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बाधाओं के बाद भी राजद व लालू में निराशा नहीं

बिहार में राजद को जद (एकी) और भाजपा का विकल्प मानने वाले हालांकि अब निराश होने लगे हैं। लेकिन निराशा की वजह यह नहीं कि जद (एकी) और भाजपा अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं बल्कि यह कि राजद के नेताओं के बीच का तालमेल गड़बड़ा रहा हैं। किसका हुक्म बजाएं और किसका नहीं, पार्टी के साधारण नेता और कार्यकर्ता तय करते वक्त दुविधा से घिरने लगे हैं। लालू प्रसाद सोच रहे हैं कुछ और हो रहा है। अगर उनके दोनों बेटे आने वाले दिनों के संकट को ठीक से नहीं भांप पाए और निपटने की तैयारी नहीं कर पाए तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

महागठबंधन की सरकार के वक्त स्थिति राजद के अनुकूल थी। लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव के बीच शुरु खटपट इतनी विकराल हुई कि महागठबंधन की सरकार इससे बच नहीं पाई। नीतीश कुमार ने एकाएक अपने पद से इस्तीफा दे भाजपा के साथ हाथ मिला राजग की सरकार बना ली। उस वक्त भी राजद के अनुकूल स्थिति थी। नीतीश कुमार और भाजपा के खिलाफ वातावरण बना।

नीतीश कुमार की आलोचना इसलिए हुई कि उन्होंने फिर भाजपा से हाथ मिला लिया और उन पर यह आरोप भी लगा कि उन्होंने ऐसा सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए किया। भाजपा की आलोचना इसलिए हुई कि वह तिकड़म से सत्तासीन होती है। आम लोगों में राजद के प्रति सहानुभूति हुई। नीतीश कुमार धोखा नहीं देते तो महागठबंधन यानी राजद पूरी मियाद तक सत्ता में रहता। सबसे अधिक राजद के विधायक होने पर भी वादे के मुताबिक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया गया। राजद के समर्थक और वोटर सहानुभूति के चलते राजद के पक्ष में एकजुट हुए। तख्तापटल होने के बाद सूबे में हुए उपचुनाव में राजद की जीत इसका संकेत थी।

लालू प्रसाद की सूझबूझ से सूबे में उनकी पार्टी दस साल बाद सत्ता में आई थी। सत्ता में आने के बाद उनकी कोशिश यह हुई कि उनके दोनों बेटे (तेजस्वी प्रसाद यादव और तेज प्रताप यादव) राजनीति में जम जाए और अपने बल बूते पर सूबे की बागडोर संभालने लायक बन जाए। दोनों पहली बार विधायक बने और मंत्री भी। लेकिन बीच में ही अच्छा-खासा व्यवधान खड़ा हुआ कि वे सत्ता से बाहर हो गए। नीतीश कुमार करते भी क्या, काफी ऊब गए थे और मान-सम्मान पर आघात होने लगा था। लालू प्रसाद सब कुछ समझ रहे थे। लेकिन वे अपने बेटों पर नियंत्रण करनेे में सफल नहीं हुए। वे चुप रहे और उनकी चुप्पी को बेटों का बचाव माना गया। परिवारवाद का आरोप तो बहुत पहले से झेल रहे थे। वे अपने बेटों पर नियंत्रण कर पाए होते और नीतीश कुमार के मान-सम्मान की रक्षा करते तो आज स्थिति दूसरी होती।

राजनीतिकों का तो कहना यह है कि राजद के समर्थकों और वोटरों में आ रही निराशा का एक बड़ा कारण लालू प्रसाद के दोनों बेटों के बीच चल रहा शीत युद्ध है। पार्टी पर सबसे ज्यादा वर्चस्व किसका हो। पार्टी किसका सबसे ज्यादा हुक्म बजाए। इसी तरह के तमाम सवालों को लेकर तेज और तेजस्वी में शीत युद्ध है। उनके बीच चल रहे शीत युद्ध से उनके समर्थकों और वोटरों के बीच गलत संदेश यह जा रहा है कि वे दोनों आपस में लड़-भिड़ रहे हैं, तो उनका (समर्थक और वोटर) भला क्या होगा। साफ-साफ यह कि लालू प्रसाद के ‘माईÓ समीकरण यानी यादवों और मुस्लिमों का क्या होगा।

जानकार बताते हैं कि तेज और तेजस्वी के बीच शीत युद्ध के लिए खुद लालू प्रसाद ही जिम्मेदार हैं। तेज का मानना है कि लालू प्रसाद ने उनकी उपेक्षा की है और भेदभाव बरता है। परिवार में ही उनकी हकमारी हुई है। वे तेजस्वी के बड़े है और किसी गुण में कम भी नहीं है। इसके विपरीत तेजस्वी यह मानते है कि उनके गुणों और कौशल को देख कर ही उन्हें आगे रहने का मौका मिला है। तेज प्रताप चाहते हैं कि पार्टी वे चलाएं और विधानसभा व विधायकों को तेजस्वी संभाले। लेकिन तेजस्वी को यह मंजूर नहीं। दोनों भाइयों में मनमुटाव उसी दिन से शुरू हो गया था जब तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री और तेज को केवल मंत्री बनाया गया था। उस समय तो मनमुटाव दबा रह गया लेकिन बाद में, खासकर सत्ता से बाहर होने के बाद फूट पड़ा है। लालू प्रसाद शुरू में जब उन्हें संभाल नहीं पाए, तो अब संभालना आसान भी नहीं रह गया है। अब तो उन्हें चारा घोटाले में सजा हो गई है और दिनोंदिन स्वास्थ्य भी बिगड़ा है।

जानकार याद भी दिलाते हैं कि 2005 में सूबे में राजद की दुर्गति की एक बड़ी वजह परिवारवाद ही था। मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के दोनों भाइयों (सुभाष यादव और साधु यादव) की पार्टी और सरकार में कम चलती नहीं थी। पार्टी में उनका और उनके कार्यकलापों की आलोचना करने की हिम्मत किसी नेता (शिवानंद तिवारी को छोड़ कर) में नहीं थी। लेकिन जब लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के हाथ से सूबे की सत्ता चली गई, तब उन्हें पता चला कि वजह क्या है। राबड़ी देवी के दोनों भाइयों को पार्टी से अलग होना पड़ा। फिलहाल वही स्थिति लालू प्रलाद के दोनों बेटों की है। सवाल उठ ही सकता है कि क्या वैसा ही नुकसान होगा जैसा कभी सुभाष-साधु की वजह से हुआ था।

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर नीतीश कुमार और भाजपा के नेता ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं जिससे दो बातें साफ हो जाएं। एक, नीतीश कुमार और भाजपा की एकता मजबूत है। दूसरे, नीतीश कुमार ही सूबे में राजग के सर्वेसर्वा हैं। नीतीश कुमार और भाजपा के नेता इन बातों से राजद के राजग विरोधी अभियान को बेअसर करना चाहते हैं। बात भी यह है कि राजद के पास इन बातों की काट नहीं है। विपक्षी दल के नेता के रूप में तेजस्वी विभिन्न मुद्दों को लेकर नीतीश कुमार और सरकार को तो घेर रहे हैं लेकिन नीतीश कुमार और सरकार अपने पलट जबाव से साफ बच रहे हैं। सरकार को घेरने का जो असर होना चाहिए, वह हो नहीं पा रहा है। वजह यह कि विधानसभा के बाहर राजद के नेता-कार्यकर्ता नीतीश कुमार और सरकार के खिलाफ सड़क पर नहीं उतर पा रहे हैं। तेज और तेजस्वी किसी दूसरी बात में उलझे हैं।

मराठा आरक्षण की आग में झुलसता महाराष्ट्र

अभी तो ये अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है’ आम तौर पर जुलूसों और प्रदर्शनों में लगने वाला यह उद्घोष मराठा क्रांति मोर्चा के आंदोलन पर सटीक और प्रासंगिक बैठता है। मराठों को आरक्षण दिए जाने की मांग को लेकर पिछले दिनों समूचा महाराष्ट्र आंदोलित रहा। वैसे तो यह आंदोलन शांतिपूर्ण चल रहा था पर औरंगाबाद में एक युवक द्वारा गोदावरी नदी में छलांग लगाकर खुदकुशी करने के बाद मराठा आंदोलनकारी हिंसक हो गए और उन्होंने पूरे राज्य को हिंसा में झोंक दिया। राज्य की देवेंद्र फड़णवीस सरकार की चूलें हिल गईं। पूरे महाराष्ट्र बंद के बाद आखिर में राजधानी मुंबई, ठाणे और आसपास के इलाकों में बंद रखा गया। मराठा समाज ने लाखों की तादाद में जुलूस, मोर्चे निकाले। ये जुलूस यानी शांतिपूर्ण जन आंदोलन कैसा होता है, उसकी एक मिसाल था। इन 58 मोर्चों, जुलूसों ने दुनिया के सामने एक आदर्श स्थापित किया। आंदोलन के दूसरे चरण में मराठा क्रांति मोर्चा ने बंद का आह्वान किया था, मराठों का आक्रोश तो उबाल पर था ही पर फडणवीस सरकार के उदासीन रवैये के चलते वो और भड़क गया।

चुनाव के मद्देनजर भड़की आग

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 72 हजार सरकारी नौकरियों में मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा के बाद भी आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। 2019 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वहीं माना जा रहा है कि महाराष्ट्र में भी अगले साल चुनाव हो सकते हैं, ऐसे में भाजपा के लिए मराठा आंदोलन एक चुनौती बन गया है।

क्या है मराठों की मुय मांगें?

