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‘छह महीने के लिए नेताजी को मुख्यमंत्री बनना चाहिए था’

अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बने पांच महीने हो चुके हैं. इस दौरान वे जनता या सरकार पर अपनी छाप छोड़ पाने में असफल रहे हैं. सरकार में कई समानांतर सत्ता केंद्रों की आहट है. इन मुद्दों पर तहलका संवाददाता वीरेंद्रनाथ भट्ट ने सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री और अखिलेश के चाचा शिवपाल सिंह यादव से बातचीत की.

अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बने पांच महीने हो रहे हैं, लेकिन यह आम धारणा है कि अब भी सत्ता की कमान मुलायम सिंह यादव ही संभाल रहे हैं क्योंकि ज्यादातर लोग अखिलेश की सुन ही नहीं रहे?

मुझे ऐसा नहीं लगता. नेताजी ने तो अखिलेश को पूरा अधिकार दे रखा है और वे कभी भी सरकार के कामकाज में दखल नहीं देते हैं. जब नेताजी खुद मुख्यमंत्री थे तब भी उन्होंने अपने सभी मंत्रियों को काम करने की पूरी छूट दे रखी थी. क्या आपने किसी सरकारी कार्यक्रम में नेताजी को अखिलेश के साथ देखा है? लेकिन नेताजी परिवार के और पार्टी के मुखिया हैं और सरकार के कामकाज पर नजर रखने और समय-समय पर निर्देश देने का उनको पूरा अधिकार है. 

आपके बारे में कहा जाता है कि आप अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे.

लेकिन हम अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के विरोध में भी नहीं थे. हमारी इच्छा थी कि नेताजी छह महीने के लिए मुख्यमंत्री बनें, उसके बाद अखिलेश बनें. लेकिन नेताजी का निर्णय अंतिम है. वे परिवार के और पार्टी के मुखिया हंै. उनका निर्णय सबको स्वीकार है. अब यह कोई मुद्दा नहीं है. 

पांच माह के अखिलेश के कार्यकाल को आप किस तरह देखते हैं? वे खुद को एक सक्षम प्रशासक साबित कर पाने में असफल रहे हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि अखिलेश अब सपा के सर्वमान्य नेता हैं और अगला लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जाएगा. अखिलेश ने अच्छी शुरुआत की है. वे विनम्र हैं और आम जनता को सहजता से उपलब्ध हैं.

ऐसा कहा जा रहा है कि सरकार में सत्ता के कई समानांतर केंद्र बन गए हैं. आप समेत कई मंत्री अपनी-अपनी सरकार चला रहे हैं.

यह सब बकवास है. विरोधियों का दुष्प्रचार है. इसका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है. मुख्यमंत्री ही सरकार के मुखिया हैं और सभी मंत्री उनको विश्वास में लेकर ही निर्णय लेते हैं. मैं भी कोई अपवाद नहीं हूं. 

कानून-व्यवस्था पर सरकार की पकड़ ढीली हो रही है. सरकार मथुरा, प्रतापगढ़ और बरेली में सांप्रदायिक दंगा रोक पाने में असफल रही. क्या आपको लगता है कि अखिलेश सरकार नौकरशाही और सरकारी तंत्र पर अपनी छाप छोड़ सकी है?

अखिलेश मेहनत से काम कर रहे हैं. अभी सरकार बने चार-पांच महीने ही हुए हैं, इस समय सरकार का मूल्यांकन करना थोड़ी जल्दबाजी होगी. मुझे पूरा विश्वास है कि सरकार जनता की हर आकांक्षा को पूरा करेगी. 

30 जुलाई को मुलायम सिंह ने मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर पार्टी के विधायकों और मंत्रियों को अनुशासन का पाठ पढ़ाया. उसके अगले दिन उन्होंने सपा की राज्य कार्यकारिणी बैठक की अध्यक्षता की जबकि सपा की राज्य इकाई के प्रमुख अखिलेश यादव हैं. बार-बार नेताजी को आगे क्यों आना पड़ रहा है? 

यह कहना सही नहीं है कि नेताजी को अखिलेश की मदद में बार-बार उतरना पड़ रहा है. यह सब तो संगठन का काम है जो पहले भी चलता था. हमारी पार्टी लोकतांत्रिक है. किसी एक व्यक्ति की तानाशाही नहीं है. जनता ने हमको भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए वोट दिया है, इसलिए नेताजी ने मंत्रियों को ईमानदारी से काम करने का आदेश दिया. पार्टी के संविधान के अनुसार राज्य कार्यकारिणी की बैठक हर दो माह में होनी चाहिए और विधानसभा चुनाव के बाद यह पहली बैठक थी. 

चर्चा है कि अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने से आपके परिवार में जबरदस्त सत्ता संघर्ष छिड़ गया है.

­ऐसा कुछ नहीं है. सभी सदस्य अपनी-अपनी जिम्मेदारी के अनुसार कार्य कर रहे हैं.

अभी हाल में हुए नगर निकाय चुनावों में आपके भाई राजपाल सिंह और राम गोपाल यादव ने इटावा नगर पालिका में अपने-अपने उम्मीदवार खड़े किए.

निजी तौर पर किसी को भी समर्थन देने की खुली छूट थी. पार्टी अधिकृत रूप से चुनाव लड़ ही नहीं रही थी. जो हारा वह सपा का और जो जीता वह भी सपा का.

आपके पुत्र आदित्य राजनीति में उतरने की तैयारी कर रहे हैं?  

नहीं, नहीं… आदित्य राजनीति में नहीं उतरेगा. उसको राजनीति में उतरने से मैंने रोका है. मेरी पत्नी भी इसके खिलाफ है. यह दूर से तो बहुत अच्छी लगती है लेकिन यहां संघर्ष बहुत ज्यादा है, जीवन बहुत अनिश्चित है.

टीआरपी के बनाए और सताए

एनडीटीवी ने चैनलों की दर्शक संख्या यानी टीआरपी जारी करने वाली कंपनी टैम की मातृ कंपनियों पर अमेरिका में धोखाधड़ी का मुकदमा दायर कर दिया है. दूरदर्शन भी ऐसा करने का मन बना चुका है.  बात टैम के कम मीटरों की तो है ही लेकिन उनको लगाने और आंकने में जिस तरह की पर्दादारी है, उसकी ज्यादा है. टैम ने सारे देश की टेलीविजन देखने से जुड़ी रुचियों को नापने के लिए केवल कुछ हजार मीटर कुछ विशेष शहरी इलाकों में ही लगाए हैं. इनसे आंकड़े लेने की प्रक्रिया को कोई स्वतंत्र संस्था भी ऑडिट नहीं करती. तो फिर ऐसे में आंकड़ों के अपने आप गलत होने और जानबूझकर गलत किए जाने की आशंकाओं से कैसे इनकार किया जा सकता है?

यह इतना महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि देशभर के विज्ञापनदाता उस चैनल और कार्यक्रम को सबसे ज्यादा विज्ञापन देते हैं जिसकी टीआरपी सबसे ज्यादा होती है. 100-200 करोड़ रुपयों में स्थापित होने वाले समाचार चैनलों का अस्तित्व ही टीआरपी के आधार पर मिलने वाले विज्ञापनों पर टिका होता है. इसलिए कम टीआरपी वाला चैनल ज्यादा वाले जैसा बनना चाहता है और सभी चैनल अपने उन कार्यक्रमों के जैसा ही बनाते रहना चाहते हैं जिन्हें खूब टीआरपी मिलती हो.

इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमारे यहां का एक बहुत बड़ा हिंदी समाचार चैनल है. इस चैनल ने संसाधनों की कमी के चलते बिना मतलब के कुछ ऐसे कार्यक्रम बनाए जिन्हें कुछ समय के लिए बढ़िया टीआरपी मिल गई. बस बाकी चैनल भी थोड़ा सब्र से काम लेने और अपने काम को बढ़िया करने की बजाय उस चैनल जैसा बनने की होड़ में लग गए. नतीजा आज हिंदी चैनलों की घटी हुई साख के रूप में हम सबके सामने है. टीआरपी के इस खेल से उन लोगों-इलाकों से जुड़े मुद्दों-कार्यक्रमों की उपेक्षा हुई जहां टीआरपी के मीटर नहीं लगे हैं. दूसरा अगर टीआरपी की गणना की पूरी प्रक्रिया के ही भ्रष्ट होने की हर गुंजाइश इसमें मौजूद हो तो इसका दुरुपयोग लोगों की रुचियों को बदलने और गलत चीजों को प्रोत्साहित करने आदि के लिए भी तो किया जा सकता है.

सवाल यह है कि बात-बात में चैनलों और अखबारों पर लगाम कसने की धमकी देते रहने वाली सरकार इस मामले में कोई हस्तक्षेप क्यों नहीं करती? भले ही टीआरपी एक विशुद्ध व्यावसायिक प्रतिष्ठान की एक विशुद्ध व्यावसायिक गतिविधि हो मगर यह करोड़ों लोगों के हित-अहित, रुचियों और उनके सुधार आदि से भी तो जुड़ी है. और फिर इससे एक सरकारी प्रतिष्ठान दूरदर्शन के हित भी तो प्रभावित हो रहे हैं.

