Home Blog Page 1529

गुरुजी के सबक का सबब

सात जनवरी को झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) प्रमुख शिबू सोरेन के रांची आवास पर गहमागहमी थी. नेताओं-कार्यकर्ताओं की भीड़ में सरकार रहेगी या जाएगी, इस पर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही थीं. तभी मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा वहां पहुंचे. यह दिन के करीब साढ़े बारह बजे की बात है. आधा घंटे तक वे अपने मूल राजनीतिक गुरु शिबू सोरेन के आवास पर रुके. बात फैली कि यह सत्ता बचाने की आखिरी कोशिश है. यह भी कि अर्जुन मुंडा क्राइसिस मैनेजमेंट में माहिर हैं, बात बन जाएगी. अंदरखाने से निकले एक झामुमो नेता बोले, ‘शिबू सोरेन तीन दिन का और समय देने पर राजी हो रहे हैं.’ मोहलत की इस खबर से कुछ लोगों ने राहत की सांस ली.
मामला सुलझता दिख रहा था, लेकिन पार्टी नेताओं की बैठक शुरू होने के बाद अचानक बात गड़बड़ा गई. एक वरिष्ठ झामुमो नेता बताते हैं, ‘झामुमो खेमे के मंत्रियों में अधिकांश ने सरकार नहीं गिराने की बात कही थी. परेशान शिबू सोरेन बैठक से उठकर अपने कमरे में गए. वहां उनकी नजर टीवी पर आ रही खबरों पर पड़ी. एक नेता का बयान आ रहा था कि झामुमो की कोई बात नहीं मानेंगे. शिबू ने पूछा कि यह कौन नेता है! बताया गया कि झारखंड भाजपा के प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान हैं. कमरे से निकलकर शिबू सोरेन ने कहा कि ‘अब तीन दिन का समय नहीं दिया जाएगा,  सरकार से समर्थन आज ही वापस लेंगे.’ सूत्रों के मुताबिक शिबू के ऐसा कहने से वे मंत्री भी हक्के-बक्के रह गए जो सरकार गिराने के फैसले का विरोध कर रहे थे.

लेकिन ऐसा लगा जैसे शिबू सोरेन के बेटे और राज्य के उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस इशारे के इंतजार में ही थे. वे बाहर निकले और मीडियाकर्मियों को बयान दे दिया कि पार्टी सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करती है. हेमंत जब यह एलान कर रहे थे तब झामुमो के ही दो वरिष्ठ नेताओं साइमन मरांडी और हेमलाल मुर्मू के चेहरे पर उभरा तनाव साफ दिख रहा था. सूत्रों के मुताबिक इसके बाद भीतर हो रही बैठक में वे बिफरे भी कि हेमंत कौन होते हैं यह एलान करने वाले. बेटे की घोषणा पर अंदरूनी विवाद और न गहराए, इसलिए आधे घंटे में शिबू खुद मीडिया के सामने आए और उन्होंने बेटे हेमंत की बात पर मुहर लगा दी.

एक पखवाड़े से अधिक समय से सरकार पर संकट छाया था. इसके बावजूद भाजपा का कोई केंद्रीय नेता इसके हल की कोई संभावना तलाशने रांची नहीं आया

झामुमो के वरिष्ठ नेता यह किस्सा ऐसे सुनाते हैं जैसे टीवी पर दिखे झारखंड भाजपा प्रभारी के बयान की वजह से सरकार चली गई. जबकि उस दिन अपने ही नेताओं से घिरते जाने के बाद परेशान शिबू सोरेन की छटपटाहट और हेमंत सोरेन में सत्तापलट करने की अकुलाहट साफ-साफ दूसरी कहानी बयान कर रही थी.

खबर लिखे जाने तक झारखंड के राज्यपाल सैय्यद अहमद राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर चुके हैं. अपने 12 वर्षों के सफर में झारखंड आठ मुख्यमंत्री और दो राष्ट्रपति शासन देख चुका है. इस बार सत्ता की सियासत साधने के लिए चले खेल के आखिरी परिणाम से यह बात साफ हुई है कि एक समय सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन में संघर्ष के जरिए अहम भूमिका निभाने के चलते गुरुजी और दिशोम गुरु के नाम से प्रतिष्ठित हुए और बाद में पूरी तरह से परिवारवाद के पोषक बने शिबू सोरेन की आखिरी महत्वाकांक्षा यही है कि उनका बेटा उनके सामने एक बार मुख्यमंत्री जरूर बने. जानकारों के मुताबिक शिबू ऐसा इसलिए भी चाहते हैं कि झामुमो में बुजुर्ग-वरिष्ठ हो चले नेताओं से लेकर नए-नवेले कार्यकर्ता भी यह मान लें कि उनके बाद झामुमो के तारणहार सिर्फ और सिर्फ उनके बेटे हेमंत ही हैं और उन्हें ही उनका असली उत्तराधिकारी माना जाए.
लेकिन क्या सरकार की असामयिक बलि तीन बार मुख्यमंत्री बनने का मौका जुगाड़ लेने के बावजूद एक साल भी उस पद पर रह पाने में नाकाम शिबू सोरेन, उनके बेटे हेमंत सोरेन और पार्टी झामुमो को इस मकसद में सफल होने देगी? जानकार बताते हैं कि इतनी आसानी से नहीं, क्योंकि झामुमो अब बैकफुट पर है और गेंद पूरी तरह कांग्रेस के पाले में जा चुकी है. कांग्रेस झामुमो को अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करना जानती है, इसलिए हेमंत की रांची-दिल्ली दौड़ और छटपटाहट के बाद भी कांग्रेसी नेता इत्मीनान के मूड में दिखे. झारखंड कांग्रेस के प्रभारी शकील अहमद का कहना था, ‘हमें कोई जल्दबाजी नहीं, भाजपा और झामुमो की अंदरूनी लड़ाई में सरकार गई है और इसमें हम किसी भी तरह की पहल तभी करेंगे जब पूरी तरह से आश्वस्त हो जाएं.’

कांग्रेस अपनी सुविधानुसार पूरी तरह आश्वस्त होने की प्रक्रिया में है. झामुमो समेत दूसरे कई दलों के नेता और मौके की ताक में बैठे निर्दलीय सरकार बनवाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर एक किए हुए हैं जबकि भाजपा, सरकार की दूसरी सहयोगी पार्टी आजसू और राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा फिर से चुनाव के पक्ष में हैं. मरांडी कहते हैं कि फिर से सरकार बनने देने का कोई औचित्य नहीं क्योंकि इसके लिए तमाम समझौते होंगे इसलिए बेहतर है कि नया जनादेश प्राप्त किया जाए. सरकार में तीसरी साझेदार रही आजसू के प्रमुख और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुदेश महतो भी कहते हैं कि फिर से चुनाव हो. फिलहाल 81 सदस्यों वाली राज्य विधानसभा में भाजपा और झामुमो, दोनों के पास 18-18 विधायक हैं.

सरकार के तीसरे सहयोगी आजसू के पास छह विधायक हैं. झारखंड विकास मोर्चा के 11 और कांग्रेस के 13 विधायक हैं. राजद के पांच विधायक हैं, भाकपा माले के पास एक सीट है और शेष पर निर्दलीयों का कब्जा है. झामुमो और कांग्रेस के पास यह आसान विकल्प है कि फिर से चुनाव की मांग कर रहे भाजपा, आजसू और झाविमो को छोड़कर भी आपस में तमाम किस्म के समझौते करके सरकार बना ली जाए. लेकिन ऐसी सरकार का क्या होगा और वह कितनी कारगर होगी, झारखंड के लोगों को इसका लंबा अनुभव रहा है. भाकपा माले के विधायक विनोद सिंह कहते हैं, ‘अब फिर से समझौतावादी रुख से सरकार बनाने के बजाय जनता पर फैसला छोड़ा जाए क्योंकि यह तो साफ हुआ कि झामुमो और भाजपा के मेल से यह सरकार राज्यहित में नहीं बनी थी. समझौते के तहत अगली सरकार भी राज्यहित में नहीं बनेगी.’

आगे क्या होगा यह तो दिल्ली में तय होगा, लेकिन सरकार बनाने-बिगाड़ने के इस खेल के बाद राज्य की राजनीति में झामुमो और भाजपा का क्या होगा, यह झारखंड में ही तय होना है क्योंकि सरकार के बनने और अब चले जाने की अंदरूनी कहानी से लोग धीरे-धीरे वाकिफ होते जाएंगे. अंदरूनी कहानियां कई तरह की हैं. एक बड़ी बात तो शिबू सोरेन का पुत्रमोह है ही, उसके समानांतर ही सरकार जाने के पीछे और भी कई चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में हैं. एक तो यह कि शिबू सोरेन और उनके बेटे हेमंत सोरेन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति से लेकर कोयला घोटाले तक में सीबीआई का शिकंजा कसने की संभावना बढ़ती जा रही थी, इसलिए याचक की तरह केंद्र सरकार की शरण में जाना झामुमो की मजबूरी हो गई थी.

दूसरी चर्चा यह चल रही है कि झारखंड का संथाल परगना झारखंड मुक्ति मोर्चा का गढ़ रहा है और  वहां भाजपा लगातार झामुमो को कमजोर करने के अभियान में लगी हुई थी. उदाहरण के लिए, भाजपा के राज्यसभा सांसद निशिकांत दुबे वहां लगातार झामुमो पर वाकप्रहार कर रहे थे, शिबू सोरेन को भ्रष्ट नेता बता रहे थे. उधर, भाजपा-झामुमो की अंदरूनी लड़ाई का फायदा उठाने के लिए राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी लगातार संथाल परगना में कैंप भी करने लगे थे. संथाल में बाबूलाल की मजबूत पकड़ रही है और जानकारों के मुताबिक झामुमो को यह डर सताने लगा था कि भाजपा वहां अगर झामुमो के खिलाफ काम करती रही तो वह अपना कुछ भला करे ना करे, बाबूलाल मरांडी जरूर मजबूत होते जाएंगे. जानकारों के मुताबिक ऐसे में जरूरी था कि अपना गढ़ बचाने के लिए झामुमो सरकार से अलग हो जाए. 

चर्चा यह भी चल रही है कि इस सरकार को झामुमो ने भाजपा को समर्थन देकर बनवाया ही इसलिए था ताकि समय आने पर बदला लिया जा सके. दरअसल 2010 में शिबू सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री बने थे और तब भाजपा समर्थन दे रही थी. भाजपा ने भी तब झामुमो को बैकफुट पर लाकर समर्थन वापस ले लिया था और 30 मई, 2010 को आखिरकार सोरेन को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था. उसके बाद फिर दोनों दलों के सहयोग से सरकार बनी. इस बार झामुमो भाजपा को बैकफुट पर लाई और बीच में समर्थन वापसी करके उसने अपने नेताओं को सत्ताच्युत करने से उभरे जख्मों को भरते हुए हिसाब-किताब बराबर किया. एक जानकार यह भी बताते हैं कि खनन और दूसरे किस्म के ठेकों में भाजपा और आजसू के कार्यकर्ताओं-नेताओं का दबदबा बढ़ता जा रहा था. ऐसे में झामुमो कार्यकर्ता और नेता लगातार अपने नेताओं पर दबाव बना रहे थे कि ऐसी सरकार का क्या मतलब जब कोई फायदा ही न हो.

संकेत साफ है कि सरकार जाने की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार हो रही थी. हो सकता है, इनमें से कोई वजह सही हो या एक-एक कर सभी वजहें सही हों. झामुमो ने इसके लिए पहले राज्य में स्थानीय नीति तय करने से लेकर अल्पसंख्यकों के मसले को उठाकर एक पत्ता फेंका था लेकिन इस पर भी उसकी भद ही पिटी. सवाल उठे कि इन दोनों मसलों पर अगर सरकार कुछ नहीं कर रही तो उसमें झामुमो भी बराबर की दोषी है. तब झामुमो ने कहा कि समन्वय ठीक से नहीं हो रहा, इस पर भी उसकी हंसी उड़ी क्योंकि सरकार के समन्वयक खुद शिबू सोरेन थे. इसी बीच शिबू सोरेन काफी दिनों से 28-28 माह की सरकार का वास्ता देकर मीडिया को बयान दे रहे थे. हालांकि तब हेमंत ने तहलका से बातचीत में भी कहा था कि ऐसा कोई करार सरकार के लिए नहीं हुआ है.

संकेत साफ है कि सरकार जाने की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार हो रही थी. हो सकता है, इनमें से कोई वजह सही हो या एक-एक कर सभी वजहें सही हों.

लेकिन बाद में हेमंत ने भी अपने पिता का राग दोहराना शुरू कर दिया. एक सीडी भी जारी की गई, जिसमें 28-28 माह के करार की बात सामने आई लेकिन तुरंत ही उस सीडी की बात भी खंडित हो गई क्योंकि वह बातचीत वर्तमान सरकार के बजाय इसके पहले सरकार बनाने की पहल के लिए की गई थी. बात खंडित हो गई लेकिन यह साफ हुआ कि अर्जुन मुंडा ने ऐसे समझौते से सरकार बनाने की कोशिश की थी.

अभी जो सरकार चल रही थी वह भी भाजपा संसदीय बोर्ड के फैसले के उलट जाकर बनाई गई थी. अर्जुन मुंडा की यह सरकार नहीं बचे, इसे लेकर राज्य के कुछ भाजपाई नेता तो बहुत दिनों से भीतरघात कर ही रहे थे लेकिन इस संकट के दौरान यह भी साफ हुआ कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी इस सरकार को ज्यादा पसंद नहीं कर रहा था. एक पखवाड़े से अधिक समय से सरकार पर संकट छाने के बावजूद पार्टी का कोई केंद्रीय नेता इसमें पहल करने को नहीं आया. जानकारों का मानना है कि अर्जुन मुंडा आखिरी दिन तक शिबू सोरेन के आवास पर जिस तरह से अपनी सत्ता बचाने की ललक लिए हुए पहुंचे थे, उससे यह भी साफ होता है कि झामुमो की लाख लताड़ के बावजूद वे सत्ता के लिए बेचैन थे.

आखिर में सवाल उठता है कि अगर चुनाव हो तो कोई स्थायी सरकार बनने की कितनी संभावना है. जानकारों के मुताबिक फिलहाल जो राजनीतिक हालात हैं उनमें यह कतई संभव नहीं दिखता. तो फिर क्या रास्ता है जिससे झारखंड राजनीतिक प्रयोगशाला बनने से मुक्त हो जाए? इसका एक जवाब बिहार के दो नेताओं के बयान से आता है. लालू प्रसाद कहते हैं कि बिहार-झारखंड को फिर से एक कर दिया जाए. और नीतीश कुमार का मानना है कि झारखंड में विधानसभा सीटों की संख्या कम से कम 150 की जाए नहीं तो यह संकट बना ही रहेगा.    

अधिकार पर वार

उत्तराखंड के एक व्यक्ति को अपनी शिक्षिका पुत्री के लिए एक शिक्षक वर की तलाश थी. इन महोदय को एक अनोखा आइडिया सूझा. इन्होंने सोचा कि क्यों न सूचना के अधिकार या आरटीआई के तहत एक हनुमान  रूपी आवेदन भेजकर शिक्षक वरों की सूचनाओं का पूरा पहाड़ ही मंगा लिया जाए. जनाब ने उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में एक आवेदन दाखिल किया. इसमें उन्होंने प्रदेश में एक निश्चित आयु वर्ग तक के शिक्षकों के नाम, उनकी शैक्षिक योग्यताएं, तैनाती स्थल, मूल निवास आदि की सूचना मांगी. एक महीने से भी कम समय और मात्र 10 रुपये में इनको योग्य वरों की संपूर्ण सूची उपलब्ध हो गई. फिर इन्होंने अपनी पसंद के हिसाब से अपनी बेटी का रिश्ता भी करवा दिया. दामाद ढूंढ़ने का इससे सस्ता, सुलभ और प्रामाणिक तरीका शायद ही कोई और हो.

सहारनपुर के पवन विहार में रहने वाले एक युवक का रिश्ता मेरठ से तय हुआ तो लड़की के परिजनों ने सहारनपुर एसएसपी के दफ्तर में सूचना का आवेदन करके पूछ लिया कि संबंधित लड़के का नाम किसी आपराधिक गतिविधि के लिए पुलिस रिकॉर्ड में तो नहीं है. आरटीआई के जरिए होने वाले दामाद का पुलिस रिकॉर्ड सुनिश्चित करने के बाद ही बात आगे बढ़ी.

 ‘यदि मान भी लिया जाए कि कुछ लोग आरटीआई द्वारा अधिकारियों को ब्लैकमेल कर रहे हैं तो भी कोई ईमानदार अधिकारी इस बात से कभी नहीं घबराएगा’

आरटीआई से जुड़े ये किस्से सुनने में दिलचस्प जरूर लगते हैं, लेकिन ऐसे ही किस्से सरकार को इस कानून के पर कतरने का बहाना दे रहे हैं. ऐसे ही किस्सों के सहारे सरकार इस कानून को कमजोर करने की ताकत हासिल कर रही है. लोकतंत्र में ‘लोक’ के प्रति ‘तंत्र’ की जवाबदेही होना आवश्यक है. सूचना के अधिकार ने यह काम बखूबी किया भी है जिसके लिए इस कानून की खूब तारीफ हुई है. लेकिन आरटीआई के जरिए सरकारी तंत्र के दुरुपयोग का तर्क सरकार द्वारा कई बार दिया जा चुका है. इसके चलते इस कानून को नियंत्रित करने की बात भी उठ रही है. हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी आरटीआई के दुरुपयोग का हवाला देते हुए इसकी समीक्षा की बात कही थी. तमाम राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया. भारी विरोध के चलते केंद्र सरकार भले ही आरटीआई में प्रस्तावित संशोधन से पीछे हट गई हो, लेकिन अलग-अलग राज्यों के आरटीआई प्रावधान देखे जाएं तो साफ हो जाता है कि इस कानून को कमजोर करने की पहल हो चुकी है.

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 एक केंद्रीय अधिनियम है. लेकिन देश भर के सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, उच्च न्यायालयों, विधान सभाओं, सर्वोच्च न्यायालय, संसद के दोनों सदनों और सभी सूचना आयोगों को आरटीआई से संबंधित अपने नियम बनाने का अधिकार है. इस तरह पूरे देश में आरटीआई के 100 से भी ज्यादा अलग-अलग नियम हो जाते हैं. नियम बनाने की इसी ताकत के जरिए कई राज्यों और संस्थाओं ने धीरे-धीरे इस अधिकार को आम आदमी की पहुंच से बाहर करने का रास्ता ढूंढ़ निकाला है.आरटीआई हर आदमी की पहुंच में रहे, इस मकसद से इसके तहत आवेदन शुल्क मात्र 10 रुपये निर्धारित किया गया था. लेकिन कई राज्यों ने यह शुल्क बढ़ा दिया है. हरियाणा में तो आरटीआई के अंतर्गत आवेदन शुल्क शुरू से ही 50 रुपये निर्धारित किया गया था. अब अन्य राज्यों और संवैधानिक संस्थाओं ने भी शुल्क बढ़ाना शुरू कर दिया है. उत्तर प्रदेश विधान सभा तो आरटीआई की मूल अवधारणा को लगभग समाप्त ही कर चुकी है.

