के प्रस्ताव को विचार योग्य पाया.  चूंकि जिंदल ने 540 एवं एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर-सोलार एक्सप्लोसिव ने 552 रुपये प्रति मीट्रिक टन की दर से खनन का प्रस्ताव दिया था सो भटगांव दो में खनन का ठेका एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्टर-सोलार को सौंप दिया गया.

भटगांव दो (एक्सटेंशन) को हासिल करने के लिए यूं तो 14 कंपनियों ने प्रपत्र खरीदा था लेकिन कॉर्पोरेशन ने इस ब्लॉक के लिए सिर्फ दो कंपनियों एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर-सोलार एक्सप्लोसिव और मुंबई की एसीसी को इस प्रस्ताव के योग्य पाया. इसके बाद एसीसी को यह कहकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया कि उसके पास भूमिगत खनन का अनुभव शून्य है. इस तरह कॉर्पोरेशन के प्रस्ताव के लिए सिर्फ एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर-सोलार बची और उसे 129.60 रुपये प्रति मीट्रिक टन की दर पर खनन का ठेका दे दिया गया. कैग ने अपनी रिपोर्ट में इसी बात पर आपत्ति जताई है कि एक कोल ब्लॉक 552 रुपये प्रति मीट्रिक टन की दर पर आवंटित कर दिया गया जबकि दूसरा 129.60 रुपये प्रति मीट्रिक टन की दर पर. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों कोल ब्लॉक आसपास ही हैं और जब भटगांव दो (एक्सटेंशन)   के प्रस्ताव के लिए सिर्फ एक कंपनी अंतिम चरण में थी तो स्वच्छ और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिए नए सिरे से टेंडर क्यों नहीं बुलाए गए.

जब महाराष्ट्र की शिवसेना-भाजपा सरकार में नितिन गडकरी लोकनिर्माण मंत्री थे तब अजय संचेती की कंपनियों ने उनकी कई सरकारी परियोजनाओें में मदद की थी

तहलका के पास कॉर्पोरेशन की मीटिंगों के कुछ मिनट्स भी हैं. इनमें जिक्र है कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के आधार पर कार्पोरेशन ने माना था कि भटगांव दो एक्सटेंशन के 12.43 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 366.82 लाख टन के उच्च श्रेणी का कोयला मौजूद है. कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में यह माना है कि भटगांव दो एक्सटेंशन में ‘अ’ से ‘स’ श्रेणी का ऐसा कोयला मौजूद है जो बेहद कम, लेकिन दुर्लभ और उच्च मूल्य का है. हालांकि कॉर्पोरेशन यह भी मानता है कि खनन योग्य रिजर्व कोल 249.1 लाख टन ही है.

इस मामले का एक दिलचस्प पहलू और है. जब छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन ने एसएमएस इन्फ्रास्ट्रक्चर-सोलार एक्सप्लोसिव से कोल खनन का एग्रीमेंट किया तो उसने पर्यावरण विभाग की मंजूरी लेने के लिए साल 2009 में यह दावा किया था कि भटगांव दो और भटगांव दो एक्सटेंशन का 57 फीसदी आरक्षित कोयला उच्च गुणवत्ता का है. कॉर्पोरेशन ने यह भी माना था कि 90 से 95 फीसदी कोयला ऐसी जगह है जिसे कम खर्चीली पद्धति के जरिए निकाला जा सकता है, लेकिन  अप्रैल, 2011 में एक निजी कोयला सलाहकार एनपी भाटी जो नागपुर के रहने वाले हैं, के हवाले से यह बात सामने आई कि खदान में ‘डी’ श्रेणी का ऐसा कोयला मौजूद है जिसे निकालने का खर्चा ज्यादा हो सकता है. कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल कोयला सलाहकार की बातों पर मुहर लगाते हुए कहते हैं, ‘भटगांव दो कोल ब्लॉक ‘महान नदी’ से दूर है जबकि भटगांव दो (एक्सटेंशन) नदी के पास है इसलिए जब कभी भी भटगांव दो की एक्सटेंशन योजना पर काम प्रारंभ होगा तो नदी और कोल ब्लॉक को संरक्षित करना होगा. यह संरक्षण खर्च बढ़ाने वाला साबित होगा लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं है.’  गौरीशंकर अपनी बातों में यह भी इशारा करते हैं कि अभी जब खनन शुरू ही नहीं हुआ तो हानि कैसी? लेकिन इसी बात का दूसरा अर्थ यह भी है कि जब कोयले का खनन प्रारंभ होगा तब नुकसान तय है. यही बात कैग ने मानी है कि 32 साल के लिए खनन योग्य रिजर्व कोयले (249.1 लाख मीट्रिक टन) और कंपनियों के द्वारा किए जाने वाले दोहन से निगम को 1052.20 करोड़ की राजस्व हानि संभावित है.