अगर दूरदर्शन कमाएगा नहीं तो उसे चलाने के लिए सरकार को पैसा खर्चना होगा. पैसा सरकार का न होकर जनता का होगा. तो अंत में जनता के हितों को ही तो नुकसान पहुंचेगा. फिर सरकार ही तो देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता भी है. तो फिर उसने दूरगामी दुष्प्रभावों वाली इस दोषपूर्ण व्यवस्था को दुरुस्त करने की हरसंभव कोशिश अब तक क्यों नहीं की? मगर जो चैनल आज टीआरपी को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं वे भी क्या स्थिति जैसी है उसे वहां तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? क्या वे भी एक गलत व्यवस्था का, जब भी वह उनके पक्ष में रही, फायदा नहीं उठाते रहे?

महाकुंभ का महाफल

2012 ने देश को खेलों से जुड़ी ऐसी कहानी दी है जो हमेशा सबके जहन में बसी रहेगी. लंदन में भारत ने अब तक का सबसे अच्छा ओलंपिक प्रदर्शन किया. यह ओलंपिक भारतीय खेलों के नवोदय का वाहक हो सकता है. इन खेलों में मिले कुल छह पदकों की चमक ने उस रोशनी को तेजतर कर दिया जो पिछले तीन-चार साल से हमें भारतीय खेलों की तरफ से आती दिख रही थी. पिछले ओलंपिक में भारत ने पहली बार तीन पदक जीते थे. इससे पहले के ओलंपिक खेलों में भारत को कभी-कभार एक पदक और अधिकतर बिना पदक के ही संतोष करना पड़ता था. 2008 के खेलों में तस्वीर पहली बार बदलती हुई दिखी. सिर्फ पदकों के आधार पर नहीं, भारतीय खिलाड़ियों के तेवर और आत्मविश्वास के आधार पर भी. उसके बाद साल 2010 ने भारतीय कामयाबी को एक नया आयाम दिया. इस साल भारत ने कॉमनवेल्थ खेलों में कुल 101 और एशियाई खेलों में कुल 65 पदक जीते जिनमें क्रमश: 38 और 14 स्वर्ण पदक थे. ये किसी जादू जैसा था जो पूरे देश के सर चढ़कर बोल रहा था, और 2012 ओलंपिक में जब भारतीय खिलाड़ी लगातार पदकों की तरफ बढ़ रहे थे तब यह जादू अपने पूरे शबाब पर पहुंच गया. पहली बार खेलों के जादू का मतलब क्रिकेट का जादू नहीं था.

बीजिंग ओलंपिक की सफलता के आत्मविश्वास के चलते इस साल भारत से उम्मीदें पहले से बढ़ी हुई थीं. भारत ने कुल तिरासी खिलाड़ियों के साथ तेरह खेलों में शिरकत की जिनमें कुश्ती, बॉक्सिंग, निशानेबाजी, बैडमिंटन और तीरंदाजी में संभावनाएं प्रबल थीं. भारत के पदक जीतने वाले सभी खिलाड़ी- गगन नारंग, विजय कुमार, साइना नेहवाल, मैरीकॉम, योगेश्वर दत्त और सुशील कुमार अपने साथ पहले ही पदकों की उम्मीद का भारी बोझ लेकर लंदन गए थे. सुखद है कि उन्होने यह कर दिखाया. पहली बार भारत की तरफ से दो महिलाओं ने पदक जीते. सुशील कुमार ने भी कमाल किया. लगातार दो ओलंपिक में मेडल जीतने वाले वे देश के पहले खिलाड़ी बने. सेमीफाइनल में उन्हें पूर्व विश्व चैंपियन कजाक पहलवान के खिलाफ आखिरी राउंड में तीन अंकों से पिछड़ने के बाद जीतते देखना एक अद्भुत अनुभव था. इस वक्त कुश्ती ने क्रिकेट के रोमांच को मीलों पीछे छोड़ दिया था. याद रखना होगा कि इसी खेल में भारत की तरफ से पचपन किलोग्राम वर्ग में सिर्फ 18 साल की उम्र के बिल्कुल नए पहलवान अमित कुमार ने अद्भुत खेल दिखाते हुए प्री. क्वार्टर फाइनल में ईरान के विश्ववरीय पहलवान को हरा दिया था. वे क्वार्टर फाइनल भी जीत ही जाते अगर रेफरी और टाइमिंग ने उनका साथ दिया होता. इसके बाद योगेश्वर दत्त ने भी रेपचेस राउंड में सिर्फ पचास मिनट के अंदर लगातार तीन बाउट जीतकर कांस्य पदक हासिल कर लिया. सुखद यह भी था कि कुश्ती जिससे अभिजात्य शहरी वर्ग में गांव और मिट्टी का देसी खेल मानकर किनाराकशी की जाती है, उसी खेल में सुशील कुमार की फाइनल बाउट देखते हुए शहरी वर्ग की सांसंे अटकी हुई थीं. बदलाव की ये शुरुआत ही ओलंपिक 2012 का हासिल है. जरूरत इस बात की है कि यह जारी रहे.

[box]हालांकि कई उम्मीदें ऐसी भी रहीं जिनका अंत निराशा के अंधेरों में हुआ. पिछली बार सोना जीतने वाले अभिनव बिंद्रा इस साल खाली हाथ रहे.[/box]

इसी तरह तीरंदाजी में विश्व नंबर एक दीपिका से बहुत सी उम्मीदें थीं जो पूरी नहीं हो सकीं. विजेंदर समेत पुरुष मुक्केबाजों से भी निराशा ही हाथ लगी. टेनिस में ओलंपिक से ठीक पहले खिलाड़ियों और एसोसिएशन के बीच जो नाटक हुआ उसने पदक की उम्मीदों पर कुठाराघात कर डाला लेकिन इन सबके बीच जो निराशा सबसे गहरी और कभी न मिटाई जा सकने वाली रही वह हमें राष्ट्रीय खेल हॉकी में मिली. जिस खेल में कभी हमने 1928 से लेकर 1956 तक लगातार स्वर्ण पदक जीते थे, उस खेल में इस बार सारे मैच हारकर आखिरी स्थान पर रहे. पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद निराश स्वर में कहते हैं, ‘बीजिंग ओलंपिक के लिए क्वालीफाई ही न कर पाने के बाद इस बार सबको उम्मीद थी कि टीम बेहतर करेगी, पिछले कुछ समय में टीम के अच्छे प्रदर्शन से उम्मीद भी थी लेकिन टीम शुरू से ही कमजोर खेली और आक्रामकता की इसी कमी के चलते हॉकी से हमें लंदन ओलंपिक का सबसे कड़वा अनुभव मिला.’ हॉकी टीम के बुरे प्रदर्शन पर टीम के कप्तान भरत क्षेत्री अपनी निराशा को छिपा नहीं पाए और उन्होंने कहा, ‘हम यहां खेलने लायक ही नहीं थे!’  भविष्य में भारतीय टीम फिर से ओलंपिक में खेलने और जीतने लायक बन सके इसके लिए बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है.

हॉकी से मिली गहरी निराशा को ओलंपिक में मिले छह पदक तो कुछ कम करते ही हैं साथ ही पदकों तक न पहुंच पाने के बावजूद कुछ बातें आगे के लिए सुनहरी उम्मीदें जगाती हैं. कुश्ती, निशानेबाजी, और बॉक्सिंग के खेल में हमारे पास दुनिया के सबसे कद्दावर खिलाड़ी हैं. ऐसा ही तीरंदाजी में भी है भले ही ओलंपिक में चूक हो गई हो. इन सारे खेलों में हमारे पास कई-कई खिलाड़ी हैं जो अपने खेल में विश्व रैंकिंग में सर्वश्रेष्ठ पांच में शुमार हैं. इसके अलावा एथलेटिक्स जिसमें कि सबसे ज्यादा पदक होते हैं, उसमें भी भारतीयों ने अपना प्रदर्शन सुधारा है. कॉमनवेल्थ और एशियाड में भारत ने एथलेटिक्स के बूते ही ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की थी और इस ओलंपिक में भी डिस्कस थ्रो में फाइनल खेलने वाले विकास गौड़ा, कृष्णा पूनिया, शॉटपुट में ओम प्रकाश करहाना, पैदल चाल में के. इरफान, बसंत बहादुर राणा, हर्डल्स में सिद्धार्थ थिंगालय, हाई जंप में साहना कुमारी, स्टेपल चेज में सुधा सिंह आदि ने राष्ट्रीय रिकार्ड बेहतर करते हुए आगे के लिए उम्मीदों को नए पंख दिए.

कहने वाले कह सकते हैं कि एक सौ बीस करोड़ के देश में सिर्फ छह पदक पर इतराने से पहले हमें चीन के पदकों की संख्या देख लेनी चाहिए. दरअसल ऐसा करने वाले चीन और भारत के बीच के बुनियादी अंतर को नहीं समझ पाते. खेल पत्रकार हेमंत सिंह तहलका से बातचीत में इसे रेखांकित करते हैं, ‘चीन में जिस अमानवीय, अत्याचारी और तानाशाही तरीकों से छोटे-छोटे बच्चों को पदक लाने की तैयारियों में झोक दिया जाता है, भारत जैसे लोकतांत्रिक और रिवायती देश में उस कीमत पर पदक का पक्षधर शायद ही कोई हो. चीन में जो खेल-संस्कृति आज से लगभग तीस साल पहले विकसित हो गई भारत में उसका बीजवपन सिर्फ तीन-चार साल पहले हुआ है, जिसको पुष्पित-पल्लवित होते देखने के लिए हमें अभी थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा. लंदन ओलंपिक में इसका अंकुर फूटता दिखाई दिया है.’ बिल्कुल सही है कि जिस देश में ‘खेलोगे, कूदोगे, बनोगे खराब’ जैसी कहावत होश संभालते ही दिमाग में बिठा दी जाती है वहां खेल संस्कृति जैसे शब्द की बात करना भी बेमानी कही जाएगी. पिछले तीस साल में अगर कोई खेल संस्कृति विकसित भी हुई है तो उसका बेशतर हिस्सा एक ही खेल, क्रिकेट के हिस्से गया है. भारत में क्रिकेट और बाकी खेलों के बीच भेदभाव को लेकर अंतहीन बहस की जा सकती है, जिसमें न पड़ते हुए यहां सिर्फ इतना लिख देना ठीक रहेगा कि विश्व के 200 से ज्यादा देशों के बीच होने वाले भीषण मुकाबले में पहले क्वालीफाई करने और फिर पदक लाने वाले खिलाड़ियों और विश्व के मात्र दस-बारह देशों के बीच होने वाले मुकाबले में स्वत: क्वालीफाई होकर विश्वकप लाने वाले खिलाड़ियों में स्वाभाविक वरीयता किसे मिलनी चाहिए.

