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‘जोड़ने’ में न टूटें लक्ष्मण रेखाएं

लगता है लक्ष्मण रेखाएं तोड़ने का यह स्वर्ण-युग आ गया है. जिसे देखो वह अपनी मर्यादाएं तोड़कर न जाने क्या-क्या जोड़ना चाहता है.

देश की बड़ी अदालत ने नदी जोड़ने के लिए सरकार को आदेश दिया है. एक समिति बनाने को कहा है और उसकी संस्तुतियां भी एक निश्चित अवधि में सरकार के दरवाजे पर डालने के लिए कहा है. और शायद यह भी कि सरकार संस्तुतियां पाते ही तुरंत सब काम छोड़कर नदी जोड़ने में लग जाए.

यह दूसरी बार हुआ है. इससे पहले एनडीए के समय में बड़ी अदालत ने अटल जी की सरकार को कुछ ऐसा ही आदेश दिया था. तब विपक्ष में बैठी सोनिया जी और पूरी कांग्रेस उनके साथ थीं. एनडीए के भीतरी ढांचे में भी आज की तरह किसी भी घटक ने इसका कोई विरोध नहीं किया था. सबसे ऊपर बैठे राष्ट्रपति भी इस योजना को कमाल का मानते थे. प्रधानमंत्री जी ने भी देश भर की नदियों को तुरंत जोड़ देने के लिए एक भारी-भरकम व्यवस्थित ढांचा बना दिया था और उसको चलाए रखने के लिए एक भारी-भरकम राशि भी सौंप दी थी. इसके संयोजक बनाए गए थे – श्री सुरेश प्रभु. तब किसी ने मुझसे कुछ पूछा था. मेरा उत्तर दो वाक्यों का था. नदी जोड़ना प्रभु का काम है, इसमें सुरेश प्रभु न पड़ंे. सब कुछ होने के बाद भी अटल जी के समय में यह योजना लगातार टलती चली गई. इतनी टली कि यूपीए-1 और फिर निहायत कमजोर यूपीए-2 को भी पार करके वापस बड़ी अदालत के दरवाजे पर पहुंच गई. अब बड़ी अदालत ने फिर से वह पुलिंदा सरकार के दरवाजे पर फेंका है.

देश का भूगोल इसकी इजाजत नहीं देता. यदि यह कोई करने लायक काम होता तो प्रकृति ने कुछ लाख साल पहले इसे करके दिखा दिया होता.  लेकिन उसने ऐसा कोई काम नहीं किया क्योंकि कुछ करोड़ साल के इतिहास में देश का उतार-चढ़ाव, पर्वत, पठार और समुद्र की खाड़ी बनी है और उसमें देश के चारों कोनों से नदियों को जोड़कर बहाने की गुंजाइश नहीं थी.

ऐसा नहीं है कि प्रकृति खुद नदी नहीं जोड़ती है. जरूर जोड़ती है लेकिन उसके लिए कुछ लाख साल धीरज के साथ काम करना होता है. हिमालय का नक्शा ऊपर से देखें तो गंगा और यमुना का उद्गम बिल्कुल पास-पास दिखाई देगा लेकिन यह पर्वत का भूगोल ही है कि दोनों नदियों को प्रकृति ने अलग-अलग घाटियों में बहाया और फिर बहुत धीरज के साथ पर्वत को काट-काटकर प्रयाग तक पहुंच कर इनको मिलाया. समाज भी प्रकृति के इस कठिन परिश्रम को समझता था इसलिए उसने ऐसी जगहों को कोई एक्स, वाई, जेड जैसे अभद्र नाम देने के बदले तीर्थ की तरह मन में बसाया.

कचहरियों का काम अन्याय सामने आने पर न्याय देने का होता है. यह काम भी किसी भावुकता के आधार पर नहीं होता. न्याय देने वाला पक्ष-विपक्ष की लंबी-लंबी दलीलें सुनता है और तब वह नीर, क्षीर, विवेक के अनुसार फैसला सुनाता है. दूध का दूध और पानी का पानी. लेकिन नदी जोड़ो प्रसंग में अदालत ने दोनों बार दूध भुला दिया और पानी को पानी से जोड़ने का आदेश दे दिया है.

यह संभव है और यह स्वाभाविक है कि अदालत का ध्यान पानी की कमी से जूझ रहे क्षेत्रों और नागरिकों की तरफ जाए. लेकिन इसमें ऐसे आदेशों से किसी ऐसे इलाकों पर कैसा अन्याय होगा, लगता है कि इसकी तरफ उसका ध्यान गया ही नहीं है. अदालत अगर अपने मुकदमों के रजिस्टरों की धूल झाड़कर देखे तो उसे पता चलेगा कि उसके यहां नदियों के पानी के बंटवारों को लेकर अनेक राज्य सरकारों के मामले पड़े हैं. इनमें से कुछ पर अभी फैसला आना बाकी है और जिन भाग्यशाली मुकदमों में फैसले सुना दिए गए हैं, उन्हें सरकारों ने मानने से इनकार कर दिया या यह अवमानना जैसा लगे तो उसे ढंग से लागू नहीं होने दिया है. यह सूची लंबी है और इसमें सचमुच कश्मीर से कन्याकुमारी तक विवाद बहता मिल जाएगा.

हमारे देश में प्रकृति ने हर जगह एक सा पानी नहीं गिराया है. जैसलमेर से लेकर चेरापूंजी में रहने वाले लोगों को जितना पानी मिला उन्होंने उसी में अपना काम बखूबी करके दिखाया था. लेकिन अब विकास का नया नारा सब जगह एक से सपने बेचना चाहता है और दुख की बात यह है कि इसमें न्याय देने वाले लोग भी शामिल होना चाह रहे हैं. ऐसे लोगों और संस्थाओं को अपनी-अपनी लक्ष्मण रेखाओं के भीतर रहना चाहिए और कभी रेखाओं को तोड़ना भी पड़े तो बहुत सोच-समझकर ऐसा करना चाहिए.

जीरा या धीमा जहर!

यदि नमक में आयोडीन की हल्की-सी मात्रा आपको कई बीमारियों से बचा सकती है तो हर रोज खाने में इस्तेमाल होने वाले किसी मसाले में बेहद खतरनाक जहर की हल्की-सी मात्रा आपके स्वास्थ्य के लिए घातक भी साबित हो सकती है. हाल ही में आई एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक आप जिस जीरे को हर दिन खाने में इस्तेमाल कर रहे हैं उसमें मिले कीटनाशक भविष्य में आपको कई जानलेवा बीमारियों का शिकार बना सकते हैं. भारत सरकार के कृषि एवं सहकारिता विभाग की पहल पर तैयार की गई एक रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान में कई प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल से यहां उत्पादित होने वाला जीरा जहरीला हो चुका है. उल्लेखनीय है कि राजस्थान देश में जीरे का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक राज्य है.

ऑल इंडिया नेटवर्क प्रोजेक्ट ऑन पेस्टीसाइड रेजिड्यू  नामक परियोजना के तहत 5 साल तक हुए इस अनुसंधान की रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है. लेकिन तहलका के पास मौजूद रिपोर्ट की प्रति में खुलासा किया गया है कि जीरे में न्यूनतम स्वीकृत मात्रा से कई गुना अधिक मात्रा तक जहर घुला हुआ है.

जीरा ओस और कोहरे में पैदा नहीं होता. इसलिए राजस्थान के मारवाड़ इलाके की सूखी जलवायु में यह खूब पैदा किया जाता है. भारत के कुल 429 हजार हेक्टेयर में से अकेले राजस्थान में 169 हजार हेक्टेयर यानी देश में जीरा उत्पादन के कुल क्षेत्रफल के 40 प्रतिशत भाग पर जीरा पैदा किया जाता है. बीते साल भारत में कुल 127 हजार टन जीरा उत्पादित हुआ और उसमें से अकेले राजस्थान का हिस्सा 43 हजार टन था. राज्य का जीरा कई छोटी मंडियों से होते हुए गुजरात की ऊंझा और दिल्ली की खारीबावली जैसी बड़ी मंडियों तक पहुंचता है. और यहां से ज्यादातर भारतीयों की थाली में.

जीरे में कीटनाशकों की जांच के लिए गठित अनुसंधान दल के प्रभारी एनएस परिहार अध्ययन से जुड़े तथ्य तहलका से साझा करते हुए बताते हैं, ‘ बीते पांच साल में राजस्थान के जीरा उत्पादक सात जिलों (जोधपुर, अजमेर, बाड़मेर, जालौर, पाली, भीलवाड़ा और नागौर) से हर महीने चार-चार नमूने लिए गए थे. इस दौरान जीरा के 60 प्रतिशत नमूनों में कई खतरनाक कीटनाशकों के भारी मात्रा में पाए जाने की पुष्टि हुई है.’ दल के मानकों के हिसाब से कीटनाशकों की न्यूनतम स्वीकृत मात्रा एक पीपीएम (दस लाख में एक हिस्सा) यानी एक किलोग्राम जीरे में एक मिलीग्राम से कम होनी चाहिए. मगर इन नमूनों में कीटनाशकों की मात्रा खतरनाक स्तर को पार करते हुए 2 से 4 पीपीएम यानी एक किलोग्राम जीरे में 2 से 4 मिलीग्राम तक पाई गई. परियोजना से जुड़े कृषि वैज्ञानिक बीएन शर्मा इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं, ‘राज्य के जीरा उत्पादक कई कीटनाशकों को तयशुदा मात्रा से चार गुना तक इस्तेमाल कर रहे हैं. जैसे कि मेनकोजेब नामक फफूंदीनाशक को एक लीटर पानी में दो ग्राम की जगह आठ ग्राम तक डाला जा रहा है. जीरे की फसल में झुलसा नामक फंफूद जब आती है तब बीज पककर तैयार हो जाता है और ऐसे में मेनकोजेब का अंधाधुंध छिड़काव करने से यह जहर के तौर पर बीज में रह जाता है.’  राजस्थान में जीरे की फसल पर एक के साथ चार-चार कीटनाशकों का छोटे-छोटे अंतराल पर छिड़काव किया जा रहा है. मगर इससे भी खतरनाक तथ्य यह है कि जीरे की फसल में कई प्रतिबंधित कीटनाशकों का भी इस्तेमाल हो रहा है. इनमें शरीर के कई अहम अंगों में बीमरियां फैलाने वाले आरगेनोक्लोरिन, आरगेनोफास्फेट और सिंथेटिक पाइरेथ्रोइड से भी बेहद जहरीले कीटनाशक शामिल हैं.

प्रतिबंधित कीटनाशकों के इस्तेमाल को लेकर कीटनाशक एजेंसी चलाने वाले पंकज जोशी बताते हैं कि राजस्थान के जीरा उत्पादकों को सरकार की ओर से परामर्श की कोई व्यवस्था नहीं है. इसलिए जीरा उत्पादक को जीरे में होने वाली बीमारियों के लिए कृषि विभाग के अधिकारी की बजाय कीटनाशक विक्रेता से संपर्क करना पड़ता है. यह विक्रेता कंपनी द्वारा बताए गए कई महंगे कीटनाशकों की सूची जीरा उत्पादक को थमाता रहता है और उसकी जेब से पैसा निकालता रहता है. जाहिर है इस धंधे में सबसे ज्यादा मुनाफा जीरे को अपनी बेहिसाब कमाई का जरिया बनाने वाली कीटनाशक कंपनियों को ही होता है.

‘जीरे में मिल रहा मोनोक्रोटोफास किडनी और लीवर को हानि पहुंचा रहा है तो फारेट से कैंसर का खतरा बढ़ता जा रहा है’

राज्य कृषि विभाग ने राजस्थान में मोनोक्रोटोफास जैसे जहरीले कीटनाशक को केवल कपास में इस्तेमाल करने की छूट दी है. मगर सरकारी स्तर पर कोई निगरानी और नियंत्रण नहीं होने से जीरे में इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है. इसी तरह फारेट नामक जहरीले कीटनाशक पर तो पूरी तरह से रोक लगाई गई है. बावजूद इसके यह यहां के बाजारों में आसानी से उपलब्ध है. प्रतिबंधित कीटनाशकों के खुलेआम बिकने के मसले पर जब तहलका ने राजस्थान कृषि विभाग के आयुक्त से संपर्क किया तो उनके पास भी इस मामले में गोल-गोल बातों के बीच सिर्फ जांच कराने का आश्वासन था.

फिजीशियनों की राय में इस प्रकार से जहर का रोज और नियमित मात्रा में शरीर में पहुंचते रहना एक ऐसा धीमा लेकिन खतरनाक हादसा है जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को ही खत्म कर देता है. चित्तौड़गढ़ के डॉ नरेंद्र गुप्ता कहते हैं, ‘ मोनोक्रोटोफास का किडनी और लीवर पर बहुत बुरा असर पड़ता है. वहीं सिंथेटिक पाइराथ्रोइड से एलर्जी और फारेट से कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है.’  भारत में कई जगहों पर जीरा कच्चे तौर पर और औषधियों के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. विशेषज्ञों की राय में कच्चे तौर पर इस्तेमाल में लाया गया जीरा अपेक्षाकृत अधिक जहरीला होता है.

राजस्थान में जीरे की फसल में कीटनाशकों का प्रयोग न सिर्फ इसकी पूरी खेती को ही जहरीला बना रहा है बल्कि मिट्टी की संरचना पर भी इसके कई घातक असर पड़ रहे हैं. जोधपुर में कृषि शोधकार्यों से जुड़े नासिर खिलजी बताते हैं, ‘ कुछ साल पहले तक हम जब नंगे पैर खेतों में काम करते थे तब शरीर को कोई नुकसान नहीं होता था. मगर अब मिट्टी भी इस कदर जहरीली होती जा रही है कि जीरा उत्पादन में लगे किसानों की त्वचा में कोई न कोई बीमारी लगी ही रहती है.’ खिलजी को आशंका है कि अगर जीरे के खेतों में जहर इसी तरह से जड़ें जमाता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब मारवाड़ के जीरे के खेतों की तुलना पंजाब के उन खौफनाक खेतों से की जाएगी जो कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण फिलहाल जहरीली फसल उगल रहे हैं और कैंसर मरीजों के बड़े केंद्र बन चुके हैं. मारवाड़ के कई जीरा उत्पादक यह भी बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में मिट्टी की उर्वरता भी तेजी से घटी है. पाली जिले के जैतारन गांव के जीरा उत्पादक हरिनारायण चौधरी बताते, ‘ कीटनाशकों को लेकर जीरे की भूख हर साल बढ़ती ही जाती है. मगर अब कीटनाशकों की प्रचुरता के चलते इस इलाके के कुछ खेतों की उर्वरता इस हद तक घटी है कि जीरा उगना ही बंद हो रहा है. इसी के साथ कीटनाशकों के भारी छिड़काव से जीरे के दुश्मन कीट के साथ केंचुआ सहित कई मित्रकीट भी मारे जा रहे हैं.’ कृषि विज्ञान के जानकार बताते हैं कि लेडीबायराबीटल जीरे का एक ऐसा मित्रकीट है जो उसकी फसल को नुकसान पहुंचाने वाले चेपा यानी एफिड (पौधा चूसने वाला मच्छर) को खाता है. मगर इनदिनों कई हानिकारक रसायनों से लेडीबायराबील जैसे कई मित्रकीट का ही तेजी से सफाया किया जा रहा है.

इन भयावह हालात की सारी जिम्मेदारी अकेले जीरा उत्पादकों के कंधों पर नहीं डाली जा सकती. कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर के पूर्व कुलपति डॉ वीबी सिंह के मुताबिक इसके लिए सरकार की वह नीति भी जिम्मेदार है जिसने जीरा उत्पादकों को आधुनिकता के नाम पर खतरनाक कीटनाशकों की ओर धकेला है. वे कहते हैं, ‘ इसी आधुनिकता के मार्फत बाजार की ताकतें शामिल हुईं और उन्होंने जीरे की खेती को पूरी तरह से कीटनाशकों पर ही निर्भर बना दिया. इससे एक ओर कीट की प्रतिरोधकता बढ़ने से कीटनाशक अपना असर खोते जा रहे हैं और दूसरी तरफ जीरा उत्पादक भी अपनी फसल बचाने के लिए ज्यादा से ज्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हुए हैं.’

तहलका से बातचीत में कई जीरा उत्पादक बताते हैं कि मारवाड़ में कीटनाशकों की ज्यादा मात्रा डालना अब उनकी मजबूरी है; क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करेंगे तो फसल बर्बाद होने का खतरा है. इससे जीरा उत्पादकों का नुकसान यह हो रहा है कि कीटनाशकों की खरीद कई गुना तक बढ़ गई है. इसकी वजह से जीरा उत्पादन की लागत साल दर साल बढ़ती जा रही है. वहीं जीरे की गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही है.

कुल मिलाकर यह ऐसा दुष्चक्र है जिसमें एक तरफ राजस्थान के जीरा उत्पादक किसान फंस चुके हैं तो दूसरी तरफ देश के वे तमाम उपभोक्ता हैं जिन्हें जीरे के तौर पर जहर मिल रहा है.

