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ना ना करते…

अनशन की राजनीति से सफर शुरू करने वाली टीम अन्ना चुनावी राजनीति के मोड़ पर आ पहुंची है. यह आंदोलन की तार्किक परिणति है या मजबूरी या योजनाबद्ध रणनीति ? अतुल चौरसिया की रिपोर्ट.

दो अगस्त को दिन में डेढ़ बजे जंतर-मंतर पर अन्ना के मंच से अचानक ही वह घोषणा हुई जिसके लिए देश, मीडिया, अन्ना के समर्थक और विरोधी कोई भी तैयार नहीं था. टीम के वरिष्ठ सदस्य और अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने राजनीतिक विकल्प देने का ऐलान कर दिया. इसने जंतर-मंतर पर मौजूद भीड़ से लेकर राजनीति के गलियारों और समाचार चैनलों के न्यूज रूम तक तमाम जगहों पर चल रही बहसों की दिशा ही मोड़ कर रख दी. ऐसा होना स्वाभाविक भी था. जो लोग कल तक नेताओं का विरोध कर रहे थे वे ही अब खुद नेता बनने की बात कर रहे थे. कुछ लोगों को यह बात इसलिए भी अजीब लग रही थी क्योंकि ठीक पंद्रह घंटे पहले टीवी चैनल टाइम्स नाउ को दिए गए साक्षात्कार में अरविंद केजरीवाल राजनीति में उतरने की किसी भी संभावना को कोरी गपबाजी बता कर खारिज कर चुके थे.

इस घोषणा का असर होना था और हुआ. कल तक जो कांग्रेस बात-बात पर अन्ना को चुनाव लड़ने की चुनौती दे रही थी उसने तुरंत ही मामला लपका. सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी का बयान आया, ‘हमें पता थी उनकी नीयत. यह सब वे राजनीति में आने के लिए ही कर रहे थे.’ भाजपा की प्रतिक्रिया फिर भी संयत रही. पार्टी उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं, ‘हम टीम अन्ना का स्वागत करते हैं. लोकतंत्र में सबको हक है चुनाव लड़ने का.’ लेकिन ऐसा हुआ कैसे? कभी रही टीम अन्ना की एक सदस्य शाजिया इल्मी इसकी वजह पर रोशनी डालते हुए कहती हैं, ‘एक तारीख की रात को हमें 23 वरिष्ठ नागरिकों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र मिला. इसमें जेएम लिंग्दोह, वीके सिंह, कुलदीप नैयर जैसे वरिष्ठ लोगों ने अन्ना और उनके सहयोगियों से अपील की थी कि वे अनशन का रास्ता छोड़कर राजनीतिक विकल्प पर विचार करें, क्योंकि इस सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता. अपनी जान दांव पर लगाने का कोई औचित्य नहीं है. इसके बाद हमने राजनीतिक विकल्प पर विचार करने का फैसला किया.’ 

हालांकि यह बात मुश्किल से ही गले उतरती है कि सिर्फ एक पत्र डेढ़ घंटे के भीतर डेढ़ साल के रुख को बदल सकता है. इस अचानक फैसले से जेहन में दो बातें आती हैं. पहली तो यह कि संभव है टीम पहले से ही राजनीतिक विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही हो. दूसरी स्थिति यह हो सकती है कि सरकार द्वारा कोई भाव न दिए जाने की स्थिति में टीम अपना चेहरा बचाने का रास्ता खोज रही थी और यह पत्र उसके लिए माकूल अवसर लेकर उपस्थित हुआ. पत्र की आड़ में टीम ने राजनीतिक विकल्प पर विचार करने के साथ ही अपना अनशन समाप्त कर दिया.  जो बातें टीम अन्ना के सदस्यों के जरिए निकल कर आ रही हैं, वे पहली स्थिति को बल देती हैं. गोपनीयता की शर्त पर टीम के एक अहम सदस्य बताते हैं, ‘लगभग छह महीने पहले से ही टीम में राजनीतिक विकल्प पर विचार शुरू हो गया था. फरवरी में टीम अन्ना के कोर सदस्यों की एक बैठक पालमपुर में प्रशांत भूषण के फार्महाउस पर हुई थी. उस बैठक में जेएम लिंग्दोह भी थे. वहीं पर राजनीतिक विकल्प देने की बात तय हो गई थी.’ अपना हर कदम बहुत नाप-तौल कर बढ़ाने वाली टीम अन्ना यहां भी एक योजना के तहत आगे बढ़ी. उसने जंतर-मंतर पर पहले अनशन का आयोजन किया, फिर पत्र सामने आया और उसके बाद राजनीतिक विकल्प देने की घोषणा के साथ अनशन समाप्त कर दिया गया. 

अभी तक अन्ना और उनके सहयोगी सरकार को अपनी पिच पर आकर खेलने के लिए मजबूर कर रहे थे. अब स्थिति उलटी हो गई है

इस लिहाज से यह सारा मामला पहले से ही ‘स्टेज मैनेज्ड’ लगता है और इसे देखते हुए इस टीम के मकसद के प्रति शंकाएं पैदा होने लगती हैं. अन्ना का मुंबई अनशन असफल होने के बाद से ही यह बात साफ होने लगी थी कि जनसमर्थन कम होता जा रहा है. एक वर्ग का मानना है कि ऐसे में टीम की तरफ से एक ईमानदार पहल यह की जा सकती थी कि सार्वजनिक रूप से मान लिया जाता कि हमने जनता के एक मुद्दे पर आंदोलन करने का फैसला किया था, अब जब जनता ही हमारे साथ नहीं है तो हम आंदोलन वापस लेते हैं. लेकिन शुचिता और ईमानदारी की बात कर रहे लोग इतना नैतिक बल नहीं जुटा सके. यानी साफ है कि कहीं-न-कहीं अहं या फिर निहित स्वार्थ आड़े आ रहे थे. उसके नतीजे में अब राजनीतिक विकल्प की बात हो रही है. 

खैर, यहां तक आने के बाद भी टीम किसी स्पष्ट निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही है. जैसा कि इल्मी बताती हैं, ‘अभी हमारे पास कोई नियत ढांचा नहीं है. हम यह भी नहीं बता सकते कि हमारा विकल्प कैसा होगा, उसका स्वरूप कैसा होगा. हम अभी सिर्फ बातचीत और बैठकों के दौर से गुजर रहे हैं. कोई पुख्ता ढांचा सामने आने में अभी कुछ वक्त लगेगा.’ लोगों की चिंता यही है. टीम के बीच भी इस फैसले को लेकर एकराय नहीं है. संतोष हेगड़े और अखिल गोगोई ने पहले ही दिन विरोध का सुर ऊंचा कर दिया था. स्वयं अन्ना हजारे घोषणा से पहले तक इसके खिलाफ थे, ऐसा टीम के कई सदस्य स्वीकारते हैं. एक मुद्दे पर आंदोलन हो सकता है, राजनीति नहीं. दरअसल राजनीति बहुत व्यापक दायरा है. अब इस टीम का लेना-देना सिर्फ भ्रष्टाचार से नहीं होगा. उससे कश्मीर पर भी राय मांगी जाएगी, बाबा रामदेव पर भी, नक्सलवाद पर भी और आतंकवाद पर भी. और जब इन मुद्दों की बात होती है तब टीम के सिर आपस में ही टकराने लगते हैं. कश्मीर पर प्रशांत भूषण का रुख टीम अन्ना की चुनावी उम्मीदों की हवा निकाल सकता है तो रामदेव के मुद्दे पर अरविंद का ही टकराव अन्ना के साथ हो जाता है.

जिस मध्यवर्ग पर इसकी उम्मीदें टिकी हैं, वह कई मसलों पर लगभग तालिबानी नजरिया रखता है, मसलन नक्सलियों का इस देश से सफाया कर दिया जाना चाहिए. तो सवाल उठता है कि टीम इससे कैसे निपटेगी. दूसरा मुद्दा यह है कि जिस मध्यवर्ग के भरोसे टीम राजनीति का मैदान मारने की फिराक में है वह वोट देने भी कितना निकलता है. अलग-अलग मौकों पर टीम के सदस्यों के आपसी अहं का टकराव भी देखा जाता रहा है. इन छोटी-छोटी लड़ाइयों के मद्देनजर इतने बड़े लक्ष्य को पाने के लिए क्या टीम एकजुट हो पाएगी? जाने-माने राजनीतिक चिंतक योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘कुछ हद तक नेता आंदोलनों का चरित्र तय करते हैं, लेकिन गहरे अर्थ में आंदोलन नेताओं का चरित्र गढ़ता है.’ 

लोकतंत्र की सेहत के लिए विरोध, अनशन और आंदोलन जरूरी तत्व हैं. इस लिहाज से अन्ना के लोकपाल जैसे आंदोलनों का अपना महत्व है और रहेगा. एक तबके का मानना है कि यह आंदोलन अपने लक्ष्य को पाने में असफल रहा. लेकिन सब ऐसा नहीं मानते. योगेंद्र यादव कहते हैं कि सामाजिक आंदोलनों की सफलता-असफलता को मापने का नजरिया अलग होता है. उनके शब्दों में, ‘अगर लक्ष्य प्राप्ति को पैमाना मानें तो गांधीजी के सारे आंदोलन असफल रहे, नर्मदा बचाओ आंदोलन भी असफल रहा. जन आंदोलनों की सफलता की कसौटी यह है कि इसने जनमानस की सोच में क्या बदलाव किया है, इसके दीर्घकालिक असर समाज और व्यवस्था पर क्या पड़े हैं. मेधा पाटेकर की असली सफलता यह है कि आज कोई भी बड़ा बांध बनाने से पहले 100 बार विचार होगा. इसी तरह लोकपाल ने जनता के मन में  यह विश्वास जगाया है कि वह सरकार को अपनी बात सुनने के लिए मजबूर कर सकती है.’ टीम ने जब चुनाव में उतरने का निर्णय कर ही लिया है तब उन्हें रणनीतिक रूप से भी बहुत चतुर सिद्ध होना पड़ेगा. चुनावी राजनीति करने का सबसे सीधा-साधा तरीका तो यह होगा कि एक पार्टी बनाई जाए और सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए जाएं. लेकिन कइयों का मानना है कि यह तरीका तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है.

दूसरा तरीका है कि टीम अन्ना जेपी के फार्मूले का अनुसरण करे. 1974 में जेपी ने जबलपुर में शरद यादव को कांग्रेस के खिलाफ उतार कर अपने कांग्रेस विरोधी आंदोलन की शुरुआत की थी और अंतत: इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था. इसके लिए टीम अन्ना को पांच-दस या पंद्रह हाई-प्रोफाइल सीटों  का चुनाव करना पड़ेगा. जरूरी है कि ये सीटें शहरी हों जहां अन्ना को जानने-समझने वालों की बहुतायत है. ये हाई-प्रोफाइल सीटें राहुल गांधी, सोनिया गांधी से लेकर कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, वी नारायणस्वामी, लालू यादव, सुषमा स्वराज तक की हो सकती हैं. एक बार उम्मीदवार तय हो जाने के बाद स्वयं अन्ना पूरी टीम के साथ इन चुनाव क्षेत्रों में पूरी ताकत के साथ भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाते हुए जोरदार हमला करें. केंद्रित लक्ष्य के साथ अगर अन्ना इनमें से कुछ सीटें भी जीतने में कामयाब रहते हैं तो इसके जरिए राजनीतिक समुदाय और जनता को बड़े संकेत प्रेषित किए जा सकते हैं. फिर किसी सरकार और पार्टी के लिए उन्हें नजरअंदाज कर पाना मुश्किल होगा. 