उत्तर प्रदेश विधान सभा से यदि आपको कोई सूचना प्राप्त करनी है तो 500 रुपये आवेदन शुल्क के तौर पर अदा करने होंगे, साथ ही मांगी गई सूचना का भुगतान 15 रुपये प्रति पेज की दर से देना होगा. इतना ही नहीं, विधान सभा के नियमों में यह भी शामिल है कि एक आवेदन-पत्र में केवल एक ही बिंदु पर सूचना मांगी जा सकती है. इन नियमों से भी यदि आप हताश नहीं हुए और सूचना लेने पर अड़े रहे तो भी जरूरी नहीं कि आपको सूचना मिल ही जाए. आपके आवेदन को इस नियम के आधार पर भी ठुकराया जा सकता है जो कहता है कि ‘यदि अनुरोध पत्र में प्रयुक्त भाषा उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रतिष्ठा या गरिमा के विरुद्ध हो तो भी सूचना प्रदान करने से इनकार किया जा सकता है.’ सिर्फ विधान सभा ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय और सभी जिला न्यायालयों में भी सूचना प्राप्त करने के नियम कुछ ऐसे ही हैं. हालांकि न्यायिक क्षेत्र में आवेदन शुल्क को 500 रुपये से घटाकर 250 रुपये कर दिया गया है.

‘देश में वर्षों से काम अव्यवस्थित तरीकों से होता आया है. आरटीआई आने के बाद कुछ लोगों को रातों-रात सब कुछ व्यवस्थित चाहिए जो व्यवहार में संभव नहीं है’

छत्तीसगढ़ विधान सभा में भी उत्तर प्रदेश की ही तरह आवेदन शुल्क 500 रुपये कर दिया गया है. यही नहीं, यहां पहले गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) रहने वाला कोई व्यक्ति बिना किसी शुल्क के ही सूचना प्राप्त कर सकता था. अब उसे यह छूट सिर्फ उन्हीं मामलों में मिलेगी जब मांगी गई सूचना का लेना-देना उससे ही हो. इसके अलावा यदि छत्तीसगढ़ के किसी भी विभाग से कोई बीपीएल कार्ड-धारक सार्वजनिक सूचना चाहता है तो उसे बस 50 पेज तक की ही सूचना नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएगी. सिर्फ आवेदन शुल्क के जरिए ही नहीं, कई और तरीकों से भी आरटीआई कानून को कमजोर और सीमित करने की कोशिशें हो रही हैं. महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में आरटीआई के तहत किए जाने वाले आवेदन को 150 शब्दों तक ही सीमित करने का नियम बनाया गया है. साथ ही प्रत्येक आवेदन एक ही विषय पर होना भी जरूरी है. झारखंड के आरटीआई कार्यकर्ता सुमित कुमार महतो कहते हैं, ‘झारखंड उच्च न्यायालय में तो आवेदन शुल्क बढ़ाने के साथ ही नियमों में यह भी जोड़ दिया गया है कि सूचना प्राप्त हेतु आवेदक की मंशा क्या है. कई आवेदन सिर्फ यह कहकर खारिज कर दिए जाते हैं कि आवेदक की मंशा ठीक नहीं है.’ जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर जब भी इस कानून को कमजोर करने की बात उठी है तो पूरे देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसका व्यापक विरोध किया है. शायद यही कारण है कि अब राज्यों और संस्थाओं के स्तर पर आरटीआई को कई तरीकों से सीमित करने की कोशिश की जा रही है.

विभिन्न स्तरों पर आरटीआई को कमजोर करने की जो मुहिम पूरे देश में चल रही है इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क यही दिया जाता है कि इस अधिकार का दुरुपयोग बहुत व्यापक स्तर पर हो रहा है और कई लोग आरटीआई के जरिए ब्लैकमेलिंग का धंधा करने लगे हैं. वैसे इस तर्क को पूरी तरह से नकारा भी नहीं जा सकता. व्यापक स्तर पर न सही लेकिन ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जहां इस अधिकार का इस्तेमाल दुर्भावना से और ब्लैकमेलिंग के लिए ही किया जा रहा है. ऐसे ही मामले सरकार और संस्थाओं को इस कानून को कमजोर करने का बल भी प्रदान कर रहे हैं. ठाणे में एक इंजीनियर द्वारा एक स्थानीय आरटीआई कार्यकर्ता के साथ मिलकर एक डॉक्टर को ब्लैकमेल करने का मामला चर्चा का विषय बन चुका है. इस मामले में आरोपित इंजीनियर अजीत कार्निक और आरटीआई कार्यकर्ता मुकेश कनाकिया ने मिलकर एक डॉक्टर से 2.75 लाख रुपये की मांग की थी. यह मांग वह आरटीआई आवेदन वापस लेने के लिए की गई थी जिसमें आवासीय कॉलोनी में नर्सिंग होम चलाए जाने संबंधी सूचना मांगी गई थी. ऐसा ही एक मामला उत्तराखंड का भी है जहां जिलाधिकारी कार्यालय से प्लाटों के आवंटन संबंधी सूचना मांगी गई थी.

सूत्र बताते हैं कि टिहरी जिले के मसूरी-चंबा फल पट्टी पर दो प्लॉट अवैध रूप से आवंटित किए गए थे. कुछ आरटीआई कार्यकर्ताओं ने इससे संबंधित सूचनाओं हेतु आवेदन विभाग में किया और कुछ दिनों बाद आवेदन वापस ले लिया गया. इस पूरे मामले में 7-8 लाख रुपये में समझौता होने की बात कही जा रही है. उत्तराखंड में ‘सूचना का अधिकार हेल्पलाइन’ चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता मोहन नेगी बताते हैं, ‘कुछ तथाकथित पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता इस कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं. इन लोगों के संपर्क विभाग के ही कुछ लोगों से होते हैं जो इन्हें गड़बड़ी की सूचना दे देते हैं. जहां भी इन लोगों को किसी गड़बड़ी की भनक लगती है वहां ये लोग आरटीआई आवेदन की धमकी देकर अपना हिस्सा मांग लेते हैं. निशंक सरकार के दौरान तो ऐसे कुछ लोगों की जांच भी करवाई गई थी.’ नेगी का मानना है कि ऐसे लोगों का खुलासा होना बहुत जरूरी है क्योंकि इन्हीं के कारण आरटीआई जैसा महत्वपूर्ण कानून बदनाम होता है और सरकार को इसे कमजोर करने का बहाना मिल जाता है. वे कहते हैं, ‘ऐसे कुछ लोगों की करतूतों का परिणाम पूरे समाज को ही भुगतना पड़ता है.’

ऐसे ही कुछ मामले देश के अन्य हिस्सों से भी हैं जिनको आधार बनाकर आरटीआई पर रोक लगाने की वकालत की जाती है. लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं कि कानून को कमजोर कर देना इस समस्या का समाधान कत्तइ नहीं हो सकता. महाराष्ट्र के ‘माहिती अधिकार मंच’ से जुड़े आरटीआई कार्यकर्ता भास्कर प्रभु कहते हैं, ‘पूरे देश में आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों में से मुश्किल से एक फीसदी ही ऐसे लोग हैं जो इस अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हों. इन एक फीसदी लोगों का उदाहरण देकर देश के करोड़ों लोगों से उनका अधिकार छीन लेना या उसे कमजोर कर देना बिल्कुल भी सही नहीं ठहराया जा सकता.’ ‘हरियाणा सूचना का अधिकार मंच’ के राज्य संयोजक सुभाष कहते हैं, ‘यदि मान भी लिया जाए कि कुछ लोग आरटीआई द्वारा अधिकारियों को ब्लैकमेल कर रहे हैं तो भी कोई ईमानदार अधिकारी इस बात से कभी नहीं घबराएगा. आरटीआई से सिर्फ उसी को ब्लैकमेल किया जा सकता है जो खुद किसी भ्रष्टाचार में लिप्त होगा. क्या ऐसे भ्रष्ट लोगों की चिंता करते हुए आरटीआई पर रोक लगाना उचित होगा?’

आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि कई-कई पन्नों के आवेदन लोग किसी दुर्भावना से नहीं बल्कि जागरूकता के अभाव में भी करते हैं

वैसे देश में जहां भी आरटीआई को दुर्भावना के साथ इस्तेमाल करने के मामले सामने आए हैं उनमें से कुछ मामलों में ऐसा करने वालों को दंडित भी किया गया है. दिल्ली स्थित एक संस्था ‘पारदर्शिता पब्लिक वेलफेयर फाउंडेशन’ द्वारा दिल्ली नगर निगम में एक आवेदन दाखिल करके पूछा गया था कि क्या विभाग के दक्षिण जोन के किसी अधिकारी को यौन रोग है और क्या किसी की सरोगेट या सौतेली मां है. साथ ही आवेदन में एक इंजीनियर की डीएनए रिपोर्ट भी मांगी गई थी. एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान जब उच्च न्यायालय के संज्ञान में यह बात आई तो कोर्ट ने आरटीआई का गलत इस्तेमाल करने के लिए संस्था पर 75 हजार रु का जुर्माना लगाया. छत्तीसगढ़ के आरटीआई विशेषज्ञ और ‘छत्तीसगढ़ सिटिजनस इनिशिएटिव’ के राज्य समन्वयक प्रतीक पांडे कहते हैं, ‘आरटीआई अधिनियम में ही वह प्रावधान मौजूद है जिसके तहत नाजायज सूचना मांगे जाने पर आवेदन ठुकराया जा सकता है. छत्तीसगढ़ सूचना आयोग द्वारा एक व्यक्ति के 200 आवेदन इसीलिए खारिज कर दिए गए थे क्योंकि वे अनुचित थे. हल यह नहीं है कि कानून को कमजोर कर दिया जाए.’

कई लोगों का यह भी मानना है कि सूचना के अधिकार ने कई लोगों को जरूरत से ज्यादा ही सक्रिय कर दिया है. गुजरात की आरटीआई कार्यकर्ता पंक्ति जोग मानती हैं कि इस देश में कई वर्षों से काम अव्यवस्थित तरीकों से होता आया है. सरकारी विभागों में आज भी अधिकतर दस्तावेज अव्यवस्थित ही हैं, लेकिन आरटीआई के आने से कुछ लोगों को रातों-रात सब कुछ व्यवस्थित चाहिए जो व्यवहार में संभव नहीं है. पंक्ति कहती हैं, ‘कई लोग ऐसे भी हैं जो इस अधिकार का उपयोग किसी पैसे के लिए नहीं बल्कि नाम के लिए कर रहे हैं. इस अधिकार ने सभी लोगों को एक्टिविस्ट और अतिसक्रिय बना दिया है. कई ऐसे लोग भी हैं जो अब खाली समय में आरटीआई आवेदन बनाने का ही काम कर रहे हैं. इनका उद्देश्य किसी को तंग करना या ब्लैकमेल करना नहीं है, लेकिन इन्हें समाज सेवक के रूप में मशहूर होना है तो इन्होंने आरटीआई को रास्ता बनाया है. इनमें रिटायर्ड लोग भी हैं और सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं.’ गुजरात के दूरदर्शन केंद्र का उदाहरण देते हुए पंक्ति बताती हैं कि इस विभाग के एक तृतीय श्रेणी के कर्मचारी ने सारे विभाग की नाक में दम कर रखा है.

इस कर्मचारी द्वारा अपने ही विभाग में लगभग 700 आरटीआई आवेदन दाखिल किये गए हैं. नए-नए आरटीआई एक्टिविस्ट बने इन कर्मचारी का खौफ पूरे विभाग में इतना है कि ये महोदय अब ऑफिस में बैठ कर भी बस आरटीआई आवेदन ही बनाते रहते हैं, लेकिन कोई भी अधिकारी इन्हें कुछ नहीं बोलता. इनके द्वारा रोज लगभग 30-35 आवेदन अपने ही विभाग में दाखिल किए जाते हैं. कुछ आवेदनों में तो यह भी पूछा जाता है कि फलां कमरे में रखी फलां अलमारी की कितनी चाबियां हैं. ये कर्मचारी कुछ राष्ट्रीय आरटीआई कार्यकर्ताओं के भी काफी नजदीकी हैं, इसलिए विभाग के अधिकारी भी इन्हें कुछ बोलने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते. पंक्ति जोग ‘माहिती अधिकार गुजरात पहल’ की समन्वयक हैं और आरटीआई कानून के लागू होने से पहले से ही इस अधिकार के आंदोलन में शामिल रही हैं. आरटीआई के ऐसे उपयोग पर वे कहती हैं, ‘ऐसे ही कुछ लोगों की वजह से अब लोग आरटीआई कार्यकर्ताओं के नाम से ही तंग आने लगे हैं. हमें तो अब खुद को आरटीआई कार्यकर्ता बताते हुए भी शर्म महसूस होती है. हम किसी से नहीं कहते कि हम आरटीआई कार्यकर्ता हैं.’ लेकिन पंक्ति इसके लिए एक हद तक सरकारी विभागों को भी जिम्मेदार मानती हैं. वे कहती हैं, ‘जिन जानकारियों को विभाग द्वारा सार्वजानिक कर दिया जाना था, उनमें से 15 प्रतिशत भी सार्वजनिक नहीं हुई हैं. ऐसे में लोग यदि सूचनाओं के लिए आवेदन करते भी हैं तो उन्हें गलत नहीं ठहराया जा सकता.’

सभी राज्यों के सूचना आयोगों में लंबित मामलों की सूची इतनी बड़ी है कि कई जगह तो चार-पांच साल से लोगों की अपील की सुनवाई ही नहीं हुई है

छत्तीसगढ़ में आरटीआई के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्था ‘समर्थन’ से जुड़े दिनेश कहते हैं, ‘किसी भी जगह के आरटीआई आवेदकों की सूची पर यदि गौर किया जाए तो आप पाएंगे कि हर जगह कुछ ऐसे लोग मौजूद हैं जो लगातार इस कानून का उपयोग कर रहे हैं. इनमें अच्छे लोग भी हैं और बुरे भी हैं जिनमें फर्क कर पाना काफी मुश्किल है. लेकिन इतना जरूर देखा गया है कि जब भी किसी व्यक्ति को आरटीआई में थोड़ी-सी भी महारत हासिल हो जाती है और सरकारी कर्मचारी इन्हें सम्मान देने लगते हैं तो ये लोग भी समझौता करना सीख जाते हैं. यहीं से आरटीआई की बर्बादी शुरू हो जाती है.’ छत्तीसगढ़ के ही आरटीआई विशेषज्ञ प्रतीक पांडे लोगों द्वारा लगातार आरटीआई के इस्तेमाल को सही ठहराते हुए कहते हैं, ‘आरटीआई एक ऐसा लड्डू है जिसे एक बार खाने के बाद लोग बार-बार खाना चाहते हैं. इसमें कोई बुराई भी नहीं है, हर व्यक्ति को गणतंत्र में यह अधिकार तो अनिवार्य रूप से होना ही चाहिए. सरकार स्वतः ही सूचनाएं सार्वजानिक करने में जितनी पारदर्शिता बरतेगी, लोग उतना ही आवेदन कम करेंगे. लेकिन आज तो सरकारी विभागों ने धारा चार के अंतर्गत बहुत ही कम सूचनाएं सार्वजनिक की हैं.’

आरटीआई एक्ट की धारा चार के अंतर्गत सभी सरकारी विभागों को कई जानकारियां स्वतः ही सार्वजनिक करनी होती हैं. पूरे देश में शायद ही कोई ऐसा विभाग हो जिसके द्वारा धारा चार का पूर्ण रूप से पालन किया जा रहा हो. लगभग सभी राज्यों के आरटीआई कार्यकर्ता इन जानकारियों को सार्वजनिक न किए जाने को एक भारी समस्या मानते हैं. महाराष्ट्र के भास्कर प्रभु कहते हैं, ‘विभागों द्वारा धारा चार के तहत बहुत ही कम जानकारियां सार्वजनिक करना ही लोगों को अधिक से अधिक आवेदन दाखिल करने पर मजबूर करता है, लेकिन अब तो लोगों के इस अधिकार को भी सीमित किया जा रहा है. प्रदेश सरकार ने आरटीआई आवेदन को 150 शब्दों तक सीमित कर ऐसा ही किया है. ऐसा करने के पीछे सरकार तर्क देती है कि लोग कई-कई पन्नों के आवेदन देकर आरटीआई का दुरुपयोग कर रहे हैं.’ एक ही आवेदन पत्र में कई जानकारियां मांगने और कई-कई पन्नों के आवेदन पत्रों को आरटीआई का दुरुपयोग मानते हुए कुछ राज्यों ने आवेदन पत्र में शब्दों की सीमा निर्धारित कर दी है.

लेकिन क्या वास्तव में कई-कई पन्नों का आवेदन देना आरटीआई का दुरुपयोग है? आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि ऐसे आवेदन लोग किसी दुर्भावना से नहीं बल्कि जागरूकता के अभाव में भी करते हैं. छत्तीसगढ़ के आरटीआई कार्यकर्ता दिनेश बताते हैं कि चूंकि हर व्यक्ति आवेदन लिखने में परिपक्व नहीं होता इसलिए सीमित शब्दों में अपनी बात स्पष्ट नहीं कर पता. ‘हरियाणा सूचना अधिकार मंच’ के सुभाष भी ऐसे आवेदनों को दुरुपयोग न मान कर लोगों की अपरिपक्वता ही मानते हैं. ऑल इंडिया रेडियो, रोहतक का किस्सा सुनाते हुए सुभाष बताते हैं कि एक आवेदक ने यहां के निदेशक से उनकी सरकारी गाड़ी के खर्चे का ब्यौरा मांगना चाहा. इस आवेदक ने सीधे सवाल करने के बजाय घुमा-फिरा कर कुल 79 सवाल पूछे जिनमें यह तक पूछा गया था कि जब निदेशक महोदया जा रही थीं तो गाड़ी में उनके बाएं कौन बैठा था और उनके दाएं कौन. आवेदन पत्र में पूछे गए कुल 79 सवालों में से कोई पांच या छह सवाल ही सही थे. सुभाष आगे बताते हैं, ‘लोग आवेदन पत्र में स्पष्ट प्रश्न पूछने से कतराते हैं इसलिए अपनी बात को घुमा-फिरा कर लिखते हैं. इसे अधिकार का दुरुपयोग नहीं बल्कि उनकी जागरूकता की कमी कहना ही बेहतर होगा.

लोक सूचना अधिकारी यदि आवेदकों की सहायता करें तो ऐसी कई समस्याएं आसानी से सुलझाई जा सकती हैं ‘सूचना का अधिकार अधिनियम लागू करवाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका लोक सूचना अधिकारियों की ही होती है. यही वह कड़ी है जो जनता को सीधे इस कानून से जोड़ती है. आरटीआई अधिनियम की यह सबसे जरूरी कड़ी ही सबसे ज्यादा विवादास्पद भी है. आरटीआई को किताबों से धरातल पर उतारने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी इन्ही लोक सूचना अधिकारियों के कंधों पर है, इसलिए लोगों की नाराजगी और निंदा का सामना भी इसी वर्ग को करना पड़ता है. सरकार भी जब आरटीआई अधिनियम को कमजोर करने की बात करती है तो बंदूक इसी वर्ग के कंधों पर होती है और तर्क होता है कि लोक सूचना अधिकारियों का कार्यभार बढ़ रहा है. सूचना देने में यदि देर हुई तो जुर्माना भी इसी वर्ग को भुगतना पड़ता है. अकेले आंध्र प्रदेश में ही पिछले कुछ वर्षों में इन कर्मचारियों पर 4.5 लाख रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगाया जा चुका है. इस तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि लोक सूचना अधिकारियों को अपने आधिकारिक कार्य के साथ ही सूचना आवेदनों का जवाब भी देना होता है.