इस पूरे प्रकरण से जुड़ा एक पेंच यह भी है कि कोयला खदान आवंटन को कॉर्पोरेशन ‘आवंटन‘ नहीं मानता. कॉर्पोरेशन में मांइस शाखा के महाप्रबंधक पीएस यादव कहते हैं, ‘हमने इन्फ्रास्ट्रक्चर-सोलार एक्सप्लोसिव को महज भागीदार बनाया है. जब कभी भी खनन से लाभ होगा तो कॉर्पोरेशन को 51 फीसदी हिस्सा मिलेगा जबकि कंपनियों को 49 फीसदी.’ जबकि कैग के मुताबिक इन कोल ब्लॉकों का आवंटन किया गया है.

इस पूरे प्रकरण से अचानक चर्चा में आए संचेती के लिए यह पहला मौका नहीं है जब वे विवादों में आए हों.  इसके पहले उनकी कंपनी ने वर्ष 1999 से 2003 के मध्य बिल्ड, ओन, ऑपरेट एंेड ट्रांसफर (बूट) पद्धति से दुर्ग- राजनांदगांव जिले के बीच एक बायपास का निर्माण किया था. बायपास बनने के बाद जब कंपनी ने सरकार को टैक्स नहीं चुकाया तो प्रदेश के वाणिज्यिक कर विभाग ने 17 करोड़ 35 लाख रुपये की वसूली के लिए संपत्ति को कुर्क करने का आदेश जारी कर दिया. विभाग ने कार्रवाई भी की लेकिन 15 सितंबर, 2011 को कुर्क की गई सारी संपत्ति जिसमें विभिन्न बैंकों के 21 खाते थे, लौटा दी गई. कुछ दिनों बाद इस रहस्य से पर्दा उठा कि वाणिज्यिक कर महकमे ने जिस कंपनी की संपत्ति कुर्क की थी उसने कागजों में अपने नाम में हेरफेर करके खुद को नई कंपनी बता दिया और सारी संपत्ति वापस पा ली.

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता शैलेष नितिन त्रिवेदी आरोप लगाते हुए कहते हैं,‘संचेती बंधुओं पर सरकार लगातार मेहरबान रही है. संचेती ग्रुप का छत्तीसगढ़ में न तो कोई कारखाना है और न ही निकट भविष्य में कारखाना स्थापित होने की संभावना है. इसके बावजूद उन्हें केवल नितिन गडकरी का करीबी होने के कारण औने-पौने दर पर कोल ब्लॉक दे देना सवाल तो खड़े करता ही है.’  दूसरी ओर कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल कैग की रिपोर्ट को ही काल्पनिक कहकर खारिज करते हैं. वे कहते हैं, ‘लाभ या हानि की गणना कोल ब्लॉक में काम की शुरूआत होने के बाद ही की जा सकती है. कैग का आकलन केवल कल्पना है.’ इधर  गौरीशंकर के इस तर्क को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी एवं पूर्व भाजपा सांसद करूणा शुक्ला नकारते हुए कहती हैं, ‘ यह कहना ठीक नहीं है कि कैग की रिपोर्ट काल्पनिक है क्योंकि कैग अपनी आपत्तियों से सरकार को चार-छह महीने पहले अवगत कराता है.’ कुछ इसी तरह की बात पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं भाजपा सांसद रमेश बैस भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘ एक संवैधानिक संस्था की रिपोर्ट को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता.’ बैस ने कुछ दिन पहले ही निजी चैनलों को दिए गए अपने बयान में भाजपा अध्यक्ष नितिन गड़करी और संचेती बंधुओं को आड़े हाथों लिया था लेकिन उसके बाद वे अपने बयान से मुकर गए.

भाजपा की संचेती से निकटता और उन्हें पक्षपाती तरीके से कारोबारी सहयोग मिलने की बात इससे भी जाहिर होती है कि महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की सरकार के दौरान जब गड़करी लोकनिर्माण मंत्री थे तब उनके विभाग ने 55 फ्लाईओवर और मुंबई पुणे एक्सप्रेसवे बनाया था. उनके इस काम में सबसे ज्यादा मदद संचेती की कंपनी ने ही की थी. वर्ष 1998 में जब गडकरी राष्ट्रीय राजमार्ग कमेटी के चेयरमैन थे तब भी संचेती की कंपनी ने कई प्रोजेक्ट हासिल किए थे.

हो सकता है छत्तीसगढ़ सरकार आने वाले दिनों में नियम कानूनों की पेचीदगी का हवाला देकर संचेती प्रकरण को भ्रष्टाचार न मानने के तर्क दे. लेकिन ‘विश्वसनीय छत्तीसगढ़’ का नारा देने वाली भाजपा सरकार की कैग रिपोर्ट के आने बाद पहली बार हिलती हुई जरूर दिख रही है.