1952 में जब ओलंपिक में शिरकत करने के लिए हेलसिंकी जाने को पहलवान केडी जाधव ने बंबई के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरार जी देसाई से सिर्फ चार हजार रूपये मांगे थे तब उन्होंने कुश्ती के लिए पैसा देने से मना कर दिया था. इसके बाद जाधव अपने निजी प्रयासों से हेलसिंकी गए और ओलंपिक में देश को पहला व्यक्तिगत पदक दिलाया. अपनी पूरी जिंदगी जाधव को कुश्ती पहलवानों की उपेक्षा का दर्द रहा. लंदन ओलंपिक में कुश्ती में लगातार दूसरी बार ओलंपिक पदक जीतकर जब सुशील कुमार देश के सबसे कामयाब खिलाड़ी बने और सरकार सहित पूरे देश ने उन्हें पलकों पर रख लिया, तब सुशील दरअसल केडी जाधव को भी उनके हिस्से का सम्मान दिला रहे थे. इसी तरह देश के लिए मेरीकॉम का ओलंपिक पदक दिल्ली के उन सभी शोहदों के मुंह पर एक तमाचा था जिनकी तंगनजरी पूर्वोत्तर की लड़कियों को सिर्फ ‘चिंकी’ के बतौर देखती है. लंदन ओलंपिक भारतीय खेलों के लिए एक युग की शुरुआत हो सकते हैं बशर्ते सिर्फ दो चीज़ों का ध्यान रखा जाए- खेल को ‘खेल’ न समझा जाए और सिर्फ क्रिकेट को खेल न समझा जाए!

इतिहास के दो आख्यान

priyamvadपुस्तक: इतिहास के दो आख्यान

लेखक: प्रियंवद

मूल्य: 600 रुपये

पृष्ठ: 511

प्रकाशन: वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर

मेरे प्रिय कथाकार प्रियंवद प्राचीन भारतीय इतिहास और संस्कृति के विद्यार्थी भी रहे हैं.  इतिहास पर उनकी एक पुस्तक ‘भारत विभाजन की अंतःकथा’ (1707 से 1947 तक ) कुछ साल पहले प्रकाशित हुई थी. हाल ही में इतिहास पर उनकी दूसरी पुस्तक ‘भारतीय राजनीति के दो आख्यान’ (1920 से 1950 तक) प्रकाशित हुई है. प्रियवंद जिन दो आख्यानों की पुनर्प्रस्तुति कर रहे हैं, पाठकों के समक्ष वे दो शीर्षकों से उपलब्ध हैं – ‘गांधी, नेहरू, सुभाष और वामपंथ’ तथा ‘स्वतंत्र हिन्दू भारत और सरदार पटेल.’

इस पुस्तक के लेखन के उद्देश्य और प्रासंगिकता के संदर्भ में लेखक की टिप्पणी गौरतलब है, ‘भारतीय राजनीति के इस सर्वाधिक संघर्षपूर्ण समय में जब स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा गया, दो अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधाराओं, ‘वामपंथ’ और ‘हिन्दू भारत’ तथा इन विचारधाराओं को अपने वाहक, योद्धा, उनकी प्रतिबद्धताएं, संघर्ष, घटनाक्रम व उनके अपने-अपने ‘महामानवों’ के जटिल व अंतर्गुम्फित मनोवेगों, अंतर्विरोधों, महत्वाकांक्षाओं, स्वप्नों के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है.’ इस प्रस्तुति को लेकर भी वे स्पष्ट राय रखते हैं और कहते हैं, ‘इस पुस्तक में इतिहास लिखा नहीं बताया जा रहा है.’

हालांकि प्रियंवद इस किताब की भूमिका में यह भी जोड़ते हैं कि ‘अब यह निष्पक्ष, तार्किक और पूर्वग्रह मुक्त विश्लेषण के साथ इतिहास और उसके महानायकों के पक्षों पर कुछ अलग तरह से रोशनी डालने की कोशिश है अथवा यह भी कि यह प्रयास इतिहास लेखन की आवश्यक प्रामाणिकता, वैज्ञानिकता, निर्मम तटस्थता और अनुशासन के साथ होते हुए भी, अपने स्वरूप और प्रस्तुति में आख्यान के अधिक निकट है.’ अपनी इस निर्मम तटस्थता के कारण ही महात्मा गांधी के ‘नैतिक आग्रह’ के साथ पक्षधर दिखता हुआ लेखक पुस्तक में यथास्थान उनके राजनीतिक निर्णयों, चुप्पियों, संतुलनों पर निर्मम दृष्टि भी डालता है. परंतु पाठकों को  ऐसी किसी तटस्थता के भ्रम में भी नहीं होना चाहिए क्योंकि लेखक इतिहास की पुनर्प्रस्तुति कर रहा है जिसे इतिहासकारों से शिकायत है कि उन्होंने तथ्यों को ‘कतिपय पूर्वग्रहों’ से प्रस्तुत किया था अथवा तथ्य योजनाबद्ध तरीके से ‘विखंडित या विकृत’ किए गए थे. पुनर्प्रस्तुति की एक योजना है, जिसके कारण लेखक की अपनी दृष्टि कहीं मुखरता से तो कहीं प्रक्रिया में संबद्ध प्रतीत होती है. अन्यथा कोई कारण नहीं बनता है कि नाथूराम गोडसे और भगत सिंह की तुलना महज कुछ संयोगों के आधार पर कर दी जाए.

लेखक तात्कालिक घटनाओं की पुनर्व्याख्या कर रहे हैं. वे भाषणों, संवादों, पत्रों, और आत्मकथाओं के अंश से तत्कालीन घटनाक्रमों और उसके सूत्रधारों के  आपसी संबंधों की विस्तार से व्याख्या कर रहे हैं. वाम-दक्षिण राजनीति के संदर्भों और उनके विरोधाभासों पर भी अच्छी चर्चा कर रहे हैं. वे सांप्रदायिकता की राजनीति की व्याख्या कर रहे हैं, लेकिन तत्कालीन राजनीति के महत्वपूर्ण केंद्र रहे डाॅ. आंबेडकर को अधिक महत्व नहीं देते हैं. कम्युनल अवार्ड की चर्चा तो हुई है, उससे दुखी नेताओं की भी, लेकिन पुणे पैक्ट की चर्चा के बहाने भी डा. आंबेडकर की राजनीति की कोई चर्चा नहीं है. हो सकता है कि विषय की सीमा का तर्क लेखक के सामने हो, लेकिन पाकिस्तान बनने और ‘हिन्दू भारत’ के संदर्भ में ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ के लेखक की सक्रियता की चर्चा उन्हें क्यों न्यायसंगत नहीं लगती है! लेखक अपने उद्देश्यों के साथ इस तरह संबद्ध होते चले गए हैं कि वल्लभ भाई पटेल को गैर-सांप्रदायिक और योग्य प्रशासक के रूप में  प्रस्तुत करते हुए जवाहरलाल नेहरू की व्यक्तिगत आस्थाओं, धर्म के प्रति बदलती आस्थाओं,  को  पटेल के द्वैध (बाइनरी) में प्रस्तुत कर पाठकों को कुछ संकेत-सा देने लगते हैं. यह सच हो सकता है कि पटेल की छवि उनके यथार्थ से अलग बनती चली गई हो जिसे फिर से समझने की जरूरत है, लेकिन उसे नेहरू के बाइनरी में फिर से देखने का क्या तात्पर्य !

पुस्तक अपनी समग्रता में महत्वपूर्ण है और तत्कालीन भारत को नए सिरे से समझने का आधार भी प्रदान करती है. बशर्ते पाठक अपनी दृष्टि के साथ प्रस्तुत सामग्रियों और विचारों का अध्ययन करे. प्रियंवद की मीमांसा एक अलहदा दृष्टि के साथ उसकी मदद करेगी. यहां ऐसे कई प्रसंग हैं जो तत्कालीन भारत के सूत्रधारों के आपसी संबंधों की अनकही कथाएं प्रस्तुत करते हैं.