सरकारी नौकरियों के साथ ही कॉलेजों में आरक्षण मराठों की मुख्य मांग हैं। 2014 में एनसीपी-कांग्रेस की गठबंधन सरकार ने मराठों को 16 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया था। उसके लिए पहली बार आर्थिक रूप से पिछड़ों की कम्युनिटी बनाई गई थी। उस कारण कुल आरक्षण 51 प्रतिशत से अधिक हो जाने से अदालत ने इस आरक्षण को रद्द कर दिया था।

कोर्ट रद्द न कर सके, ऐसा आरक्षण चाहिए

अदालत ने कहा था कि मराठों को आरक्षण नहीं दिया जा सकता, जबकि मराठा चाहते हैं कि सरकार उन्हें ऐसा आरक्षण दे जिसे अदालत रद्द न कर सके। इस मामले में आखिरी फैसला न आए तब तक राज्य में होने वाली 72 हजार से अधिक भर्तियां रोक दी जाएं।

कुल आबादी में मराठों की संया 33 फीसदी

महाराष्ट्र की कुल आबादी में मराठों की तादाद 33 फीसदी है। यह समुदाय राज्य में होने वाले किसी भी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने में सक्षम है। 1960 में महाराष्ट्र राज्य के गठन के बाद से अब तक कुल 17 मुख्यमंत्रियों से 10 मुख्यमंत्री तो मराठा रहे हैं। इतना ही नहीं करीब आधे विधायक मराठा ही हैं। 288 सदस्यीय विधानसभा में 145 विधायक मराठा हैं। ये विधायक सभी प्रमुख दलों कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में हैं। महाराष्ट्र की करीब 50 शैक्षणिक संस्थाओं पर मराठों का नियंत्रण है।

राज्य की अर्थव्यवस्था पर मराठों का दबदबा

महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था में शक्कर मिलों का बड़ा महत्व है। गुजरात में जैसे तेलिया राजा होते हैं वैसे ही महाराष्ट्र में ‘सुगर किंग।’ राज्य की 200 में से 168 शक्कर मिलों पर मराठों का आधिपत्य है। इसी तरह, 70 प्रतिशत सहकारी बंैक भी मराठों के नियंत्रण में है। अब तक मराठों का आरक्षण आंदोलन एकदम शांतिपूर्वक चल रहा था। वे विशाल रैलियां निकाल रहे थे। जबकि कोपर्डी रेप केस और अब एक युवक द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर आत्महत्या करने से यह आंदोलन उग्र और हिंसक हो गया है।

क्रांति दिवस यानि नौ अगस्त को तीसरा चरण शुरू करना भी तय हुआ है। मराठों के इस पूरे आंदोलन के पीछे मुख्य मांग आरक्षण की है और वह फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है। न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा है। भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रतिशत तय है, वह 50 प्रतिशत है। मराठा समाज की मांग 16 प्रतिशत है। यदि वह मंजूर होती है तो कुल आरक्षण 68 प्रतिशत हो जाएगा। अन्य पिछड़े वर्ग अर्थात ओबीसी को हासिल आरक्षण के साथ छेड़छाड़ न करते हुए मराठों का आरक्षण देना सरकार के लिए बेहद जटिल है। तमिलनाडु में जयललिता अपने मुख्यमंत्रित्व काल में आरक्षण को 69 प्रतिशत ले गई। वह आज भी जस की तस है, इसलिए महाराष्ट्र सरकार को भी मराठा आरक्षण मंजूर है।

सवाल, केवल आरक्षण का नहीं है, मराठा समाज मुख्य रूप से कृषक समाज है और कृषि के साथ ही डेयरी व अन्य पूरक कृषि उद्योग आज संकट में हैं। मराठा समाज का जीवन संघर्ष ऐसा बहुआयामी है। उसे गंभीरतापूर्वक समझने के लिए उदार मन ज़रूरी है, अन्यथा आत्महत्या करने वाले सर्वाधिक किसान मराठा समाज के हैं, यह कहने की नौबत मराठा आंदोलनकारियों पर नहीं आती। मराठा आंदोलनकारियों से शांति बनाये रखने की अपील करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 602 पाठ्यक्रमों के दो लाख छात्रों को शिक्षा शुल्क का 50 प्रतिशत वापस देने की बात कही है। वैसे ही प्रत्येक जिले में होने वाले छात्रावासों में से दो पूर्ण होने का भी उल्लेख किया है। युवा उद्यमियों को प्रोत्साहन देने के लिए अण्णा साहेब पाटील महामंडल के काम करने का उल्लेख मुख्यमंत्री ने किया है। मुख्यमंत्री ने मराठा समाज की अन्य मांगों पर सरकार के गंभीरतापूर्वक काम करने का आश्वासन भी दिया है पर मराठा क्रांति मोर्चा का कहना है कि एक मजबूत व्यवस्था बनाई जाए और इस व्यवस्था पर नजर रखने के लिए विधायक दबाव प्रशासन पर रखा जाए।

मुख्यमंत्री के बयान के बाद मराठा समाज के गणमान्य वरिष्ठों ने भी उस पर अत्यंत संतुलित व दूरदृष्टिपूर्ण प्रतिक्रिया दी। वे भी स्वागतयोग्य हैं। एनडी पाटील और न्यायमूर्ति बीएन देशमुख ने छत्रपति शिवाजी के वंशजों से आत्महत्या या जलसमाधि न करने की अपील करते हुए शांतिपूर्वक कानूनी लड़ाई लडऩे की बात कही। उन्होंने सरकार से भी अपील की कि वे आंदोलनकारियों की भावना समझें। उन्होंने यह भी कहा कि हिंसक आंदोलन से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उससे मूल एजेंडा एक तरफ रह जाता है और मूल मुद्दे बाजू में रह जाते हैं।

आंदोलन की बलि चढ़े 3 युवक

मराठा आरक्षण आंदोलन में अब तक कुल 3 युवक बलि चढ़ चुके हैं। औरंगाबाद की मुकुंदवाड़ी के प्रमोद पाटील (उम्र 31) ने रविवार, 29 जुलाई की रात्रि 9 और 10 के बीच रेल्वे के सामने छलांग लगाकर अपनी ईहलीला समाप्त कर ली। प्रमोद पाटील ने रविवार को दोपहरढ़ाई बजे फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर अपने फैसले की जानकारी दे दी थी। उसने अपनी पोस्ट में लिखा कि चलो आज एक और मराठा जा रहा है…पर कुछ करिये मराठा आरक्षण के लिए…जय जीजाऊ…आपका प्रमोद पाटील। उसके बाद उसने पौने पांच बजे एक और पोस्ट की। यह पोस्ट उसने रेल पटरी पर सेल्फी लेते हुए डाली थी। उसमें लिखा था…’मराठा आरक्षण जान जाएगीÓ इस पोस्ट के बाद उसके मित्र परिवार सभी ने विनती की थी कि ‘भाऊ, ऐसा कुछ मत कर…प्लीज ऐसा कुछ मत करो…मुझे कॉल करो…आदि। इसके बाद उसने रात्रि 9 और 10 बजे के बीच रेल्वे के सामने छलांग लगाकर अपनी जान दे दी।

मराठा आंदोलन के दौरान औरंगाबाद जिले में आत्महत्या यह तीसरा तीसरा मामला है। इसके पहले 23 जुलाई को काकासाहब शिंदे ने गोदावरी नदी में छलांग लगाकर जान दे दी थी। उसके दूसरे दिन जगन्नाथ सोनवणे ने जहर खाकर अपना जीवन समाप्त कर लिया था। प्रमोद की खुदकुशी के बाद उसके परिजन आहत हैं। उसके माता पिता ने साफ कहा है कि जब तक मराठा आरक्षण के बारे में सरकार ठोस निर्णय नहीं लेती तब तक उसका शव नहीं लेंगे। मराठा आंदोलन में अब तक हुई तीन मौतों के कारण मराठा आंदोलनकारियों में बेहद गुस्सा है। सरकार के खिलाफ उनमें आक्रोश है और मराठा आरक्षण आंदोलन कब खत्म होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।