 

आज नकद कल रियायत

 

 

राजस्थान में अलवर जिले के कोटकासिम ब्लॉक का यह ओजली गांव है. यहां ग्राम सेवा सहकारी समिति की उचित मूल्य की दुकान पर तीन महीने पहले तक केरोसिन के लिए उपभोक्ताओं की भीड़ जमा हो जाती थी. पर अब उसी केरोसिन के नाम पर चारों ओर सन्नाटा पसर जाता है. दुकान के कर्मचारी महावीर यादव के मुताबिक इस सन्नाटे की वजह यह है कि जिला कलेक्टर के निर्देश पर केरोसिन अब पहले से तीन गुना अधिक कीमत पर बेचा जा रहा है.

बीते दिसंबर के पहले तक ओजली सहित कोटकासिम ब्लॉक की सभी दुकानों पर हर उपभोक्ता को 15 रु प्रति लीटर की दर से तीन लीटर केरोसिन मिल जाता था. मगर अब इस ब्लॉक के लोगों के लिए एक लीटर केरोसिन पर 45 रु चुकाने का आदेश जारी हुआ है. ओजली के बलवीर चौधरी कहते हैं कि उनके लिए हर लीटर पर सीधे-सीधे 30 रु और तीन लीटर पर कुल 90 रु अतिरिक्त खर्च करना किसी भी तरह संभव नहीं.

आने वाले दिनों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत देश के अन्य उपभोक्ताओं को भी केरोसिन पर कई गुना अधिक रुपया खर्च करना पड़ सकता है. दरअसल योजना आयोग की अनुशंसा पर भारत सरकार रोजमर्रा की जरूरत की सभी चीजों पर दी जाने वाली सब्सिडी में से अधिक से अधिक बचत की तैयारी कर रही है. फिलहाल इसकी शुरुआत घरेलू उपयोग में काम आने वाले केरोसिन से हो रही है. इसके लिए बीते साल यूआईडीएआई यानी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने केरोसिन पर सीधी सब्सिडी का फॉर्मूला भारत सरकार के हवाले किया था. यह फॉर्मूला कहता है कि पहले राशन की दुकानों पर उपभोक्ताओं को केरोसिन पर दी जाने वाली सब्सिडी खत्म की जाए. फिर सरकार पहले यह तय करे कि वह किन उपभोक्ताओं को सब्सिडी के लायक मानती है. जिन उपभोक्ताओं को वह सब्सिडी के लायक मानती है उनके बैंक खाते खोले जाएं और उसके बाद जो उपभोक्ता राशन की दुकान से बाजार की दर पर केरोसिन खरीद सकता है उसकी सब्सिडी को बैंक खाते में स्थानांतरित किया जाए.

बीते साल भारत सरकार के पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने राजस्थान सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली में केरोसिन पर सीधी यानी बैंक खातों के जरिए सब्सिडी देने की पायलट परियोजना लागू कराने का प्रस्ताव दिया था. इसे राजस्थान सरकार ने तुरंत स्वीकार किया और बीते दिसंबर में प्रयोग के तौर पर अलवर जिले के कोटकासिम ब्लॉक को चुना.

जब आम आदमी के भले के नाम पर जमीनी हकीकतों से आंखें मूंदकर योजनाएं बनाई जाती हैं तो उनकी मार उसी आम आदमी पर पड़ती है

कई उपभोक्ताओं के लिए बाजार की दर पर रोजमर्रा की चीजों को खरीद पाना संभव नहीं है. इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए राजस्थान सरकार द्वारा उपभोक्ताओं को बाजार में 45 रु प्रति लीटर की दर से मिलने वाले केरोसिन पर 30 रु की सब्सिडी दी जाती है. मगर कोटकासिम ब्लॉक में चलाई जा रही इस परियोजना के तहत जिला प्रशासन हर उपभोक्ता से एक लीटर केरोसिन के लिए 45 रु वसूल रहा है. हालांकि वह हर उपभोक्ता से वसूली गई 30 रु की अतिरिक्त राशि को उपभोक्ता के बैंक खाते में स्थानांतरित कराने का दावा कर रहा है, लेकिन इस सवाल का उसके पास कोई जवाब नहीं कि तीन लीटर के हिसाब से क्या हर उपभोक्ता 135 रु का केरोसिन खरीद ही लेगा. कोटकासिम ब्लॉक के कई उपभोक्ता बताते हैं कि उनके लिए बाजार दर पर केरोसिन खरीदने का मतलब है या तो केरोसिन की मात्रा में और अधिक कटौती करना या फिर केरोसिन खरीदना ही बंद कर देना.

कोटकासिम का तजुर्बा बताता है कि सरकार ने गरीबों के आर्थिक व्यवहार के तौर-तरीकों को उपेक्षित किया है. इस परियोजना के अध्ययन से जुड़े वीरेंद्र विद्रोही कहते हैं, ‘एक गरीब उपभोक्ता अपने हिस्से की सब्सिडी बैंक खाते में आने का इंतजार नहीं करना चाहता. उसका खाता कहां खुलेगा, कब खुलेगा, कब उसमें रुपया आएगा और कब वह बैंक से रुपया निकालेगा, ऐसे कई सवालों में कोई भी उपभोक्ता उलझना नहीं चाहता.