-संजीव चन्दन

‘लेखकों को गप के लिए स्पेस ढूंढ़ना पड़ेगा’

वरिष्ठ कवि  राजेश जोशी ने साहित्य की हरेक विधा में अपना हाथ आजमाया और उसे बखूबी अंजाम तक भी पहुंचाया है. कविता के अलावा उन्होंने कहानी, नाटक, नुक्कड़ नाटक, आलोचना, नोटबुक भी लिखे हैं. बच्चों के लिए भी लिखा. वे 66 की उम्र में भी युवाओं की तरह परिवर्तन को स्वीकारते हैं. यही वजह है कि पाठकों को वे ‘किस्सा कोताह’ जैसी रचना दे पाने का माद्दा रखते हैं. ‘किस्सा कोताह’ में आत्मकथा है. परंपरा है. इतिहास है. अगर राजेश जोशी की मानें तो किताब को किसी विधा में शामिल करने के बजाय मुक्त आख्यान मान लेने में कोई हर्ज नहीं. इसी किताब के बहाने उनसे स्वतंत्र मिश्र की बातचीत.

 

 ‘किस्सा कोताह’  में आप कह रहे हैं कि विधा तय करने से क्या होगा, क्योंकि कोई विधा साबुत बची नहीं. कहानी, कहानी नहीं रही. उपन्यास, उपन्यास नहीं रहा. कविता तो खैर… टिप्पणी चाहूंगा.

हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं. हम औद्योगिक युग से निकल कर तकनीकी युग में पहुंच चुके हैं. बदलाव की वजह से बहुत सारी चीजें टूटती हैं और नए तरीके से आकार लेती हैं. एंटी नॉवल (18वीं-19वीं सदी में यूरोप में सामान्य परंपरा से हटकर उपन्यास लिखा जाने लगा जिसमें कोई कथा-सूत्र देखने को नहीं मिलता था) का भी दौर आया. भाषा में बदलाव आया. अकविता और अकहानी का भी दौर आया. नेहरू से लोगों का मोहभंग हुआ था. लोगों ने जेपी की बात सुननी शुरू कर दी. समाज में आए बदलाव का असर लेखन में भी दिखा. शिल्प में भी बदलाव आए. इसलिए विधा ही जब अपने मूल रूप में स्थायी नहीं रहती तब विधा तय करने का क्या मतलब? खासकर जब आप मुक्त आख्यान लिख रहे हैं तब आप विधा कैसे तय करेंगे.

क्या गपबाजी के लिए स्पेस कम हुआ है?

गप के लिए स्पेस बनाना होगा. दरअसल गप खुद में एक स्पेस है. भाषा में अगर स्पेस की बात करें तो यह जरूरी होगा कि आप कल्पना करें. गप कोई यथार्थ से परे नहीं है. लेकिन गप यथार्थ को अतिशयोक्ति में बदल देता है. गप कल्पनाशीलता के लिए एक स्पेस ढूंढ़ता है. वह उड़ान के लिए एक स्पेस ढूंढ़ता है.

शहर का किस्सा सुनाने वाले मनवा भांड के लिए आपने एक कविता लिखी है. क्या ऐसा लगता है कि मनवा भांड हमारे बीच से गायब-से हो गए हैं?

सच है कि मनवा भांड जैसे लोग हमारे बीच नहीं रहे. समाज जिस गति से बदल रहा है वह गप के दूसरे प्लेटफॉर्म ढूंढ़ लेगा. शहरों या गांवों में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो पटरियों पर बैठ कर तरह-तरह के किस्से सुनाते रहते हैं. अब लेखकों को गप के लिए स्पेस बनाना होगा. स्टोरी टेलिंग कहानी की एक शैली के तौर पर ही विकसित हो गई. यूरोप में स्टोरी टेलर मजमे वाली जगह जाकर  लोगों को किस्सा सुनाते हैं. भारत में भी इसकी परंपरा रही है. यहां अाल्हा-ऊदल, जात्रा, जट-जटिन जैसी स्टोरी टेलिंग की बड़े लोकप्रिय शैलियां रही हैं. आप देखेंगे कि स्टोरी टेलिंग में खूब सारी गप होती थी.

आल्हा-ऊदल जैसी परंपरा खत्म हो रही है तो क्या इससे नाटक को नुकसान पहुंचा है? 

समाज में बदलाव आएंगे तो उसका असर लेखन पर भी दिखेगा. पारंपरिक चीजों को तोड़ कर नई शैली में चीजें आपके सामने आने लगती हैं. कोई चीज गायब नहीं होती है बस उसका रूप बदलता रहता है. संयुक्त परिवार वाला सुकून अब एकल प्रथा के अस्तित्व में आने से गायब हो गया है. संयुक्त परिवार में एक किस्म का सुकून था. संयुक्त परिवार की कुछ अच्छाइयां थीं तो कुछ बुराइयां भी. संयुक्त परिवार की व्यवस्था व्यक्तिगत विकास और स्वतंत्रता को बाधित करती थी. इन्हीं वजहों से संयुक्त परिवार टूटा. लेकिन संयुक्त परिवार में साथ-साथ रहने से कई तरह की सुरक्षा भी मिलती है. मैंने बहुत पहले संयुक्त परिवार के लिए एक कविता लिखी थी. मैंने उसमें कहा था कि एकल परिवार की वजह से चोरों को ज्यादा सुविधा मिल गई है. एकल परिवार में सारे सदस्य बाजार या सिनेमा निकलते हैं तब चोरों को सूना घर मिल जाता है. ऐसा संयुक्त परिवार में नहीं होता. संयुक्त परिवार में मन की बातें आसानी से शेयर की जा सकती थीं. अब एकल परिवार में यह संभव नहीं हो पा रहा है जिससे तनाव बढ़ा है. संयुक्त परिवार में काम आपस में बंट जाने से सबको स्पेस मिल जाता था. आप दूसरों को काम देकर अपने लिए समय निकाल सकते थे.

आप लिखते हैं कि सतर्कता आदमी को चालाक बनाती है और बहक आदमी को सहज. बहक आदमी को अराजक भी तो बनाती है और पारिवारिक व्यवस्था में उससे खलल भी पैदा होता है.

बहक कई तरह की हो सकती है. सतर्कता भी कई तरह की हो सकती है. सतर्क होकर कई लोग अपने काम को अच्छी तरह अंजाम देते हैं. लेकिन जब कामकाज में जरूरत से ज्यादा सतर्क होते हैं तब आपके भीतर एक किस्म की चालाकी भी पनपने लगती है. इसी तरह बहक का भी मामला है कि आप किसलिए बहक रहे हैं. अपने को मुक्त करने के लिए बहक रहे हैं या दूसरों को परेशान करने के लिए. अगर आप दूसरे ढंग से बहकेंगे तो उससे अराजकता पैदा होगी. पर किताब में बहक का प्रयोग सतर्कता के विलोम में किया गया है. किताब में बहक का मतलब खुद को मुक्त करने से है. रचना का एक काम मुक्त करना भी है. आखिरकार आप अपने को मुक्त नहीं करेंगे तब बहुत सारी सूक्ष्म चीजों को आप नहीं समझ पाएंगे. कल्पनाशीलता को सतर्क होकर ज्यादा बांधने की कोशिश करेंगे तब कहीं-न-कहीं आप उड़ान को रोकने की कोशिश कर रहे हैं.

आज बच्चे पत्र-पत्रिकाओं से दूर होकर टेलीविजन में घुसते चले जा रहे हैं. ऐसे में बच्चों के लिए लिखने वालों को किन चुनौतियों से पार पाना होगा?

हमारे यहां खासकर बच्चों के लिए हिंदी में जो लेखन हो रहा है वह अपने स्वरूप में पारंपरिक ही बना हुआ है. बच्चों को एनीमेशन के जरिए कहानियां दिखाई जा रही हैं. उसकी भाषा बुरी है. बच्चों पर इसका गलत असर पड़ रहा है. यहां बनने वाली एनीमेशन फिल्मों का स्तर विश्वस्तरीय नहीं है. कार्टून का स्तर भी निम्न कोटि का है. पहले वर्ल्ड डिजनी शो आता था. उसका स्तर बहुत बढ़िया था. मीडिया (इलेक्ट्रॉनिक) का आकर्षण चाहे जितना बढ़ जाए लेकिन उससे प्रिंट मीडिया पूरी तौर पर खत्म नहीं होगा. इसलिए किताब या प्रिंटिंग वर्ल्ड की जरूरत हमेशा बनी रहेगी. अब आपकी चुनौती होगी कि किताब को इतना आकर्षक बनाया जाए कि वह रंगीन टीवी के सामने कुछ देर टिक सके. किताब को आकर्षक बनाकर ही आप बच्चों को स्क्रीन से हटा सकेंगे. नए समय की भाषा, नए समय के सवाल, नए समय के परिवर्तन के साथ जो कहानियां जुडेंगी, उसे ही बच्चे पढ़ेंगे. अब बच्चे मोबाइल और इंटरनेट को इतनी आसानी से हैंडल करते हैं कि उन्हें शेर और भालू की कहानियां कहां पसंद आएंगी. आपको नई तकनीक के बारे में कहानी गढ़नी पड़ेगी. आप नई भाषा में कहानी नहीं देंगे तब वे क्यों पढ़ेंगे. पहले के लेखकों ने शेर और भालू से कहानियां गढ़ीं वैसे ही आज के लेखकों को नए समय के हिसाब से कल्पनाएं गढ़नी होंगी.  गप यथार्थ को अतिशयोक्ति में बदलता है. गप कल्पनाशीलता और उड़ान के लिए एक स्पेस ढूंढ़ता है.

असम समझौता : राजीव गांधी

बांग्लादेशी नागरिकों को असम से बाहर निकालने के लिए किया गया समझौता जो कभी लागू नहीं हो पाया.

 भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में नीली दंगा अब तक की सबसे हिंसक घटनाओं में से है. 1983 के इस दंगे में 24 घंटों के दौरान ही लगभग 2,000 लोगों की हत्या कर दी गई थी. ये ज्यादातर बांग्लादेशी नागरिक थे. हालांकि असम में बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ हिंसा की छिटपुट घटनाएं 80 के दशक से ही देखी जा रही थीं, लेकिन यह तब तक की सबसे भयावह घटना थी. इसको देखते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने असम में आईएमडीटी (इलीगल इमीग्रेंट डिटरमिनेशन बाई ट्रिब्यूनल एक्ट) लागू कर दिया. इस कानून का मकसद राज्य में विदेशी नागरिकों की पहचान करना और उन्हें राज्य से बाहर निकालना था. लेकिन अपने मूल प्रावधान में यह कानून काफी विवादास्पद हो गया. इसके तहत किसी व्यक्ति पर विदेशी होने का आरोप लगाने वाले व्यक्ति को ही यह साबित करना पड़ता था कि आरोपित विदेशी है. जबकि भारत के बाकी हिस्सों में लागू विदेशी नागरिक कानून के तहत आरोपित व्यक्ति के ऊपर यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी भारतीय नागरिकता साबित करे. 

आईएमडीटी कानून पारित होने के बाद असम में आंदोलन तेजी से भड़क उठा. ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) की अगुवाई में चल रहे इस आंदोलन के नेताओं का कहना था कि केंद्र और राज्य की कांग्रेस सरकार इस कानून के जरिए बांग्लादेशियों को स्थायी नागरिक बना रही है ताकि उसका वोटबैंक मजबूत बना रहे. 1984-85 में यह आंदोलन इतना उग्र हो गया कि राज्य में अराजकता की स्थिति पैदा हो गई. इन हालात में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच 15 अगस्त, 1985 को एक समझौता हुआ.  इसे ही ‘असम समझौता’ कहते हैं. इसके तहत स्पष्ट प्रावधान किया गया था कि जनवरी, 1966 से पहले असम आए बांग्लादेशियों को  स्थायी नागरिक का दर्जा मिलेगा लेकिन इसके बाद मार्च, 1971 तक यहां आए लोग राज्य में रह तो सकते हैं लेकिन वे दस साल तक वोट नहीं दे पाएंगे. समझौते में प्रावधान था कि 1971 के बाद आए लोगों की पहचान करके उन्हें वापस बांग्लादेश भेज दिया जाएगा. असम समझौते के बाद राज्य में आंदोलन तो समाप्त हो गया लेकिन आसू से बनी असम गढ़ परिषद सहित कांग्रेस पार्टी के सत्ता में आने के बावजूद यह समझौता कभी जमीनी हकीकत नहीं बन पाया.

-पवन वर्मा

अन्हे घोड़े दा दान: 'आग न लगा दूं मैं इस दुनिया को..'

फिल्म: अन्हे घोड़े दा दान

निर्देशक: गुरविंदर सिंह

अभिनेता : माल सिंह, समुएल, सरबजीत कौर, धरमिंदर कौर, कुलविंदर कौर, लखा सिंह और गुरविंदर मखना

यूं तो यह देखने की फ़िल्म ज़्यादा है, ज़्यादा इसके सन्नाटे को सुनने की, कभी रिक्शा के पहियों की और कभी आती हुई रेलगाड़ी की आवाज़ को सुनने की. और यह सोचने की कि कब-कब मरा जा सकता है और कब नहीं.  आप जब इस फ़िल्म में दाख़िल होते हैं तो वह ध्वस्त होने का दृश्य है. गाँव के किनारे पर एक मकान, जिसे आधी रात एक बुलडोजर ढहा रहा है. कैमरा स्थिर. उड़ती धूल कैमरे की आँखों में नहीं गिरती, पर आपकी आँखों में गिरती है. आप आँखें मल रहे हैं, लेकिन वहाँ वे बूढ़े, एक पुलिस अफ़सर के सामने खड़े हैं. तीन सरदार, जो सन ऑफ सरदार के सरदार नहीं हैं, जो सिंह इज किंग नहीं हैं, जो सरसों के खेतों में मोहब्बत के गाने गाते हुए कभी नहीं भागे, जो कनाडा नहीं गए और न ही जाना चाहते हैं, वे तीन बूढ़े सरदार एक पुलिस अफ़सर के सामने खड़े हैं, और वह उनमें से दो को जाने को कहता है, एक को अकेला छोड़कर, जिसका वह घर है. टूटा हुआ घर, जिसकी ज़मीन बताते हैं कि पंचायत की है. जैसे वे सब ज़मीनें, जिनमें से सोना निकलता है, या कोयला या अभ्रक, वे हिन्दुस्तान की हैं, और इस तरह उन हिन्दुस्तानियों की बिल्कुल नहीं, जो वहाँ रहते हैं, रहते आए हैं. यह कानून है कोई जिसे वे पुलिसवाले हमेशा कहते हैं – तू हमें सिखाएगा क्या?  जिसका वह घर है, जानते हैं कि वह क्या कहता है? कि वे दो साथी, जो उसके सुख-दुख में भाई जैसे थे, उन्हें भाग जाने को क्यों कहा गया और क्या है ऐसी बात, जो पुलिस वाला उससे अकेले में करना चाहता है. वह जो डर है उसकी आँखों में और उसे अभी अलग-अकेला जो कर दिया गया है, इसे आप बता नहीं सकते, बस भुगत सकते हैं.

 कैसे पकड़ती है यह फ़िल्म उस खालीपन को, उस आधे टूटे मकान को, जिसकी एक निकली हुई ईंट से बनी जगह में से कैमरा एक रेलगाड़ी को देखता है. रेलगाड़ियाँ बार-बार, गाँव में भी, फिर शहर में भी, फ़िल्म के सारे किरदार रेलगाड़ियों के रास्ते के पास ही रहते हैं. रेलगाड़ियों से कोयला आता है और लोहा और अभ्रक और सोना भी शायद, लेकिन जब वे वहाँ रुकती हैं, उनके आशियानों के पास, तो बस उदास लोग उतरते हैं. अब कारखाने भी उतरेंगे ना, और तुम्हें अमीर बनाएंगे भाइयों, तुम्हारे बेटों को नौकरियां देंगे और उन्हें रिक्शा नहीं चलानी पड़ेगी. बस वे रिक्शा यूनियन की हड़तालों की तरह यहाँ भी लाल झंडे न उठा लें. ऐसा किया तो वाज़िब कदम तो उठाना ही पड़ेगा. कानून भूल गए?

 उन तीन में से एक मल सिंह का बेटा मेलू सिंह शहर में रिक्शा चलाता है. हड़ताल के बीच उसके सिर पर एक चोट है, जिसे वह बताता है कि बैलेंस बिगड़ गया और दीवार से टकरा गया, और एक गाड़ी सड़क पर रिक्शों को उठाकर ले जा रही है. एक पूरी कतार जिसे देखते हुए आप मौत की दिशा में जमते जाते हैं. कहीं जादू है कोई अगर सिनेमा में, तो वह सत्य नागपॉल के कैमरे की नज़र में है और निर्देशक गुरविंदर सिंह की इस पूरी फ़िल्म में. उस ठहराव में, जिसमें वे बिना कुछ कहे फ़िल्म को गहरा बनाते जाते हैं, आपके दिमाग पर पक्के मार्कर से छापते जाते हैं. शुद्ध सिनेमा, जिसमें कहानी वहाँ है, जहाँ कैमरा देखता है, रुका रहता है, आपको रोके रखता है. कहीं कहीं तो आपको यह तक लगने लगता है कि अब शायद ऐसा कुछ नहीं, जो इस माध्यम में कहा नहीं जा सकता. जो कुछ भी फ़्रेम में है, वह आपको जानता है और आपसे बात करता है. गुरविंदर, सत्य और फ़िल्म के साउंड डिजाइनर मंदर कुलकर्णी ने पगडंडी की धूल और रेल के फाटक तक में साँसें डाल दी हैं. वे जब कुछ नहीं कहते, तब भी एक साथ इतना कुछ कहते जाते हैं.

 क्या अद्भुत दृश्य कि कहीं और जा रहा था मेलू सिंह का बाप और एक भीड़ आ रही है शोषितों की, दलितों की, जिनके पास उनका एका ही है, जो भी है, शक्ति तो कोई नहीं. कहीं और जा रहा था मेलू सिंह का बाप, लेकिन मुड़ता है और भीड़ में शामिल हो जाता है. उसकी आँखों में दिए बराबर भी रोशनी नहीं शायद लेकिन उसका खड़े रहना और फिर पलटकर सबके साथ होना दुनिया भर के सिनेमा के कमाल दृश्यों में से एक. एक संकरी गली, उसमें बस देर तक एक दृढ़ भीड़ के कदमों की आहट, जिसके पास न खोने को कुछ है, न पाने को. और देखिए, दर्ज़ी लगातार कपडे सिल रहा है, चक्की वाला आटा पीस रहा है, बस रुककर एक बार भीड़ को देखते हुए. इतने सारे लोग ख़ुशी-ख़ुशी चबूतरों पर खेल रहे हैं और भीड़ सरपंच के घर जाकर रुकती है. कौन है भीड़? खेतों के मज़दूर, जिनका कोई खेत नहीं? अब तो घर भी नहीं. और कहाँ था आपका सिनेमा अब तक, या वह, जिसे आप सिनेमा कहते हैं? शर्म नहीं आई उसे ‘दिल बोले हड़िप्पा’ या ‘सिंह इज किंग’ पर? कैसे करते हैं आप मोहब्बत, गर्व और विकास की बातें? कैसे गा लेते हैं पुत्त जट्टां दे ने गबरू? यही पुत्त, जो सरपंच के घर में बंदूक लेकर खड़े हैं और वहीं सरपंच का एक दलित चौकीदार, जो दुनिया का सबसे कमज़ोर इंसान लगता है. भीड़ आश्वासन के साथ वापस आती है और गोली का इंतज़ार करती रहती है. साथ में गालियाँ सुनकर, कि कैसे उनके बेपढ़े बच्चों की नौकरियां लग जाती हैं इस डेमोक्रेसी में.