आवेदनों को प्राथमिकता देना और भी ज्यादा ज़रूरी इसलिए हो जाता है जुर्माने का भय भी हमेशा बना रहता है. उत्तराखंड के शिक्षा विभाग के एक लोक सूचना अधिकारी जगदीश पंत कहते हैं, ‘मेरे पास 20 से 25 आवेदन प्रतिदिन आते हैं. कुछ आवेदनों में तो इतनी ज्यादा सूचनाएं मांगी जाती हैं जिनको इतने कम समय में एकत्रित करना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. हम विभागीय कार्य करें या पूरा समय आवेदनों का जवाब देने में बिता दें?’ पंत शिक्षा विभाग में दाखिल किए गए एक आरटीआई आवेदन का जिक्र करते हुए बताते हैं कि राज्य के शिक्षा निदेशालय में किसी ने एक आवेदन दाखिल करके प्रदेश भर के शिक्षकों की आय का ब्यौरा और सभी की पासबुक की प्रतिलिपि मांगी है. राज्य के निदेशालय से यह आवेदन प्रदेश के सभी ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों को भेजा गया है और उनसे जानकारी देने को कहा गया है. पंत आगे कहते हैं, ‘आरटीआई के तहत आवेदन शुल्क बढ़ाकर 1,000 या 500 रुपये कर देना चाहिए. आवेदन शुल्क 10 रूपए होने के कारण कोई भी कुछ भी जानकारी मांग लेता है.

‘जोश-जोश में कानून तो बना दिया, अब इससे बचने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं’

आवेदन शुल्क यदि 1,000 रुपये हो तो वही व्यक्ति सूचना का आवेदन करेगा जिसे सच में किसी महत्वपूर्ण जानकारी की आवश्यकता होगी.’ हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने भी आरटीआई के दुरुपयोग पर टिप्पणी करते हुए कहा है, ‘देश को ऐसी स्थिति नहीं चाहिए जहां 75 फीसदी सरकारी कर्मचारी अपना 75 फीसदी समय आरटीआई आवेदनों का जवाब देने में ही लगाते रहें. आरटीआई अधिनियम के अंतर्गत जुर्माने का भय इतना भी नहीं बढ़ना चाहिए कि सरकारी कर्मचारी अपने विभागीय कार्य से ज्यादा सूचना आवेदनों के जवाब को प्राथमिकता देने लगें.’

लोक सूचना अधिकारियों को आरटीआई की वजह से होने वाली समस्याओं का सिलसिला यहीं समाप्त नहीं होता. इनकी एक समस्या यह भी है कि अधिकतर इनसे इनके वरिष्ठ अधिकारी के संबंध में सूचनाएं मांगी जाती हैं. ऐसे में जहां एक तरफ इनको अपने विभागीय वरिष्ठ का खौफ होता है तो दूसरी तरफ सूचना आयोग द्वारा जुर्माने का डर भी बना रहता है. आरटीआई कार्यकर्ता भास्कर प्रभु कहते हैं, ‘कई विभागों में निचली श्रेणी के कर्मचारियों को ही लोक सूचना अधिकारी बनाया गया है. ये लोग अधिकतर अपने वरिष्ठ अधिकारी से संबंधित सूचनाएं नहीं दे पाते और जुर्माना  भुगतते हैं. कई जगह सूचना अधिकारी बेवजह ही बलि का बकरा बन जाया करते हैं.’

लेकिन ज्यादातर आरटीआई कार्यकर्ता इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. उनके मुताबिक लोक सूचना अधिकारी ही सूचना न मिलने का सबसे बड़ा कारण हैं और इन अधिकारियों ने सूचना न देने के कई तरीके खोज निकाले हैं. आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष बताते हैं, ‘हरियाणा की ग्राम पंचायतों में सरपंचों को लोक सूचना अधिकारी बनाया गया है. इनके पास जब लोग आरटीआई आवेदन दाखिल करते हैं तो कई बार ये लोग सूचना देने के बजाय खाली लिफाफे भेज दिया करते हैं. एक बार तो लिफाफे का वजन बढ़ाने के लिए एक सरपंच ने लिफाफे में पुराने अखबार के टुकड़े और कुछ कंकड़ भेज दिए थे.’ आरटीआई अधिनियम में यह भी प्रावधान है कि यदि आवेदक अनपढ़ हो तो सूचना अधिकारी को उसके लिए लिखित आवेदन तैयार करना होगा. सुभाष बताते हैं, ‘हरियाणा की ग्राम पंचायतों में तो कई जगह खुद सूचना अधिकारी ही अनपढ़ हैं. ऐसे भी कई किस्से हो चुके हैं जहां आवेदक और अधिकारी दोनों ही अनपढ़ हों. कई बार तो ऐसी स्थिति में आवेदन लिखवाने के लिए लड़ाइयां भी हो चुकी हैं.’

उत्तर प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता इजहर अहमद अंसारी लोक सूचना अधिकारियों के रवैये के बारे में कहते हैं, ‘आरटीआई के लागू होने के कुछ समय तक तो सूचना अधिकारियों में इस कानून का भय था भी, लेकिन अब तो कई सूचना अधिकारी साफ कह देते हैं कि हम सूचना नहीं देंगे, तुम चाहो तो आयोग चले जाओ. सूचना अधिकारी भी जान गए हैं कि सामान्यतः हर व्यक्ति अपील करने आयोग तक जाता ही नहीं, और यदि गया भी तो दो साल तक तो उसका नंबर ही नहीं आएगा.’ सभी राज्यों के सूचना आयोगों में लंबित मामलों की सूची इतनी बड़ी है कि कई जगह तो चार-पांच साल से लोगों की अपीलों की सुनवाई नहीं हुई है. झारखंड के सुमित कुमार महतो बताते हैं, ‘प्रदेश के सूचना आयोग में सुनवाई बंद होने के चलते यहां के सूचना अधिकारियों का रवैया मनमाना हो गया है. विभाग के अपीलीय अधिकारी से तो सूचना अधिकारियों के अच्छे संबंध होते ही हैं. ऐसे में आवेदक उनके पास अपील करने जाएं भी तो उसको कोई न्याय नहीं मिलता.’ पंक्ति जोग कहती हैं, ‘किसी भी विभाग के घोटाले वहां के अधिकारियों से छुपे नहीं होते और अधिकतर मामलों में बड़े अधिकारी खुद घोटालों में शामिल होते हैं. ऐसे में यदि कोई  सूचना मांगे तो विभाग के बड़े अधिकारी और अपीलीय सूचना अधिकारी भी सूचना न देने में लोक सूचना अधिकारी की पूरी सहायता करते हैं.’

कई प्रदेशों में तो सूचना अधिकारी आवेदन के जवाब में इतने ज्यादा दस्तावेज जुटा देते हैं कि आवेदक को शुल्क ही लाखों में देना पड़े. आरटीआई कार्यकर्ताओं का मानना है कि सूचना अधिकारी जान-बूझकर ज्यादा दस्तावेज देने की बात करते हैं ताकि आवेदक को हतोत्साहित कर सकें. उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश के परिवहन निगम से मांगी गई एक सूचना का जवाब हासिल करने के लिए आवेदक से एक लाख 24 हजार रूपये मांगे गए. इतना ज्यादा शुल्क होने के कारण अधिकतर आवेदक जवाब लेने से इनकार कर देते हैं. हरियाणा के आरटीआई कार्यकर्ताओं की मानें तो प्रदेश के कुछ लोक सूचना अधिकारी यहां तक कह देते हैं कि जानकारी से संबंधित दस्तावेज जिस जगह रखे थे वहां आग लग जाने के कारण सूचना नहीं दी जा सकती. कुछ सूचना अधिकारी यह भी कह चुके हैं कि बाढ़ आने के कारण संबंधित दस्तावेज बह चुके हैं या उन्हें
दीमक खा गई है.

सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुए सात साल हो गए हैं. एक तरफ आरटीआई कार्यकर्ता मानते हैं कि अभी तक इस कानून का 50 प्रतिशत उपयोग भी नहीं हो रहा. लोगों को इस अधिकार के प्रति जागरूक करने की कई मुहिमें चलाई जा रही हैं. दूसरी तरफ कई सरकारों ने इसके दुरुपयोग की बात करके इस पर लगाम लगाने की पहल कर दी है. सर्वोच्च न्यायालय भी आरटीआई के दुरुपयोग पर टिप्पणी कर चुका है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या इतने जन आंदोलनों और अथक प्रयासों के बाद हासिल किए गए सूचना के अधिकार को कमजोर करना ही इसका दुरुपयोग रोकने का एकमात्र तरीका है. इस संदर्भ में महाराष्ट्र के भास्कर प्रभु का सुझाव व्यावहारिक लगता है. वे कहते हैं, ‘सरकार का यही तर्क होता है कि कई लोग लगातार इस अधिकार का दुरुपयोग कर रहे हैं और इसके जरिए ब्लैकमेल कर रहे हैं. तो सरकार को हर विभाग में आने वाले आवेदनों को सार्वजनिक कर अपनी वेबसाइट पर डाल देना चाहिए. जब हर आवेदन वेबसाइट पर होगा तो जनता को भी यह पता चलेगा कि कौन व्यक्ति कितने और किस तरह के आवेदन कर रहा है. लगातार कई आवेदन करने वाले और दुर्भावना से सूचना मांगनेवाले व्यक्तियों को जनता भी पहचान सकेगी. ऐसे लोगों को समाज भी स्वीकार नहीं करेगा और तब इन लोगों पर रोक लगाना भी संभव हो सकेगा.’  बात वाजिब भी लगती है, जिन लोगों का हवाला देकर सरकार इस कानून को कमजोर करने की बात कहती है उन लोगों पर रोक लगाना कानून पर रोक लगाए जाने से बेहतर है.    

साक्षात्कार:“जोश-जोश में कानून तो बना दिया, अब इससे बचने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं.”

केंद्रिय सूचना आयुक्त एमएल शर्मा से राहुल कोटियाल की बातचीत.

सात साल बाद आरटीआई को आप कैसे देखते हैं?
आजादी के बाद जो भी कानून बनाए गए हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण सूचना का अधिकार ही है जिसने आम आदमी को सशक्त करने का काम किया है. केंद्रीय सूचना आयोग के स्तर पर तो यह काफी प्रभावी रहा है. हां, कुछ राज्यों में इतना सराहनीय कार्य नकेंद्रिय सूचना आयुक्त एमएल शर्माहीं हो पाया क्योंकि लंबित मामलों की संख्या काफी ज्यादा है, स्टाफ कम है, आवेदनों का निस्तारण नहीं हो पा रहा है और यदि शीघ्र निस्तारण न हो तो सूचना का महत्व ही खत्म हो जाता है. इस सबके बावजूद भी यह कानून एक सफल है क्योंकि इसके जरिए कम से कम आम आदमी को बोलने का मौका तो मिला वरना उसकी तो कोई सुनवाई ही नहीं हो पाती थी. हमारे सामने जब दोनों पक्ष उपस्थित होते हैं तो आम नागरिक जमकर अपनी भड़ास सरकारी कर्मचारियों पर निकालते हैं. मैं तो कहूंगा कि यह कानून ‘सेफ्टी वॉल्व’ का काम कर रहा है जिसके जरिए आम नागरिक सरकार के प्रति अपनी भड़ास निकाल रहे हैं.
इसके दुरूपयोग और अनावश्यक उपयोग की बातें भी पिछले कुछ समय से उठती रही हैं. प्रधानमंत्री और सर्वोच्च न्यायालय  इस सन्दर्भ में टिप्पणी कर चुके हैं.
हां, आरटीआई का दुरुपयोग भी है और इसको नकारा नहीं जा सकता. हमारे सामने ही एक आवेदन आया जिसमें विज्ञान एवं तकनीकी मंत्रालय से किसी ने पूछा था कि ‘मैंने सुना है कि विदेश में एक ऐसी मशीन बनी है जिससे देश के भाग्य का पता लग जाता है. बताया जाए कि वो कौन-सा देश है जहां ऐसी मशीन बनी है और यह भी बताया जाए कि इस देश का भाग्य क्या है; तो ऐसे भी मामले हैं लेकिन यह दुरूपयोग अपवाद के तौर पर ही है. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से सूचना आयोग को बल दे दिया है कि ऐसे मामले यदि आते हैं तो इन्हें सिरे से नकार दिया जाए. आखिर आरटीआई का मतलब सिर्फ नागरिक का ही नहीं बल्कि देश का भला भी है.

विभिन्न सूचना आयोगों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं. क्या इसका एक कारण लोगों द्वारा आरटीआई का अनावश्यक उपयोग भी है?
मैं इसका कारण आरटीआई के अनावश्यक उपयोग को ज्यादा नहीं मानता. स्टाफ की कमी एक बड़ा कारण जरूर है और सूचना आयुक्तों को भी तो ज्यादा काम करना चाहिए. जो भी सूचना आयुक्त एक दिन में 25 से कम मामले देखता है वह ठीक नहीं है. प्रत्येक सूचना आयुक्त को महीने में 400 से 500 मामलों का निस्तारण कर देना चाहिए. लेकिन देश में ऐसे भी आयोग हैं जहां आयुक्त दिन में तीन या चार मामले ही देख रहे हैं. इसके अलावा स्टाफ को बढ़ाए जाने की भी आवश्यकता है. सरकार ने पर्याप्त स्टाफ नहीं दिया है. हमारे केंद्रीय आयोग में ही आप स्टाफ की हालत देख लीजिए. अधिकतर लोग संविदा पर हैं और कई तो सेवानिवृत्त लोग ही काम कर रहे हैं.

कई राज्यों और संस्थाओं ने अपने आरटीआई नियमों में बदलाव कर आवेदन शुल्क 500 रुपये तक कर दिया है. क्या ऐसा करना आरटीआई के मूल उद्देश्य को ही समाप्त करना नहीं है?
आरटीआई के अंतर्गत आवेदन शुल्क 10 रुपये बहुत सोच-समझ कर रखा गया था. अब तंग आकर यदि कोई सरकार या संस्था इसे 20-30 रुपये बढ़ा देती है तो बात फिर भी समझ में आती है लेकिन शुल्क को  500 रुपये कर देना मेरी समझ से बाहर है. मैं मानता हूं कि 10 रुपये बहुत ही कम हैं लेकिन 500 रुपये तो बहुत ही ज्यादा हैं. जहां भी ऐसा किया गया है वह गलत है. ऐसी स्थिति जरूर बने कि इस अधिकार का दुरुपयोग रुके मगर ऐसी भी स्थिति ना हो जाए कि इस अधिकार का कोई उपयोग ही ना कर सके. दरअसल जोश-जोश में कानून तो
बना दिया लेकिन अब इससे बचने के रास्ते तलाशे जा रहे हैं.   

लोक सूचना अधिकारियों की मानें तो उन्हें आरटीआई की वजह से कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
लोक सूचना अधिकारी इस आंदोलन की जान हैं, वे ही इसकी आधारशिला हैं. शुरू में उन्हें यह कार्य जरूर बोझ जैसा महसूस हो रहा था परंतु अब वे मान चुके हैं कि सूचना तो उन्हें देनी ही है. वैसे भी कोई सारी उम्र के लिए तो सूचना अधिकारी बनाया नहीं जाता, ज्यादा से ज्यादा दो-तीन साल के लिए ही किसी को लोक सूचना अधिकारी बनाया जाता है फिर उसे हटाकर किसी और को यह कार्य सौंप दिया जाता है. अब दो-तीन साल के लिए यदि कुछ लोगों को अतिरिक्त कार्यभार संभालना भी पड़े तो कोई बड़ी बात नहीं है. लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि जिसे भी लोक सूचना अधिकारी बनाया जाए उसे कुछ अतिरिक्त स्टाफ भी प्रदान किया जाए.

कई राज्यों ने फीस बढ़ाने के साथ ही आवेदन पर 150 शब्दों की सीमा लगा दी है. ऐसा किया जाना कितना उचित है?
बिल्कुल उचित है. हमने 50-50 पेज के भी आवेदन देखे हैं, परन्तु उन्हें आरटीआई आवेदन नहीं कहा जा सकता. वह तो पूरी राम कथा है. मैं समझता हूं कि 150 शब्द ऐसी सीमा है जिसमें हर तरह का प्रश्न पूछा जा सकता है. अगर आपका काम एक आवेदन से नहीं बनता तो दो आवेदन दाखिल कर लीजिए. एक आवेदन एक ही विषय पर हो यह भी बिल्कुल सही है. अगर आप कई विषयों से संबंधित सूचना एक ही आवेदन में मांगते हैं तो आपको खुद भी पूरी सूचना प्राप्त नहीं हो पाती. ऐसे में यह सभी के हित में है कि एक आवेदन एक ही विषय पर हो और सीमित शब्दों में लिखा गया हो. हमें इस कानून को व्यावहारिक बनाना है सैद्धांतिक नहीं.

तो आपके अनुसार आरटीआई एक्ट में किसी संशोधन की गुंजाइश है या फिर आप मानते हैं कि यह अपने आप में बिल्कुल सही और सपूंर्ण है?
इसमें बिल्कुल संशोधन की गुंजाइश है. पहला तो यह कि आरटीआई आवेदन में शब्दों की सीमा राष्ट्रीय स्तर पर ही निर्धारित की जाए. दूसरा, फीस भी कुछ हद तक बढ़ाई जानी चाहिए. माना कि 500 रूपये बहुत ज्यादा है लेकिन 10 रुपये फीस बहुत ही कम है. केंद्र सरकार को दोबारा विचार कर इसे बढ़ाना चाहिए जो कि पूरे देश के लिए एक ही रहे और कोई भी लोक प्राधिकारी इसमें संशोधन न कर सके. तीसरा, आरटीआई अधिनियम में आयोग को जुर्माना वसूलने का कोई भी प्रावधान नहीं है, इसलिए इसकी व्यवस्था भी होनी चाहिए. चौथा, प्रथम अपीलीय अधिकारियों पर जुर्माना करने का भी कोई प्रावधान कानून में नहीं है और मेरी नजर में इस कानून की सबसे कमजोर कड़ी प्रथम अपीलीय अधिकारी ही हैं क्योंकि उनको आयोग का भी कोई डर नहीं होता. इसलिए अपीलीय अधिकारियों को भी आयोग के अधिकार क्षेत्र में लाया जाना चाहिए. आखिरी बात यह कहूंगा कि आयोग में अपील करने हेतु कोई भी शुल्क नहीं देना होता तो लोग धड़ाधड़ आयोग में अपील करते चले जाते हैं. इसलिए चाहे 50 रुपये ही हो मगर आयोग आने वाले हर आवेदक से शुल्क लिया जाना चाहिए.

न्याय को ना

पिछले साल 15 फरवरी, 2012 के अंक में तहलका ने एक खबर प्रकाशित की थी. ‘न्यायिक नियुक्ति का धनचक्कर नाम से प्रकाशित इस खबर में बताया गया था कि किस तरह से उत्तर प्रदेश में जजों की नियुक्ति में भी मुंह खोलकर पैसे मांगे जा रहे हैं. उस वक्त प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती थीं और राज्य में चुनावी माहौल था. चुनाव के बाद प्रदेश में सरकार बदली. अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी नई सरकार से लोगों ने काफी उम्मीदें लगाईं. लेकिन कानून-व्यवस्था से लेकर कई मोर्चों पर अब तक नाकाम साबित हुई राज्य सरकार ने न्यायिक नियुक्ति के इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी करने को लेकर अब तक हीलाहवाली ही बरती है. वह भी तब जब देश के राष्ट्रपति से लेकर मुख्य न्यायाधीश तक उसे इस मामले में कार्रवाई करने को कह चुके हैं.

इस मामले में तब से लेकर अब तक की सरकारी सुस्ती को समझने से पहले इसकी पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्ति को मंजूरी दिए जाने के बावजूद राज्य के नियुक्ति विभाग के आला अधिकारियों द्वारा नियुक्ति पत्र जारी करने के एवज में रिश्वत मांगने का आरोप पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्व सहायक महाधिवक्ता गगनगीत कौर ने लगाया था. उन्होंने इन अधिकारियों को न सिर्फ रिश्वत देने से मना कर दिया था बल्कि अपनी सीट यह कहते हुए सरेंडर कर दी कि वह भ्रष्ट बनकर न्याय देने वाली कुर्सी तक नहीं पहुंचना चाहती हैं. उन्होंने राज्य नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव कुंवर फतेह बहादुर, संयुक्त सचिव युगेश्वर राम मिश्रा और अंडर सेक्रेटरी सुनील कुमार पर नियुक्ति पत्र जारी करने के बदले रिश्वत मांगने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद उच्च न्यायालय तक अपनी शिकायत पहुंचाई थी.