यह परियोजना लागू करने से पहले ही भारत सरकार जोर-शोर से प्रचार कर रही है कि अगर केरोसिन बचाने का यह तरीका सफल साबित होता है तो इसे राजस्थान सहित देश के अन्य राज्यों में भी दोहराया जाएगा. अलवर कलेक्टर आशुतोष एटी पेडणेकर की मानंे तो इस तरीके से केवल तीन महीने के भीतर बड़े पैमाने पर सब्सिडी बची भी है. कोटकासिम ब्लाॅक में पहले हर महीने 84 हजार लीटर केरोसिन आवंटित होता था. मगर पेडणेकर का दावा है कि परियोजना लागू होने के पहले ही महीने (दिसंबर) में मात्र 18 हजार लीटर केरोसिन की खपत हुई.

यह और बात है कि सीधी सब्सिडी परियोजना के तहत पहले महीने में खोले गए बैंक खातों का आकड़ा पेडणेकर के दावे की हवा निकाल देता है. कोटकासिम ब्लॉक में उपभोक्ताओं की संख्या 26 हजार है, जबकि दिसंबर महीने में जिला प्रशासन ने यहां केवल छह हजार बैंक खाते खोले. यानी उसने परियोजना के पहले महीने ही 20 हजार उपभोक्ताओं से सीधे-सीधे उनका केरोसिन छीन लिया और 66 हजार लीटर की सब्सिडी नहीं पहुंचाई. इसी तरह, जिला प्रशासन के मुताबिक जनवरी और फरवरी में क्रमशः 23 हजार और 13 हजार लीटर केरोसिन की खपत हुई. दूसरे शब्दों में परियोजना के दूसरे और तीसरे महीने में उसने क्रमशः उपभोक्ताओं को 61 हजार और 71 हजार लीटर की सब्सिडी नहीं पहुंचाई. कुल मिलाकर उसने कोटकासिम ब्लॉक के उपभोक्ताओं से तीन महीने के भीतर 198 हजार लीटर की सब्सिडी छीन ली. इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि केरोसिन की खपत में गिरावट की एक बड़ी वजह केरोसिन की दर में भारी बढ़ोतरी हो सकती है. इससे सिद्ध होता है कि कोटकासिम ब्लॉक की तर्ज पर अगर सरकार सब्सिडी ‘बचाने’ का यह फॉर्मूला पूरे अलवर में अपनाए तो वह जिले में सालाना 46 करोड़ और राजस्थान में सालाना 900 करोड़ रु की सब्सिडी तो केवल केरोसिन पर ही ‘बचा’ सकती है.

हालांकि आम उपभोक्ता के लिए केरोसिन आटा और चावल की तुलना में तुरंत जरूरत की चीज नहीं है. मगर भारत सरकार ने कोटकासिम के प्रयोग को एक औजार के तौर पर इस्तेमाल किया और आटे-दाल में भी इसी तरह सब्सिडी ‘बचाने’ पर उतर आई तो कई और गरीबों की थाली से कल आटा और परसों चावल भी गायब हो सकता है.

कोटकासिम का तजुर्बा बताता है कि सरकार का यह तरीका व्यावहारिक भी नहीं है. इस ब्लॉक की 24 ग्राम पंचायतों में 34 राशन की दुकानों पर 26 हजार उपभोक्ता हैं. जबकि इस परियोजना के लिए केवल छह बैंक हैं. इनमें से भी उपभोक्ताओं के बैंक खाते जीरो बैलेंस पर खोले जाने पर दो बैंकों (एसबीआई और एसबीबीआई) ने अपनी असमर्थता जता दी है. हालांकि राजस्थान ग्रामीण बैंक ने कुछ उपभोक्ताओं को पासबुक जारी की हैं, लेकिन इस कवायद को लेकर लोगों का तजुर्बा अच्छा नहीं है. कोटकासिम से 20 किलोमीटर दूर जाटवा गांव के कालूराम धनपत बताते हैं कि वे बीते तीन महीने में चार बार बैंक जा चुके हैं लेकिन हर बार बैंक से उनके केरोसिन का नकद पैसा नहीं आने की सूचना मिलती है.

राजस्थान उपभोक्ता संरक्षण समिति के प्रांतीय महासचिव आरके सिद्ध बताते हैं कि कोटकासिम में बैंको से सब्सिडी लेने की हकीकत यह है कि बीते तीन महीनों से अधिकतर उपभोक्ताओं का पैसा बैंक खातों में आया ही नहीं. वहीं बैंक सब्सिडी के चक्कर में कई ग्राम पंचायतों (मकड़ावा, बिलाहेड़ी और तिगावा आदि) के उपभोक्ताओं को 15 से 20 किलोमीटर का फासला भी तय करना पड़ता है. इससे उपभोक्ताओं का आर्थिक नुकसान तो होता ही है उनका काफी समय भी खर्च हो जाता है. इसलिए मार्च से उपभोक्ताओं ने केरोसिन के लिए राशन की दुकानों पर जाना बहुत कम कर दिया है.