 आप जो भी हैं, अगर आरक्षण के ख़िलाफ़ चिल्लाना अपना जन्मजात फर्ज़ समझते हैं, या इस कारखानों, नहरों, बाँधों और सड़कों के विकास के पाँव से लटककर आप अमेरिका बनना चाहते हैं तो आपको पंजाब (या जिस भी राज्य में आप हों) के उस गाँव में जाना चाहिए. न जा पाएँ तो यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए. यह बहुत बड़ी कहानी है, जिसे गुरदयाल सिंह (उस उपन्यास के लेखक, जिस पर यह फ़िल्म बनी है) और गुरविंदर सिंह एक छोटे से गाँव के एक मकान और शहर में रिक्शा चला रहे मेलू सिंह के माध्यम से ही कह देते हैं. यह हम सबकी कहानी है. उन सबकी, जिन्हें इस ‘विकास’ ने उनके घरों से निकाल फेंका है. और बिना उनकी बात किए उन सबकी भी, जिनके लिए यह ‘विकास’ स्वर्ग लेकर आया है.

 शहर में फ़िल्म नहर के पास भी ठहरती है, जहाँ थककर मेलू सिंह कुछ खाता है (शायद खाता हो, हमें तो पानी पीते ही दिखाया बस) और फिर अपने रिक्शा पर सो जाता है. नहर भी रेलगाड़ी जैसी, जिससे ख़ुशहाली आनी थी, आई भी है शायद लेकिन जट्टों के घर में. मेलू सिंह की माँ दिन भर उनके खेतों से नरमा चुगकर आती है और लौटते हुए बकरियों के लिए थोड़ा सा चारा लाने पर गालियाँ सुनती है. वह याद करती है, वे अच्छे दिन, जब गरीब के असीस के लिए ख़ुशी से दिया करते थे लोग. क्या ऐसा था कभी या उसके दिमाग में कोई पुरानी कहानी है बस? यहाँ फ़िल्म सबसे ज़्यादा बात करती है, उस औरत के मुँह से, जो बाहर ही सो गई है, सर्दी में बाहर. फ़िल्म जहाँ जहाँ बोलती है, वहाँ इतने स्वाभाविक डायलॉग हैं, सजे हुए नहीं लेकिन फ़िर भी चीर डालने वाले. इतनी सारी बातें, जिन्हें पंजाबी में ही बेहतर कहा जा सकता था. लेकिन वह बाहर क्यों सो गई है? कोई वजह नहीं. पूछो तो कोई दुख नहीं. काँटा भी नहीं, जिसे बता दे और कोई निकाल ले. एक चुप किशोर बेटा, जिसे शायद किसी ज़मींदार के लड़के ने मारा है. उसके साथ बकरी को भी. एक बेटी, जो माँ हो गई है, जैसे ऐसे घरों की सब लड़कियाँ हो जाया करती हैं. बकरी को बुखार है और वह रात भर उसके पास बैठी है. क्या क्या कहा जाए अब? क्या मेलू सिंह के साथ रात को बठिंडा की सड़कों पर घूमा जाए, जब वह कोई दोस्त खोज रहा है जिसके घर में सर्दी की उस रात सोया जा सके? रिक्शा चलाने वाले उसके दूसरे उदास दोस्तों से कोई बात की जाए क्या, जो एक खंडहर किले की छत पर कुछ देर पहले उसके साथ पी रहे थे? क्या उखाड़ लिया मेलू सिंह तूने गाँव से यहाँ आकर? सात साल से रिक्शा चला रहा है..

 वह दोस्त यह सवाल ख़ुद से भी पूछ रहा है और बता रहा है कि जो वह कहना चाहता है, उसे बिना पिए समझा नहीं जा सकता. कितना कुछ है उसके भीतर! दुनिया भर की बेचैनी और विवशता. अभी रात है, लेकिन दिन में आपने देखा होगा, कि इस किले की छत से सामने किसी फ़ैक्ट्री की एक बड़ी सी चिमनी दिखती है. आप फ़िल्म में जहाँ भी जाएँ, वह चिमनी लगातार आपके सामने रहती है. उसी की ओर शायद रात में मेलू सिंह का वह दोस्त गुस्से में खाली बोतल फेंकता है और कहता है – ‘आग न लगा दूं मैं इस दुनिया को…’

 वह लड़की, जो बीमार बकरी को सहला रही है, जिसकी माँ अब अन्दर जाकर सो गई है, और पिता बेटे से मिलने शहर गए हैं – बेटी से बार-बार पूछकर कि वह एक बार मना कर दे तो शायद न जाएं – वह लड़की अचानक उठकर चल देती है. आधी रात उस गाँव की सुनसान गलियों में. कहाँ जाएगी वह लड़की, कोई नहीं जानता. कम से कम मैं तो नहीं. लेकिन सचमुच का एक बड़ा अँधेरा है, जिसे इसी फ़िल्म ने, सत्य के कैमरे ने ही जैसे डिस्कवर किया है. यह अद्भुत सिनेमेटोग्राफ़ी है और निर्देशन भी. अगर मैंने पहले यह नहीं कहा तो अब कहना चाहिए कि गुरविंदर सिंह उन फ़िल्मकारों में शामिल हो गए हैं, जिनकी फ़िल्मों का मैं बेसब्री से इंतज़ार करूंगा. उनमें, जिन्हें उठाकर हमें अपनी हथेलियों पर बिठा लेना चाहिए. फ़िल्म की शुरुआत में और आख़िर में भी, देर रात कोई अन्धे घोड़े का दान माँगता जाता है, कहता हुआ कि यह परम्परा है, और कोई उसे धमका रहा है कि अपने घर भाग जा. कौन डाँटता है दान या भीख माँगने वालों को सबसे ज़्यादा? ‘कर के कमाओ’, आप कहते हैं, और जो कमाते हैं, वे इस फ़िल्म में अपनी नज़रों में छुरियाँ लेकर आपका और मेरा इंतज़ार कर रहे हैं. वे गालियाँ सुन रहे हैं, अँधेरे में लालटेनें जाकर दो रोटी और साग खाते हुए, और अपने घरों को ढहते देखते हुए, पुलिस से पिटते हुए, महीनों-सालों के लिए जेलों में जाते हुए, यातनाएँ सहते हुए, रिक्शे चलाते और मार खाते हुए, और तब भी इंसानियत, भाईचारे और लोकतंत्र के वास्ते देकर आपसे गिड़गिड़ाकर शरण माँगते हुए – अपने ही घरों, खेतों और जंगलों में. यक़ीन मानिए, जिस दिन उनके पास माचिस होगी और थोड़ा मिट्टी का तेल, वे हमारी ‘विकासशील’ दुनिया में आग लगा देंगे. और आपको याद रखना चाहिए कि पहले उन्होंने पूरी विनम्रता से अपना हक़ माँगा था.

-गौरव सोलंकी

जो जो बच्चन बने, वे नायक थे, लेकिन सबसे ज़्यादा जले भी वही : गैंग्स ऑफ वासेपुर

फ़िल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर 2

निर्देशक अनुराग कश्यप

लेखक जीशान कादरी, अखिलेश जायसवाल, सचिन के. लाडिया, अनुराग कश्यप

अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, तिग्मांशु धूलिया, रिचा चड्ढ़ा, हुमा कुरैशी, राजकुमार यादव, पंकज त्रिपाठी, जीशान कादरी

 

वह शुरू से जानता है कि वह पानी को मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश कर रहा है और वह जितना कसके पकड़ता है, पानी उतना जल्दी छूटता जाता है और जीवन भी. जीवन, जिससे उसे मोहब्बत है, बिल्कुल शुरू से ही. बल्कि ज़िन्दगी से उस जितनी मोहब्बत पूरी फ़िल्म में किसी को नहीं. उसके अलावा किसी लड़ैया में इतना साहस नहीं कि अपने खूनी वर्तमान से पीछे जाकर देखे कि उसे तो नहीं करना था यह सब, और एक अलसुबह चौबारे पर खड़ा रोने लगे. कि कैसे वह शशि कपूर था अन्दर, या हो रहा था/होना चाहता था, और उसके मरते संजीव कुमार ने, या कोसती वहीदा रहमान ने, या पीठ में छुरा घोंपते प्राण ने उसे बच्चन बनाकर छोड़ा. जो जो बच्चन बने, वे नायक थे, लेकिन अन्दर से और बाहर से सबसे ज़्यादा जले भी वे ही.

वह लकड़बग्घों की ऐसी दुनिया में है, जहां उन गानों के लिए कोई जगह नहीं, जो उसकी मोहसिना उसे ज़िन्दा रखने के लिए गाती है, कभी उसे बांहों में भरकर, कभी फ़ोन पर. वहां नहीं मारना कायरता है और वह एक समय तक गांजे को चुनता है ताकि अपने बाहर की दुनिया से रिश्ता तोड़ ले. लेकिन बदला उसी को अपना आख़िरी हथियार चुनता है और जब बदला अन्दर हो, तब बाहर के बादल, बारिश और बच्चे नहीं दिखते. अपने बच्चे भी नहीं.