2009 में उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे. परीक्षा हुई और उसमें गगनगीत कौर का चयन हुआ. कुल 24 सीटों में से पांच पर महिलाओं की नियुक्ति होनी थी क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने महिलाओं के लिए 20 फीसदी आरक्षण का नियम बना रखा है. लेकिन साक्षात्कार तक पहुंचने वाली सामान्य वर्ग की महिलाओं की संख्या चार रही. सरकारी नियमों के मुताबिक इनमें से सभी का चयन हो जाना चाहिए था. लेकिन 12 जनवरी, 2010 को जो अंतिम परिणाम आया उसके मुताबिक सामान्य वर्ग से सिर्फ तीन महिलाएं चुनी गईं और दो सीटें सामान्य वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों को दे दी गईं. कौर ने इसकी शिकायत इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से की. कौर की नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए एक बार फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक पत्र 5 मई, 2011 को सूबे के नियुक्ति विभाग को लिखा. अदालत का कहना था, ‘पूर्ण कोर्ट ने गगनगीत कौर की नियुक्ति के मामले पर विचार किया और यह निष्कर्ष निकाला कि 2009 में आयोजित परीक्षा में 20 फीसदी महिला आरक्षण कोटे के तहत चौथी महिला उम्मीदवार के तौर पर कौर की नियुक्ति की सिफारिश राज्य सरकार को की जाए.इस पत्र में यह भी लिखा गया कि सरकार की तरफ से गगनगीत कौर की नियुक्ति का आदेश जारी किया जाए और इसकी एक प्रति इलाहाबाद उच्च न्यायालय को जल्द से जल्द भेजी जाए.

‘मैंने इस गलत बात पर आपत्ति जताई तो उनका जवाब था कि पैसा कुंवर फतेह बहादुर और मुख्यमंत्री तक जाता है इसलिए बगैर पैसा दिए कुछ नहीं होगा’कौर ने जब नियुक्ति विभाग के अधिकारियों से नियुक्ति पत्र जारी करने के संबंध में संपर्क साधा तो अधिकारियों ने उनसे रिश्वत की मांग शुरू कर दी. कौर कहती हैं, ‘सुनील कुमार ने नियुक्ति पत्र जारी करने के बदले मुझसे लाखों रुपये की मांग की.कौर ने इसकी शिकायत करते हुए 31 मई, 2011 को भारत के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद उच्च न्यायालय को पत्र लिखा. कुछ होता नहीं देख तकरीबन दो साल की भागदौड़ और अदालत से लेकर उत्तर प्रदेश के नियुक्ति विभाग के अधिकारियों का चक्कर काटने के बाद अंततः 23 जनवरी, 2012 को कौर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को एक पत्र लिखकर अपनी सीट सरेंडर कर दी. उसी समय तहलका ने इस मामले को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी.

इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद तीन पूर्व केंद्रीय मंत्रियों ने इस मामले की जांच के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय और भारत के राष्ट्रपति को पत्र लिखा था. ये तीन पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं- सुब्रमण्यम स्वामी, जयनारायण निषाद और संजय पासवान. संजय पासवान ने भारत के राष्ट्रपति और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले की जांच कराने का आग्रह किया. वे अपने पत्र में लिखते हैं, ‘नियुक्ति विभाग के अधिकारी इलाहाबाद हाई कोर्ट के फुल कोर्ट की सिफारिश के बाद भी नियुक्ति पत्र जारी करने से मना कर रहे हैं और वे चयनित अभ्यर्थी गगनगीत कौर से पैसे मांग रहे हैं. पैसे देने से मना करने पर ये अधिकारी लगातार हीलाहवाली कर रहे हैं. इसे देखते हुए कौर ने अपना दावा वापस ले लिया है. लेकिन यह घटना न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाती है. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी उच्चस्तरीय जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए और दोषियों को सजा मिले, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल अनंत कुमार ने 19 जुलाई को एक पत्र लिखकर संजय पासवान को बताया कि अदालत ने तमाम भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतों पर आगे की कार्रवाई के लिए शासन को लिख दिया है. कुमार ने यह भी बताया कि गगनगीत कौर की शिकायत के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने शासन यानी प्रदेश सरकार को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए लिखा. लेकिन आज की तारीख में तथ्य यह है कि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा कार्रवाई के लिए लिखे जाने के बावजूद अब तक शासन ने इस मामले में कुछ नहीं किया.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले की जांच की मांग की. स्वामी लिखते हैं, ‘इस मामले की जांच कराने के लिए कौर ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था. उन्होंने न्यायिक पद से अपना दावा भी वापस ले लिया. लेकिन इसके बावजूद अब तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है. इसलिए मेरा आपसे आग्रह है कि इस मामले में हस्तक्षेप करें और जरूरी कार्रवाई का आदेश दें.स्वामी के पत्र के बाद उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे एसएच कपाडि़या ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय को उचित कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा. उन्होंने चीफ जस्टिस को बताया कि इस संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को गगनगीत कौर ने पहले भी लिखा था लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद कैप्टन जयनारायण प्रसाद निषाद ने भी इस मसले को भारत के राष्ट्रपति और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को सामने पत्र लिखकर उठाया. राष्ट्रपति ने निषाद के पत्र के बाद उतर प्रदेश के मुख्य सचिव को नियुक्ति विभाग के संबंधित अधिकारियों के न्यायिक नियुक्ति में भ्रष्टाचार को लेकर कार्रवाई के लिए कहा. लेकिन मुख्य सचिव स्तर पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

जब इस संवाददाता ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करके इन पत्रों पर शासन और इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरफ से हुई कार्रवाई की जानकारी चाही तो जो सूचनाएं मिलीं उनसे पता चला कि अब तक तो इन मामलों में कुछ हुआ ही नहीं है. बदहाली का आलम यह है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा इस मामले की जांच कराने के लिए लिखे जाने के बावजूद इस दिशा में कुछ नहीं हो रहा है. कौर कहती हैं, ‘ऐसे में फिर कोई भी इंसाफ की गुहार आखिर कहां लगाए? ‘ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल अनंत कुमार से जब तहलका ने कार्रवाई के बारे में जानना चाहा तो पहले तो उन्होंने यह कहा कि कई मामले हमारे सामने आते हैं और ऐसे में किसी एक मामले के बारे में बताना तो मुश्किल है. लेकिन जब उन्हें उन्हीं के दस्तखत से आए एक पत्र का हवाला देकर याद दिलाने की कोशिश की गई तो उनका जवाब बदल गया. वे कहने लगे, ‘देखिए, यह तो गोपनीय मामला है. हम किसी को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकते हैं कि इस शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर इस मामले की जांच की मांग की.

तहलका से बातचीत में कौर बताती हैं, ‘जब मैंने पैसे देने से मना कर दिया तो नियुक्ति विभाग के अधिकारी सुनील कुमार और योगेश्वर राम मिश्रा ने मेरी नियुक्ति पत्र जारी करने संबंधी फाइल पर आपत्ति लगा दी. उनका तर्क था कि गगनगीत कौर राज्य की बाहर की महिला हैं इसलिए उतर प्रदेश में वे नौकरी नहीं कर सकती हैं. जबकि मेरे साथ ही परीक्षा में बैठी हरियाणा राज्य के पानीपत की निवासी बबीता रानी को महिला अभ्यर्थी के तौर पर चयनित होने के बाद शासन के उसी अधिकारी सुनील कुमार और योगेश्वर राम मिश्रा ने नियुक्ति पत्र जारी करने की अनुशंसा की. बबीता रानी अभी उतर प्रदेश के कानपुर देहात कोर्ट में एडिशनल सेशन जज के पद पर हैं.वे आगे कहती हैं, ‘जब मैंने बबीता रानी को राज्य के बाहर का होने के बावजूद नियुक्ति दिए जाने को आधार बनाकर उनके कुतर्क को काटना चाहा तो उनका जवाब था कि पैसा कुंवर फतेह बहादुर और मुख्यमंत्री तक जाता है. इसलिए बगैर पैसा दिए कुछ नहीं हो सकता.

दिलचस्प बात है कि गगनगीत कौर ने जब सूचना के अधिकार कानून के तहत नियुक्ति विभाग से अपने मामले से संबंधित सारी फाइलों की नोटिंग मांगी तो लेकिन आज तक उन्हें फाइलों की नोटिंग उपलब्ध नहीं कराई गई. उन्हें आवेदन के जवाब में कहा गया कि फिलहाल उनकी नियुक्ति को लेकर उच्च न्यायालय से पत्राचार चल रहा है इसलिए जवाब पत्राचार समाप्त होने के बाद देंगे.

इस मामले में भले ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल अनंत कुमार औपचारिक तौर पर कुछ जवाब देने से बच रहे हों लेकिन उच्च न्यायालय में इस मामले की प्रगति से वाकिफ लोगों से जब तहलका ने बातचीत की तो पता चला कि अभी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश हैं इसलिए कोई खास प्रगति नहीं हुई है. इन लोगों का यह भी कहना है कि जैसे ही नए पूर्णकालिक मुख्य न्यायाधीश आएंगे वैसे ही इस मामले से संबंधित फाइल को उनके सामने रखा जाएगा और उम्मीद है कि तब इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई हो.   

कैद में बुढ़ापा

Hemraaj

उत्तर प्रदेश की जेलों में बड़ी संख्या में बुजुर्ग कैदियों की मौजूदगी  जेलों और इन कैदियों दोनों को भारी पड़ रही है. एक ओर जहां क्षमता से अधिक कैदियों की मौजूदगी से जेलें प्रभावित हो रही हैं वहीं ये उम्रदराज कैदी महज इसलिए सलाखों के पीछे दिन काट रहे हैं क्योंकि इनकी रिहाई में कभी सरकारी नियम-कायदे तो कभी परिजनों की उपेक्षा आड़े आ रही है. कई मामलों में तो कैदी सजा पूरी होने के बाद भी बंद हैं क्योंकि उनके लिए नियमानुसार जमानतदार की व्यवस्था नहीं हो पा रही है.

राज्य के जेल आईजी आरपी सिंह पर यकीन किया जाए तो पूरे प्रदेश में बुजुर्ग कैदियों की संख्या केवल एक हजार के आस-पास है जबकि एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो प्रदेश में बुजुर्ग बंदियों की संख्या छह से सात हजार के बीच है. अकेले बरेली केंद्रीय कारागार और बरेली जिला जेल में ही 800 के करीब बुजुर्ग कैदी बंद हैं. ये वे कैदी हैं जिनकी उम्र 60 से 90 साल के बीच है. इन बुजुर्ग कैदियों को उठाने-बैठाने तक के लिए जेल प्रशासन को दूसरे कैदियों या बंदी रक्षकों की मदद लेनी पड़ती है.

उम्र के इस पड़ाव पर बुजुर्ग बंदियों को आए दिन कोई न कोई बीमारी घेरे रहती है. ऐसे में जेल अस्पताल के एक बड़े हिस्से में इन्हीं का इलाज चलता रहता है. इन कैदियों के इलाज में भी जेल अधिकारियों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तैनात एक जेलर बताते हैं कि जेल के अस्पतालों की स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं है. लिहाजा इलाज के लिए बुजुर्ग कैदियों को आस-पास के जिलों में स्थित मेडिकल कॉलेजों में भेजना पड़ता है. मेडिकल कॉलेज में बेहतर इलाज के लिए सबसे बड़ी समस्या धन की आती है. बीमार कैदी के इलाज के लिए शासन से धन की व्यवस्था करने की प्रक्रिया इतनी लंबी है कि जब तक व्यवस्था हो पाती है तब तक बीमार बुजुर्ग कैदी या तो अपने प्राण त्याग देता है या भगवान की कृपा से ही ठीक हो जाता है.

ऐसे हजारों कैदी हैं जो बिना सहारे के चल तक नहीं सकते. नियमों के मुताबिक रिहाई के हकदार ये कैदी प्रशासनिक उपेक्षा के चलते अब तक कैद हैं

जेल के एक अधिकारी बताते हैं कि नियमों के अनुसार आजीवन कारावास की सजा काट रहे किसी कैदी को यदि जेल में 14 साल हो चुके हों तो उसे छोड़ा जा सकता है. लेकिन इन कैदियों के बुजुर्ग होने के बावजूद इनको छोड़ने की प्रक्रिया में न तो सरकार ही कोई दिलचस्पी लेती है और न प्रशासन. 1938 के प्रोबेशन एक्ट के अनुसार यदि बुजुर्ग कैदी 14 साल की सजा पूरी कर चुका है तो जेल से उसका फॉर्म ए भरवाया जाता है. फिर जेल से जिलाधिकारी के यहां और वहां से आईजी जेल के यहां रिपोर्ट जाती है. आईजी जेल के यहां से रिपोर्ट शासन को भेजी जाती है. शासन का एक बोर्ड अपनी रिपोर्ट राज्यपाल के यहां भेजता है. इस प्रक्रिया के बाद राज्यपाल की संस्तुति से बुजुर्ग कैदियों को छोड़ने का नियम है.

हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा काट रहे देवकली बंडा निवासी 71 साल के छोटे सिंह इन्हीं नियमों के शिकार हैं. वे 14 साल से ज्यादा समय बरेली केंद्रीय कारागार में बिता चुके हैं और डंडे के बिना जरा भी चलने में असमर्थ हैं. गांव देवकली में 1977 में हुई एक हत्या के मामले में अदालत ने छोटे सिंह को 1979 में सजा सुनाई. 1979 से लेकर 1985 तक छह साल लगातार छोटे सिंह जेल में रहे. इस बीच छोटे सिंह के परिजनों ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहां सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में छोटे सिंह को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया. छह साल जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने की स्थिति में छोटे सिंह 11 साल तक अपने परिवार के बीच रहे.

इस बीच हत्या के मामले की सुनवाई हाई कोर्ट में चलती रही. हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए 1997 में छोटे सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. हाई कोर्ट से सजा होने के बाद 1997 से लेकर आज तक छोटे सिंह लगाकार जेल में हैं. जेल के अधिकारी बताते हैं कि यदि सरकार के नियम को देखें तो छोटे सिंह उम्र को देखते हुए अपनी न्यूनतम 14 साल से करीब आठ साल अधिक सजा भुगत चुके हैं. लेकिन सरकारी अमले की शिथिलता कहें या उपेक्षा, वे अब जेल की दीवारों के पीछे दिन काट रहे हैं.

जेल विभाग के एक बड़े अधिकारी कहते हैं, ‘रिहाई संबंधी रिपोर्ट भेजने की प्रक्रिया में हर स्तर पर अधिकारी अपने को बचाने का काम करते हैं. लिहाजा रिपोर्ट के साथ एक लाइन यह भी बढ़ा दी जाती है कि बंदी को छोड़ने पर समाज में भय व आतंक व्याप्त हो सकता है. इस लाइन के बढ़ने के बाद छूटने की प्रक्रिया पर विराम लग जाता है.’

बुजुर्ग कैदियों के साथ ही प्रदेश की जेलों में दर्जनों की संख्या में ऐसे कैदी भी बंद हैं जिनकी रिहाई का आदेश राज्यपाल या कोर्ट की ओर से तो दे दिया गया है लेकिन सालों या महीनों से उनकी रिहाई नहीं हो पा रही है. क्योंकि रिहाई बांड भरने के लिए उन्हें जमानतदार ही नहीं मिल पा रहे हैं.

तमिलनाडु निवासी जॉन डैनियल बरेली के केंद्रीय कारागार में करीब 20 साल से बंद हैं. वे उन दर्जनों कैदियों में से एक हैं जो न्यायालय द्वारा निर्धारित सजा पूरी करने के बाद भी नहीं छूट पा रहे हैं. 20-22 साल पहले डैनियल रोजी-रोटी की तलाश में घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर बरेली आए थे. यहां आकर उन्होंने चिटफंड कंपनी खोली जो कुछ दिनों बाद ही बैठ गई. कंपनी में जिन लोगों का रुपया लगा था उन लोगों ने पुलिस में शिकायत की. 11 लोगों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने डैनियल के खिलाफ 1993 में धोखाधड़ी के 11 अलग-अलग मुकदमे दर्ज किए. डैनियल के मुताबिक मुकदमों के आधार पर न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई जहां से 1995 में उन्हें दस साल की सजा हुई. सजा के खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

हाई कोर्ट ने इस सजा को कम करते हुए सात साल कर दिया और एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया. जुर्माने की रकम अदा न कर पाने की स्थिति में तीन साल का कारावास और निर्धारित किया गया. डैनियल जुर्माने की रकम अदा नहीं कर पाए लिहाजा उन्होंने तीन साल की सजा और काटी. जेलर एके सक्सेना बताते हैं कि न्यायालय से डैनियल को जो सजा हुई थी वह 2005 में ही पूरी हो चुकी है. इसके बावजूद रिहाई न हो पाने का कारण यह है कि हाई कोर्ट से उन्हें पांच मामलों में सजा देते समय यह शर्त भी रख दी गई थी कि उन्हें जेल से छूटते वक्त हर मामले में दो-दो लोगों की जमानत देनी होगी. रिहाई के लिए डैनियल को दस स्थानीय जमानतदार नहीं मिल सके इसलिए सजा पूरी होने के सात साल बाद भी वे जेल में हैं.

प्रदेश की जेलों पर यदि नजर डालें तो यहां की कुल 40 हजार व्यक्तियों को रखने की क्षमता वाली 65 जेलों में करीब 82 हजार लोग कैद हैं.

पीलीभीत निवासी 48 साल के गिरधारी का मामला भी इससे बहुत अलग नहीं है. हत्या के मामले में पिछले 26 साल से जेल की दीवारों के पीछे कैद गिरधारी को गत अक्टूबर माह में उस वक्त रिहाई की उम्मीद जगी जब कैद की अवधि को देखते हुए राज्यपाल की ओर से उनकी रिहाई के आदेश दिए गए. लेकिन रिहाई के आदेश को तीन माह से अधिक का समय हो गया है पर छूटने के आसार अभी नहीं दिख रहे हैं. इसके लिए लिए उन्हें दो जमानती चाहिए. जेल के अधिकारी बताते हैं, ‘ गिरधारी के परिवार को रिहाई के आदेश की जानकारी दे दी गई है. लेकिन परिवार इतना गरीब है कि दो जमानतदारों की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है जिसके कारण रिहाई नहीं हो पा रही है.’ लंबे समय से जेल में रहने के कारण गिरधारी की मानसिक स्थिति भी अब ठीक नहीं है. उनकी हरकतों को देखते हुए जेल अधिकारी उन्हें अब यदा-कदा ही बैरक से बाहर निकालते हैं. गिरधारी के साथी कैदी बताते हैं कि जैसे ही कोई उनके सामने जाता है वे अपनी रिहाई की बात शुरू कर देते हैं और मारपीट तक पर आमादा हो जाते हैं. जेल अधीक्षक एके राय बताते हैं, ‘बिना जमानतदार के रिहाई संभव नहीं है.’