कोटकासिम ब्लॉक में एक अजीब स्थिति बन चुकी है. यहां केरोसिन का भंडार है लेकिन बैंकों में सब्सिडी नहीं पहुंची है  इसलिए जनता केरोसिन खरीद नहीं सकती. राजस्थान अधिकृत विक्रेता संघ ने इस स्थिति पर आपत्ति जताई है. संघ के प्रांतीय महासचिव ओपी शर्मा कहते हैं, ‘प्रशासनिक अनियमितता के चलते केरोसिन विक्रेता बेरोजगार बैठे हैं.’ दूसरी तरफ राजस्थान खाद्य विभाग के प्रमुख शासन सचिव जेसी मोहंती आश्वासन देते हैं कि केरोसिन विक्रेताओं को हुए नुकसान की भरपाई की जाएगी. उधर, स्थानीय विधायक रामहेत यादव का आरोप है कि योजना लागू करने से पहले मोहंती ने भरोसा दिलाया था कि जनप्रतिनिधियों की राय ली जाएगी. वे कहते हैं, ‘लेकिन योजना लागू होते ही जिला कलेक्टर से लेकर प्रमुख शासन सचिव तक बेरुखी दिखाई जा रही है’. यह प्रशासनिक बेरुखी का नतीजा ही है कि बीती 29 जनवरी को  कोटकासिम ब्लॉक के सभी 24 सरपंचों ने स्थानीय विधायक की अगुवाई में एक बैठक की और उसके बाद इस परियोजना से जुड़ी अनियमितताओं को लेकर राजस्थान हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की.

अब देखना यह है कि उनकी यह कवायद क्या रंग लाती है.

रिपोर्ट पर रार

बीती जनवरी की बात है. राष्ट्रीयकृत बैंक के एक अधिकारी बिहार विधानसभा में विपक्षी दल के एक वरिष्ठ नेता के सरकारी आवास में बैठे थे. बैंक के अधिकारी नेता जी को इस बात के लिए मना रहे थे कि अगर वे कोशिश करें तो सरकार अपने विशाल धन का कुछ हिस्सा उनके बैंक में जमा कर देगी. उनका कहना था कि इससे बैंक के आला अधिकारी काफी खुश होंगे और उनके करियर का ग्राफ भी ऊंचा होगा.

इसी बातचीत के दौरान हमारा वहां पहुंचना हुआ. नेता जी से साक्षात्कार के सिलसिले में हमारा पहले से समय निर्धारित था. बैंक अधिकारी अपनी रौ में थे. वे नेता जी को यह बार-बार याद दिला रहे थे कि उनका बैंक मोटी रकम जमा करने वाले ग्राहकों का विशेष सम्मान करने में हमेशा तत्पर रहता है. नेता जी का जवाब था, ‘देखिए, अब हम तो विपक्ष में हैं. सरकार हमारी सुनती कहां है. किसी सत्ताधारी नेता से बात कीजिए.’  बैंक अधिकारी की बातों से लग रहा था कि उनका सत्ताधारी दल के किसी प्रभावी नेता से सीधा संपर्क नहीं था इसलिए वे विपक्षी दल के नेता के यहां पहुंचे थे. शायद उनकी सोच रही हो कि उनके माध्यम से ही सत्ताधारी नेताओं तक पहुंच बनाई जा सकती है. हालांकि यह कोई चकित करने वाली घटना नहीं है. बैंक अधिकारी करोड़ों या कई बार लाखों रुपये जमा करने की हैसियत रखने वाले आम ग्राहकों का भी दरवाजा खटखटाते रहते हैं ताकि उनके बैंक में जमा रकम का आंकड़ा बढ़े. ऐसे ग्राहकों को बैंक काफी सुविधाएं भी देते हैं और उपहार भी. बैंक की भाषा में वे इसे कस्टमर रिलेशनशिप कहते हैं.