सिद्दीकी की सल्तनत

मायावती सरकार में कृषि, आबकारी और लोकनिर्माण जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मुखिया रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने रुतबे के सहारे अपने करीबियों को तरह-तरह के अनैतिक लाभ पहुंचाए. तहलका के पास मौजूद लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट उनके काले कारनामों का कच्चा-चिट्ठा उजागर करती है. जय प्रकाश त्रिपाठी की पडताल

बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता व पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा सुप्रीमो मायावती के सबसे करीबियों में से हैं. जब तक प्रदेश में बसपा की सरकार थी, सिद्दीकी सरकार की आंख, नाक और कान थे. सरकार में सिद्दीकी का जितना बड़ा कद था, नियम-कानूनों के साथ खेलने की उनकी आदत भी उतनी ही बड़ी थी. उनके नियम विरुद्ध कारनामों की फेहरिस्त पत्नी हुस्ना सिद्दीकी के नाम फर्जी शिक्षण सोसाइटी बनाने से लेकर शराब कारोबार से जुड़े लोगों तक फैली है.

लखनऊ निवासी जगदीश नारायण शुक्ला की शिकायत पर लोकायुक्त एनके मल्होत्रा ने जब सिद्दीकी की पड़ताल शुरू की तो प्याज के छिलके की तरह परत-दर-परत उनके कारनामे खुलते चले गए.

सबसे पहले हुस्ना सिद्दीकी की एजुकेशनल सोसाइटी की बात करते हैं. क्यूएफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूट 49, श्यामनगर, खुर्रमनगर, लखनऊ के नाम से यह सोसाइटी 10 जुलाई, 2007 को रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराई गई थी. 10 जुलाई, 2011 को संस्था के सदस्यों ने पांच साल की अवधि के लिए इसका नवीनीकरण करवाया. समिति में अध्यक्ष सीमा अग्निहोत्री, उपाध्यक्ष मूल चंद्र, सचिव हुस्ना सिद्दीकी पत्नी नसीमुद्दीन सिद्दीकी सहित 11 लोगों को शामिल किया गया. दस्तावेजों में प्रबंधकारिणी के तीन सदस्यों सीमा अग्निहोत्री, संजीव कुमार अग्निहोत्री और पंकज अग्निहोत्री का पता बान वाली गली, चौक लखनऊ दर्ज है, जबकि सचिव हुस्ना सिद्दीकी का पता 1102, लाप्लास लखनऊ दर्ज है. बाकी सदस्यों का पता बांदा का है. साल 2006 से 2010 तक के संस्था के बहीखातों की जांच में पता चला कि सोसाइटी को 3,62,48,417 रुपये की रकम मिली. यह रकम चंदे, दान और अनुदान के रूप में मिली थी.

सोसाइटी को करोड़ों रुपया किन लोगों की तरफ से दिया गया, इसका पता लगाने के लिए लोकायुक्त ने जब अध्यक्ष सीमा अग्निहोत्री को नोटिस जारी किया तो उनका जवाब दिलचस्प था. सीमा ने लोकायुक्त को बताया कि 28 नवंबर, 2011 को उन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया है. इतना ही नहीं, उनका यह भी कहना था कि अनुदान देने वाले लोगों के बारे में वे कोई भी दस्तावेज देने में असमर्थ हैं. अध्यक्ष का यह जवाब लेकर उनके भाई व संस्था के सदस्य पंकज अग्निहोत्री लोकायुक्त कार्यालय में उपस्थित हुए. हद तो तब हो गई जब कागजों में संस्था का सदस्य होने के बावजूद पंकज अग्निहोत्री ने लोकायुक्त को पूछताछ में बताया कि सोसाइटी के बारे में उन्हें कोई जानकारी ही नहीं है. संस्था के दूसरे सदस्य व अध्यक्ष सीमा के एक और भाई संजीव कुमार अग्निहोत्री ने 28 दिसंबर, 2011 को अजीबोगरीब बयान लोकायुक्त कार्यालय में दर्ज कराया. उनके मुताबिक उन्होंने 49, श्यामनगर, खुर्रमनगर के पते पर सोसाइटी का कार्यालय कभी देखा ही नहीं. संजीव ने साथ में यह भी बताया कि संस्था को उन्होंने भी एक लाख रुपये दान के रूप में दिए हंै, लेकिन यह रुपया आया कहां से इसका जवाब वे आज तक लोकायुक्त को नहीं दे सके हैं.

नसीमुद्दीन की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी ने अपनी सोसाइटी को जिस पते पर रजिस्टर करवाया वह पता ही फर्जी निकला

चूंकि संस्था की अध्यक्ष सीमा अग्निहोत्री ने नवंबर में ही अपने पद से इस्तीफा देने की बात कही थी इसलिए नियमत: यह जरूरी था कि सोसाइटी ने कोई-न-कोई कार्यवाहक अध्यक्ष या प्रभारी बनाया हो. इसके मद्देनजर संस्था के पते पर कार्यवाहक अध्यक्ष के नाम दूसरा नोटिस भेजा गया ताकि दानकर्ताओं और चंदा देने वालों की सूची से उनके नाम व आय के स्रोतों की जानकारी मिल सके. इस बार स्थिति और भी चौंकाने वाली हो गई. जिस खुर्ररमनगर पुलिस चौकी के जिम्मे नोटिस तामील कराने का जिम्मा था, उसने लोकायुक्त कार्यालय को लिख कर दे दिया कि लिफाफे पर दिया गया पता गलत है और इस नाम का कोई कार्यालय या बिल्डिंग मौजूद ही नहीं है. पुलिस के इस जवाब और संजीव अग्निहोत्री के बयान से यह बात तो साफ हो गई कि संस्था का जो पता दिखा कर पंजीकरण कराया गया है वहां क्यू एफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूट नाम की कोई सोसाइटी ही नहीं है.

संस्था का कोई अध्यक्ष न मिलने पर जांच का दायरा पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी पर आ टिका. लोकायुक्त ने हुस्ना से दानकर्ताओं की सूची मांगी. हुस्ना की ओर से जो सूची दी गई वह 2007-2011 की थी. वित्तीय वर्ष 2006-2007 के दानकर्ताओं की सूची उन्होंने लोकायुक्त को नहीं दी. सूची में चंदे की कुल धनराशि 1,82,46,793 रुपये बताई गई थी. इस सूची के अनुसार अधिकांश धनराशि चेक और ड्राफ्ट द्वारा और कुछ नकद भी प्राप्त की गई थी. बाकी की रकम के बारे में उन्होंने लोकायुक्त को कोई जानकारी नहीं दी. लोकायुक्त अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं, ‘यह साबित हो चुका है कि क्यूएफ शैक्षणिक संस्थान हुस्ना सिद्दीकी पत्नी नसीमुद्दीन सिद्दीकी की अपनी निजी सोसाइटी है. जिन लोगों को सदस्य के रूप में दिखाया गया है वे केवल पंजीकरण कराने के उद्देश्य से इसमें सम्मिलित किए गए मालूम होते हैं.’

मंत्री जी की पत्नी पर उंगली सिर्फ संस्था बना कर करोड़ों रुपये का गोलमाल करने के लिए ही नहीं उठ रही बल्कि संस्था के लिए खरीदी गई जमीन में भी बड़ा हेर-फेर हुआ है. शिक्षण संस्था के नाम बाराबंकी जिले की कुर्सी तहसील के गांव निंदूरा में लगभग 14 एकड़ जमीन 2006 में खरीदी गई. इसमें से गाटा संख्या 1206, 1207, 1208, 1209, 1210, 1223 और 1224 के कुल रकबा 1.102 हेक्टेयर पर क्यूएफ महाविद्यालय का निर्माण हुआ है. इसमेंें से 0.240 हेक्टेयर आच्छादित क्षेत्रफल व 0.862 अनाच्छादित क्षेत्रफल चारदीवारी के अंदर है. इसके अलावा गाटा संख्या 1425  में भी 0.33 हेक्टेयर पर निर्माण हो चुका है और 0.50 क्षेत्रफल निर्माणाधीन है.

लोकायुक्त ने जब सोसाइटी की जमीन की जांच शुरू की तब और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. जांच में पता चला कि संस्था के नाम जो 14 एकड़ जमीन खरीदी गई है उसका मूल्य कागजों में करीब 46 लाख दिखाया गया है जबकि उसकी वास्तविक कीमत 10 करोड़ के आस-पास होती है. जमीन खरीदने के बाद एक बार फिर शुरू हुआ ताकत और रसूख का खेल. शिकायत के बाद मौके पर लोकायुक्त की ओर से भेजे गए जांच दल ने पाया कि सोसाइटी के नाम करीब 14 एकड़ जमीन खरीदी गई है जबकि मौके पर टीम ने पाया कि इसके आस-पास की 10 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर भी विद्यालय का ही कब्जा है. सूत्र बताते हैं कि जिस 10 एकड़ अतिरिक्त जमीन पर विद्यालय का कब्जा है उसमें से अधिकांश संपत्ति नसीमुद्दीन सिद्दीकी के मंत्री रहते हुए बेनामी तरीके से उनके लोगों द्वारा खरीदी गई है. जांच के बाद लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि गांव में जो भी संपत्ति क्रय की गई है उसकी खरीद कम कीमत में दर्शाकर आय के अज्ञात स्रोतों से कमाई गई धनराशि का प्रयोग अवश्य हुआ है. कितनी धनराशि का इसमें इस्तेमाल हुआ, कितने लोगों के नाम बेनामी संपत्ति खरीदी गई, किन लोगों से खरीदी गई, यह सारी जांच किसी बड़ी अपराध अन्वेषण एजेंसी द्वारा करवाई जानी चाहिए.

ताकत के बल पर घपले-घोटालों का यह खेल सिर्फ राजधानी लखनऊ और पड़ोसी जिले बाराबंकी तक सीमित नहीं रहा. पूर्व मंत्री के गृह जिले बांदा में भी उनके परिजनों ने नियम-कानूनों के साथ जमकर खिलवाड़ किया. बांदा शहर से सटे लड़ाकापुरवा गांव की गाटा संख्या 3235 का कुल रकबा 2.389 हेक्टेयर है. इसमें से 18 सितंबर, 2008 को उपमा गुप्ता पत्नी कृष्ण चंद गुप्ता ने भगवान दीन से दो हेक्टेयर भूमि पांच लाख रुपये में खरीदी थी. इसका सर्किल रेट 12 लाख रुपये प्रति एकड़ दिखाया गया. सर्किल रेट के हिसाब से जमीन पर 4,06,000 रुपये स्टांप ड्यूटी अदा की गई. तीन सप्ताह बाद ही 10 अक्टूबर को नसीमुद्दीन सिद्दीकी के भाई जमीरूद्दीन की पत्नी अकरमी बेगम ने उपमा गुप्ता की दो हेक्टेयर जमीन में से 1.050 हेक्टेयर जमीन तीन लाख रुपये में खरीद ली. इसी दिन जमीरूद्दीन की पुत्रवधू अर्शी सिद्दीकी ने इसी गाटा संख्या वाली 0.950 हेक्टेयर जमीन को उपमा गुप्ता से ढाई लाख रुपये में खरीदा.

सिद्दीकी के परिजनों ने गरीब किसानों के लिए शुरू की गई राज्य सरकार की परियोजना का गलत फायदा उठाया

यहां यह बताना जरूरी है कि उपमा गुप्ता के पति कृष्ण चंद गुप्ता सिंचाई विभाग के इंजीनियर हैं और बांदा के ही रहने वाले हैं. गुप्ता पिछले दो साल से निर्माण निगम में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं. सिंचाई विभाग व निर्माण निगम दोनों ही मंत्रालय नसीमुद्दीन सिद्दीकी के पास थे. यहां सवाल यह उठता है कि क्या नसीमुद्दीन सिद्दीकी के परिजनों को दिलाने के लिए ही पहले उनके ही विभाग के एक इंजीनियर की पत्नी के नाम जमीन कराई गई और फिर तीन सप्ताह बाद उसे मंत्री जी के परिजनों के नाम कर दिया गया. अगर यह मान भी लिया जाए कि यह महज संयोग है और इसमें कुछ गलत भी नहीं हुआ तो असली खेल कहां हुआ?

इसी गाटा संख्या 3235 से 89.22 वर्ग मीटर जमीन भगवान दीन ने 14 अगस्त, 2008 को 1,40,000 रुपये में ममता यादव पत्नी पप्पू यादव एवं दीन दयाल यादव को बेचा है. इस खरीद के आधार पर जमीन के दाम का असली मूल्यांकन किया जाए तो यह डेढ़ करोड़ प्रति हेक्टेयर से कुछ ज्यादा होता हैै. इसका अर्थ यह हुआ कि उपमा गुप्ता ने जो दो हेक्टेयर जमीन खरीदी थी उसका बाजार मूल्य तीन करोड़ से भी ज्यादा होता है. मगर उपमा गुप्ता को यह जमीन सिर्फ पांच लाख रुपये में मिल गई थी. उसपर अगली विचित्रता यह कि कौड़ियों के भाव खरीदी गई इतनी महंगी जमीन उन्होंने तीन सप्ताह बाद ही  मंत्री के परिजनों को मात्र साढ़े पांच लाख रुपये में बेच भी दी. लोकायुक्त ने अपनी जांच में लिखा है कि इस भूमि की खरीद में काले धन का इस्तेमाल हुआ है और जमीन की कीमत कम दिखा कर इस संपत्ति को नसीमुद्दीन सिद्दीकी के संबंधियों ने खरीदा है.

घपले-घोटालों का यह दायरा सिर्फ जमीन खरीदने और संस्था के नाम पर करोड़ों रुपये डकारने तक ही सीमित नहीं है. बसपा के सबसे ताकतवर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के परिजनों ने बुंदेलखंड के गरीब किसानों के लिए शुरू की गई राज्य सरकार की विशेष परियोजना से भी जमकर फायदा उठाया. केंद्र सरकार की ओर से बुंदेलखंड के किसानों को करोड़ों का पैकेज दिया गया. इससे किसानों को सब्सिडी पर ट्रैक्टर, डिस्क, हैरो, थ्रेशर और कल्टीवेटर बंटने थे. नियम के अनुसार सब्सिडी का लाभ सिर्फ गरीब किसानों को ही मिलना था. लेकिन जब घर में ही कृषि मंत्री हो तो सब्सिडी का लाभ मिलना भला कौन-सा मुश्किल काम है. लिहाजा पूर्व कृषि मंत्री के दो भतीजों जुबैरूद्दीन व बजाहुद्दीन पुत्र जमीरूद्दीन सिद्दीकी ने एक-एक ट्रैक्टर हथिया लिए. वह भी तब जबकि वे किसान भी नहीं थे. लोकायुक्त ने अपनी जांच में लिखा है कि जो अनुदान दिया गया उसमें नियमों का पालन नहीं किया गया. कितने लोगों ने आवेदन किया, उनमें से कौन पहले आया और कौन बाद में, इसका लेखा-जोखा भी कृषि विभाग के पास नहीं है. प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है और इसके लिए कृषि विभाग उत्तरदायी है.

नसीमुद्दीन पर टिप्पणी करते हुए लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ‘उनके सीधे शामिल होने का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है, लेकिन कृषि मंत्री होने के नाते व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए और कृषि विभाग को आवंटित धनराशि पात्र अभ्यर्थियों को दिलवाने का दायित्व उनका था.’ वैसे भी कोई सामान्य सा बुद्धि वाला व्यक्ति भी यह आसानी से सोच सकता है कि यदि आपके मातहत विभाग से आपके परिजनों को कोई लाभ पहुंचाया जाता है तो निश्चित ही इसके पीछे आपकी भूमिका होनी चाहिए.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी आबकारी विभाग के भी मंत्री थे और इसके जरिये भी उन्होंने कितने नियम विरुद्ध काम किए इसके बारे में भी लोकायुक्त की रिपोर्ट में  कड़ी टिप्पणियां की गई हैं. लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सिद्दीकी ने आबकारी नीति में मनमाने बदलाव किए जिससे कुछ खास लोगों को  जबर्दस्त फायदा हुआ.

पूर्व बसपा सरकार में नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर मेहरबानियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच करने के बाद पूरे प्रकरण पर जब लोकायुक्त ने सरकार से सीबीआई जांच की सिफारिश की तो सरकार ने इसे सिरे से ही खारिज कर दिया. जबकि इसी तरह की कई शिकायतों में लोकायुक्त की सिफारिश पर ही मायावती ने अपने दर्जन भर मंत्रियों को चुनाव से पहले बाहर का रास्ता दिखा दिया था.

क्या लाइलाज है सपाई अराजकता?

जो युवा आज सपा के गले की हड्डी बन गए हैं, जिनसे आज मुलायम सिंह बार-बार अनुशासित रहने की अपील कर रहे हैं कभी वे मुलायम के आह्वान पर हल्ला बोला करते थे. गोविंद पंत राजू का विश्लेषण

23 मार्च 1997 की सुबह विक्रमादित्य मार्ग स्थित लोहिया ट्रस्ट की इमारत के प्रांगण में लोहिया जयन्ती के कार्यक्रम की तैयारियां चल रही थीं. लोहिया ट्रस्ट के पिछवाड़े वाले बरामदे में कुरता पायजामा पहने एक नौजवान हाथ में कागज लेकर उसे पढ़ते-पढ़ते याद करने की कोशिश कर रहा था. वह बार बार रूमाल से अपने माथे का पसीना भी पोंछ रहा था. तभी उसकी नजर हम पर पड़ी और वह थोड़ा शर्माते हुए सफाई देने लगा, ‘नेताजी भी रहेंगे. उनके सामने ही भाषण देना है. जरा भी गलती हो गई तो सारी मेहनत बर्बाद हो जायगी. इसीलिए ठीक से याद करने की कोशिश कर रहा हूं.’ यह नौजवान समाजवादी युवजन सभा का प्रदेश पदाधिकारी था और नेता जी के सामने लोहिया जी के बारे में ठीक से बोल सके, इसके लिए किसी बड़े नेता से लिखवाए गए भाषण को रट रहा था.