एक और मामला है शाहजहांपुर के 85 साल के बुजुर्ग लालजीत सिंह का. 35 साल पूर्व 1977 में शाहजहांपुर जिले के छोटे-से गांव पिपराजप्ती में जमीनी रंजिश के चलते दो पक्षों के बीच हुई गोलीबारी में चार लोगों की मौत हो गई थी. विवाद में एक पक्ष की ओर से लिखाए गए हत्या के मुकदमे में लालजीत सिंह को 1997 में हाई कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई. मरने वालों में लालजीत का एक भाई भी शामिल था. लालजीत अब चलने-फिरने से भी लाचार हैं. उन्हें उठाने-बैठाने के लिए दो लोगों की जरूरत होती है. ऊपर से अनेक बीमारियों ने भी उन्हें जकड़ रखा है. उनकी शारीरिक हालत को देखते हुए जेल प्रशासन उनसे अब कोई काम भी नहीं ले सकता. आजीवन कारावास के लिए जो न्यूनतम सजा सरकार की ओर से 14 साल की निर्धारित है वो लालजीत काट चुके हैं इसके बावजूद उनकी रिहाई संभव नहीं है तो इसलिए कि हत्या के आरोप में वे अकेले जेल में नहीं हैं बल्कि उनका छोटा भाई 65 साल का राजेन्द्र सिंह भी बरेली केंद्रीय कारागार में बंद है. हाईकोर्ट से सजा होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में सजा के खिलाफ अपील क्यों नहीं की. इस सवाल पर लालजीत बताते हैं, ‘परिवार में कोई बचा ही नहीं था. वैसे भी मुकदमे आदि में रुपया काफी लग जाता है.’

प्रदेश की जेलों पर यदि नजर डालें तो यहां की कुल 40 हजार व्यक्तियों को रखने की क्षमता वाली 65 जेलों में करीब 82 हजार लोग कैद हैं. प्रदेश की जेलें क्षमता से अधिक कैदियों के अलावा स्टाफ की कमी की दोहरी समस्या से भी जूझ रही हैं. यदि केंद्रीय जेलों की बात करें तो प्रदेश में स्थित पांच केंद्रीय जेलों की क्षमता सिर्फ दस हजार कैदियों की है लेकिन इन जेलों में 27 हजार से ज्यादा कैदी बंद हैं. जेलों में क्षमता से दोगुनी संख्या में कैदियों के होने का सबसे बड़ा कारण है कि प्रदेश के कुशीनगर, संतकबीरनगर, श्रावस्ती, अमरोहा, चंदौली, संतरविदासनगर, औरैया, हाथरस, महोबा, अमेठी, हापुड़, संभल और शामली जिलों में जिला जेल ही नहीं है. यदि बात इलाहाबाद की करें तो वहां एक केंद्रीय जेल तो है लेकिन जिला जेल अभी तक नहीं बन सकी है. जिन जिलों में जेल नहीं है उन जिलों के कैदियों को आस-पास के जिलों में भेजा जाता है. अंबेडकरनगर, गौतमबुद्धनगर, चित्रकूट और कासगंज सहित चार जिलों में नई जेल बनाने का काम चल रहा है. लेकिन काम इतना धीमा है कि ये कब पूरी होंगी यह तय ही नहीं है.

जेलों में अधिकारियों व कर्मचारियों की तैनाती की स्थिति भी काफी दयनीय है. कैदी तो जेलों में क्षमता से दोगुने हैं लेकिन तैनाती प्रस्तावित पदों से भी कम है. पूरे प्रदेश की जेलों के लिए डिप्टी जेलरों के 448 पद स्वीकृत हैं जबकि तैनाती मात्र 222 डिप्टी जेलरों की है. इसी तरह जेलर के 87 पद हैं और तैनात 76 ही हैं.

आलम यह है कि जेल में कर्मचारियों की कमी होने के कारण कैदियों तक से काम लेना पड़ रहा है. ऐसा ही एक कैदी है उत्तराखंड के अल्मोड़ा का निवासी उमेश चंद्र जोशी. 1997 में बीएससी पार्ट वन की पढ़ाई कर रहा था उसी समय अल्मोड़ा के गढ़ाई गंगोली में एक हत्या के आरोप में उमेश नामजद हुआ और न्यायालय ने 1999 में आजीवन कारावास की सजा सुना दी. 33 साल का उमेश 1999 से लेकर आज तक बरेली जेल में ही बंद है. वैसे तो उमेश जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है लेकिन 1999 से ही वह जेल कार्यालय में लिखापढ़ी का काम देख रहा है. पहली नजर में उसके कामकाज के तरीके को देख कर कोई भी उसे सजायाफ्ता मुजरिम नहीं कहेगा.

क्योंकि जेल के सिपाही हों या जेलर या अधीक्षक सभी को जेल में बंद किसी भी कैदी के बारे में कोई भी जानकारी चाहिए होती है तो घंटी बजा कर जोशी को ही बुलाता है. कौन सा कैदी किस मामले में कब से सजा काट रहा है या किसके ऊपर कितने मामले चल रहे हैं और मामले लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट में किस स्थिति में हैं ये सारी जानकारी जोशी के पास रहती है. कैदियों का पूरा सिजरा उमेश को मुंहजबानी याद है. हाई कोर्ट से सजा होने के बाद अब उसका मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इस सबसे लगता है कि उत्तर प्रदेश की जेलों की अंधेरी कोठरियों में बंद उम्रदराज कैदियों के लिए फिलहाल रोशनी की कोई किरण दूर दूर तक नहीं है.

बालपन में ब्याह

‘हमारी जाति डोम है और हमारे यहां सात-आठ साल में शादी अनिवार्य है. यदि आपने इससे ज्यादा देरी की तो अपने बच्चे के लिए जोड़ा मिलना मुश्किल हो जाएगा. जोड़ा तलाश भी लें तो उसमें किसी न किसी तरह की कमी होगी. वह किसी दुर्घटना या बीमारी का शिकार होगा. इसलिए हमारी जाति में समय रहते शादी की परंपरा है. गौना (लड़की की विदाई) जरूर हम अठारह पार करने के बाद ही करते हैं. विदाई में उम्र को लेकर कोई समझौता नहीं करते.’

मोहन डोम बड़ी बेबाकी से अपनी बात रखते हैं. बिहार में पश्चिम चंपारण के जिला मुख्यालय बेतिया से उनका गांव धांगड़ टोली पांच-सात किलोमीटर के फासले पर ही होगा. धांगड़ टोली की तरफ मुख्य सड़क पर जाते हुए सड़क के किनारे ही मोहन डोम का आशियाना है. वे सड़क के किनारे झोपड़ी डाल कर रहते हैं. उनसे घर पर ही मुलाकात होती है. बातचीत के बाद साफ होता है कि मोहन इकलौते व्यक्ति नहीं हैं जिन्होंने कम उम्र में अपने एक लड़के और एक लड़की की शादी की है. एक-दो दिन और भागदौड़ के बाद यह भी स्पष्ट होता है कि डोम समाज कम उम्र में शादी को स्वीकार करने वाला अकेला समाज नहीं है. कई दूसरे समाजों में भी कम उम्र में शादियां हुई हैं.

बेतिया के भरपटिया माध्यमिक विद्यालय की प्राचार्य उषा दुबे बताती हैं, ‘इतनी कम उम्र में शादी-शुदा बच्चों को देखकर मन ग्लानि से भर जाता है.’ वे आगे कहती हैं कि उन्हें इस स्कूल में एक साल ही हुआ है. पहली बार जब वे इस स्कूल में आईं और शादी-शुदा लड़कियों को देखा तो बहुत परेशान हुईं. वे कहती हैं, ‘ये बच्चियां स्कूल में आकर अपनी ससुराल का किस्सा सुनाती थीं, मैं सुनती थी क्योंकि हमें ट्रेनिंग के दौरान बताया गया है कि बच्चों के साथ घुल-मिल कर रहना है, जिससे वे आपको अपना अच्छा दोस्त समझें. इस घटना से आहत होकर मैं इन बच्चों के परिवार- वालों से भी मिली, लेकिन वे मुझसे ही लड़ने लगे. मैं शादी की बात लेकर पुलिस के पास भी जाना चाहती थी पर मेरे साथियों ने मुझे यह कहकर रोक दिया कि हमारा काम इन बच्चों को पढ़ाना और ऐसे संस्कार देना है कि बच्चों की छोटी उम्र में शादी न की जाए.’ 

एक स्कूल में छह साल की प्रेमा (काल्पनिक नाम) मिलती है. उसका हंसना, बोलना, बतियाना सब अपनी उम्र के बच्चों जैसा ही है. बेतिया से आठ किलोमीटर दूर अपने स्कूल की चौथी कक्षा में प्रेमा अपने क्लास के दूसरे बच्चों के साथ घुल-मिलकर ही बैठती है लेकिन अपनी एक खासियत के चलते क्लास में दूर से ही पहचानी जा सकती है. वह है उसकी मांग में भरा हुआ सिंदूर. प्रेमा के बिना कुछ कहे ही यह सिंदूर उसकी कहानी काफी कुछ बयान कर देता है. प्रेमा जिस माध्यमिक स्कूल में पढ़ती है वहां 800 बच्चे हैं. इनमें 80 बच्चे शादीशुदा हैं. यह आंकड़ा स्कूल की प्रधानाध्यापिका देती हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि संख्या इससे कहीं अधिक है. 

प्लान यूके की एक रिपोर्ट के अनुसार हर दिन 27,397 कम उम्र की लड़कियां जबरन शादी की भेंट चढ़ती हैं. यानी हर तीन सेकंड में एक बच्ची

एक राजकीय विद्यालय में प्राचार्य जनक मिश्र की मानें तो शादीशुदा बच्चे-बच्चियां इस क्षेत्र के स्कूलों में आम हैं. मिश्र कहते हैं, ‘कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे रोकने से यह रुकने वाला भी नहीं है. शादी के बाद बच्चे स्कूल आ रहे हैं, शुक्र मनाइए. शादी वाले मसले पर अधिक बातचीत करेंगे तो वे अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर देंगे. बहुत सोच-विचार कर हमने बच्चों को पढ़ाने और शिक्षित करने को अपनी प्राथमिकता बनाया है.’

कल्पना (काल्पनिक नाम) सात साल की है, तीसरी कक्षा में पढ़ती है. एक साल पहले उसकी शादी हुई. उसे पता है कि उसकी शादी साठी (बेतिया) में हुई है. पति का नाम याद नहीं आता तो उसी स्कूल में आठवीं क्लास में पढ़ने वाली उसकी बड़ी बहन याद दिलाती है. छोटी उम्र में शादी कर चुकी कुछ मुस्लिम लड़कियां भी स्कूल में मिलती हैं. उनकी मांग में सिंदूर तो नहीं मगर नाम के साथ खातून जुड़ा है. हालांकि इस सबमें एक अच्छी बात यह देखी जा सकती है कि शादी के बाद भी परिवार- वालों ने इनके स्कूल जाने पर प्रतिबंध नहीं लगाया. शादी का सही-सही अर्थ भी न जानने वाली लड़कियां, सुबह-सुबह अपने पति के नाम का सिंदूर मांग में डालकर स्कूल में उपस्थित रहती हैं.

जानकार मानते हैं कि जो परिवार शादी के बाद भी बच्चियों को स्कूल भेज रहे हैं, उन्हें अब इस बात के लिए राजी करने में सरकारी और गैरसरकारी संगठनों को अधिक परेशानी नहीं होनी चाहिए कि बच्चियों की शादी वे सही समय पर ही करें. अब छोटी उम्र में बच्चियों की शादी कराने वाले परिवारों के बीच इस बात को लेकर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है कि अठारह साल गौने की नहीं, कानून की तरफ से शादी की तय उम्र सीमा है. वैसे छोटी उम्र में शादी की बात की जाए तो एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में हर तीसरे सेकंड में एक बच्ची को जबरन शादी के लिए राजी किया जाता है. हाल ही में एक टीवी कार्यक्रम के दौरान गैरसरकारी संस्था ‘गर्ल्स नॉट ब्राइड्स’ की कम्यूनिकेशन ऑफिसर लॉरा डिकिन्सन का कहना था, ‘बहुत-से समुदायों में बाल विवाह को मंजूरी मिली हुई है, ऐसे परिवारों में लड़कियों को लड़कों से कम महत्व मिलता है.’

जब हम महिला अधिकारों की बात करते हैं, बाल अधिकारों की बात करते हैं या बच्चियों में या बच्चों में स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी विषयों की चर्चा करते हैं, उस दौरान ऐसे हजारों बच्चों को चर्चा में शामिल नहीं कर पाते जिनके शादी-शुदा होने की जानकारी सरकारी या किसी गैर सरकारी फाइल में भी दर्ज नहीं है. बिहार के पश्चिम चम्पारण में महादलित समाज से आने वाले बहारन राउत अपने क्षेत्र में समाज के मुखिया भी हैं. समाज के विवादों को वे पंच बनकर सुलझाते रहे हैं. वे बताते हैं, ‘मैंने तय किया कि अपनी पोती की शादी छोटी उम्र में नहीं करूंगा इसलिए दस साल के बाद ही पोती के लिए लड़का तलाशना प्रारंभ किया. लेकिन उस उम्र में भी इसके लिए लड़का तलाशना हमारे लिए मुश्किल हो रहा था क्योंकि हमारे समाज में छोटी उम्र में ही शादियां हो जाती हैं.’

बहारन के अनुसार उन्होंने जाति पंचायत में भी इस बात को उठाया, लेकिन किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया. बहारन अपनी शादी का किस्सा भी सुनाते हैं जब वे पांच साल की उम्र में दूल्हा बने. उन्होंने शादी के मंडप पर बैठने से पहले मां का दूध पीने की जिद कर दी. अब शादी में मां मौजूद नहीं थीं. लोगों ने भागकर कहीं से गाय के दूध का इंतजाम किया और दूल्हा बने बहारन राउत शादी के मंडप पर दूध पीने के बाद ही बैठे.

 आंकड़े बताते हैं कि हर सौ में से सात लड़कियों की शादी कानूनी तौर पर तय समय सीमा 18 साल से कम उम्र में हुई है. ऐसा तब है जब हमारे पास बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाने वाला 1929 का कानून है जिसमें 1949 और 1978 में संशोधन हुआ. 2006 में बाल विवाह को लेकर कानून को और मजबूत बनाया गया. उसके बावजूद सच्चाई यह है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे: 2005-06) के मुताबिक 20-24 वर्ष आयु वर्ग की 44.5 फीसदी युवतियां 18 साल से पहले विवाहिता हो चुकी थीं.

बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाने के पीछे के तर्क जायज हैं. इन्हें आम तौर पर उन परिवारों के मुखिया स्वीकार भी करते हैं जिनसे बिहार के पश्चिम चंपारण के चनपटिया और योगापट्टी प्रखंड में हमारी बात होती है. बाल विवाह की पीडि़त आम तौर पर लड़कियां ही बनती हैं. शादी के बाद सबसे पहले उनका ही स्कूल छुड़ा दिया जाता है. जानकार मानते हैं कि यदि लड़कियों को हम स्कूल नहीं भेजेंगे तो देश भर की लड़कियों को मिले शिक्षा का अधिकार कानून का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा. दूसरे, यदि कम उम्र में लड़की की शादी होती है तो वह गर्भ धारण के लिए तैयार नहीं होगी. ऐसे में जच्चा और बच्चा दोनों असुरक्षित होंगे. देश में मातृत्व मृत्यु दर ऊंची होने की बड़ी वजह इस तरह बचपन में की जाने वाली शादी ही हैं. इस तरह की शादियों में लड़कियां बार-बार गर्भवती होती हैं. सही प्रकार से पोषक आहार और देखभाल ना मिलने के कारण उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. वे बच्चियां नहीं जानतीं कि कब और कितनी बार उन्हें मातृत्व चाहिए, यह निर्णय लेना उनका अपना अधिकार है लेकिन किसी परिवार में उनकी नहीं सुनी जाती. 

‘प्लान यूके’ लड़कियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक गैरसरकारी संस्था है. इसके अनुसार दुनिया भर में हर साल एक करोड़ लड़कियों की जबरन कम उम्र में शादी कराई जाती है. प्लान यूके की एक रिपोर्ट के अनुसार हर दिन 27,397 कम उम्र की लड़कियों की जबरन शादी कराई जाती है. यह आंकड़ा बारीकी से देखा जाए तो इसका मतलब हुआ कि हर तीन सेकंड में एक लड़की की जबरन शादी. यूनिसेफ की ‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन’ 2012 रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हो रहे बाल विवाह में 40 फीसदी से अधिक की भागीदारी भारत की है. इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 20-24 साल की 22 फीसदी महिलाओं ने अपने पहले बच्चे को अठारह साल से कम उम्र में जन्म दिया है. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ‘फैमिली वेलफेयर स्टेटिस्टिक्स 2011’ के अनुसार 18 साल से कम उम्र की बच्चियों की शादी के मामले में ग्रामीण भारत शहरी भारत से तीन गुना आगे है.

परंपरा, संस्कार और संस्कृति के नाम पर कब तक इन बच्चियों के साथ अन्याय होता रहेगा? बिहार का पश्चिम चंपारण अपनी शादीशुदा बेटियों को स्कूल भेज रहा है शायद इसलिए यह किस्सा बाहर आ पाया. लेकिन उन बाल विवाहिताओं का क्या जो चौखट के बाहर कदम तक नहीं रख पातीं?

बे-काम का कानून

देश में पहली बार बाल विवाह पर रोक लगाने वाला कानून 1930 में आया. ‘द चाइल्ड मैरिज रिस्ट्रेंट एक्ट 1929’ नामक इस कानून को ‘शारदा एक्ट’ के नाम से भी जाना जाता है. पहली बार इसी कानून के जरिए लड़कों के विवाह की न्यूनतम उम्र 21 साल और लड़कियों की 18 साल निर्धारित की गई. ‘शारदा एक्ट’ की कमियों को दूर करने के लिए 2007 में ‘द प्रोहिबिशन ऑफ चाइल्ड मैरिज एक्ट 2006’ लागू किया गया. नाम में इस बदलाव की वजह थी कानून के प्रावधानों को अधिक सख्त बनाना. दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसी साल एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यह कानून सभी निजी कानूनों से ऊपर होगा और देश के हर नागरिक पर लागू होगा.

यूनिसेफ की रिपोर्ट

 वर्ष 2009 में आई यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में होने वाले कुल विवाहों में से करीब 40 फीसदी बाल विवाह होते हैं. वहीं यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (यूएनएफपीए) द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण ‘मैरिंग टु यंग: एंड चाइल्ड मैरिज’ के मुताबिक देश में 20 से 24 की उम्र की 47 फीसदी महिलाओं का बाल विवाह हुआ था. 

घोषणावीर मुख्यमंत्री

यह वाकया 25 साल पहले का है. मध्य प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा नदी के नीलकंठ (सीहोर) घाट में एक नवयुवक गले तक डूबा हुआ था. गांव के सारे लोग इस नौजवान को देखने के लिए जुटे थे. अचानक गांव के लोगों में हलचल बढ़ती है और यह नवयुवक मां नर्मदा को साक्षी मानते हुए घोषणा करता है कि इस क्षेत्र की सेवा के लिए आजीवन अविवाहित रहेगा. ठीक तीन साल बाद वह भाजपा के टिकट से इस क्षेत्र का विधायक चुना जाता है. इस दौरान वह अपनी पहली ही सार्वजनिक घोषणा भूलकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर जाता है. आज यही नवयुवक प्रदेश में में मुख्यमंत्री की गद्दी पर आसीन है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बारे में यह कहानी कितनी सच्ची है इसकी पुष्टि तो तभी हो सकती है जब वे खुद स्वीकार करें लेकिन मध्य प्रदेश में उनके कुछ साथी विधायक इस घटना के साक्षी रहे हैं.

