Home Blog Page 1526

मैं और मेरी दुनिया

अतीत

मुझे लगता है कि मेरी सोच में मेरे पिता का आदर्शवाद बसा हुआ है. वे एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे. लेकिन उन्होंने कभी अपने संपर्कों का इस्तेमाल नहीं किया. उस जमाने में वे एमए-एलएलबी थे मगर वे एक दुकान चलाते थे. पहले विलिंगटन हॉस्पिटल के पीछे उनकी एक छोटी-सी दुकान हुआ करती थी. बाद में उन्होंने एनएसडी में कैंटीन खोली. एक बार तो किराया न चुका पाने की वजह से हमें अपने फ्लैट से भी निकाल दिया गया था. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, ऊंची तालीम पाया एक शख्स जिसे मोहम्मद यूनुस से लेकर इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां तक जानती थीं, लेकिन उसने कभी इस जान-पहचान का इस्तेमाल नहीं किया. अपनी चाय की दुकान चलाता रहा. इसलिए अपनी किताब में मैंने उन्हें सबसे कामयाब नाकामयाब कहा है. जैसे वे मेरे लिए थे वैसा ही मैं अपने बच्चों के लिए हूं—एक दोस्त, एक शिक्षक और हमेशा उन्हें खुश रखने की कोशिश करने वाला शख्स.

मैं 15 साल का था जब कैंसर के चलते मेरे पिता गुजर गए. एक तो उनकी थोड़ी कमाई और दूसरे उनकी असमय मौत ने शायद मेरी मां को ज्यादा व्यावहारिक बना दिया. उन्हें अहसास था कि बच्चों को पालने-पोसने और अच्छी शिक्षा देने की जिम्मेदारी उनके ही कंधों पर है. उनकी मौत भी बहुत मुश्किल परिस्थितियों में हुई. तब वे बस 47 या 48 साल की थीं और मुझे लगता है कि अगर उन्होंने इतनी हाड़तोड़ मेहनत न की होती तो वे और जीतीं. तब मेरी उम्र 25 साल थी.

पिता की मौत के बाद ही मेरी बहन बीमार रहने लगी थी. तब मनोचिकित्सा के बारे में इतनी जानकारी नहीं हुआ करती थी. उसके लिए ठीक इलाज ढूंढ़ने में हमें चार-पांच साल लगे. इसके बाद उसे उबरने में पांच साल लगे जिस दौरान वह मां पर निर्भर हो गई थी. फिर मां भी गुजर गईं जिससे वह बुरी तरह टूट गई. हालांकि अब वह पहले से काफी बेहतर है और मेरे ही साथ रहती है.

मां-बाप के गुजरने के बाद मुझे अहसास हुआ कि आदर्शवाद और व्यावहारिकता दोनों जरूरी हैं. तो मुझमें मेरे पिता का आदर्शवाद भी है और मां की व्यावहारिकता भी. इसलिए मैं खुद को एक ईमानदार व्यक्ति कहता हूं जो व्यावहारिक भी है.

पैसे और शादियों में नाचने पर

मैंने कभी नहीं कहा कि मैं शादियों में नाचता हूं. मैं एक परफॉर्मर हूं और इसके मायने समझे जाने चाहिए. मैं शादियों में परफॉर्म करता हूं लेकिन उसका खर्च उठाना चुनिंदा लोगों के बूते की ही बात है. हम इसे एक शो की तरह करते हैं और इसकी कुछ शर्तें होती हैं. मसलन यह एक ऐसे एरिया में होना चाहिए जहां खाना-पीना न हो रहा हो. परफॉर्मेंस रात को नौ बजे शुरू होगा और साढ़े ग्यारह बजे खत्म हो जाएगा. मंच 30 बाई 40 फुट का होगा. हम किसी के साथ बात नहीं करेंगे. न ही हम आपका खाना खाएंगे. हम आपके रिश्तेदारों के साथ तस्वीरें नहीं खिंचवाएंगे जब तक  हम खुद ऐसा न करना चाहें. हम आएंगे, परफॉर्म करेंगे और चले जाएंगे. यानी इसका एक स्तर होता है. बहुत कम लोग ही इसका खर्च उठा सकते हैं मसलन लक्ष्मी निवास मित्तल जैसी हस्तियां. मैं शादी के संगीत में नहीं नाचता.

जब मैं युवाओं को अपने जैसा होने को कहता हूं तो मैं वास्तव में मानता हूं कि मैं कुछ ऐसा कर रहा हूं जो किसी भी भारतीय को करना चाहिए. उसे कोशिश करनी चाहिए, कड़ी मेहनत करनी चाहिए, पैसा कमाना चाहिए और अच्छी तरह से जिंदगी गुजारनी चाहिए.

धर्म

मैं नास्तिक नहीं हूं. मैं ऊपरवाले पर यकीन करता हूं. मैं जन्म से मुसलमान हूं तो मैं इस्लाम को और धर्मों की तुलना में थोड़ा बेहतर जानता हूं. हालांकि अब तक मेरी जिंदगी के ज्यादातर हिस्से में मेरे इर्द-गिर्द हिंदू ही रहे हैं. रामलीला मुझे बड़ी अच्छी लगती थी. जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी है और मैं देख रहा हूं कि दुनिया में इस्लाम को लेकर क्या हो रहा है, मुझे यह अहम लगता है कि इस्लाम के बारे में पूरी तरह से जाने बिना भी मुझे इसकी अच्छाई के साथ खड़े रहने की जरूरत है. एआर रहमान ने एक बार मुझे एक एसएमएस भेजा था. इसमें लिखा था कि आप इस्लाम के दूत हैं. मुझे लगता है कि मैं वास्तव में हूं. मैं इस्लाम के सिद्धांतों पर चलता हूं. ये हैं अमन, अच्छाई और मानवता के लिए करुणा. कुछ लोग हैं जो ऐसी हरकतें करते हैं जो उनके मुताबिक इस्लामिक हैं. उनसे मुझे बहुत चिंता होती है. लेकिन मुझे लगता है कि हम भी बहुत जल्दी ही लोगों को खांचों में रख देते हैं. जैसे वह बंगाली है तो ऐसा ही होगा. मुझे लगता है कि हमें वर्गीकरण पसंद है क्योंकि इससे हमें एक तरह का सुरक्षा बोध होता है. मैं वैसा ही हूं जैसा एक आधुनिक मुसलमान को होना चाहिए. मेरी शादी एक हिंदू से हुई है. मेरे बच्चे दोनों धर्मों के साथ बड़े हो रहे हैं. मैं जब इच्छा करती है, नमाज पढ़ता हूं. कई दूसरी चीजें भी हैं जो अब प्रासंगिक नहीं रही हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं कुरान पर सवाल कर रहा हूं. मैं चाहता हूं लोग जानें कि इस्लाम का मतलब सिर्फ उन्माद या गुस्सा नहीं है. न ही इसके मायने किसी ऐसे शख्स से हैं जो सिर्फ जिहाद करता है. जिहाद का असल मतलब है अपने भीतर की हिंसा और कमजोरी पर विजय पाना.

काम

जहां तक काम का सवाल है तो मुझे काम की बीमारी है जो अच्छी बात नहीं है. मैं जरूरत से ज्यादा ही काम करता हूं. मेरे सामने जो अवसर आते हैं उनमें से मैं 95 फीसदी लपक लेता हूं. मैं कोई भी चीज हाथ से नहीं जाने देता. मैं हमेशा ऊर्जावान रहता हूं. हर समय काम करता रहता हूं. जबकि मुझे इसकी जरूरत नहीं है. मेरे पास अब बहुत पैसा है. खूबसूरत बच्चे हैं. अच्छी बीवी है. बढ़िया मकान है. कारोबार बढ़िया चल रहा है. मैं जानता हूं कि सब कुछ ठीक है. मगर मुझे हमेशा यह लगता है कि यह भी कर लूं, वह भी कर लूं. यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है. लोगों को लगता है कि मैं सिर्फ पैसे के लिए काम करता हूं. लेकिन ऐसा नहीं है. मैं ऐसा इसलिए करता हूं कि यह मेरी फितरत ही नहीं है कि कोई मौका मेरे हाथ से निकल जाए. तो काम करते रहना मेरी जरूरत है. मेरे पास जो चीजें हैं मैं उनका लुत्फ उठाता हूं और मैं उन्हें खोना नहीं चाहता. लेकिन अगर यह सब चला भी जाए तो कोई बात नहीं. मेरा इससे कोई मोह नहीं है. अगर मेरे पास यह कार नहीं होगी तो मैं थ्रीव्हीलर से काम चला लूंगा. लेकिन काम के बिना मैं नहीं रह सकता. फिर भले ही वह चूहेदानी बनाने का काम हो.

मेरी जिंदगी में कोई कमी नहीं है. फिर भी जब मैं अकेला होता हूं तो उदास हो जाता हूं. मेरे मां-बाप को गुजरे कई साल हो गए हैं. अब तो मैं यह तक भूल गया हूं कि वे कैसे दिखते थे. क्या यह उदासी उनकी वजह से है? पता नहीं. लेकिन अकेले में मैं उदास हो जाता हूं. इसीलिए मैं रात-दिन काम करता रहता हूं.

अपने बारे में

मैं बहुत परंपरावादी हूं. मुझे लगता है कि मेरी फिल्में पूरी दुनिया में इसलिए चलती हैं कि मेरे मूल्य अब भी वही हैं जिन्हें पुराने दौर के कहा जाता है. मैं महिलाओं से शर्माता हूं. आप सुनकर हैरान होंगे मगर अपनी बेटी की सहेलियों के साथ भी मैं ज्यादा देर तक नहीं रह पाता. मुझे लगता है कि आपको लड़कियों की दुनिया में ज्यादा नहीं घुसना चाहिए. मैंने कभी अपनी पत्नी की अलमारी या उसके हैंडबैग में झांककर नहीं देखा. मेरा मानना है कि एक महिला को ज्यादा से ज्यादा प्राइवेसी मिलनी चाहिए. कभी-कभी लड़कियां मुझसे कहती हैं कि वे मुझे पसंद करती हैं. मुझे समझ में नहीं आता कि मैं क्या कहूं. इसलिए इससे पहले कि वे मुझे बेवकूफ समझें मैं कुछ मजाकिया बात कह देता हूं. रोमांस के मामले में मुझे यह भी लगता है कि किसी लड़की को पहल नहीं करनी चाहिए. अपने मामले में भी मैं सोचता हूं कि काश मैंने गौरी को प्रपोज किया होता. तो मैं बहुत परंपरावादी हूं.

प्रशंसक

मुझे लगता है कि बड़ी उम्र की बहुत-सी महिलाएं, मांएं, मुझे पसंद करती हैं. मेरा मानना है कि मर्दाना छवि पसंद करने वाले पुरुषों को मैं अच्छा नहीं लगता. उनमें से आधे से ज्यादा तो यही सोचते हैं कि मैं समलैंगिक हूं. लोगों को लगता है कि मैं अच्छा आदमी हूं. वे मुझे प्यार करते हैं. जर्मनी, फ्रांस, अफगानिस्तान, तुर्की, पोलैंड, जापान, मोरक्को और चीन में कई जगहें हैं जहां लोग मुझे चाहते हैं. जर्मनी में लोग मुझसे कहते हैं कि हमारे पास हर चीज के लिए एक बटन है. ऊपर जाने के लिए, नीचे आने के लिए, कार चलाने के लिए. लेकिन हमारे पास रोने के लिए कोई बटन नहीं है. हम बहुत रुखे हो गए हैं. रोने के लिए हमारा बटन आप हो. हम आपकी फिल्में देखते हैं और रोते हैं. मुझे भीड़ बहुत अच्छी लगती है. मेरे आस-पास 10 लोग हों तो मैं असहज रहूंगा. मगर 10,000 लोग हों तो मैं सहज महसूस करूंगा. मैं कोई और होता हूं तो सहज होता हूं. मैं जब मैं होता हूं तो बहुत असहज हो जाता हूं.

शब्दों का सफर

हिंदुस्तानी फिल्मों के मिजाज को हिंदुस्तानी इसके गीत ही बनाते हैं. हमारी फिल्मों के साहस की सबसे पहली निशानी भी इसके गीत ही हैं. भारत में फिल्मों की विकास यात्रा में बोलती फिल्मों से पहले तक पश्चिमी परिपाटी का जबरदस्त असर था. लेकिन बोलने वाली फिल्मों से भारतीय सिनेमा ने जो राह पकड़ी वह बिल्कुल नई थी. यह पश्चिम के गीत-रहित सिनेमा की बजाय हिंदुस्तान की अपनी, गीतों से लबालब रहने वाले लोक-माध्यमों की डगर थी. इसीलिए 1931 में आई भारत की सबसे पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ में सात गाने थे. शायद आलम आरा के हिस्से में आई कुल चर्चा उसके हिट गानों की वजह से ही थी.

हालांकि आलम आरा के संगीत में जादू जैसा कुछ नहीं था, मगर इसने अगर धूम मचाई तो इसके पीछे सबसे बड़ी वजह आसान धुनों पर सजे असरदार अल्फाज़ थी. असल में यह फिल्म पारसी थिएटर के लबो-लहजे वाली फिल्म थी जिसमें लेखन का विभाग हमेशा मार्के के शायरों से सजा होता था. इसके बाद अगले चार-पांच साल तक आने वाली हर फिल्म में गीतों की भरमार रही.

आरंभिक दौर के ज्यादातर गीतकार असल में पारसी थिएटर या अन्य नाट्य मंडलियों से जुड़े हुए शायर-कवि थे. इनमें राधेश्याम कथावाचक, डीएन मधोक, आरजू लखनवी, गोपाल सिंह नेपाली, तनवीर नकवी, आगा कश्मीरी, पंडित सुदर्शन आदि प्रमुख थे. इनमें फिल्मी गीतों के क्षेत्र में सबसे बड़ा योगदान आरजू लखनवी का है. साहिर कहा करते थे कि आरजू ने ही फिल्मी गीतों को उसका सबसे पहला मुहावरा, सांचा और ज़ुबान दी. आरजू का दिया यह मुहावरा नब्बे के दशक तक चलन में रहा. 1935 के आस-पास जब विशेषज्ञ संगीतकारों जैसे आरसी बोराल, पंकज मलिक, तिमिर बरन ने फिल्मी दुनिया में कदम जमाए तब पहली बार सिनेमा को जादुई धुनें मिलना शुरू हुआ और यहीं से यादगार गीतों का सिलसिला भी शुरू हो गया.

हमारे फिल्मी गीतों की विषयवस्तु शुरुआत में तीन प्रवृत्तियों के इर्द-गिर्द घूमती थी. इनमें सबसे पहली थी प्रेम. अन्य दो धाराएं भक्ति और देश-प्रेम की थी. प्रेम की प्रवृत्ति आज तक हिंदी फिल्म गीतों की रीढ़ बनी हुई है. आरजू लखनवी ने आरंभिक दौर के ज्यादातर रूमानी नगमे और गजलें सिनेमा को दीं. इस सिलसिले में दूसरा नाम केदार शर्मा का आता है. न्यू थिएटर के गीतकारों में सबसे ज्यादा चर्चित केदार शर्मा ही थे. इसी समय बहुमुखी प्रतिभा के धनी डीएन मधोक भी प्रेम और भक्ति की उम्दा रचनाओं से हिंदी फिल्मों को धनी कर रहे थे. पीएल संतोषी भी इस कड़ी में एक अहम नाम थे. लेकिन आरंभिक फिल्मी गीतों का जिक्र अधूरा है अगर इनमें मौजूद राष्ट्रीय धारा वाले गीतों की बात न हो. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में आई फिल्म किस्मत के लिए लिखे गए प्रदीप के गीत दूर हटो ऐ दुनिया वालो हिंदुस्तान हमारा है ने अंग्रेजी शासन की नींद हराम कर दी थी. बाद के वर्षों में भी कवि प्रदीप ने राष्ट्रीय चेतना और देशप्रेम को समर्पित ऐसे-ऐसे उम्दा गीत लिखे कि वे एक तरह से हमारे देश के लिए राष्ट्रीय गीतकार ही बन गए.

भारतीय फिल्मों की विकास यात्रा पर बारीक नजर डाली जाए तो पता चलता है कि हिंदुस्तानी सिनेमा के साहस की सबसे पहली निशानी इसके गीत ही हैं

लेकिन असल मायनों में हिंदी सिनेमा के कभी न भुलाए जा सकने वाले गीतों का दौर 1945 के बाद शुरू हुआ. संगीत के साथ गीतों का स्वर्ण-युग भी यही है. इस दौर में उर्दू-हिंदी के पहली श्रेणी के शायरों ने फिल्म इंडस्ट्री का रुख किया. इनमें साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी, खुमार बाराबंकवी, जांनिसार अख्तर, राजा मेंहंदी अली खान, हसरत जयपुरी या फिल्मों में हिंदी धारा लाने वाले पंडित नरेंद्र शर्मा, इंदीवर, भरत व्यास, राजेंद्र कृष्ण, प्रेम धवन, शैलेंद्र आदि सबसे प्रभावी नाम रहे. इन सभी ने अगले तकरीबन 25 साल तक फिल्मी गीतों को साहित्य की कसौटी पर ढीला नहीं पड़ने दिया. इस दौर में भी फिल्मी गीतों की सबसे मुख्य अभिव्यक्ति प्रेम की ही रही. देशभक्ति और भक्ति दो अन्य मुख्य विषय थे. मगर अब एक और बिल्कुल नया रंग फिल्मों गीतों को मिल गया था. यह रंग था प्रगतिशील विद्रोह का. फिर भी इस पूरे दौर के गीतों की सबसे बड़ी खासियत प्रेम के अलग-अलग रंगों की छटा ही रही. 1946 की फिल्म शाहजहां में मजरूह के लिखे गम दिए मुस्तकिल का सोज आज भी बरकरार है. वहीं शकील बंदायूनी के दर्द (1947) के लिए लिखे अफसाना लिख रही हूं को कौन भूल सकता है. वहीं शैलेंद्र के 1949 में बरसात के लिए लिखे गए बरसात में हमसे मिले तुम, 1951 में आवारा के लिए लिखे गए आवारा हूं और घर आया मेरा परदेसी आदि गीतों ने इनमें सादगी और सुख की अनुभूति को भी खूब आगे बढ़ाया. इसी वक्त शकील बदायूंनी ने बैजू बावरा, अमर जैसी फिल्मों में जितने सुंदर भजन लिखे उसने देश को कौमी एकता की एक नई मिसाल दी. शकील की ही तरह बाद के वर्षों में साहिर लुधियानवी की कलम से भी सीमा, नया दौर जैसी फिल्मों के लिए कुछ बेहद लोकप्रिय भक्ति गीत निकले.