नवम्बर 2011 की एक और सुबह. समाजवादी पार्टी के कार्यालय में अखिलेश यादव के कमरे के अंदर 5-6 युवाओं की एक मंडली दो तीन कम्प्यूटर और लैपटाप पर काम करते हुए गंभीर चिन्तन में लीन थी. समाजवादी पार्टी की भावी योजनाओं पर विचार करते हुए, पहले दृश्य वाला नौजवान अब भी समाजवादी पार्टी से जुड़ा हुआ है और विधानसभा चुनाव भी लड़ चुका है जबकि दूसरे दृश्य वाले नौजवान अब उत्तर प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री की कोर टीम के सदस्य माने जाते हैं.

इन दो उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी के लिए नौजवानों की क्या अहमियत है. मुलायम सिंह यादव ने 4 अक्टूबर 1992 को समाजवादी पार्टी की स्थापना के वक्त से ही युवाओं को न सिर्फ पार्टी संगठन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं दी थीं बल्कि पार्टी को आगे बढ़ाने में भी उनका खूब इस्तेमाल किया. मुलायम सिंह यादव छात्रों और युवाओं के बीच जाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते थे और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद पर अपने पहले दो कार्यकालों में विश्वविद्यालयों में छात्रों के कार्यक्रमों में सबसे अधिक बार जाने वाले मुख्यमंत्री बन गए थे. मुलायम सिंह ने राममनोहर लोहिया की विचारधारा को जिन जिन क्षेत्रों में पूरी तरह अपनाया उनमें युवाओं से संबंधित विचारधारा भी एक थी. आज भी समाजवादी पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में 25 फीसदी से अधिक ऐसे हंै जो छात्र या युवा राजनीति से किसी न किसी रूप में जुडे़ रहे हैं. अपने पिछले कार्यकाल में भी मुलायम ने युवा बेरोजगारों को 500 रुपये प्रतिमाह का बेराजगारी भत्ता देने की घोषणा कर युवाओं के प्रति अपने मोह का प्रमाण दिया था. लेकिन समाजवादी पार्टी की यही ताकत उसकी सबसे बड़ी मुसीबत भी है. पिछले कार्यकाल में इसी युवा शक्ति के कारण समाजवादी पार्टी को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा था और उसे ‘गुण्डाराज’ जैसे तमगे भी मिले थे. इसी ताकत को नियंत्रित रखने के लिए मुलायम सिंह यादव अपने कार्यकाल के अंतिम छह महीने में अपने हर सार्वजनिक कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं से अनुशासन में रहने, पार्टी की छवि को सुधारने और जनता के बीच फिर से इज्जत वापस हासिल करने का प्रयास करने की भीख मांगते दिख रहे थे. लेकिन समाजवादी पार्टी की ‘ताकत’ पर इसका कोई असर नहीं हो पाया और उनका परिणाम समाजवादी पार्टी के 5 साल के निर्वासन के रूप में सामने आया.

अखिलेश यादव ने जो रणनीति बनाई थी उसमें युवाओं को बेलगाम न छोड़ने पर खास ध्यान दिया गया था. बावजूद इसके कानून का राज शत प्रतिशत स्थापित नहीं हो सका है

2011 में भी यही ‘ताकत’ एक बार फिर समाजवादी पार्टी को मजबूत करती दिखाई दी. लेकिन कहावत है कि दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है ठीक उसी तरह समाजवादी पार्टी ने भी इस बार ‘ताकत’ के इस्तेमाल में कई सावधानियां रखीं. अखिलेश यादव के खेमे में चुनाव की जो रणनीति बनाई जा रही थी उसमें युवाओं को बेलगाम न छोड़ने पर खास ध्यान दिया गया. पार्टी से सक्रिय रूप से जुड़ने वाले युवा नेताओं की छवि का भी खासा ध्यान रखा गया और पूरे चुनाव अभियान में सबसे ज्यादा जोर इसी बात पर रहा कि इस बार अगर पार्टी सत्ता में आई तो शत प्रतिशत कानून का राज स्थापित किया जाएगा. अखिलेश की उदार और लचीली छवि के कारण भी युवाओं का जबर्दस्त ध्रुवीकरण पार्टी के पक्ष में हुआ. चुनाव अभियान के दौरान अखिलेश की सभाओं में युवाओं की सबसे अधिक उपस्थिति इसका प्रमाण थी. लोगों को भी लगने लगा था कि शायद इस बार सब कुछ बदल जाएगा.

लेकिन चुनावी नतीजे आने और सरकार बनने के शुरुआती दिन ही ऐसा लगने लगा कि मामला वही ‘ढाक के तीन पात’ वाला हो गया है. शपथ ग्रहण समारोह में समाजवादी पार्टी की ‘ताकत’ ने मंच पर कब्जा कर जिस तरह की उद्दण्डता दिखाई थी उसने अखिलेश जैसे ‘कूल’ मुख्यमंत्री को भी कठोर कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा. एक के बाद एक कार्यकर्ता और नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने, झंडे बैनर के इस्तेमाल के लिए कड़े नियम बनाने और समाजवादी कार्यकर्ताओं को साफ चेतावनी देने के बाद भी सब कुछ ठीक हो गया है, यह कहा नहीं जा सकता और यही बात अब समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती हो गयी है.

समाजवादी पार्टी यह बात भलीभांति जानती है कि उसकी राजनीति के लिए युवा कितने महत्वपूर्ण हैं. इसीलिए अपने घोषणा पत्र में भी उसने छात्र संघों की बहाली, बेरोजगारी के लिये भत्ता, खेलों के लिए विशेष प्रयास तथा स्कूल से कॉलेज स्तर तक वाद विवाद प्रतियोगिताओं के आयोजन आदि अनेक वायदे भी किए थे. सरकार बनते ही इनमें से कई वायदे पूरे भी कर दिए गए. पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी कहते हैं, ‘युवा तो हमारी पार्टी का आधार हैं. नेता जी ने भी कहा है कि इस बार की जीत में युवाओं के संघर्ष का बड़ा योगदान है. समाजवादी पार्टी की संघर्षयात्रा में नौजवानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. नौजवानों के बिना समाजवादी पार्टी अधूरी है.’ मगर समाजवादी पार्टी का आधार कही जाने वाली युवा शक्ति पार्टी के लिये दुधारी तलवार की तरह है. समाज विज्ञानी डॉ. राजेश कुमार कहते हैं, ‘छात्र संघों की बहाली बेशक स्वागत योग्य है लेकिन छात्रसंघों की गतिविधि कालेजों के भीतर तक ही सीमित रहे तो बेहतर होगा. यह अगर परिसर के बाहर फैल गई तो सत्ताधारी दल के लिए आफत बन सकती है.’
अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की लाल गांधी टोपी को लाल रंग की स्पोर्ट्स कैप में बदल कर पार्टी के युवा चेहरे को बाहर से बदलने का काम तो शुरू कर दिया है. मगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर और समाजवादी पार्टी के लिए 2014 में दिल्ली की सत्ता का रास्ता तैयार करने वाले नायक के रूप में उनकी भूमिका की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे पार्टी की ‘ताकत’ पर कितनी लगाम रख सकते हैं और युवाओं की असीम ऊर्जा को किस हद तक सकारात्मक दिशा में ले जा सकते हैं.

‘हुनर’ और ‘औजार’ पर प्रहार

अच्छी नीयत से शुरू की गई हुनर और औजार नाम की योजनाओं का मकसद यह था कि बिहार की हजारों मुसलिम लड़कियां अपने पांवों पर खड़ी हों. लेकिन प्रतिष्ठित मुसलिम मजहबी संगठनों से जुड़े लोगों ने ही इन योजनाओं को पलीता लगा दिया. इर्शादुल हक की रिपोर्ट

सात सितंबर, 2009 का वह दिन फुलवारी शरीफ की नूरी परवीन की जिंदगी में खुशियों की सौगात लेकर आया था. उस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक भव्य कार्यक्रम में उसे ढाई हजार रुपये का चेक अपने हाथों से दिया था. नूरी ने हुनर योजना के तहत सिलाई में एक साल की ट्रेनिंग ली थी. मुख्यमंत्री ने उसे यह चेक इसलिए दिया था ताकि वह अपने हुनर के बूते अपने पैरों पर खड़ी हो सके. नूरी के सपनों को जैसे पर लग गए थे. वह सोच रही थी कि उन पैसों से खरीदी गई सिलाई मशीन से वह काम करेगी और पैसे कमाएगी.

वह क्षण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी यादगार था. वे खुश थे और संतुष्ट भी. इसी खुशी में उन्होंने यह घोषणा कर दी थी कि ‘हुनर’ और ‘औजार’ योजना का विस्तार होगा. इसका लाभ 25 हजार की बजाय 50 हजार बच्चियों तक किया जाएगा और इसमें दलित बच्चियों को भी शामिल किया जाएगा.

सितंबर, 2009 के  उस कार्यक्रम को बीते आज ढाई साल हो चुके हैं. स्याह नकाब की चिलमन के पीछे से झांक रहा नूरी का खुशियों से चमकता वह चेहरा और उस दिन मुख्यमंत्री के माथे पर उभरा संतोष का भाव, फिल्मों की फ्लैश-बैक घटना की तरह कहीं गुम-से हो गए हैं. इस फिल्म की आगे की पात्र जैसे भोजपुर की शमा, नसरीन, फारबिसगंज की तब्बसुम, शबाना और गोपालगंज की जमीला जैसी हजारों लड़कियां नूरी जैसी खुशकिस्मत नहीं हैं. क्योंकि इस फिल्म के विलेन इनके सपनों को चकनाचूर कर रहे हैं.

तीनों ही संगठनों को राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये दिए ताकि वे अपने संसाधनों, नेटवर्क और विशेषज्ञों की मदद से यह कार्यक्रम लागू करें

जुलाई, 2008 में केंद्र के सहयोग से राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक बालिकाओं के स्वरोजगार और प्रशिक्षण के लिए ‘हुनर’  योजना शुरू की थी. इसके बाद हुनरमंद होने वाली बालिकाओं के लिए ‘औजार’ योजना के तहत 2,500 रुपये दिए जाने थे ताकि वे अपने हुनर का इस्तेमाल करने के लिए औजार खरीद सकें. लेकिन 40-45 हजार बालिकाओं के स्वरोजगार और सपनों से जुड़ी इस योजना पर घोटाले का ग्रहण लग गया.

इस योजना के लिए राज्य सरकार ने बिहार के तीन बड़े मजहबी संगठनों- इमारत शरिया, एदारा शरिया और रहमानी फाउंडेशन को नोडल एजेंसी के रूप में चुना था. उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने के पीछे नीतीश सरकार की यही मंशा थी कि ये संगठन न सिर्फ मुसलमानों के प्रतिनिधि संगठन हैं बल्कि वे भलीभांति जानते हैं कि मुसलिम समाज को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है. पटना स्थित इमारत शरिया जहां दारुल उलूम देवबंद के समानांतर एक ऐसी मजहबी संस्था है जिसके पैरोकार बिहार, उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल समेत अनेक राज्यों में  हैं. विभिन्न मुद्दों पर फतवा देने में इस संस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है. पूर्वी राज्यों के मुसलमानों का इस संस्था पर इतना भरोसा है कि वे ईद का चांद दिखने की तस्दीक भी इस संस्था द्वारा ही करते हैं. इसी तरह पटना के सुल्तानगंज इलाके में स्थित इदारा शरिया बिहार समेत अन्य पूर्वी राज्यों में मुसलमानों का प्रतिनिधि संगठन है जिसे मुसलमान सम्मान की नजर से देखते हैं.  तीसरी संस्था रहमानी फाउंडेशन हाल के वर्षों में गरीब मुसलिम छात्रों को आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए मुफ्त कोचिंग करवाने और इन छात्रों की सफलता के लिए चर्चित हुई है.

इन तीनों ही संगठनों को राज्य सरकार ने करोड़ों रुपये दिए ताकि वे अपने संसाधनों, नेटवर्क और तकनीकी विशेषज्ञों की मदद से हुनर कार्यक्रम को लागू करें. कार्यक्रम के तहत बालिकाओं को सिलाई, पेंटिंग, ब्यूटीशियन और चाइल्ड केयर आदि का प्रशिक्षण देना था. पहले ही साल इस कार्यक्रम में लगभग 13 हजार लड़कियों को शामिल कर लिया गया. इस प्रकार राज्य के 38 में से अधिकतर जिलों तक इस कार्यक्रम की पहुंच हो गई. लेकिन पिछले दो-तीन महीनों के प्रयास में तहलका को मिले दस्तावेज, सबूत और तथ्य बताते हैं कि गरीब और अनाथ बच्चियों के हुनर के विकास के लिए शुरू की गई यह योजना लूट खसोट और घपलों घोटालों की भेंट चढ़ चुकी है.

गड़बड़ियों का खेल

lरहमानी फाउंडेशन : रहमानी फाउंडेशन बिहार के पूर्वी जिलों में दर्जनों छोटे-छोटे मदरसों या गैरसरकारी संस्थाओं के माध्यम से हुनर कार्यक्रम चला रहा है.  तहलका ने कुछ केंद्रों का जायजा लिया तो चौंकाने वाले मामले सामने आए. अररिया जिले का मदरसा आलिया दारुल कुरआन, दरभंगिया टोला का केंद्र मो. फिरोज की देखरेख में चलता है. यहां चलने वाले पहले सत्र में 31 बालिकाओं ने प्रशिक्षण लिया. इस साल सफल बालिकाओं को औजार खरीदने के लिए प्रत्येक को ढाई-ढाई हजार की रकम मिल भी गई. पर दूसरे सत्र में स्थितियां बिल्कुल उलट गईं. फिरोज की देखरेख में चलने वाले प्रशिक्षण केंद्रों पर 121 बालिकाओं ने प्रशिक्षण तो लिया पर उनमें से कइयों को औजार के लिए पैसे नहीं मिले. उदाहरण के लिए, फाउंडेशन ने फारबिसगंज के रामपुर मुहल्ले के मो इलियास अंसारी की बेटी तबस्सुम परवीन के नाम 31 अक्टूबर, 2009 को एक चेक जारी किया था.  तकनीकी या किसी अन्य कारण से इसका भुगतान नहीं हो सका. फिरोज की शिकायत के बाद रहमानी फाउंडेशन ने फिर दो नवंबर, 2010 को चेक जारी किया. लेकिन दोबारा इस चेक का वही हस्र हुआ. हालांकि रहमानी फाउंडेशन से जुड़े अधिकारी आरिफ रहमानी तहलका से कहते हैं कि चेक से पैसे नहीं मिलने का जिम्मेदार फाउंडेशन नहीं हैं. वे कहते हैं,  ‘हो सकता है कि चेक को समय पर जमा नहीं करवाया गया होगा.’

लेकिन तबस्सुम तो सिर्फ एक उदाहरण है. रामपुर के ही गुलाम रब्बानी की बेटी शबाना परवीन के नाम 10 जून, 2011 को उसी बैंक से एक चेक जारी किया गया. पर शबाना को भी भुगतान नहीं हो सका. फिरोज का आरोप है कि इस तरह के अनेक चेक बेकार हो गए और बालिकाओं को भुगतान से वंचित होना पड़ा. इस संबंध में जब रहमानी से बात की गई तो जवाब मिला कि अगर चेक से भुगतान नहीं हुआ तो प्रभावित लोगों को उनसे शिकायत करनी चाहिए थी. पर तबस्सुम के पिता इलियास अंसारी कहते हैं, ‘हमने  कई बार शिकायत की. एक बार दूसरा चेक बनवाया भी गया. फिर भी पैसे नहीं मिले. अब हम कितना दौड़ें और किसके पास गुहार लगाते फिरें. हम थक चुके हैं.’

रहमानी फाउंडेशन द्वारा अनेक लाभार्थियों को पैसे न देने के आरोपों को उसके अधिकारी गलत तो बताते ही हैं साथ ही वे सरकार द्वारा आवंटित राशि के सदुपयोग का दावा भी करते हैं. पर सरकारी दस्तावेज कुछ और ही किस्सा बयान करते हैं. सरकार ने 2010-11 में फाउंडेशन को औजार कार्यक्रम के तहत 66 लाख 35 हजार रुपये दिए थे. पर दो दिसंबर, 2012 को जो दस्तावेज विभाग ने जारी किया उसके अनुसार रहमानी फाउंडेशन ने सरकार को इसका कोई उपोयगिता प्रमाण पत्र नहीं दिया. हालांकि फाउंडेशन के अधिकारी आरिफ रहमानी का दावा है कि उन्होंने एक-एक पाई का उपयोगिता प्रमाण पत्र दे दिया है.