बंद का ऐलान वापस

शिक्षा और नौकरी में आरक्षण की मांग कर रहे मराठा क्रांति मोर्चा के संयोजकों ने मुंबई बंद वापस की घोषणा करते हुए कहा कि पिछले दो सालों से मराठा समाज को झूठे आश्वासन देकर बहलाया जा रहा था जिसके चलते मूक (मौन) मोर्चा के बदले ठोक मोर्चा का रास्ता अपनाना पड़ा। आयोजकों ने सहयोगी संगठनों का आभार जताया और शांति बनाए रखने की अपील की। मुंबई, ठाणे और नवी मुंबई में बंद वापसी की घोषणा के बाद स्थिति सामान्य होने की ओर है।

हालांकि मराठा क्रांति मोर्चा ने महाराष्ट्र बंद के ऐलान के वक्त ही इसे हिंसक न होने देने की ताकीद दी थी लेकिन सोमवार को काका साहेब शिंदे नामक आंदोलनकारी के जलसमाधि की घटना के बाद इस आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया और वह राज्य भर में फैल गया।

पहली बार मराठा समाज का मोर्चा आक्रामक दिखाई दिया। हाइवे जाम कर दिया गया। आटो रिक्शा, बस, गाडिय़ों की तोड़ फोड़ की गई। आगजनी की घटनाएं हुईं। पुलिस पर पथराव किया गया, आंदोलनकारी और पुलिस आमने-सामने आ गए। सबसे ज्यादा परेशानी स्टुडेंट्स को हुई। सुबह-सुबह छात्र स्कूल, कॉलेज पहुंच गए नौ दस बजे से आंदोलनकारियों ने रोड़ जाम करना शुरू कर दिया था। शैक्षणिक संस्थान दुविधा में रहे और स्टुडेंटस के अभिभावकों को उन्हें वापस घर लाने में बड़ी दिक्कतें हुईं।

मराठा क्रांति मोर्चा के वीरेंद्र पवार ने कहा, ‘हम मराठा हैं, हमारा मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था। हमारा बंद कामयाब रहा। बच्चों और महिलाओं के सड़कों पर होने और बढ़ती हिंसा की वजह से हमें अपना बंद वापस लेना पड़ा है। हम भी सामान्य नौकरी पेशा हैं, हमें विश्वास था कि किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं होगी। हम पता लगाएंगे कि हिंसा कहां से शुरू हुई? असामाजिक तत्वों का समावेश हो सकता है इस हिंसा में।

संविधान में संशोधन से हो सकता है निराकरण: शरद पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को मराठों की पार्टी माना जाता है, उसका आधार भी मराठा ही हैं। इसी कारण वो महाराष्ट्र की चार प्रमुख पार्टियों—भाजपा, कांग्रेस और शिवसेना के मुकाबले खड़ी है। एनसीपी यानि राष्ट्रवादी कांग्रेस के सुप्रीमो शरद पवार का कहना है कि भारतीय संविधान के विशेष अनुच्छेद में संशोधन से मराठा आरक्षण की मांग का हल निकल सकता है। शरद पवार ने कोल्हापुर में कहा कि महाराष्ट्र और केंद्र में भाजपा सत्ता में है, उन्हें संशोधन करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए। राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो भी अन्य विरोधी दलों के समर्थन की जिम्मेदारी मैं लेता हूं।

पवार ने कहा कि संविधान में संशोधन के कारण दूसरे राज्यों की जातियों को भी न्याय मिलेगा। यदि किसी ने सकल मराठा समाज के आंदोलन में फूट डालने की कोशिश की तो उसे कंकर जैसा बाहर निकाल फेंके। उन्होंने मराठा समाज को एकजुट रहने की सलाह देते हुए कहा कि इस बारे में उन्होंने देश के प्रमुख वकीलों से भी चर्चा की है। संविधान में संशोधन से ही इसका रास्ता निकल सकता है। उसके लिए लोकसभा में आवश्यक बहुमत लगेगा, जो मौजूदा सरकार के पास है।

फिर हुआ वही खून-खराबा

मंगलवार 17 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ‘मॉब लीचिंग’ की बढ़ती घटनाओं पर एक अहम फैसला देते हुए कहा था कि, ‘कोई नागरिक अपने आप में कानून नहीं बन सकता। लोकतंत्र में भीड़ तंत्र को इजाज़त नहीं दी जा सकती’।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड की पीठ ने भीड़ और कथित गौरक्षकों द्वारा की जाने वाली हिंसा से निपटने के लिए निरोधात्मक, उपचारात्मक और दंडात्मक प्रावधानों पर दिशा निर्देश देते हुए साफ कह दिया कि, ‘गाय के नाम पर खून खराबा अब और नहीं चलेगा, संसद इस पर सख्त कानून बनाए।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेश के चार दिन बाद ही शनिवार 21 जुलाई को राजस्थान के अलवर जिले की भीड़ ने एक युवक को गो तस्कर समझ कर पीट-पीट कर मार डाला। वारदात रामगढ़ क्षेत्र के ललावड़ी गांव में शुक्रवार 20 जुलाई की रात को हुई। शुक्रवार की देर रात ललावड़ी गांव के जंगलों में गोवंश को लेकर हरियाणा जा रहे 28 वर्षीय अकबर और उसके साथी असलम की गांव वालों ने लाठियों से बुरी तरह पिटाई कर दी, अकबर बुरी तरह मरणासन्न हो गया। लेकिन असलम भागने में सफल हो गया। सवा साल में इस जिले में भीड़ ने यह तीसरी जान ली है। इससे पहले एक अप्रैल 2017 को बहरोड़ में हरियाणा के पहलू खां की मौत हो गई, 10 नवम्बर 2017 को गोविंदगढ़ के बिन्दुका के उमर खान की हत्या कर दी गई और 8 दिसम्बर 2017 को तस्लीम खान को मार डाला गया। पुलिस ने शुरुआती दौर में हत्या का मामला दर्ज कर धर्मेन्द्र यादव और परमजीत नामक युवकों को गिरफ्तार कर अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली।

पुलिस ने हमलावरों के मामले में आरोपियों के किसी संगठन से जुडऩे की बात भी हवा में उड़ा दी। उधर मुख्यमंत्री ने भी घटना को गंभीरता से नहीं लिया और किताबी बयान देकर मामले को रफा-दफा कर दिया कि ‘घटना निंदनीय है, लिहाजा दोषियों को कड़ी सजा दी जाएगी। यही लिपे-पुते लफ्ज गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने भी दोहराए और चुप्पी साध ली। लेकिन घटना की असलियत तब बेनकाब हुई जब, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस वारदात को ‘मोदी का क्रूर भारत’ की संज्ञा देते हुए बर्रे का छत्ता हेड़ दिया कि, ‘इस क्रूर इंडिया में मानवता की जगह नफरत ने ले ली है और लोगों को कुचला जा रहा है। उनका कहना था, ‘भीड़ के शिकार मरणासन्न अकबर को अस्पताल पहुंचाने में पुलिस को तीन घंटे क्यों लगे? आखिर क्यों लोग कुचले जा रहे हैं और मरने के लिए छोड़े जा रहे हैं?

हालांकि केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने यह कहते हुए पलटवार करने की कोशिश की कि, ‘राहुल गांधी के परिवार ने 1984 में भागलपुर जैसे दंगों में नफरत की अगुवाई की और वह भी गिद्ध राजनीति के जरिए वही काम कर रहे है। लेकिन घटना को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन में स्मृति ईरानी का पटाखा फुस्स हो गया, नतीजतन मामला संसद में भी गूंज गया और राहुल गांधी द्वारा सवाल उठाए जाने पर हकीकत पर पर्दा उठने लगा कि, ‘पुलिस वालों ने पहली ज़रूरत को दरकिनार किया और अकबर को 250 मीटर पर स्थित अस्पताल पहुंचाने में तीन घंटे लगाए जबकि पीडि़त तब तक जीवित था।

सरकार सक्रिय हुई और पुलिस महानिदेशक ओ.पी. गल्होत्रा ने संयुक्त जांच टीम बनाई तो मौके से जान बचाकर भागे अकबर के साथी असलम ने सनसनीखेज खुलासा कर दिया कि लालवाड़ी के पास पहले भीड़़ ने फायरिंग की फिर हमला कर दिया। इस सवाल पर कि गायों को रात में क्यों ले जा रहे थे? असलम का कहना था कि, ‘दिन में गायों के बिदकने का खतरा रहता है, इसालिए एहतिहात के तौर पर सफर रात को किया जा रहा था। उधर पुलिस की संयुक्त जांच रिपोर्ट भी चौंकाने वाली थी कि, ‘स्थानीय पुलिस ने अकबर की चोटों को गंभीरता से अनुमान लगाने की बजाय पहले गायों को गौशाला पहुंचाने की जल्दी मचाई, नतीजतन अकबर समय रहते अस्पताल नहीं पहुंच सका।