हालांकि आजीवन कुंवारे रहने की कसम खाकर शादी कर लेना कोई अपराध नहीं है. लेकिन घोषणा करके उसे भुला देने की जो नजीर चौहान ने राजनीति में प्रवेश के समय बनाई थी वह अब उनके शासनकाल में और पक्की हो गई दिखती है. यदि चौहान के कार्यकाल पर निगाह डाली जाए तो बतौर मुख्यमंत्री प्रदेश के इतिहास में घोषणा करने के मामले में वे सबसे आगे हैं. पिछले सात साल का उनका रिकॉर्ड बताता है कि उन्होंने एक दिन में औसतन तीन से अधिक घोषणाएं की हैं. यह और बात है कि उनकी ज्यादातर घोषणाएं हवाई सिद्ध हुईं.

दरअसल चौहान की एक दिक्कत यह है कि वे जिस गति से घोषणाएं कर रहे हैं उससे उन्हें ही याद नहीं रहता कि उन्होंने कहां और कौन-सी घोषणा की है. इसी का एक नजारा महेश्वर उपचुनाव (2012) में तब देखने को मिला जब उन्होंने प्रदेश में पहला हिंदी विश्वविद्यालय खोलने की घोषणा कर दी. मगर लोगों ने जब चौहान को याद दिलाया तो उन्हें याद आया कि यह घोषणा तो वे पहले ही कर चुके हैं. इसी तरह उन्होंने चार साल पहले श्योपुर जिले के दौरे के दौरान विजयपुर में पेयजल योजना के लिए एक करोड़ रुपये देने की घोषणा कर दी. जनसंपर्क विभाग ने बाकायदा उसकी प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की. मगर विधानसभा के पटल पर चौहान का जवाब था कि उन्होंने ऐसी कोई घोषणा ही नहीं की है. 

मुख्यमंत्री चौहान ने जिस ढंग से घोषणाओं के हवाई किले खड़े किए हैं उससे उनकी ही पार्टी भाजपा के कई बड़े नेता अब तंग आ चुके हैं. पार्टी सांसद रघुनंदन शर्मा ने पिछले साल उज्जैन में एक कार्यक्रम के दौरान कहा भी था, ‘राज्य सरकार के कई मंत्री इसलिए बेलगाम घोषणाएं कर रहे हैं क्योंकि उनके मुखिया भी ऐसा ही कर रहे हैं.’ शर्मा के मुताबिक घोषणाएं महज अखबारों में छपने और वाहवाही लूटने के काम आ रही हैं. विधानसभा में ही मंत्रियों द्वारा विधायकों के सवाल पर दिए गए आश्वासनों की संख्या बताती है कि करीब ढाई हजार आश्वासन अब तक पूरे नहीं हो पाए. वहीं चौहान भी सदन के भीतर यह मान चुके हैं कि वे घोषणावीर हैं. उनकी मानें तो, ‘वीर ही घोषणाएं करते हैं. यदि कुछ घोषणाएं पूरी नहीं हुईं तो इसलिए कि उनमें तकनीकी गड़बडि़यां थीं.’ चौहान का दावा है कि उन्होंने 80 फीसदी घोषणाएं पूरी भी कर दीं.

लेकिन मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक की हालिया रिपोर्ट खुद ही उनके दावे की कलई खोल देती है. इसके मुताबिक मुख्यमंत्री ने सात साल में कुल 7,334 घोषणाएं की हैं. मगर इनमें से 3,513 यानी आधे से अधिक घोषणाएं अटकी हुई हैं. वहीं करीब एक हजार घोषणाएं ऐसी हैं जो या तो शुरू नहीं हो सकीं या जिन्हें शुरू करा पाना अब संभव नहीं हो पाया है. अधर में फंसी इन घोषणाओं  तक में से भी अधिकतर पंचायत व ग्रामीण विकास (485), जल संसाधन (426), राजस्व (231) और स्वास्थ्य (193) जैसे आम आदमी से सीधे ताल्लुक रखने वाले महकमों से जुड़ी हैं.

मुख्यमंत्री ने 2008 में जारी जनसंकल्प पत्र में किसानों के लिए सबसे अधिक 62 घोषणाएं की थीं. लेकिन चार साल बाद भी उनमें से 61 घोषणाएं अधर में हैं

विशेषज्ञों की राय में किसी भी राज्य का बजट घोषणाओं के बजाय योजनाओं के आधार पर तैयार किया जाता है. ऐसे में चौहान जिस अनुपात में घोषणाओं की झड़ी लगा रहे हैं उससे बजट पूरी तरह से गड़बड़ा गया है. खुद राज्य के वित्त मंत्री राघवजी को मुख्यमंत्री की घोषणाओं को साकार कर पाना संभव नहीं लगता. वे पहले ही मीडिया में साफ कर चुके हैं, ‘यदि भाजपा सत्ता में लौटी भी तो पांच साल तक इन घोषणाओं को अमली जामा पहनाना असंभव है.’  उनके मुताबिक यदि आपात कोष का खजाना भी खोल दिया जाए तो सौ करोड़ रुपये से अधिक रकम नहीं जुटाई जा सकती. जबकि चौहान की घोषणाओं को पूरा करने के लिए बारह हजार करोड़ रुपये की दरकार है. सरकार की माली हालत इतनी खराब है कि उसे अपने सभी महकमों का बजट कम करना पड़ा है. वहीं चौहान सरकार के कार्यकाल में यह प्रदेश 85 हजार करोड़ रुपये का कर्जदार बन चुका है. बावजूद इसके मुख्यमंत्री द्वारा नित नई-नई घोषणाएं करना ‘कर्ज लेकर घी पीने’ जैसा लग रहा हैं.

सवाल यह है कि जब राज्य का खजाना खाली है तो मुख्यमंत्री अलग-अलग वर्ग की पंचायतों और महापंचायतों का भव्य आयोजन करके उनमें करोड़ों रुपये क्यों खर्च कर रहे हैं. गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अपने आवास पर अब तक 25 से अधिक पंचायतें करा चुके हैं. इस बारे में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया का कहना है, ‘चौहान बताएं कि उन्होंने अपने आवास पर अब तक जितनी भी पंचायतें कराई हैं उनमें की गई घोषणाओं की स्थिति क्या है. साथ ही वे यह भी बताएं कि इस पूरे तामझाम में सरकार का अब तक कुल कितना पैसा खर्च हो चुका है.’

जानकार बताते हैं कि मुख्यमंत्री की कोई भी घोषणा शासन की योजना मानी जाती है. इसलिए चौहान को चाहिए कि वे ऐसी घोषणा न करें जिससे शासन को व्यर्थ की माथापच्ची करनी पड़े. प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव केएस शर्मा के मुताबिक, ‘मुख्यमंत्री की कोई घोषणा यदि बहुत लंबे समय से अधूरी पड़ी है तो इसका सीधा अर्थ है कि उसमें वित्त या विधि की ऐसी अड़चन है जिसे दूर करना मुश्किल है.’ उदाहरण के लिए, पांच साल पहले मुख्यमंत्री ने अनुसूचित जाति पंचायत में इस वर्ग के साहित्यकारों और कलाकारों को पुरस्कार देने की घोषणा की थी. इस घोषणा पर संस्कृति मंत्रालय ने शासन को बताया कि उसने पुरस्कारों का किसी वर्ग विशेष से संबंधित कोई दायरा तय नहीं किया है.

लिहाजा इस घोषणा को पूरा करने का काम अनुसूचित जाति कल्याण मंत्रालय को सौंपा जाए. तब से दोनों मंत्रालयों के बीच यह घोषणा अटकी पड़ी है. इसी तरह, चार साल पहले मुख्यमंत्री ने प्रदेश में बीस हजार आंगनबाड़ी खोलने की घोषणा की थी. तब तक सरकार ने बेरोजगारों को भर्ती करने की कोई तैयारी नहीं की थी. बावजूद इसके मुख्यमंत्री ने आंगनबाडि़यों में बेरोजगारों को भर्ती करने की घोषणा कर दी. जनसंपर्क विभाग ने भी अखबारों में विज्ञापन जारी कर दिया. उसमें पांच लाख से अधिक आवेदन आए. मगर सरकार ने यह पूरी प्रक्रिया रद्द कर दी. इस दौरान सरकार के विज्ञापन में तीन करोड़ रुपये तो खर्च हुए ही, बेरोजगारों के भी आवेदन भरने में एक करोड़ रुपये खर्च हो गए. 

मुख्यमंत्री ने 2008 में जारी जनसंकल्प पत्र में किसानों के लिए सबसे अधिक 62 घोषणाएं की थीं. लेकिन चार साल बाद भी उनमें से 61 घोषणाएं अधर में हैं. इसमें वह घोषणा भी शुमार है जिसमें उन्होंने किसानों का पचास हजार रुपये तक का कर्ज माफ करने की घोषणा की थी. भाजपा कर्णधारों का मानना है कि चौहान की इस घोषणा ने पार्टी की सत्ता में वापसी कराने में अहम भूमिका अदा की थी.

मुख्यमंत्री ने 2008 में जारी जनसंकल्प पत्र में किसानों के लिए सबसे अधिक 62 घोषणाएं की थीं. लेकिन चार साल बाद भी उनमें से 61 घोषणाएं अधर में हैं.

गौरतलब है कि 2003 में कांग्रेस को इसी बीएसपी (बिजली, सड़क और पानी) फैक्टर के चलते सत्ता गंवानी पड़ी थी. चुनावी वर्ष में अब यही फैक्टर यहां फिर जोर पकड़ रहा है. हालत यह है कि भाजपा विधायक दल की बैठक में विधायकों ने कहना शुरू कर दिया है कि चुनाव में बिजली और सड़क की बदहाली भारी पड़ सकती है. 13 दिसंबर, 2012 को विधानसभा सत्र के आखिरी दिन पार्टी विधायक दल की बैठक में विधायकों ने मुख्यमंत्री से साफ-साफ कहा कि यदि इन क्षेत्रों में जल्द ही कुछ काम नहीं किया गया तो चुनावी मैदान में मोर्चा संभालना मुश्किल हो जाएगा. दरअसल 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सौ दिन के भीतर हर घर में 24 घंटे बिजली पहुंचाने की घोषणा दम तोड़ चुकी है.

हकीकत यह है कि यहां बिजली का उत्पादन मांग के मुकाबले आधा भी नहीं हो पा रहा है. चौहान सरकार का दूसरा बड़ा सिरदर्द राजकीय राजमार्गों को लेकर है. राज्य में लोक निर्माण विभाग की कुल 25 हजार किलोमीटर सड़कें हैं. मगर विभागीय रिपोर्ट के मुताबिक इसमें भी 9,500 किलोमीटर सड़कें खस्ताहाल हैं. वहीं मुख्यमंत्री की 31 दिसंबर तक 15 हजार किलोमीटर सड़कें बनाने की घोषणा मखौल बनकर रह गई है. खुद मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र बुधनी से राजधानी तक 80 किमी का फासला सड़क मार्ग से तय करने में साढ़े तीन घंटे का समय लगता है.

मजेदार यह भी है कि मुख्यमंत्री चौहान खुद अपने लिए की गई घोषणाओं पर भी कायम नहीं रहते. इनमें न तो वित्त और न ही प्रशासन का ही कोई पेंच फंसता है. मसलन, 2008 में जब केंद्र ने पेट्रोल की कीमत में बढ़ोतरी की तो उसके बाद चौहान की वह घोषणा सिर्फ घोषणा ही बनी हुई है जिसमें उन्होंने सप्ताह में एक दिन साइकिल से मंत्रालय जाने की बात की थी. बेशक चौहान ने इन सालों में घोषणाओं के बूते लोकप्रिय नेता की छवि बना ली है लेकिन अब इनकी जमीनी हकीकत सामने आने के साथ-साथ राज्य भाजपा की पेशानी पर बल पड़ना शुरू हो गए हैं.

विदेश में ऐश, नतीजा सिफर!

छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों में विदेश यात्राओं की होड़ लगी हुई है, लेकिन निवेश आकर्षित करने तथा तमाम अन्य जरूरी वजहों का हवाला देकर की जा रही इन विदेश यात्राओं का परिणाम अब तक शून्य ही रहा है. राज्य के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह अक्टूबर, 2009 में जब एक सप्ताह की दक्षिण अफ्रीका यात्रा पर गए थे तब उन्होंने व्यापार-वाणिज्य के नजरिये से नए संबंधों की शुरुआत का हवाला देते हुए दावा किया था कि उनकी सरकार जल्द ही कोयले पर आधारित गैस के उत्पादन और प्लेटिनम धातुओं के संयंत्रों की स्थापना के लिए पहल करेगी, लेकिन चार साल बाद भी दक्षिण अफ्रीका के किसी निवेशक ने प्रदेश में निवेश की रुचि नहीं दिखाई. कमोबेश यही स्थिति वर्ष 2011 में भी बनी जब उन्होंने 9 से 21 अक्टूबर तक कैलिफोर्निया, सेन फ्रांसिस्को और लास एंजिल्स जैसे शहरों की खाक छानी. इस यात्रा के दौरान भी अप्रवासी भारतीयों को प्रदेश में पूंजी निवेश करने का न्यौता दिया गया था लेकिन परिणाम वही ‘ढाक के तीन पात’ रहा.

अकेले मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि अध्ययन या फिर ट्रेड फेयर में शिरकत के नाम पर अनेक मंत्री और अफसर विदेश यात्राओं पर जाते रहे हैं लेकिन सभी के नतीजे सिफर ही रहे हैं. वर्ष 2007 में जब रमन सरकार के एक मंत्री मेघाराम साहू ने मलेशिया और थाईलैंड की यात्रा की थी तब हल्ला मचा था कि वे सिंगापुर, मलेशिया और थाईलैंड क्यों जा रहे हैं. वजह यह थी कि वे सामान्य प्रशासन विभाग की अनुमति के बगैर अपने निजी सहायक बाबूलाल साहू को भी ले गए थे. मंत्री जब यात्रा से लौटे तो उन्होंने मंडियों को आधुनिक बनाने के लिए एक रिपोर्ट तैयार करने की बात कही जो अब तक तैयार नहीं हो पाई है. मंडी बोर्ड के संयुक्त संचालक एस राय तहलका से कहते हैं, ‘प्रदेश में कुल 70 मंडियां है लेकिन सभी अधकचरे ढंग से संचालित हो रही हैं. दुर्ग और राजनांदगांव जैसे जिलों में फलों के क्रय-विक्रय के लिए फल मंडी जरूर खोली गई है लेकिन इसका रिस्पांस भी बेहतर नहीं माना जा सकता.’

वर्ष 2007 में ग्रामोद्योग मंत्री केदार कश्यप ने ग्रामोद्योग विभाग के सचिव सीके खेतान और हस्तशिल्प बोर्ड के महाप्रबंधक नरेंद्र सिंह चंदेल के साथ बारी (इटली) की यात्रा की थी. इस यात्रा के दौरान भी मंत्री ने छत्तीसगढ़ के हस्तशिल्पियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सार्थक मंच देने का दावा किया था. इस यात्रा पर कुल 14 लाख 79 हजार 84 रुपये खर्च किए गए.

अफसरों ने यात्रा के अनुभव को लेकर हस्तशिल्प विकास बोर्ड के समक्ष एक संक्षेपिका भी प्रस्तुत की, लेकिन बाद में यह देखने की जहमत नहीं उठाई गई कि हस्तशिल्पियों को सही बाजार मिल पा रहा है या नहीं. बोर्ड ने वर्ष 2008-09 में देश के कुल 24 स्थानों पर शिल्पकलाओं की प्रदर्शनी लगाई थी, जबकि वर्ष 2009-10 में मात्र दस स्थानों पर प्रदर्शनी लग पाई. बाद के सालों में प्रदर्शनियों की संख्या और भी कम हो गई. बोर्ड पहले उन तमाम कलाकारों के आवागमन का खर्च वहन किया करता था जो देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित की जाने वाली प्रदर्शनियों में शामिल हुआ करते थे लेकिन धीरे-धीरे बोर्ड ने यह बंद कर दिया. 

 

2008 में गृह मंत्री रामविचार नेताम इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज की बैठक में भाग लेने के लिए नॉर्वे गए थे लेकिन इसकी संक्षेपिका तक मंत्रालय में मौजूद नहीं है

वर्ष 2008 में तत्कालीन गृह मंत्री रामविचार नेताम के अलावा 47 अफसर विदेश यात्रा पर गए थे. इन यात्राओं पर कुल एक करोड़ 67 लाख 10 हजार चार सौ साठ रुपये खर्च किए गए थे. इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज की ओर से नक्सलवाद की रोकथाम के लिए 10 से 17, अप्रैल तक नॉर्वे में आयोजित वैश्विक सम्मेलन से शिरकत के बाद जब गृहमंत्री स्वदेश लौटे तब उन्होंने नक्सलवाद के खात्मे के लिए प्रभावी उपायों को अपनाने की बात कही थी, लेकिन वहां क्या हुआ, किन उपायों पर जोर दिया गया इसकी कोई संक्षेपिका भी गृह विभाग के पास मौजूद नहीं है.

 

वर्ष 2009 में मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह अपने लाव-लश्कर के साथ दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर थे तो मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल, विक्रम उसेंडी और रामविचार नेताम ने लंदन, इटली, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे, जिनेवा, जापान और अमेरिका की यात्रा की थी. मंत्रियों के अलावा सरकार के 36 अफसर भी जमकर विदेश यात्रा पर गए जिन पर कुल एक करोड़ 66 लाख 37 हजार 121 रुपये खर्च हुए. इस साल पर्यटन मंडल के तत्कालीन सचिव सुब्रत साहू और महाप्रबंधक मदन गोपाल श्रीवास्तव ने लंदन, इटली और स्विटरजरलैंड में लगने वाले वर्ल्ड ट्रैवल मार्ट में शिरकत करने के बाद छत्तीसगढ़ में विदेशी पर्यटकों की ओर से रुचि दिखाने का दावा किया था लेकिन पर्यटन सूचना केंद्र के प्रबंधक दिलीप आचार्या छत्तीसगढ़ में विदेशी पर्यटकों की आवाजाही को उल्लेखनीय नहीं मानते. तहलका से चर्चा में वे कहते हैं, ‘प्रदेश में धार्मिक स्थलों की बहुलता के चलते धार्मिक पर्यटकों की आवाजाही तो साल भर बनी रहती है लेकिन छत्तीसगढ़ की पहचान नक्सलियों के एक प्रमुख गढ़ के रूप में प्रचारित कर दी गई है, फलस्वरूप विदेशी छत्तीसगढ़ आने से अब भी कतराते हैं.’ वैसे एक सच्चाई यह भी है कि वर्ष 2012 में जहां देसी पर्यटकों की संख्या दो लाख 33 हजार 251 थी तो विदेशी पर्यटकों में मात्र दो हजार एक सौ 66 ही यहां आए. 

वित्त विभाग के प्रमुख अजय सिंह ने भी 6 से 18 सितंबर तक यूरोपियन यूनियन स्टेट पार्टनरशिप कार्यक्रम के तहत उच्च स्तरीय अध्ययन के लिए डेनमार्क, नॉर्वे और आस्ट्रिया की यात्रा की. तब भी कहा गया था कि वे विभिन्न देशों में लोक स्वास्थ्य को बेहतर करने के नजरिये से चल रही योजनाओं का अध्ययन कर, उन्हें राज्य में लागू करने की पहल करेंगे. यात्रा में छह लाख 68 हजार 666 रुपये खर्च हुए थे. लेकिन स्वास्थ्य महकमे के पास कोई रिपोर्ट मौजूद नहीं है. वर्ष 2011 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के अलावा कुल सात मंत्रियों और 27 अफसरों ने विदेशी सैर-सपाटे को अंजाम दिया था. इस यात्रा में एक करोड़ 13 लाख पांच हजार सात सौ 61 रुपये फूंके गए. वर्ष 2012 में तीन मंत्रियों रामविचार नेताम, चंद्रशेखर साहू और अमर अग्रवाल के अलावा 57 अधिकारियों ने विदेश भ्रमण किया. उल्लेखनीय है कि इतने खर्च के बाद की गई विदेश यात्राओं का कोई हासिल नजर नहीं आता है.