फ़ैज़ल ख़ान की हिंसा उसकी इच्छा से ज़्यादा उसका कवच है, भले ही वह ख़ुद इसे जानता है या नहीं. इसी कवच के कारण वह मारकर या मारते हुए अपने पिता जितने घृणित ढंग से नहीं हँस पाता. जश्न मनाने का उसके पास कोई कारण नहीं। उसके जैसे दो रूप हैं. लोहे के टेंडरों की बात कोई और करता है और मोहसिना से गाने कोई और सुनता है. वह पैसा कमाता है, शक्तिशाली बनता है लेकिन उसके बचपन से लेकर अंत तक उसके भीतर तक कुछ नहीं पहुंचता, सिनेमा और मोहसिना के सिवा. और दोनों के साथ ही वह रो रहा है.

इस हिस्से में फ़िल्म कहीं उभरकर पॉलिटिकल नहीं होती. अपने गानों में खूब होती है, शादी के गानों में भी. और इक्का-दुक्का जगह अपने डायलॉग्स में, जब यह शहाबुद्दीन की तरह चुनाव जीतकर खुला खेलने और गाय का दूध दुहकर मुख्यमंत्री बनने की बात करती है। लेकिन मुख्यत: यह व्यक्तिगत कहानी और कभी-कभी कविता कहने वाला शुद्ध सिनेमा है और आप और हम चाहें या न चाहें, इसे कोई क्रांति नहीं करनी। हां, हंसी के खोल में क्रूर परपेंडिकुलर देना है, जिसका मरना तसल्ली दे. अपने किरदारों के संजय दत्तीय और सलमान ख़ानी स्टाइलों और आपकी हंसी के बीच यह आपको मांस के लोथड़ों और खून की नालियों के रास्ते पर ले जाएगी और आपका हाल नहीं पूछेगी. आपको बुज़ुर्गाना सलाह नहीं देगी, सुधरने या बिगड़ने (आपके लिए इनके जो भी अर्थ हों) की सीख नहीं देगी, और भावुक नहीं करेगी, सन्न करेगी। आप जब बाहर निकलते हैं तो आप नहीं जानते कि आपको क्या करना चाहिए. बल्कि आप हैं कौन और क्या आपको भूख लगी है और क्या यह सही समय है कि आप कहीं चैन से बैठकर सब्जी-रोटी खा लें. क्या अब के बाद कोई भी सही समय होगा ऐसा? यह एक शानदार सिनेमाई दावत थी भीतर, अपने सारे खेलों और जादू के साथ, लेकिन आप इतने बेचैन क्यों हैं?

लेकिन बेचैनी की बात से पहले हमें उस सिनेमाई दावत की बात करनी चाहिए, जिसमें इतने लम्बे-लम्बे शॉट हैं (कभी कभी शायद उनके खूबसूरत भ्रम भी) कि कभी-कभी तो फिल्म का यथार्थ बाहर के यथार्थ से कुछ ग्राम ज्यादा विश्वसनीय होने लगता है. अनुराग और राजीव रवि इतनी खूबसूरती से अंधेरे और उजाले के बीच अपने लम्बे दृश्यों को तैरने देते हैं. ख़ासकर फ़ैज़ल के घर पर हमले के वक़्त उसका अपनी छत पर पहुंचना, घायल होना और फिर छतें फाँदते हुए उसका गिरना, घायल होना, ठहरना, फिर उठना – विजुअली यह पूरा सीक्वेंस दुनिया भर के सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ हिस्सों में से एक है. इसका ठहराव और एक समय के बाद पीछे शुरू हुआ संगीत इसे और कमाल बनाता है. बल्कि उससे पहले सुल्तान के अपने साथियों के साथ उसके घर पर हमला करने और तब फ़ैज़ल के ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ वाले कमरे से पूरे परिवार को सुरक्षित जगह तक ले जाने वाले हिस्से जिस तरह शूट किए गए हैं, वे इस फ़िल्म को अलग कतार में ले जाते हैं. हमारे सिनेमा में, और खासकर इस जॉनर और इस कहानी के सिनेमा में और वह भी इतने सारे किरदारों के दृश्यों में, इतने कम कट्स के साथ अपनी बात कहना बतौर फ़िल्मकार, अनुराग को भी बहुत ऊपर ले जाता है. फ़ज़लू को मारने के सीन से लेकर आख़िर में स्लो मोशन में ऊपर फ़ैज़ल तक बन्दूकें पहुंचा रहे टैन्जेंट और डेफ़िनेट तक बहुत सारे लाजवाब सीन हैं. लम्बे चेज़ सीक्वेंस हैं, जो बेचैन तो हैं ही, उससे ज़्यादा मज़ेदार हैं. ख़ासकर शमशाद का डेफ़िनेट का पीछा करने का सीक्वेंस बहुत अच्छा है. इस पूरे सीक्वेंस में राजकुमार यादव ने कमाल ऐक्टिंग की है.     

‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की एक और उपलब्धि यह है कि यह हमें अपने किरदारों की साधारण हिन्दुस्तानी ज़िन्दगियों में, बिना उनकी सादगी और ज़बान खोए, हंसने-मुस्कुराने की खूब सारी जगहें देती है. और ऐसा करने के लिए इसे बाहर से कुछ लाने या कुछ नया ‘क्रियेट’ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, बल्कि यह वह सब पकड़ती है, जो हर वासेपुर के हर मोड़ पर हम सब देखते आए हैं. वे कभी विडम्बनाएं हैं, कभी भोलापन या बेवकूफ़ी और कभी-कभी हमारे बीच की बेहद आम बात कि फ़िल्मी कलाकारों के ज़िक्र में एक बुज़ुर्ग कहते हैं कि वो नरगिस और सुनील दत्त का बेटा है ना. चार आदमियों के बीच बैठे एक आदमी को फ़ैज़ल ख़ान ने मार दिया है और फ़िल्म बाकी चारों के बाद के रिएक्शन पर ठहरती है, जब भौचक्के वे फिर से सिगरेट पीने और चने खाने लगे हैं. या यह कि मातम पर यशपाल शर्मा जिस बैंड पर चढ़कर ‘तेड़ी मेहड़बानियां’ या ‘याद तेड़ी आएगी’ गा रहे हैं, उसका नाम ‘आशा बैंड’ है. या यह कि एक-दूसरे की जान के प्यासे फ़िल्म के किरदार जिन गलियों से भाग रहे हैं, उनमें ‘मैंने प्यार किया’ या ‘दिल तो पागल है’ के पोस्टर लगे हैं. कहीं पीछे कैलेंडर है, जो पाप न करने की सीख दे रहा है. सुल्तान की हत्या करने निकले तीन लोग उसे घेरने के दौरान आपस में फ़ोन पर यह बात कर रहे हैं कि हैल्मेट लगाकर कितनी गर्मी लगती है और कटहल से क्या क्या किया जा सकता है. या चप्पलों के जो दृश्य हैं, कि दुकान लूटने घुसने लड़के बाहर चप्पल उतारकर घुसते हैं. फ़ैज़ल को उसके बाप के मरने की ख़बर मिली है और वह चला जाता है और फिर चप्पल पहनने लौटता है. या एक सीन में पीछे ऋचा समझा रही हैं कि वॉशिंग मशीन में रंगीन और सफेद कपड़े अलग-अलग धोने हैं.

यह ऐसी फ़िल्म है, जिसके इतने सारे ऐक्टर या लगभग सभी ऐक्टर अपनी ऊंचाइयां छूते हैं. तिग्मांशु धूलिया दूसरे हिस्से में पहले से भी आगे जाते हैं, ऋचा चड्ढ़ा भी। नवाज़ुद्दीन, जिन्होंने बेहद मुश्किल किरदार और पहले हिस्से से दूसरे में उसका बदलाव जिया है, जिसका बाहर का कवच लोहा है और अन्दर कहीं मोम. राजकुमार यादव, जिनका किरदार छोटा है, लेकिन प्रतिभा नहीं. ज़ीशान क़ादरी, पंकज त्रिपाठी, विनीत कुमार और बहुत सारे वे लोग, जिनके नाम यहां नहीं लिए जा सके। और क्या यह दोहराने की ज़रूरत है कि स्नेहा खानवलकर का संगीत (वरुण ग्रोवर और पीयूष मिश्रा  के बोल) और जी.वी. प्रकाश कुमार का बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म को कहां ले जाता है?

लेकिन यह बेचैन क्यों करती है? क्या उस बच्चे के लिए, जिसके लिए उसके अब्बू बस एक हलो छोड़कर गए हैं और बदले और मौत की विरासत, जिसे जो भूल सकेगा, वही बचेगा? या फ़िल्मों की दीवानी उसकी मां के लिए, जो आख़िर अपने हीरो की मौत लेकर फ़िल्मों के इस शहर आई है? या हमारे लिए, जिनके पास यह कोई रास्ता नहीं छोड़ती? न बदला, न गांजा. न बच्चन, न शशि कपूर. फ़िल्म के दौरान चलती हंसी के बाद आख़िर एक सन्नाटा. ऐसा डर, जो आख़िर निडर बनाता है और संत भी। या बस बेहतर इंसान, जिसे फिर से याद आया है कि रोटी चाँद से बड़ी है.