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट इस मामले में काफी कुछ कह देती है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘मृतक के एक हाथ में फ्रेक्चर था, उसकी पीछे की पसलियां टूटी हुई थी। फेफड़ों में चोट और अत्यधिक खून बहना पाया गया तो जाहिर है कि, अकबर के साथ पूरी निर्ममता बरती गई। पुलिस जिस समय मौकाए वारदात पर पहुंची, अकबर मिट्टी में सना खेत में पड़ा था। जिस हालत में अकबर पड़ा हुआ था, पुलिस को उसे संभालकर उठाना और गाड़ी में लाना था, लेकिन उसे तो अद्र्धचेतन अवस्था में भी लात-घूंसों पर धर लिया गया। आखिर यह कौन सी पुलिसिया कार्रवाई थी? घायल अकबर को पहले अस्पताल ले जाना ज़रूरी था या थाने? एएसआई मोहन सिंह उसे पहले थाने ले जाने की जि़द पर अड़े थे और अब जबकि घटना ने तूल पकड़ लिया तो वे शर्मिन्दगी के साथ इस बात पर हामी भी भरते नजर आते हैं।

लेकिन इस बात ने तो पुलिस की कार्यशैली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर पुलिस घायल अकबर को अस्पताल ले जाने की बजाय थाने क्यों ले गई? जो वक्त उसके उपचार में खर्च होना था वो थाने की खानापूर्ती में जाया हो गया, नतीजतन मरणासन्न अकबर को तो दम तोडऩा ही था?

इस संवेदनशील मामले में केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल का बयान स्तब्ध करने वाला था कि, ‘जैसे जैसे मोदी जी लोकप्रिय होते जाएंगे, ऐसी घटनाएं बढ़ेगी। चुनाव के समय पहले भी ऐसा हुआ था, 2019 में कुछ और होगा, ये मोदी जी की योजनाओं का रिएक्शन है।’ मेघवाल का बयान वायरल हुआ तो वे विवाद में फंसते नजर आए। नतीजतन उन्होंने यह कह कर बचने की कोशिश की कि, ‘मेरे बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है।

गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया ने जब मौके पर जाकर हालात देखे तो उन्होंने इस मामले में बड़ा बयान देते हुए माना कि, अकबर की मौत पुलिस हिरासत में हुई है। राज्य सरकार ने अब इस मामले में न्यायिक जांच कराने का फैसला लिया है। इसके साथ ही गृहमंत्री कटारिया ने दोषियों को सजा दिलाने का वादा करते हुए कहा कि किसी को भी किसी की जान लेने का हक नहीं है। इस बीच स्पेशल डायरेक्टर जनरल पुलिस एन आर के रेड्डी ने अकबर की मौत को पुलिस की चूक बताते हुए कहा कि, ‘जो हुआ, उसे टाला जा सकता था। उधर सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में सख्ती बरतते हुए राज्य सरकार से तत्काल रिपोर्ट तलब की है। उधर गृह मंत्रालय ने भी घटना के ब्यौरे के साथ-साथ आरोपियों पर हुई कार्रवाई के बारे में जल्द से जल्द ब्यौरा देने को कहा है।

इस मामले को लेकर प्रदेश के एक दैनिक का कहना है, ‘प्रदेश में भीड़ फैसले कर रही है, मानों वही सरकार हो? कुल मिलाकर सरकार का रवैया हैरान करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद आखिर वह कौनसी मजबूरी है जो राज्य सरकार को भीड़ के खिलाफ कानून बनाने से रोक रही है? वो भी तब, जब आए दिन भीड़ के पैरों तले कानून और व्यवस्था कुचली जा रही है?

इरादे साफ हैं भले ही पहनता हूं सूट-बूट: मोदी

मेरे इरादे साफ हंै’। अगर उद्योगपतियों की बगल में सूट-बूट पहने हुए मैं दिखता हूं तो इसलिए क्योंकि मेरे इरादे साफ हैं। मुझे उनके साथ खड़े होने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती क्योंकि ‘इरादे’ बड़े साफ है। व्यापारी भारत के विकास में मदद करते रहे है। गांधी जी के भी इरादे इतने नेक और शुद्ध थे कि उन्हें बिड़ला परिवार में रहने में कभी कोई संकोच नहीं रहा।

प्रधानमंत्री के इस बयान पर कांग्रेस ने कहा, यह उनके विवेक पर है कि वे किन उद्योगपतियों के साथ दिखते हैं। वे जो भारतीय बंैक प्रणाली को लूट कर देश के बाहर हो जाते हैं या दूसरे। कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि वे अपनी तुलना गांधी से कर रहे हैं यह कितना हास्यास्पद है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ में सोमवार को विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा, ‘पब्लिक में मिलना नहीं, पर्दे के पीछे सब कुछ करना है। वे डरते रहते हंै। पूर्व सपा नेता अमर सिंह यहां बैठे हुए हैं। ये आपको पूरा ब्यौरा दे सकते हैं। क्या हमने कभी (उद्योगपतियों और व्यापारियों) को ‘चोर’ और ‘लुटेरे’ कह कर कभी गाली दी। जो देश के साथ गलत करते हैं उन्हें देश छोडऩा पड़ता है या फिर अपने दिन जेल में गुजारने पड़ते हैं। क्या आपको यह पता नहीं कि वे किसके जहाज में घूमते थे। लखनऊ में हुआ भव्य समारोह राज्य में 60 हजार करोड़ रुपए के निवेश पर आयोजित था। इसमें देश के जाने माने उद्योगपति आदित्य बिड़ला समूह के अध्यक्ष कुमारमंगलम बिड़ला, अडानी समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी, एसेंल समूह के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा और आईटीसी के प्रबंध निदेशक संजीव पुरी ही नहीं बल्कि वाल्मार्ट के संचालक भी मौजूद थे।

इस मौके पर प्रधानमंत्री ने कहा कि जो लोग उनकी आलोचना करते हैं वे दशकों पुरानी समस्याएं भूल जाते हैं। कृप्या ध्यान दीजिए। आप उनके राज के 70 साल याद कीजिए और मेरे पास तो सिर्फ चार साल हैं। जबकि आपके पास तो 70 साल हैं। दरअसल देश में कांग्रेस का शासनकाल 54 साल का है। सत्ता में मोदी के नेतृत्व में राज पांच साल का है। जबकि अटल बिहारी वाजपेयी एक साल सत्ता में रहे। सहयोगी गठबंधन रूप में तीन साल भाजपा ने पहले राज किया था जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे।

‘कुछ लोग इसे भूमि पूजन समारोह कहते हैं लेकिन यह रिकार्ड ब्रेकिंग समारोह है। इतने कम समय में पुराने तौर-तरीके बदल गए हैं। और उद्योगपतियों का भरोसा हासिल किया गया है। मुझे खुशी है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में निवेश का महत्वपूर्ण माहौल, कार्य संस्कृति बदल कर बनाया गया है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा क्षेत्र को खास तौर पर तवज्जुह दी गई है। प्रधानमंत्री ने जिन परियोजनाओं की आज आधारशिला रखी उससे राज्य में औद्योगिकीकरण बढ़ेगा। अगले लोकसभा चुनाव के पहले राज्य में बड़े औघौगिकीकरण का लक्ष्य पूरा हो चलेगा।

राज्य के उद्योग मंत्री सतीश महाना ने कहा कि इन उद्योगों से दो लाख लोगों से ज़्यादा लोगों को नौकरियां मिल सकेंगी। प्रधानमंत्री अपने विपक्षियों पर हमला करने से नहीं चूके जो बाहर की उनकी यात्राओं का उपहास उड़ाते हैं। वे ऐसा कह कर लोकसभा चुनाव में अपनी हार के अंदेशे से घबराए हुए हैं।

खुद के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘इस राज्य का मैं सांसद हूं। मैं यहां दो बार, पांच बार,नहीं दस बार आऊंगा। मैं आता रहूंगा।’ दरअसल वे समाजवादी पार्टी के नेताओं की टिप्पणी पर बोल रहे थे जिसमें उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री महीने भर में छह बार तो राज्य में आते हैं। उनकी इस महीने में राज्य की यह छठी और लखनऊ की दूसरी बार हुई यात्रा थी।

कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा, सवाल बहुत सीधा है प्रधानमंत्री किस तरह के उद्योगपतियों के साथ दिखते हैं, बात करते हैं। एक, जो भारतीय बैंक को नुकसान पहुंचा कर लापता हो जाते हैं जिनके साथ उनके फोटो भी दिखते हैं। दूसरे आप किस तरह के उद्योगपतियों – पूंजीपतियों को बढ़ावा दे रहे हैं। हम सूट बूट की सरकार के मेलजोल पर अपनी बात कह रहे हैं। बहुतों की कीमत पर कुछ को लाभ नहीं पहुंचना चाहिए।