टीम के राजनीतिगमन के नतीजे में कुछ राजनीतिक रिश्ते भी पुनर्परिभाषित होंगे. कांग्रेस के साथ इसके रिश्ते हमेशा से तल्ख रहे लेकिन भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से आंदोलन को एक नैतिक समर्थन दिया था. टीम भी कहीं न कहीं नर्म रुख के जरिए इसकी कीमत चुका  रही थी. लेकिन बदली परिस्थितियों में इनका अपरिभाषित रिश्ता प्रतिद्वंद्विता की श्रेणी में आ खड़ा हुआ है. भाजपा इस खुशी में थी कि सरकार के खिलाफ चल रहे सभी आंदोलनों का तयशुदा लाभ 2014 में उसे ही मिलेगा. पर अब सबसे बड़ी चिंता उसी के लिए है. टीम अन्ना अगर राजनीति में उतरती है तो सबसे बड़ा नुकसान वह भाजपा का कर सकती है. जो शहरी मध्यवर्ग जंतर-मंतर पर तिरंगा लहरा रहा था, वह परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थक माना जाता है. यह भाजपा के लिए विचार की घड़ी है. लेकिन भाजपा सांसद शाहनवाज हुसैन पार्टी का बहादुर चेहरा पेश करते हुए कहते हैं, ‘भाजपा अन्ना की बैसाखी पर नहीं टिकी है. गली-गली, गांव-गांव में हमारा संगठन है. वह हमें 2014 का चुनाव जितवाएगा.’ हुसैन का बयान उनकी राजनीतिक मजबूरी का नतीजा भी हो सकती है. 

अभी तक अन्ना और उनके सहयोगी सरकार को अपनी पिच पर आकर खेलने के लिए मजबूर कर रहे थे. अब स्थिति उलटी है. अन्ना ने उस पिच पर खेलने का फैसला किया है जिसमें महारत राजनीतिक पार्टियों को हासिल है. तो इस पिच पर सफल होने के लिए टीम को गिद्ध वाली दृष्टि, लोमड़ी जैसी चालाकी, बगुले जैसा ध्यान और इन सबसे ऊपर व्यक्तिगत ईमानदारी चाहिए होगी.

वफादार सिपहसालार

बात 2002 की है. केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार थी. उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना था. राजग ने अपना उम्मीदवार भाजपा के वरिष्ठ नेता भैरों सिंह शेखावत को बनाया था. उनके मुकाबले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सुशील कुमार शिंदे को मैदान में उतारा. शेखावत की जीत तय मानी जा रही थी और कहा जा रहा था कि शिंदे का सियासी करियर खत्म होने वाला है. खुद शिंदे इस खतरे से वाकिफ थे. इसके बावजूद उन्होंने चुनाव लड़ा और जैसा कि माना जा रहा था वे हार गए. मगर उनका करियर खत्म होने की बजाय और चमक गया. बगैर कोई सवाल किए गांधी परिवार का आदेश मानने का इनाम शिंदे को छह महीने में ही मिल गया. सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को हटाकर राज्य की कमान उनके हाथों में सौंप दी थी.

एक छोटी-सी नौकरी से देश के गृहमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने वाले सुशील कुमार शिंदे के असाधारण सफर में ऐसे कई उदाहरण हैं. इन्हीं उदाहरणों में उनकी सफलता का सूत्र भी छिपा है. राष्ट्रपति पद के लिए जब से प्रणब मुखर्जी का नाम चलना शुरू हुआ था तब से ही यह तय माना जा रहा था कि पी चिदंबरम को गृह मंत्रालय से वापस वित्त मंत्रालय भेजा जाएगा. असली कयासबाजी चल रही थी नए गृहमंत्री और लोकसभा में सत्ताधारी दल के नेता के नाम को लेकर. जब यह पता चला कि कांग्रेस आलाकमान सुशील कुमार शिंदे को ऊर्जा मंत्रालय से गृह मंत्रालय भेज रही है तो उन लोगों को सबसे ज्यादा हैरानी हुई जो सियासत में प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कार की बात करते हैं. लेकिन जो लोग देश की सियासी पेचीदगियों से वाकिफ हैं उन्हें अफसोस जरूर हुआ पर आश्चर्य नहीं.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘हर कोई जानता है कि सुशील कुमार शिंदे गांधी परिवार के वफादार रहे हैं. गांधी परिवार को कभी उनसे खतरा नहीं लगा. आप अगर गौर से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की दोनों सरकारों को देखेंगे तो यह पता चलेगा कि गांधी परिवार कभी वैसे व्यक्ति को गृह मंत्रालय में नहीं लाया जो सरकार में स्वाभाविक तौर पर नंबर दो दिखने लगे. अपने यहां यह माना जाता है कि प्रधानमंत्री के बाद गृहमंत्री ही होता है. अपने सबसे कद्दावर नेता प्रणब मुखर्जी को भी गांधी परिवार ने गृहमंत्री नहीं बनाया. अब जब प्रणब नहीं हैं तो चिदंबरम का कद ना बड़ा हो जाए इस भय से उन्हें वित्त मंत्रालय भेज दिया गया और शिंदे को यहां ले आया गया.’

ऊर्जा क्षेत्र में सुधार की बात सालों से चल रही है, पर शिंदे के कार्यकाल में न सुधारों की गाड़ी आगे बढ़ी और न इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में कोई प्रगति हुई

शिंदे गांधी परिवार के किस कदर वफादार हैं, इसे समझने के लिए एक और उदाहरण दिया जा सकता है. 2004 में लोकसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव हुए. कांग्रेस का इस चुनाव में जीतना बेहद मुश्किल लग रहा था. लेकिन शिंदे की अगुवाई में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधन को बहुमत हासिल हो गया. मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार सुशील कुमार शिंदे थे. लेकिन गांधी परिवार ने विलासराव देशमुख को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया. शिंदे ने एक बार फिर बगैर कुछ कहे आलाकमान का यह फैसला स्वीकार कर लिया. इसके बाद शिंदे को आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बना दिया गया. किसी राजनेता के राज्यपाल बनने का मतलब आम तौर पर यही मान लिया जाता है कि उसके राजनीतिक करियर पर फुल स्टॉप लग गया. लेकिन गांधी परिवार की वफादारी का इनाम शिंदे को दो साल के भीतर ही मिल गया. उन्हें 2006 में हैदराबाद के राजभवन से लाकर दिल्ली के ऊर्जा मंत्रालय में बैठा दिया गया. यानी शिंदे के बारे में जब-जब यह माना गया कि उनकी सियासी पारी खत्म होने वाली है तब-तब उन्होंने और मजबूत होकर वापसी की और इसकी प्रमुख वजह रही गांधी परिवार के प्रति उनकी वफादारी.

सियासी जानकार यह मान रहे हैं कि शिंदे को गृहमंत्री का पद भी उन्हें गांधी परिवार के प्रति वफादार होने की वजह से ही मिला है न कि उनके प्रदर्शन के आधार पर. जिस दिन शिंदे को गृहमंत्री बनाने की घोषणा हुई, उसी दिन देश ने अब तक का सबसे बड़ा ब्लैकआउट झेला. देश की तीन प्रमुख ग्रिडों के फेल होने से 22 राज्यों के 60 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए. जिस मंत्री को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए था उसे सजा देने के बजाय एक तरह से प्रमोशन दे दिया गया. अगर कोई ऊर्जा मंत्रालय के अधिकारियों से बात करे तो पता चलता है कि इस ब्लैक आउट की वजह शिंदे की ढुलमुल कार्यशैली भी थी. केंद्रीय बिजली नियामक आयोग (सीईआरसी) ने जुलाई में ही बताया था कि पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान नेशनल ग्रिड से अपने कोटे से अधिक बिजली ले रहे हैं. इसके बाद 12 जुलाई को ऊर्जा मंत्रालय ने इन राज्यों को एक पत्र भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली.

अगर ऊर्जा मंत्रालय इन राज्यों के साथ उसी वक्त सख्ती से पेश आता तो यह संभव था कि इतनी बड़ी बिजली कटौती का सामना नहीं करना पड़ता. मंत्रालय द्वारा बनाई गई एक समिति की शुरुआती जांच में यह बात सामने आई है कि आगरा-दिल्ली और आगरा-ग्वालियर के बीच कहीं ओवर लोडिंग होने की वजह से समस्या पैदा हुई. इससे भी यह बात प्रमाणित होती है कि अगर सीईआरसी की रिपोर्ट पर ऊर्जा मंत्रालय ने कार्रवाई की होती तो ब्लैकआउट टल सकता था. उधर, जब बिजली कटौती से लोग बेहाल थे तो शिंदे इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेने के बजाय यह कुतर्क देते हुए दिखे कि अमेरिका में तो चार-चार दिन तक ग्रिड ठीक नहीं होता लेकिन यहां तो चार घंटे में ही सब ठीक हो गया.

बतौर ऊर्जा मंत्री शिंदे की नाकामी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती. जब 2006 में वे ऊर्जा मंत्री बने थे तो उस वक्त उन्होंने कहा था कि सरकार हर  घर का अंधेरा दूर करेगी. इसका मतलब यह हुआ कि शत प्रतिशत बिजलीकरण का लक्ष्य रखा गया. लेकिन इस वादे का हश्र किसी से छिपा हुआ नहीं है. 11वीं पंचवर्षीय योजना में बिजली उत्पादन की क्षमता में 78,000 मेगावॉट की बढ़ोतरी का लक्ष्य था. लेकिन शिंदे के कार्यकाल के दौरान इसमें 53,000 मेगावॉट का ही इजाफा हुआ. अभी देश की बिजली उत्पादन की कुल क्षमता है 1.87 लाख मेगावॉट. लेकिन अब भी पीक आवर में आपूर्ति और मांग के बीच 12 फीसदी का फासला है. शिंदे के कार्यकाल में सरकारी बिजली कंपनियों का हाल और खस्ता हुआ. इसकी गवाही खुद सरकारी आंकड़े दे रहे हैं. सरकारी बिजली कंपनियों पर बैंकों का 12,000 करोड़ रुपय से ज्यादा का कर्ज है.

आर्थिक मामलों का अध्ययन करने वाली संस्था क्रिसिल का अध्ययन बताता है कि 2006-07 से 2009-10 के बीच सरकारी बिजली कंपनियों का घाटा 24 फीसदी बढ़कर 27,500 करोड़ रुपय हो गया. क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि अगर 2011 का घाटा भी इसमें जोड़ दिया जाए तो घाटा बढ़कर 40,000 करोड़ रुपय पर पहुंच जाएगा. बिजली कंपनियां मुख्य तौर पर कोयले और गैस की कमी की समस्या का सामना कर रही हैं. इस वजह से ज्यादातर कंपनियां अपनी क्षमता से काफी कम बिजली उत्पादन कर रही हैं. इस समस्या को दूर करने के लिए शिंदे कुछ नहीं कर पाए. ऊर्जा क्षेत्र में कई तरह के सुधार की बात सालों से चल रही है. लेकिन शिंदे के छह साल के कार्यकाल में न तो सुधारों की गाड़ी आगे बढ़ी और न ही ऊर्जा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर कोई प्रगति हुई.