इमारत शरिया : इमारत शरिया वेलफेयर सोसाइटी की तरफ से हुनर और औजार का काम देख रहे इस संस्था के सचिव मो. मोजाहिर कहते हैं कि सरकार की तरफ से लगभग पूरी आवंटित राशि उनकी संस्था को मिल गई और इस रकम का सदुपयोग भी कर लिया गया. वे यह भी बताते हैं कि इस संबंध में उपयोगिता प्रमाण पत्र भी सरकार को दे दिया गया. पर विभिन्न जिलों में चल रहे प्रशिक्षण केंद्रों के संचालकों और प्रशिक्षकों की शिकायतें हैं कि उन्हें समुचित भुगतान नहीं मिला. गोपालगंज के भोरे में प्रशिक्षण केंद्र चलाने वाले नथुनी मियां कहते हैं कि उनको वर्ष 2010-11 में एक साल की बजाय मात्र पांच महीने का मानदेय प्रति महीने 1,500 रुपये की दर से दिया गया. जबकि यह आंकड़ा 2,000 रुपये प्रति माह होना चाहिए था.हालांकि इमारत के अधिकारी मो. मोजाहिर इस आरोप को बेबुनियाद बताते हुए कहते हैं कि उन्होंने प्रत्येक संचालक को प्रति माह के हिसाब से 2,000 रुपये दे दिए. वे इस गड़बड़ी का जिम्मेदार गोपालगंज के जिला कोऑर्डिनेटर को ठहराते हैं. पर मोजाहिर भूल जाते हैं कि जिला कोऑर्डिनेटर की जवाबदेही इमारत के प्रति है, इसलिए इमारत खुद को इससे अलग नहीं कर सकता. इमारत की कार्यप्रणाली पर इस मामले में राज्य भर से उंगलियां उठी हैं. जब कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से इस संबंध में सूचना मांगनी शुरू की तो इमारत शरिया में हड़कंप मच गया. इमारत ने अपनी बदनामी से बचने के लिए पहले कोऑर्डिनेटर इफ्तेखार काजमी को उनके पद से हटा दिया. इसके बावजूद स्थिति बिगड़ती चली गई तो अचानक पिछले दिनों हुनर कार्यक्रम को बंद करने का फैसला कर लिया गया. मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस कार्यक्रम को छोड़ने का फैसला इमारत शरिया के शीर्ष नेतृत्व, जिसमें मौलाना निजामुद्दीन शामिल हैं, के कहने पर लिया गया.

लेकिन क्या कार्यक्रम बंद कर देने से इमारत की खोई हुई प्रतिष्ठा वापस आ जाएगी? इस संबंध में आरटीआई ऐक्ट के तहत सूचना मांगने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शरीफ कुरैशी कहते हैं, ‘इमारत ने तीन वित्तीय वर्ष तक लगातार गड़बड़झाला किया है. और अब जाकर हमारे दबाव से उनकी नींद टूटी है. लेकिन इससे इमारत के पदाधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते क्योंकि गया, भोजपुर समेत राज्य के अनेक जिलों में सैकड़ों केंद्र संचालकों और प्रशिक्षकों को उनकी मजदूरी नहीं मिली. वे अपना हक अब भी मांग रहे हैं.’

अच्छी-भली योजनाओं का सत्यानाश होने से मुस्लिम समाज में निराशा है और आक्रोश भी

कुरैशी की इन बातों की तस्दीक राज्य के अनेक जिलों में केंद्र संचालकों के आक्रोश से हो जाती है. गया जिले के गुरुवा क्षेत्र में प्रशिक्षण केंद्र चलाने वाले मौलवी कौसर तब्बसुम की बानगी से कुछ ऐसा ही एहसास होता है. कौसर कहते हैं, ‘इमारत के अधिकारियों ने हमें सूचित किया था कि मेरे प्रशिक्षण केंद्र के लिए तीन सिलाई मशीनें 2010 में ही भेजी गईं. डेढ़ साल बीत गए पर वे मशीनें रास्ते में ही हैं.’

ऐसे सवालों या आरोपों का जवाब इमारत के अधिकारियों के पास बस रटा-रटाया ही मिलता है. इमारत के अधिकारी मो. मोजाहिर इन आरोपों के जवाब में कहते हैं, ‘जब मशीनें नहीं मिलीं तो उन्हें अपने जिला कोऑर्डिनेटर से पूछना चाहिए.’

एदारा शरिया : हुनर कार्यक्रम को संचालित करने वाली नोडल एजेंसियों में रहमानी फाउंडेशन और इमारत शरिया के अलावा तीसरी नोडल एजेंसी एदारा शरिया है. एदारा द्वारा संचालित प्रशिक्षण केंद्रों के प्रशिक्षकों- भोजपुर के मो. ताबिश और समस्तीपुर की रेहाना खातून के एक जैसे आरोप हैं कि उन्हें आधे-अधूरे पैसे दिए गए. इसी तरह प्रशिक्षण प्राप्त करने वाली बालिकाओं के आरोप भी कुछ ऐसे ही हैं. अगर थोड़ी देर के लिए इन आरोपों को महज आरोप मान लिया जाए और इसके बदले एदारा शरिया के दस्तावेजों पर ही भरोसा किया जाए तो भी इन दस्तावेजों से प्राप्त तथ्य कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता और पंद्रह सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति के पूर्व अध्यक्ष शरीफ कुरैशी कई महीनों से इन गड़बड़ियों की तह तक जाने के प्रयास में जुटे हैं. शिक्षा विभाग से सूचना के अधिकार के तहत उन्होंने यह पूछा था कि इन नोडल एजेंसियों से अब तक किन-किन बालिकाओं को औजार कार्यक्रम के तहत ढाई-ढाई हजार रुपये दिये गये हैं. कुरैशी के इस सवाल के जवाब में शिक्षा विभाग ने जो आंकड़े इन नोडल एजेंसियों से लेकर दिये वे जवाब से ज्यादा भ्रम पैदा करने वाले ही हैं. एदारा शरिया के दस्तावेजों के मुताबिक उसने अब तक 1989 बालिकाओं को ढाई हजार रुपये की दर से कुल 49 लाख 72 हजार रुपये बांटे हैं. पर एदारा ने न तो इस सूची में लाभान्वित होने वाली लड़कियों का नाम उजागर किया है और न ही उनके पते ही बताए हैं. कुरैशी सवाल करते हैं, ‘अगर तमाम बालिकाओं को पैसे मिले तो एदारा उनके नाम क्यों छुपा रहा है?’ कुरैशी की तरह इस कार्यक्रम पर पैनी निगाह रखने वाले गुलाम सरवर आजाद ऐसी कई बालिकाओं के नाम गिनाते हैं जिन्होंने प्रशिक्षण तो पूरा कर लिया पर उन्हें मशीन खरीदने के लिए पैसे नहीं मिले. इसी तरह भोजपुर में प्रशिक्षण केंद्र चलाने वाले मो. ताबिश अपने रजिस्टर से उन लड़कियों के नाम छांट कर बताते हैं जिन्हें आज तक पैसे नहीं मिले.

हुनर और औजार जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों से गरीब और पिछड़े तबके की हजारों मुसलिम बालिकाओं की जिंदगी में स्वरोजगार के अवसर मिलने की उम्मीद जगी थी. पर इस कार्यक्रम को लागू करवाने वाली नोडल एजेंसियों के कुछ अधिकारियों ने काफी हद तक इसकी बदहाली की दास्तान लिख दी है. इससे मुसलिम समाज में निराशा भी है और आक्रोश भी.

किंगमेकर किंग

वे ऐसे किंग हैं जिनकी चर्चा आम तौर पर मीडिया में नहीं होती. पर मध्य बिहार के राजनीतिक गलियारे और गंवई चौपालों की सियासी बहस का वे लाजिमी हिस्सा हुआ करते हैं. लोग उनके असल नाम की बजाय उन्हें किंग कह कर ही संबोधित करते हैं. वे सार्वजनिक मंचों पर नहीं दिखते. सरकारी-गैरसरकारी समारोहों से दूर का वास्ता भी नहीं रखते. भाषणबाजी तो जैसे उनके लिए  है  ही नहीं. राजनीतिक और नीतिगत फैसले भी नहीं लेते, पर फैसले को अपनी जरूरतों और इच्छाओं के हिसाब से प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. एक धनाढ्य उद्योगपति होने के बावजूद वे खुद को एक राजनेता ही कहलाना पसंद करते हैं. बिहार की सत्ताधारी राजनीति जब भी गरमाती है तो पर्दे के पीछे से उनके सियासी रसूख की तपिश को महसूस तो किया जा सकता है, पर उन्हें न तो देखा जा सकता है और न ही सुना. इसलिए देश भर की तो बात ही छोड़िए, बिहारी जनमानस की बड़ी आबादी के लिए भी वे अनजाने ही हैं.

पर वे राजनीतिक रूप से कितने महत्वपूर्ण हैं इसका अंदाजा लगाने के लिए सिर्फ यह जानना काफी है कि संसद में पहुंचने के लिए जो तीन संवैधानिक रास्ते हैं वे उन सब पर टहल चुके हैं. जनता के वोट से चुन कर वे लोकसभा पहुंचे हैं. यह 1980 की बात है जब वे कांग्रेस के टिकट पर जहानाबाद से जीते थे. 1984 में वे चुनाव हार गए, लेकिन राष्ट्रपति द्वारा मनोनयन के रास्ते वे राज्यसभा पहुंच गए. इसके बाद वे पहले राष्ट्रीय जनता दल और बाद में जनता दल यूनाइटेड के सहारे ऊपरी सदन पहुंचते रहे. 1980 से 2012 तक का उनका यही राजनीतिक सफर है. राज्यसभा में यह उनकी सातवीं पारी है.

उनका नाम  है महेंद्र प्रसाद. हालांकि वे खुद को किंग महेंद्र कहलवाना पसंद करते हैं. फिलहाल वे सिर्फ इसलिए चर्चा में नहीं हैं कि वे सातवीं बार राज्यसभा के सदस्य बने हैं, बल्कि इसलिए भी कि उनकी वजह से उनके दल के दो ऐसे नेता भी राज्यसभा की सदस्यता दोबारा पा गए जिन्होंने शायद खुद के लिए ईश्वर-अल्लाह से प्रार्थना करना भी छोड़ दिया था. ये हैं अली अनवर और अनिल साहनी. अनवर और साहनी पहले भी सत्ताधारी जदयू से राज्यसभा के सदस्य थे.  पिछले सात साल में जब भी राज्यसभा के चुनाव हुए हैं, जदयू यह घोषित करता रहा है कि किसी नेता को लगातार दो बार राज्यसभा भेजना उसकी परंपरा नहीं है. ऐसे में अली अनवर और अनिल साहनी के लिए दोबारा ऊपरी सदन का सदस्य बनने की संभावना नहीं थी. पर पार्टी की राजनीति पर गहरी नजर रखने वाले विश्लेषकों के अनुसार यह किंग महेंद्र ही थे जिनके लिए जदयू को यह परंपरा तोड़नी पड़ी. किंग महेंद्र राज्यसभा में खुद के जाने के प्रति कितना आश्वस्त थे इसका अंदाजा उनकी उस बात से लगाया जा सकता है जो उन्होंने निर्विरोध चुने जाने के बाद कही. उनका कहना था, ‘अगर राज्यसभा की एक सीट के लिए भी चुनाव होता तो हमारी जीत पक्की होती.’

देखा जाए तो बिहार में राजनीति के खेल में चित और पट, दोनों किंग महेंद्र की रही है. 1980 से आज तक वे हर सत्ताधारी पार्टी से सांसद रहे हैं. जब कांग्रेस सत्ता में थी तब वे घोर कांग्रेसवादी हुआ करते थे. फिर मंडल के दौर में पिछड़े नेताओं का उभार हुआ तो भी भूमिहार जाति से ताल्लुक रखने वाले किंग का रुतबा बरकरार रहा. 1990 में लालू ने सत्ता संभाली तो भी किंग लालू की आंखों का तारा बने और राज्यसभा पहुंचते रहे. वह भी तब लालू के इस दौर को उच्चवर्ग के राजनीतिक पतन के दौर के रूप में देखा गया. फिर 2005 में लालू के घोर विरोध का बिगुल बजा कर जब नीतीश सत्ता में आए तब भी किंग महेंद्र, किंग ही बने रहे और नीतीश की तरफ से 2006 में राज्यसभा पहुंचाए गए. अब 2012 में वही इतिहास दोहराया गया है.

पिछले लगभग 32 साल में से कम-से-कम 25 साल किंग महेंद्र रसायन और उर्वरक मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति के सदस्य जरूर रहे हैं

सवाल उठता है कि आखिर क्यों बिहार का हर सत्ताधारी दल एक चर्चित दवा कंपनी एरिस्टो के इस मालिक को इतनी तरजीह देता रहा है क्या इसकी वजह आर्थिक मदद है? इस सवाल का जवाब जदयू के बैंक खातों की जानकारी रखने वाले एक वरिष्ठ नेता गोपनीयता की शर्त पर देते हैं. वे कहते हैं, ‘हम काले और सफेद धन की बहस में नहीं जाना चाहते. सीधी बात यह है कि चुनाव या इस तरह के दीगर अवसरों पर, जब भी पार्टी को जरूरत पड़ती है वे खुल कर आर्थिक सहायता करते हैं. यह सहायता निश्चित तौर पर निर्धारित नियमों के अनुसार चेक से की जाती है. इससे उन्हें भी टैक्स छूट का फायदा तो मिलता ही है’.

लेकिन क्या सचमुच उनकी किसी भी सत्ताधारी पार्टी के लिए महज इतनी ही उपयोगिता है  कि उनसे पार्टी फंड में पैसे लिए जाएं? जदयू के ही सांसद और हाल के दिनों में किंग से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले जगदीश शर्मा भी इस सवाल पर बेहद सावधान दिखते हैं. वे कहते हैं, ‘किंग महेंद्र गहरी समझ वाले नेता हैं. समय-समय पर पार्टी को उनके राजनीतिक अनुभवों का लाभ मिलता रहता है. सिर्फ फंड ही एक मामला नहीं है जिसके कारण पार्टी उन्हें पसंद करती है. उन्होंने अपनी कंपनी के माध्यम से हमारे क्षेत्र के सैकड़ों लोगों को रोजगार दिया है’.

किंग महेंद्र 1980 से यानी पिछले लगभग 32 साल में से कम-से-कम 25 साल संसद की एक खास समिति के सदस्य जरूर रहे हैं. यह संसदीय समिति है रसायन और उर्वरक मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति. इस समिति के सदस्य रहने के कारण कई लोग आरोप लगाते रहे हैं कि वे अपनी दवा कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए इस समिति से जुड़े रहते हैं. हालांकि जगदीश शर्मा कहते हैं कि ऐसे आरोप ईर्ष्या रखने वाले लोग ही लगाते हैं. वे कहते हैं, ‘उनकी दवा कंपनी एक स्थापित कंपनी है जिसे वे 30 सालों से सरकार के भरोसे ही नहीं चला रहे. जहां तक संसदीय सलाहकार समिति की सदस्यता की बात है तो यह सब जानते हैं कि ज्यादातर सांसद किसी-न-किसी संसदीय समिति के सदस्य होते ही हैं. इसमें क्या अजूबा है?’
जहानाबाद में गोविंदपुर गांव के मूल निवासी 72 वर्षीय किंग महेंद्र के नाम विश्व भ्रमण के कई रिकॉर्ड भी हैं और जुबान न खोलने का भी उनका रिकॉर्ड अद्भुत रहा है. दूसरे शब्दों में कहें तो संसद में चुप बैठने का अगर रिकॉर्ड निर्धारित किया जाए तो किंग इसमें भी शायद सब पर भारी पड़ें. आंकड़े बताते हैं कि अपने 30 साल  के संसदीय करियर में किंग ने अब तक मात्र पांच सवाल पूछे हैं. शुरुआत से ही वे प्रेस से बात करने से परहेज करते रहे हैं. यही वजह है कि काफी कोशिशों के बाद भी तहलका की उनसे बात नहीं हो सकी. उनके दल के राज्यसभा सांसद  अली अनवर  कहते हैं, ‘महेंद्र जी सार्वजनिक जीवन में खामोश रहना पसंद करते हैं पर निजी बातचीत में वे काफी शालीन, हंसमुख और यात्रापसंद इंसान हैं.’ वे आगे कहते हैं ‘किंग महेंद्र को एक हद तक राज्यसभा की वेबसाइट में छपी जानकारियों से समझा जा सकता है.’

राज्यसभा की वेबसाइट से किंग के बारे में जो जानकारी सामने आती है, उसका विश्लेषण भी काफी दिलचस्प है. अगर आप अंग्रेजी अक्षरमाला के तमाम 26 अक्षरों से शुरू होने वाले देशों के नामों की सूची देखें तो इनमें सिर्फ ‘एक्स’ ही वह अक्षर है जिससे शुरू होने वाले देश का भ्रमण किंग ने नहीं किया है. वह भी इसलिए कि ‘एक्स’ अक्षर से दुनिया के किसी भी देश का नाम शुरू नहीं होता. किंग के नाम एक रिकॉर्ड यह भी है कि उन्होंने एक वित्तीय वर्ष यानी अप्रैल 2002 से अप्रैल 2003 के दौरान 84 देशों का भ्रमण किया था. सबसे ज्यादा यात्रा करने वाले सांसद होने का गौरव उन्हें हासिल है. वे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स की राष्ट्रीय रिकॉर्ड श्रेणी में भी हैं. यहां उन्होंने 2004 से 2010 तक सबसे ज्यादा देशों का भ्रमण करने वाले भारतीय का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया है.