अगले कुछ वर्ष साहिर, शकील, कैफी, राजेंद्र कृष्ण और शैलेंद्र के ही नाम रहे. साहिर लुधियानवी ने प्यासा से हिंदी फिल्मों के गीतों को एक नया तेवर और बेबाकी दी. जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां है और ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है जैसे गाने साहित्य के फिल्मों से मिलन की अनूठी मिसाल थे. इसके अलावा धूल का फूल के तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा और साधना के औरत ने जनम दिया मर्दों को गीत के साथ साहिर ने अपनी विद्रोही अभिव्यक्ति जारी रखी. साधना का गीत तो औरत को समर्पित फिल्मी गीतों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. साहिर की निजी जिंदगी से निकला यह गीत वास्तव में रोंगटे खड़े कर देने वाली रचना था. वहीं शकील ने इसी साल आई मदर इंडिया में गंवई लोकसंस्कारों से सजे गीत जितने लालित्य के साथ पेश किए उसने उन्हें भी साहिर के कद का ही गीतकार बनाए रखा. शैलेंद्र भी यहूदी और मधुमती जैसी फिल्मों के जरिए अपने अलग अंदाज के गीत सिनेमा को दे रहे थे. गीतकारों के लिए पहला फिल्मफेयर भी शैलेंद्र को ही यहूदी के अद्भुत गाने ये मेरा दीवानापन है के लिए मिला. वहीं इस समय भी पंडित भरत व्यास और कवि प्रदीप अपने भक्ति गीतों की वजह से लोगों की जुबान पर थे. 1957 में आई वी शांताराम की दो आंखें बारह हाथ में भरत व्यास का लिखा ऐ मालिक तेरे बंदे हम आज भी भक्ति गीतों में सबसे यादगार माना जाता है. 1959 में कैफी आजमी ने भी गुरुदत्त के साथ जुड़ कर कागज के फूल के लिए अमर गीत लिखे. लेकिन अगले साल 1960 में आई मुगले आजम के गीतों की ऐतिहासिक कामयाबी ने मुख्य मुकाबला फिर साहिर लुधियानवी और शकील बदायूंनी के बीच कर दिया. इसी साल साहिर के फिल्म बरसात की रात के लिए लिखे गाने जबरदस्त धूम मचा रहे थे. मुगले आजम के गीतों में शकील ने पारंपरिक प्रेम के साथ विद्रोह को भी मिला दिया जो अभी तक साहिर की विशेषता थी. फिल्म के जब प्यार किया तो डरना क्या और ऐ मुहब्बत जिंदाबाद जैसे गीत इसकी बानगी हैं. मुगले आजम के साथ ही कोहिनूर और चौदहवीं का चांद जैसी फिल्मों में लिखे गए खूबसूरत नगमों ने भी शकील को साहिर के मुकाबले कुछ बड़ा ही किया. बाद के सालों में यह पूरी बहस यह कहकर खत्म करनी पड़ी कि शकील रूमानियत के तो बादशाह हैं लेकिन अपने विद्रोही तेवरों के चलते फिल्मी गीतों के विशाल फलक पर साहिर का कद उनसे ज्यादा बड़ा नजर आता है. साहिर के बड़े होने की एक वजह उर्दू अदब में उनका शकील से बड़ा होना भी रही.

1960 के बाद के वर्षों में साहिर, शकील, शैलेंद्र के अलावा मजरूह सुल्तानपुरी, हसरत जयपुरी और राजेंद्र कृष्ण ने अपने रूमानी नगमों से लोगों का दिल जीता. यहां साहिर के ताजमहल, गजल, गुमराह, हमराज, शकील के गंगा जमुना, लीडर, राम और श्याम, शैलेंद्र के गाइड, तीसरी कसम और मजरूह के दोस्ती, चिराग के लिए लिखे गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. इनके साथ एक अन्य गीतकार जो बेहद लोकप्रिय रहे वे थे गजलों के बादशाह मदन मोहन के जोड़ीदार राजा मेहंदी अली खान. जिन्होंने वो कौन थी? अनपढ़, मेरा साया आदि फिल्मों में बेहद खूबसूरत गीत लिखे. लेकिन इस पूरे दशक को प्रेम के नगमों से पहले इस वजह से याद किया जाना चाहिए कि इसमें देशभक्ति को समर्पित सबसे अच्छे गीत लिखे गए. इन गीतों में सबसे पहला नाम प्रेम धवन के गीतों का आएगा जिन्होने छोड़ो कल की बातें…, ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ वतन ऐ वतन, मेरा रंग दे बसंती चोला जैसे बेहद लोकप्रिय देशभक्ति गीत फिल्मों को दिए. इसके अलावा कैफी आजमी ने भी फिल्म हकीकत में देशभक्ति का जोश भर देने वाला गीत कर चले हम फिदा लिखा. हकीकत कैफी के लिखे रूमानी नगमों जैसे हो के मजबूर मुझे और मै ये सोचकर … के लिए भी याद रखी जाएगी. कैफी ने ही मेरी आवाज सुनो जैसा मार्मिक गीत भी लिखा. इसी दशक में शकील बदायूंनी ने भी अपनी आजादी को हम, नन्हा मुन्ना राही हूं और इंसाफ की डगर पे.. जैसे गीत फिल्मों को दिए. 1965 के बाद के सालों में इंदीवर ने मनोज कुमार की फिल्म पूरब और पश्चिम के लिए है प्रीत जहां की रीत सदा जैसे कालजयी देशभक्ति गीत लिखे और मनोज कुमार की ही फिल्म उपकार में गुलशन बावरा के लिखे मेरे देश की धरती सोना…को भुलाया नहीं जा सकता.

समीर के नाम सबसे ज्यादा फिल्मों के लिए गीत लिखने का गिनीज बुक रिकाॅर्ड तो आया लेकिन अच्छे गीतों की रिकॉर्ड-बुक में वे सबसे पिछले पन्नों में चले गए

इसी दौर में कुछ और नए, पैर जमाने की कोशिश में लगे गीतकारों ने भी बहुत खूबसूरत गीत लिखे. इनमें हिंदी के लोकप्रिय गीतकार गोपालदास नीरज, आनंद बख्शी और गुलज़ार के नाम प्रमुख हैं. बाद वाले दोनों नाम 1970 के बाद के बीस वर्षों में सबसे बड़े फिल्मी गीतकार बनकर उभरे. 1970-80 के बीच कई पुराने गीतकार सक्रिय भी नहीं रहे थे, संगीत ने बदलकर गीतों को पीछे ढकेलना शुरू कर दिया था. फिर भी साहिर, मजरूह, और नरेंद्र शर्मा जैसे पुराने गीतकारों के साथ आनंद बख्शी, गुलजार और योगेश ही गीतों का स्तर बचाने में कामयाब रहे. 1975 की फिल्म जय संतोषी मां के भजनों के जरिए प्रदीप मुश्किल दौर में भी भक्ति गीतों को हिट कराने में कामयाब रहे. इस दौर में भी प्रेम की प्रधानता तो गीतों में बनी रही लेकिन देशप्रेम और भक्ति गायब से हो गए. प्रेम भी पचास और साठ के दशक का न रहकर लाउड होने लगा था. 1980 के बाद के वर्षों में जब स्वर्ण युग खत्म हो चुका था और शोर ने शब्दों को दबा लिया था, तब भी गुलजार और आनंद बख्शी के साथ जावेद अख्तर खूबसूरत गीत लिख रहे थे. गुलजार ने इजाजत, मासूम तो आनंद बख्शी ने कर्ज, एक दूजे के लिए और जावेद अख्तर ने सिलसिला, सागर आदि फिल्मों के लिए गोल्डन इरा की बराबरी वाले गीत लिखे.

1990 में भी यही तीन लोग गीतों के मेयार का झंडा थामे रहे, हालांकि आनंद बख्शी भी अब चोली के पीछे लिख रहे थे और गुलजार में भी संवेदना का पहले जैसा स्तर नहीं था और जावेद अख्तर की प्रतिभा जागती-बुझती रहती थी. लेकिन फिर भी समीर के जाने जाना-जाने तमन्ना टाइप गीतों के दौर में ये ठंडी हवा की तरह थे. 1990 से लेकर 2000 का पूरा दौर समीर का था जिन्होंने दीवाना, साजन और आशिकी जैसी कुछ फिल्मों में कुछ सुंदर गाने भी लिखे लेकिन ज्यादा काम करने की हवस ने उनके गीतों का जादू खत्म कर दिया. ज्यादातर गीत ऐसे होते थे मानो उन्हीं पुराने शब्दों और उपमाओं को किसी मशीन में डालकर गीत निकाल लिया हो. समीर के नाम सबसे ज्यादा फिल्मों के लिए गीत लिखने का गिनीज बुक रिकॉर्ड तो आया लेकिन अच्छे गीतों की रिकॉर्ड-बुक में वे सबसे पिछले पन्नों में चले गए.

हलांकि 2000 के बाद से अभी तक के दौर में भी संगीत ने शब्दों को दबा रखा है और आइटम सांग के चलन के कारण खारिज करने लायक गीत भी हिट हो रहे हैं लेकिन बदनाम होती मुन्नियों और जवान होती शीला के बीच भी इस दौर में 90 के दशक की अपेक्षा कहीं ज्यादा उम्मीद दिखाई देती है. इस दशक में हमें तारे जमीन पर लिखते प्रसून जोशी मिलते हैं और जो भी मैं कहना चाहूं, बर्बाद करें अल्फाज मेरे लिखने वाले इरशाद कामिल भी. मौला मेरे ले ले मेरी जान वाले जयदीप साहनी भी हैं, खोया खोया चांद  लिखने वाले स्वानंद किरकिरे भी और सबसे नए अमिताभ भट्टाचार्य जिन्होंने डीके बोस के भागने के बीच उड़ान के अविस्मरणीय गीत लिखे हैं. ये सब अपने नए शब्दकोशों, अभिव्यक्तियों और मुहावरों को फिल्मी गीतों में लाने वाले गीतकार हैं और फिर से फिल्मी गीतों को कविता के करीब ले जाते हैं. गुलजार भी दिल तो बच्चा है जी की अपनी ताजगी के साथ नयों के बराबर और कभी-कभी उनसे ज्यादा सक्रिय हैं. 2009 में आई गुलाल के एक गीत में पीयूष मिश्रा लिखते हैं- जिस कवि की कल्पना में जिंदगी हो प्रेमगीत, उस कवि को आज तुम नकार दो. रूमानियत की इस नकार में साहिर के गुस्से की खुशबू है और यही सबसे उम्मीद भरी बात है.

 

हाउस खाली जेब फुल

हिंदी फिल्म उद्योग में असफलता की कहानियां इन फिल्मों की तरह ही नाटकीय और मनोरंजक हैं. कागज के फूल के असफल होने (कहा जाता है कि कुछ दर्शकों को यह फिल्म इतनी बुरी लगी कि उन्होंने टॉकीजों के पर्दे पर पत्थर बरसाए थे) पर गुरुदत्त का निर्देशन से मोहभंग होना या राजकपूर की अति महत्वाकांक्षी फिल्म मेरा नाम जोकर  पर दर्शकों की ठंडी प्रतिक्रिया के बाद उनका अभिनय छोड़ना और स्टूडियो गिरवी रखने के लिए मजबूर होना, ऐसी ही कहानियां हैं. उस दौर में निर्देशक जी-जान लगाकर फिल्में बनाते थे और उनकी किस्मत सर्वशक्तिमान दर्शकों के हाथ में होती थी.

लेकिन इस बीच फिल्म उद्योग काफी समझदार हुआ. इसने समझा कि दर्शक ही मनोरंजन के इस कारोबार के विधाता हैं. यह भी कि जब ऐसा है तो इस अबूझ पहेली पर इतना भरोसा क्यों किया जाए. इसी सोच का नतीजा है कि आज फिल्म उद्योग के इस विधाता की ताकत आधी से भी कम हो चुकी है. कुछ मामलों में तो दर्शकों को बिलकुल भुला ही दिया गया है. वे अब निर्माता-निर्देशकों-कलाकारों की जेब को प्रभावित करने की ताकत नहीं रखते. फिल्मी कारोबार में कमाई के नए तौर-तरीके ईजाद होने के बाद फिल्म की कमाई का आधा हिस्सा बॉक्स ऑफिस से आता है तो बाकी फिल्म रिलीज होने के पहले ही उसके गीत-संगीत और प्रसारण के अधिकारों की बिक्री से. और यदि फिल्म में खान तिकड़ी में से कोई एक काम कर रहा है तो फिल्म की शूटिंग के पहले ही वह मुनाफा कमा लेती है. जैसे कुछ खबरों के मुताबिक स्टार नेटवर्क ने दबंग-2 के अधिकार पहले ही 50 करोड़ में खरीद लिए हैं.

फिल्मों के बदले कारोबार का एक पहलू और भी है. पश्चिम उत्तर प्रदेश में एक सिनेमाघर के मालिक बहुत नाराज हैं. उन्होंने रा.वन  के लिए पांच लाख रुपये दिए थे. पहले हफ्ते में उन्हें डेढ़ लाख रुपये वापस मिले. दूसरे हफ्ते तक फिल्म पिटने लगी. नतीजा? इस हफ्ते उनकी कमाई 50 हजार रुपये तक सिमट गई और तीसरे हफ्ते उनके शो देखने कोई नहीं आया. उन्हें इस फिल्म में लगभग तीन लाख रुपये का घाटा हुआ और वे आज भी शाहरुख खान को कोस रहे हैं.

वहीं दूसरी तरफ मुंबई में शाहरुख ने रा.वन हिट होने की खुशी में एक पार्टी आयोजित की थी. अखबारों में एक पृष्ठ के विज्ञापन के साथ यह घोषणा भी की गई कि फिल्म का सीक्वेल बनाने की तैयारी चल रही है. उत्तर प्रदेश के सिनेमाघर मालिक से उलट मुंबई में शाहरुख के घर पर हुई इस पार्टी की अपनी वजहें थीं. 150 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने रिलीज के पहले ही न सिर्फ अपनी लागत वसूल कर ली बल्कि कुछ करोड़ का मुनाफा भी बटोर लिया था. रा.वन  ने रिलीज के पहले ही वितरण अधिकार बेचकर 77 करोड़, टीवी प्रसारण अधिकार से 35 करोड़ और संगीत अधिकार से 15 करोड़ रुपये कमा लिए थे. 10 करोड़ की अतिरिक्त कमाई म्यूजिक लॉन्च के प्रसारण अधिकार से भी हुई और 50 करोड़ की कमाई विभिन्न ब्रांडों से टाइअप से हुई. इन आंकडों की एक चौंकाने वाली व्याख्या यह है कि जब शाहरुख खान और उनकी टीम के पास इतना पैसा पहले ही आ चुका था तब भारत में यदि एक भी आदमी उनकी फिल्म देखने नहीं जाता तो भी वह हिट थी.

शाहरुख की हालिया फिल्म डॉन 2 की लागत भी 75 करोड़ रुपये थी. इसे रिलायंस एंटरटेनमेंट ने 80 करोड़ रुपये में खरीदा और फिल्म ने 37 करोड़ रुपये टीवी अधिकार बेचकर हासिल किए और 10 करोड़ रुपये संगीत अधिकार के जरिए.

जिस व्यापार में कम जोखिम पर अच्छा मुनाफा होगा, वहां जाहिर है कई कारोबारी भी आएंगे. हिंदी फिल्म उद्योग में भी यही हो रहा है

कुछ इसी तरह की खबरें सलमान खान की एक था टाइगर  के टीवी प्रसारण अधिकार के बारे में भी आ रही हैं. आमिर खान की तलाश, जिसका बजट 40 करोड़ रुपये है, के बारे में कहा जा रहा है कि अपनी लागत के बराबर राशि में ही फिल्म के टीवी प्रसारण अधिकार बिके हैं और रिलायंस एंटरटेनमेंट ने इसे 90 करोड़ में खरीदा है.

फिल्मी कारोबार का यह नया गणित किसी को भी हैरान कर सकता है. यूटीवी मोशन पिक्चर्स में इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन एंड सिंडीकेशन की उपाध्यक्ष अमृता पांडे कहती हैं, ‘दस साल पहले तक बॉक्स ऑफिस से होने वाली कमाई किसी फिल्म के कारोबार का 90 फीसदी होती थी. अब ये 40-50 फीसदी तक सिमट गई है.’ एक मोटे अनुमान के मुताबिक किसी फिल्म के टीवी प्रसारण अधिकार से फिल्म की कमाई का तीस फीसदी मिल जाता है. बीस फीसदी हिस्सा फिल्म के विदेशों में प्रसारण, संगीत और इंटरनेट अधिकार की बिक्री से निकल आता है. पिछले दस सालों में फिल्मों से कमाई के ढेरों तैयार हुए हैं. अकेले संगीत प्रसारण से कमाई के अब कई विकल्प हैं जैसे रेडियो, केबल व टीवी प्रसारण अधिकार और मोबाइल रिंगटोन. हिंदी फिल्मों को अब नए बाजार भी मिल रहे हैं. ब्रिटेन और अमेरिका जैसे परंपरागत विदेशी बाजारों के अतिरिक्त हिंदी फिल्मों का भावनात्मक पक्ष ब्राजील, पोलैंड ओर चेकोस्लावकिया के दर्शकों को भी लुभा रहा है. पांडे स्वीकार करती हैं, ‘अगर फिल्म थियेटरों में न चले तब भी हमारे पास कई तरीके हैं जिससे हम कोशिश करते हैं दर्शकों के मनचाहे समय और जगह पर हम इसे उपलब्ध करा दें, इसके लिए टीवी, इंटरनेट और वीडियो ऑन डिमांड जैसे विकल्प हैं.’

फिल्मों के कारोबार से जुड़े वित्त विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हर एक विकल्प के माध्यम से ही फिल्म को पांच फीसदी दर्शक मिल जाएं तो फिल्म मुनाफा कमा लेती है. यही वह तरीका है जिसकी बदौलत यूटीवी ने पिछले दिनों तीस मार खां, वी आर फैमिली  और आई हेट लव स्टोरीज  जैसी फिल्मों के बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट जाने के बावजूद मुनाफा कमाया था.