– गौरव सोलंकी

हो हरी

जाऊं कि न जाऊं! जाने पर खतरा है न जाने पर भी खतरा! करूं तो क्या करूं! जाने दो, छींटाकशी तो रोज की बात है. हां, मगर कल तो छेड़खानी हुई है, बाकायदा छेड़खानी. टच करने की कोशिश की है! अगर ऐसे ही चुप रही तो कल को बात और बढ़ जाएगी! तो फिर क्या करूं, चली जाऊं क्या?

क्या जाऊं! इस बात की क्या गारंटी कि वे भी इसे गंभीरता से लेंगे. आजकल छेड़खानी को कौन गंभीरता से लेता है. अगर लोग इसे गंभीरता से लेते तो ऐसी घटना आम नहीं होती. ऐसी घटनाओं पर जिम्मेदारों का तब तक ध्यान नहीं जाता है, जब तब वह वीभत्स रूप न ले ले या फिर जिसके साथ घटना हुई हो, वह कोई विशिष्ट हो. तो फिर न जाऊं! हाय राम! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूं! अकेले जाने का ख्याल आया भी तो आया कैसे! किसी को अपने साथ ले लेती हूं, मगर कौन चलेगा मेरे साथ. हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है. कई तो मेरे जैसे होते हैं जिनको जान से ज्यादा अपनी इज्जत प्यारी होती है. फिर कोई वहां क्यों जाना चाहेगा? क्या करूं! अगर मैं वहां गई और मां-बाप को पता चल गया, तो मेरी घर वापसी का टिकट कटना तय है. घर वापस चली जाऊं! क्या रखा है यहां. दिन भर खटने के बाद आखिर मिलता ही कितना है. घर वापस जाकर करूंगी भी क्या. कैसा समाज है, कैसे लोग हैं. कल जब मैंने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का विरोध किया था, वहां कौन बोला था. अगर लोग बोलने लगे, तो हम जैसों को क्या जरूरत है, वहां जाने की. इत्ते बेवकूफ तो नहीं है हम कि बैल से कहें कि आ बैल मुझे मार!

मगर ऐसा कितने दिनों तक चलेगा? वहां जाना तो पडे़गा ही. अरे कोई जबरदस्ती है क्या भाई! जाओ नहीं जाती. हां, मगर कल को फिर कोई ऐसी-वैसी घटना हो गई तो! तब मैं क्या करूंगी! कहीं कोई कांड हो गया, तो कल को लोग यही कहेंगे कि आप हमारे पास आई क्यों नहीं. सही बात है, तो चली जाती हूं. चली ही जाती हूं! वहां चली तो जाऊं, मगर न जाने कैसे-कैसे सवाल पूछेंगे. कैसे पूछेंगे! कैसी नजरों से देखेंगे! मेरे बारे में क्या सोचेंगे! वहां जा कर पछताना न पडे़! कहीं पूछताछ के बहाने बार-बार बुलाए न! यह भी हो सकता है कि पूछताछ के बहाने रात-बिरात घर ही आ धमके! कहीं वहां मेरे साथ ऐसा-वैसा कुछ हो गया तब! तब कहां जाऊंगी!

मैं आज की नारी हूं. अपने अधिकारों को अच्छी तरह से जानती हूं. मैं नहीं लडूंगी तो कौन लडे़गा. अगर वहां कुछ ऐसा-वैसा मेरे साथ हुआ, तो उन्हें मुंहतोड़ जवाब दूंगी. मगर ऐसी नौबत ही क्यों आए. जब यही करना है, तो वहां जाने की जरूरत ही क्या है! हां, तो वे अपनी तनख्वाह भी हमें दे, जब उनका भी काम हमें ही करना है! अरे यार, मैं वहां जाने की सोच ही क्यों रही हूं! ऐसा करती हूं बॉडी गार्ड रख लेती हूं. तब जाती हूं वहां पर. सेफ रहूंगी. या फिर ऐसा करती हूं कि पहले एक गन खरीदती हूं, फिर वहां जाती हूं. अरे यार कैसे-कैसे आइडिया आ रहे हैं! क्या करूं! अकेले जाऊं या किसी को साथ ले जाऊं ? पहले किसी से फोन करवा देती हूं. मगर किससे! मेरे जाने में इतने रुतबे वाला कौन है! छोड़ो! कल देखते हैं. कल अगर ऐसा हुआ तो चलेंगे थाने में रपट लिखाने. नहीं यार, कल छेड़खानी न हो जाए! रपट लिखाने जाऊं तो कहीं रपट ही न जाऊं! उफ! पता नहीं छेड़खानी समस्या है कि उसकी रपट लिखवाना!  वह न जाने कब से थाने जाने के बारे में सोच रही है और न जाने कब तक सोचती ही रहेगी…

-अनूप मणि त्रिपाठी

जाऊं कि न जाऊं!

जाऊं कि न जाऊं! जाने पर खतरा है न जाने पर भी खतरा! करूं तो क्या करूं! जाने दो, छींटाकशी तो रोज की बात है. हां, मगर कल तो छेड़खानी हुई है, बाकायदा छेड़खानी. टच करने की कोशिश की है! अगर ऐसे ही चुप रही तो कल को बात और बढ़ जाएगी! तो फिर क्या करूं, चली जाऊं क्या?

क्या जाऊं! इस बात की क्या गारंटी कि वे भी इसे गंभीरता से लेंगे. आजकल छेड़खानी को कौन गंभीरता से लेता है. अगर लोग इसे गंभीरता से लेते तो ऐसी घटना आम नहीं होती. ऐसी घटनाओं पर जिम्मेदारों का तब तक ध्यान नहीं जाता है, जब तब वह वीभत्स रूप न ले ले या फिर जिसके साथ घटना हुई हो, वह कोई विशिष्ट हो. तो फिर न जाऊं! हाय राम! मैं ऐसा सोच भी कैसे सकती हूं! अकेले जाने का ख्याल आया भी तो आया कैसे! किसी को अपने साथ ले लेती हूं, मगर कौन चलेगा मेरे साथ. हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है. कई तो मेरे जैसे होते हैं जिनको जान से ज्यादा अपनी इज्जत प्यारी होती है. फिर कोई वहां क्यों जाना चाहेगा? क्या करूं! अगर मैं वहां गई और मां-बाप को पता चल गया, तो मेरी घर वापसी का टिकट कटना तय है. घर वापस चली जाऊं! क्या रखा है यहां. दिन भर खटने के बाद आखिर मिलता ही कितना है. घर वापस जाकर करूंगी भी क्या. कैसा समाज है, कैसे लोग हैं. कल जब मैंने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार का विरोध किया था, वहां कौन बोला था. अगर लोग बोलने लगे, तो हम जैसों को क्या जरूरत है, वहां जाने की. इत्ते बेवकूफ तो नहीं है हम कि बैल से कहें कि आ बैल मुझे मार!

मगर ऐसा कितने दिनों तक चलेगा? वहां जाना तो पडे़गा ही. अरे कोई जबरदस्ती है क्या भाई! जाओ नहीं जाती. हां, मगर कल को फिर कोई ऐसी-वैसी घटना हो गई तो! तब मैं क्या करूंगी! कहीं कोई कांड हो गया, तो कल को लोग यही कहेंगे कि आप हमारे पास आई क्यों नहीं. सही बात है, तो चली जाती हूं. चली ही जाती हूं! वहां चली तो जाऊं, मगर न जाने कैसे-कैसे सवाल पूछेंगे. कैसे पूछेंगे! कैसी नजरों से देखेंगे! मेरे बारे में क्या सोचेंगे! वहां जा कर पछताना न पडे़! कहीं पूछताछ के बहाने बार-बार बुलाए न! यह भी हो सकता है कि पूछताछ के बहाने रात-बिरात घर ही आ धमके! कहीं वहां मेरे साथ ऐसा-वैसा कुछ हो गया तब! तब कहां जाऊंगी!

मैं आज की नारी हूं. अपने अधिकारों को अच्छी तरह से जानती हूं. मैं नहीं लडूंगी तो कौन लडे़गा. अगर वहां कुछ ऐसा-वैसा मेरे साथ हुआ, तो उन्हें मुंहतोड़ जवाब दूंगी. मगर ऐसी नौबत ही क्यों आए. जब यही करना है, तो वहां जाने की जरूरत ही क्या है! हां, तो वे अपनी तनख्वाह भी हमें दे, जब उनका भी काम हमें ही करना है! अरे यार, मैं वहां जाने की सोच ही क्यों रही हूं! ऐसा करती हूं बॉडी गार्ड रख लेती हूं. तब जाती हूं वहां पर. सेफ रहूंगी. या फिर ऐसा करती हूं कि पहले एक गन खरीदती हूं, फिर वहां जाती हूं. अरे यार कैसे-कैसे आइडिया आ रहे हैं! क्या करूं! अकेले जाऊं या किसी को साथ ले जाऊं ? पहले किसी से फोन करवा देती हूं. मगर किससे! मेरे जाने में इतने रुतबे वाला कौन है! छोड़ो! कल देखते हैं. कल अगर ऐसा हुआ तो चलेंगे थाने में रपट लिखाने. नहीं यार, कल छेड़खानी न हो जाए! रपट लिखाने जाऊं तो कहीं रपट ही न जाऊं! उफ! पता नहीं छेड़खानी समस्या है कि उसकी रपट लिखवाना!  वह न जाने कब से थाने जाने के बारे में सोच रही है और न जाने कब तक सोचती ही रहेगी…

-अनूप मणि त्रिपाठी