एक साल पुरानी जानकारी के अनुसार किंग दुनिया के कुल 258 में से 205 देशों में अपने पांव रख चुके हैं. उनके इस रिकॉर्ड के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कायल हैं. पिछले दिनों जब किंग महेंद्र राज्यसभा के लिए नामांकन भरने पटना पहुंचे तो उनका परिचय कराते हुए मुख्यमंत्री ने अपने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ‘महेंद्र जी सोमालिया छोड़कर दुनिया के सभी देशों का दौरा कर चुके हैं. अबकी बार वे वहां भी पहुंच जाएंगे.’ मुख्यमंत्री के इस रहस्योद्घाटन से लगा कि इस एक साल में किंग ने कम-से-कम 50 और देशों का भ्रमण कर लिया है.

सादा जीवन पर शाही अंदाज के शौकीन महेंद्र प्रसाद खान पान में अब भी बिहारी जरूर हैं पर वे बिहार में कम ही दिखते हैं. इसी तरह भले ही उनकी दवा फैक्टरियों में सैकड़ों बिहारी काम करते हैं पर उनके कारोबार का बड़ा हिस्सा बिहार से बाहर ही है. इसके बावजूद बिहार के हर सत्ताधारी राजनीतिक दल को उनके फंड का लाभ जरूर मिलता रहता है. हालांकि यह भी कहा जाता है कि जैसे उनकी फैक्ट्रियां गुजरात से वियतनाम तक फैली हुई हैं, वैसे बिहार में भी होतीं तो कुछ लाभ बिहारी जनता को भी जरूर होता.

‘किताब की कीमत में लेखक की कोई भूमिका नहीं होती`

असगर वजाहत ने बीते एक दशक में दुनिया को यात्राओं के जरिए समझा है. अंतिका प्रकाशन से उनकी किताब ‘रास्ते की तलाश में आई है. किताब के बहाने कई मुद्दों पर स्वतंत्र मिश्र की उनसे बातचीतः

‘रास्ते की तलाश में’  शीर्षक क्यों?

यात्रा के लिए निकलने वाले हर यात्री के कुछ उद्देश्य होते हैं. उन उद्देश्यों की पूर्ति कभी होती और कभी नहीं होती है. आप यात्रा करते जाते हैं, आपकी तलाश का दायरा बढ़ता जाता है. हम लोग हमेशा किसी खोज में लगे होते हैं. यात्रा के दौरान बहुत सारे अनजान लोग मिलते हैं. आप अनजान संस्कृतियों से टकराते हैं. अपरिचित समाज से मिलते हैं. लेकिन आपकी खोज कभी पूरी नहीं होती. आपकी तलाश हमेशा जारी रहती है. रास्ता एक प्रतीकात्मक शब्द है. आप रास्तों से होकर कुछ तलाश करते हैं. रास्ते की खोज करने के क्रम में कितना मिल पाता है और कितना नहीं, यह अलग बात है.

अपनी किताब में आप दक्षिण समाज की खूबियों को पकड़ते हैं लेकिन उत्तर भारत को झिड़कते हैं. क्या हिंदी समाज वाकई में इतना पिछड़ा समाज है?

अभी-अभी मैं इलाहाबाद से लौटा हूं. उसे देखकर महसूस होता है कि यह कितना उपेक्षित शहर है. सड़कें उपेक्षित हैं. पेशाब और शौच की सुविधाएं तक नहीं हैं. पीने का पानी तक नहीं है. गाड़ी खड़ी करने की सुविधा नहीं है. सड़कों पर गड्ढे सालों से बने हुए हैं. मुख्य सड़कों के आगे लोगों ने दुकानें बना ली हैं. बड़ी-बड़ी सड़कों के किनारे लोगों ने झुग्गियां डाल दी हैं. दुनिया में जो अराजकता कहीं नहीं दिखाई दे वह हमारे उत्तर प्रदेश में जरूर दिखाई देती है. इस रूप में प्रशंसा तो की जा सकती है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय कभी भारत का ऑक्सफोर्ड हुआ करता था. लेकिन आप आज की तारीख में इनकी प्रशंसा कैसे कर सकते हैं? सामाजिक विकास के पैमाने पर ये प्रदेश बहुत निचले पायदान पर पहुंच गए हैं. मैं जब इलाहाबाद गया तो लोगों ने मुझसे कहा कि सांप्रदायिकता से हमें लड़ना होगा. मैंने उनसे कहा कि यह सब ठीक है. लेकिन भारत में उत्तर प्रदेश सामाजिक विकास के पैमाने पर सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है. आपने इस बारे में क्या किया है? इसे ठीक करना भी आपकी जिम्मेदारी है. हिंदी प्रदेशों में मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल को छोड़ दिया जाए तो बहुत खराब स्थिति है. माफिया, गिरोहबंदी, घोटाले, आतंक की राजनीति उत्तर प्रदेश में आकर समा गई है.

दक्षिण में भी तो घोटाले खूब हो रहे हैं?

घोटाले तो हर जगह हो रहे हैं. लेकिन दक्षिण भारत सामाजिक विकास के पैमाने पर हिंदी प्रदेशों की तुलना में अभी भी बहुत आगे है. दोनों के बीच का अंतर बहुत ज्यादा है.

आप साहित्य की मूल धारा से दूर नजर आ रहे हैं और यात्रा-वृत्तांत ज्यादा लिख रहे हैं. इस बदलाव की वजह?

मैं साहित्य की मुख्यधारा यानी कथा, कहानी और उपन्यास लेखन का भी काम कर रहा हूं. राजकमल से मेरे दो छोटे-छोटे उपन्यास आए हैं. युवावस्था में फिक्शन लिखना बहुत अच्छा लगता है, लेकिन एक समय आता है जब लेखक कथा, कहानी लिखते-लिखते ऊब जाता है. इस स्थिति में लेखक को लगने लगता है कि दायरे की चीजों से यथार्थपरक तरीके से संवाद किया जाए. यही वजह है कि मैं यात्रा वृत्तांत अधिक लिख रहा हूं. पाकिस्तान पर भी मैंने एक यात्रा-संस्मरण पूरा किया है.

‘कहानीकारों को लगता है कि चार पंक्तियां लिख देने से पाठक चारों खाने  चित हो जाएंगे. यही वजह है कि पाठक कहानी से दूर हो रहे हैं’

आपकी किताब ‘रास्ते की तलाश में’  में मात्र 80 पन्ने हैं. ब्लैक एेंड व्हाइट तस्वीरें हैं. इस लिहाज से किताब की कीमत 225 रुपये बहुत ज्यादा नहीं है?

मैं मानता हूं कि किताब की कीमत बहुत ज्यादा है. मेरी इच्छा तो यह है कि किताबें पाठकों को फ्री में उपलब्ध हों. कीमत तो प्रकाशक तय करते हैं. किताब की कीमत तय करने में लेखकों की कोई भूमिका नहीं होती. कीमत कम रखने के लिए लेखक ज्यादा से ज्यादा यही कर सकता है कि वह राॅयल्टी न ले. कीमत तय करने में किसी तरह का नियंत्रण नहीं है, इसलिए प्रकाशक जो चाहे कीमत रख लेते हैं. प्रकाशक ज्यादा कीमत रखने को लेकर तरह-तरह के तर्क देते हैं. जैसे किताबें ज्यादा बिकती नहीं हैं और खर्च निकालना तक मुश्किल होता है.

इन दिनों हिंदी में घुमक्कड़ी साहित्य खूब लिखा जा रहा है. इसकी क्या वजह है?

कहानियों में बनावटीपन और भारीपन बढ़ा है. कहानी में छद्म आ गया है. कहानीकार पाठकों को डराने की कोशिश कर रहे हैं. लेखकों को लगता है कि चार पंक्तियां लिख दीं और पाठक चित. इन सब कारणों से पाठक कहानी से दूर हो रहे हैं. आज कहानी लिखना चुनौती भरा काम हो गया है. अखबार में हर रोज बहुत भयानक कहानियां छप रही हैं. उससे ज्यादा क्या लिखेंगे. यात्रा-वृत्तांत के जरिए आप समाज और समय से संवाद करते हैं. इसके जरिए एक समाज का विश्लेषण करते हैं, जो दूसरे समाज के लिए उत्सुकता का विषय हो सकता है.

तो आप यह मान रहे हैं कि कहानी यथार्थ से दूर हो रही है?

हां, ऐसा है. कहानी के फॉर्मेट में कोई खास बदलाव नहीं आया है. बौद्घिकता और छद्म चीजों को आप जिस तरह से कहानियों में ला रहे हैं, उससे चीजें यथार्थ से दूर होती जा रही हैं. भाषा और शैली के चमत्कार को ज्यादा तवज्जो दिए जाने से वास्तविक चीजें कहानी से दूर हो गईं. इससे बेहतर होगा कि आप यात्रा संस्मरण या अपने अनुभव के आधार पर कुछ लिखने की कोशिश करें.

आपका अगला यात्रा-वृत्तांत किन इलाकों पर आधारित होगा?

यह बड़ा ही टेढ़ा सवाल है. असल में हो यह रहा है कि किसी भी इलाके के बारे में जानना चाहते हैं तो आप गूगल पर टाइप करते हैं तो वहां के बारे में बहुत सारी जानकारियां सामने आ जाएंगी. फाटो भी मिल जाएंगे. बहुत प्रकट चीजों के बारे में लिखने का कोई मतलब नहीं है. पहले मैंने सोचा कि चीन के बारे में लिखा जाए. फिर सोचा कि दक्षिण कोरिया या म्यांमार जाया जाए. लेकिन अब मैं सोचता हूं कि अफगानिस्तान जाऊं. वहां से सड़क के रास्ते तुर्कमेनिस्तान जाऊं. वहां से मध्य एशिया. दुसांबे यानी तजाकिस्तान तक जाऊं. इसका जिक्र महाभारत में बहुत बार आया है. मैं इन यात्राओं के जरिए एक सांस्कृतिक नक्शा खींचने की कोशिश करना
चाहता हूं.

गर्व के पर्व का पासा

बिहार में शताब्दी वर्ष समारोह के आयोजन के जरिये प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर से अपने विरोधियों को पटखनी देने और खुद को मजबूत करने की एक नायाब कोशिश की है. निराला की रिपोर्ट

पहली बार बिहार का अपना राज्यगान. अलग से एक प्रार्थना गीत भी. दो सौ से अधिक किताबों के जरिये बिहार के इतिहास, भूगोल, संस्कृति आदि के नये सिरे से दस्तावेजीकरण की कोशिश. पटना के गोलघर, बिहार के पर्यटन स्थल, कई अहम व्यक्तित्वों पर वृत्तचित्रों का निर्माण. नामचीनों के साथ कई अनाम-गुमनाम रचनाधर्मियों को सम्मान. नीली रोशनी से सराबोर राजधानी पटना के अलग-अलग इलाकों में स्थित सरकारी भवन. कुछ निजी प्रतिष्ठान-मकान भी. और इन सबको मिलाकर पटना के गांधी मैदान में तीन दिन तक बिहारी जोश-जुनून, उमंग-उत्साह का यादगार मेला. कई मेलों के राज्य में अपने किस्म का पहला मेला. छठ, उर्स, बौद्ध उत्सव, सोनपुर आदि से अलग छवि का.

गैलरियों में सजी बिहार की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक झलक को देखने, सांस्कृतिक आयोजनों का मजा लेने हर रोज हजारों लोग धूल-धक्कड़ में धक्का-मुक्की कर यहां पहुंचते रहे. कुछ उदित नारायण, कैलाश खेर जैसों का आकर्षण भी था. कुछेक के लिए व्यंजन मेले में तरह-तरह के बिहारी खान-पान का भी. शास्त्रीय और हिंदुस्तानी संगीत के रसिकों के लिए गांधी मैदान से सटे श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में दो दिनों तक देश के नामचीन कलाकारों का जुटान हुआ. आम तौर पर बड़े आयोजनों में भी खाली रहनेवाले इस सभागार में सीट न मिल पाने की चिंता में शाम से ही लोगों की भीड़ उमड़ती रही. मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज, बांसुरीवादक हरिप्रसाद चैरसिया, गीतकार जावेद अख्तर जैसे लोगों की जुगलबंदी का नायाब रूप दिखा. राजधानी पटना तीन दिनों तक ऐसे ही जश्न की खुमारी में रहा. जश्न-ए-बिहार का यह दौर सिर्फ राजधानी तक सीमित नहीं रहा. प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में भी ऐसे ही आयोजन, उत्सव चले. बिहारी उपराष्ट्रीयता की एक नयी लहर के साथ. इन नायाब आयोजनों के जरिये बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लाखों बिहारियों को कायल करने के साथ ही अपने राजनीतिक विरोधियों से भी अपनी कलाबाजी का लोहा मनवाते रहे.

22 मार्च के बिहार शताब्दी वर्ष समारोह के प्रारंभिक दिन के विशाल उत्सव की चर्चा से पहले कुछ फुटकर बातों पर गौर करते हैं. उस रोज सुबह-सुबह मोबाइल पर दो मैसेज आये. पहला राज्य के सीमावर्ती फारबिसगंज इलाके से राष्ट्रीय जनता दल के एक नेता का था. कुछ शेरो-शायरी के बाद एक वाक्य- ‘बी प्राउड टू बी ए बिहारीः हैप्पी बिहार दिवस.’ दूसरा बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी से जुड़े एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का -‘बिहार स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर अपने गौरवशाली इतिहास को याद करें बिहारी. बधाई.’ इसी रोज शताब्दी समारोह शुरू होने के पहले गांधी मैदान से कुछ दूर एक और खास आयोजन भी हुआ. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-माले के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन और इंकलाबी नौजवान सभा द्वारा यहां आयोजित सेमिनार का विषय था- शताब्दी वर्ष में बिहारः संघर्ष की विरासत, बदलाव की चाहत. भाकपा माले के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य समेत कई अहम वक्ताओं की इसमें उपस्थिति रही. बिहार सरकार को किसी न किसी बहाने, मौके-बेमौके निशाने पर लेने वाले अर्थशास्त्री प्रो. नवलकिशोर चौधरी भी थे इसमें. इस सेमिनार में सरकार की जमकर आलोचना हुई.यह तय-सा भी था.

नीतीश जानते हैं कि जाति की राजनीति के विस्तारीकरण से एक पारी तो खेली जा सकती है लेकिन आगे विकास के साथ कुछ और ताने-बाने भी बुनने होंगे

प्रशासनिक आयोजन का तमगा देकर, सरकारी शताब्दी वर्ष समारोह कहकर इसकी आलोचना किए जाने के बावजूद मोबाइल में पड़े दो मैसेज और माले के सेमिनार का आयोजन, शताब्दी वर्ष और बिहारी अस्मिता के अभियान पर एक प्रकार की मुहर लगा देते हैं. संभव है कि नीतीश कुमार को टुकड़े-टुकड़े में आते इस तरह की असहमति के स्वरों की जानकारी न हो लेकिन यह अहसास अच्छे से है कि ‘बिहारीपन’ का गौरवबोध अथवा ‘बिहारी होने’ के भाव को उभारना राजनीति में उन्हें और मजबूत कर सकता है.

करीब डेढ़ साल पहले बिहार में दूसरी पारी शुरू करने वाले नीतीश जब 22 मार्च की शाम पांच बजे मुख्य समारोह में पहुंचे तो उन्होंने अपने संबोधन में ‘बिहारीपन’ को परवान चढ़ाने की हरसंभव कोशिश की. इस कोशिश में उन्होंने बिहार के सौ साल की यात्रा को अपनी छह साल की परिधि में भी बांधा. अपने पूर्ववर्ती लालू प्रसाद की राजनीति के ताबूत में एक और गहरी कील ठोंकने की कोशिश की. परंपरागत तौर पर केंद्र पर निशाना साधा और मौका देख कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी सांकेतिक तौर पर लपेटे में लिया.

नीतीश ने अपने संबोधन में बिहारी होने का मतलब ‘पहले अपमान- अब शान’ की बात को अलग-अलग लहजे में, अलग-अलग वाक्यों के साथ कई बार कहा. दो दिन पहले उन्होंने जिस अंदाज में देश की राजधानी दिल्ली में जाकर हुंकार भरी थी कि ‘यदि बिहारी काम ठप कर दें तो दिल्ली ठहर जाए’, कुछ-कुछ उसी लहजे में जनसमुदाय को भावनात्मक तौर पर नीतीश ने फिर से ललकारा कि अब बिहारियों को हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठना होगा बल्कि अपना हक लेना होगा. केंद्र को जवाब देना होगा. सांकेतिक तौर पर आगामी लोकसभा चुनाव में केंद्र सरकार को बेदखल करने का आग्रह भी किया नीतीश ने और मौका पाकर यह भी कहा कि बिहार की जो छवि हाल में बनी है, उसके लिए हमने पैसा देकर या किराये पर कोई ब्रांड अंबेसडर नहीं रखा है. यह बिहारियों ने मुंहामुंही किया है. यह कहते हुए नीतीश साफ तौर पर अमिताभ बच्चन को गुजरात का ब्रांड अंबेसडर बनाए जाने की ओर इशारा कर रहे थे.
उस रोज हजारों की भीड़ में नीतीश कुमार जब बिहारीपन जगाने और बिहारी उपराष्ट्रीयता को पिछले छह-सात सालों में स्थापित कर देने का असल सूत्रधार खुद को घोषित कर रहे थे, तब वहां मौजूद कुछेक लोग उनके इस राजनीतिक हुनर के कायल हुए जा रहे थे. यह याद करते हुए कि कैसे लालू प्रसाद की बिछाई जातीय राजनीति की बिसात पर ही दलित-महादलित, पिछड़ा-अतिपिछड़ा आदि समीकरणों के जरिये पटखनी देने के बाद अब नीतीश बहुत ही चतुराई से लालू के ही बिहारीपन को व्यवस्थित और सुंदरतम रूप देकर आगे उसकी फसल काटने की तैयारी में लग गए हैं.