तो आखिर बॉलीवुड में इस बदलाव का निर्णायक मोड़ कहां था? असल में फिल्मों से जुड़े जोखिम को खत्म करने की शुरुआत आज से बारह-पंद्रह साल पहले मानी जा सकती है. तब बॉलीवुड में व्यावसायिक साझेदारी और समझदारी से फिल्में बनने की शुरुआत हुई. इससे पहले माना जाता था कि हिंदी फिल्मों में कहीं न कहीं संदिग्ध फायनेंसरों और माफिया समूहों का पैसा लगा हुआ है. कंपनियों के फिल्म निर्माणक्षेत्र में उतरने के बाद वितरण और मार्केटिंग में भी व्यावसायिकता दिखने लगी. पहले किसी फिल्म के 400 प्रिंट रिलीज होना एक बड़ी बात मानी जाती थी. आज रा.वन और अग्निपथ जैसी फिल्में शुरुआती 4,000 और 2,700 प्रिंटों के साथ रिलीज हो रही हैं. आज फिल्मों की लागत का एक तिहाई हिस्सा उसकी मार्केटिंग पर खर्च होता है. जाहिर है ये किसी रोजमर्रा की वस्तु मार्केटिंग नहीं है जिसे सालों तक के लिए अपना बाजार बनाकर रखना है. इसलिए फिल्म की अपने बजट के हिसाब से इतनी आक्रामक मार्केटिंग होती है ताकि कम से कम पहले हफ्ते के आखिरी तीन दिन तो दर्शकों को बॉक्स ऑफिस तक लाया जा सके. फिल्म कारोबार विश्लेषक इंदु मिरानी बताती हैं, ‘आज फिल्मों का धंधा इतना सुरक्षित हो गया है कि किसी निर्माता की फिल्म फ्लॉप होने की स्थिति में उसके दिवालिया होने की नौबत नहीं आती.’

जिस व्यापार में कम जोखिम पर अच्छा मुनाफा होगा, वहां जाहिर है कई कारोबारी भी आएंगे. हिंदी फिल्म उद्योग में भी यही हो रहा है. अब हमारे यहां थोक में फिल्में (हर साल लगभग 1,000 फिल्में) बन रही हैं. इनमें से ज्यादातर में इस फॉर्मूले का ध्यान रखा जा रहा है कि दर्शकों को रिझाने के लिए ऐसा कोई आकर्षण जरूर हो जिससे फिल्म रिलीज होने के कम से कम दो दिन बाद तक ये थियटरों में भीड़ जुटाती रहे. आइटम नंबर, फाइट सीक्वेंस और नायक की बजाय महानायक की उपस्थिति इन फिल्मों की जान है (बॉडीगार्ड, सिंघम, अग्निपथ और आने वाली फिल्में राउडी राठौर, एक था टाइगर, दबंग 2 और धूम 3).

फिलहाल ज्यादातर प्रोडक्शन हाउसों ने अपने निवेश को तीन तरह की फिल्मों के लिए बांट कर रखा है. बिग, मीडियम और स्मॉल बजट फिल्में. सबसे ज्यादा निवेश बड़े सितारों वाली और एक्शन थीम की फिल्मों के लिए रखा जाता है. मीडियम बजट कॉमेडी और बॉलीवुड की परंपरागत रोमांस वाली फिल्मों के लिए होता है. इनके बारे में समझा जाता है कि इनमें निवेश अधिक सुरक्षित है. छोटा निवेश प्रयोगवादी फिल्मों के लिए होता है. वायाकॉम 18 ने बड़े बजट की फिल्म प्लेयर्स (हाल की सबसे फ्लॉप फिल्म) बनाई थी लेकिन इसका घाटा सुजॉय घोष की कहानी से पूरा कर लिया. यूटीवी अक्षय कुमार की राउडी राठौर बना रहा है. लेकिन इसी प्रोडक्शन हाउस ने पान सिंह तोमर भी बनाई थी. इसी तरह से यशराज फिल्म्स आमिर खान के साथ धूम 3 बना रहा है और इसके साथ ही नए निर्देशक हबीबी फैजल की पहली फिल्म इशकजादे  का भी निर्माता है.

फिल्म लेखिका नंदिना रामनाथ कहती हैं, ‘फिल्मों में एक बड़ा बदलाव उनके बजट में आया है. आजकल एक औसत बजट की फिल्म से आप बेहतर बिजनेस की उम्मीद कर सकते हैं. एक ऑफबीट फिल्म के लिए एक 300 सीट के मल्टीप्लेक्स को भरना आसान है बजाय 900 सीट के एक सिंगल स्क्रीन के. लेकिन मल्टीप्लेक्स अपने भारी खर्चे की वजह से बड़ी फिल्मों को दिखाने में ही दिलचस्पी दिखाते हैं.’

फिल्मों के इस बदलते कारोबार में बेशक दर्शक हाशिये पर पहुंच रहे हैं लेकिन आज भी एक बात जो नहीं बदली वह यह कि उनके लिए फिल्में एक टाइमपास हैं. और वह उन्हें नहीं मिलेगा तो उनके पास भी अब टीवी शो- क्रिकेट सहित कई विकल्प हैं.

‘मेरे लिए तो मेरा कच्चा रास्ता उनकी सड़क से बेहतर है’

मेरा बचपन मेरठ में गुजरा. मेरे पिता कवि थे और एक सरकारी दफ्तर में काम करते थे. सिनेमा ही हमारे मनोरंजन का इकलौता साधन था. बचपन की देखी फिल्में याद करूं तो मुझे ‘परदे के पीछे’ याद आती है. उसमें विनोद मेहरा और नंदा थे. लेकिन फिल्मों में असली रुचि ‘शोले’ से जगी. तब हम पांचवीं-छठी कक्षा में पढ़ते थे. उसके बाद तो अमिताभ बच्चन के ऐसे दीवाने हुए कि उनकी ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘नसीब’, ‘सुहाग’, हर फिल्म देखी. ऐसी फिल्में ही हम देखते थे. इन फिल्मों ने ही असर डालना शुरू किया. श्याम बेनेगल की एक-दो फिल्में भी देखी थीं. कॉलेज में आते-आते ‘उत्सव’ और ‘कलयुग’ आ गई थीं. उस दौर की फिल्म ‘विजेता’ याद है. ज्यादातर फिल्में दोस्तों के साथ देखीं. फिल्मों में इंटरेस्ट था, लेकिन मैं इतना सीरियस दर्शक नहीं था. सच कहूं तो बहुत बाद में म्यूजिक डायरेक्टर बन जाने के बाद भी फिल्मों और डायरेक्शन का खयाल नहीं आया था.

मेरे पिता जी ने मुंबई आकर फिल्मों के लिए कुछ गाने भी लिखे. उनकी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से दोस्ती थी. मेरे पिता जी का नाम राम भारद्वाज हुआ. वे शौकिया तौर पर गाने लिखते थे. वे छुट्टी लेकर मुंबई आते. बाद में उन्होंने बिजनेस में आने की भी कोशिश की. फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन में उतरे, लेकिन नाकाम रहे. उस वजह से घर कर्ज में आ गया. मेरा तो तब संगीत का भी इरादा नहीं था. मैं क्रिकेट खेलता था और उसी में आगे बढ़ना चाहता था. तब मैं स्कूल की टीम में खेलता था और उत्तर प्रदेश की तरफ से खेलने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी भी गया था. दिल्ली आने पर एक दोस्त की वजह से संगीत में दिलचस्पी हुई. मेरी दिलचस्पी थी संगीत में, लेकिन संगीतकार बनने के बारे में नहीं सोचा था. यह इंटरेस्ट बाद में इतना सीरियस हो गया कि क्रिकेट छूट गया.

उन दिनों गजलों का दौर था. हम सभी गजल गाते थे. एक दोस्त पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के जानकार थे. उनके साथ रहने से पश्चिमी संगीत का ज्ञान बढ़ा. मैंने ‘पेन म्यूजिक’ रिकॉर्डिंग कंपनी ज्वाइन कर ली. उसी जॉब में ट्रांसफर लेकर मुंबई आ गया. एक-डेढ़ साल यहां स्ट्रगल किया. तभी दिल्ली में गुलजार साहब से मुलाकात हुई. दरअसल मैं लंबे अरसे से उनसे मिलना चाहता था. उसके लिए युक्ति की थी. उन्होंने हौसला बढ़ाया और पीठ पर हाथ रखा. गुलजार भाई की वजह से ही मैं कुछ बन पाया. वे मेरे पिता की तरह हैं. उन्हीं के साथ ‘चड्डी पहन के फूल खिला है’ गीत की रिकॉर्डिंग की. उसके बाद ‘माचिस’ का ऑफर मिला और मैं फिल्मों के लिए संगीत बनाने लगा.

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. लोग मेरे काम को पसंद भी कर रहे थे, लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में स्पॉट ब्वॉय से लेकर प्रोड्यूसर तक के मन में डायरेक्टर बनने की ख्वाहिश रहती है. मैं अक्सर कहता हूं कि हिंदुस्तान में फिल्म और क्रिकेट दो ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में हर किसी को लगता है कि उससे बेहतर कोई नहीं जानता. सचिन को ऐसा शॉट खेलना चाहिए और डायरेक्टर को ऐसे शॉट लेना चाहिए. हर एक के पास अपनी एक कहानी रहती है. रही मेरी बात तो संगीतकार के तौर पर जगह बनाने के बाद मैं फिल्मों की स्क्रिप्ट पर निर्देशकों से बातें करने लगा था. स्क्रिप्ट समझने के बाद ही आप बेहतर संगीत दे सकते हैं. स्क्रिप्ट सेशन में निर्देशकों से ज्यादा सवाल करने लगा था. उन बैठकों से मुझे लगा कि जिस तरह का काम ये लोग कर रहे हैं, उससे बेहतर मैं कर सकता हूं. इसी दरम्यान संगीत निर्देशन के लिए फिल्मों का मिलना कम हो गया तो लगा कि इस रफ्तार से तो दो साल के बाद मेरे लिए काम ही नहीं रहेगा. मेरा काम और एटीट्यूड भी आड़े आ रहा था. उन्ही दिनों संयोग से मुंबई में इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल हुआ. तब यह देश के विभिन्न शहरों में हुआ करता था. गुलजार साहब की वजह से मैं फेस्टिवल देखने गया. वे अपने साथ ले जाते थे. उस फेस्टिवल में किस्लोवस्की की फिल्म ‘रैड’, ‘ब्लू’ और ‘व्हाइट’ देखी. उसे देखने के बाद झटका लगा. एहसास हुआ कि फिल्में तो ऐसी ही होनी चाहिए. अगले साल त्रिवेंद्रम में किस्लोवस्की की ‘डे के लॉग’ देखी. उसे देखकर मेरा दिमाग खराब हो गया. मुझे लगा कि सिनेमा इतनी बड़ी मानवीय अभिव्यक्ति है. उससे पहले सिनेमा मेरे लिए सिर्फ मनोरंजन था. सिनेमा का वास्तविक असर उस फिल्म को देखने के बाद ही हुआ. उसके बाद मैंने फिल्म फेस्टिवल मिस नहीं किए. फेस्टिवल की फिल्में देख-देख कर फिल्मों के बारे में जाना और समझा. फिल्म फेस्टिवल ही मेरा फिल्म स्कूल रहा.

उससे पहले जो सिनेमा देखा था, उसे और उसके असर को भूला (अनलर्न) तो नहीं जा सकता. हमारे अवचेतन में सारे अनुभव जमा हो जाते हैं, लेकिन सही में सिनेमा की शक्ति, अभिव्यक्ति और मीडियम की समझ फेस्टिवल की फिल्मों के बाद ही आई. बहुत बड़ा कंट्रास्ट था. उन फिल्मों ने हिला कर रख दिया कि फिल्में इस तरह से भी असर कर सकती हैं. हमारी कमर्शियल फिल्में मुख्य रूप से मनोरंजन होती हैं. विषय और प्रभाव के स्तर पर वे सतह पर ही रहती हैं. जबकि अच्छी फिल्में तो सीने में कुछ जोड़ देती हैं. सत्यजित राय की फिल्में देखीं. उनकी ‘चारुलता’ कई बार देखी. इतने बड़े फिल्मकार को लोगों ने बदनाम कर दिया कि वे केवल गरीबी बेचते हैं. हिंदुस्तान में अगर गरीबी है तो क्यों नहीं दिखायी जाए? हमें गरीबी पर शर्म नहीं आती, उन पर बनी फिल्मों पर आती है. उन्होंने 40-50 साल पहले जैसी फिल्में बनाईं, वैसी फिल्में आज भी फिल्ममेकर नहीं बना पा रहे हैं. उनकी ‘चारुलता’ की छवियां ‘देवदास’ की ऐश्वर्या राय में दिखती हैं.

अवसर कब आपके सामने आ जाएगा, आपको पता नहीं चलेगा. आपको हमेशा अपनी क्रिएटिविटी की बंदूक लोड करके रखनी होगी

इन सब फिल्मकारों के असर और अपने भीतर की बेचैनी में मैंने निर्देशन पर किताबें पढ़नी शुरू कर दीं. खासकर ‘आर्ट ऑफ रोमांटिक राइटिंग’ का बहुत असर हुआ. उन दिनों जीटीवी के लोग ‘गुब्बारे’ के संगीत के लिए मेरे पास आए. मैंने एक शर्त रखी कि मैं आपका म्यूजिक कर दूंगा लेकिन आप मुझे एक शॉर्ट फिल्म बनाने के लिए दो. एक तरह से उन्हें ब्लैकमेल किया और मुझे दो शॉर्ट फिल्में मिल गईं. उन फिल्मों को करने के बाद लगा कि मैं कितना खराब लेखक हूं. सबसे पहले मुझे लिखना सीखना होगा.

उत्तराखंड का मेरा एक दोस्त प्रेम कहानियों की एक सीरीज कर रहा था. मैंने उसे दो और कहानियों के बीच अपनी कहानी रख कर दे दी. उसे कहानी पसंद आई तो फिर स्क्रीनप्ले और संवाद मैंने ही लिखे. फिर भी लगा कि लेखन पर पढ़ना जरूरी है. बहुत पढ़ने के बाद नए विषय की खोज में निकला. अब्बास टायरवाला के पास एक थ्रिलर कहानी थी ‘मेहमान’. मैं मनोज बाजपेयी से मिला. वह मेरा दोस्त था. उसे बड़ी रेगुलर टाइप की कहानी लगी. उस वक्त मेरे पास हिंदुस्तान-पाकिस्तान के दो सैनिकों की एक कहानी थी. उन्होंने कहा कि इस पर काम करते हैं. वे फिल्म के लिए राजी हो गए. इसी बीच रॉबिन भट्ट ने मुझे अजय देवगन से मिलवा दिया. उन्हें कहानी पसंद आ गई और वे फिल्म प्रोड्यूस करने के लिए तैयार हो गए. फिल्म के गाने रिकॉर्ड हो गए, एक्टर साइन हो गए और लोकेशंस देखी जाने लगीं. मगर इस बीच उनकी ‘राजू चाचा’ फ्लॉप हो गई. एक महीने बाद मेरी फिल्म की शूटिंग थी, लेकिन वह ठप हो गई. उस फिल्म की स्क्रिप्ट और गानों पर मैंने एक साल से अधिक समय तक काम किया था.

उसके बाद मैंने हर डायरेक्टर को कहानी सुनाई. एक्टर कहानी सुनने के नाम पर भाग जाते थे और प्रोड्यूसर मेरी कहानी समझ नहीं पाते थे. मुंबई में ज्यादातर प्रोड्यूसर को नाम समझ में आता है, काम समझ में नहीं आता है. एक साल की कोशिश के बाद भी कुछ नहीं हुआ तो मैं चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी गया. वहां ‘मकड़ी’ की स्क्रिप्ट जमा की. वह उन्हें पसंद आ गई. वह स्क्रिप्ट मजबूरी में मैंने स्वयं लिखी थी. तब मेरे दोस्त अब्बास टायरवाला व्यस्त थे और मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि किसी लेखक को दूं.

‘मकड़ी’ के साथ दूसरे किस्म का हादसा हुआ. फिल्म बन जाने के बाद सोसायटी ने फिल्म रिजेक्ट कर दी. कहा, बहुत ही खराब फिल्म है. मैंने गुलजार साहब और दोस्तों को दिखाई. सभी को फिल्म अच्छी लगी. मैंने फिल्म को स्वयं रिलीज करने का फैसला किया. दोस्तों से पैसे उधार लेकर चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी के पैसे वापस किए. उन दिनों मल्टीप्लेक्स शुरू हो रहे थे. मेरी फिल्म डेढ़ घंटे की थी. ऐसी फिल्म के लिए कोई स्लॉट नहीं था. उसे बेचने और रिलीज करने में नानी याद आ गई. लेकिन ‘मकड़ी’ रिलीज होने के बाद कल्ट फिल्म बन गई और मेरा सफर शुरू हुआ.

यूं तो ‘मकड़ी’ और ‘मकबूल’ भी जैसी मैं चाहता था, वैसी ही बनीं लेकिन उनके बाद अड़चनें कम हो गईं. ‘मकड़ी’ के बारे में ज्यादातर लोग मानते हैं कि वह बच्चों की फिल्म है. ‘मकड़ी’ में मुझे 12 लाख का नुकसान हुआ था. ‘मकबूल’ के साथ मामला अलग हुआ. उसे बनाने के लिए पैसे नहीं मिल रहे थे. एक्टर भी तैयार नहीं हो रहे थे. मैंने तब एनएफडीसी भी संपर्क किया तो उन्हें फिल्म का बजट ज्यादा लगा. मैंने बैंक लोन की कोशिश की तो वह अटका रहा. तभी संयोग से बॉबी बेदी से मुलाकात हो गई. बॉबी बेदी उस फिल्म के निर्माण के लिए तैयार हो गए. उन्होंने कहा कि फिल्म का बजट ज्यादा है, लाभ हुआ तभी तुम्हें पैसे दूंगा. इस तरह मैंने फ्री में ही काम किया. इस फिल्म से मुझे कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ, लेकिन फिल्म पसंद आई और मुझे पांव टिकाने की जगह मिल गई. डायरेक्टर के तौर पर मुझे स्वीकार कर लिया गया. उस फिल्म की वजह से मुझे आमिर खान ने बुलाया. हालांकि वह फिल्म नहीं बन पाई. उसके बाद ‘ओमकारा’ में मेरे साथ सारे एक्टर काम करना चाहते थे.