जानकारों की राय में इसके बावजूद शिंदे को गृहमंत्री बनाया जाना साबित करता है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व या यों कहें कि गांधी परिवार ने उन्हें यह प्रोन्नति किसी खास रणनीति के तहत दी है. इसमें वफादारी की भूमिका तो अहम है ही, साथ में इस बात को लेकर भी निश्चिंतता है कि शिंदे का कद कभी भी उतना बड़ा नहीं हो सकता कि वे गांधी परिवार को चुनौती देते नजर आंए. कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि प्रणब मुखर्जी को गृहमंत्री नहीं बनाए जाने की असली वजह गांधी परिवार का यही डर थी. ऐसा लगता है कि शिंदे को गृह मंत्रालय में लाकर सोनिया गांधी दलितों को भी एक बार फिर से कांग्रेस के साथ लाने की योजना को आगे बढ़ाना चाहती हैं. नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘एक दलित राजनेता को गृहमंत्री बनाकर सोनिया गांधी ने यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है कि कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जो दलितों का खयाल रखती है. कांग्रेस चाहेगी कि उसे आने वाले चुनावों में इस बात का फायदा मिले.’ वे आगे जोड़ती हैं, ‘दो साल पहले राहुल गांधी ने भी कहा था कि अगर कांग्रेस को अपने बूते केंद्र की सत्ता में आना है तो दलितों को फिर अपने साथ लाना होगा. इसके बाद से ही राहुल का दलितों के घर में जाना और भोजन करना शुरू हुआ था. शिंदे को गृह मंत्रालय में लाए जाने को इससे भी जोड़कर देखना होगा.’

राजनीति को समझने वाला एक वर्ग यह भी मानता है कि सुशील कुमार शिंदे कुछ मामलों में बतौर गृहमंत्री बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं

यहां सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए कांग्रेस आलाकमान ने गृह मंत्रालय जैसा अहम और संवेदनशील विभाग शिंदे  के हाथों में दे दिया या फिर वे गृह मंत्रालय संभालने में सक्षम हैं? इस सवाल का जवाब समझने में आसानी हो, इसके लिए जरूरी है कि शिंदे की पृष्ठभूमि से संबंधित कुछ और बातें जान ली जाएं. अगले चार सितंबर को अपनी जिंदगी के 71 साल पूरे करने वाले शिंदे सात बार विधायक रहे हैं. बतौर सांसद यह उनकी तीसरी पारी है. कोल्हापुर के शिवाजी विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई करने वाले शिंदे ने अपने कामकाज की शुरुआत कोर्ट में बतौर क्लर्क 1957 में की. वे इस नौकरी में 1965 तक रहे. इसके बाद वे पुलिस में सब इंस्पेक्टर बन गए. पुलिस की नौकरी के दौरान ही उन्होंने सीआईडी के लिए भी काम किया. छह साल तक पुलिस की नौकरी करने के बाद 1971 में शरद पवार उन्हें राजनीति में लाए.

इसके तीन साल बाद शोलापुर की करमला विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना था. इसमें कांग्रेस की ओर से शिंदे को टिकट मिला और वे जीतकर पहली बार विधायक बन गए. इसके बाद उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार बढ़ता ही गया. विधायक बनने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें महाराष्ट्र की वीपी नायक सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया. शिंदे महाराष्ट्र में वित्त, योजना, शहरी विकास, उद्योग और परिवहन मंत्रालय संभाल चुके हैं. उन्होंने रिकॉर्ड नौ बार महाराष्ट्र का बजट पेश किया है. वे दो मर्तबा 1990 और 1996 में महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं. 1992 में उन्हें महाराष्ट्र से राज्य सभा के लिए चुना गया.

शिंदे को राजनीति में आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका शरद पवार की रही. लेकिन पवार के कांग्रेस से अलग होने से पहले से ही शिंदे गांधी परिवार के करीब हो गए थे. जब सोनिया गांधी ने अमेठी से अपना पहला चुनाव लड़ा तो शिंदे को उन्होंने चुनाव एजेंट बनाया था. इससे गांधी परिवार से शिंदे की नजदीकी और बढ़ी. हालांकि, गृहमंत्री बनने के बाद भी एक दिन शिंदे ने यह बयान दिया कि शरद पवार उनके राजनीतिक गुरु हैं. इस बयान को कांग्रेस और शरद पवार के बीच खराब हो रहे रिश्ते को ठीक करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. जब पिछली बार शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे तो उसी दौरान आदर्श सोसाइटी को जमीन आवंटित की गई थी. 2010 में जब आदर्श घोटाला सामने आया तो उससे शिंदे का भी नाम जुड़ा. इस घोटाले की जांच कर रही समिति के सामने भी शिंदे को पेश होकर अपना पक्ष रखना पड़ा. शिंदे आदर्श सोसाइटी की गड़बड़ियों से पल्ला झाड़ते हुए सारा दोष महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख पर मढ़ते हैं.

शिंदे के साथ काम करने वाले लोग उनकी खूबियों को गिनाते हुए उनकी विनम्रता का उल्लेख सबसे पहले करते हैं. हाल तक शिंदे के सहयोगी के तौर पर काम करने वाले एक अधिकारी कहते हैं, ‘वे बहुत विनम्र हैं. वे सबकी यहां तक कि एक चपरासी की बात भी काफी गंभीरता से सुनते हैं. इसकी एक वजह यह हो सकती है कि उन्होंने खुद कचहरी में चपरासी की नौकरी की है और बाद में पुलिस में बतौर सब इंस्पेक्टर काम किया है. सत्ता और पैसे का मद उनमें नहीं दिखता. इन्हीं योग्यताओं के बूते उन्होंने एक सामान्य चपरासी से लेकर देश के गृहमंत्री तक का सफर तय किया है.’  उनकी तीन बेटियों में एक प्रणिति शिंदे महाराष्ट्र में विधायक हैं. प्रणिति कहती हैं, ‘वे कभी भी नाराज नहीं होते. धैर्य के साथ अपना काम निपटाते हैं. वे हमेशा मुस्कुराते रहते हैं और काफी मेहनत करते हैं.’ प्रणिति से बातचीत में ही यह पता चलता है कि लोक कला और मराठी साहित्य से शिंदे को लगाव है और वे हिंदी व मराठी फिल्मों के पुराने गाने सुनना पसंद करते हैं. विचार वेद के नाम से उन्होंने मराठी में एक किताब भी लिखी है.

लेकिन क्या ये योग्यताएं उन्हें बतौर गृहमंत्री सफल बनाएंगी? ऊर्जा मंत्रालय के उनके कामकाज को देखते हुए कई जानकार आशंकित हैं.  इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक पूर्व प्रमुख कहते हैं, ‘यह बात तो गृह मंत्रालय के अधिकारी भी समझ रहे हैं कि शिंदे को गृहमंत्री क्यों बनाया गया है. उनके पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि चिदंबरम के शुरू किए गए काम को आगे बढ़ाना भी उनके लिए चुनौती साबित होने जा रहा है. उनकी असल परीक्षा नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर (एनसीटीसी), तेलंगाना, माओवाद, कश्मीर और आतंकवाद के मोर्चे पर होने वाली है.’ गृह मंत्रालय में उनके शुरुआती दिनों का कामकाज देखकर मंत्रालय के अधिकारी भी उत्साहित नहीं है. मंत्रालय में उच्चपदस्थ एक  आईएएस अधिकारी बताते हैं, ‘जिस दिन वे गृहमंत्री बने, उसी दिन पुणे में विस्फोट हुआ, लेकिन वैसी तत्परता नहीं दिखी जैसी चिदंबरम के समय दिखती थी. गृह मंत्रालय के कामकाज से शिंदे कितने वाकिफ हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मॉर्निंग मीटिंग के लिए रोज गृह मंत्रालय आते हैं. कार्यभार संभालने वाले दिन शिंदे ने ढाई घंटे तक अधिकारियों की बैठक ली, लेकिन इसके बावजूद अधिकारी शिंदे की रणनीति नहीं समझ पाए. अधिकारी आपसी बातचीत में इस बैठक को उबाऊ बता रहे थे.’ 

अधिकारियों में यह बात चल रही है कि कहीं फिर से गृह मंत्रालय में वैसा माहौल न बन जाए जैसा शिवराज पाटिल के कार्यकाल के दौरान था. बताते चलें कि चिदंबरम ने गृह मंत्रालय की कार्यशैली में काफी बदलाव किया था. अधिकारी और अन्य कर्मचारी समय पर आएं, इसके लिए उन्होंने बायोमेट्रिक सिस्टम लगवाया था. वे खुद समय से पहले दफ्तर पहुंचते थे.  इस वजह से अन्य अधिकारी भी बिल्कुल समय से मंत्रालय आने लगे. चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान तकरीबन दो दर्जन आतंकी योजनाएं पटरी से उतारी गईं. चिदंबरम के कार्यकाल में ही अमेरिका को इस बात के लिए मजबूर होना पड़ा कि वह मुंबई हमले के मुख्य आरोपित डेविड कोलमैन हेडली से भारत को पूछताछ की मंजूरी दे. सऊदी अरब को भी अबु जुंदाल का प्रत्यर्पण करना पड़ा. चिदंबरम के कार्यकाल के दौरान गृह मंत्रालय ने अर्धसैनिक बलों की संख्या 45,000 से बढ़ाकर 1.10 लाख की.

भले ही अधिकारी शिंदे की कार्यशैली को लेकर चिंतित हों लेकिन राजनीति को समझने वाला एक वर्ग मानता है कि शिंदे कुछ मामलों में बतौर गृहमंत्री बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं. नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘एनसीटीसी का मामला राज्यों के विरोध की वजह से आगे नहीं बढ़ पाया. कई क्षेत्रीय दलों के नेता मानते हैं कि चिदंबरम थोड़े जिद्दी नेता हैं और कई बार वे अपने फैसले थोपते हैं. लेकिन शिंदे की छवि टकराव से बचने वाले और सबको साथ लेकर चलने वाले नेता की है. शिंदे ने गृह मंत्रालय संभालते ही यह बयान दिया कि वे राज्यों को साथ लेकर चलेंगे. माओवाद के मसले पर भी उन्होंने कहा कि वे बातचीत शुरू करने के लिए हिंसा रोकने की शर्त नहीं रखेंगे. जबकि चिदंबरम इसके उलट सोचते थे. ऐसा लगता है कि शिंदे राज्यों के साथ केंद्र के संबंध सुधारने की एक प्रमुख कड़ी साबित होने की कोशिश करेंगे.’

शिंदे के सहयोगी और देश की राजनीति की बारीक समझ रखने वाले लोग अब यह बात भी कर रहे हैं कि अगर 2014 में किसी तरह फिर से कांग्रेस कमजोर बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में आती है तो शिंदे प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं क्योंकि कमजोर बहुमत की स्थिति में संभवतः राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने से परहेज करें. 2014 में शिंदे की उम्र 73 साल होगी और गांधी परिवार उन्हें शीर्ष पद देकर दलितों का हितैषी होने का संदेश देने की कोशिश कर सकता है. नीरजा चौधरी तो यह भी कहती हैं कि संभव है कि चुनाव से पहले ही दलितों का समर्थन पाने के लिए कांग्रेस ऐसा माहौल बनाने की कोशिश करे कि अगले प्रधानमंत्री शिंदे हो सकते हैं.

अक्षम नहीं असाधारण

शरत गायकवाड़ का बायां हाथ जन्म से ही ऐसा है. एक नई जिंदगी इस रूप में दिखे तो किसी भी मां-बाप का परेशान होना स्वाभाविक है. शरत के माता-पिता भी भाग्या और महादेव राव भी अपवाद नहीं थे. साथ देने को जब बस एक हाथ हो तो साधारण काम भी असाधारण लगने लगता है.  लेकिन साधारणता की हसरत अब बहुत पीछे छूट गई है. आज शरत असाधारण उपलब्धियों के पहाड़ पर बैठे हैं. बंगलुरू में रहने वाला 21 साल का यह तैराक पिछले सात सालों के दौरान 40 राष्ट्रीय और 30 अंतरराष्ट्रीय पदक अपने नाम कर चुका है. उपलब्धियों की इस किताब में एक नया पन्ना जोड़ते हुए शरत ने पैरालिंपिक-2012 के लिए क्वालीफाई किया है. इस मुकाम पर पहुंचने वाले वे पहले भारतीय तैराक हैं.   