बहुत से लोग अब भी यह मानते हैं कि अरसे बाद राष्ट्रीय स्तर पर बिहारीपन की ठेठ शैली को एक अलग पहचान के साथ चर्चा में लाने और जाने-अनजाने स्थापित करने की शुरुआत लालू प्रसाद यादव ने ही की थी. संसद भवन से लेकर बड़े से बड़े सार्वजनिक आयोजनों में ठेठ गंवई अंदाज में बोलना, मीडिया के जरिये बिहार की एक बोली को बिहारी भाषा के रूप में स्थापित करवाना, कुरताफाड़ होली खेलना, बिहारी लोकगीतों के गायकों को स्थापित करवाना, बिहारी मूल पहचान की नृत्यशैली लौंडा नाच, बिरहा-चैता गान आदि को प्रतिष्ठित करवाना, खानपान में मट्ठा, लिट्टी-चोखा, सत्तू आदि के साथ नशे में खैनी की ब्रांडिंग करना. यह सब लालू ने ही एक जमाने में मजबूती से किया था. बिहारीपन और लालू एक-दूजे के पर्याय भी बने. अब उसे सुंदर और सुव्यवस्थित रूप देकर नीतीश दो दशक बाद की नयी पीढ़ी में मजबूती से स्थापित होने की प्रक्रिया में लगे हैं.

बिहारी अस्मिता की बिसात पर लालू को दूर ठेल देने की इस कवायद का असर नीतीश को अच्छे से पता है. वे जानते हैं कि बिहार की आबादी में करीब 58 प्रतिशत युवा हैं. वे यह भी जानते हैं कि जाति की राजनीति के विस्तारीकरण से एक पारी तो खेली जा सकती है लेकिन आगे की राजनीति के लिए विकास के साथ इसके इर्द-गिर्द ही कुछ और ताने-बाने भी बुनने होंगे. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं कि बिहारी अस्मिता एक ऐसा मसला है, जो कई वर्गों को एक साथ रोमांचित कर सकता है. देश के कोने-कोने में फैले कामगारों के साथ ही संभ्रांतमिजाजियों को भी. जाति की राजनीति से नाराज और भूमि सुधार आदि के आरंभिक एलान से खफा सवर्णों के खेमे को भी.

उपराष्ट्रीयता के उभार का इस्तेमाल गरीबों के उत्थान में भी किया जा सकता है बशर्ते आयोजन के बहाने अतीत में ही नहीं भविष्य में भी झांका जाए

नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग कर एक ऐसी ही सधी हुई राजनीतिक चाल और भी चल चुके हैं जो विरोधी दलों को न तो उगलते बन रही है और न ही निगलते. आलोचना के अलग-अलग बिंदु और असहमति के भिन्न-भिन्न स्वरों के बाद भी उस अभियान पर अमूमन सभी दलों को मुहर लगानी पड़ी. विशेष राज्य के दर्जे पर तो एक बड़ा सवाल यह भी उठ सकता है कि नीतीश जब खुद केंद्र में मंत्री थे तो क्यों इस पर कोई ईमानदार पहल नहीं कर सके? लेकिन बिहारी अस्मिता वाले राजनीतिक पत्ते में तो ऐसा कोई सवाल भी नहीं है. एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डॉ डीएम दिवाकर कहते हैं कि उपराष्ट्रीयता का उभार अच्छी चीज है और इसका इस्तेमाल गरीबों के उत्थान में भी किया जा सकता है बशर्ते 100 साला आयोजन को अतीत का आकलन करने के साथ भविष्य की रूपरेखा तैयार करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाए. दिवाकर की तरह कई लोग अलग-अलग बात कहते हैं लेकिन बिहार के सौ साल के आयोजन और बिहारी उपराष्ट्रीयता के अभियान पर ज्यादा सवाल खड़े नहीं कर पाते. और यही बात नीतीश को एक नई मजबूती देती नजर आती है.

अंत में बात आयोजन से जुड़े कुछ ऐसे बिंदुओं पर जिन पर इस आयोजन के वक्त यदि थोड़ा ध्यान दिया जाता तो यह कुछ और यादगार हो सकता था. मसलन सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक, भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में प्रदेश के दस्तावेजीकरण का काम काफी महत्वपूर्ण है लेकिन इसकी कुछ संभावनाएं यदि बिहार सरकार के ही संस्थानों – बिहार राष्ट्र भाषा परिषद और बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी – के जरिये भी निकाली गई होतीं तो यह इन मृतप्राय संस्थानों के लिए संजीवनी की तरह होता. परिषद और अकादमी का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है और यहां से एक से बढ़कर एक दस्तावेजों का प्रकाशन होता रहा है. लेकिन पिछले करीब दो दशक से ये बेहद बेहाली वाले दौर में है.

बिहार के शताब्दी मेले में व्यंजन मेले का खासा आकर्षण था लेकिन उद्घाटन वाले दिन यानी 22 मार्च को व्यंजन मेले के कई स्टॉल खाली पड़े रहे. जबकि बिहार में इतने किस्म के खास व्यंजन अलग-अलग क्षेत्र में प्रसिद्ध हैं कि सबका एक-एक स्टॉल लगने पर भी व्यंजन मेला छोटा पड़ सकता था. औरंगाबाद के अंबा की गुड़ही मिठाई, खरांटी-नालंदा का पेड़ा, छेनामुरगी आदि को परे भी कर दें तो ब्रांड बिहार के तौर पर स्थापित गया के तिलकुट, अनरसा और रामदाना लाई की कमी यहां खलती रही.

मुख्य समारोह स्थल पर जैसे नजारे दिखे और जिस तरह की प्रस्तुतियां हुईं, वे समग्रता में बिहार की यात्रा का उतना प्रतिनिधित्व नहीं कर सकीं. बिहार की यात्रा को दिखाने के लिए जो लेजर शो रोजाना के आकर्षण का केंद्र था. इसमें मौर्यकाल, चाणक्य, बिंबिसार, बुद्ध आदि के गौरवगान के बाद आजादी के बाद की यात्रा में डॉ राजेंद्र प्रसाद, जेपी के बाद सीधे वर्तमान सरकार के नायकत्व पर पहुंचना थोड़ा अखरता रहा. कम से कम समाजवादी धारा के ही कर्पूरी ठाकुर जैसे महानायक को तो प्रमुखता से रेखांकित किया जाता. या इस शो में पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की एक झलक तो दिखती!.

अंत में एक बात झारखंड और आदिवासियों के संदर्भ में. अव्वल तो यह कि 11 साल पहले अलग हुए झारखंड को परे कर बिहार को देखना संभव ही नहीं. ऊपर से बिहार के सौ-साला जश्न में आदिवासियों को एकदम से महत्व नहीं देना, आयोजकों की समझ पर सवाल ही खड़ा करता है. बिहार सरकार विशेष राज्य दर्जा अभियान में खुद बता रही है कि यहां आदिवासी अच्छी संख्या में हैं. राज्य में उनके लिए दो विधानसभा सीटें भी आरक्षित हैं. तो समारोह स्थल पर आदिवासियों के नायक बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हो आदि दिखने चाहिए थे. इन आदिवासी महानायकों को अगर झारखंड का मानकर नजरअंदाज भी किया गया होगा तो तिलका मांझी की झलक तो दिखनी ही चाहिए थी, जिनके नाम पर भागलपुर में विश्वविद्यालय है. झारखंड बंटवारे के बाद जो आदिवासी बिहार में रह गये हैं, उनके नायकत्व, उनकी सांस्कृतिक पहचान को हाशिये पर तो नहीं ठेला जा सकता. कम से कम एक छोटा आयोजन ही सही, उनके लिए, उनके द्वारा, उनके नाम पर तो हो जाता…!

कौन-सा मंतर भजे भाजपा

भाजपाई पिरामिड में समस्या जड़ की बजाय शीर्ष से शुरू होती है. देश में प्रधानमंत्री का एक पद है और इस पद के इर्द-गिर्द ही भाजपा का मर्ज और इलाज दोनों घूम रहे हैं. इसी पद की अदम्य लालसा ने लालकृष्ण आडवाणी को 85 बसंत बाद भी गतिवान बनाए रखा है. लेकिन उनकी इस गतिशीलता ने उस पार्टी की गति बिगाड़ रखी है जिसे खड़ा करने का श्रेय भी काफी हद तक उन्हें ही जाता है. कांग्रेस नीत केंद्र सरकार की विश्वसनीयता निम्नतम धरातल को छू रही है. सीडब्ल्यूजी, 2जी, आदर्श घोटाला और अब कोयले में हाथ काला. हाल के पांच में से चार विधानसभा चुनावों में इसकी दुर्गति हो चुकी है. कम-से-कम तीन सहयोगी (टीएमसी, एनसीपी, डीएमके) किसी भी समय सरकार की बांह मरोड़ने को तैयार बैठे हैं. ये स्थितियां किसी भी विपक्ष के लिए आदर्श कही जाएंगी, सत्ता में वापसी के नजरिये से भी और सरकार को नीचा दिखाने के लिहाज से भी. लेकिन हमारी मुख्य विपक्षी पार्टी इस अस्थिर दौर में भी क्या एक विश्वसनीय विकल्प है? वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी इसका जवाब देती  हैं, ‘आज की स्थिति तो ऐसी नहीं है. आज भाजपा से जनता के बीच जो सिग्नल जा रहा है वह कलह का सिग्नल है. झारखंड में अंशुमन मिश्रा का मसला हो या कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा का. हर तरफ से एक ही सिग्नल मिल रहा है कि पार्टी में घमासान मचा हुआ है. गुटबाजी चरम पर है.’

नीरजा का इशारा भाजपा की दुखती रग की ओर है. आडवाणी की अदम्य इच्छा से जो समस्या शुरू होती है वह नरेंद्र मोदी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह और पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी की महत्वाकांक्षाओं से टकरा कर इतनी जटिल हो जाती है कि नेतृत्व के मसले पर हर नाम के साथ तीन-चार किंतु-परंतु जुड़ जाते हैं. जनता के बीच भाजपा की दशा उस सेना की बन गई है जिसके सेनापति का पता नहीं और सारे सिपहसालार एक-दूसरे का सर काट लेने पर आमादा हैं.

2004 में एनडीए की अविश्वसनीय हार के बाद ही आडवाणी के सामने सक्रिय राजनीति से अलग एक वैकल्पिक भूमिका चुनने का विकल्प था. लेकिन उन्होंने अपने लिए कुछ अलग ही योजना बना रखी थी. 2004 के बाद वाले आडवाणी पहले से अलग थे. उनके सपने प्रधानमंत्री के पद तक जाते थे और उस पद तक जाने का रास्ता बताने वाले विश्वस्तों का एक गुट था. उसकी राय ही उनके लिए सर्वोपरि थी. यह समूह ही उन्हें पाकिस्तान यात्रा, जिन्ना की मजार पर बयान से लेकर समय-समय पर रथ यात्रा तक के सुझाव देता रहा. जिन्ना पर बयान की कीमत उन्हें पार्टी का अध्यक्ष पद गंवा कर चुकानी पड़ी.

दूसरी पीढ़ी (जेटली, सुषमा) और सत्तर पार वाली पीढ़ी (सिन्हा, जोशी) के बीच का द्वंद्व भाजपा के लिए एक बड़ा सिरदर्द है. दोनों एक-दूसरे की राह काटते हैं

2009 के लोकसभा चुनावों में किसी अन्य चेहरे के अभाव और आम सहमति के आधार पर आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा और एनडीए चुनाव में उतरे. लेकिन जनता ने उनके प्रेरणाविहीन और बुजुर्ग नेतृत्व को नकार दिया. एनडीए का यह सबसे बुरा प्रदर्शन था. बावजूद इसके आडवाणी ने हथियार नहीं डाले, जबकि उम्र भी अब उनके हाथ से निकल चुकी थी. पिछले साल केंद्र सरकार के व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ वे एक और रथयात्रा पर निकल पड़े. इस बार उन्हें कार्यकर्ताओं और पार्टी का समर्थन हासिल करने के लिए नागपुर में माथा टेकना पड़ा. इतनी हील-हुज्जत के बावजूद आडवाणी ने खुद को उस परम पद की दौड़ से बाहर नहीं किया. उन्होंने हमेशा उस सीधे से सवाल का टेढ़ा जवाब दिया कि वे प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैं या नहीं. उनके इस रुख से न सिर्फ पार्टी बल्कि मीडिया, संघ और निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच भी यह संदेश गया कि उन्होंने अपनी इच्छा को तिलांजलि नहीं दी है. वरिष्ठ पत्रकार अशोक मलिक बताते हैं, ‘आज की स्थिति में न तो संघ उन्हें चाहता है न ही भाजपा में कोई उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ना चाहता है. ले-देकर आडवाणी की उम्मीद साठोत्तरी पीढ़ी के नेताओं से है (जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा) जो अपने से जूनियर नेताओं के नेतृत्व में काम करने की बजाय आडवाणी को आगे कर सकते हैं. और बदले में उन्हें महत्वपूर्ण पद मिलने की पूरी गारंटी है.’

आडवाणी का सबसे बड़ा विरोध उन्हीं के गृहराज्य से हो रहा है. मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को अब और ज्यादा दबाने के मूड में नहीं हैं. कॉरपोरेट मीटिंग हो, सद्भावना सभाएं हों या फिर टाइम और कुछ भारतीय पत्रिकाओं में पीएम पद का सबसे लोकप्रिय उम्मीदवार जैसी पीआर कसरतें, मोदी अपनी उपस्थिति और स्वीकार्यता बढ़ाने का कोई मौका छोड़ नहीं रहे हैं. मोदी को लेकर पार्टी में दो तरह की धाराएं हैं. उनकी समर्थक धारा का मानना है कि पार्टी के सबसे लोकप्रिय उम्मीदवार को कब तक पीछे रखा जाएगा. लेकिन दूसरी विचारधारा का मत कहीं ज्यादा वास्तविक और व्यावहारिक है. इसके मुताबिक मोदी ने अभी तक गुजरात के बाहर कहीं भी खुद को साबित नहीं किया है. और गुजरात में भी उनकी सफलता के पीछे 2002 के बाद उत्पन्न खतरनाक ध्रुवीकरण की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. चौधरी कहती हैं, ‘दिसंबर में होने वाले गुजरात विधानसभा के चुनावों के बाद राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का पदार्पण हो सकता है. हालांकि यह इस पर निर्भर करेगा कि वे इस बार गुजरात में कैसा प्रदर्शन करते हैं.’ मोदी के लिए परेशानी यह है कि अब उनका विरोध संघ के भी एक हिस्से से होने लगा है. उसकी चिंता यह है कि उनकी मनमानी शैली न तो पार्टी के हित में है न ही संघ की विचारधारा के हित में.

पार्टी के सबसे बुजुर्ग नेता और सबसे लोकप्रिय नेता की स्थिति के मद्देनजर पार्टी में दो सबसे स्वाभाविक चेहरे सामने आते हैं- सुषमा स्वराज और अरुण जेटली. इन दोनों ने संसद में अपने पूर्ववर्तियों (आडवाणी और जसवंत सिंह) की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है. सरकार को अलग-अलग मुद्दों पर घेरने से लेकर कई मुद्दों पर विरोधी पार्टियों को अपने साथ खड़ा करने में भी दोनों सफल रहे हैं. हालांकि दोनों की अपनी-अपनी सीमाएं हैं. सुषमा स्वराज ने 2004 में अपने मुंडन के एलान के बाद से एक लंबा सफर तय किया है. इस दौरान उन्होंने अपनी एक उदारवादी छवि का निर्माण भी किया है. लेकिन उनकी समस्या यह है कि संघ में उन्हें आज भी बाहरी के तौर पर ही देखा जाता है. उनका समाजवादी अतीत संघ के जेहन से मिट नहीं पा रहा है. अन्यथा एक कुशल वक्ता और भीड़ को अपनी तरफ खींच लाने वाली नेताओं की जमात में वे सबसे आगे हैं. इसके अलावा नीतिगत मसलों पर भी कई जगह उनके हाथ तंग हैं, विशेषकर आर्थिक मोर्चे पर.