 हमारे यहां एक अजीब-सा सिस्टम है जिसमें सबके लिए जगह है. ‘इश्किया’ भी हिट होती है और ‘वो आती जवानी रात में’ भी चलती है अब तक मेरी समझ में आ गया था कि यह माध्यम निर्देशक का ही है. निर्देशक गलत भी बोल रहा हो तो सभी को बात माननी पड़ेगी. साथ ही यह भी लगा कि फिल्म मेकिंग से बड़ा कोई क्रिएटिव एक्सप्रेशन नहीं है. यह सारे फाईन आर्ट्स का समागम है. इसमें संगीत, कविता, नाटक, सब कुछ है. फिल्ममेकर होने पर सर्जक की फीलिंग आ जाती है. हां, कभी-कभी तानाशाह भी बनना पड़ता है, लेकिन कभी-कभी बच्चे की तरह सुनना भी पड़ता है. निर्देशक को हर तरह की सलाह और विचार के लिए खुला रहना होता है. आप अपने फैसलों पर दृढ़ रहें, लेकिन अहंकार और डिक्टेटरशिप आ गई तो आपके हाथ से कमान छूट भी सकती है.

लेकिन यहां तक पहुंचना इतना आसान नहीं था. मुझे भी जल्दी अवसर नहीं मिला. लंबा संघर्ष करना पड़ा. एक बात गुलजार साहब ने समझाई थी कि अवसर टारगेट की तरह होते हैं. वह कब आपके सामने आ जाएगा, आपको पता नहीं चलेगा. आपको हमेशा अपनी क्रिएटिविटी की बंदूक लोड करके रखनी होगी. अगर आप यह सोचते हैं कि अवसर आएगा तो गन साफ करके, गोली भरकर, फिर फायर करेंगे तो टारगेट निकल जाएगा. इसलिए हमेशा तैयार रहना होगा और धैर्य भी बनाए रखना होगा.

संघर्ष लंबा तो था लेकिन मुझे लगता है कि हमारी फिल्म इंडस्ट्री में बाहर से आने वाले लोगों के जितने विरोधी हैं, उससे ज्यादा समर्थक हैं. मैं अपनी ही फिल्मों की बात करूं तो अब मेरी ऐसी कमाल की जगह बन गई है कि मुझे हिट या फ्लॉप की चिंता नहीं रहती. अब फर्क नहीं पड़ता कि कौन क्या बोल रहा है. सच तो बाहर आ ही जाता है. यह नैचुरल प्रोसेस है. यह सभी के साथ होगा, इसलिए बगैर घबराए ईमानदारी से अपनी सोच पर काम करने की जरूरत है. अगर सभी लोग सड़क पर चल रहे हों और आप निकल कर कच्चे रास्ते पर आ जाएंगे तो लोग कहेंगे कि उल्लू का पट्ठा है. वे आपको खींच कर सड़क पर लाने की कोशिश करेंगे. उन्हें डर रहेगा कि कच्चे रास्ते से ही कहीं यह आगे न निकल जाए. वे चाहेंगे कि हम उनकी चाल में आ जाएं. लेकिन मेरे लिए तो अपना चुना कच्चा रास्ता ही ज्यादा अच्छा है.

लेकिन इस कच्चे का अर्थ डार्क फिल्म नहीं था. यह संयोग से ही हुआ कि मेरी फिल्में डार्क होती हैं. बस लोगों को पसंद आ गईं फिल्में. मुझे मानव मस्तिष्क में चल रही खुराफातें आकर्षित करती हैं. इंसानी दिमाग की अंधेरी तरफ जबरदस्त ड्रामा रहता है. हमलोग सिनेमा में उसे दिखाने से बचते हैं. हम लोग डील ही नहीं कर पाते. मुझे लगता है कि इस पर काम करना चाहिए. अगर ‘मैकबेथ’ और ‘ओथेलो’ चार सौ साल से लोकप्रिय है तो उसकी अपील का असर समझ सकते हैं. सच कहूं तो मैं तो कॉमेडी फिल्म बनाने की पूरी तैयारी कर चुका था. ‘मिस्टर मेहता और मिसेज सिंह’ की स्क्रिप्ट तैयार थी, लेकिन वह फिल्म नहीं बन सकी.

अब भी मैं देश-विदेश की फिल्में देखता रहता हूं. मुझे व्यक्तिगत तौर पर स्कॉरसीज, कपोला, वांग कार वाई और किस्लोवस्की की फिल्में पसंद हैं.

राजकुमार हिरानी की ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ देख कर बहुत जोश आया और प्रेरणा मिली. ‘लगान’ या ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ बना पाना बहुत मुश्किल है जिसमें मुख्यधारा में भी रहंे और अपने सेंस भी ना छोड़ें. आप पूरी डिग्निटी के साथ एक बड़ी फिल्म बना दें, यह बड़ा मुश्किल काम है. दर्शकों में जहां एक्सपोजर है, जहां अच्छी पढ़ाई-लिखाई है, उनकी समझ अलग है. जहां रोटी-पानी के लिए ही दिक्कत है, उनको फिर आप उस तरह से सिनेमा कैसे दिखा सकते हैं? हमारे यहां ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ भी हिट होती है, ‘इश्किया’ भी हिट होती है. ‘वो आती जवानी रात में’, वो भी चलती है अपने लेवल पर. हमारे यहां दर्शकों के तीन-चार प्रकार हैं. एक अजीब-सा सिस्टम है जिसमें सबके लिए जगह है. आप जिस तरह के लोगों से आयडेंटीफाई करते हैं, अगर उन्हीं से आप प्रशंसा चाहते हैं तो फिर आपको उन्हीं के लिए फिल्म बनानी चाहिए.

लेकिन मेरे खयाल से अब भी हिंदी सिनेमा में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है. हम अभी भी जीरो हैं. आप्रवासी भारतीयों की संख्या ज्यादा है. वे फिल्में देखने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करते हें. किसी भी फिल्म का बिजनेस 75 और 100 करोड़ हो जाता है, लेकिन क्वालिटी जीरो रहती है. मेरे खयाल से ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद कोई भी हिंदी फिल्म इंटरनेशनल स्टैंडर्ड की नहीं बनी है. मीरा नायर की फिल्में अच्छी होती हैं. अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारा कमर्शियल सिनेमा ‘लाफिंग स्टॉक’ ही है. माना जाता है कि हम केवल हंसते-नाचते और गाते रहते हैं. धारणा ऐसी बन गई है कि हमारी फिल्मों को गंभीरता से नहीं लिया जाता. अजीब बात तो यह है कि टोरंटो फेस्टिवल में ‘कभी अलविदा ना कहना’ चुन ली जाती है और ‘ओमकारा’ रिजेक्ट हो जाती है. मैं यह नहीं कहता कि एक ही प्रकार का सिनेमा बने. हर कोई ‘ओमकारा’ बनाने लगेगा तो माहौल रूखा हो जाएगा. लेकिन ऐसा चुनाव मेरी समझ में नहीं आता और मैं कनफ्यूज्ड हो जाता हूं.

इस पर यह और कि मुंबई में जान-पहचान के लोग केवल फिल्मों की ही बातें करते हैं. बचने के लिए मैं अक्सर मुंबई से बाहर निकल जाता हूं. आम आदमी की तरह रहने और जीने की कोशिश करता हूं. टिकट की कतार में लग जाता हूं, किसी रेस्तरां में बैठ जाता हूं. बाहर निकलो तो दुनिया के आम लोगों से मेलजोल होता है और अपनी भी खबर लगती है. पता चलता है कि अभी क्या और कैसे हो रहा है. वैसे तो सूचना के इतने माध्यम आ गए हैं, लेकिन दुनिया से सीधे जुड़ने का अब भी कोई विकल्प नहीं है.

इन दिनों एक बहुत अच्छा परिवर्तन यह आया है कि मल्टीप्लेक्स के आने की वजह से छोटी और गंभीर फिल्में भी हिट हो रही हैं. मुझे लगता है कि राज कपूर के समय में श्याम बेनेगल और सत्यजीत रे की फिल्मों के दर्शक बिल्कुल नहीं थे. अब 25 प्रतिशत दर्शक वैसे हैं. उस वक्त विश्व सिनेमा का बिल्कुल एक्सपोजर नहीं था. यूरोपियन फिल्में आती नहीं थीं. फेस्टिवल में खास प्रतिशत में ही लोग देखते थे. करोड़ों की आबादी में चार हजार लोग ही ढंग की विदेशी फिल्में देख पाते थे. अब एक्सपोजर के बाद दर्शक और फिल्ममेकर दोनों बदले हैं. पहले शायद मजबूरी में राज कपूर को व्यावसायिक फिल्में बनानी पड़ती होंगी. हमें नहीं पता. हो सकता है कि राज कपूर यूरोप में जाकर देखते हों तो उनको लगता हो कि यार मैं ऐसी फिल्में बना पाता, पर मेरे देश में दर्शक ही नहीं हैं यह देखने के लिए. आज वे होते तो बहुत खुश होते.

जादू की क्लिप

हिंदी सिनेमा में स्त्री

 रा.वन की शुरुआत के एक दृश्य में बहुत सारे मेकअप और कम कपड़ों के साथ सलीब पर लटकी प्रियंका ‘बचाओ बचाओ’ की गुहार लगा रही हैं और तब हीरो शाहरुख उन्हें बचाने आते हैं. यह सपने का सीन है लेकिन हमारे सिनेमा के कई सच बताता है. एक यह कि हीरोइन की जान (और उससे ज्यादा इज्जत) खतरे में होगी तो हीरो आकर बचाएगा और इस दौरान और इससे पहले और बाद में हीरोइन का काम है कि वह अपने शरीर से, पुकारों से और चाहे जिस भी चीज से, दर्शकों को पर्याप्त उत्तेजित करे. लेकिन अच्छा यही है कि इज्जत बची रहे और लड़की इस लायक रहे कि हीरो उसे साड़ी पहनाकर मां के सामने ले जा सके.

हिंदी फिल्मों में ‘इज्जत’ सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्दों में से है और जैसा ‘जब वी मेट’ का स्टेशन मास्टर अपनी बिंदास नायिका से कहता भी है कि अकेली लड़की खुली तिजोरी की तरह होती है. यह हैरान करने वाली बात है कि नायिका की इज्जत अगले कुछ ही क्षणों में खतरे में पड़ जाती है और नायक न हो तो अब तक साहसी लग रही नायिका के साथ कुछ भी हो सकता है. इसीलिए वह बार-बार पुरुष के कदमों में गिरती है. अधिकतर जगह नायिका को नायक के बराबर दिखाने वाली ‘बॉबी’ की नायिका भी ‘झूठ बोले कव्वा काटे’ गाने में अपने प्रेमी के पैरों की धूल अपने माथे पर लगाती है. क्योंकि जब वह मायके जाने की बात करती है तो प्रेमी दूसरा ब्याह रचाने को कहता है और लड़की तुरंत कदमों में – ‘मैं मायके नहीं जाऊंगी’.

‘इंसाफ का तराजू’ की जीनत अपने पति से कहती है, ‘हां, शादी के बाद मैं मॉडलिंग नहीं करूंगी.’ ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की सिमरन कहती है कि सपने नहीं देखूंगी. ‘अभिमान’ की जया कहती है कि गाना नहीं गाऊंगी. बहुत सारी फिल्मों की नायिकाएं खुशी-खुशी नौकरी छोड़ने और बेडरूम के अलावा कहीं भी छोटे कपड़े न पहनने के लिए तैयार हो जाती हैं और ‘साहिब बीवी और गुलाम’ की छोटी बहू कहती है कि जब तक कोठे पर शराब के नशे में धुत्त पड़े पति के पैरों की धूल नहीं मिलेगी, उपवास नहीं तोड़ेगी.

’जो हुक्म मेरे आका’ वाले इस ‘नहीं’ और पैरों की धूल की बात बार-बार होती है. ‘बंदिनी’ की प्रगतिशील लगती नायिका फिल्म के सब मुख्य पुरुष किरदारों के पैर बार-बार छूती है. ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के आखिर में जब सिकंदर अपनी रामकहानी सुनाता है तो राखी उसे भगवान कहते हुए पैरों में गिर जाती हैं.

‘कभी कभी’ में राखी और अमिताभ की शादी नहीं हो पाती क्योंकि अमिताभ नहीं चाहते कि अपनी खुशी के लिए मां-बाप को दुखी किया जाए. इसके बाद आखिर तक फिल्म दुखी अमिताभ को नैतिक रूप से ज्यादा सही दिखाती है और राखी के मन में अपराधबोध रहता है. यह अपराधबोध हमारे समाज और सिनेमा की उन सब लड़कियों में भी है, जो खूबसूरत नहीं हैं, जिनके पिता उनकी शादी के लिए दहेज नहीं जुटा पा रहे या जिनकी तथाकथित इज्जत लुट गई है. ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की जीनत का चेहरा जला हुआ है, इसलिए वह अभागी है और मंदिर में ज्यादा वक्त बिताती है. ‘गाइड’ सबसे विद्रोही फिल्मों में से है, जिसकी नायिका बिना तलाक लिए अपने पति को छोड़ती है और एक गाइड के साथ लिव-इन में रहती है, लेकिन उसमें भी देव आनंद जब वहीदा को अपनी मां के पास ले जाते हैं तो कहते हैं कि मां, यह एक अभागन है.

वे अब भी प्रेम करती हैं और गाने गाती हैं, लेकिन उनके पास जादू की एक क्लिप भी है जिससे वे बाल भी बांधती हैं, ताले भी खोलती हैं और सिर भी

जैसा अमिताभ ‘कभी कभी’ में राखी से कहते हैं, वैसा ही कुछ ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ के शाहरुख काजोल से कहते हैं. वह भागना चाहती है, उसकी मां भी चाहती है कि वे भाग जाएं, लेकिन शाहरुख ‘हिंदुस्तानी’ हैं, उन्हें ‘हिंदुस्तानी लड़कियों’ की इज्जत की फिक्र है. लंदन में पली बढ़ी सिमरन भी ‘मेरे ख्वाबों में जो आए’ गाती है और जब ख्वाब वाला आता है, तब कबूतरों को उड़ाते और बेटियों को बांधते बाउजी की पालतू गाय बनकर अपने पंजाब आ जाती है. जहां खूब सरसों है, गाने हैं, खुशी है लेकिन आजादी नहीं है. ऊपर से उसका प्रेमी उसे यह बता रहा है कि तुम अपने पिता की संपत्ति हो इसलिए उनके साइन के बिना तुम्हें नहीं ले सकता. आखिर में मार खाते हुए वह सिमरन को बाउजी को सौंप भी देता है – आपकी अमानत है – और चूंकि हैप्पी एंडिंग है, लड़की अपने प्रेमी के रूप में दूसरे बाउजी के साथ चली जाती है.

यही फिल्मों की अच्छी भारतीय लड़की की परिभाषा है. ‘कुछ कुछ होता है’ के शाहरुख को भी यही चाहिए, इसीलिए माइक्रो मिनी स्कर्ट वाली रानी ‘ओम जय जगदीश हरे’ गाकर अपनी पवित्रता सिद्ध करती हैं. अच्छी लड़कियों को इसी तरह पवित्र रहना होगा क्योंकि जैसा अधिकांश हिंदी फिल्मों की तरफ से ‘जख्मी औरत’ की डिंपल अदालत में कहती हैं कि औरत की इज्जत एक बार लुट गई तो कभी नहीं लौट सकती या ‘इंसाफ का तराजू’ की नायिका कहती है कि औरत के मन की पवित्रता से बड़ी उसके तन की पवित्रता है. यह तब, जब ये फिल्में उन औरतों की कहानियां हैं, जो ‘एंग्री यंग मैन’ के से तेवरों से अपने बलात्कारियों को खत्म करती हैं. इसी साल आई ‘हेट स्टोरी’ की नायिका ऐसे एक हादसे के बाद कहती है कि शहर तो बदला जा सकता है, शरीर नहीं.

हालांकि नायिका की इज्जत तो आम तौर पर बचा ली जाती है, लेकिन नायक की बहनें अक्सर नहीं बच पातीं. वे इस तरह कहानी में मकसद पैदा करती हैं. साथ ही खलनायक या नायक के विरोधी पक्ष के किसी भी आदमी की बेटियां, बहनें किसी बहाने से नायक के करीब आने की कोशिश करें तो उसे उनसे कैसा भी सलूक करने का पूरा हक है. ‘बाजीगर’ में वह उनसे प्यार करके उनकी हत्या कर सकता है और ‘बंदिनी’ में तो खुद नूतन एक औरत की इसलिए हत्या कर देती हैं क्योंकि उनके देशभक्त प्रेमी ने उनसे शादी न करके उस औरत से की. फिल्म उस प्रेमी से कभी सवाल नहीं करती और नूतन ने तो खैर अच्छा काम किया ही.

हीरोइन के नहाने, तैरने या कपड़े बदलने के दृश्य अक्सर उसे चाहने वाले पुरुष की मौजूदगी में और सिर्फ उसकी मौजूदगी में ही होते हंै. ऐसा नहीं कि वह हेलन की तरह आधे-अधूरे कपड़ों में भीड़ के सामने कैबरे में नाचने लगे. तब उसे अपने प्रेमी के साथ कुर्सी पर बैठकर वह नाच देखना चाहिए और जब कैबरे डांसर नाचती हुई आकर प्रेमी को यहां-वहां छुए तो मुस्कुराते रहना चाहिए या ज्यादा से ज्यादा कुछ सेकंड का झूठा गुस्सा दिखाना चाहिए. नायिका ‘शोले’ में खलनायक के सामने नाचेगी तो नायक की जान बचाने के लिए. तब सब चलता है. तब वह ‘चोली के पीछे क्या है’ पर भी नाच सकती है, भले ही वह पुलिस ऑफिसर हो. नायक की जान बचाना महान काम है और उसके जीवन का जरूरी कर्तव्य. इसके बदले में वह कभी भी ‘डर’ के सनी की तरह खून से उसकी मांग भरेगा और कहेगा, ‘तुम कहीं भी जाओ, रहोगी तो किरण सुनील मल्होत्रा ही.’

‘तुम मेरी हो’ का यह अधिकार अनगिनत गानों के बोलों में भी देखा जा सकता है और ‘ब्लड मनी’ के कुणाल खेमू अपने सच्चे प्यार का ऐलान करते हैं, ‘तेरे जिस्म पे, तेरी रूह पे, बस हक है मेरा.’