एक अलग मगर दिलचस्प ‘मुल्क’

सालों बाद बालीवुड से एक फिल्म आई है ‘मुल्क’। यह फिल्म अदालती दृश्य से शुरू होती है और एक-एक कर दर्शक को समाज, संबंध और प्रेम की पूरी कहानी समझ में आने लगती है। यह फिल्म देशभक्ति, राष्ट्र प्रेम की बात तो करती है लेकिन यह किसी धार्मिक चौखटे में नहीं आती। इस लिहाज से यह फिल्म देखने लायक है।

यह फिल्म ढेरों पूर्वाग्रहों से मुक्त है। फिल्म आप यदि देखे तो यह आपको शुरू से आखिर तक बांधे रखती है। यह फिल्म अपने उदाहरणों से गंगा-जमुनी तहजीब भारतीय रीति-रिवाज, समाज को इक्कीसवीं सदी में उभरे बाजारवाद के बरक्स एक निहायत पुराने मगर तहजीबदार ‘मुल्क’ को पेश करती है। जिसे आप देख कर ही समझ पाएंगे।

इस फिल्म की नायिका है तापसी पन्नू। यह उनकी पहली हिंदी फिल्म है। वे इस फिल्म की कहानी सुन कर ही खासी रोमांच से भर गई थी। उन्होंने बड़ी लगन से अपनी भूमिका निभाई है। इस फिल्म के नायक हैं जाने-माने अभिनेता ऋषि कपूर। जिनके पास पीढिय़ों से अभिनय का सलीका रहा है। वे खुद इस फिल्म को ‘प्रमोट’ करने में जुटे भी रहे हैं। वे मानते हैं कि यह फिल्म हर हिंदुस्तानी को पसंद आने वाली फिल्म है।

 ‘मुल्क’ के निर्देशक अभिनव सिन्हा हैं। उनका मानना है कि यह फिल्म उनकी बनाई दूसरी फिल्मों में काफी बेहतर है। खुद छोटे शहरों से बड़े शहर में आए अभिनव मानते हैं कि भारतीय संस्कृति छोटे शहरों में कहीं बेहतर है। वहां अच्छा भाईचारा है और एक दूसरे के प्रति सम्मान और जानने-सीखने की इच्छा है। ‘मुल्क’ को जानने- समझने के लिए इसे ज़रूर देखें।

और कारवां गुज़र गया

”अब तो मज़हब कोई ऐसा चलाया जाए

जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए

आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी

कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए’’

इन शब्दों के रचयिता महान कवि व गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ देश के मौजूदा हालात का दर्द अपने सीने में लिए चले गए। उनकी कलम ने मानवीय संवेदनाओं को बार-बार झिंझोरा। जहां एक ओर वे सामाजिक व्यवस्था के ताने बाने से बगावत करते नज़र आते हैं तो दूसरी ओर वे बेहद रोमानी हो जाते हैं। वे लिखते हंै-

”लिखे जो खत जो तुझे, वे तेरी याद में

हज़ारों रंग के नज़ारे बन गए’’

उनके नगमों में प्रेम अपनी उच्चतम अवस्था में दिखाई पड़ता है। उसमें एक पवित्रता दिखती है। कोई फूहड़पन नहीं। इसके साथ उनकी कविताओं, गज़लों और नगमों में सादापन साफ झलकता है। उनके शब्द भी सादे हैं, आम आदमी को समझ आते हैं। हर मानव उनसे प्रभावित होता है।

 उनकी कल्पना की उड़ान असीमित थी। एक जगह वो कहते हैं-

”हाथ थे मिले कि ज़ुल्फ चांद की सवार दूं

होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार लूं

और सांस यंू कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूं’’

किसी भी शायर या कवि के लिए उसकी कल्पना की उड़ान बहुत मायने रखती है। इसके साथ ही नीरज में एक क्रांतिकारी भी नज़र आता है। वह जुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाता है। उस क्रांतिकारी की ये पंक्तियां ही सारी बात कह देती हैं। अपनी एक गज़ल में वे लिखते हैं-

”दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था

तुम्हारे घर का सफ़र इस कदर सख्त न था’’

”जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया, न खौल उठा,

वो और कुछ भी हो मगर आदमी का रक्त न था’’

 यह विद्रोही भावना शायद उन्हें अपने जीवन के आरम्भ से ही मिली थी। बेहद मुफ्लिसी में अपने जीवन की शुरूआत करने वाले नीरज ने भूख को बहुत करीब से देखा था। उनका संघर्ष सभी के लिए एक प्रेरणा है। उनकी सोच में हमेशा सकारात्मकता रही है। वे कभी हतोत्साहित नज़र नहीं आते। उनकी पंक्तियां उत्साह बढ़ाती हैं। समय, काल और व्यवस्था को चुनौती देती है-

”है बहुत अंधियारा अब सूरज निकलना चाहिए

जिस तरह से भी हो यह मौसम बदलना चाहिए

छीनता है जब तुम्हारा हक कोई, उस वक्त तो

आंख से, आंसू नही शोला निकलना चाहिए’’

ऐसा नहीं है कि नीरज ने जीवन संघर्ष को एक ही ऐनक से देखा हो। उन्होंने संघर्ष में अध्यात्मवाद को भी महत्व दिया और धर्मांघता पर भी चोट की। वे लिखते हैं-

”जितना कम सामान रहेगा

उतना सफर आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी

उतना तू हैरान रहेगा’’

इसी $गजल में अगले शेयर की बानगी देखिए-

”जब तक मंदिर और मस्जिद हैं

मुश्किल में इंसान रहेगा’’

यहां अचानक अध्यात्मवाद और मोक्ष की बात करते-करते नीरज सांप्रदायिकता पर चोट कर जाते हैं। इतना ही नहीं वे देश के रहबरों पर भी तंज कसते हैं। साथ ही समाज में दबे कुचले लोगों को भी संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं। वे कहते हैं-

”खुशबू सी आ रही है इधर जाफरान की

खिड़की खुली है गा़लिबन उनके मकान की

हारे हुए परिंदे ज़रा उड़ के तो देख

आ जाएगी ज़मीन वे छत आसमान की’’

इसके पश्चात् उनका तंज आता है देश के नेताओं पर जब वे कहते हैं-

”बुझ जाए सरेआम ही जैसे कोई चिराग

कुछ यूं है शुरूआत मेरी दास्तान की

ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी

हालत यही है आज कल हिंदुस्तान की’’

नीरज का जन्म चार जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश में इटावा महेवा के निकट पुरावली गांव में हुआ। उनका पूरा नाम गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ था। उन्होंने जो भी लिखा अपने ‘कलम’ के नाम ‘नीरज’ के नाम से लिखा। उनकी रचनाओं के लिए उन्हें 1991 में ‘पद्मश्री’ और 2007 में ‘पदम भूषण’ के खिताबों से नवाजा गया। वे धर्मसमाज कॉलेज अलीगढ़ में प्रोफेसर भी रहे। उनकी बहुत सी कविताएं और गाने हिंदी फिल्मों की शोभा बने और बहुत ही मकबूल हुए। उनमें 1965 में बनी फिल्म ‘नई उम्र की नई फसल’ का यह गाना ‘और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे’ आज भी नई पीढ़ी के होठों से सुना जा सकता है।

नीरज शायद एकमात्र ऐसे गीतकार हैं जिन्हें तीन साल लगातार ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार मिलते रहे। 1970 में उन्हें फिल्म ‘चंदा और बिजली’ के गाने ‘काल का पहिया घूमे रह भैया’ 1971 में फिल्म ‘पहचान’ के गाने ”बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं’’ के लिए और 1972 में राजकपूर की सबसे मशहूर फिल्मों में से एक ‘मेरा नाम जोकर’ के इस गाने ”ए भाई ज़रा देख के चलो, आगे भी नही पीछे भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी’’ के लिए इस पुरस्कार से नवाजा गया। इनके अलावा उनके छह सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गानों में-

”फूलों के रंग से

दिल की कलम से

तुझको लिखी रोज़ पाती’’ (फिल्म- प्रेम पुजारी)

”शोखियों में घोला जाए

फूलों का शवाब

उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब’’

(फिल्म- प्रेम पुजारी)

”रंगीला रे तेरे रंग में यूं

रंगा है मेरा मन’’ (फिल्म- प्रेम पुजारी)

”लिखे जो खत जो

तुझे वो तेरी याद में’’        (फिल्म- कन्यादान)

”खिलते हैं गुल यहां खिलके

बिखर जाने को’’   (फिल्म- शर्मीली)