अरुण जेटली दूसरी समस्या के शिकार हैं. उनकी छवि हमेशा से ही उदारवादी रही है. दूसरी पार्टियों के बीच भी वे काफी स्वीकार्य माने जाते हैं. उनकी यह छवि एनडीए को साधे रखने में सहायक साबित हो सकती है. लेकिन वे कभी भी मास लीडर बन कर नहीं उभरे हैं. यह बात उनके खिलाफ जाती है. हालांकि पार्टी की नीतियों और रणनीतियों को बनाने में उनकी भूमिका हमेशा अग्रणी रही है, इसलिए उन्हें दरकिनार कर पाना बहुत मुश्किल है. जेटली के पक्ष में एक बात और जाती है. यदि किन्हीं वजहों से मोदी अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाते हैं तो वे जेटली को अपना समर्थन दे सकते है. यह बात जगजाहिर है कि जेटली-मोदी की आपसी समझदारी बहुत अच्छी है.

भाजपा की समस्या यह है कि चुनाव से पहले वह अपने झगड़े निपटा नहीं सकती और बिना झगड़ा निपटाए जनता उसपर विश्वास नहीं कर सकती

दूसरी पीढ़ी के इन नेताओं की राह में अड़चन सत्तर पार वाली पीढ़ी से है. सरकार बनने की सूरत में यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह या फिर मुरली मनोहर जोशी इनके नाम पर अड़ंगा लगा सकते हैं.ऐसी स्थिति में आडवाणी एक बार फिर से प्रासंगिक हो जाएंगे.

यह तो तब की स्थिति है जब भाजपा और संघ को अपना नेता चुनने की आजादी हो. लेकिन वर्तमान इसकी इजाजत नहीं दे रहा. आज इन दोनों से इतर एक तीसरा पक्ष भी उतना ही मजबूत हो चुका है, उसका नाम है एनडीए. अशोक मलिक बताते हैं, ‘आज सरकार बनने की स्थिति में पीएम पद तय करने वाला तीसरा पक्ष एनडीए भी है. अब अकेले संघ और भाजपा नेता का चुनाव नहीं कर सकते हैं. बिना उसकी सहमति के किसी नाम पर मुहर नहीं लग सकती.’ एनडीए के नजरिये से एक और बात काफी महत्वपूर्ण है. ज्यादातर राज्यों के चुनावों में जहां भी भाजपा अपने सहयोगियों के साथ चुनाव लड़ी है वहां सहयोगी मजबूत हुए हैं और भाजपा की हालत कमजोर हुई है. पंजाब में अकाली मजबूत हुए, बिहार में नीतीश कुमार को कोई नजरअंदाज कर नहीं सकता. ऐसे में अगर भाजपा अपनी मौजूदा सौ-सवा सौ सीटों तक ही अटकी रही तो संभव है कि एनडीए के किसी अन्य घटक दल के नेता के नाम पर भी सहमति बन जाए. अशोक मलिक के शब्दों में, ‘जिन भी जगहों पर चुनाव हो रहे हैं, वहां कांग्रेस के खिलाफ क्षेत्रीय पार्टियां ही मजबूत होकर उभरी हैं. सिर्फ उन्हीं जगहों पर भाजपा बढ़त में है जहां उसका कांग्रेस से सीधा मुकाबला है. भाजपा को हर हालत में एनडीए का दायरा फैलाना होगा और अपनी सीटों को कम- से-कम 180 तक ले जाना होगा. तभी वह अपने नेता को पीएम पद पर बिठा सकती है.’

मगर एनडीए को लेकर एक बड़ी दिक्कत और है. आज उसका कुनबा जदयू, अकाली और शिवसेना तक सिमट कर रह गया है. एक जदयू को छोड़ दें तो बाकी दोनों कमोबेश कट्टरपंथी विचारधारा वाली पार्टियां हैं. 90 के दशक में भी, जब एनडीए अस्तित्व में आया था, अगर दक्षिण भारत की दो पार्टियों को छोड़ दिया जाए (एआईएडीएमके और डीएमके   जिनके लिए मुसलिम वोट बैंक मजबूरी नहीं है) तो अन्य किसी क्षेत्रीय पार्टी ने भाजपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं किया था. अटल बिहारी वाजपेयी के प्रभाव वाले दौर में 24 पार्टियों का जो उस पर गठबंधन तैयार हुआ था उसके ज्यादातर सहयोगी चुनाव के बाद इसमें शामिल हुए थे. इसकी सीधी-सी वजह है उनका मुसलिम वोट बैंक. नायडू हों, पटनायक हों, पासवान हों या ममता बनर्जी हों. मुसलिम वोटों की मजबूरी चुनाव से पहले इन्हें भाजपा के पाले में आने नहीं देगी. चौधरी बताती हैं, ‘चुनावों से पहले किसी भी सहयोगी का एनडीए के साथ आना मुश्किल है. उनके मुस्लिम वोट की मजबूरी इसमें बाधा बनेगी. इसलिए भाजपा को अकेले दम पर 200 सीटों के आस-पास पहुंचना होगा. और इसके लिए अपनी लड़ाई को खत्म करना उनकी पहली जरूरत होगी.’

तो क्या ऐसा कोई जादुई फाॅर्मूला हो सकता है जिससे शीर्ष पर मचा घमासान थम जाए? किसी भी फाॅर्मूले की सबसे पहली मांग होगी अपनी आकांक्षाओं का त्याग, पूरा नहीं तो कुछ हद तक ही सही. जानकार मानते हैं कि कुछ भी करके अगर संघ, गडकरी और भाजपा नेतृत्व का एक हिस्सा आडवाणी को समझाने में कामयाब हो जाएं तो पार्टी की आधी से ज्यादा समस्याओं का निराकरण हो सकता है. क्योंकि अभी जो आडवाणी अपनी सारी ऊर्जा जोड़-तोड़ और उठापटक की राजनीति में लगाते हैं उसका उपयोग फिर पार्टी के हित में किया जा सकेगा. मगर इसके लिए पार्टी और संघ को उन्हें भी एनडीए की सरकार बनने की स्थिति में कुछ-कुछ सोनिया गांधी की वर्तमान स्थिति जैसे पद का वादा करना होगा. इसके बाद बारी आती है मोदी की. स्वीकार्यता के स्तर पर मोदी को अभी साबित करना है. सीधे परम पद की रेस में जाना उनके राजनीतिक भविष्य के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकता है. अगर वे पहले ही प्रयास में असफल रहते हैं तो उनका राजनीतिक भविष्य हमेशा के लिए अधर में लटक सकता है. मोदी की तमाम प्रशासनिक खूबियों के बावजूद एनडीए के सहयोगियों आदि के बीच उनकी स्वीकार्यता एक बड़ी समस्या है. अगर वे पहले से ही इस बात को समझ जाते हैं तो यह उनकी पार्टी के लिए संजीवनी साबित हो सकता है. तो उन्हें सरकार बनने की स्थिति में किसी ऐसे पद का वादा करके समझाया जा सकता है जो केंद्रीय राजनीति में उनकी स्वीकार्यता को बढ़ाकर उनके लिए आगे का रास्ता तैयार करे. यह पद उपप्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक कुछ भी हो सकता है. यहां से भाजपा के सामने उस चेहरे की लड़ाई शुरू होती है जिसे आगे रखकर 2014 के समर में उतरना है. गडकरी ने खुद को तो इस दौड़ से बाहर रखने का पहले ही एलान कर रखा है. इसलिए वे आडवाणी और संघ के सहयोग से इस शीर्ष पद के लिए मची धींगामुश्ती को विराम देने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं. लेकिन सबसे पहला और बड़ा सवाल आडवाणी के समझने का ही है.

हालांकि यह न तो कोई जादुई फॉर्मूला है और न ही राजनीति में इतनी सरलता से झगड़े निपटाए जाते हैं. ऊपर से इन सबके साथ एक विकट प्रश्न है सबका एक ही पीढ़ी से आना. ऐसे में इनके बीच एक-दूसरे के प्रति आदर भाव का अभाव भी इन्हें एक मंच पर लाने में बाधा उत्पन्न करता है और आगे भी करेगा. नीरजा चौधरी इसे इस तरह समझाती हैं, ‘राजनेता जनता की नब्ज को बहुत जल्दी समझ लेते हैं. सरकार बनने की स्थिति में वे किसी-न-किसी समझौते पर पहुंच ही जाएंगे. लेकिन सरकार बनने से पहले ऐसा कोई समझौता शायद ही हो सके.’ यही भाजपा की समस्या है. पहले वे अपने झगड़े निपटा नहीं सकते और बिना झगड़ा निपटाए जनता उस पर विश्वास नहीं कर सकती.

मोहन प्यारे!

यह नितिन गडकरी कौन है? 2009 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन बहुत खराब रहा था. इसके बाद राजनाथ सिंह की जगह पार्टी अध्यक्ष के रूप में जब महाराष्ट्र के इस नेता का नाम चला तो हर तरफ यही सवाल पूछा जा रहा था. उस वक्त महाराष्ट्र के बाहर न तो भाजपा के कार्यकर्ता गडकरी को जानते थे और न ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक. ऐसे में देश के मुख्य विपक्षी दल के अध्यक्ष के तौर पर गडकरी का नाम हर किसी को चौंका रहा था.

दिल्ली में बैठे पार्टी के वरिष्ठ और दूसरी पांत के नेता गडकरी को जानते तो थे लेकिन वे इस सवाल को घुमा-फिराकर जरा दूसरे ही लहजे में कह रहे थे. इस लहजे में जानने से ज्यादा यह बताने का भाव था कि उनके सामने एक सीमित क्षेत्रीय पहचान और अनुभव वाले नेता की कोई हैसियत ही नहीं है. महाराष्ट्र में गडकरी की पहचान एक ऐसे लोक निर्माण विभाग मंत्री की रही है जिसने कई फ्लाईओवर बनवाए और जो एक बार भी सीधे तौर पर जनता द्वारा नहीं चुना गया. वे विधान परिषद के सदस्य रहे थे. ऐसे में दिल्ली के तथाकथित राष्ट्रीय नेता पार्टी के अंदर और बाहर इस बात को जमकर उठा रहे थे कि इस तरह के व्यक्ति को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का मतलब है पार्टी को और पीछे ले जाना. इनके मुताबिक गडकरी जैसे ‘बाहरी’ व्यक्ति को तो तीन साल पार्टी को समझने में ही लग जाएंगे.

गडकरी को लेकर उठ रहे इन तमाम सवालों के बावजूद भाजपा की कमान उन्हीं के हाथों में सौंप दी गई. इस तरह नागपुर और आस-पास के इलाकों में कारोबार के साथ-साथ महाराष्ट्र में भाजपा की राजनीति करने वाले गडकरी दिल्ली आ गए. इस बात पर किसी को जरा भी संदेह नहीं था कि गडकरी को यह कुर्सी संघ की कृपा से ही मिली है और संघ ने इस मामले में दिल्ली केंद्रित पार्टी नेताओं की राय को बहुत तवज्जो नहीं दी थी. गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद भी उनकी पहचान और हैसियत को लेकर सवाल उठाने वाले नेता संतुष्ट नहीं हुए. अब वे यह कहने लगे कि संघ के आशीर्वाद से गडकरी अध्यक्ष तो बन गए हैं लेकिन देखते हैं कि वे कैसे सफल होते हैं.

इसके बाद से लगातार गडकरी और दिल्ली की राजनीति के धुरंधर माने जाने वाले भाजपा के तथाकथित राष्ट्रीय नेताओं के बीच शह और मात का खेल चलता रहा है. इसमें कभी गडकरी को मात मिली तो कभी उनके खाते में सफलता भी आई. हाल-फिलहाल की घटनाओं पर नजर डालें तो भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी के व्यापक अभियान के बावजूद उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम घोटाले में आरोपित बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने, कर्नाटक में येदियुरप्पा की चुनौती से पार न पा सकने और कथित तौर पर पैसे लेकर राज्यसभा का टिकट अंशुमान मिश्रा को देने के मामले में गडकरी की काफी किरकिरी हुई है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भाजपा के खराब प्रदर्शन का ठीकरा भी उनके सर ही फोड़ा जा रहा है.

गडकरी अपने पहले कार्यकाल का अधिकांश हिस्सा गुजारने के बावजूद पार्टी की आंतरिक कलह और गुटबाजी दूर नहीं कर पाए हैं

तो ऐसे में अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या गडकरी को बतौर भाजपा अध्यक्ष दूसरा कार्यकाल मिलेगा. हर कोई इस तथ्य से वाकिफ है कि गडकरी को कार्यकाल विस्तार तब ही मिल सकता है जब एक बार फिर संघ उन पर भरोसा करे. लेकिन क्या इन गंभीर आरोपों के बावजूद संघ का भरोसा अब भी गडकरी पर कायम है? या यों कहें कि क्या संघ एक बार फिर गडकरी पर भरोसा करने का जोखिम उठाने को तैयार है?

अगर गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद से अब तक की घटनाओं और मौजूदा परिस्थिति में भाजपा व संघ के अंदर से आ रही सूचनाओं को जोड़कर देखा जाए तो एक तस्वीर उभरती दिखती है. यह तस्वीर बताती है कि संघ फिर से वैसी स्थिति नहीं पैदा होने देना चाहता है जैसी अटल बिहारी वाजपेयी के समय में हो गई थी. जब वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने पार्टी को कई मामलों में संघ के प्रभाव से मुक्त कराने का काम किया था. लेकिन उनके बाद चुनावी राजनीति में लगातार पिटती भाजपा ने एक बार फिर से संघ को खुद पर पकड़ मजबूत करने का अवसर दे दिया. संघ ने इसकी शुरुआत 2009 में गडकरी को अध्यक्ष बनाकर कर दी थी. उस समय से लेकर अब तक संघ ने पार्टी पर लगातार अपनी पकड़ मजबूत की है. उमा भारती से लेकर संजय जोशी को पार्टी में वापस लाने से लेकर स्वदेशी की बात करने वाले मुरलीधर राव को पार्टी में अधिक सक्रिय करवाकर संघ ने अपनी उसी रणनीति को आगे बढ़ाने का काम किया है.

संघ की यही रणनीति गडकरी के राजनीतिक भविष्य से अनिश्चय की मात्रा को कम कर देती है. यही वजह है कि पार्टी के एक मजबूत धड़े द्वारा नापसंद किए जाने के बावजूद पार्टी में गडकरी लगातार मजबूत होते गए. पार्टी में एक ऐसा माहौल बना कि गडकरी के खिलाफ बोलने को संघ के खिलाफ बोलना समझा जाने लगा. इसलिए खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानने वाले भाजपा नेताओं ने गडकरी के खिलाफ बोलने वालों का समर्थन जरूर किया लेकिन खुद कभी उनके खिलाफ मुंह नहीं खोला.

मगर हाल ही में अंशुमान मिश्रा को झारखंड से राज्यसभा भेजने के गडकरी के निर्णय पर वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिन्हा ने खुलेआम हल्ला बोल दिया. गडकरी पर आरोप लगा कि उन्होंने पैसे लेकर राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता एसएस अहलूवालिया का टिकट काटा और पार्टी के लिए पैसे जुटाने का काम करने वाले एनआरआई व्यवसायी अंशुमान मिश्रा की उम्मीदवारी का समर्थन कर दिया. पिछले कुछ सालों में सिन्हा ने अपनी पहचान आर-पार की राजनीति करने वाले एक ऐसे नेता की बनाई है जिसने अपने करीबी पत्रकारों के जरिए खुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में शामिल करवाने का खेल नहीं खेला.

संघ का साथ और कार्यकर्ताओं के बीच गडकरी का कद बढ़ने से भाजपा की तीसरी पंक्ति के नेता उनके साथ आ गए हैं

जब सिन्हा ने गडकरी के खिलाफ बोलना शुरू किया तो उन्हें तुरंत पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उन सभी दावेदारों का समर्थन मिल गया जो दिल्ली की राजनीति करते हैं. प्रधानमंत्री बनने को लेकर लालकृष्ण आडवाणी की व्यग्रता से तो हर कोई वाकिफ है लेकिन प्रधानमंत्री पद को लेकर लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने भी अपनी इच्छाओं को उभार देने का काम अपने करीबी नेताओं और पत्रकारों के जरिए खूब कराया है. पार्टी के लोग ही बताते हैं कि इन तीन वरिष्ठ नेताओं के समर्थन के साथ जब अंशुमान मिश्रा के मामले को यशवंत सिन्हा ने उठाया तो उनकी बात सुनना और उस पर अमल करना गडकरी की मजबूरी बन गया. इनके मुताबिक पहली वजह यह है कि गडकरी पर हल्ला बोलने वालों ने मुद्दा ही ऐसा चुना था जिस पर संघ किसी भी हालत में गडकरी का बचाव नहीं करता. और दूसरी वजह यह है कि सब कुछ जानने के बावजूद अब भी संघ में आर-पार की लड़ाई को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. संघ को पता है कि गडकरी अपने पहले कार्यकाल का अधिकांश हिस्सा गुजारने के बावजूद पार्टी के आंतरिक कलह और गुटबाजी दूर नहीं कर पाए हैं. जानकार चुनावों में भाजपा की हार के लिए आंतरिक कलह को ही सबसे बड़ी वजह बताते हैं.