रूह का तो कहना मुश्किल है, लेकिन नायिका के इसी जिस्म पर हिंदी सिनेमा का इतना हक रहा है कि वह जैसे ही आजाद होकर इसे अपने सुख के लिए इस्तेमाल करना चाहती है तो संस्कृति घोर खतरे में पड़ जाती है. ‘फायर’ इसीलिए प्रतिबंधित होती है. ऐसा शायद नहीं मिलेगा कि स्पष्ट शारीरिक इच्छाओं के साथ भी वह ‘अच्छी’ लड़की के किरदार में हो और हीरो उससे प्यार करे. संभव है कि यह यथार्थ की विडंबना ही हो कि ‘ओए लकी लकी ओए’ की नायिका की बहन कभी हिन्दी फिल्मों की नायिका नहीं हो पाती. ‘जिस्म’ की बिपाशा या ‘गुलाल’ की आयशा मोहन भी शारीरिक पहलें करती हैं लेकिन यह उनके षड्यंत्र का हिस्सा है और इस तरह वे बुरी हैं, भले ही दूसरी वजहों से. ‘रॉकस्टार’ की नरगिस अपनी जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं करती लेकिन हिंदी सिनेमा के लिए यही बड़ी बात है कि हीरोइन हीरो के साथ जाकर ‘जंगली जवानी’ देखे, और वह भी तब, जब वे प्यार न करते हों. इसी तरह ‘ख्वाहिश’ की मल्लिका लाज-शरम को कूड़ेदान में फेंकती है और कंडोम खरीदने जाती है. ‘नो वन किल्ड जेसिका’ एक कदम आगे जाती है और पत्रकार रानी की प्रेमकहानी दिखाए बिना उन्हें एक लड़के के साथ अंतरंग होते हुए दिखाती है. तभी फोन बजता है और सब कुछ बीच में छोड़कर रानी निकल पड़ती हैं. काम प्यार या सेक्स से ज्यादा जरूरी है या नहीं, ऐसा पहले अक्सर पुरुष ही तय करते आए हैं.

लेकिन ऐसा कम है कि वे काम करती हों या उनका काम, प्रेम या पुरुषों से इतर भी कहानी का हिस्सा हो. अस्सी के दशक की कई फिल्मों में हेमा, डिंपल और रेखा पुलिसवाली बनी हैं, लेकिन वे अक्सर औरतों के या अपने ऊपर हुए अन्याय का बदला ले रही होती हैं. अन्याय और उसकी लड़ाई की कहानियों के अलावा स्त्रियों की मजबूत या मुख्य भूमिकाओं वाली फिल्मों में वे सबसे ज्यादा बार वेश्या या नर्तकी होती हैं. और जहां कहानी अपने मुख्य किरदार के लिंग पर निर्भर नहीं है, वहां निन्यानवे फीसदी संभावना है कि पुरुष ही मुख्य भूमिका में होगा. स्त्री की ‘चमेली’, ‘बवंडर’, ‘पाकीजा’ या ‘डर्टी पिक्चर’ तो हैं लेकिन उसकी कोई ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ या ‘रंग दे बसंती’ नहीं. उनमें वह बस सहायक है. यूं तो ‘आवारा’ में नरगिस और ‘ऐतराज’ में करीना वकील बनी हैं लेकिन दोनों का पेशा फिल्म के लिए तभी अहमियत रखता है, जब उन्हें अपने प्रेमियों/पतियों को बचाना हो. आम फिल्मों में वैसे तो उनका पेशा दिखाने की जरूरत नहीं समझी जाती लेकिन दिखाया जाता है तो सबसे ज्यादा बार वे टीचर या डॉक्टर बनती हैं. वे ‘हम आपके हैं कौन’ जैसी कई फिल्मों में कम्प्यूटर साइंस पढ़ती बताई जाती हैं लेकिन कम्प्यूटर के पास भी नहीं फटकतीं. नायिका को ज्यादा दिमाग के काम करते नहीं दिखाया जाता और अक्सर उसके बेवकूफ होने को उसका ‘क्यूट’ होना कहकर बेचा जाता है. अगर हीरोइन चश्मा लगाती है, खूब पढ़ती है तो या तो फिल्म के अंत तक उसका मेकओवर हो जाएगा और वह आपको एक तड़कते-भड़कते गाने पर नाचकर दिखाएगी या हीरो को दूसरी ‘सुन्दर’ हीरोइन से प्रेम हो जाएगा. चश्मे वाली, पढ़ने-पढ़ाने वाली लड़कियां/औरतें बहुत नाखुश रहेंगी, अतिवादी होंगी और ‘मासूम’ जैसी कई फिल्मों में वे मासूम नायिका को आजादी और स्त्री-समानता जैसी बातों से बरगलाने की भी कोशिश करेंगी लेकिन नायिका झांसे में नहीं आएगी. आखिर में वे लौटकर आएंगी और कहेंगी कि तुम सही थी, पति के बिना जीवन नर्क है. सबक यह कि पढ़ने और सोचने से दिमाग खराब हो जाता है. चश्मा लगाने से चेहरा खराब होता है इसलिए उसे उतरवाने के लिए ‘कल हो न हो’ का शाहरुख जान लगा देगा. इन्हीं सब वजहों से ‘प्यासा’ की माला सिन्हा से ‘चुपके चुपके’ की जया और ‘दिल’ की माधुरी तक वे किताबें लेकर तो बहुत घूमती है, लेकिन उनका खास महत्व नहीं होता. प्यार और शादी के बाद तो बिल्कुल भी नहीं.

अपने करियर में ज्यादा महत्वाकांक्षी होकर ‘आंधी’ या ‘कॉर्पोरेट’ जैसी फिल्मों में वह अपने साथ के पुरुषों जैसे काम करने लगती है तो हारती है, अकेली रह जाती है. यथार्थ क्या सिर्फ इतना ही है या यह उसे सबक है? ‘बन्दिनी’ के अशोक कुमार की वही हिदायत कि पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने की कोई जरूरत नहीं है, यह तुम्हारे लिए बहुत खतरनाक होगा.

सबक बहुत हैं. मसलन बहुत बार वह गुरूर में होगी और गोविन्दा जैसे नायक उसके गुरूर को जूते तले कुचलकर उसे सुधारेंगे और तब प्यार करेंगे. वह किसी ‘भली’ औरत का घर तोड़ने की कोशिश करेगी तो आखिर में लानतें मिलेंगी और मियां-बीवी खुश रहेंगे, भले ही वह ‘सिलसिला’ हो या ‘बीवी नंबर वन’. सबक ‘प्यार का पंचनामा’ जैसी लड़कों की दोस्ती की फिल्में भी हैं, जिनमें उनके ‘बराबर’ काम करने वाली सब लड़कियां संवेदनहीन और बुरी सिद्ध की जाती हैं और लड़के उन्हें गाली देते हुए उनके बिना खुशी से रहना तय करते हैं. लड़कियों की दोस्ती की इक्का-दुक्का ‘टर्निंग थर्टी’ या ‘आयशा’ हैं लेकिन उनमें जय-वीरू की मिसालें कहां!

खैर, नाउम्मीदी की यह पुरुष-सत्तात्मक उमस तो है लेकिन इसमें समय-समय पर ठंडी हवा के झोंके और कभी-कभी एयर कंडीशनर भी हैं. ‘मदर इंडिया’ है जो भूखी औलाद के लिए खाना लाने को कीचड़ में भी उतर सकती है लेकिन साथ ही उस औलाद के कीचड़ होने पर उसे गोली भी मार सकती है. ‘चक दे इंडिया’ है, जिसकी लड़कियों को उन सब चीजों से लड़ने और जीतने की जिद है जो उन्हें चूल्हों और परदों में झोंकना चाहती हैं. ‘डोर’ की गुल पनाग और ‘कहानी’ की विद्या बालन हैं जो भले ही उस परम कर्तव्य यानी पति की जान बचाने या जान का बदला लेने के लिए सैकड़ों किलोमीटर दूर जाएं, लेकिन औरत होना उनके रास्ते में नहीं आता. शरीर न उनकी बाधा बनता है, न हथियार. दिलचस्प यह है कि उनकी कहानियों में पुरुष वैसे ही चुप और भले सहायक हैं, जैसे औरतें ज्यादातर फिल्मों में रहती आई हैं. ‘लव आजकल’ की नायिका शादी से अगले दिन भी शादी तोड़कर किसी और के पास जा सकती है और इस बार उसे मंडप छोड़कर भागने पर ‘कटी पतंग’ की आशा पारेख की तरह उम्र भर पछताना नहीं पड़ता. ‘अर्थ’ की शबाना और ‘लक बाय चांस’ की कोंकणा को कोई शिकवा नहीं, लेकिन वे अपने पुरुषों के बिना अलग रहना चुनती हैं, और इस निर्णय के बाद वे दुखी नहीं हैं. नई पारो भी अपने शक्की और स्वार्थी देव के बिना रो-रोकर नहीं मरती और शादी कर लेती है. ‘एक हसीना थी’ की उर्मिला, ‘खून भरी मांग’ की रेखा और ‘ओमकारा’ की कोंकणा अपने साथ बुरा करने वाले पुरुषों को खत्म करते हुए इस बात का बिल्कुल लिहाज नहीं करतीं कि वे उनके प्रेमी या पति थे. ‘सात खून माफ’ की प्रियंका तो ऐसा छह बार करती हैं. ‘सीता और गीता’ की हेमा और ‘चालबाज’ की श्रीदेवी एक फिल्म के भीतर ही एक कमजोर औरत को निडर औरत का जवाब हैं. ‘आई एम’ की नंदिता दास को बच्चा चाहिए, लेकिन इसके लिए भी उसे किसी की जरूरत नहीं. ‘जूली’ से लेकर ‘क्या कहना’ तक वे बिना शादी के अकेली अपने बच्चे को पालने को तैयार हैं, लेकिन घुटने टेकने के लिए नहीं. ‘चीनी कम’ की तब्बू और ‘जॉगर्स पार्क’ की पेरिजाद को जब प्यार होता है तो उन्हें अपने प्रेमी की उम्र और समाज की तिनका भर भी परवाह नहीं है. ‘वेक अप सिड’ में वह लापरवाह बच्चे जैसे अपने दोस्त को बेहतर जीना सिखाती है और ‘प्यासा’ में वह एक वेश्या है लेकिन पूरे सभ्य समाज के बीच वही है जो उसके नायक को पहचानती है और उसे उसके लक्ष्य तक पहुंचाती है. ‘देव डी’ की चंदा है जो अपनी मर्जी से वेश्या बनती है और पढ़ती भी है, खुश भी रहती है और ‘शोर इन द सिटी’ बिना झिझक के कहती है कि उसकी गृहिणी नायिका ने ‘द एल्केमिस्ट’ अपने प्रकाशक पति से पहले और बेहतर ढंग से पढ़ी है. ‘जुबैदा’ अपने ऊपर लगे सब तालों को तोड़कर फेंकना चाहती है और ‘मम्मो’ देशों के बीच लगे तालों को. ‘तनु वेड्स मनु’ की कंगना शादी के लिए देखने आए लड़के से पव्वा चढ़ाकर मिलती है, जेसिका छूकर गुजरने वाले मनचलों को गालियां देते हुए मारती है और ‘ये साली जिंदगी’ की चित्रांगदा खुद को मारने वाले अपहरणकर्ता को जान से मार देती है.

वे अब भी प्रेम करती हैं और गाने गाती हैं लेकिन उनके पास जादू की एक क्लिप भी है जिससे वे बाल भी बांधती हैं, ताले भी खोलती हैं और सिर भी. उनकी आवाज अब भी नर्म है लेकिन उन्होंने नाखूनों की धार तेज कर ली है.

बाहर देखिए, उजाला हो रहा है.

 

बैलगाड़ी पर मायालोक

आज की ‘मल्टीप्लेक्स पीढ़ी’ को उस दौर की बातें एक पीरियड फिल्म की तरह लग सकती हैं जब सिनेमाहॉल में दर्शक नहीं जाते थे बल्कि सिनेमाहॉल ही उनके द्वार पर पहुंचता था. वह टूरिंग टॉकीजों का दौर था. फिल्म वितरक एक बैलगाड़ी पर पूरी टॉकीज को बिठाकर  कर गांव-गांव ले जाते थे. बांस और कपड़े की मदद से अस्थायी टॉकीज बनती थी और बनते थे देश के सेलीब्रिटी. छत्तीसगढ़ में रायपुर के ललित तिवारी और मुंगेली के बल्लभभाई सोलंकी (हाल ही में दिवंगत हुए) और उनके पुत्र धनेश सोलंकी इसी
पीढ़ी के सदस्य हैं जिन्होंने गांव-देहातों में पहली बार हिंदी सिनेमा की पैठ बनाई.

तहलका से इन लोगों ने उस दौर की फिल्मों, टूरिंग टॉकीजों की मुश्किलों, दर्शकों की प्रतिक्रियाओं सहित कई अनुभवों को साझा किया. ललित तिवारी बताते हैं, ‘जब चालीस-पचास साल पहले फिल्मों के प्रदर्शन का काम प्रारंभ किया तब लोगों के साथ-साथ घरवालों ने भी यह मान लिया था कि हमारी लाइन बिगड़ गई है. उन्हें बहुत बाद में समझ आया कि फिल्में दशा और दिशा भी बदल सकती हैं.’ इसका एक उदाहरण देते हुए वे अपनी बात आगे बढ़ाते हैं , ‘जब वी शांताराम की  फिल्म दुनिया ना माने  सिनेमा हॉल में लगी थी तब बेमेल विवाह करने वाले लोगों के बीच हलचल मच गई थी. फिल्म ‘दहेज’ ने तो समाज के एक बड़े वर्ग को आंदोलित-सा कर दिया था.’ 24 मार्च, 1939 को जन्मे ललित तिवारी अब तो काफी वृद्ध हो गए हैं लेकिन मौका मिलते ही वे अपने पुराने दिनों के सफर में लौटना नहीं भूलते. एक फिल्म प्रदर्शक की हैसियत से छत्तीसगढ़ के छोटे-बड़े इलाकों में रामराज्य, पनघट, भरत-मिलाप, हर-हर महादेव, स्वर्ण सुंदरी, नागिन  जैसी कई सुपरहिट फिल्मों का प्रदर्शन करने वाले ललित तिवारी ने फोटोफोन, बावर, केली और सुपर सिम्पलेक्स ( फिल्म दिखाने वाली मशीन) जैसी कई मशीनों वाला सुनहरा दौर देखा है. फिल्म के वितरण और प्रदर्शन के क्षेत्र में लंबा समय व्यतीत कर चुके तिवारी को कुछ फिल्मों का अनोखा प्रचार अब भी याद है. जेमिनी प्रोडक्शन की रंजन अभिनीत फिल्म चंद्रलेखा  का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि फिल्म की पहली पेटी रायपुर रेलवे स्टेशन से हाथी-घोड़ों के जुलूस के साथ लाई गई थी.

धनेश सालंकी ने भी फिल्मों के प्रचार के इस तरीके को काफी करीब से देखा है. देश के सबसे बड़े सेंट्रल सर्किट सिने एसोसिएशन के प्रारंभिक सदस्य एवं छत्तीसगढ़ में टूरिंग सिनेमा के जन्मदाता के रूप में विख्यात मुंगेली के बल्लभभाई सोलंकी के बेटे धनेश बताते हैं कि वे बचपन से अपने पिता के साथ बैलगाड़ी में रील की पेटी के साथ चावल-आटा-दाल बांधकर गांव-देहात घूमा करते थे. वे बताते हैं, ‘एक फिल्म बारात  जिसमें अजीत थे, के प्रदर्शन के दौरान उनके पिता ने अचानक यह तय किया कि बारात निकाली जानी चाहिए. उनके इस फैसले के बाद एक टूरिंग टॉकीज के गेटकीपर को दूल्हा बनाया गया तो दूसरी टाकीज के गेटकीपर को दुल्हन. बारात निकली और धूम से निकली. कई गांव के लोग बाराती बने और फिल्म बारात  चल निकली. इसी तरह फिल्म पतंग  के प्रचार के लिए बच्चों के बीच पतंग बांटी गई थी.’  धनेश मानते हैं कि पुराने फिल्म वितरक एवं प्रदर्शक अश्लीलता के विरोधी हुआ करते थे. वे ऐसी ही एक घटना का जिक्र करते हैं, ‘एक फिल्म में हीरोइन नलिनी जयवंत हीरो को आंख मारकर रिझाती थीं. इस दृश्य के आते ही दर्शक हो-हल्ला मचाते हुए जमीन पर लोटने लगते थे. वितरक कुछ दिनों तक हो-हल्ला बर्दाश्त करते रहे अंततः उन्होंने सेंसर की परवाह किए बगैर आंख मारने वाले दृश्य पर कैंची चला दी.’  सोलंकी मानते हैं कि जब तक फैशन धोती-कुर्ते, पैंट-शर्ट यहां तक बैलबाटम में सीमित था तब तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था लेकिन जब पैंट की जगह हाफपैंट और साड़ी की जगह बिकनी ने ले ली तब गड़बड़ियां शुरू हो गईं. तब फिल्में देखने के लिए काफी दर्शक जुटने लगे. टूरिंग टॉकीजें बिककर टॉकीजें बन गईं. लेकिन बाद में जब दर्शकों को किनारे करके फिल्में बनने लगीं तो इन टाॅकीजों के एक गोदाम में तब्दील होने में भी देर नहीं लगी. रायपुर के ललित तिवारी अपने संघर्ष के बाद शारदा, मनोहर, लक्ष्मी और अमर छविगृह के प्रोप्राइटर बन बैठे थे. अब उनके पास मात्र एक छविगृह श्याम मौजूद है. इसी तरह मुंगेली के बल्लभभाई सोलंकी की आखिरी ख्वाहिश राधाकृष्ण छविगृह ने भी हाल ही में दम तोड़ दिया है. सोलंकी के पुत्र धनेश कहते हैं, ‘पिता जी के सिनेमाई जुनून ने हमारे परिवार के आठ लोगों का पेट पाला, लेकिन हम आठ लोग उनके एक सिनेमाहॉल को नहीं बचा पाए.’ 

‘गांव के गुंडों को फ्री में फिल्म दिखाते थे’

किसी गांव में लगने वाले मेले को एक भरा-पूरा मेला तब तक नहीं माना जाता था जब तक वहां सिनेमा का प्रदर्शन न हो. एक खुले मैदान को बांस-बल्लियों और बोरे से घेरने के बाद मचान पर खड़े होकर कोई चिल्लाता था- चले आइए.. चले आइए… हाजिर की हुज्जत नहीं, गैर की तलाश नहीं. हंसने-हंसाने के लिए हो जाइए तैयार. सिर्फ दो आने का खेला है साहेब… पूरे परिवार को गुदगुदाने के लिए आ गए हैं शेखचिल्ली भगवान दादा. साथ में है महिपाल और आपके रातों का कत्ल करने वाली हसीना श्य..या…य्यामा.