जाहिर है हर कोई उनकी इस प्रेरणादायी यात्रा के बारे में जानना चाहता है. वे बताते हैं कि इसमें उनके दृढ़ संकल्प और उन सभी लोगों का हाथ है जिन्होंने समय-समय पर उनका हौसला बढ़ाया. अपनी मां के बारे में बात करते हुए उनके चेहरे पर मुसकान आ जाती है. शरत कहते हैं, ‘शुरूआती दौर में मैं जब भी पदक जीतता तब मां मेरी पसंद का खाना बनाती थीं. लेकिन मुझे लगता है कि अब तो यह सब उनके लिए सामान्य बात हो गई है.’ 

शरत ने पहली बार राष्ट्रीय खेलों में 2003 में भाग लिया था. वे तब सिर्फ 12 साल के थे. इस आयोजन के दौरान उनकी झोली में चार स्वर्ण पदक आए. आज भी उन्हें याद है कि जैसे-जैसे इस आयोजन का वक्त पास आता जा रहा था तो उन्हें बड़ी घबराहट हो रही थी. वे बताते हैं,  ‘लेकिन एक बार पानी में क्या उतरा कि सारी घबराहट छूमंतर हो गई.’ शरत को सहजता से तैरते हुए देखकर कोई भी पल भर के लिए यह भूल सकता है कि तैराकी के लिए पूरी तरह संतुलित एक शरीर बहुत जरूरी है. तैरने के क्रम में दोनों बाजुओं का इस्तेमाल पानी को काटने के लिए और पैरों का उपयोग शरीर को आगे धकेलने में किया जाता है.    

‘मेरा मुकाबला मुझ जैसे किसी खिलाड़ी से नहीं है. न ही मैं दो बाजुओं वाले किसी तैराक से होड़ लेना चाहता हूं. मैं तो अपनी ही उपलब्धियां पीछे छोड़ना चाहता हूं’

विकलांग बच्चों में भविष्य को लेकर डर मां-बाप से प्यार कम मिलने की वजह से पैदा नहीं होता है. यह डर पैदा होता है दूसरों को देखकर खुद को कम समझने के बाद. अच्छी बात यह रही कि माता-पिता से लेकर लिटिल फ्लॉवर पब्लिक स्कूल के उनके शिक्षकों तक सबने उनका हौसला बढ़ाया. सबने कहा कि जो सब कर सकते हैं वह तुम भी कर सकते हो . थोड़ी सी आशंकाएं तभी पैदा हुईं जब शरत को नौ साल की उम्र में ही तैराकी के अभ्यास में भी शामिल कर लिया गया. उनके पिता महादेव राव को एक बार लगा था कि शिक्षकों से इस बारे में बात की जाए. शरत की मां भाग्या उस समय को याद करते हुए कहती हैं, ‘मेरे पति बेटे के स्कूल प्रिंसिपल के पास गए और उनसे कहा कि वे शरत का ख्याल रखें. दरअसल उनके मन में बेटे के डूब जाने का खतरा पैदा हो गया था. लेकिन प्रिंसिपल ने जोर देते हुए कहा था कि जब वह हरेक गतिविधियों में क्लास के अन्य बच्चों की बराबरी कर रहा है तब उसे तैराकी  से अलग रखने का कोई मतलब नहीं. उन्होंने कहा कि उसका विशेष ख्याल रखने से कहीं वह दूसरे बच्चों से अलग-थलग न पड़ जाए. प्रिंसिपल ने शरत के पिता को यह समझाया कि कोच उसका दूसरे बच्चों की तरह ही ख्याल रखेंगे. कोच को यह अच्छी तरह पता है कि वे क्या कर रहे हैं.’ 

एक ही बाजू का मतलब शरत के लिए यह था कि उन्हें दो हाथ और दो पांव वाले एक सामान्य आदमी की तरह संतुलन स्थापित करना सीखना होगा. कंधों, पांव और भीतरी तौर पर खुद को मजबूत बनाना होगा. पिछले सात सालों से शरत के कोच 41 वर्षीय जॉन क्रिस्टोफर बताते हैं, ‘यह एक चप्पू से नाव खेने जैसा है. अगर शरत ने अतिरिक्त ताकत विकसित नहीं की होती तो वे आगे नहीं बढ़ सकते थे. इसकी बजाय वे एक ही जगह पर गोल-गोल घूमते रहते.’ 

शरत अपने कोच को ‘जॉन सर’ कहकर बुलाते हैं. जॉन की नजर शरत पर पहली बार 2003 में लिटिल फ्लॉवर स्कूल के प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान पड़ी थी और उन्हें यह लग गया था कि इस लड़के को एक पेशेवर खिलाड़ी के तौर पर तैयार किया जा सकता है. लेकिन जॉन ने इससे पहले ऐसे किसी खिलाड़ी को प्रशिक्षित नहीं किया था. इसका मतलब यह नहीं है कि शरत ने इस वजह से ट्रेनिंग में कोई रियायत ली हो.     

तैराकी सीखने के दौरान आई समस्याओं को याद करते हुए शरत कहते हैं कि एक नौ साल के बच्चे को अक्षम और विशेष रूप से सक्षम लोगों के बीच भेद करना सीखना था. वे कहते हैं, ‘वे दिन घोर निराशाओं से भरे होते थे. दोस्त मुझ पर कमेंट पास करते थे और हंसते थे. मैं ज्यादातर समय अपने दोनों हाथ होने की दुआ करता था. लेकिन इस बारे में कुछ भी नहीं किया जा सकता था. शरत थोड़ा गंभीर होते हुए कहते हैं, ‘शरीर को प्रशिक्षण देने से पूर्व अपने मन को प्रशिक्षित करने की जरूरत होती है. आपको अपनी कमियों की ओर देखना बंद करना होता है.’ शरत ने ऐसा ही किया और अब उनके मन में हठ समा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वे ऊंचे से ऊंचे मुकाम तक पहुंचेगे.  

 वर्ष 2010 में हुए एशियाई पैरा खेलों के आयोजन में शरत ने कांस्य पदक जीता और वे पैरालिंपिक खेलों के लिए क्वालीफाई भी कर गए. लेकिन उसके बाद कंधों की चोट की वजह से उनके प्रदर्शन में दो सेकेंड की गिरावट आई. लंदन में आयोजित होने वाले पैरालिंपिक में अपना प्रदर्शन ठीक करने के लिए वे हर रोज पांच घंटे से भी ज्यादा मेहनत कर रहे हैं. पसंदीदा जंक फूड से भी उन्होंने तौबा कर ली है और घर का बना खाना खा रहे हैं. लड़कियों की बात उनसे पूछने पर वे थोड़ा शरमाते हैं और फिर कहते हैं कि लड़कियां उन्हें बहुत भाव देती हैं लेकिन इन चक्करों में पड़ने से उनका ध्यान बंट जाएगा. वे कहते हैं, ‘मेरे जीवन का एक और एकमात्र उद्देश्य पैरालिंपिक खेलों में पदक हासिल करना है.’

शरत ने अपने कमरे में बचपन के हीरो सचिन तेंदुलकर और इयान थोर्प की तस्वीर लटका रखी है. ऐसे कोई स्टार आपके रोल मॉडल नहीं हैं जो आपकी तरह विशेष रूप से सक्षम हों, इस सवाल पर शरत पहले एक गहरी सांस लेते हैं और फिर कहते हैं,’मुझे लगता है कि मीडिया ने कभी भी हम जैसे खिलाड़ियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है. शायद यही वजह है कि मैंने ऐसे खिलाड़ियों के बारे में कभी नहीं सुना.  मैं भी थोर्प और तेंदुलकर जैसा खिलाड़ी बनना चाहता हूं जिनका मुकाबला हमेशा अपने आप से होता है. मेरा मुकाबला मुझ जैसे किसी दूसरे खिलाड़ी से नहीं है. न ही मैं दो बाजुओं वाले किसी तैराक से होड़ लेना चाहता हूं. मैं तो अपनी ही उपलब्धियां पीछे छोड़ना चाहता हूं.’ क्रिस्टोफर को वह दिन याद है जब वे शरत को ओलंपियन बनाने का निश्चय लिए उनके माता-पिता से मिले थे.  वे बताते हैं, ‘मैंने उनसे कहा कि यह लड़का विकलांगता नहीं बल्कि काबिलियत लेकर जन्मा है. अब आप इस चीज के लिए मानसिक रूप से तैयार न हों कि आप इसे कैसे पालेंगे. तैयारी उन उपलब्धियों के लिए कीजिए जो यह अब हासिल करने वाला है. ’

‘पुलिस मुझे ऑटो में थाने ले गई और किराया भी मुझे ही देना पड़ा’

जिंदगी में कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कोई मुसीबत बिना कोई चेतावनी दिए अचानक ही आ धमकती है और आप बिल्कुल ही असहाय-से हो जाते हैं. मेरे साथ भी एक दफा ऐसा हुआ था. यह करीब एक दशक पहले की बात है. तब मैं मुंबई में था. उस दिन मैं ऑफिस से घर आया ही था. दिन बहुत व्यस्त रहा था. ऊपर से घर लौटने के लिए अंधेरी से मलाड के लिए ट्रेन पकड़ी तो उसमें तिल तक रखने की जगह नहीं थी. इसलिए जब घर पहुंचा तो थोड़ी राहत-सी महसूस हुई. उस वक्त घर पर सन्नाटा था. मेरा रूम पार्टनर संदीप ऑफिस से नहीं लौटा था. मुझे बहुत भूख लग रही थी, इसलिए मैंने गैस चूल्हे पर अंडे उबलने के लिए रख दिए और नहाने की तैयारी करने लगा.

तभी घर की घंटी बजी. दरवाजे पर संदीप होगा यह सोचकर मैंने कुंडी खोल दी. लेकिन दरवाजा खुलते ही कई लोग जबरदस्ती घर में घुस आए. धक्का-मुक्की करते हुए एक आदमी ने मुझे दबोच लिया और बाकी लोगों ने घर की तलाशी लेनी शुरू कर दी. उनमें से एक रसोई घर से अंडे की केतली लिए बाहर निकला और उसे फर्श पर पटकते हुए मुझसे पूछा, ‘इसमें क्या है?’ मैंने कहा, ‘अंडे.’ उसने दूसरा सवाल दागा, ‘किसलिए?’ मैंने कहा, ‘खाने के लिए.’

बड़ी ही अजीब स्थिति पैदा हो गई थी. वे अंडों को बहुत सावधानीपूर्वक सूंघ रहे थे. उन्होंने एक अंडा फोड़ भी दिया जो अभी कच्चा ही था.  मुझे जिस आदमी ने पकड़ रखा था उसकी तरफ गर्दन घुमाते हुए मैंने पूछा, ‘क्या हो रहा है यह सब?’ रूखे अंदाज में जवाब देते हुए उसने कहा, ‘मैं तुम्हारे घर की तलाशी ले रहा हूं.’ थोड़ी हिम्मत करते हुए मैंने दूसरा सवाल दागा, ‘क्यों?’ उसने फिर कहा, ‘मैं बम ढूंढ़ रहा हूं.’ मैंने पूछा, ‘कौन हो तुम लोग?’ उसने चिढ़ते हुए कहा, ‘पुलिस, क्या तुम्हें दिख नहीं रहा.’