इतना ही नहीं मंत्रियों के साथ जाने की बात छोड़ दी जाए तो राज्य के अधिकारी अपने स्तर पर भी विदेश यात्राओं में कतई पीछे नहीं हैं. उनकी इस होड़ पर भारी मात्रा में सरकारी धन खर्च हो रहा है. कई  प्रशासनिक अधिकारियों से जूनियर अफसर पीजाय उम्मेन ने छत्तीसगढ़ में अपनी पदस्थापना के दौरान सबसे ज्यादा विदेश यात्राएं की थीं. उम्मेन सेवानिवृत्त हो चुके हैं, लेकिन वर्ष 2007 से वे लगातार विदेश यात्रा करते रहे हैं. जब वर्ष 2007 में वे आवास पर्यावरण महकमे का कामकाज देख रहे थे तब उन्होंने न्यू रायपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी की ओर से एक लाख 68 हजार 859 रुपये के व्यय पर लंदन की यात्रा की थी. एक दिसंबर से 12 दिसंबर, 2008 तक वे वित्त विभाग के सचिव डीएस मिश्र के साथ लंदन और अमेरिका की यात्रा पर थे.

इतना ही नहीं मंत्रियों के साथ जाने की बात छोड़ दी जाए तो राज्य के अधिकारी अपने स्तर पर भी विदेश यात्राओं में कतई पीछे नहीं हैं.

वर्ष 2009 के अक्टूबर महीने में उम्मेन जोहन्सबर्ग केपटाउन में थे. वर्ष 2011 में उन्होंने 27 से 31 मार्च तक शहरों के विकास के मद्देनजर पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल विकास के संबंध में अध्ययन के लिए ब्रसेल्स तथा 5 से 14 अक्टूबर तक बेल्जियम की यात्रा की थी. दोनों यात्राओं के लिए उन्होंने छह लाख 75 हजार 743 रुपये खर्च किए थे. छत्तीसगढ़ स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में एमडी की हैसियत से पदस्थ राजेश गोवर्धन ने वर्ष 2007 में जर्मनी और 2008 में बेल्जियम की यात्रा की. जबकि हस्तशिल्प बोर्ड में महाप्रबंधक की हैसियत से पदस्थ रहे नरेंद्र सिंह चंदेल ने वर्ष 2007 में जहां दो लाख 39 हजार रुपये के व्यय पर बारी (इटली) की यात्रा की थी तो इसी पद पर रहते हुए वे 16 से 18 मार्च, 2008 तक शिकागो में थे. भारतीय प्रशासनिक सेवा 1981 बैच के अफसर विवेक ढांढ ने भी नगरीय प्रशासन विभाग की ओर से पांच लाख 58 हजार 572 रुपये के व्यय पर 4 से 9 अक्टूबर, 2009 को स्पेन और पेरिस की यात्रा की थी.

इस यात्रा के दौरान शहरों के योजनाबद्ध तरीके से नवीनीकरण किए जाने वाले प्रयासों का दावा सामने आया था. ढांढ दो से पांच मई, 2010 तक कनाडा के वैंकूवर शहर की यात्रा पर थे. इस यात्रा में पांच लाख पांच हजार 718 रुपये खर्च हुए थे. यात्रा के परिणामों के संदर्भ में महज इतना ही कहा जा सका था कि विभिन्न देशों में वेयर हाउसिंग लॉजिस्टिक के क्षेत्र में हो रही प्रगति से अवगत होकर अनुभव को समृद्ध किया गया. वर्ष 2007 से लेकर दिसंबर, 2012 तक लगभग दो सौ अफसरों ने विदेश यात्राएं की हैं. छत्तीसगढ़ में मंत्रियों और अधिकारियों की यात्रा का यह सिलसिला फिलहाल थमा नहीं है, लेकिन राज्य को इन यात्राओं से फायदा मिलने का इंतजार है.

 

राहुल गांधी : युवा तुर्क का राजनीतिक बयान

एक ऐसी पार्टी जिसमें करीब चार दशक से एक ही परिवार का आधिपत्य हो वहां नताओं का सार्वजनिक रूप से रोना-बिलखना अपने आप ही एक संशय को जन्म देता है. शीला रोईं, जनार्दन रोए और गहलोत रोए. लगभग पूरा कांग्रेस परिवार ही गमगीन था. कहना होगा कि यहां पार्टी के नवनियुक्त उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपना लक्ष्य पूरा करने में पूरी तरह से सफल रहे. उन्होंने अपने पार्टीजनों और देशवासियों को बिल्कुल सही समय पर अपनी दादी और पिताजी के बलिदान की याद दिलाई. इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि देश के लिए गांधी परिवार का योगदान बहुत बड़ा है.

लेकिन यहां आकर राहुल गांधी के साथ हमारी सहमति समाप्त हो जाती है. इस देश के नेता भावुकता का प्रदर्शन करने के लिए नहीं जाने जाते. ऐसे में ज्यादातर कांग्रेसी नेताओं के रोने-बिलखने का एक संदेश साफ है कि वे इस मौके का इस्तेमाल परिवार के प्रति अपनी श्रद्धा साबित करने के लिए करने से नहीं चूके. यह एक अलग किस्म का अवसरवाद है. 

खैर, हम राहुल गांधी के भाषण के पहले हिस्से की बात करते हैं जिसे उनका राजनीतिक बयान कहा जा सकता है. राहुल गांधी को भले ही आधिकारिक रूप से नंबर दो अब जाकर कांग्रेस ने घोषित किया हो लेकिन इस बात में किसको संदेह था कि वे पार्टी में नंबर दो नहीं है? उन्होंने अपनी पार्टी की संस्कृति को बदलने की बात कही, अवसरवादी राजनीति पर लगाम लगाने की भी बात कही है. इन घोषणाओं के लिहाज से राहुल एक नई कांग्रेस की उम्मीद जगाते हैं. लेकिन यह बदलाव आमूल परिवर्तन की तरह नहीं दिखने वाला. उन्हें पता है कि यह आसान काम नहीं है.

इसीलिए उन्होंने बदलवा और युवाओं को लाने के साथ एक वाक्य सावधानी से जोड़ दिया था- ‘यह सब धीरे-धीरे होगा.’ ओल्ड गार्ड के अंदर किसी तरह की बेचैनी न पनपने पाए इसका भी उन्होंने बहुत सावधानी से ख्याल रखा. जब-जब उन्होंने कहा कि युवाओं को आगे लाना है तब-तब उन्होंने यह भी कहा कि हमें अपने बुजुर्गों के अनुभव की जरूरत हर दकम पर पड़ेगी. उन्हें अंदाजा है कि आमूल बदलाव का कोई संदेश पार्टी के भीतर ही उठापटक का सबब बन सकता है. यहां राहुल गांधी ने काफी समझदारी दिखाई.

पर परिवर्तन के बयान पर वे खुद को बहुत आगे ले जाते नहीं दिखे. बदलाव की उनकी घोषणा उनकी तमाम पिछली घोषणाओं के जैसी ही है. उसमें किसी स्पष्ट योजना और कार्यक्रम के दर्शन नहीं होते. किस तरह से वे पार्टी की अंदरूनी संस्कृति को बदलेंगे, किस तरह से देश में समतामूलक माहौल बनाएंगे इसके लिए उन्होंने कोई विस्तृत और स्पष्ट रोडमैप नही दिया है उन्होंने. उत्तर प्रदेश से लेकर खैरलांजी तक के दलित परिवारों के घरों में रात बिताना और उनका जीवन बदलने का सपना दिखाकर वापस दिल्ली लौट -जाने वाली छवि अभी भी कायम है. अमेठी, बस्ती से लेकर भट्टा पारसौल तक के जितने दलित परिवारो के घर में उन्होंने रात्रि विश्राम किया है उनमें से कोई भी राहुल गांधी से संतुष्ट नहीं है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पत्ता साफ की एक वजह राहुल के वे खोखले वादे भी थे जिनसे वहां के लोगों में एक गुस्सा था. यह खोखलापन उनके राजनीतिक बयान में भी दिखा. यह कांग्रेस को किसी निश्चित दिशा में नहीं ले जा रहा है.   

राजनीति वातावरण के नजरिए से देश इस समय एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर है. देश की दो बड़ी पार्टियों में नेतृत्व का फेरबदल चल रहा है. कांग्रेस में जहां यह परिवारवाद की अगली कड़ी के रूप में सामने आया है वहीं भाजपा में यह संघ के आधिपत्य और पार्टी के एक धड़े के बीच मची आपसी खीचतान को सामने लेकर आया है. इस लिहाज से राहुल गांधी के लिए स्थितियां मुफीद है, उनके सामने कोई दिग्गज, घाघ जननेता नहीं खड़ा है, एक बिखरी हुई पार्टी है जिसके तमाम धड़े आपसी सिरफुटौव्वल से बेजार हैं. पर हां जनता खोखले वादे और दिशाहीन नेताओं को ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं करती. 

हिंदू कोड बिल

भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान सरकार हमेशा यह सावधानी बरतती थी कि सामाजिक मामलों में वह दखल न दे. मुसलमानों के साथ-साथ हिंदुओं को भी अपने सामाजिक मसलों में धार्मिक नियमों के आधार पर फैसले लेने की आजादी थी. हालांकि किसी धार्मिक समुदाय के एक बड़े तबके द्वारा मांग करने पर सरकार इस दिशा में पहल जरूर करती थी. इस आधार पर 1941 में सरकार ने हिंदुओं में विधवा उत्तराधिकार कानून की समीक्षा के लिए राव समिति का गठन किया था और इसी समिति ने पहली बार हिंदू कोड बिल का मसौदा तैयार किया था.

नेहरू के नेतृत्व में जब भारत में पहली नामित सरकार बनी तब उन्होंने कानून मंत्री बीआर अंबेडकर को दोबारा हिंदू कोड बिल बनाने की जिम्मेदारी सौंपी. अंबेडकर ने राव समिति द्वारा बनाए गए बिल में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए और 1948 में इसे संसद में चर्चा के लिए पेश कर दिया. इन नए संशोधित हिंदू कोड बिल में तलाक और विधवा महिलाओं व लड़कियों के लिए संपत्ति का अधिकार जैसे विषयों पर सुधारवादी कदम उठाए गए थे.

रूढ़िवादी हिंदू पहले से इस बिल के विरोध में थे. इसलिए जब यह बिल संसद में चर्चा के लिए आया तब हिंदूवादी संगठनों ने इसके खिलाफ देश भर में प्रदर्शन शुरू कर दिए. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अकेले दिल्ली में दर्जनों विरोध रैलियां आयोजित कीं. स्वामी करपात्री इस पूरे विरोध आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे. वे जगह-जगह रैलियों में धर्मशास्त्रों का हवाला देते हुए अंबेडकर को हिंदू कोड बिल पर सार्वजनिक बहस के लिए आमंत्रित करते थे. इस व्यापक विरोध का असर यह हुआ कि हिंदू कोड बिल संसद से पारित नहीं हो पाया. और इस घटना से आहत अंबेडकर ने आखिरकार नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया.

हालांकि जब 1951-52 में आम चुनाव के बाद नई सरकार का गठन हुआ तब एक बार फिर हिंदू कोड बिल संसद से पारित कराने की कोशिशें हुईं और 1956 तक चार अलग-अलग विधेयकों को पारित कर इसे स्वीकार कर लिया गया.
-पवन वर्मा

सीधे सवाल, उलझे जवाब

क्या बलात्कार की सजा फांसी हो?
‘औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया.
जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया’
दिल्ली के जंतर मंतर पर जहां साहिर लुधियानवी की ये पंक्तियां गाते हुए कुछ युवा नुक्कड़ नाटक में लोगों को महिलाओं की व्यथा सुना रहे हैं वहीं उनके ठीक पीछे एक बड़े-से बैनर पर प्रधानमंत्री के नाम एक अपील भी लिखी है. इसका पहला बिंदु है ‘धारा 376 में मृत्यु दंड का प्रावधान किया जाए’. इनसे थोड़ी ही दूरी पर ‘भगत सिंह क्रांति सेना’ के कुछ लोग धरना दे रहे हैं. उनके अध्यक्ष तेजिंदर बग्गा की भूख हड़ताल का आज सातवां दिन है. उनकी भी पहली मांग यही है कि बलात्कारियों को फांसी की सजा हो.

जंतर मंतर का यह दृश्य पूरे देश के लोगों में व्याप्त उस आक्रोश की तस्वीर बयान करता है जो 16 दिसंबर की रात हुए गैंगरेप के बाद से लोगों में पैदा हुआ है. एक तरफ जहां पिछले 18 साल में भारत में कुल तीन फांसियां हुईं और यह चर्चा जोर पकड़ने लगी थी कि भारत को भी अधिकतर विकसित देशों की तरह मृत्युदंड को समाप्त कर देना चाहिए वहीं अब इस सजा का दायरा और बढ़ाने की मांग हो रही है. इस घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा संबंधी कानूनों में सुधार के लिए बनाई गई जस्टिस वर्मा समिति को भाजपा समेत हजारों संगठनों और व्यक्तियों के सुझाव प्राप्त हुए हैं जिनमे बलात्कार के लिए फांसी का प्रावधान बनाने की मांग की गई है.

लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिंदर सच्चर जैसे कई लोगों का मानना है कि फांसी देना इस समस्या का समाधान नहीं है. जस्टिस सच्चर कहते हैं, ‘यह तो सिद्ध हो ही चुका है कि फांसी देने से लोगों में वह डर पैदा नहीं होता जिससे अपराधों पर रोक लग सके. ऐसे में हमें आगे बढ़ते हुए फांसी को तो समाप्त ही कर देना चाहिए.’ दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के अगुवा रहे ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के कार्यकर्ता संदीप सिंह भी मानते हैं कि बलात्कार के लिए फांसी देने पर कई जगह तो पीड़ित को जिंदा ही नहीं छोड़ा जाएगा. इसके अलावा अधिकतर मामलों में अपराधी किसी न किसी तरह पीड़ित से जुड़ा होता है इसलिए बलात्कार का मामला दर्ज न करने के लिए पीड़ित पर कई तरह के दबाव बनाए जाएंगे जिससे ऐसे मामले सामने भी नहीं आ पाएंगे. संदीप बताते हैं, ‘जरूरत कानून को कठोर करने की नहीं बल्कि महिलाओं के प्रति संवेदनशील बनाने की है. आज महिलाओं पर होने वाले कई अपराधों को तो हमारा कानून मानने से भी इनकार करता है. जिस तरह से जाति सूचक टिप्पणी करना अपराध माना गया है, उसी तरह लैंगिक टिप्पणियां करने वालों को भी दंडित किए जाने का प्रावधान कानून में होना चाहिए.’

कानून के जानकारों का मानना है कि बलात्कार के लिए उम्र कैद की सजा का प्रावधान कुछ कम कठोर नहीं है लेकिन दोष साबित होने की दर का बहुत ही कम होना एक बड़ी समस्या है. दिल्ली विश्वविद्यालय में विधि के प्रवक्ता संतोष शर्मा बताते हैं, ‘महिला उत्पीड़न से जुड़े मुद्दों में फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए जल्दी न्याय देना एक सकारात्मक पहल होगी. आज लाखों की संख्या में ऐसे मामले लंबित हैं जिनमें सालों से किसी को सजा नहीं हो पाई है. यह एक बड़ा कारण है कि इन मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है.’ मौजूदा कानून में बदलाव की बात करने पर संतोष कहते हैं, ‘बलात्कार की परिभाषा को और ज्यादा विस्तृत किया जाना भी आवश्यक है ताकि महिलाओं पर होने वाले अन्य यौन अपराधों को भी उसमें शामिल किया जा सके.’

दिल्ली में हुई इस नृशंस घटना से गुस्साए कई लोग यह मांग कर रहे हैं कि अपराधियों को सऊदी अरब की तरह सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसे देश के कानून को आदर्श बनाने की मांग कर रहे हैं जहां आज तक महिलाओं को वोट देने और गाड़ी चलाने तक के अधिकार नहीं दिए गए हैं और जिस देश में 2012 में हुई आखिरी फांसी जादू-टोना करने के आरोप में दे दी गई थी. जस्टिस सच्चर समेत कई कानूनी जानकारों का मानना है कि निश्चित ही महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित कानूनों में सुधार की जरूरत है लेकिन फांसी को बढ़ावा देना समस्या का समाधान नहीं बल्कि राज्य को भी बर्बर बनाने की ही एक पहल होगी.

क्या नाबालिग आरोपित को भी बाकियों जैसी सख्त सजा हो?
16 दिसंबर को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार का एक आरोपित 18 साल से कम उम्र का होने के चलते ‘किशोर अपराधी’ की श्रेणी में आता है. इसलिए उसे अन्य अपराधियों की तरह फांसी या आजीवन कारावास से दंडित नहीं किया जा सकता. इस तथ्य ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है जिसमें किशोर की उम्र को 18 साल से घटाकर 16 साल किए जाने की मांग हो रही है. तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और बिहार सरकार के अलावा सैकड़ों संगठन केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेज चुके हैं कि अधिनियम में संशोधन करके किशोर की आयु को घटाकर 16 साल किया जाए.

वैसे किशोर न्याय अधिनियम, 1986 के तहत किशोर (जुवेनाइल) की आयु 16 साल ही तय की गई थी. 2000 में बाल अधिकारों पर हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मलेन के बाद इस अधिनियम में बदलाव किया गया और इसे 18 साल कर दिया गया. इस अधिनियम में संशोधन भी हुए हैं लेकिन किशोर की उम्र को हमेशा ही 18 साल रखा गया. इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के किसी किशोर को उसके द्वारा किए गए अपराध के लिए तीन वर्ष से अधिक की सजा नहीं दी जा सकती. साथ ही किशोर अपराधियों को अन्य अपराधियों के साथ जेल में रखने के बजाय बाल सुधार गृह में रखा जाता है.

अब इस पर बहस हो रही है. सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता संजय पारिख किशोर की उम्र को घटाकर 16 साल करने के पक्ष में हैं. वे कहते हैं, ‘कई वैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के तर्क भी बताते हैं कि आजकल के किशोर तुलनात्मक रूप से जल्दी परिपक्व हो जाते हैं. उन्हें इतने माध्यमों से सूचनाएं और जानकारियां मिल रही हैं कि 16 वर्ष की उम्र में वे तय कर सकते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह सही है या नहीं. तकनीक का विकास इसका एक महत्वपूर्ण कारण है.’ उधर, विधि प्रवक्ता संतोष शर्मा मानते हैं कि तकनीक जितनी तेजी से युवाओं को सकारात्मक दिशा में प्रभावित कर रही है उतनी ही तेजी से उन्हें गलत दिशा में भी झोंक रही है और गलत कार्यों के लिए आकर्षित कर रही है. वे कहते हैं, ‘16 से 18 साल की आयु ऐसी होती है जहां बच्चे आसानी से अपने माहौल और अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से प्रभावित होते हैं. ऐसे में उनकी किसी भी गलती के लिए उनका समाज भी उतना ही दोषी है.’