टाकीज के बाहर निर्मित किए एक मचान पर एक व्यक्ति टिन वाली पेटी जिसमें फिल्म वितरक कंपनी का नाम अंकित रहता था, लेकर मौजूद रहता था. पेटी के एक हिस्से में दो आने (बारह पैसे)  रखे जाते थे और फिर दर्शकों को टिकट थमा दी जाती थी. फट्टा टॉकीज के भीतर प्रवेश करने के बाद बीड़ी-सिगरेट सुलगाने की छूट इस चेतावनी के साथ दी जाती थी कि परदा जला तो जुर्माना भुगतना होगा. जुर्माना नहीं देने पर जेल की हवा खानी होगी. हां एक बात और यह कि फट्टा टॉकीज जिस जगह लगती थी उस इलाके के कुंदन-सुंदन मसलन छुरे-चक्कू और कटार रखने वाले दादाओं को फोकट में फिल्म दिखाई जाती थी. कुछ इलाकों में वहां के रसूखदार व्यक्ति को प्रत्येक रात के लिए बतौर मुख्य अतिथि के तौर पर बुक कर लिया जाता था. मुख्य अतिथि प्रोजेक्टर के बगल में बैठकर चाय-नाश्ता तो करता ही था हर शो में वह एक ही बात दोहराता था- चुपचाप सनेमा देखो बे… दिमाग मत खराब करो… क्यों गांव के नाम को बट्टा लगा रहे हो सालो… बस चारमीनार सुलगाने के बाद मूंछों पर ताव देने वाली इतनी घुड़की सबके लिए पर्याप्त होती थी.

                                                                                                                                    – ललित तिवारी

 

 

‘महिलाओं को लगता था कि सारे हीरो बाएं हाथ से ही घूंसे चलाते हैं’

रायपुर के ललित तिवारीटाकीज के बीचोबीच सफेद परदा टांगा जाता था. मर्द सामने बैठते थे जबकि महिलाएं पर्दे के पीछे. अमिताभ बच्चन ने तो बहुत बाद में उल्टे हाथ से घूंसे चलाए. हकीकत यह थी कि प्रोजेक्टर के दूसरे छोर में बैठने वाली औरतों को हमेशा से यही लगता था कि जो हीरो होता है वह उल्टे हाथ से ही सब कुछ करता है. कुंआरी लड़कियां रूमालों में हीरो का नाम काढ़ती थीं. जबकि कुंआरे लड़के हीरोइनों के दीवाने हुआ करते थे. कोई अपने आपको खुर्शीद का दीवाना बताकर खुश होता था तो कोई स्वर्णलता के पीछे पागल था. फिल्म शुरू होती थी तो फिल्म आनंदमठ का एक गीत चोंगे में जरूर बजता था- हरे मुरारे मधु कैटभ हारे.. गोपाल गोविंद मुकुंद शौरे….जय जगदीश हरे. इस गीत के बाद प्रोजेक्टर चालक एक बार फिर चोंगे से चेतावनी देता था- ‘मेहरबान. सावधान. हम आज का खेला शुरू करने जा रहे हैं. फिल्म में रील बदलने के दौरान दो छोटे और एक बड़ा मध्यांतर किया जाएगा. कृपया शांति बनाए रखिएगा. जो शोर मचाएगा उसे बाहर कर दिया जाएगा.’ रील बदली जाती थी तो सिसकारियों और चीखों के साथ सीटियां बजती ही थीं. कई बार तो बात मादर-फादर से होते हुए सिनेमा मालिक के खानदान के कपड़े उतारने तक पहुंच जाती थी. इसी एक मुद्दे पर गेटकीपर की एंट्री होती थी. वह हर चेहरे पर रोशनी फेंककर यह जानने की कोशिश करता था कि आखिर वह शख्स कौन हैं. आखिर में इस ड्रामे का अंत ऐसे होता था कि शख्स दर्शकों के बीच मौजूद किसी जासूस की वजह से पकड़ा जाता या बोरे को चीरते हुए भाग खड़ा होता.

                                                                                                                                                                                      -धनेश सोलंकी

 

छोटी-सी कहानी है…

तीन मई को भारतीय सिनेमा अपने सौवें बरस में दाखिल हो जाएगा. हिंदी के कथा संसार की उम्र भी लगभग इसके बराबर है- शायद कुछ बरस ज्यादा, लेकिन दोनों समकालीन कहे जा सकते हैं. हिंदी की पहली आधुनिक कहानी कहलाने की होड़ जिन रचनाओं में दिखती है, उनमें से एक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पर फिल्म भी बनी. कायदे से हिंदी साहित्य और सिनेमा के बीच एक पुल यह कहानी भी बनाती है. 1960 में बिमल राय प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी इस फिल्म का निर्देशन मणि भट्टाचार्य  ने किया था और इसमें सुनील दत्त और नंदा जैसे कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएं अदा की थीं.

अनायास यह खयाल आता है कि साठ के दशक में कई दूसरी महत्वपूर्ण रचनाओं पर भी फिल्में बनीं. हिंदी की किसी साहित्यिक कृति पर बनी इस दौर की सबसे कामयाब फिल्म ‘तीसरी कसम’ रही, जो फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर बनी थी. फिल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने किया था. हालांकि उसके पहले 1963 में प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ और 1966 में ‘गबन’ पर फिल्में बनीं. बाद में सत्यजित रे ने प्रेमचंद की ही ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और ‘सदगति’ पर फिल्में बनाईं.

हालांकि 1934 में जब प्रेमचंद खुद मुंबई- तब के बंबई- पहुंचकर फिल्मी दुनिया में काम करना चाहते थे तो इतने कामयाब नहीं हुए. वैसे फिल्मी दुनिया में उनका संक्षिप्त प्रवास बताता है कि उनके व्यावसायिक लेखन में भी उनकी अपनी प्रतिबद्धताएं नजर आती रहीं. 1934 में वे मुंबई पहुंचे और उन्होंने अजंता सिनेटोन में 8,000 रुपये सालाना वेतन पर बतौर पटकथा लेखक की नौकरी शुरू की. उन्होंने ‘मज़दूर’ फिल्म की कहानी लिखी जिसका निर्देशन मोहन भवनानी ने किया था. फिल्म के केंद्र में मजदूरों की बदहाली थी और एक प्रभावशाली व्यवसायी ने मुंबई में फिल्म के प्रदर्शन के खिलाफ स्टे ले लिया. फिल्म लाहौर और दिल्ली में प्रदर्शित हुई, लेकिन जब इसने मज़दूरों को मिल मालिकों के खिलाफ आंदोलन के लिए प्रेरित करना शुरू किया तो इन शहरों में भी इस पर पाबंदी लग गई. फिल्म में प्रेमचंद ने भी मजदूर नेता की छोटी सी भूमिका अदा की थी. बहरहाल, उस दुनिया में प्रेमचंद का दिल नहीं लगा और हिमांशु राय के समझाने के बावजूद वे बंबई से लौट आए.

हिंदी की जिन दूसरी कृतियों को फिल्मी दुनिया ने कुछ अहमियत दी, उनमें भगवतीचरण वर्मा का उपन्यास ‘चित्रलेखा’ रहा. पाप और पुण्य की अवधारणा पर लिखे गए इस उपन्यास पर दो बार फिल्में बनीं- पहली बार 1941 में और दूसरी बार 1964 में. दोनों बार केदार शर्मा ने ये फिल्में बनाईं. दूसरी बार बनी ‘चित्रलेखा’ का एक गीत काफी चर्चित भी हुआ- ‘संसार से भागे फिरते हो’.

यह सत्तर का दशक है जब हिंदी सिनेमा हिंदी साहित्य का हाथ थामने की कुछ कोशिश करता है. फिल्म लेखक दिनेश श्रीनेत तो मानते हैं कि हिंदी में नई कहानी और नया सिनेमा दोनों साथ-साथ चले. बेशक, इसके कई प्रमाण दिखते भी हैं. 1969 में मणि कौल ने मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पर जो फिल्म बनाई, उससे हिंदी में नए सिनेमा की शुरुआत मानी जाती है. इस फिल्म को बेहतरीन फिल्म का फिल्मफेयर समीक्षक सम्मान भी मिला. दो साल बाद मणि कौल ने मोहन राकेश के ही नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर भी फिल्म बनाई और 1974 में विजयदान देथा की कहानी दुविधा पर. हिंदी साहित्य से मणि कौल का रिश्ता और दूर तक जाता है. मुक्तिबोध की कहानी ‘सतह से उठता आदमी’ पर भी उन्होंने अपनी तरह की एक अलग सी फिल्म बना डाली.

यह शायद 1972 का साल था, जब कुमार शाहनी ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘मायादर्पण’ पर इसी नाम से फिल्म बनाकर ठीक वही पुरस्कार जीता जो ‘उसकी रोटी’ पर मणि कौल जीत चुके थे. मणि कौल और कुमार शाहनी के अलावा बासु चटर्जी वे तीसरे निर्देशक हैं जो नई कहानी से जुड़े लेखकों की कृतियों पर फिल्म बनाते नजर आते हैं. उन्होंने राजेंद्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर इसी शीर्षक से और मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ नाम से फिल्में बनाईं.

वैसे फिल्मी दुनिया में किसी हिंदी लेखक का जो सबसे कामयाब हस्तक्षेप रहा, वह नई कहानी की त्रयी के तीसरे हस्ताक्षर कमलेश्वर की तरफ से दिखता है. उन्होंने समांतर सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा दोनों में बराबर अधिकार के साथ काम किया- एक तरफ ‘आंधी’, ‘मौसम’, ‘अमानुष’, ‘छोटी सी बात’ जैसी फिल्में लिखीं तो दूसरी तरफ ‘राम बलराम’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘साजन की सहेली’ और ‘सौतन’ जैसी कारोबारी और सितारों से सजी फिल्में भी. मनोहर श्याम जोशी ने भी ‘पापा कहते हैं’, ‘अपु राजा’, ‘भ्रष्टाचार’ जैसी कुछ फिल्मों की पटकथाएं या संवाद लिखे. बरसों बाद श्याम बेनेगल ने धर्मवीर भारती की किताब ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ पर इसी नाम से एक यादगार फिल्म बनाई. वैसे 80 के दशक में ही केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’ पर ‘नदिया के पार’ के नाम से एक सफल फिल्म भी बनी. सदी के इस पहले दशक में विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’ पर ही शाहरुख खान ने ‘पहेली’ के नाम से एक कारोबारी फिल्म बनाई जो खूब चली भी.

दो-तीन साल पहले उदय प्रकाश के उपन्यास ‘मोहनदास’ पर बनी फिल्म इस सिलसिले की बस आखिरी कड़ी की तरह दिखाई पड़ती है. हिंदी सिनेमा और हिंदी साहित्य का साथ इससे आगे नहीं जाता. अंततः ये सारे लेखक साहित्य की दुनिया में लौट आते हैं. फिल्मी दुनिया से मायूसी या मोहभंग के बाद लौटने वाले लेखकों में हमारे वरिष्ठ उपन्यासकार अमृतलाल नागर भी दिखाई पड़ते हैं. सवाल है, आखिर हिंदी के ये बड़े लेखक फिल्मों में कामयाब क्यों नहीं हो पाए?  एक जवाब तो साफ है – लेखन एक स्वतंत्र और एकांतिक विधा है जिसमें आप अपनी मर्जी से, अपनी प्रतिबद्धता और संवेदना के हिसाब से काम करते हैं, जबकि सिनेमा मूलतः एक कारोबार है जिसमें लेखक बहुत सारी दूसरी विधाओं के बीच तालमेल बिठाकर चलता है, यही नहीं कई बार उसमें व्यावसायिक समझौते भी करने पड़ते हैं. दूसरी बात, कहानी या उपन्यास लेखन के मुकाबले फिल्म लेखन कहीं ज्यादा जटिल विधा है जो एक तरह का पेशेवर प्रशिक्षण भी मांगती है.

लेकिन चाहे फिल्म लिखनी हो या उपन्यास लिखना हो- विधा तो वह शब्दों की है और उसमें कई रचनात्मक लोग भी लगे हुए हैं जिन्होंने बहुत अच्छा काम किया है. फिर क्या हिंदी साहित्य और सिनेमा के बीच की दूरी का कुछ ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य भी है जहां तक मैं देख पाता हूं. दरअसल जिसे हम हिंदी सिनेमा कहते हैं, एक तरह से उसकी शुरुआत उर्दू सिनेमा के रूप में हुई. ज्यादातर पटकथा-लेखक या गीतकार उर्दू की पृष्ठभूमि से आए या फिर हिंदी-उर्दू दोनों की साझा विरासत से. हिंदी के मुकाबले उर्दू लेखकों सआदत हसन मंटो, कृष्णचंदर, राजेंदर सिंह बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, राही मासूम रजा, इस्मत चुगतई, गुलजार, जावेद अख्तर की आवाजाही सिनेमा की दुनिया में ज्यादा रही. इसी तरह गीतकारों में शकील बदायूंनी, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी, जांनिसार अख्तर, मजरूह सुल्तानपुरी आदि मूलतः उर्दू की पृष्ठभूमि से आए लोग रहे. हालांकि यह फिल्मी दुनिया ही याद दिलाती है कि इन लेखकों के संदर्भ में हिंदी और उर्दू का फर्क देखना बेमानी है- आखिरकार ये एक ही जुबान के नुमाइंदे हैं. बेशक इनके समांतर पंडित प्रदीप और भरत व्यास जैसे कुछ गीतकारों ने तत्समनिष्ठ हिंदी में कई सफल गीत लिखे, लेकिन अंततः हिंदी सिनेमा जिस पूरी पृष्ठभूमि से आता दिखाई पड़ता है, वह नाच-गानों से भरी वाजिद अली शाह के दरबार में चलने वाली इंदर सभा से बनती है, बाद के दौर में पारसी थिएटर के नाटकों से जुड़ती है और अंततः उस परंपरा से, जिसका नाम उर्दू है.

बेशक, आजादी के बाद जब मुल्क बंटते हैं तो सिनेमा भी बंटता है, कलाकार-लेखक सब सरहद के इधर-उधर दिखते हैं. धीरे-धीरे एक नई पीढ़ी सामने आती है जो हिंदी के कथा संसार में अपनी कहानियां खोजती है. लेकिन हकीकत यह है कि यह संसार उसकी बहुत मदद नहीं करता.

उर्दू में किस्सागोई की जो लोकप्रिय परंपरा रही, हिंदी का साहित्य उसके मुकाबले कहीं ज्यादा भारी-भरकम किस्म के यथार्थ का वाहक बना रहा. शायद यह हिंदी साहित्य पर सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति का दबाव भी रहा जिसने उसे फिल्मों के अपेक्षया रोमांटिक संसार से दूर रखा. अब यह बात बहसतलब है कि इस प्रवृत्ति ने हिंदी साहित्य का भला किया है या बुरा. सच्चाई सिर्फ इतनी है कि आज का हिंदी लेखक एक बेचेहरा शख्स है जिसे उसका समाज ठीक से पहचानता नहीं. इसमें शक नहीं कि हिंदी की गरीब बहन उर्दू इस मामले में अपने गद्य और पद्य दोनों में- अपने अफसानों में भी और अपनी शायरी में भी हिंदी के मुकाबले अपने समाज के कहीं ज्यादा करीब है.

बहरहाल, हिंदी सिनेमा और हिंदी साहित्य में बन रहा रिश्ता अब लगभग टूटा हुआ दिखता था. फिल्मों में आई नई पीढ़ी हिंदी साहित्य से कोसों दूर है और उसकी प्रेरणाएं या तो पश्चिम के सिनेमा से आती हैं या फिर अंग्रेजी के साहित्य से. विशाल भारद्वाज ‘मैकबेथ’ और ‘ऑथेलो’ के अनूठे देसी संस्करण तैयार कर सकते हैं या रस्किन बॉन्ड की कृतियों पर ‘ब्लू अंब्रेला’ या ‘सात खून माफ’ जैसी फिल्में बनाते हैं. विधु विनोद चोपड़ा चेतन भगत के औसत से उपन्यास ‘फाइव प्वाइंट समथिंग’ पर ‘3 इडियट्स’ जैसी शानदार फिल्म बना डालते हैं. मगर यह विडंबना ही है कि जिस दौर में हिंदी सिनेमा अपने शिल्प में ज्यादा यथार्थ-सजग और सूक्ष्म हो रहा है उस दौर में वह अपने समय की समर्थ हिंदी कहानियों से कटा हुआ है. चाहें तो इसके लिए कुछ हद तक उस हिंदी लेखक को भी जिम्मेदार ठहरा सकते हैं जो सामाजिक यथार्थ के अपने घिसे-पिटे खोल में रहकर लिख रहा है और अपनी विधा का ऐसा पुनराविष्कार करने की कोशिश तक नहीं कर रहा जिसमें वह फिल्म जैसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय माध्यम को कुछ प्रीतिकर और पौष्टिक दे सके.

‘मुझे मालूम है कि जो मुझे अच्छा लगता है, वह पब्लिक को भी अच्छा लगता है’

‘लगान’ का निर्माण आपका अहम फैसला था. उस फिल्म से इंडस्ट्री में कई बदलाव आए. आज के आमिर खान को बनाने में ‘लगान’ का कितना बड़ा योगदान रहा?

 ‘लगान’ मेरे करियर का माइलस्टोन है. इसके निर्माण में मेरा जुड़ाव एक्टर, क्रिएटिव पर्सन और प्रोड्यूसर के  रूप में था. उन सभी जिम्मेदारियों को मैंने निभाया. ‘लगान’ ने भी हमें बहुत कुछ दिया. मेनस्ट्रीम सिनेमा में उस मैग्नीट्यूड की फिल्में नहीं बनती थीं. उस फिल्म से हिम्मत मिली कि एक्सपेरिमेंट और बड़े पैमाने पर नए विषय की फिल्म भी दर्शक पसंद कर सकते हैं. उस फिल्म ने हमारे दिमाग की खिड़कियां खोल दीं. मेरे प्रोडक्शन को सेटअप करने में ‘लगान’ का योगदान है. दरअसल, मैं तो प्रोडक्शन करना ही नहीं चाहता था.

ऐसा क्यों?

 बतौर अभिनेता जब मैं इंडस्ट्री में आया तो मेरे चाचा जान (नासिर हुसैन) और अब्बा जान (ताहिर हुसैन) फिल्में बना रहे थे. उनको देख कर मैंने तय किया था कि प्रोडक्शन से दूर ही रहना है. बहुत खतरे का काम है प्रोडक्शन. आप तब के मेरे इंटरव्यू पढ़ें तो मैं कहा करता था कि जिंदगी में कभी कोई फिल्म प्रोड्यूस नहीं करूंगा.