कई पड़ोसियों से मेरी हाय-हैलो होती ही रहती थी. लेकिन इस संकट के समय उन सभी ने बिल्कुल ही उदासनीता ओढ़ रखी थी

मुझे कैसे दिखता? उनमें से किसी ने भी खाकी वर्दी नहीं पहनी हुई थी. उनके मुंह से शराब का भभका भी उठ रहा था. इस बीच मेरे फ्लैट के बाहर भीड़ इकट्ठी हो गई थी. सोसाइटी के एसोसिएशन के अध्यक्ष भी उस भीड़ में मूक दर्शक की तरह खड़े थे. मैंने उन्हें सुनाते हुए थोड़ी ऊंची आवाज में कहा, ‘क्या हो रहा है महाशय?’ उन्होंने मुझे सूचना देने वाली शैली में कहा, ‘दोपहर में आपके घर में एक विस्फोट हुआ था.’ लगभग चौंकते हुए मैंने कहा, ‘विस्फोट? यहां?’ मैंने घर के अंदर सरसरी निगाह से देखा. वहां मुझे ऐसा कुछ भी नहीं दिखा. इसी बीच एक पुलिस अधिकारी ने घोषणा करने के अंदाज में कहा, ‘कुछ भी नहीं है यहां.’ सभी घर से बाहर निकल आए.

पुलिस अधिकारी ने अपनी गिरफ्त ढीली की और आदेश देते हुए कहा, ‘तुम्हें मेरे साथ पुलिस स्टेशन चलना होगा.’ मैंने साहस दिखाते हुए कहा, ‘किसलिए? इस बिल्डिंग में मुझे हर कोई जानता है.’ पड़ोसी मेरी ओर  लाचारी से देख रहे थे. पुलिसवालों में से एक ने मुझसे कहा, ‘तुम्हारे किसी पड़ोसी ने ही तुम्हारी शिकायत दर्ज कराई है.’ मैं कई पड़ोसियों को जानता था. उनसे मेरी मेरी हाय-हैलो होती रहती थी. लेकिन इस संकट के समय उन्होंने उदासीनता ओढ़ रखी थी. मैं भौचक रह गया.

फिर मुझे लगा कि क्यों न पुलिस को ही समझाने की कोशिश की जाए. मैंने उन्हें बताया कि मैं दूरदर्शन पर एक बहुत लोकप्रिय कार्यक्रम का निर्देशक हूं. लेकिन पुलिस वाले किसी भी सूरत में पिघलने को तैयार नहीं थे. उसने सवाल किया, ‘लेकिन जो विस्फोट हुआ उसका क्या ?’ मैंने जवाब दिया, ‘इस बारे में मुझे कुछ भी नहीं पता. दोपहर में तो मैं घर पर भी नहीं था.’ उसने छूटते ही पूछा, ‘तुम्हारा रूममेट कहां है?’ मैंने बताया, ‘वह ऑफिस में होगा. वह चैनल वी के लिए काम करता है.’ पुलिसवाले ने फैसला देते हुए कहा, ‘रूममेट के आने तक तुम्हें पुलिस स्टेशन में इंतजार करना होगा.’

उन्होंने मुझे ऑटो में पटका और पुलिस स्टेशन ले गए. ऑटो का किराया मुझे ही देना पड़ा. उस जमाने में मोबाइल का चलन नहीं था. उन्होंने मुझे लैंडलाइन से फोन करने की इजाजत भी नहीं दी. संदीप और उसकी एक महिला पत्रकार मित्र के वहां आने में दो घंटे से ज्यादा का समय लग गया. ऑफिस से फ्लैट पर लौटते ही संदीप को पड़ोसियों ने मेरी दुर्दशा के बारे में सूचना दी थी. महिला पत्रकार ने थाने में कदम रखते ही पुलिस अधिकारी पर चिल्लाना शुरू कर दिया. मैंने उसे चुप रहने की सलाह दी क्योंकि मुझे यह लग रहा था कि कहीं पुलिसवाले मुझे सलाखों के पीछे न डाल दें. लेकिन वह तो जैसे पुलिसवालों पर फट पड़ने को तैयार थी. मुझे वहां लाने वालों के मुंह पर जैसे ताला जड़ गया था. उसने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे थाने से बाहर ले गई. थाने से घर लौटते हुए संदीप ने मुझे बताया कि वह धमाका डियोड्रेंट की बोतल फटने से हुआ था और उससे खिड़की का एक शीशा भी चटक गया था.  मैंने इस घटना से कुछ बातें सीखीं. एक, अगर आपको पुलिसवाले पकड़ कर ले जाएं तो थाने जाने का खर्च देने को तैयार रहें. दो, महिला पत्रकारों की ताकत को कम करके न आंकें और तीन, दुआ करें कि आपको अच्छे पड़ोसी मिलें. 

मेटाबोलिक सिंड्रोमः ये है क्या बला?

आजकल डॉक्टर लोग कई लोगों को जांच-वांच करके यह बताते हैं कि आपको दरअसल ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ नामक परेशानी है. पर वे प्रायः यह साफ नहीं करते हैं कि यह ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ आखिर क्या बला है. मरीज के पूछने पर भी डॉक्टर अक्सर यही जवाब देते हैं कि इसके होने से आगे जाकर आपका खतरा दो से पांच गुना ज्यादा बढ़ जाता है. इससे आपको हार्ट अटैक या लकवे का स्ट्रोक पड़ सकता है. बस. इससे ज्यादा बताया भी तो इंसुलिन रेजिसटेंस, बहुत ज्यादा पेरिटोनियल फैट जैसी तकनीकी शब्दावली का वह जंगल खड़ा कर देते हैं जहां आपके हाथ को हाथ नहीं सूझता.

मुझे लगता है कि हर शख्स को ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ का थोड़ा-बहुत सिर पैर पता तो होना ही चाहिए. ऐसा माना जाता है कि लगभग 24 प्रतिशत वयस्कों में तथा 44 प्रतिशत साठ वर्ष से ऊपर की उम्र वालों में यह विकार मौजूद हो सकता है. संभव है कि उन्हें कोई तकलीफ न हो रही हो तब भी इसके बारे में जानकारी होगी तो इसे कंट्रोल भी कर लेंगे. कंट्रोल कर लेंगे तो हार्ट अटैक और स्ट्रोक का रिस्क भी बहुत हद तक कम कर सकेंगे.

 यह ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ आखिर है क्या बला?  इस विकार में शरीर के अंदर ही अंदर मानो एक षड्यंत्र-सा चल पड़ता है. आपके लीवर और पेट के अंदर की चर्बी में बेतहाशा वृद्धि हो जाती है. यह बात ऊपर से पता भी नहीं चलती. जरूरी नहीं कि आप मोटे लगें पर अंदर खतरनाक वाली चर्बी बढ़ जाती है. यह खून में घुलकर अंततः दिल और दिमाग की नलियों में जमा होकर उन्हें अवरुद्ध करती रहती है. शरीर में इंसुलिन बनती अवश्य है परंतु शरीर पर उसका वांछित असर ही  नहीं होता. इसी को डॉक्टर लोग ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ की स्थिति कहते हैं. नतीजा? ऐसे शख्स की ब्लड शुगर बढ़ी रहती है. अंततः उसे डायबिटीज भी हो सकती है. खून की नलियों को तनावमुक्त रखने का गुण भी समाप्त हो जाता है.

‘वजन कम करने और नियमित व्यायाम की सलाह मैं जरूर देता हूं. ये दो बातें आपकी बहुत सारी स्वास्थ्य समस्याओं का शर्तिया हल है

वे अब ‘रिलैक्स’ नहीं हो पातीं. इससे रक्तचाप बढ़ा रह सकता है. रक्त में खराब किस्म के कोलेस्ट्राल बढ़ जाते हैं. खराब कोलेस्ट्राल का खोटा सिक्का चलता है और अच्छे कोलेस्ट्राल के खरे सिक्के की कीमत कम हो जाती है. और यह सारा उत्पात उस आदमी के शरीर में चल रहा होता है जो ऊपर से एकदम स्वस्थ महसूस कर रहा है. जब स्वस्थ हैं तो जांच भी क्यों कराना? फिर एक दिन उसे हार्ट अटैक आ जाता है या डायबिटीज निकल आती है या ऐसा ही कुछ हो जाता है जो उसके हिसाब से एकदम अनपेक्षित था पर डॉक्टर की नजर में इतना अपेक्षित था कि यह तो होना ही था. न होता तो आश्चर्य कहाता. तो मुझे कैसे पता चले कि मुझे ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ है अथवा नहीं? 

डाक्टर के पास जाएं. रुटीन मेडिकल चेकअप कराएं. डॉक्टर की सलाह पर कुछ ब्लड शुगर तथा कोलेस्ट्रोल की जांच. बस. इस सबसे यदि यह पता चले किः

1. यदि आप औरत हैं तो आपकी कमर 35 इंच से ज्यादा है और यदि आप आदमी हैं तो 40 इंच से ज्यादा है.

2. आपका अच्छा कोलेस्ट्रोल (HDL) कम है (औरतों में 50mg/dl से कम और आदमी में 40mg/dl से कम),

3. आपका खराब कालेस्ट्रोल (ट्राईग्लिसराइड्स) 150mg/dl से ज्यादा है.

4. आपका रक्तचाप 130/80 से ज्यादा है.

5. खाली पेट ब्लड शुगर 100mg/dl से ज्यादा है.

तो जान लें कि आपको ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ है. आप ऊपर से तो स्वस्थ दिखते हैं परंतु आपकी मे टाबोलिज्म, आपका ऊर्जा पैदा करने का सिस्टम, आपका इंजन खराब चल रहा है तो यह किसी भी दिन जरूर बैठ जाएगा. आप तेजी से डायबिटीज,उच्च रक्तचाप, हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक की दिशा में जा रहे हैं. उनसे पहले ही आप सतर्क हो जाएं.

तो मैं अब क्या करूं, डॉक्टर साहब? मैं तो जांच कराके फंस गया, साहब. चिंता में डाल दिया आपने तो. कोई दवाई बताइए ना. कैसे इस ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ नामक छिपे हुए दुश्मन को कंट्रोल किया जाए? क्या करें यदि जांच में ऐसा निकल आए? और कुछ भी न करूं तो? देखिए, यदि इसका पता चल जाए तो इसे नजरअंदाज मत करें. ऐसा किया तो यह रास्ता अंततः आपको उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, हार्ट अटैक तथा स्ट्रोक की तरफ ले जाएगा. इसे कंट्रोल करने के लिए यह सब करें जो मैं बता रहा हूं:

1. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ज्यादा न खाएं. आवश्यकता से अधिक कैलोरी ही इसकी जड़ है. अपनी भूख से एकाध रोटी कम ही खाएं.

2. हाई कैलोरी बम टाइप के भोज्य पदार्थ विशेष तौर पर शक्कर, घी और तेल में बने हुऐ खाने-पीने के पदार्थ बहुत कम कर दें.

3. शक्कर बंद करके शुगर फ्री सेकरीन टाइप कुछ खा लूं क्या? स्वाद के स्तर पर पूरी संतुष्टि. नहीं, बनावटी मीठापन पैदा करने वाली चीजें अंततः वजन तथा कैलोरी बढ़ाती ही हैं. नहीं. कैसे बढ़ाती हैं, यह फिर कभी बताऊंगा.

4. खाना खाने के बाद फल खाएं और साथ में सलाद भी.फलों को भोजन के तुरंत बाद खाने से एंटी ऑक्सीडेंट वाला लाभदायक प्रभाव पड़ता है जो खाली पेट खाए गए फल से अधिक नहीं मिलता.

5. वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि खाने से ठीक पूर्व यदि 300ml बीयर या 150ml वाइन या 45ml शराब ली जाए तो यह ‘मेटाबोलिक सिंड्रोम’ को ठीक करने में बेहद मददगार है. परंतु याद रहे कि बस इसी मात्रा में. यदि इससे ज्यादा ली तो बेहद खराब असर भी होता है. यदि आप इस मात्रा में रुकने की इच्छाशक्ति रखते हैं तो यह सलाह आपके लिए है. यदि आप मेरी सलाह के बहाने दारू पीना चाहते हैं तो क्षमा करें.

6. कॉफी पीने से भी इसमें फायदा होगा. कॉफी, चाय, मछली और मछली का तेल आदि भी फायदा करते हैं.

7. वजन कम करें.

8. नियमित व्यायाम करें. आप कहेंगे कि मैं जब चाहे जिस बहाने से वजन कम करने और व्यायाम करने की सलाह को बीच में घसीट ही लाता हूं. क्या करूं? ये दो बातें आपकी बहुत सारी स्वास्थ्य समस्याओं का शर्तिया समाधान हैं. कभी करके देखें.

उजाले के लिए अंधेरगर्दी

कुछ समय से झारखंड के गढ़वा जिले की पहचान माओवादियों के गढ़ के रूप में बन गई है. इस नई पहचान के खेल में एक पुरानी समस्या इस कदर हाशिये पर चली गई है कि उसकी वजह से हजारों लोगों की घुटन भरी जिंदगी पर कभी बात ही नहीं हुई. अब, जब इतने वर्षों बाद सरकार को उस मसले की याद भी आई है तो यह किसी पुराने घाव को कुरेदने जैसा ही है. वर्षों पहले की यह समस्या गढ़वा जिले के घोर नक्सल प्रभावित इलाके भंडरिया की है. यहां कोयल नदी पर 1969 में मंडल बांध बनाने की घोषणा हुई थी. कहा गया कि सिंचाई के लिए तरस रहे किसानों को पानी मिलेगा और बिजली भी. लोग मान गए. जमीन अधिग्रहण का काम शुरू हुआ. लेकिन 1974-75 में जब मुआवजे की बात आई तो कुछ को मुआवजा देने के बाद बाकी लोगों को आश्वासन का झुनझुना थमाकर बांध निर्माण का काम शुरू कर दिया गया. काम शुरू होते ही यह भी कह दिया गया कि आस-पास के 32 गांवों के लोग अपने अपने घर-बार को छोड़ दें वरना वे कभी भी डूब के प्रभाव में आ सकते हैं. 

हुआ भी ऐसा ही. 1986 में बांध लगभग बनकर तैयार हो गया था. अब इसमें पानी को रोकने वाले दरवाजे लगना बाकी था. लेकिन मामला लंबे समय तक लटका ही रहा. इसके एक दशक बाद अगस्त, 1997 को भीषण बाढ़ आ गई. आसपास के कई गांवों के लोग, घर-बार, माल-मवेशी बाढ़ में बह गए. इसके बाद माओवादियों ने पुल निर्माण में लगे अधीक्षण अभियंता बैजनाथ मिश्र की हत्या कर दी. फिर 15 साल से अधिक समय तक बांध निर्माण का काम बंद रहा. इस दौरान जो 32 गांव डूब क्षेत्र में आए थे, वहां जिंदगी बद से बदतर होती गई. आज भी वहां जाने के लिए 16-17 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. 1,100 से अधिक परिवार इस तबाही के दायरे में आते हैं, लेकिन इतने परिवारों के लिए एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय की सुविधा छोड़ दें तो आज तक कुछ भी मयस्सर नहीं हो सका है. यहां तक कि इन गांवों को बगैर मुआवजे के राजस्व गांव की सूची से भी हटा दिया गया. इनमें चेमोसन्या भी है, जो झारखंड के महान शहीद नीलांबर पितांबर का गांव है. 

इलाके के रामनाथ बताते हैं कि पुनर्वास न होने से सभी लोग फिर से वहीं बस गए जहां से बाढ़ ने उजाड़ा था. एक और स्थानीय निवासी उमेश कहते हैं कि 2003 में सरकार ने कहा था कि पूरी सुरक्षा के साथ जमीन व मकान मिलेगा. इस पर भरोसा करके वे अपने गांव कुटकू से भंडरिया आ गए. मेहनत करके सिर छिपाने के लिए एक छप्पर खड़ा किया. मगर स्थानीय उपद्रवी तत्वों ने उसे आग के हवाले कर दिया. उमेश कहते हैं, ‘जब हमने कहा कि जमीन सरकार ने हमें दी है,  हमसे जमीन के पट्टों के कागजात दिखाने को कहा गया. पर हमें तो सरकार ने ये दिए ही नहीं थे. फिर हम कैसे दिखाते. थक-हार कर हम वापस अपनी जगह पर आ गए.’ 

मंडल बांध की ऊंचाई 64.82 मीटर तय है. इससे 12 मेगावाट बिजली का उत्पादन होना है. अब एक बार फिर से सरकार इस बांध को पूरा करके बिजली उत्पादन का काम शीघ्र शुरू करने की तैयारी में है. लेकिन पहले से ही उजड़े लोगों की जिंदगी का मसला हाशिये पर है. सरकार की ओर से यह कहा जाता है कि यहां 5,000 से अधिक लोग अवैध तरीके से बस गए हैं, उनका कुछ नहीं किया जा सकता और ग्रामीणों का जो आंदोलन चल रहा है वह माओवादियों द्वारा संचालित है. 

कुटकू जन संघर्ष समिति से जुड़े जगत सिंह बताते हैं कि 23 जुलाई को गांववालों की बैठक हो चुकी है और उसमें तय हुआ है कि न तो मुआवजा लिया जाएगा और न ही बांध बनने दिया जाएगा. वे कहते हैं, ‘पहले हम बाढ़ से हुई क्षतिपूर्ति के लिए संघर्ष करेंगे.’ हालांकि ग्रामीणों को इस बात का डर है कि संघर्ष की धार को कुंद करने के लिए लोगों को जबरदस्ती किसी न किसी बहानेसे माओेवादी या मुखबिर न करार दे दिया जाए.  इस मसले पर एसडीओ एम मुत्थुरमन कहते हैं कि सरकार को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है. वे हकीकत का पता लगाने की कोशिश करने की बात कहते हैं और यह भी कि जो लोग बेमतलब का आंदोलन करेंगे उनके खिलाफ कार्रवाई होगी.

ग्रामीण बताते हैं कि 1986 में सरकार ने बाढ़ प्रभावितों को मुआवजा देने की शुरुआत भी की लेकिन जो चेक मिले उनमें सरकारी नाजिर के दस्तखत ही नहीं थे. अब सरकार बैंक खाता होने पर ही मुआवजा देने की बात कर रही है. कुटकू बचाओ संघर्ष समिति की पुष्पा कुजूर कहती हैं, ‘हमारी जमीन उपजाऊ है. सरकार हमें खेती करने दे और बाजार तक पहुंचने का साधन उपलब्ध कराए तो हम अभिशप्त पलामू के लिए वरदान साबित होंगे.’ जगत सिंह कहते हैं, ‘कानून कहता है कि जिस उद्देश्य के लिए जमीन अधिगृहीत होती है वह अगर 25 वर्षों तक पूरा न हो तो जमीन मूल मालिकों को लौटा देनी चाहिए और गांवों को फिर से राजस्व गांव घोषित करना चाहिए. यहां तो यह काम 40 साल बाद भी अधूरा है. फिर भी न तो हमें जमीन मिली है, न उचित मुआवजा और न ही हमारे गांव राजस्व ग्राम घोषित हुए हैं.

कहां है वह भारत?

 

असम से मानेसर तक का भारत न्यूज मीडिया में कहां है? एक अच्छा अखबार वह है जिसमें देश खुद से बातें करता हो. कोई 50 साल पहले दी गई अमेरिकी लेखक आर्थर मिलर की इस कसौटी पर अपने राष्ट्रीय अखबारों और चैनलों को कसा जाए तो कितनों में देश खुद से बातें करता हुआ दिखाई या सुनाई देता है? जो देश उसमें दिखाई या सुनाई देता है, वह ‘भारत’ है या ‘इंडिया’? कहने को दर्जनों राष्ट्रीय चैनल और अखबार हैं, लेकिन क्या उनमें देश और उसके असली नुमाइंदे दिखाई और सुनाई देते हैं? 

असम में पिछले एक महीने से सांप्रदायिक हिंसा जारी है. इसमें अब तक 80 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है. चार लाख से अधिक लोग घर बार छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं. लेकिन इसकी जैसी व्यापक लेकिन संवेदनशील रिपोर्टिंग होनी चाहिए थी, वह नहीं हुई. वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने यह कमी तो मानी है लेकिन उनका यह तर्क समझ से परे है कि असम की हिंसा को पर्याप्त और इन-डेप्थ कवरेज न मिलने के पीछे बड़ी वजह उसका दिल्ली से दूर होना है.

 

वहां देश से अलग होने का कोई आंदोलन हो जाए या चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा करने लगे तो मीडिया का तीसरा नेत्र खुल जाता है

 

इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़ दें तो असम और पूरा पूर्वोत्तर भारत कथित राष्ट्रीय न्यूज मीडिया के राडार पर कहीं नहीं दिखता. जैसे वह भारत का हिस्सा ही नहीं हो. अलबत्ता वहां देश से अलग होने का कोई आंदोलन शुरू हो जाए या चीन अरुणाचल प्रदेश पर दावा करने लगे तो मीडिया का तीसरा नेत्र खुल जाता है. लेकिन बाकी समय में पूर्वोत्तर के लोग कैसे रह रहे हैं, वहां क्या हो रहा है, उनकी समस्याएं, सवाल और मुद्दे क्या हैं आदि को रिपोर्ट या चर्चा के लायक नहीं समझा जाता है. 

हैरानी की बात नहीं है कि अधिकांश राष्ट्रीय चैनलों या अखबारों के पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में रिपोर्टर नहीं हैं. खुद राजदीप सरदेसाई के मुताबिक, किसी भी राष्ट्रीय चैनल के पास पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में तो छोड़िए, असम की राजधानी गुवाहाटी में भी ओबी वैन नहीं है. क्या इसकी वजह सिर्फ पूर्वोत्तर भारत का दिल्ली से दूर होना या उसका दुर्गम होना है? या इसकी वजह न्यूजरूम में वहां के प्रति गहरे सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रह हैं? कहीं इसका एक बड़ा कारण यह तो नहीं है कि पूर्वोत्तर भारत में टीआरपी का एक भी पीपुलमीटर नहीं लगा है और बाकी देश में भी पूर्वोत्तर के दर्शकों की संख्या नाममात्र की है?

लेकिन अगर असम में हिंसा की असंतोषजनक कवरेज का कारण उसका दिल्ली से दूर होना मान भी लिया जाए तो दिल्ली से सटे मानेसर में मारुति की कार फैक्टरी में श्रमिक असंतोष के बाद भड़की हिंसा में एक अधिकारी की मौत और उसके बाद श्रमिकों के दमन-उत्पीड़न की लगभग एकतरफा, आधी-अधूरी और कुछ मामलों में फर्जी रिपोर्टिंग का कारण क्या है? क्यों लगभग सभी चैनल/अखबार मारुति के श्रमिकों और यूनियन के खलनायकीकरण में लगे रहे? सबका ध्यान 18 जुलाई की हिंसा की घटना पर था, लेकिन किसी की दिलचस्पी उसके पीछे के कारणों को जानने में नहीं थी. चैनल/अखबार मारुति और जिला प्रशासन के प्रवक्ता ज्यादा लग रहे थे. क्या यह सिर्फ संयोग है या फिर सोची-समझी संपादकीय नीति का नतीजा? 