इस घटना का जिक्र एक विशेष कारण से महत्वपूर्ण है. जब तहलका ने पटना स्थित भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा तीन अप्रैल को बिहार सरकार द्वारा आमद और खर्च पर जारी की गई रिपोर्ट पर जानकारी लेनी चाही तो लेखाकार भवन से जुड़े एक अधिकारी ने कुछ ऐसी ही कहानी सुनाई. इसके बाद उस अधिकारी ने उस घटना का भी उल्लेख किया जिसके कारण पिछले एक पखवाड़े से राज्य में तूफान मचा हुआ है. यह घटना है बिहार सरकार द्वारा सरकारी खजाने से महज चार दिन में 937 करोड़ रुपये निकाल लिए जाने की. यह घटना 28 मार्च 2011 से 31 मार्च, 2011 के बीच की है. यानी वित्त वर्ष समाप्त होने के दिन तक. ये अधिकारी विधानमंडल के उन नियमों का हवाला देते हैं जिनके तहत राज्य सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह सरकारी कोष से पैसे निकालने के बाद उन पैसों का इस्तेमाल संबंधित वित्त वर्ष में जरूर कर ले. वर्ना उसे ये पैसे फिर से सरकारी कोष में जमा कराने पड़ते हैं. सूत्रों के मुताबिक चूंकि ये पैसे वित्त वर्ष के अंतिम चार दिन में निकाले गए इसलिए संभावना बनती है कि सरकार ने इस रकम का उपयोग नहीं किया होगा बल्कि इसे किसी बैंक में जमा कर दिया होगा. कैग के अधिकारी कहते हैं, ‘ये पैसे बैंक में आम तौर पर दो ही तरह से रखे जा सकते हैं. बचत खाते में या चालू खाते में. बचत खाते के पैसे पर बैंक ब्याज देते हैं. चालू खाते पर ब्याज अदा नहीं किया जाता. अगर ये पैसे चालू खाते में होंगे (कैग अधिकारी के अनुसार इसकी पूरी गुंजाइश है) तो सरकारी रुपये को इस रकम पर सालाना मिल सकने वाले ब्याज यानी कम-से-कम 37 करोड़ का नुकसान होगा और संबंधित बैंक को इतना या इससे भी अधिक का मुनाफा.

सवाल यह है कि वित्त वर्ष के अंतिम चार दिन में जब सरकार को यह पता है कि वह इन पैसों का इस्तेमाल नहीं कर पाएगी तो आखिर उन पैसों को निकाला ही क्यों गया. कैग के ये अधिकारी कहते हैं, ‘बैंकों के ‘कस्टमर रिलेशनशिप’ की कहानी को आप इस घटना से जोड़ कर देखिए. सब समझ जाएंगे.’

कैग अधिकारी बताते हैं कि हड़बड़ी में ऐसे बिल भी जमा करा दिए गए हैं जिनमें निकाली गई रकम से ज्यादा के खर्च का हिसाब दिया गया है

सवाल उठता है कि क्या सचमुच बैंक और सरकार के कुछ लोग ऐसा करते हैं. कैग के अधिकारी इस सवाल का सीधा जवाब तो नहीं देते पर इतना जरूर कहते हैं, ‘हम इसकी जांच में जुट गए हैं.’ यहां जनवरी महीने में विपक्षी दल के उन नेता और बैंक अधिकारी की बातचीत के पहलुओं को थोड़ा विस्तार दिया जाये तो शक की सुई पिछली सरकारों की तरफ भी जाती है. कैग रिपोर्ट 2011 कहती है कि राज्य सरकार ने निकाले हुए काफी पैसों के खर्च का हिसाब 2003 से नहीं दिया है और 2011 तक यह रकम 22 हजार करोड़ रुपये हो गई है.

तीन अप्रैल को जब यह रिपोर्ट राज्य विधान परिषद और विधानसभा में पेश हुई तो काफी हंगामा हुआ. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव, लोक जनशक्ति पार्टी प्रमुख रामविलास पासवान और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकीलुर्रहमान ने मार्च के अंतिम चार दिनों में निकाली गई 937.75 करोड़ रुपये की रकम के मामले की सीबीआई से कराने की मांग तक कर डाली. अर्थशास्त्री नवलकिशोर चौधरी कहते हैं, ‘सैकड़ों करोड़ रुपये का निकाला जाना और उन पैसों का हिसाब तक नहीं देना. सरकार की अक्षमता की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है?’

लेकिन इन सब मुद्दों पर राज्य के वित्त विभाग के मंत्री सुशील कुमार मोदी का एक अलग ही तर्क है. वे कहते हैं ‘कैग का यह आरोप सौ फीसदी सही नहीं है, क्योंकि कैग के दफ्तर में एसी (निकाली गई रकम) और डीसी (खर्च की गई रकम) बिल बोरियों में रखे पड़े हैं लेकिन कैग में मानवसंसाधन की कमी के कारण इसकी जांच नहीं हो सकी है.’ हालांकि मोदी की इस बात पर कैग के अधिकारी कहते हैं, ‘जब बिल तैयार था तो सरकार ने इसे आखिरी क्षण में क्यों भेजा.’  कैग के अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि हड़बड़ी में सरकारी कर्मियों ने खर्च के सैकड़ों ऐसे बिल भी जमा करा दिए हैं जिनमें निकाली गई रकम से ज्यादा के खर्च का हिसाब दिया गया है. अधिकारी सवाल करते हैं कि जो अतिरिक्त रकम मिली ही नहीं उसे खर्च कैसे कर दिए?