फिर कैसे मन बदला और आप ‘लगान’ के निर्माण के लिए तैयार हुए?

 आशुतोष गोवारीकर ने मुझे एक्टर के तौर पर लेने के लिए स्क्रिप्ट सुनाई थी. तब तक मैंने कोई फिल्म प्रोड्यूस नहीं की थी. ‘लगान’ की कहानी मुझे बहुत पसंद आई थी. मेरी चिंता थी कि ऐसी फिल्म को कौन प्रोड्यूस करेगा. एक तो आशुतोष दो फ्लॉप दे चुके थे और दूसरे ‘लगान’ में चलन के हिसाब से कुछ भी नहीं था. मैंने आशुतोष को सलाह दी कि पहले तू कुछ प्रोड्यूसर से मिल. यह मत बताना कि मैं फिल्म कर रहा हूं. मेरा नाम सुनते ही वे तैयार हो जाएंगे. वे गलत वजह से… स्टार की वजह से तैयार होंगे. तू कहानी सुना और देख कि लोग क्या कहते हैं. मैं तो हूं ही तुम्हारे साथ. उसने कई प्रोड्यूसरों को कहानी सुनाई. फिल्म किसी की समझ में नहीं आई. तब मुझे गुरुदत्त, बीआर चोपड़ा, महबूब खान और के आसिफ जैसे फिल्ममेकर्स से प्रेरणा मिली. उनकी हिम्मत ने जोश दिया. तब तक मुझे एक्टिंग करते दस-बारह साल हो गए थे. मैंने फैसला किया कि मैं रिस्क लूंं. एक ही जिंदगी है, जो करना है कर लूं. उस वक्त मैंने फैसला किया था कि एक ही फिल्म बनाऊंगा.

कह सकते हैं कि ‘लगान’ की सफलता ने आपको निर्भीक कर दिया. उसके बाद से आपने काफी अलग किस्म की फिल्में कीं…

 निर्भीक तो मैं शुरू से था. ‘कयामत से कयामत तक’ से मैंने शुरुआत की. तब वैसी फिल्म कोई नहीं कर सकता था. ‘अंदाज अपना अपना’ देख लें. उस समय मुझे ऐसी फिल्मों की जरूरत नहीं थी. मैं तो स्टार था. ‘जो जीता वही सिकंदर’ या ‘सरफरोश’ नाॅर्मल फिल्में नहीं हैं. यहां तक कि ‘दिल’ भी… लेकिन हां, ‘लगान’ अलग लेवल की फिल्म थी. उससे हिम्मत बढ़ गई. आप जिस निर्भीकता की बात कर रहे हैं, वह मेरे एटीट्यूड में पहले से था. दुनिया की नजरों में हमेशा से पंगे लेता रहा हूं. वास्तव में अपनी पसंद का काम करता रहा हूं. मुझे मालूम है कि जो मुझे अच्छा लगता है वह पब्लिक को भी अच्छा लगता है.

कोई एक टर्निंग पॉइंट रहा होगा, जब आप को एहसास हुआ होगा कि आप अपनी मर्जी का काम करें तो भी दर्शक पसंद करेंगे?

 नहीं, कोई टर्निंग पॉइंट नहीं है. यह एक्सपीरिएंस ‘कयामत से कयामत तक’ के समय ही हो गया था. बड़ी सीख मिली थी. फिल्म सफल रही थी. उसके बाद मैंने नौ फिल्में साइन की थीं. सारी फिल्में मैंने यही सोच कर साइन की थीं कि अच्छी होंगी. उसी दौरान मैंने डायरेक्टर के महत्व को समझ लिया. उन दिनों मुझे जिन डायरेक्टरों का काम अच्छा लगता था और मैं जिनके साथ काम करना चाहता था, वे मुझे साइन नहीं कर रहे थे. वजह जो भी रही हो… तब खुद को प्रूव करना आसान नहीं था. मैं तब तक स्टार नहीं बना था. फिर मैंने नए डायरेक्टर चुनने शुरू किए. मैंने परखा कि कौन-कौन डायरेक्टर नए हंै और अच्छा काम कर रहे हैं. एक फिल्म की शूटिंग में पता चल गया कि डायरेक्टर ही सब कुछ है. स्कि्रप्ट कितनी भी अच्छी हो, डायरेक्टर उसे कहीं भी पहुंचा सकता है. फिल्म बुरी हो सकती है. तभी मैंने फैसला किया कि तीन चीजों (स्क्रिप्ट, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर) से संतुष्ट होने पर ही फिल्में साइन करूंगा. प्रोड्यूसर अगर उन्नीस हो तो चीजें संभाली जा सकती हैं, लेकिन स्क्रिप्ट और डायरेक्टर कमजोर हों तो कुछ नहीं किया जा सकता. वैसे टर्निंग पॉइंट बताना ही है तो ‘लगान’ को मान सकते हैं.

‘दर्शकों का प्यार सुनामी की तरह आता है. आप सावधान न रहें तो बह जाएंगे. कुछ पकड़ कर रखना पड़ता है. जमीन में पांव धंसा कर रखना पड़ता है’

‘लगान’ के बाद की आपकी फिल्मों में ‘गजनी’ और ‘फना’ दो फिल्में अलग किस्म की हैं. दोनों भटकाव लगती हैं.

मैं नहीं मानता. ‘गजनी’ और ‘फना’ दोनों के बारे में कई लोगों की राय है कि ये मुझे नहीं करनी चाहिए थीं. मैं सहमत नहीं हूं. मैंने दोनों फिल्में इसलिए कीं क्योंकि दोनों की स्क्रिप्ट मुझे अच्छी लगी. मैं बहुत ज्यादा इंटेलेक्चुअलाइज नहीं करता. मैं दिल की सुनता हूं. जो मुझे अच्छा लगता है, वही करता हूं. मैं जानता हूं कि ‘फना’ की तुलना ‘रंग दे बसंती’ से नहीं की जा सकती. ऐसे ही ‘गजनी’ की तुलना ‘तारे जमीन पर’ से नहीं की जा सकती. मैंने जब ओरिजनल ‘गजनी’ देखी तो मुझे बहुत मजा आया था. मनोरंजन की जब हम बात करते हैं तो उसकी कई किस्में होती हैं. दर्शक भी कई प्रकार के होते हैं. ‘फना’ और ‘गजनी’ उस लेवल पर आपको अच्छी नहीं लगी होंगी, लेकिन बहुत सारे दर्शकों के लिए ‘गजनी’ ‘फना’ नंबर वन फिल्में हैं.

ऐसा लगता है कि आप अपने स्टारडम का सही इस्तेमाल करते हैं. आप लगातार हिट फिल्में दे रहे हैं. कुछ नया कर रहे हैं. सफल हैं. इन सारी उपलब्धियों के बावजूद हर मुलाकात में मैंने महसूस किया है कि आप किसी आम आदमी की तरह व्यवहार करते हैं. आपके घर में भी ताम-झाम नहीं है?

 वास्तव में अपने स्टारडम को मैंने कभी सीरियसली नहीं लिया. स्टारडम का मतलब कि लोग आपको पसंद करते हैं. आपको प्यार और आदर देते हैं. इन बातों में मुझे भी मजा आता है. मैं जानता हूं कि मेरे काम की वजह से ही यह सब हो रहा है. पर्सनल लाइफ मेरी कैसी है, इसके बारे में उन्हें कुछ नहीं मालूम. वे मुझे मिले भी नहीं हैं. आप लगातार नायक की भूमिका निभाते हैं. उन भूमिकाओं में नेक काम करते हैं. आपके बारे में उनके मन में अच्छे विचार बनते हैं. लाखों की तादाद में लोग फिल्में देखते हैं. उनकी पॉजीटिव एनर्जी आपकी तरफ आती है. दर्शकों का प्यार सुनामी की तरह आता है. आप सावधान न रहें तो बह जाएंगे. कुछ पकड़ के रखना पड़ता है. जमीन में पांव धंसाना पड़ता है. इस सुनामी में कई स्टार बहक जाते हैं. उन्हें भ्रम हो जाता है कि वे इंसान से बढ़ कर हैं. मैं इस भ्रम में कभी नहीं पड़ा.

लेकिन यह सीख और समझ कहां से मिली? आंतरिक गुण है या आपने औरों से सीखा?

हम-आप ऐसे क्यों है, उसकी खास वजह होती है. बचपन में या ग्रोइंग एज में जैसे प्रभाव पड़ते हैं, उनसे ही हमारी पर्सनैलिटी बनती है. ज्यादातर माता-पिता का असर होता है. परिवार के अन्य सदस्यों और रिश्तेदारों का भी असर होता है. दोस्तों का असर सबसे ज्यादा होता है. स्कूल-कॉलेज का असर होता है. एक बार पर्सनैलिटी बन जाए तो उसे बदलना बहुत मुश्किल होता है. बहुत कम लोग हैं जो 40-45 की उम्र के बाद भी अपनी सोच और नजरिया बदलने की कोशिश करते हैं. उसके लिए बहुत स्ट्रांग विल चाहिए. मेरे ऊपर माता-पिता का असर है. मेरे खयाल से अम्मी ने बहुत कुछ सिखाया-बताया. एक और खास बात रही है कि मेरे इर्द-गिर्द स्ट्रांग वीमेन रही हैं. मैं उनकी तरफ जल्दी आकर्षित होता हूं. मेरी अम्मी फौलादी महिला हैं. उनकी फूफी, जिन्हें मैं नानी जान बोलता था, उनकी बहुत स्ट्रांग पर्सनैलिटी थी. नुजहत, इमरान की अम्मी… मैं ऐसी औरतों के बीच रहा और पला हूं.

पापा के साथ कैसे संबंध थे. 

अब्बा जान… बचपन में मैं उनसे बहुत डरता था. हम चारों भाई-बहन डरते थे. वे तुनकमिजाज थे. उन्हें जल्दी गुस्सा आता था. अब्बा जान का गुस्सा बहुत तेज होता था. फैमिली में उनका गुस्सा मशहूर था. हम लोगों में उन्हें लेकर इतना डर था कि हम दूर-दूर ही रहते थे. वे घर पर आते थे तो हम अपने कमरों में छिप जाते थे. बाहर नहीं निकलते थे. डर रहता था कि सामने पड़े तो किसी न किसी बात पर डांट पड़ जाएगी. हां, कभी प्यार करते थे तो बहुत लाड़-प्यार दिखाते थे. तब हम सरप्राइज होते थे. अरे, आज क्या हो गया? हमलोग इमोशनली अम्मी के ज्यादा नजदीक थे. अब्बा जान के लिए दिल में इज्जत थी और मन में डर. बड़े होने पर यह डर धीरे-धीरे कम हुआ, लेकिन वह पूरी तरह से नहीं गया. सच है कि मैं इमोशनली उनके ज्यादा करीब नहीं था. यह भी हो सकता है कि तब परिवार के पुरुष सदस्य बच्चों से ज्यादा लाड़-प्यार नहीं दिखाते थे. वे अपने बच्चों से ज्यादा घुलते-मिलते नहीं थे. पढ़ाई के अलावा उनके पास सवाल नहीं होते थे या कहीं से कोई शिकायत मिली हो तो हमारी जवाबतलबी होती थी. 

अपने बच्चों से कैसे संबंध हैं आपके? कितना जरूरी मानते हैं कि बच्चों को पालन-पोषण के साथ प्यार भी मिलना चाहिए?

 बच्चों के साथ मेरा रिश्ता दोस्ती का है. मैं उनके साथ दोस्तों जैसा ही व्यवहार करता हूं. बहुत नजदीक हूं उनके. पहले की पीढ़ी के पुरुष इस मामले में थोड़े कटे और सख्त थे. वे खयाल नहीं रखते थे भावनाओं का. मां तो तब भी सीने से चिपकाए रहती थी. बच्चे बड़े हो जाएं तो भी उनके लिए छोटे ही रहते हैं. हमारी सोसायटी में पुरुष जल्दी इमोशन नहीं दिखाते. मैं अपने इमोशन तुरंत बता देता हूं. कुछ भी छिपाता नहीं. किसी बात पर रोना आ जाए तो रो देता हूं. खुशी होती है तो उसे भी नहीं छिपाता.

‘सरफरोश’  या यूं कहें कि  ‘गुलाम’  के समय से आप किरदार पर अधिक मेहनत करने लगे. आपकी मेहनत पर्दे पर भी नजर आई. उन किरदारों का दर्शकों से रिश्ता बना…

 किरदार तो मैंने ‘राजा हिंदुस्तानी’ में भी बहुत सही पकड़ा था. ‘जो जीता वही सिकंदर’ के संजय लाल के बारे में क्या कहेंगे? ‘रंगीला’ का किरदार देख लीजिए. ‘राजा हिंदुस्तानी’ में स्माल टाउन के युवक का रोल प्ले किया था. वह नैरो माइंडेड है, मेल शोवेनिस्ट है… लोगों को मैं बहुत पसंद आया था. अभी किरदार पर खास ध्यान देता हूं. उसके साथ रहना और उसे जीना… यह सब ज्यादा अच्छी तरह होता है. मैं भी थोड़ा मैच्योर हुआ हूं और अपनी फिल्मों की तैयारी के लिए पूरा समय निकालता हूं. किरदार की हर बारीकी पर ध्यान देता हूं.

‘मेरा कॉमन सेंस कहता है कि मैं समझ जाऊंगा कि अब दर्शक मुझे पसंद नहीं कर रहे हैं. यह महसूस होते ही मैं काम छोड़ दूंगा. आप देख लीजिएगा’

क्या करियर को लेकर कोई खास प्लानिंग रही या जब जो फिल्म आई वह कर ली?

 मैं लांग टर्म प्लानिंग नहीं कर सकता. मुझे क्या मालूम कि साल-दो साल में मेरे पास कौन-सी स्क्रिप्ट आएगी. अपना काम मेहनत और ईमानदारी से जरूर करता हूं. कोशिश रहती है कि अच्छा परिणाम मिले.

आप और बाकी दोनों खान (शाहरुख-सलमान) आगे-पीछे आए और अभी तक चल रहे हैं. चिंता तो होती होगी कि आखिर कब तक? क्या आप मानसिक तौर पर तैयार हैं कि कुछ साल बाद आप आज की स्थिति में नहीं रहेंगे?

मैं तो नहीं तैयार हूं. मेरे खयाल में तैयार होना भी नहीं चाहिए. मैं अपनी बात करूं तो बहुत आगे की सोचता ही नहीं. इस वक्त जो जी रहा हूं, उस पर मेरा ध्यान रहता है. शॉर्ट टर्म में सोचता हूं. अभी रीमा कागटी की फिल्म ‘तलाश’ पूरी कर रहा हूं. मेरा टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ आ रहा है. उसकी वजह से मेरी फिल्मों का शेड्यूल आगे खिसक गया है. ‘सत्यमेव जयते’ जरूरी और महत्वाकांक्षी टीवी शो है. फिर ‘धूम 3’ करूंगा. उसके आगे का मुझे भी नहीं मालूम. मेरा कॉमन सेंस कहता है कि मैं समझ जाऊंगा कि अब दर्शक पसंद नहीं कर रहे हैं. यह महसूस होते ही मैं काम बंद कर दूंगा.  इसे समझने का सिंपल तरीका है, जिस दिन मुझे अपना काम करने में खुशी नहीं होगी उस दिन से काम बंद कर दूंगा. आप खुश नहीं हैं, फिर भी आप साबित करना चाह रहे हैं कि आप स्टार हैं. अब भी आप अच्छा काम कर सकते हैं. यह खामखयाली है. या यह लगने लगे कि मेरा काम दर्शक नहीं समझ पा रहे हैं तो इसका मतलब है कि मैं डिस्कनेक्ट हो चुका हूं. मुझे अंदाजा नहीं है कि मैं कब तक सफल रहूंगा. जिस दिन मुझे या मेरे दर्शकों को मेरा काम पसंद नहीं आएगा, उस दिन से सब कुछ बंद… आप देख लीजिएगा. मैं बिल्कुल कैलकुलेटिव नहीं हूं. मैं शुद्ध रूप से अपने इमोशन पर चलता हूं.

आपकी बिरादरी में यह धारणा है कि आमिर कुछ भी यों ही नहीं करते?

यह सही है कि मैं यों ही कुछ नहीं करता. और फिर क्यों करूं? एक जिंदगी है और इतने सारे काम हैं. मेरा एक फोकस है लाइफ में. अपने प्रोफेशन में मैं अच्छा काम करना चाहता हूं. अच्छा काम करने के लिए जब जिससे मिलना होता है, मिलता हूं. मेरी जबान पर वही बात होती है जो मेरे दिल में होता है. मैं दोमुंहा नहीं हूं. अगर मुझे आपका काम अच्छा नहीं लगा तो बोल दूंगा कि आपका काम अच्छा नहीं लगा. मेरे साथ काम कर चुके प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, एक्टर हैं. उनसे बात करें. अभिनय देव से पूछ लीजिए. उनके शूट किए सीन पसंद आने पर अच्छा कहा. पसंद नहीं आया तो मैंने कहा कि मजा नहीं आया. जो बात मेरे दिल में होती है, वही कहता हूं. मेरे इंटरव्यू में भी आपको यह बात दिखेगी.

लेकिन कभी क्या खतरा महसूस नहीं होता? अपनी लोकप्रियता और स्वीकृति से व्यक्ति आत्मकेंद्रित और निरंकुश भी हो जाता है. फिर आस-पास के लोग डर या खौफ में रजामंदी जाहिर करने लगते हैं. गलत निर्णयों को भी सही बताने लगते हैं.

मेरे साथ अभी तक ऐसा नहीं हुआ है. मेरी हर फिल्म की टीम के सदस्य को पूरी छूट रहती है. ‘डेल्ही बेली’, अनुषा रिजवी की फिल्म ‘पिपली लाइव’, ‘तारे जमीन पर’, किरण की फिल्म ‘धोबी घाट’ या ‘लगान’ में आशुतोष… जब भी कोई सवाल मन में आता है तो मैं सभी से पूछता हूं. भैया, ऐसा लग रहा है. मैं यह सोच रहा हूं. तुम लोग क्या सोच रहे हो? उन्हें जो फील होता है वे बताते हैं. मेरे सामने लोग खुल कर अपनी बातें कहते हैं. यह मेरी स्ट्रेंथ है. अब यह अलग बात है कि मैं उनकी राय से सहमत होऊं या न होऊं. मेरी फिल्मों के आडियंस टेस्ट के समय आए हुए दर्शक मुझे भला-बुरा कहते हैं. मैं मजाक नहीं कर रहा हूं. कभी आपको ऐसे शो में बुलाऊंगा. कई बार पहली दफा मिल रहे व्यक्ति भी बेबाक राय देते हैं कि आपकी फिल्म पसंद नहीं आई. मजा नहीं आया. इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि मेरी प्रेजेंस में भी वे झिझकते नहीं हैं.