दिल्ली और चैनलों/अखबारों के दफ्तरों के आस-पास लाखों मजदूर छोटी-बड़ी फैक्टरियों में काम करते हैं लेकिन क्यों किसी चैनल/अखबार में श्रमिक बीट कवर करने वाला रिपोर्टर नहीं है और न श्रमिक मुद्दों की नियमित रिपोर्टिंग होती है? गोया वे इस देश के नागरिक ही न हों. अगर हमारे राष्ट्रीय चैनलों/अख़बारों में पूर्वोत्तर भारत और करोड़ों मजदूर नहीं हैं तो उनमें कौन-सा देश दिखता और बातें करता है? 

 

आंदोलन से आगे

टीम अण्णा के अब तक के आंदोलन में क्या वे वैचारिक तंतु दिखाई पड़ते हैं जिनसे हम उनकी राजनीति का कुछ अनुमान लगा सकें?

जन लोकपाल के लिए शुरू हुआ टीम अण्णा का आंदोलन अब इस देश को एक राजनीतिक विकल्प मुहैया कराने की बात कर रहा है. जंतर-मंतर के नासमझी भरे अनशन की नाकामी के बाद टीम का एलान है कि वह राजनीति में आएगी. हालांकि इस एलान के तत्काल बाद जिस तरह अण्णा हजारे या दूसरे लोगों के बयान आए हैं, उससे अपने राजनीतिक विकल्पों को लेकर उनकी दुविधा और कशमकश छुपी हुई नहीं है, लेकिन फिर भी अगर टीम अण्णा जैसा कोई समूह राजनीति में आना चाहता है तो उसका स्वागत होना चाहिए, क्योंकि कम से कम मेरी तरह बहुत सारे लोग मानते हैं कि यह टीम व्यक्तिगत तौर पर ईमानदार है और उसमें अपने देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव कम से कम हमारे मौजूदा राजनीतिक प्रतिष्ठान से कहीं ज्यादा गहरा है.

लेकिन व्यक्तिगत ईमानदारी और जिम्मेदारी का एहसास अपनी जगह है, भारत जैसे जटिल लोकतांत्रिक समाज में राजनीति की चुनौतियां अपनी जगह. इन चुनौतियों का वास्ता सिर्फ हमारी चुनावी राजनीति की उन बुराइयों से नहीं है जो सतह पर बड़ी आसानी से दिखती हैं, मसलन राजनीति में पैसे और अपराध का बढ़ता दबदबा या जातिवाद और सांप्रदायिकता का बढ़ता असर. मगर मामला इतना सरल नहीं है.

यह एक बड़ा सवाल है कि भारत के संसदीय लोकतंत्र को ऐसा घुन क्यों लग रही है. टीम अण्णा इस सवाल का जवाब नहीं खोजती, वह बस इन बुराइयों को दूर कर देना चाहती है. दरअसल यह एक सजावटी किस्म का इलाज है जिससे कुछ दिन के लिए सूरत भले बदलती दिखे, लेकिन लोकतंत्र की सेहत तब तक दुरुस्त नहीं हो सकती, जब तक उसकी मूल व्याधियों का उपचार न किया जाए. 

बहरहाल, टीम अण्णा के अब तक के आंदोलन में क्या वे वैचारिक तंतु दिखाई पड़ते हैं जिनसे हम उनकी राजनीति का  कुछ अनुमान लगा सकें? अनशन के आखिरी दिन अरविंद केजरीवाल ने राजनीति में आने की घोषणा करते हुए जो भाषण दिया था उसमें उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि उनके उम्मीदवार जनता के बीच से चुने जाएंगे, उनका कोई आलाकमान नहीं होगा. यह दरअसल एक तरह का शब्दाडंबर भर है, जिससे राजनीति का कोई सूत्र खोजना मुश्किल है. हालांकि इसके पहले अरविंद केजरीवाल ‘स्वराज’ नाम की एक छोटी-सी पुस्तिका लिख चुके हैं जिसमें उनकी राजनीतिक परिकल्पना का कुछ सुराग मिलता है.

अरविंद केजरीवाल मानते हैं कि राजनीतिक सत्ता सरकार के हाथ में इस तरह सिमट गई है कि जनता का उस पर नियंत्रण नहीं रह गया है. यह नियंत्रण रहे, इसके लिए वे ग्राम सभा को सर्वोच्च बनाने की वकालत करते हैं.  एक तरह से यह सत्ता के विकेंद्रीकरण का वही सूत्र है जो अण्णा हजारे के भाषणों में बार-बार दिखता रहा है. स्वराज जैसे नाम या ग्राम सभा जैसी बात के साथ अरविंद केजरीवाल अचानक गांधी की याद दिलाते हैं जिनके राजनीतिक सूत्र भी मूलतः ग्राम स्वराज की अवधारणा पर ही केंद्रित थे. 

व्यक्तिगत ईमानदारी अपनी जगह है, भारत जैसे जटिल समाज में राजनीति की चुनौतियां अपनी जगह

इन वैचारिक आग्रहों या अनशन जैसे मूलतः राजनीतिक कार्यक्रमों से लगता है कि टीम अण्णा गांधीवादी राजनीति करना चाहती है- शुद्धता और सदाचार पर अतिरिक्त जोर शायद राजनीतिक आग्रह का विस्तार है. लेकिन अण्णा हों या उनकी टीम- दोनों को देखकर बार-बार यही लगता है कि वे बस स्थूल गांधी को समझ पाते हैं, उस सूक्ष्म गांधी तक नहीं पहुंचते जिसके लिए स्वराज एक पूरी सभ्यता दृष्टि था.

गांधी जब ग्राम स्वराज की बात करते थे तो वे नितांत स्थानीय अर्थव्यवस्था की बात भी करते थे जो अपनी जरूरतें खुद पूरी कर ले और बाहर की कम से कम चीजें ले. गांधी का ग्राम स्वराज मूलतः सबकी सामाजिक बराबरी के सपने में भी निहित था जिसमें अस्पृश्यता या किसी भी अन्य तरह के भेदभाव की जगह नहीं थी. वे देशज प्रतिभा पर भरोसा करते थे और पश्चिम की वैचारिकता से अनाक्रांत एक स्वाभिमानी भारत बनाना चाहते थे. 

अण्णा और केजरीवाल अगर गांधी का ग्राम स्वराज लाना चाहेंगे तो पहले उन्हें अपनी राजनीति में उस मौजूदा उदारीकरण के खिलाफ ठोस रुख अख्तियार करना होगा जिसकी वजह से भारत की निजी उद्यमिता बिल्कुल ढह-सी गई है, उस भूमंडलीकरण से लड़ना होगा जिसने इस देश की मौलिकता खत्म कर दी है- इस सिलसिले को अंग्रेजी के विशेषाधिकार के खात्मे से भी जोड़ना होगा जो भारत में सामाजिक गैरबराबरी की एक बड़ी वजह है. मामला यहीं खत्म नहीं होगा- टीम अण्णा को आरक्षण के सवाल पर भी अपनी राय साफ करनी होगी और आदिवासियों-दलितों और अल्पसंख्यकों की बराबरी का मसला भी उठाना होगा, क्योंकि आर्थिक खुशहाली की लड़ाई सामाजिक न्याय की लड़ाई से अलग नहीं लड़ी जा सकती. 

इन सैद्धांतिक सवालों की अपनी व्यावहारिक मुश्किलें भी हैं. फिलहाल टीम अण्णा का समर्थन आधार मूलतः उस शहरी मध्यवर्ग से बनता है जो उदारीकरण की धूप में नहा रहा है और आरक्षण के किसी भी रूप से नाक-भौं सिकोड़ रहा है. यह वही मध्यवर्ग है जिसे एक नकली राष्ट्रवाद की अवधारणा बहुत लुभाती है और जो प्रशांत भूषण की इसलिए पिटाई कर डालता है कि वे कश्मीर को लेकर एक जायज और निजी राय रखते हैं.

टीम अण्णा जब तक लोकपाल, भ्रष्टाचार और काले पैसे जैसी मोटी-मोटी बातें कर रही है, तब तक किसी को गुरेज नहीं है, लेकिन जैसे ही वह देश के संसाधनों में बराबरी का सवाल उठाएगी, उसके अपने ही लोग उसके विरुद्ध हो जाएंगे. कह सकते हैं, टीम अण्णा से जो अपेक्षाएं हम रख रहे हैं, उस पर देश का कोई भी राजनीतिक दल खरा नहीं उतरता. बात सही है और इसीलिए लोग विकल्प की तलाश भी कर रहे हैं. टीम अण्णा को विकल्प देना है. अगर गांधी और जेपी का वारिस बनना है, अगर ग्राम स्वराज और संपूर्ण क्रांति के सपने को वास्तविकता की धरती पर उतारना है तो उसे ये अपेक्षाएं पूरी करनी होंगी.

इस निबंध के बंधन खोलिए

हमारी स्कूली शिक्षा में 15वीं कक्षा नहीं होती है, इसलिए हम 12वीं कक्षा से ही काम चला लेंगे. यदि देश भर की 12वीं कक्षा के बच्चों को 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) पर एक निबंध लिखने का काम सौंपा जाए तो उसके जो परिणाम आएंगे, उससे थोड़ा बेहतर ही होता है 15 अगस्त पर हमारे प्रधानमंत्रियों द्वारा दिया जाने वाला भाषण. 

तिरंगा फहराया जाता है और उसके बाद लाल किले की प्राचीर से शुरू हो जाता है एक पचरंगा निबंध. अक्सर इस दिन बादल छा जाते हैं और पानी भी गिरने लगता है. इस पचरंगा भाषण को सड़ने से बचाने के लिए छाते भी ताने जाते हैं. विरोध का रंग काला माना जाता है इसलिए ध्यान रखा जाता है कि छाते काले रंग के न हों. इस भाषण में पांच चीजें होना जरूरी होता है. विकास की बात तो सबसे पहले होनी ही चाहिए. इसके लिए सब अच्छी उपमाएं पहले से  ही खोज ली गई हैं. लंबा रास्ता है. कठिन चढ़ाई है. लेकिन हम सब कदम-से-कदम मिलाकर इस पर बढ़ते चलेंगे और इस देश को विकास के एक ऊंचे शिखर पर ले जाएंगे. इसी के साथ जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद दर) की चर्चा भी होना स्वाभाविक है. खेती को भला कैसे भूल सकते हैं और जब किसान की याद आएगी तो फिर जय जवान को कैसे भूला जा सकता है. थोड़ी-सी चर्चा पड़ोसी देशों और बाहरी ताकतों की भी होनी चाहिए. 

इसके बिना वह अदृश्य बाहरी हाथ या बाहरी शक्ति कैसे समझ में आएगी? इसके षड्यंत्र के कारण हमारे घर में शांति स्थापित नहीं हो पाती और महंगाई भी कम नहीं हो पाती. सरकार तो इन सब मोर्चों पर तेजी से दौड़ना चाहती है. सरकार निशाना लगाना चाहती है. वह गोल करना चाहती है, लेकिन पदकों की तालिका में न स्वर्ण पदक मिलता है, न रजत और न ही कांस्य.

इतना बड़ा देश है. इतने सारे लोग हैं, इसलिए अक्सर प्रधानमंत्री अपने लिखित कागजों से आंख उठाए बिना ही देश के भाइयों एवं बहनों को बार-बार संबोधित करते चले जाते हैं. इन भाइयों एवं बहनों को बार-बार याद दिलाया जाता है कि विविधता में एकता है और यही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है. बाकी पूंजियां हमें विश्व बैंक आदि से समय-समय पर मिलती रहती हैं. यदि भाषण से बाहर निकल कर आएं तो इस दिन कोई संन्यासी बाहर जमा काले धन की वापसी से देश का कितना उज्जवल विकास होगा उसकी भी याद दिला देता है. 