घोटाले की गूंज

कैग की यह सालाना रिपोर्ट इस लिहाज से भी राज्य सरकार की मंशा और ईमानदारी पर करारा प्रहार है कि इस बार संस्था ने घोटाले, घपले और चोरी की बात साफ-साफ कही है. इस बार कैग का लहजा कितना सख्त है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस दिन यानी तीन अप्रैल को 11 बजे कैग की रिपोर्ट बिहार विधानमंडल में पेश की गई उसी दिन शाम को तीन बजे पटना स्थित भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक आरबी सिंह ने प्रेस कान्फ्रैंस बुला ली और साफ साफ घपलों, घोटालों और सरकारी धन की लूट की बात कही. उन्होंने कहा कि मार्च, 2011 तक गबन, हानि और चोरी के एक हजार से भी अधिक मामलों में सरकार को 409 करोड़ से भी अधिक की चपत लग चुकी है. ऐसी स्थिति में सरकार को अपना वित्तीय प्रबंधन सुधारने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि आम जनता को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है.

कैग की इस रिपोर्ट से जहां विरोधी दल आक्रमक हो गए हैं वहीं सत्ताधारी गठबंधन रक्षात्मक मुद्रा में है. सुशील मोदी ने सदन में बयान दिया कि इस मामले में सीबीआई की बजाय पब्लिक अकाउंट कमेटी से जांच कराई जाएगी.

2010 में जारी कैग रिपोर्ट के बाद भी बिहार प्रशासन में कोहराम मच गया था. अदालती हस्तक्षेप के बाद एक सरकारी कर्मचारी काम-काज छोड़कर हर प्रखंड कार्यालय में  बाकायदा शामियाना लगा कर डीसी बिल भरने में लग गए थे. लेकिन इस बार की रिपोर्ट से साफ हो गया है कि राज्य सरकार ने पिछले अनुभवों से कुछ नहीं सीखा है.

ताम्र पत्र पर नोटों वाले गांधी की हसरत

मंत्री जी ने इबारत पढ़ी. शेर और गांधी के चित्र देखे. मुंह बिचकाया. कहा कि ये तो गांधी जी जैसे नहीं लगते.किस्सा यूं इतना पुराना नहीं है, पर थोड़ी बास तो इससे आ ही सकती है.कोई चार बरस पहले की बात है. केंद्र में यही सरकार थी, पर तब किसी राजा, किसी रानी या किसी लोकपाल के संग्राम नहीं चल रहे थे. रामलीला ग्राउंड में बस राम की ही लीला होती थी. ऐसे शांत वातावरण में सरकार को अचानक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद आ गई. सरकार भावुक हो गई थी. अचानक उसे कर्तव्य ने पुकारा कि बिना वक्त गंवाए स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सम्मान कर डालना चाहिए.

सरकार ने इतना शानदार सपना देखा था पर उसके सपने इतनी आसानी से पूरे नहीं हो सकते. उन्हें पूरा करने के लिए एक समिति बनानी पड़ती है. लोकतंत्र का तकाजा है – सबसे पूछकर, राय लेकर काम करो.

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी शायद नहीं जानते होंगे कि इस देश को आजाद करने के लिए उन्होंने जो अपनी जवानी, अपनी जान झोंकी थी, तो आजादी के बाद उनकी ये सारी सेवाएं कहां दर्ज होने वाली हैं. पुलिस के पास! आजादी के दीवानों की सारी जानकारी आज पुलिस के दीवान के पास ही दर्ज है. पहले फाइल में उनका नाम एक अपराधी की तरह दर्ज था. आजादी के बाद उस पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की पर्ची चिपका दी गई.

सब कुछ बहुत जल्दी ही कर देना था. 60-62 बरस पहले जो संग्राम लड़ा गया था उसमें कोई क्रांतिकारी यदि दस बरस की उम्र में भी शामिल हुआ होगा तो अभी उसकी उम्र 80 के पार होनी चाहिए. ऐसे सेनानियों के सामने सिर झुका कर अपना आभार प्रकट करने के लिए उत्सुक खड़ी सरकार को यह भी पता था कि एक-एक दिन कितना कीमती है. देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वालों को भगवान लंबी उम्र दे, पर सरकार को यह आशंका भी थी कि उस संग्राम को जीतने वाले ये सेनानी अब किसी भी दिन जीवन संग्राम हार सकते हैं.

इसलिए सारे फैसले आनन-फानन में लिए गए. इस समिति में कौन-कौन, किस-किस कारण से होगा – इसका बड़ी बारीकी से ध्यान रखा गया. गठजोड़ सरकार की मजबूरी आड़े नहीं आने दी गई और न भाड़े के लोग. बड़े भत्तों पर आने वाले विशेषज्ञ रखे गए. फोन पर ही सदस्यों को इस पुनीत काम की जानकारी दी गई. तभी उनके योगदानों की चर्चा की गई और सदस्य बनने की हामी ले ली गई. सरकारी मुहर वाले पत्र बहुत बाद में भेजे गए. इन सदस्यों के नाम? ये ज्यादा नामी लोग नहीं थे. एक-आध ऐसे नाम थे भी तो वे शुरू की तैयारी में अपनी व्यस्तता के कारण आ ही नहीं पाए. समिति के अध्यक्ष स्वयं गृहमंत्री और सदस्य सचिव गृह मंत्रालय के सचिव थे. समिति में शेष लोग ऐसे ही रखे गए थे जो बिना वक्त गंवाए सरकार को बता सकें कि यह सम्मान का सपना कैसे पूरा होगा.