भारतीय कानूनों के अनुसार एक वयस्क नागरिक को दिए जाने वाले सभी अधिकार 18 साल की उम्र के बाद ही दिए जाते हैं. ऐसे में कई लोगों का यह भी मानना है कि जब अधिकारों के लिए एक व्यक्ति को 18 साल में परिपक्व माना जाता है तो फिर उसकी गलतियों के लिए उसे 16 साल में ही परिपक्व कैसे माना जा सकता है. सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी कहती हैं, ‘एक मामले के आधार पर कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जो आने वाले वक्त में अन्याय का कारण बन जाए. कल यदि कोई 15 या 14 साल का बच्चा ऐसा ही जघन्य अपराध करता है तो इस आयु सीमा को कहां तक कम करेंगे? बच्चों में सुधरने की प्रबल संभावनाएं होती हैं जिसका उन्हें पूरा मौका दिया जाना चाहिए. यदि उन्हें भी बाकी अपराधियों के साथ जेल में डाल दिया जाए तो उनके सुधरने की गुंजाइश ही नहीं रहेगी.’ हालांकि वे यह भी मानती हैं कि इस मामले में जिस क्रूरता से अपराध किया गया है उसे देखते हुए सभी आरोपितों को कड़ी-से-कड़ी सजा होनी चाहिए.

भारतीय कानूनों के अनुसार एक वयस्क नागरिक को दिए जाने वाले सभी अधिकार 18 साल की उम्र के बाद ही दिए जाते हैं.

किशोर के आयु निर्धारण पर हो रही इस बहस को काफी हद तक सुलझाते दिखते संतोष शर्मा कहते हैं, ‘जैसे दहेज के मामलों में सात साल की समय सीमा तय की गई है वैसे ही यहां भी एक सीमा तो तय होनी ही है. भारतीय दंड संहिता में व्यक्ति की आयु को कई वर्गों में बांटकर यह देखा जाता है कि अपराध करते वक्त उसकी समझ और अन्य कारक क्या थे और फिर उसी आधार पर सजा निर्धारित की जाती है. ऐसा ही किशोर आरोपितों से जुड़े मामलों में भी किया जा सकता है. इस तरह से विशेष श्रेणियों में बांटकर न तो जघन्य अपराध करने वाले किशोर अपराधी पूर्णतः प्रतिरक्षित रह सकेंगे और न ही किसी अबोध किशोर को अनावश्यक दंड मिलेगा.’

बहरहाल जो भी कानून बनेगा उससे दिल्ली मामले का यह किशोर आरोपित प्रभावित नहीं होगा कि इस कानून को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता. यह आगे के लिए ही प्रभावी होगा.

क्या बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर की जानी चाहिए?
दामिनी, जागृति, अमानत, निर्भया जैसे कितने ही नामों से लोगों ने उस 23 साल की लड़की को जाना और लाखों की संख्या में उसके लिए न्याय की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आए. उसका असली नाम, उसकी पहचान इसलिए भी महत्वपूर्ण नहीं थी क्योंकि उसकी जगह देश की कोई भी आम लड़की हो सकती थी. बिना उस लड़की का नाम जाने, बिना उसकी पहचान जाने ही हजारों लोगों ने एक साथ मिलकर उसके अपराधियों को सजा देने की मांग करते हुए लाठी-डंडे भी खाए और तेज पानी की बौछारें भी झेलीं. उस लड़की के गुजर जाने के बाद जब कुछ अखबारों ने उसका असली नाम प्रकाशित कर दिया तो यह पूरे देश में बहस का एक मुद्दा बन गया. कांग्रेस नेता शशि थरूर ने उसकी असली पहचान उजागर होने का समर्थन करते हुए इस बात की पैरवी की कि यदि उसके अभिभावक तैयार हों तो नए कानून को उस बहादुर लड़की के नाम पर बनाया जा सकता है. लड़की के परिजनों ने भी इस बात पर सहमति जताई है कि यदि नए कानून का नाम उनकी बेटी के नाम पर रखा जाता है तो इससे उन्हें कोई परेशानी नहीं है.

मौजूदा कानून के अनुसार बलात्कार या यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में पीड़ित की पहचान उजागर करना प्रतिबंधित एवं दंडनीय है. यदि पीड़ित की मृत्यु हो गई है तो उसके परिजनों की लिखित अनुमति पर उसकी पहचान उजागर की जा सकती है. कई लोगों का तर्क है कि बलात्कार जैसी घटना किसी के साथ भी हो सकती है और इसमें पीड़ित का कोई भी दोष नहीं, तो फिर उसकी पहचान गुप्त क्यों रखी जाए. उनके मुताबिक बलात्कार के मामले में पीड़िता और उसके परिजनों को नहीं बल्कि अपराधी और उसके परिजनों को शर्मिंदा होना चाहिए. जैसे रंगा-बिल्ला मामले के पीड़ित गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा के नाम पर बहादुरी पुरस्कार दिया जाता है वैसे ही इस लड़की के नाम पर नए कानून बनाए जाने की मांग हो रही है.

जानकार बताते हैं कि फिलहाल ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है जिसके आधार पर कानून को किसी व्यक्ति विशेष का नाम दिया जाए, लेकिन संसद में प्रस्ताव पारित करके ऐसा किया भी जा सकता है. इस बहस से ये सवाल भी उठने लगे हैं कि बलात्कार के मामलों में पीड़िता की पहचान उजागर करने के क्या प्रभाव हो सकते हैं. जस्टिस सच्चर कहते हैं, ‘दिल्ली का यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चित हो चुका है इसलिए लोगों की सहानुभूति पीड़ित और उसके परिजनों के साथ है. लेकिन बलात्कार के मामलों में आज भी समाज पीड़ित को एक आम नागरिक की तरह नहीं स्वीकार करता इसलिए उसकी पहचान उजागर करने की प्रथा शुरू नहीं होनी चाहिए’.

बलात्कार के मामलों में अधिकतर जगह पीड़िता को ही किसी न किसी तरह से दोषी मान लिया जाता है. दिल्ली के इस चर्चित मामले में भी जहां सारा देश ऐसे अपराध की निंदा कर रहा है, कई बड़े नेता और धर्मगुरु पीड़िता के ही गलत होने की बात कर चुके हैं. ऐसे में बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर करने के और भी ज्यादा दुष्परिणाम हो सकते हैं. पीड़िता की पहचान के साथ ही उसके व्यवहार, उसकी जीवन शैली, पहनावे, परिवार, संस्कार, जाति समेत तमाम मुद्दों को ऐसे लोगों द्वारा चर्चा का विषय बनाया जाएगा जो किसी भी तरह से पीड़िता में ही दोष खोजने को तैयार बैठे हैं. संजय पारिख कहते हैं, ‘पीड़िता की पहचान करके हम उसकी मुश्किलें और ज्यादा बढ़ा देंगे.’

बलात्कार के मामलों में पीड़िता की पहचान को उजागर करने का नियम बनाने से पहले एक अहम सवाल उठता है. क्या हम इसके साथ उसे और उसके परिजनों को वह माहौल भी दे पाएंगे जहां उन्हें इस घटना की वजह से प्रभावित न होना पड़े या जहां उनकी सामाजिक स्वीकार्यता हर तरह से बाकी नागरिकों के बराबर ही हो?      

क्या हम सामाजिक रूप से इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि कोई उम्मीद नहीं जगती?
28 वर्षीय युवक ने अपने बयान में बताया कि उसकी मित्र के सामूहिक बलात्कार के बाद उसे लोहे की सरियों से पीटा गया और फिर उन्हीं सरियों से उसका पेट फाड़ दिया गया. उसका कहना था, ‘पहचान छुपाने के लिए उन्होंने हमसे हमारा पूरा सामान…मोबाइल…पर्स और कपड़े सब कुछ ले लिया. पूरे कपड़े उतरवा लिए थे और फिर हमें सड़क पर फेंक दिया था. उसके बाद उन्होंने बस से मेरी दोस्त को कुचलने की कोशिश भी की लेकिन मैं उसे खींच कर किनारे ले आया.’ इस वीभत्स सामूहिक बलात्कार के बाद शुरू होने वाले त्रासदियों के सिलसिले के बारे में बताते युवक का कहना था कि वह और उसकी मित्र खून से लथपथ सड़क पर पड़े हुए थे लेकिन 25 मिनट तक कोई भी उनकी मदद के लिए नहीं रुका. उसके शब्दों में, ‘मैं लगातार मदद के लिए हाथ हिलाता रहा…गाड़ियां हमारे पास आकर स्पीड धीमी करतीं और लोग हमें देखते…और फिर देख कर आगे निकल जाते. फिर किसी ने पुलिस को फोन किया. लगभग 45 मिनट बाद तीन पीसीआर वैन आईं. वे लोग आधे घंटे तक इसी बात पर लड़ते रहे कि घटना किसके थाना क्षेत्र में आती है. हम एंबुलेंस का इंतजार करते रहे लेकिन आखिर में हमें पीसीआर वैन में ही अस्पताल जाना पड़ा. किसी ने मेरी दोस्त को हाथ तक नहीं लगाया, मैंने खुद उसे उठा कर गाड़ी में रखा’.

16 दिसंबर की रात हुए इस घटनाक्रम के बाद पीड़िता को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में दाखिल करवाया गया था. लगभग 15 दिन के संघर्ष के बाद उसने दम तोड़ दिया. लेकिन हर दिन भारत के आम शहरों और कस्बों में होने वाली बलात्कार की सैकड़ों घटनाओं से इतर देश की राजधानी में हुए इस हिंसा के इस तांडव ने शहरी मध्यवर्ग को झकझोर दिया. पानी की तेज बौछारों से लेकर आंसू गैस के गोलों और बंद मेट्रो स्टेशनों के बावजूद हजारों की तादाद में प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे और दिल्ली से लेकर चेन्नई तक पहली बार भारत महिला हिंसा के खिलाफ एक होता नजर आया.

इसके बावजूद इस घटना ने समाज के बदसूरत चेहरे को पूरी निर्ममता से उजागर करने के साथ-साथ कुछ असहज सवाल भी हमारे सामने रखे हैं. पीड़िता के मित्र का बयान एक ओर जहां बलात्कार के बाद की अंतहीन यातना की ओर इशारा करता है वहीं दूसरी ओर आपराधिक स्तर तक संवेदनहीन हो चुके समाज की झलक भी देता है. बलात्कारी के लिए फांसी की सजा के साथ-साथ यौन उत्पीड़न के खिलाफ कड़ी सजा की बढ़ती मांग के बीच स्त्रियों को लेकर मौजूदा सामाजिक नजरिये के संदर्भ में भी गंभीर बहस चल रही है.

वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता संजय पारिख सामाजिक सोच में बदलाव के सवाल पर कहते हैं, ‘सामाजिक सोच में बदलाव लाने का तर्क अपने-आप में बहुत जटिल है. एक तो हमें आम लोगों की सोच में बदलाव लाना होगा और दूसरा जो लोग लोकतंत्र की आधारभूत संरचना को क्रियान्वित करने में शामिल हैं, उनकी सोच बदलना भी जरूरी है. जैसे पुलिसकर्मी, वकील, जज और डाक्टरों की सोच. बलात्कार के ज्यादातर मामलों में पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं करती और पीड़िता पर समझौता करने के लिए दबाव बनाती है. डॉक्टर भी पीड़िता के साथ संवेदनशील व्यवहार करने के बजाय उसे परोक्ष रूप से प्रताड़ित करते हैं. वकील जरूरत न होने पर भी क्रॉस एक्जामिनेशन के नाम पर पीड़िता को  बार-बार कोर्ट रूम में अपमानित करते हैं. और तो और, मैंने खुद अपनी कई सुनवाइयों के दौरान जजों तक को महिला-विरोधी टिप्पणियां करते हुए देखा है. अब इन सबकी सोच कौन बदलेगा?’

उधर, दिल्ली गैंगरेप मामले में आवाज बुलंद करने वाली महिला अधिकार कार्यकर्ता कविता कृष्णन का मानना है कि एक समाज के तौर पर हमारे अंदर स्त्रियों को लेकर बहुत गहरी उपेक्षा और संवेदनहीनता मौजूद है. तहलका से बातचीत में वे कहती हैं, ‘दिल्ली गैंग रेप में बलात्कार के बाद जो कुछ भी हुआ वह बताता है कि हम महिलाओं के साथ-साथ इंसानियत के प्रति भी कितने असंवेदनशील हो चुके हैं. इस घटना और इसके बाद होने वाले सैकड़ों विरोध प्रदर्शनों के दौरान मैंने कई नई चीजें देखीं. उदाहरण के लिए, एक बार हमारे आजादी वाले नारों से एक आदमी परेशान हो गया और उसने मुझसे कहा कि इस तरह तो उसकी बहनें और बेटियां भी आजादी मांगने लगेंगी और इस ख्याल से उसे बहुत परेशानी हो रही है. मुझे लगता है उसके जैसी परेशानी बहुत सारे लोगों को हुई होगी और हमें ऐसी परेशानी का स्वागत करना चाहिए. क्योंकि जब तक ईमानदार मंथन नहीं होगा, चीजें नहीं बदलेंगी और सामाजिक सोच बदलने के लिए अभी हमें शुरू से अंत तक बहुत कुछ बदलने की जरूरत है’.

दिल्ली गैंग रेप के खिलाफ जारी विरोध में शामिल कुछ समूहों का मानना है कि इन सामाजिक विषमताओं का हल भी समाज में से ही निकल कर आएगा. दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों की नेतृत्व पंक्ति में शामिल ऑल इंडिया स्टूडेंट्स असोसिएशन (आइसा) के अध्यक्ष संदीप सिंह के अनुसार मौजूदा सोच का विकल्प भी इसी समाज से निकल कर आ रहा है. तहलका से बातचीत में वे कहते हैं, ‘इस सामूहिक बलात्कार के बाद पीड़ित घंटों सड़क पर खून से लथपथ पड़े रहे और कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया. यह बताता है कि हमारा समाज कितना अमानवीय हो गया है. लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि इन सबके बाद इसी समाज ने इस घटना का विरोध भी किया. यही लोग हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरे और उन्होंने दिल्ली को महिलाओं के लिए एक सुरक्षित शहर बनाने की मुहिम की शुरुआत की. इस लिहाज से देखें तो इस आंदोलन ने सुन्न कर देने वाली प्रतिस्पर्धा की खाई को पाटकर लोगों को और ज्यादा मानवीय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.’                             

‘अगर हम उसे इलाज के लिए सिंगापुर नगृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंहहीं भेजते तो भी आप सवाल करते’

पिछले दिनों देश की राजधानी में एक बस में हुए सामूहिक बलात्कार ने जनता की चेतना को झकझोर कर रख दिया. इस हादसे ने पुलिस और प्रशासन पर कई सवाल खड़े किए गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह से जवाब तलाशते अशर खान.

आपको नहीं लगता है कि तमाम अपराध मानसिकता की समस्या हैं? महिलाओं को लेकर पुरुषों का नजरिया एक समस्या है और इसमें बदलाव आना चाहिए?
सरकार और पुलिसकर्मियों को उतना ही जिम्मेदार मानने के साथ मैं सोचता हूं कि आप जो कह रहे हैं उस पर व्यापक तौर पर विचार करना होगा. खास तौर पर जिस तरह से महिलाएं सामने आई हैं और उन्होंने अपने बुरे अनुभव बांटे हैं उससे पता चलता है कि हमें इस ओर वास्तव में ध्यान देना होगा. मैं कहीं पढ़ रहा था कि दलाई लामा ने कहा था कि पश्चिम में नैतिकता की शिक्षा के लिए बाकायदा कक्षा लगती है. लेकिन हमारे यहां इसे तवज्जो नहीं दी जाती. करीब 10,000 साल पहले नैतिकता भारत में बहुत बड़ी चीज थी. यह हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा थी. लेकिन हम इसे भूल गए और मेरे विचार से अब वक्त आ गया है कि हम भुलाए जा चुके इस सबक को दोबारा सीखें.

दिल्ली में हाल ही में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद सरकार ऐसी घटनाओं का दोहराव रोकने के लिए क्या उपाय कर रही है?
हमने दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए कई उपाय किए हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि जिस तरह दिल्ली के लोग सड़कों पर आए हैं उससे साबित हुआ है कि दिल्ली की सड़कों पर महिलाओं की सुरक्षा किस कदर संकट में है. हमने दो समितियों का गठन किया है जो एक तय समय के भीतर रिपोर्ट सौंपेंगी. एक समिति कड़े कानूनों की जरूरत पर नजर डालेगी, जबकि दूसरी यह जांच करेगी कि उस हौलनाक रात को आखिर ठीक-ठीक क्या हुआ था. क्या सरकारी स्तर पर कोई शिथिलता थी और भविष्य में ऐसा कुछ रोकने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है.

दिल्ली की सड़कों पर तमाम विरोध प्रदर्शन देखने को मिले, लेकिन प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पानी की बौछार की गई. सरकार इस बात की क्या सफाई देगी?

न केवल मैं बल्कि पूरी सरकार उस गुस्से के साथ थी जिसका प्रदर्शन लोग कर रहे थे. यही वजह है कि हमने कड़े कदम उठाए हैं. मैंने कई दफा माफी मांगी और एक बार फिर उन निर्दोष प्रदर्शनकारियों से क्षमा मांगता हूं जो पुलिस कार्रवाई में घायल हुए. लेकिन हमें चीजों को सही संदर्भ में रखना होगा. मैं फिर कहूंगा कि 99 फीसदी प्रदर्शनकारी तो शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने वाले थे जबकि बाकी बचे एक फीसदी तमाम गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार थे. यहां तक कि एक पुलिसकर्मी को अपनी जान गंवानी पड़ी. कई पुलिसकर्मियों को सिर पर चोटें आईं. सरकारी संपत्ति जलाई गई, कारें पलट दी गईं और बैरिकेड तोड़े गए. इन एक फीसदी लोगों ने माहौल खराब किया. मैं एक बार फिर उन मासूम लोगों से माफी मांगता हूं जिनका कोई दोष नहीं था लेकिन जो पुलिस कार्रवाई के शिकार हुए.

चूंकि दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है तो ऐसे में आप कैसे सुनिश्चित करेंगे कि पुलिस व्यवस्था चाक चौबंद हो?
उस घटना के बाद मैंने एक रात चुपचाप बस में सफर किया. मैंने बस में सफर कर रहे लोगों से बात की और मैं पुलिस व्यवस्था के खिलाफ उनका गुस्सा अच्छी तरह समझ सकता हूं. यही वजह है कि मैंने मंत्रालय के अधिकारियों और अपने वरिष्ठ मंत्री से बात की. हमने ऐसे कदम उठाए हैं जिनकी मदद से उन समस्याओं को दूर किया जा सके जिनको मैं जान पाया. मैं आगे भी इस तरह की बस यात्राएं करता रहूंगा. साथ ही मैं शहर के थानों का भी चुपचाप दौरा करूंगा ताकि मुझे पता चले कि आम लोग किन हालात से गुजरते हैं.

ऐसे भी आरोप हैं कि पीड़िता को सिंगापुर इसलिए भेजा गया ताकि विरोध प्रदर्शन से ध्यान हटाया जा सके.
हमने पीड़िता को सिंगापुर इसलिए भेजा ताकि उसे सबसे बेहतर चिकित्सा मुहैया कराई जा सके. अगर हम उसे नहीं भेजते तो आप मुझसे पूछ रहे होते कि हमने उसे क्यों इलाज के लिए कहीं और नहीं भेजा. हमने उसे सिंगापुर इसलिए भेजा क्योंकि दिल्ली के सबसे नजदीक वहीं इतनी अच्छी चिकित्सा सुविधाएं थीं. हमने उसे बचाने की हर संभव कोशिश की लेकिन अफसोस कि ऐसा नहीं हो सका.

पीड़िता के अंतिम संस्कार को गोपनीय क्यों बनाया गया?
जहां तक अंतिम संस्कार की बात है, तो परिवार को इत्तला कर दी गई थी. परिवार ने यह तय किया कि अंतिम संस्कार कहां होगा. मैं अंतिम संस्कार में मौजूद था और उन्हें समूचे धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ अंजाम दिया गया. यह एक निहायत दुखद मामला था. वहां कोई गोपनीयता नहीं बरती गई.