”आज मदहोश हुआ

जाए रे मेरा मन’’ (फिल्म- शर्मीली) शामिल हैं।

एक टीवी साक्षात्कार मे नीरज ने खुद को दुर्भाग्यशाली कवि कहा क्योंकि उन्हें फिल्मी गाने लिखना छोडऩा पड़ा। इसका कारण उन्होंने बताया कि जिन संगीतकारों के साथ उन्होंने मशहूर गाने तैयार किए थे वे इस दुनिया से चल बसे। इस बारे में उन्होंने शंकर-जयकिशन की जोड़ी में से जयकिशन का नाम लिया। इसके अलावा उन्होंने सचिन देव बर्मन और राहुल देव बर्मन के नाम भी लिए। इनकी मृत्यु के बाद नीरज काफी निराश हो गए और उन्होंने फिल्मी दुनिया का अलविदा कह दिया।

19 जुलाई 2018 को 93 साल की उम्र में ‘कलम’ का यह शहंशाह इस नश्वर संसार को अलविदा कह गया।

पंचकूला हिंसा के आरोपी बरी, हनीप्रीत को राहत नहीं

करीब एक साल पहले डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को यौन शोषण मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद हरियाणा के पंचकूला में भड़के दंगों और बड़े पैमाने पर हुई आगजनी के सभी आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया है। इस फैसले से विशेष जांच दाल (एसआईटी) को बड़ा झटका लगा है जिसने इस मामले की जांच और इन लोगों को आरोपित किया था। हालांकि बाबा की करीबी रही हनीप्रीत को इस मामले में कोई राहत नहीं मिली है।

गौतलब है कि ये दंगे 25 अगस्त, 2017 को हुए थे और उस दिन बड़े पैमाने पर आगजनी की गयी थी। उपद्रवियों ने एक टीवी चैनल की वैन सहित कई निजी वाहन जला दिए थे। इन दंगों में तीन दर्जन के करीब लोगों की जान चली गयी थी।

पंचकूला की सेशन जज रितु टैगोर की अदालत ने 30 जुलाई को सुनाये फैसले में 25 अगस्त के इन दंगों में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत के फैसले के मुताबिक, एसआईटी ने ज्ञानीराम, सांगा सिंह, होशियार सिंह, रवि, तरसेम और राम किशन को आरोपी बनाया था, जिनके खिलाफ एसआईटी सबूत जुटाने में अब तक असमर्थ रही। सबूतों के अभाव के कारण कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है।

इन आरोपियों पर दंगे भडकाना आगजनी करना और मारपीट के आरोप में आईपीसी की धारा 148, 149, 186, 188, 436 के तहत किया मामले दर्ज किय गए थे। अदालत के फैसले की जानकारी आरोपियों की वकील पूजा नागरा ने दी है। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख राम रहीम को यौन शोषण मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद ये दंगे भड़के थे।

गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद पंचकूला समेत प्रदेश के अन्य हिस्सों में व्यापक पैमाने पर हिंसा, तोडफ़ोड़ और आगजनी की घटनाएं हुईं थीं। हिंसा में करीब 37 लोगों की मौत हुई थी। आरोपियों के खिलाफ पुलिस के पुख्ता सबूत न जुटा पाने के कारण मामला कमजोर पड़ गया। दिलचस्प यह है कि हिंसा, आगजनी की घटनाओं के इस मामले में कोर्ट ने 53 लोगों पर देशद्रोह जैसी गंभीर धाराएं हटाने के आदेश भी दिए हैं। इससे पहले सबूतों के अभाव में ही 15 लोग बरी हो चुके हैं।

हालांकि कोर्ट के फैसले में गुरमीत राम रहीम की नजदीकी रही हनीप्रीत को लेकर कुछ नहीं कहा गया है जिससे जाहिर होता है कि उसे कोर्ट की तरफ से कोइ राहत नहीं मिली है। हनीप्रीत इस समय जेल में है।

मानव तस्करी रोधक बिल 2018 संपूर्ण या त्रुटिपूर्ण?

ट्रांसजेंडर (तीसरा लिंग) के मानवीय अधिकारों की पक्षधर निशा गुलर आज अपने कार्य पर गर्व महसूस कर रही है। कुछ साल पहले ऐसा नहीं था। उसने 17 साल की उम्र में अपना घर छोड़ दिया था। फिर वह एक ‘सेक्स वर्कर’ बन गई। वह भीख भी मांगती वह नहीं चाहती थी कि उसके परिवार को उसकी वजह से शर्मिदगी उठानी पड़े। उसे जीवन भर समाज की फब्तियां सुनने को मिलीं। हालांकि कुछ सालों बाद उसका परिवार उससे मिल गया।

आज निशा को इस बात का डर है कि नया कानून उससे सम्मानपूर्ण जीविका अर्जन का अधिकार छीन लेगा। निशा और उन जैसी कई और भी आज ‘सेक्स वर्कर’ के तौर पर और ‘भीख’ मांग कर अपना जीवन यापन करती हंै, और वे उसी पर निर्भर हैं। निशा का मानना है कि इसमें कोई शक नहीं है कि यदि इस बिल में कुछ फेर बदल नहीं हुआ तो यह ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर समुदाय के सपनों को तोड़ देगा।

नए बिल ने सेक्स वर्करों और ट्रांसजेंडर को बेचैन कर दिया है। बिल में रोक, सुरक्षा और पुनर्वास की व्यवस्था की गई है। यह बिल लोकसभा में 26 जुलाई को पास हुआ। इसमें कई खामियां हंै। मानव तस्करी रोधक इस बिल के खिलाफ मानव तस्करी रोधक कार्यकर्ता, वकील और सिविल सोसायटी के लोग भी हैं। उनके अनुसार इस बिल में उस पुराने बिल की कमियों को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया गया है। इन लोगों को अब राज्यसभा सदस्यों से उम्मीद है कि वे इसका पूरा विश्लेषण करके ही इसे पास करेंगे। उनकी मांग है कि यह बिल स्थाई समिति के हवाले किया जाए।

सामाजिक विज्ञानी मीना सरस्वती सिशु ने ‘तहलका’ को बताया कि वे लोग अब राज्यसभा के सदस्यों से मिल कर बात करेंगे। उनकी यही उम्मीद है कि यह बिल स्थाई समिति को भेज दिया जाए।

‘तहलका’ ने सवाल किया कि यदि राज्यसभा भी इसे पास कर देती है तो आप क्या करेंगे? सिशु ने कहा तब हमें अदालत में जाना पड़ेगा क्योंकि उसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

 महिला व शिशु विकास मंत्री मेनका गांधी ने विश्वास दिलाया कि यह बिल पीडि़त केंद्रित है और देश में मानव तस्करी के स्थाई समाधान की दिशा में पहला कदम। इस पर यह विवाद भी है कि इसमें गरीबी, कम वेतन या बेरोज़गारी, स्तर हीन शिक्षा, वर्ग और जाति उत्पीडऩ, खराब सामाजिक व आर्थिक हालात वगैरा का जि़क्र तक नहीं है, इनके बारे में सोचने की बात तो बहुत दूर की है।

महाराष्ट्र के सभी सेक्स वर्करस ने इक_े हो कर कहा कि बजाए इसके कि सरकार इससे प्रभावित होने वाले लोगों से बात करती, उनकी समस्याएं जानती, उनकी चिंता समझती, उनके प्रतिदिन होने वाल शोषण पर ध्यान देती, वह एक ऐसा बिल ले आई जो नैतिकता की सेना (मोरेल पुलिसिंग) को बढ़ावा देगा और सेक्स वर्करस का शोषण बढ़ाएगा।

 इसके अलावा बहुत से सामजिक संगठनों ने इस बिल का विरोध किया है। इनमें नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्करस, आल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्करस, एचएयू सेंटर फॉर चाइल्ड वुमेन और न्यू ट्रेड यूनियन शामिल हंै।

ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्करस के अधिकारों को समझना

नेशनल नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्करस (एनएनएसडब्ल्यू) इंडिया ने 19 और सेक्स वर्करस के संगठनों की तरफ से जारी बयान में इस विषय पर लोकसभा द्वारा की गई जल्दबाजी की आलोचना की है। उनका सबसे ज़्यादा गुस्सा महिला व शिशु विकास मंत्री की उस टिप्पणी पर है जिसमें उन्होंने कांग्रेस के सांसद शाशि थरूर के बारे में कहा था कि वे सेक्स वर्करस के प्रतिनिधियों के साथ आए थे न कि पीडि़तों के साथ। इससे सेक्स वर्करस में काफी गुस्सा है।

उन्होंने कहा,’ मैडम मनिस्टर क्या हमें मत्रियों, सरकारों और सांसदों को अपनी बात कहने का अधिकर नहीं है? आपके अनुसार क्या हम निंदा के पात्र हैं और आप हमारे आत्मसम्मान की कीमत पर हमारा मज़ाक उड़ा सकते है? क्या हम भारत के नागरिक नहीं जिन्हें सम्मान से जीने का अधिकार हो? क्या हम महिलाएं नहीं हैं?