एक के बाद एक उपलब्धियां  गिनाई जाती हैं और फिर इस लंबी सूची में कुछ कमियों की गिनती भी की जाती है लेकिन कमी गिनाते समय आवाज जरा भी लड़खड़ाती नहीं. अगले ही क्षण गरीबी हटाने का, भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प भी तुरंत ले लिया जाता है. इसी के आस-पास वह महान क्षण भी आता है जब सबको सब चीजें देने का वायदा फिर से दोहराया जाता है. हर हाथ को मिलेगा रोजगार. हरेक को शिक्षा. हरेक को स्वास्थ्य सेवा. हरेक को न्याय. हरेक को सूचना का अधिकार यानी हरेक को हर चीज. ये बातें इतनी गंभीरता से कही जाती हैं कि किसी को भी यह नहीं लगता कि हरेक को हर चीज उधार पर टिकी सरकारें नहीं दे सकतीं. ये दुनिया के अमीर माने गए देशों में भी अब तक ऐसे सौ-पचास भाषणों के बाद भी नहीं दिया जा सकता है. 

यहां तक आते-आते अक्सर ये सब बातें कह दी जाती हैं जिन्हें पहले के 15 अगस्तों के भाषणों में अनेक प्रधानमंत्री कह ही चुके हैं. यहां पुनरावृत्ति को कभी भी दोष नहीं माना जाता है. यह तो इस दिन के भाषण का सबसे मजबूत अलंकार है. देशवासियों के सामने चल रहा यह संबोधन अब अपनी सबसे ऊंची पायदान पर पहुंच जाता है. अब जो कुछ अमूल्य क्षण बचे हैं उनमें भविष्य की आशा, सुनहरी किरणों का जिक्र और संकट से जूझ रही जनता की पीठ थपथपाने का मौका है. आशा की ये किरणें दूरदर्शन, टेलीविजन चैनल और आकाशवाणी के माध्यम से देश के कोने-कोने में बिखर जाती हैं. अलबत्ता अखबार वाले बेचारे इस पुण्य काम में साथ नहीं दे पाते हैं.  कुछ अपवादों को छोड़ कर अगले दिन अखबार बंट नहीं पाते क्योंकि उस दिन उनकी छुट्टी होती है. इसलिए अक्सर ऐसे बासी भाषण एक दिन और बासी होकर हिंदी के पाठकों तक पहुंचते हैं. इस कमी को टीवी वाले पूरा कर देते हैं. वे सुबह लाइव से लेकर रात तक इसको दुहराते रहते हैं. 

हमारे देश के प्रधानमंत्री के सामने ऐसे मौके साल भर में कम ही आते हैं जब उनको पूरे देश को संबोधित करने का मौका मिलता हो. कितना अच्छा हो कि ऐसे मौकों का उपयोग और ज्यादा आत्मीयता के साथ देश के लोगों की आंखों में आंखें डाल कर उनके मन को छू कर कुछ अच्छी बातें बताई जाएं. कुछ बुरी बातों की तरफ उनका ध्यान खींचा जाए. देश का पालक उनको भरोसे में लेकर एक दोस्त की तरह, एक पिता की तरह, एक भाई की तरह कुछ घरेलू बातें करे. पंद्रह अगस्त के इस शाश्वत निबंध को जिन बंधनों में बांध दिया गया है, उन बंधनों से उसकी मुक्ति हो पाए तो हम सचमुच स्वतंत्रता दिवस मना सकेंगे.

थोथी थ्योरी से बचिए

‘ट्रिकल डाउन थ्योरी से देश के गरीबों की अपेक्षाएं पूरी नहीं होंगी. हमारा राष्ट्रीय उद्देश्य युवाओं के लिए अवसर उत्पन्न करने का हो ताकि वे देश को कुदा कर आगे ले जा सकें.’ हमारे नए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के इन शब्दों का पुरजोर स्वागत किया जाना चाहिए. 

‘ट्रिकल डाउन’ थ्योरी की सोच है कि आर्थिक विकास से अमीरों की आय बढ़ेगी तो गरीबों के घर में भी उस आय का एक अंश टपकेगा. अमीर की आय तब बढ़ेगी जब उसके द्वारा खरीदे गए शेयर के दाम बढ़ेंगे. शेयर के दाम तब बढ़ेंगे जब उत्पादन बढ़ेगा. उत्पादन बढ़ाने के लिए अधिक संख्या में श्रमिकों की जरूरत होगी. इस प्रकार अमीरों की आय का एक हिस्सा गरीबों तक पहुंचेगा. इस सोच के चलते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बड़ी कंपनियों को खुली छूट देने को तत्पर हैं. 

अब समस्या यह है कि उत्पादन बढ़ाने के लिए रोजगार सृजन आवश्यक नहीं है. उद्यमियों के लिए फायदे की स्थिति यह है कि ऑटोमेटिक मशीनों से उत्पादन बढ़ाया जाए. ऐसे में कंपनियों का लाभ और उत्पादन बढ़ता है, लेकिन रोजगार घटते हैं. आर्थिक विकास की प्रक्रिया में अमीर लोग समृद्ध होते हैं. पूंजी की अधिकता के कारण ब्याज दर में गिरावट आती है. ब्याज दर में कमी आने से मशीनों में निवेश लाभप्रद हो जाता है. दूसरी तरफ आर्थिक विकास के कारण ही श्रमिकों का जीवन स्तर उठता है. उनके वेतन बढ़ते हैं. पूंजी के सस्ते होने एवं श्रम के महंगे होने से उद्यमी के लिए श्रमिक को रोजगार देना हानिप्रद हो जाता है. 

अर्थशास्त्रियों को नए ढंग से सोचना पड़ेगा. ऑटोमेटिक मशीनों एवं इंटरनेट के कारण श्रम ही अप्रासंगिक होता जा रहा है. वैसे एक प्रकार से यह एक सुखद उपलब्धि है. जीवित रहने के लिए मनुष्य का श्रम करना अनिवार्य नहीं रह गया है. समय का सदुपयोग वह अपने आत्म विकास के लिए कर सकता है जैसे क्रिकेट खेलने, चित्रकारी करने, संगीत का रियाज करने में. लेकिन श्रम के साथ-साथ उसका जीवन भी व्यर्थ होता जा रहा है. उसके पास रोजगार नहीं है.  

ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी कि श्रम की मांग बढ़े. पूंजी सघन के स्थान पर श्रम सघन आर्थिक विकास करना होगा. मशीनों पर टैक्स और श्रम पर सब्सिडी देनी होगी. इससे आर्थिक विकास धीमा पड़ेगा जिसे स्वीकार करना होगा. जाड़े में सिगड़ी रख कर सोने से आराम मिलता है लेकिन मृत्यु भी हो जाती है. उसी प्रकार पूंजी-सघन आर्थिक विकास से कुल उत्पादन बढ़ रहा है परंतु संपूर्ण मानवता मृतप्राय होती जा रही है. आर्थिक विकास पर लगाम लगाकर मानव विकास को लक्ष्य बनाना होगा. समस्या का हल सरकारी नौकरियों में वृद्धि से हासिल नहीं होगा. जब अधिकाधिक श्रमिक सरकारी कर्मचारी होंगे तब इन्हें वेतन देने के लिए टैक्स किससे वसूल किया जाएगा? कम्युनिस्ट देशों का अनुभव बताता है कि सरकार का असीमित विस्तार संभव नहीं है. सोवियत रूस के पतन का एक प्रमुख कारण सरकारी फौज में अतिशय वृद्धि था. 

कांग्रेस एवं भाजपा की नीति है कि अमीर को और अमीर बनाकर बाद में उस पर टैक्स लगाया जाए. इसके स्थान पर ऐसी आर्थिक नीतियां बनानी चाहिए कि पूंजी के लाभ कम हो जाएं और श्रम के अवसर बढ़ जाएं. मसलन किन्हीं गांधीवादी ने सुझाव दिया था कि घरेलू बाजार में बिक्री के लिए बनने वाले कपडे़ को पूर्णतया हथकरघों के लिए आरक्षित कर दिया जाए. इससे टेक्सटाइल मिलों के लाभ घटेंगे और जुलाहों के बढ़ेंगे. बाजार में कपड़ों का दाम भी कुछ बढ़ेगा. योजना आयोग को चाहिए कि वह कोई ऐसा अध्ययन करे जिससे यह पता चले कि श्रम की वांछित मात्रा में मांग बढ़ाने के लिए किन उद्योगों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए. 

दूसरा विषय सरकारी सेवाओं की डिलीवरी का है. खाद्य पदार्थ, फर्टीलाइजर एवं पेट्रोल सब्सिडी तथा सरकारी स्वास्थ्य एवं शिक्षा सेवाएं सभी इस समस्या से पीडि़त हैं. इन योजनाओं का लाभ गरीब तक कम ही पहुंचता है. राजीव गांधी ने 15 प्रतिशत पहुंच का आकलन किया था. इस मुद्दे पर कांग्रेस एवं भाजपा प्रशासनिक सुधारों से डिलीवरी में सुधार करना चाहते हैं. जैसे छठे वेतन आयोग ने इंसेंटिव का सुझाव दिया है. साथ-साथ इन सुविधाओं को निर्धनतम लाभार्थियों पर लिए केंद्रित करने का प्रयास किया गया है. जैसे खाद्य सब्सिडी में बीपीएल का हिस्सा बढ़ा दिया गया है. लेकिन सरकारी कर्मचारियों का चरित्र चुंबक जैसा होता है. उनसे कुछ लेने के लिये जनता को विशेष ताकत लगानी पड़ती है जैसे चुंबक में चिपके लोहे को छुड़ाने में. 

हमें नई सोच बनानी चाहिए. रिजर्व बैंक को चाहिए कि वह सारी सब्सिडी को इकट्ठा करके इस राशि के चेक  प्रत्येक वोटर को सीधे भेज दे. साथ-साथ खाद्य, फर्टीलाइजर एवं पेट्रोल पर सब्सिडी बिल्कुल समाप्त कर देनी चाहिए. केंद्रीय सरकार के निम्नलिखित मदों पर खर्चों का एकत्रीकरण किया जा सकता हैः खाद्य सब्सिडी, शिक्षा, स्वास्थ्य, हाउसिंग, कृषि, ग्राम विकास, फर्टीलाइजर एवं बिजली व पेट्रोल सब्सिडी. लगभग 3,50,000 करोड़ रु. उपलब्ध हैं. राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर दिए जा रहे खर्च को जोड़ दिया जाए तो जन कल्याण के नाम पर खर्च की जा रही कुल रकम लगभग 700 करोड़ रु. हो जाएगी. इस विशाल रकम को 55 करोड़ वोटरों में वितरित किया जाए तो 13,000 रु. प्रति वोटर अथवा 26,000 रु. प्रति परिवार प्रतिवर्ष दिए जा सकते हैं. यह रकम सीधे वोटरों को देकर सब्सिडियों के तमाम मायाजाल से देश को मुक्त कर देना चाहिए. लेकिन मनमोहन सिंह को यह पसंद नहीं क्योंकि वे जनता को भ्रमित करके गरीब के नाम पर अपने जाति भाई सरकारी कर्मियों को अधिकाधिक सुविधाएं देने को तैयार हैं.

प्रणब दा को साधुवाद कि उन्होंने मनमोहन सिंह की ट्रिकल डाउन की गलत सोच पर सवाल उठाया. देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति पद का उपयोग करते हुए वे सरकार पर इस दिशा में दबाव बना पाते हैं कि नहीं?