तो क्या इसका मतलब यह निकाला जाना चाहिए कि गडकरी कमजोर हो चले हैं? इस सवाल का जवाब समझने के लिए गडकरी के अब तक के कार्यकाल में उनके प्रदर्शन को देखना होगा. भाजपा के ही एक नेता कहते हैं, ‘कम समय में ही गडकरी ने अपनी पहचान स्थापित की. उन्होंने जमकर राज्यों का दौरा किया और कार्यकर्ताओं से काफी मिले-जुले. गडकरी ने कार्यकर्ताओं के बीच एक ऐसे अध्यक्ष की छवि बनाई जो उनकी बातों को सुनता हो. संघ का साथ और कार्यकर्ताओं के बीच गडकरी के बढ़ते कद की वजह से भाजपा की तीसरी पंक्ति के रविशंकर प्रसाद, शाहनवाज हुसैन, राजीव प्रताप रूडी, मुख्तार अब्बास नकवी, प्रकाश जावड़ेकर और अनंत कुमार जैसे नेता आडवाणी-जेटली-सुषमा से ठीक-ठाक संबंध रखते हुए गडकरी के साथ आ गए हैं. राजनाथ सिंह और वैंकैया नायडू भी गडकरी के करीबियों में शामिल हैं.’

अगर चुनावी नतीजों को पैमाना माना जाए तो गडकरी का अब तक का कार्यकाल औसत रहा है. उनके अध्यक्ष बनने से लेकर अब तक जिन राज्यों में चुनाव हुए हैं उनमें से बिहार ही इकलौता ऐसा बड़ा राज्य है जहां भाजपा की सीटें बढ़ी हैं. बाकी सभी राज्यों में भाजपा की सीटें घटी हैं और उसके सहयोगियों या विरोधियों की सीटें बढ़ी हैं. बिहार में भी भाजपा की सीटों में बढ़ोतरी का श्रेय न तो नितिन गडकरी को मिला और न ही पार्टी के अन्य नेताओं को बल्कि इसका श्रेय तो बिहार के मुख्यमंत्री और भाजपा की सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार को दिया गया. हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में पार्टी के मत प्रतिशत में तीन फीसदी कमी आई और सीटें चार कम हो गईं. पंजाब में पार्टी को सात सीटों का नुकसान हुआ. गोवा में भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया तो उत्तराखंड में कांग्रेस ने भाजपा को. मणिपुर में इस बार भी पार्टी अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाई. कर्नाटक और गुजरात के उपचुनावों में भाजपा ने अपनी वे सीटें गंवाईं जो लंबे समय से पार्टी के पास थीं. कर्नाटक की लोकसभा सीट उडुपी चिकमंगलूर पर भाजपा 1998 के बाद से हारी नहीं थी और गुजरात की मानसा विधानसभा सीट 1995 से भाजपा के पास थी.

जिस दिन विधानसभा चुनावों के नतीजे आ रहे थे उसी दिन शाम को गडकरी ने प्रेस वार्ता बुलाकर भाजपा के अच्छे प्रदर्शन के कसीदे पढ़े. लेकिन सच्चाई यह है कि इन चुनावों में कांग्रेस की तुलना में भाजपा का प्रदर्शन कतई अच्छा नहीं था. गडकरी के आसपास जो टीम है उसमें कई वैसे लोग भी हैं जो उसी तरह काम करते हैं जैसे राहुल गांधी की टीम काम करती है. इनका जोर जमीनी काम करने की बजाय ब्रांडिंग पर ज्यादा होता है. पूरा नतीजा आए बगैर नतीजों को अपनी जीत कहकर प्रचारित करना उसी रणनीति का एक हिस्सा था. एक तरफ 40 विधानसभा सीटों वाले गोवा में जीत हासिल करने पर गडकरी इतरा रहे थे तो दूसरी तरफ 60 विधानसभा सीटों वाले मणिपुर को उन्होंने यह कहकर खारिज किया कि मणिपुर का राष्ट्रीय राजनीति में कोई खास महत्व नहीं है. पार्टी के ही कुछ नेताओं को इस बात पर आश्चर्य हुआ कि किसी राष्ट्रीय पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष ऐसा गैरजिम्मेदाराना बयान कैसे दे सकता है. लेकिन गडकरी के लिए अच्छा यह  हुआ कि मीडिया ने इसे मुद्दा नहीं बनाया. नहीं तो उनके लिए जवाब देना मुश्किल हो सकता था.

उत्तर प्रदेश के नेताओं ने अपने  लोगों को टिकट तो दिलाया पर हार का ठीकरा गडकरी, उमा और संजय जोशी पर फोड़ा

दरअसल, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच सबसे ज्यादा सवाल उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रदर्शन को लेकर उठ रहे हैं. हालांकि, जो नेता सवाल उठा रहे हैं वे भी इस बात को जानते हैं कि उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य बन गया है जहां भाजपा के लिए अपनी खोयी जमीन को वापस हासिल करना किसी भी नेतृत्व के लिए आसान नहीं है. पार्टी के एक नेता बताते हैं, ‘उमा भारती से लेकर संजय जोशी को उत्तर प्रदेश में लगाने के बावजूद भाजपा का प्रदर्शन नहीं सुधरने को भले ही मीडिया इन नेताओं की नाकामी मान रहा हो लेकिन भाजपा के अंदर इस बात को लेकर मोटे तौर पर सहमति है कि अगर भाजपा की इतनी सीटें भी बच पाईं तो उसका श्रेय गडकरी, उमा भारती और संजय जोशी को ही जाता है.’

उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन सुधारने में नाकाम रहे गडकरी को इस प्रदेश में और भी कई मोर्चों पर मात मिली. उन्होंने प्रदेश में कई सार्वजनिक मंचों पर यह कहा कि कोई भी नेता किसी कार्यकर्ता को यह आश्वासन नहीं दे कि वह उन्हें टिकट दिला देगा क्योंकि इस बार टिकट सर्वेक्षण के आधार पर मिलेगा. इससे कार्यकर्ताओं को लगा कि यह अध्यक्ष ईमानदार है. लेकिन गडकरी अपनी इस बात पर कायम नहीं रह  सके. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि सर्वे के आधार पर तो सिर्फ 88 टिकट बांटे गए और बाकी अलग-अलग नेताओं के दबाव में दिए गए. यानी गडकरी ने जो बात सार्वजनिक मंच पर कही, उसके उलट फैसला उन्होंने बंद कमरे में टिकटों पर अंतिम निर्णय लेते हुए किया. पार्टी के एक नेता बताते हैं, ‘पार्टी के प्रदेश नेताओं ने अपनी पसंद के लोगों को टिकट तो दिलवाया लेकिन हार का पूरा ठीकरा पहले गडकरी और बाद में उमा भारती और संजय जोशी के सर पर फोड़ा गया. यानी बड़ी चतुराई से हार की बिसात बिछाने का काम पार्टी के प्रदेश स्तर के नेताओं ने किया और गडकरी उनके जाल में फंस गए. यही खेल अंशुमान मिश्रा प्रकरण में भी दोहराया गया. अंशुमान की सबसे अधिक वकालत राजनाथ सिंह ने की थी लेकिन सारा ठीकरा फूटा गडकरी के सर. गडकरी को मात देने की कोशिश पार्टी कार्यकारिणी के गठन से लेकर पार्टी के लिए पैसे जुटाने तक के मामले में की गई.’ उत्तर प्रदेश में तो गडकरी के सर्वेक्षण पर भी सवाल उठ रहे हैं. पार्टी के लोग ही कह रहे हैं कि सर्वेक्षण में आगे-पीछे करने का काम भी पैसे लेकर किया गया.

उत्तर प्रदेश में गडकरी जात-जमात का संतुलन साधने में भी नाकामयाब रहे. भले ही ऊपरी तौर पर यह दिख रहा हो कि उमा भारती और बाबू सिंह कुशवाहा को लाकर वे अन्य पिछड़ा वर्ग को भाजपा के पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन अगर पश्चिम उत्तर प्रदेश में टिकटों के बंटवारे को देखें तो यह पता चलता है कि जात-जमात के मोर्चे पर गडकरी का प्रबंधन कितना कमजोर था. बागपत जिले में जाटों की संख्या 40 फीसदी है लेकिन भाजपा ने जिले के किसी भी सीट पर जाट उम्मीदवार नहीं उतारा. यह कहानी सिर्फ बागपत जिले की नहीं है बल्कि इस क्षेत्र की अधिकांश सीटों पर भाजपा ने यही कहानी दोहराई. भले ही आज अजित सिंह की पहचान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाटों के नेता के तौर पर है लेकिन 1999 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने इलाके की सभी 15 सीटों पर जीत दर्ज की थी. उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा आयोग के सदस्य रहे जयप्रकाश तोमर कहते हैं, ‘उस चुनाव में इलाके के जाटों और गुर्जरों ने पूरी तरह से भाजपा का समर्थन किया था. इसलिए भाजपा इधर की सभी सीटें जीत गई थी. लोग अजित सिंह के ढुलमुल रवैये से तंग आ चुके हैं लेकिन उन्हें कोई मजबूत विकल्प नहीं मिल रहा.’ वे कहते हैं, ‘अगर भाजपा जाति का संतुलन साध ले तो उत्तर प्रदेश के ज्यादातर इलाकों में पार्टी अच्छा कर सकती है और उत्तर प्रदेश के जरिए दिल्ली पहुंच सकती है.’

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद भले ही भाजपा को जातीय समीकरण दुरुस्त करने की बात समझ में नहीं आई हो लेकिन संघ में इस पर चर्चा चल रही है. यही वजह है कि बीते दिनों आयोजित संघ की प्रतिनिधि सभा में कल्याण सिंह को वापस भाजपा में लाने की कोशिशों को गति देने पर भी बात हुई.

अंशुमान मिश्रा प्रकरण से पहले बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराने को लेकर भी गडकरी विवादों के केंद्र में आ गए थे. भाजपा के पुराने नेता रहे रामाशीष राय ने आरोप लगाया कि कुशवाहा को पार्टी में शामिल कराने के लिए भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने पैसे खाए. भाजपा ने भले ही रामाशीष राय को बाहर का रास्ता दिखा दिया लेकिन आडवाणी, सुषमा और जेटली समेत गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ के विरोध ने गडकरी को इस बात पर मजबूर कर दिया कि वे कुशवाहा को पार्टी में शामिल करने का फैसला कुछ समय के लिए टाल दें. आडवाणी की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी देशव्यापी जनचेतना यात्रा के बावजूद 5700 करोड़ रुपये के घोटाले के केंद्र में रहे कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर लिया गया. उनका मानना था कि इससे यह संकेत जाएगा कि आडवाणी के अभियान को पार्टी ने महत्व नहीं दिया और वे कमजोर हो रहे हैं. यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि बादशाह सिंह जैसे आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को पार्टी में शामिल करने को लेकर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी. क्योंकि इनकी चर्चा मीडिया में बार-बार नहीं हो रही थी.

गडकरी की फजीहत कराने का काम कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने भी कम नहीं किया. जब येदियुरप्पा मुख्यमंत्री थे तो उनके खिलाफ लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों पर पहले तो भाजपा ने उनका बचाव किया. फिर जब कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले को लेकर आक्रामक भाजपा का अभियान कमजोर पड़ने लगा तो येदियुरप्पा को इस्तीफा देने के लिए मनाने का काम शुरू हुआ. येदियुरप्पा की वजह से पहली बार किसी दक्षिण भारतीय राज्य में कमल खिला था इसलिए उनके जनाधार को देखते हुए पार्टी उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती है. येदियुरप्पा इस्तीफा देने को तैयार नहीं हुए तो गडकरी को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी. पार्टी के नेता ही बताते हैं कि दो मौके तो ऐसे भी आए जब दिल्ली में येदियुरप्पा ने कहा कि बेंगलुरु जाकर वे इस्तीफा दे देंगे. लेकिन वहां पहुंचते ही उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया. बड़ी मुश्किल से उनकी पसंद के सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनाने और आरोपों से बरी होने पर वापस उन्हें मुख्यमंत्री पद लौटाने की शर्त पर येदियुरप्पा ने इस्तीफा दिया. उच्च न्यायालय द्वारा येदियुरप्पा के खिलाफ जमीन घोटाले की याचिका खारिज किए जाने के बाद येदियुरप्पा ने गडकरी पर इस बात के लिए दबाव बढ़ा दिया है कि वे उन्हें वापस कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाएं. लेकिन पार्टी सूत्रों के मुताबिक अब सदानंद गौड़ा कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं. कर्नाटक में अगले साल चुनाव होने हैं और ऐसे में गडकरी के लिए राज्य के सत्ता संघर्ष को सुलझाना टेढ़ी खीर बन गया है.

पार्टी के कई बड़े नेताओं की आपत्ति के बावजूद उमा भारती की वापसी करवाकर गडकरी ने एक साथ कई निशाने साधे

ऐसे में अहम सवाल यह है कि राजनीतिक प्रबंधन के मामले में कई मोर्चों पर मात खाने के बावजूद क्या नितिन गडकरी को बतौर अध्यक्ष एक और कार्यकाल मिलेगा? दिल्ली में काम कर रहे संघ के एक प्रचारक कहते हैं, ‘सर संघचालक मोहन भागवत और नितिन गडकरी में बाॅस और कर्मचारी जैसा कोई रिश्ता नहीं है. दोनों इस तरह बात करते हैं जैसे परिवार के एक बड़े सदस्य और छोटे सदस्य के बीच बातचीत होती है. पैसे लेकर टिकट बेचने के आरोप को अगर छोड़ दें तो संघ की नजर में गडकरी ने अब तक ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिससे वे खलनायक बन जाएं.’ अगर ऐसा है तो फिर गडकरी के दोबारा अध्यक्ष बनने में कोई रुकावट नहीं पैदा होनी चाहिए? इस सवाल के जवाब में संघ के ये अधिकारी कहते हैं, ‘अंशुमान मिश्रा प्रकरण के बाद नागपुर के संघ के कुछ अधिकारियों ने मोहन भागवत से नितिन गडकरी की शिकायत की है. लेकिन संघ के ज्यादातर लोगों के पास गडकरी के विकल्प के तौर पर कोई नाम नहीं है. अगर जेतली और सुषमा को ही अध्यक्ष बनाना था तो यह काम तो 2009 में भी किया जा सकता था. फिर गडकरी को लाने की जरूरत ही क्या थी.’ वे आगे बताते हैं, ‘संघ की रणनीति में गडकरी पूरी तरह फिट बैठते हैं. संघ भाजपा में जो भी करना चाहता है वह गडकरी के जरिए कर रहा है.’

वे उमा भारती की वापसी का उदाहरण देते हैं. उमा भारती को पार्टी में वापस लाने पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की आपत्ति किसी से छिपी नहीं है लेकिन असली खेल शिवराज को आगे करके दिल्ली में पार्टी के वरिष्ठ नेता कर रहे थे. एक बार तो उमा भारती की वापसी के बारे में सब तय हो गया था लेकिन घोषणा के ठीक पहले दिल्ली के नेताओं ने शिवराज से इस्तीफा लिखवाकर गडकरी को दे दिया. तकरीबन साल भर के प्रयास के बाद भी जब दिल्ली के नेता नहीं माने तो फिर मोहन भागवत ने ही गडकरी को वह मंत्र दिया जिससे उमा भारती की वापसी कुछ ही दिनों के अंदर हो गई. मोहन भागवत ने गडकरी को यह कहा था कि सहमति तो आपको अध्यक्ष बनाने को लेकर भी नहीं थी लेकिन आपको बनाया गया. इसी तर्ज पर नरेंद्र मोदी की नाराजगी के बावजूद गडकरी ने संघ के कहने पर संजय जोशी की वापसी कराई. संघ के इस अधिकारी ने कहा, ‘अब तक संघ ने जो भी कहा है, वह गडकरी ने किया है. इसलिए संघ के नाराज होने की कोई वजह नहीं है. अगर संघ के अंदर यही भाव अगले कुछ महीनों तक बना रहा तो गडकरी को भाजपा के संविधान में संशोधन करके दूसरा कार्यकाल मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.’
गडकरी को जानने वाले लोग बताते हैं कि छात्र राजनीति से उन्होंने अपनी पहचान एक उदार नेता की बनाने की कोशिश की है. गडकरी को वैचारिक आधार देने में सबसे प्रमुख भूमिका भाजपा के सहयोगी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले यशवंत राव केलकर की रही हैैै. संघ गडकरी की इसी छवि के जरिए भाजपा में एक नई लीडरशीप विकसित करने की रणनीति पर काम कर रहा है. पार्टी में मुरलीधर राव से लेकर धर्मेंद्र प्रधान और जगत प्रकाश नद्दा जैसे नेताओं का बढ़ता कद इसी रणनीति का हिस्सा है. इसलिए संघ गडकरी को हटाकर किसी ऐसे व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष नहीं बनाना चाहेगा जो पार्टी में नई लीडरशीप विकसित ही नहीं होने देना चाहता हो. संघ को पता है कि दिशा भ्रम की स्थिति प्राप्त कर चुकी भाजपा की सेहत सुधारने के लिए उसे ही आगे की सियासी रणनीति तैयार करनी है.

संघ के सांगठनिक ढांचे में आपातकाल और राम मंदिर आंदोलन के दौरान राजनीतिक तौर पर सक्रिय रहे कृष्णा गोपाल, सुरेश चंद्रा और केसी कन्नन जैसे लोगों को शामिल किए जाने को भी जानकार उसी रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं जिसे गडकरी के जरिए संघ आगे बढ़ाना चाहता है.