मानवाधिकार कार्यकर्ता अकाई पद्माशली को इस बात पर नाराजगी है कि सरकार बिल में ट्रांसजेंडर (तीसरा लिंग) का जि़क्र तक करना भूल गई। अकाई ने मेनका गांधी को संबोधित करते हुए कहा,’ आप केबिनेट में उच्च पद पर हैं और एक महिला होने के नाते आप अपने कत्र्तव्य निर्भयन में विफल रहीं हैं और अपने ‘ट्रांसजेंडर’ (तीसरा लिंग) की शब्दावली का इस्तेमाल तक नहीं किया। जबकि देश की सर्वोच्च अदालत ने हमारे हक में फैसला दिया है। अदालत ने भारतीय संविधान के तहत हमारे अधिकारों को मान्यता दी है, तो आप उसे कैसे नहीं पहचानती। यह बिल पूरी तरह संवेदनहीन और गैर लोकतांत्रिक है, मैं इसकी निंदा करती हूं।

बिल की पृष्ठभूमि

इससे पहले भी मानव तस्करी को लेकर कई कानून हैं। इनमें आईपीसी की धारा 370 व 370ए, अनैतिक तस्करी (रोधक) कानून 1956 जिसमें किशोर न्याय (देखभाल और बाल सुरक्षा) कानून 2015 और कई कानून शामिल हैं। नए कानून से अपेक्षा थी कि वह पुराने सभी कानूनों की जगह एक संपूर्ण कानून बना देगा जो इसमें नहीं हुआ। इसकी बजाए बिल में कानून लागू करने वाली एजेसियों को और उहापोह की स्थिति में डाल दिया।

 ट्रैफिकिंग ऑफ परसनस (प्रीवेशन, प्रोटेकशन और रीहैवलिटेशन) बिल 2018 महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने 18 जुलाई को पेश किया और 26जुलाई को इसे पास कर दिया गया। ” ट्रैफिकिंग ऑफ परसनस’’ – यह शब्दावली आईपीसी की धारा 370 से ली गई है।

बिल की खामियां?

‘तहलका’ ने बिल में एक कमी देखी कि वह इसमें मानव अंगों और चमड़ी व्यापार के गैर कानूनी पहलू पर खामोश है। जो कि मानव तस्करी का ही हिस्सा है। यहां हजारों ऐसे लोग हैं जो आरोप लगाते हैं कि उन्हें पैसों का लालच दे कर उनके अंग निकाल लिए गए हैं। मिसाल के तौर पर तमिलनाडु के रामा पाथी (नाम बदला हुआ) का कहना है उसे गुर्दा देने के लिए सात लाख रुपए देने की बात हुई थी पर उसे केवल दो लाख ही मिले।

मानव तस्करी बिल ‘तस्करी’ की नई परिभाषा नहीं देता बल्कि पहली ही परिभाषा को धारा 370 के तहत नए रूप में जोड़ देता है। हां यह एक नया वर्ग ” ऐगरावेटिड फॉरम ऑफ ट्रैफिकिंग’’ बना देता है जिसमें कम से कम सजा 10 साल की है। जिसे उम्र कैद तक बढ़ाया जा सकता है। ‘एगरावेटिड’ में बंधुआ या जब्री मज़दूरी के लिए तस्करी, भीख मंगवाने के लिए तस्करी, शादी या बच्चा पैदा करने के लिए की जाने वाली तस्करी भी शामिल है लेकिन ये सभी तो आईपीसी की धारा 370 मे ंपहले से ही निहित हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों (एनसीआरबी) के अनुसार 2016 में पुलिस ने जब्री मज़दूरी के 10,357 मामले दर्ज किए जबकि जब्री शादी के 349 और भीख मंगवाने के 71 मामले दर्ज किए गए थे। यह कहना कि ये सभी नए मामले हैं और मौजूदा कानूनों में इन पर काबू नहीं पाया जा सकता, पूरी तरह आधारहीन हैं।

कांग्रेस का दधीचि-भाव और आगत के आसार

नरेंद्र मोदी को बेदखल करना है तो कांग्रेस को इस बार देश भर में समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों का साथ लेना-देना पड़ेगा। उसे राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद की देगची को भी फिलहाल कम आंच वाले पिछले चूल्हे पर चुपचाप खदकने के लिए छोडऩा पड़ेगा। सवाल आज का है, इसलिए राज-धर्म का यह पालन कांग्रेस का कर्तव्य है। लेकिन कल की राजनीति देखें तो कांग्रेस अपने सिर पर दुधारी तलवार लटका रही है। यह तलवार मोदी और अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी के थुलथुल होते जा रहे शरीर को कतर देगी। मगर क्या वह अब से पांच बरस बाद के कांग्रेसी-जिस्म की सेहत पर भी बुरा असर डालने से बाज आएगी?

सो, बावजूद इसके कि मैं मानता हूं कि नमोरोगियों की सियासत से हमारे मुल्क को मुक्ति दिलाने के लिए कांग्रेस को अभी सब-कुछ करना चाहिए; मुझे यह बात भी साल रही है कि भारत के वर्तमान के लिए कांग्रेस को अपना भविष्य दांव पर लगाना पड़ रहा है। महागठबंधन की यह राजनीति अगर सिर्फ़ लोकसभा चुनाव के लिए होती तो बात अलग थी। मगर इसकी शुरुआत मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में दिसंबर के चुनावों से होनी है। अब तक इन में से किसी भी प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा से इतर किसी तीसरी राजनीतिक शक्ति का फायदे से कोई आधार नहीं है। इस बार के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का समान विचार वाले दलों से होने वाला तालमेल पहली बार भले न हो, मगर पहली बार उसकी संरचना ऐसी होगी, जिससे कांग्रेसी-दस्तरखान पर वे ताकतें बाकायदा आ कर बैठेंगी, जो आगे चल कर कांग्रेस के थनों का ज़्यादा-से-ज़्यादा दूध अपने बर्तनों में दुहेंगी।

पहले ऐसा नहीं था, मगर अब भारत दो विचार-धुरियों का देश बन गया है। एक विचार है समावेशिता का। दूसरा विचार है बहिष्करण का। एक विचार है सामुदायिक एकात्मकता का। दूसरा विचार है सामुदायिक विभाजन का। अभी कई बरस दो पालों में बंटी इस सियासत की खाई पटने के कोई लक्षण दूर-दूर तक नहीं हैं। कांग्रेस पहली विचारधारा की शाश्वत प्रतिनिधि है। दूसरी विचारधारा संघ-कुनबे ने बरसों की कुचालों के बाद हमारे बहुसंख्यक समाज के एक तबके में परत-दर-परत जमाई है और भाजपा उसकी नुमाइंदगी में अपना सब-कुछ झौंके बैठी है।

आज की समस्या यह है कि संघ-कुनबे के विचार-जंगल के 99 फीसदी हिस्से पर भाजपा का कब्ज़ा है, जबकि सर्वसमावेशी विचार के बगीचे का प्रतिनिधित्व आधा दर्जन से अधिक शक्तियां कर रही हैं और वे कांग्रेस को अपना अगुआ मानने के बजाय उसे ‘समान कद वालों के बीच पहले क्रम परÓ देखने भर को तैयार हैं। सो, दो विचारधाराओं के बीच हो रहे संघर्ष के इस दौर में नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा तो अ-सुर शोर के एकाधिकारी हैं, मगर राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस सुरीले संगीत की धुनें अकेले तैयार करने के अधिकारी नहीं हैं। इसलिए भारत की राजनीति में आगे चल कर भाजपा के खल-नायकत्व पर रीझने वालों के समर्थन की शक्ति तो एकजुट रहेगी और कांग्रेस के नायकत्व को अपनी समर्थक-शक्ति की साझेदारी बहुतों के साथ करनी होगी। यह सकारात्मक विचार यात्रा के लिए तो फायदेमंद है, लेकिन यह भी ज़ाहिर है कि यह कांग्रेस के निजी-हित में नहीं है।

कांग्रेस के एकाधिकार वाले आंगन में धीरे-धीरे समान विचार वाले राजनीतिक समूहों की उपस्थिति का दायरा लगातार ऐसे ही नहीं बढ़ा है। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश और बिहार में अपने वैचारिक हमजोलियों को अपनी उंगली पकडऩे दी और आज वहां कांग्रेस उनकी उंगली पकड़ कर चलने की हालत में आ गई। कौन कह सकता है कि मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी-आंगन में इन्हीं हमजोलियों का प्रवेश, अब से पांच साल बाद 2023 में होने वाले विधानसभा चुनावों में, कांग्रेसी ज़मीन को सिकोड़ नहीं देगा? अब ऐसे राज्य बचे ही कितने हैं, जहां भाजपा का मुकाबला सीधे कांग्रेस कर रही हो? जब कांग्रेस कहीं भी भाजपा से जूझने वाला एकमात्र राजनीतिक दल नहीं रह जाएगा तो मजबूत कौन होगा?