फिल्मों की समीक्षा के बारे में क्या राय है?

रिव्यू पढ़ते समय मेरी उम्मीद रहती है कि समीक्षक फिल्म की आत्मा को समझ सका कि नहीं. अगर वह वहां तक नहीं पहुंच सका तो हमें बताए कि उसे क्या दिक्कत हुई. उसे क्या कमी लगी. फिल्म के दिल तक पहुंचना जरूरी है. मैं यह मान कर चलता हूं कि मेरी हर फिल्म के बारे में समीक्षकों की राय अलग-अलग होगी. सभी अपने हिसाब से लिखते हैं. मैं सिर्फ यह देखता हूं कि समीक्षक मेरी फिल्म के दिल और आत्मा तक पहुंच सका कि नहीं. मेरी कमियों को ढंग से जाहिर कर सका कि नहीं? मुझे अपने काम में जो कमजोरी नजर आ रही है, क्या वही आपको भी नजर आ रही है? या आप कोई नई बात बता रहे हैं, जिस से मेरी आंखें खुल रही हैं. कई बार फिल्म की व्याख्या अलग लेवल पर हो जाती है.

क्या दर्शक हर फिल्म सही ढंग से समझ पाते हैं?

मेरे खयाल में दर्शक हमेशा फिल्म को ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं. ऐसा नहीं होता कि किसी फिल्म को दर्शक न समझ पाएं. उनकी समझ हमेशा सही होती है. वे सिर्फ अपनी राय देते हैं. हम लोग अपनी राय में दूसरों की राय जोड़ने की कोशिश करते हैं. मैं अपनी फिल्म के बारे में ऐसा नहीं कह सकता कि उसे सारे रिव्यू अच्छे मिले. ‘लगान’ ज्यादातर लोगों को अच्छी लगी थी.

मुझे याद है कि एस आनंद ने  ‘लगान’  पर लिखते समय कचरा को दलित एंगल से समझने की कोशिश की थी और फिल्म की आलोचना की थी?

शायद आशुतोष ने भी इतना नहीं सोचा होगा कि मैं कचरा को क्यों ला रहा हूं. कचरा दलित है. वह विकलांग क्यों है? कई बार फिल्म की व्याख्या उसके विषय और चरित्रों को अलग संदर्भ दे देती है.

मुझे लगता है कि आपके अभिनय में निखार आने के साथ आपकी संवाद अदायगी भी बदली है.

हां, मैं मानता हूं इस बात को. आपका यह आब्जर्वेशन सही है. पहले मेरी स्पीच तेज थी. मैं बहुत जल्दी-जल्दी बोलता था. समय के साथ मैंने उसे नियंत्रित किया और जरूरी सुधार लाया. अपनी गलतियों से सीखा. मैंने संवाद अदायगी में किसी की नकल नहीं की है.

भाषा का ज्ञान और उसकी समझ की जरूरत पर कुछ बताएं. इन दिनों हिंदी फिल्मों में ही हिंदी शब्दों का सही उच्चारण नहीं होता.

एक्टर के लिए भाषा बहुत जरूरी है. आप जिस भाषा में अभिनय कर रहे हैं उस भाषा पर अधिकार तो होना ही चाहिए. आप पिछली पीढ़ी, हमारी पीढ़ी और आज की पीढ़ी को देखें तो यह फर्क समझ में आएगा. हिंदी क्षेत्रों से आए एक्टर और बड़े शहरों के एक्टर की भाषाएं अलग-अलग हैं. उनके बोलने के लहजे की बात नहीं कर रहा हूं. शब्दों और वाक्य को समझना और उसे सही ठहराव के साथ बोलना जरूरी है. लहजा तो किरदार के साथ बदलता है. वजन सही हो तो दिमाग में चल रही सोच और बोले गए अल्फाज में एक रिश्ता बनता है.

क्या आप जो बोल रहे होते हैं उसे समझ भी रहे होते हैं? कई सारे एक्टर सिर्फ संवाद बोल देते हैं. वे शब्दों के अर्थ नहीं समझते तो चेहरे पर भाव भी नहीं आता…

इतना तो बुरा नहीं हूं मैं. मैं अपने संवादों को समझने के बाद ही बोलता हूं. समस्या है कि युवा पीढ़ी के ज्यादातर एक्टर शहरों के हैं. उनकी पढ़ाई-लिखाई और परवरिश अलग माहौल में हुई है. वे हिंदी में उतने कंफर्टेबल नहीं हैं. चूंकि वे ढंग से नहीं समझते, इसलिए पर्दे पर मिसमैच दिखाई पड़ता होगा. उनके संवादों में जान नहीं आ पाती. 

एक खास ट्रेंड देख रहा हूं मैं कि इंडस्ट्री के पुराने या नए डायरेक्टर रीमेक, सीक्वल या कही गई कहानियों को िफर से कहने में लगे हैं, जबकि बाहर से आए डायरेक्टर नई कहानी लेकर आ रहे हैं….

मैं मानता हूं यह बात. आप काफी हद तक सही हैं. ये आपका ऑब्जर्वेशन सही है कि फिल्म परिवारों की दूसरी-तीसरी पीढ़ी के डायरेक्टर के रेफरेंस पॉइंट फिल्में ही हैं. वे इतनी फिल्में देख चुके हैं. उन्हें जिंदगी का तजुर्बा भी फिल्मों के जरिए ही मिला है. उनके सारे रेफरेंस पॉइंट और कैरेक्टर भी वहीं से आते हैं. जो लोग बाहर की जिंदगी जीकर आते हैं, उनके रेफरेंस पॉइंट में रियल लाइफ होती है. किरदार रियल होते हैं. मुझे लगता है कि रियल लाइफ से जुडे़ रहना जरूरी है. क्रिएटिव इंसान के लिए कामयाबी के साथ यह लगाव कम होता जाता है.

‘धोबीघाट’  का ही उदाहरण लें. ऐसी फिल्म आप नहीं सोच सकते थे.

सही कहा आपने. उसमें किरण की जिंदगी से अनुभव हैं. मैं वैसे अनुभवों से नहीं गुजरा. फिर भी आप ऐसा न समझें कि मैं रियल लाइफ से कटा हुआ  हूं.

 

सौ ग्राम सिनेमा

जब बोफोर्स का जिन्न 25 साल बाद और ऑपरेशन वेस्टएंड (तहलका कांड) का 11 साल बाद बड़े धूम-धमाके के साथ बोतल से बाहर आ गया हो, संसद की कार्यवाही जोर-शोर से ज्यादा सिर्फ शोर से चल रही हो, माओवादियों ने कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों का अपहरण कर लिया हो और तहलका के संवाददाता हमेशा की तरह नई-नई स्टोरी करने के प्रस्ताव रख रहे हों तो ऐसे में सिनेमा पर विशेषांक के औचित्य को कैसे ठहराया जाए? कैसे खुद और पाठकों को यह समझाया जाए कि बॉलीवुड पर एक पूरा अंक निकालना तहलका जैसी एक खांटी समाचार पत्रिका के लिए जरूरी न भी हो तो कोई अजीब बात भी नहीं है.

मगर शायद ऐसा करना उतना मुश्किल भी नहीं. इस विशेषांक के औचित्य को एक ही मगर जरा से लंबे वाक्य में भी समझाया जा सकता है: जिस सिनेमा ने, जब भी हम इससे जुड़े, हमारे उस समय को एक उत्सव में बदल दिया क्या उसके सौंवें साल में प्रवेश करने का उत्सव मनाना किसी भी लिहाज से अनुपयुक्त माना जा सकता है? क्या ऐसा करना तहलका की हमेशा की राजनीतिक और कई तरह के गड़बड़झालों को उजागर करने वाली पत्रकारिता के मध्य उसी तरह की ठंडी बयार जैसा नहीं होगा जिस तरह की बयार बीच-बीच में फिल्में हमारे जीवन में लाती रही हैं? वैसे भी हमने अक्सर फिल्मों, फिल्मी सितारों और इस तरह की अन्य कहानियों के साथ अन्याय ही किया है: इस बार यह इतना महत्वपूर्ण घट गया इसलिए फिल्म वाली स्टोरी ड्रॉप कर दो; कोई अपनी फलाना कांड वाली स्टोरी पांच पेज में नहीं कर पा रहा तो दो पन्नों वाली फीचर स्टोरी को एक पेज का कर दो, फिर चाहे वह कितने ही सुंदर तरीके से लिखी और सहेजी क्यों न गई हो. इस तरह तो तहलका साहित्य, कला आदि से जुड़ा कोई भी विशेषांक निकालने की स्थिति में कभी भी नहीं होगा.

एक बार जब इस विशेषांक को लाने का फैसला हो गया तो इसे करना भी कुछ हटकर ही होगा. तो इस विशेषांक में कहीं-कहीं से भी इकट्ठा करके कुछ बेहद अद्भुत और दुर्लभ चीजों का संकलन किया गया है और उन्हें एक फिल्म के महत्वपूर्ण हिस्सों के छोटे-छोटे खंडों के रूप में सजाया गया है.

कहने का मतलब यह कि हमने इस अंक को एक फिल्म का स्वरूप देने जैसी एक अजीबोगरीब कोशिश की है और इसमें मौजूद सारी सामग्री को कुछ इस प्रकार से संयोजित किया है मानो वे किसी भारतीय फिल्म का हिस्सा हों. मसलन पत्रिका का कवर, कवर न होकर एक मसाला फिल्म के पोस्टर जैसा है और पत्रिका की शुरुआत (जो आप अभी पढ़ रहे हैं) एक सेंसर बोर्ड के प्रमाण पत्र सरीखी है. फिल्म रूपी इस पत्रिका में एक मध्यांतर भी है जो इसे दो भागों में विभाजित करता है. इसके अलावा इस फिल्म में कास्टिंग, क्लाइमैक्स और ट्रेलर भी आपको कमोबेश अपने सही स्थानों पर नजर आएंगे.

मगर इस ‘फिल्मी’ विशेषांक का असली नायक इसकी सामग्री ही है. इसमें कुछ बहुत बढि़या लेख, साक्षात्कार और ऐतिहासिक दस्तावेज हैं. इस अंक में अनुपम जी जैसे पर्यावरणविद, गांधीवादी और लेखक ने फिल्मों पर लिखा है. इसमें फिल्म संसार से जुड़े छत्तीसगढ़ के दो ऐसे महानुभावों के संस्मरण हैं जो सिनेमा के शुरुआती दिनों में बैलगाड़ी पर इसे गांव-गांव पहुंचाने का काम करते रहे. अंक में भारतीय सिनेमा के पितृ पुरुष दादा साहब फालके और राजकपूर, संजीव कुमार, किशोर कुमार जैसे महानायकों के विभिन्न फिल्मी पत्रिकाओं में समय-समय पर छपे लेख तो हैं ही साथ ही आमिर और शाहरुख, दो खान भी हैं.

हिंदी के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज ने अपने संस्थान दैनिक जागरण से विशेष अनुमति लेकर इस आयोजन को अपना सहयोग दिया, उनका और उनके संस्थान का धन्यवाद.

पाठकों के पत्रों का इंतजार रहेगा, यह जानने के लिए कि हम अपने इस प्रयास में कितना असफल रहे.

निर्मल बाबा की तीसरी और चैनलों की बंद आंख

न्यूज चैनल ही निर्मल बाबा के फर्जी कारोबार को बढ़ाने में लगे हुए हैं

कहते हैं कि भक्ति में बहुत शक्ति है. लेकिन भक्ति से ज्यादा शक्ति बाबाओं, बापूओं, स्वामियों में है. विश्वास न हो तो चैनलों को देखिये, जहां भक्ति से ज्यादा बाबा, बापू, स्वामी छाए हुए हैं. आधा दर्जन से अधिक धार्मिक चैनलों पर चौबीसों घंटे इनका अहर्निश प्रवचन और उससे अधिक उनकी लीलाएं चलती रहती हैं. लेकिन इन बाबाओं का साम्राज्य सिर्फ धार्मिक चैनलों तक सीमित नहीं है. मनोरंजन चैनलों से लेकर न्यूज चैनलों तक पर भी सुबह की कल्पना उनके बिना संभव नहीं है.

नए दौर के इन साधुओं की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धर्म और ईश्वर भक्ति से उनका बहुत कम लेना-देना है. वे भक्तों को ईश्वर भक्ति की सही राह दिखाने से ज्यादा उनकी समस्याओं का हल बताने में दिलचस्पी लेते हैं. वे लाइलाज बीमारियों की दवाइयां बेचते हैं. यही नहीं, उनमें से कई शनिवार को काली बिल्ली को पीला दूध और काले तिल के सफेद लड्डू जैसे टोटकों से विघ्नों को साधने के रास्ते सुझाते हैं. ये नए जमाने के बाबा हैं जिन्हें चैनलों ने बनाया और चढ़ाया है, और अब वे चैनलों को बना-चढ़ा रहे हैं.

इन्हीं में से एक निर्मल बाबा आजकल सुर्खियों में हैं. कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदी के अधिकांश न्यूज चैनलों पर वे छाए हुए हैं. हिंदी न्यूज चैनलों पर उनका प्रायोजित कार्यक्रम थर्ड आई ऑफ निर्मल बाबा  इन दिनों सबसे हिट कार्यक्रमों में से है. रिपोर्टों के मुताबिक, यह कार्यक्रम हिंदी न्यूज चैनलों के टॉप 50 कार्यक्रमों की सूची में ऊपर से लेकर नीचे तक छाया हुआ है. कहने की जरूरत नहीं है कि उनके कार्यक्रम की ऊंची टीआरपी और बदले में बाबा से मिलने वाले मोटे पैसों के कारण इन दिनों चैनलों में निर्मल बाबा की तीसरी आंख दिखाने की होड़-सी लगी हुई है.

बाबा का कारोबार न्यूज चैनलों पर फैल चुका है. ऐसा लगता है कि चैनलों ने बाबा की तीसरी आंख के चक्कर में अपनी आंखें बंद कर ली हैं

लेकिन एक सच यह भी है कि देश को निर्मल बाबा और उनकी तीसरी आंख देने का बड़ा श्रेय चैनलों को जाता है. हालांकि चैनलों ने देश को पहले भी कई बापू-स्वामी दिए हैं लेकिन निर्मल बाबा शायद पहले ऐसे बाबा हैं जिनका पूरा कारोबार चैनलों के आशीर्वाद से फला-फूला है. उनसे पहले इंडिया टीवी और कुछ और चैनलों के सहयोग से दाती महाराज उर्फ शनिचर बाबा ने खासी लोकप्रियता और दान-दक्षिणा बटोरा था. वैसे चैनलों की मदद से कारोबार चमकाने वाले बाबाओं, स्वामियों में स्वामी रामदेव का कोई जवाब नहीं है.

इसके बावजूद मानना होगा कि रामदेव कम से कम योग पर मेहनत करते हैं. लेकिन निर्मल बाबा को अपना शरीर भी बहुत हिलाना-डुलाना नहीं पड़ता है. वे हर मायने में ‘अद्भुत’ और अनोखे हैं. वे मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के नए ‘एगोनी आंट’ या ‘संकटमोचक’ हैं जिसके पास शादी न होने से लेकर नौकरी न मिलने और कारोबार न चलने से लेकर पति के दूसरी महिला के चक्कर में फंसने जैसे आम मध्यमवर्गीय समस्याओं का बहुत आसान और शर्तिया इलाज है. यह इलाज बटन धीरे-धीरे खोलने से लेकर दायें के बजाय बाएं हाथ से पानी पीने और दस की बजाय बीस रुपये का भोग चढाने तक कुछ भी हो सकता है.

असल में, निर्मल बाबा के इलाज बहुत आसान, सस्ते और दिलचस्प हैं. इन टोटकों पर अमल करने में किसी ऐब या आदत को छोड़ना नहीं पड़ता और समस्या के हल होने की ‘उम्मीद’ बनी रहती है. ये नए किस्म के अंधविश्वास हैं. बाबा चैनलों की ‘साख’ का सहारा लेकर उन्हें आसानी से भक्तों के गले में उतार देते हैं. नतीजा, बाबा के निर्मल दरबार में भक्तों की भीड़ लगी हुई है.

बाबा के इन शंका समाधान शिविरों में प्रवेश के लिए दो हजार रुपये देने पड़ते हैं. कहा जा रहा है कि इसी के दम से बाबा करोड़पति हो गए हैं. हालांकि पैसा देकर आने वाले इन दुखियारों में से बहुत कम को ही सवाल पूछने का मौका मिल पाता है क्योंकि आरोप हैं कि ज्यादातर सवाल पूछने वाले बाबा के ही चेले और यहां तक कि मासिक तनख्वाह पर काम करने वाले टीवी के जूनियर आर्टिस्ट होते हैं. बाबा की दुकान सजाने में इनकी बहुत बड़ी भूमिका है.

बाबा का कारोबार एक चैनल से शुरू होकर अनेक चैनलों पर पहुंच चुका है. लेकिन ऐसा लगता है कि चैनलों ने बाबा की तीसरी आंख के चक्कर में अपनी आंखें बंद कर ली हैं. उन्हें बाबा की दिन-दहाड़े की ठगी नहीं दिख रही है. चैनल अंधविश्वासों को मजबूत कर रहे हैं. यह ठीक है कि निर्मल बाबा का यह कार्यक्रम प्रायोजित या एक तरह का विज्ञापन कार्यक्रम है. लेकिन क्या प्रायोजित कार्यक्रमों की कोई आचार संहिता नहीं होती है?

क्या यह ड्रग ऐंड मैजिकल रिमेडीज (ऑब्जेक्शनल ऐडवर्टीजमेंट) कानून के उल्लंघन का मामला नहीं है? आखिर बाबा मैजिकल रिमेडीज नहीं तो और क्या बेचते हैं? आखिर चैनलों की आंख सरकार के डंडे के बिना क्यों नहीं खुलती है? सबसे अफसोस की बात यह है कि यह कार्यक्रम देश के कुछ प्रतिष्ठित न्यूज चैनलों पर चल रहा है जो स्व-नियमन के सबसे अधिक दावे करते हैं. अच्छी बात यह है कि एक बार फिर सोशल और न्यू मीडिया में इस मुद्दे पर चैनलों की खूब थू-थू हो रही है. देखें, चैनलों के ‘ज्ञान चक्षु’ कब खुलते हैं?