संसद में उठा ‘वन नेशन, वन डिजिटल मेट्रो कार्ड’ का मुद्दा, कार्ड खोने पर पैसे डूबने पर भी सवाल

सुजीत ठाकुर

AI generated image


नई दिल्ली। देशभर की सभी मेट्रो सेवाओं के लिए ‘वन नेशन, वन डिजिटल मेट्रो कार्ड’ लागू करने की मांग अब संसद तक पहुंच गई है। राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए सरकार से कहा गया कि देश के सभी मेट्रो नेटवर्क के लिए एकीकृत, खाता-आधारित डिजिटल टिकट व्यवस्था विकसित की जाए, ताकि दिल्ली, बेंगलुरु, भोपाल या किसी भी शहर में यात्रियों को अलग-अलग स्मार्ट कार्ड रखने की जरूरत न पड़े।

प्रस्ताव में कहा गया कि आज भारत का मेट्रो नेटवर्क तेजी से विस्तार कर रहा है। देश के 24 शहरों में लगभग 1,090 किलोमीटर मेट्रो नेटवर्क संचालित है और लगभग इतनी ही लंबाई का नेटवर्क निर्माणाधीन है। वर्ष 2026-27 के बजट में मेट्रो परियोजनाओं के लिए 28,740 करोड़ रुपये का अब तक का सबसे बड़ा प्रावधान किया गया है। लेकिन इस विस्तार के साथ यात्रियों के सामने एक नई समस्या भी खड़ी हो गई है—हर शहर का अलग स्मार्ट कार्ड।

मौजूदा व्यवस्था में यदि किसी यात्री का मेट्रो कार्ड खो जाता है तो उसमें जमा राशि भी अक्सर चली जाती है। अधिकांश प्रणालियों में कार्ड को तुरंत बंद कराने, शेष राशि वापस पाने या उसे दूसरे कार्ड में स्थानांतरित करने की प्रभावी सुविधा उपलब्ध नहीं है। जबकि बैंक कार्ड और एकीकृत भुगतान प्रणाली (यूपीआई) में उपभोक्ता का पैसा खाते से जुड़ा रहता है, मेट्रो में अब भी पैसा प्लास्टिक कार्ड से बंधा हुआ है।

सरकार को सुझाव दिया गया कि नया डिजिटल मेट्रो कार्ड किसी प्लास्टिक कार्ड के बजाय मोबाइल नंबर से जुड़े खाते पर आधारित हो। इससे यात्री का बैलेंस पूरे देश में उपयोग किया जा सकेगा। यदि मोबाइल खो भी जाए तो पंजीकृत नंबर के आधार पर काउंटर से त्वरित क्यूआर टिकट लेकर यात्रा जारी रखी जा सकेगी। प्रस्ताव में दावा किया गया कि एक मेट्रो स्मार्ट कार्ड लगभग 5 ग्राम पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) प्लास्टिक से बनता है और उसमें लगी चिप व एंटीना के कारण उसका पुनर्चक्रण लगभग असंभव होता है। ऐसे कार्ड सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होते। इसलिए हर शहर में लाखों नए प्लास्टिक कार्ड जारी करने के बजाय डिजिटल व्यवस्था अपनाना पर्यावरण के लिए भी बेहतर होगा।

इसके अलावा मेट्रो निगमों को हर वर्ष नए कार्ड खरीदने, वितरित करने, बदलने, रिचार्ज मशीनें चलाने और नकद प्रबंधन पर होने वाला बड़ा खर्च भी कम किया जा सकता है। मौजूदा व्यवस्था में कई मेट्रो प्रणालियों में स्मार्ट कार्ड की सुविधा लेने के लिए सुरक्षा जमा और न्यूनतम राशि रखना जरूरी होता है। प्रस्ताव के अनुसार यदि खाता-आधारित डिजिटल व्यवस्था लागू होती है तो छात्र, दैनिक वेतनभोगी और कम आय वाले यात्री बिना न्यूनतम बैलेंस की बाध्यता के भी समान सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

आगे सरकार की चुनौतियां और इसका असर? ‘वन नेशन, वन डिजिटल मेट्रो कार्ड’ का विचार जितना आसान दिखता है, उसे लागू करना उतना ही जटिल होगा। सबसे पहले देश की सभी मेट्रो कंपनियों—दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, कोच्चि, नागपुर, पुणे, भोपाल, कानपुर, आगरा समेत 24 शहरों को एक साझा तकनीकी मंच पर लाना होगा। फिलहाल अलग-अलग शहर अलग टिकट प्रणाली और अलग भुगतान प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती राजस्व का हिसाब-किताब होगी। यदि कोई यात्री दिल्ली में पैसा जमा कराकर बेंगलुरु या कोच्चि में यात्रा करता है, तो उस किराये का निपटान संबंधित मेट्रो निगमों के बीच तत्काल और सटीक तरीके से करना होगा। इसके लिए एक राष्ट्रीय समाशोधन (क्लियरिंग) प्रणाली विकसित करनी पड़ेगी, ठीक वैसे ही जैसे एकीकृत भुगतान प्रणाली (यूपीआई) विभिन्न बैंकों के बीच लेन-देन का निपटान करती है।

तीसरी चुनौती साइबर सुरक्षा और डेटा संरक्षण की होगी। जब करोड़ों यात्रियों के खाते, यात्रा विवरण और भुगतान एक ही डिजिटल मंच पर जुड़ेंगे, तब मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। /यदि ये चुनौतियां सफलतापूर्वक हल हो जाती हैं, तो भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल हो सकता है जहां सार्वजनिक परिवहन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत डिजिटल टिकट व्यवस्था लागू होगी।