इसलिए अरुण जेटली की यह बात सुन कर मुझे झुरझुरी होती है कि कांग्रेस-मुक्त भारत का पहला अध्याय भाजपा ने लिखा था और अब दूसरा अध्याय महागठबंधन लिखेगा। भीतर से मेरा मन आश्वस्त है कि वह दिन कभी नहीं आएगा, जब भारत कांग्रेस-मुक्त होगा। इसलिए कि वह दिन कभी नहीं आएगा, जब पूरा भारतीय समाज संघ-विचार का अनुगामी हो जाएगा। संघ-कुनबे के कुविचार-विरोध की धारा तो हमेशा कायम रहनी ही है। वह दिन भी आएगा, जब यह कुविचार पूरी तरह परास्त हो जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि इस संग्राम का प्रतिनिधित्व कांग्रेस करेगी या कुछ अलग-अलग कबीले? क्या कांग्रेस भी ऐसा ही एक कबीला भर रह जाएगी?

इस तथ्य से मुंह फेर कर बैठे रहना मूर्खता होगी कि आज उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, दिल्ली, त्रिपुरा, पूर्वोत्तर के कई राज्यों और ओडिशा में कांग्रेस की मौजूदगी नामलेवा है। दो-सवा दो सौ लोकसभा क्षेत्र ही ऐसे हैं, जहां भाजपा के खि़लाफ कांग्रेस सीधे ताल ठोक रही है। महागठबंधन से, आज नही ंतो कल, कांग्रेस की इस मज़बूती पर उलटा असर पडऩा कोई कैसे रोकेगा? लेकिन आज नरेंद्र मोदी की पराजय के लिए बन रहे वज्र में अपनी हड्डियों तक का दान कर देने के लिए दधीचि कांग्रेस नही तो कौन बनेगा? क्या इस प्रक्रिया में कांग्रेस यह ऐहतियात बरत सकती है कि आज अगर वह अपनी हडिड़यां गलाए तो कल उसके ज़मीनी वारिसों की पगडिय़ां तुर्रेदार हो जाएं!

कांग्रेस के दर्शनशास्त्र को अपनी गांठ में बांध कर सफर शुरू करने वाले राजनीतिक दलों के लिए यह तय करने का वक़्त आ गया है कि वे ‘केंद्र में कांग्रेस-राज्य में हमÓ की राह पकड़ें। ऐसा किए बिना विभाजनकारी विचारधारा का कारगर मुकाबला हो ही नहीं सकता। द्रमुक के करुणानिधि 94 साल के हैं। उनके वारिस स्टालिन भी 65 के हो गए हैं। देवेगौड़ा 85 के हैं। शरद पवार 77 के हैं। लालू प्रसाद 70 के, मुलायम सिंह यादव 78 के और फारूख अब्दुल्ला 80 के हैं। चंद्राबाबू नायडू 68 के हैं। मायावती 62 की हैं और ममता बनर्जी 63 की। नवीन पटनायक भी 71 साल के हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि 2019 इसलिए हाथ से चला जाए कि सब को अपने-अपने राज्यों में भी सिरमौर रहना है और केंद्र में भी बढ़-चढ़ कर अपना हिस्सा चाहिए? ऐसे में अकेली कांग्रेस का दधीचि-भाव क्या कर लेगा? कांग्रेस इसी बार भाजपा से भिड़ंत के लिए अधिकतम त्याग करने से कतरा भी जाए तो 48 साल के राहुल गांधी के पास लोकसभा के 300 बंजर क्षेत्रों में ज़मीन की गुड़ाई करने के लिए 2024 तक का समय है। इसलिए जो बदलते मौसम की नब्ज़ नहीं पहचानेंगे, पाप करेंगे। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

साभार: नया इंडिया

रेहम ने खोले इमरान खान की जि़न्दगी के कई राज़

इमरान खान पाकिस्तान में नए प्रधानमंत्री का पद संभालने की तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में उनकी पूर्व पत्नी रेहम खान उन पर हमले पर हमले किये जा रही हैं।

हाल ही में उन्होंने न सिर्फ यह कहा कि पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी के प्रमुख प्रधानमंत्री के पद की जि़म्मेदारियाँ ठीक से अदा नहीं कर पायेंगे बल्कि यह भी कहा कि इमरान खान की जीत की स्क्रिप्ट पहले से ही तय थी और वह निर्देशक के कहने के अनुसार भूमिका कर रहे थे। ‘इसके डायरेक्टर कोई और नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना है।’ रेहम ने हमला तेज करते हुए कहा, ‘पाकिस्तानी सेना को जूते पॉलिश करने वाला पीएम चाहिए था, वो मिल गया है।’

ये हमले सार्वजनिक तौर पर तब से जारी हैं जबसे पूर्व बीबीसी पत्रकार और इमरान खान की दूसरी पत्नी ने अपनी आत्मकथा लिखी है। इसमें उन्होंने एक बड़ा हिस्सा अपने और इमरान खान के रिश्तों को काफी जगह दी है। याद रहे कि दोनों की शादी सिर्फ 10 महीने ही चली थी।

रेहम ने अपनी आत्मकथा ‘रेहम खान’ में इमरान खान को लेकर कई खुलासे किए थे। आम चुनाव से पहले रिलीज़ हुई ये किताब पूर्व क्रिकेटर के कई अनछुए पहलुओं को उजागर करती है।

किताब के मुताबिक इमरान खान को खूबसूरत मर्द आकर्षित करते थे। रेहम लिखती हैं कि इमरान जिस तरह सकलैन मुश्ताक के बारे में बातें करते थे। उससे लगता था कि उनका दिल सकलैन पर आया हुआ है। पाकिस्तान स्पिनर सकलैन अपनी आकर्षक मुस्कान और खूबसूरती के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने जिस तरह सकलैन के प्रति अपने आकर्षण का इजहार किया उसने मुझको डिस्टर्ब कर दिया। याद रहे सकलैन पाकिस्तान के जाने माने ऑफ स्पिनर थे। जिनका टेस्ट करियर 1995 में शुरू हुआ था। उन्होंने 49 टेस्ट में 208 विकेट लिये जबकि 169 वन-डे में 289 विकेट लेने वाले गेंदबाज बने। वर्ष 2004 में उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास ले लिया।

ट्रांसजेंडर्स में भी पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री की रुचि बताई गयी है। रेहम लिखती हैं कि ‘एक महिला पत्रकार मुझसे मिली। जिसने पाकिस्तान फिल्म एक्ट्रैस रेशम का हवाला देते हुए कहा कि ट्रांसजेंडर डांसर रिमाल आजकल इमरान को अपनी सेवाएं दे रहा है। मैं हैरान रह गई और मेरी हैरानी से वह पत्रकार हतप्रभ थी कि मैं इमरान के बारे में कितना कम जानती हूं।’

इस किताब में, जिसका ई-संस्करण अमेजन डॉट कॉम पर उपलब्ध है, ये भी कहा गया है कि इमरान खान बहुत कम उम्र से ही महिलाओं से सम्बन्ध बनाने लगे थे। ‘इमरान ने बचपन में ही अपनी उस नौकरानी के साथ शारीरिक रिश्ते बनाए, जो उनकी देखरेख में लगाई गई थी। उन्होंने रेहम से बातचीत के दौरान एक बार यह भी कहा कि उनकी उनसे बड़ी कजन ने तब खुद को उनके साथ छूने के लिए दबाव डाला जबकि वो दस साल के भी नहीं थे।’ रेहम की आतमकथा के अनुसार ड्रग्स के शौकीन थे इमरान। उनकी पूर्व पत्नी लिखती हैं कि इमरान ने पहली बार कोकीन तब ली जब उनकी पहली पत्नी जेमिमा बच्चों को उनसे दूर ले गईं। उनकी पार्टी के संस्थापक सदस्य उनकी आदत से वाकिफ थे। रेहम से उन्होंने बताया था कि कोकीन उसी तरह है जैसे आधी गिलास वाइन।

रेहम ने अपनी पुस्तक में यह भी आरोप लगाया है कि इमरान ने पहली शादी लालच की वजह से की थी। ‘उनको लगता था कि उनके ससुर उनका जीवन संवार सकते हैं। वो ब्रिटेन के सबसे धनी और राजनीतिक तौर पर काफी संपर्कों वाले शख्स थे जिन्होंने 90 के दशक में रेफरेंडम पार्टी बनाई।’

इस किताब ने जहां एक तरफ लेखिका को मशहूर किया है वहीं लोग उनसे नाराज़ हैं। इमरान खान ने हाल ही में कहा कि उनकी जि़ंदगी की सबसे बड़ी गलती उनकी दूसरी पत्नी रेहम खान से शादी करना थी। पाकिस्तान में कई लोग रेहम की इस किताब पर मुकदमा भी ठोक चुके हैं।