एक बार फिर दोहरा लें कि समय बहुत कम था. गृहमंत्री बहुत ज्यादा व्यस्त थे. इसलिए उत्साही गैरसरकारी सदस्यों ने गृह-सचिव को सुझाव दिया कि प्रारंभिक बैठकें बिना अध्यक्ष के हो जाएं तो कोई हर्ज नहीं. एक साफ-सुथरी रूपरेखा या ढांचा बन जाए तो फिर उस पर गृहमंत्री की मुहर लगती रहेगी.

सबसे जरूरी बातें शुरू की दो बैठकों में तय हुईं जो गृह मंत्रालय के बदले गैरसरकारी सदस्यों के छोटे-मोटे दफ्तरों में दो-चार कुर्सियां यहां-वहां से खींचकर संपन्न की गई थीं. तय हुआ कि सम्मान में स्वतंत्रता सेनानी को एक सुंदर ताम्र पत्र देना चाहिए. उसका नाप, तौल, वजन, लंबाई, चौड़ाई सब दर्ज हो गया. पांच पंक्तियों के पचास सुंदर शब्दों में इबारत लिख ली गई. एक तरफ शासन का प्रतीक तीन शेर थे तो दूसरी तरफ गांधी जी का ‘एकला चलो’ वाला श्री नंदलाल बसु का गरिमा भरा रेखाचित्र.

सारे निर्णय फटाफट होते रहे. अचानक तीन बातों पर जाकर सारी बातचीत अटक गई. ताम्र पत्र पर दस्तखत किसके होंगे, कुल कितने ताम्र पत्र छपेंगे और शासन की तरफ से किस जगह पर सेनानियों का सम्मान किया जाएगा? मिली जुली सरकार पर संकट के कई मिले जुले बादल आ गए. दस्तखत प्रधानमंत्री के होंगे या गृहमंत्री के. ताम्र पत्र पर एक बार दस्तखत हो गए तो वे फिर न ही मिटाए जा सकते और न ही बदले जा सकते हैं.

तय हो गया था कि तीन शेर राज्य का प्रतिनिधित्व करेंगे और दांडी वाले गांधी समाज का. इसलिए समिति की राय थी कि शासन की तरफ से किसी का दस्तखत न भी हो तो काम चलना चाहिए. इतनी सारी चीजें तैयार करने के बाद तीसरी बैठक में पहली बार गृहमंत्री आए. उनके सामने रखी फाइल खोली सचिव महोदय ने. मंत्री जी ने इबारत पढ़ी. शेर और गांधी के चित्र देखे. मुंह बिचकाया. कहा कि ये तो गांधी जी जैसे नहीं लगते.

बैठक में सन्नाटा छाया रहा थोड़ी देर. एक गैरसरकारी सदस्य ने पटाने की कोशिश की कि ये गांधी जी शांति निकेतन से निकले महान कलाकार नंदलाल बसु के बनाए हुए हैं. बेदाग, कड़क सफारी पहने मंत्री जी पर इस कलाकार के नामी ब्रश का कोई धब्बा भी नहीं पड़ सका. बिना प्रभावित हुए उन्होंने कहा, ‘नोटों पर गांधी जी जैसे साफ-साफ दिखते हैं वैसा बनाइए.’ इबारत, दस्तखत आदि की बारीकियों में गए बिना बैठक खत्म हो गई. चार मिनट चली यह बैठक.

अगली बैठक में मंत्रालय के सचिव बदल गए. नए जो आए उन्हें सदस्यों ने फिर पूरी कहानी बताई. यह भी कि नोट वाले गांधी कागज पर छपते हैं, ताम्र पत्र पर वैसे बारीक गांधी छप नहीं सकते. नंदलाल जी वाले गांधी सबसे सुंदर और व्यावहारिक दिखेंगे. सचिव को बात नहीं जमी. मंत्री जी की राय से उनकी राय भला कैसे अलग होती.

इसी बीच मुंबई में आतंकवादियों ने जगह-जगह हमले किए. गृहमंत्री भी वहां गए और कीचड़ में उतरे या नहीं, इसे लेकर बड़ा विवाद उठा. गृहमंत्री जी भी बदल दिए गए. नए जो आए उन पर और भी कई जिम्मेदारियां थीं. सो, इस पुरानी समिति की फाइल नए गृहमंत्री की मेज पर कभी दोबारा नहीं रखी गई.

ताम्र पत्र, राष्ट्र की तरफ से कृतज्ञता भरी छोटी-सी प्यार भरी इबारत और नंदलाल बसु के गांधी जी अकेले ही चलते रहे. और नोट पर छपे गांधी!

इस बीच कुछ लाखों-करोड़ों के हुए घोटाले की बास इतनी तेजी से उठी है कि इस छोटे से किस्से की बास भला किसे आने वाली.