साकेत कोर्ट ने 4 पुलिसकर्मियों को समन करने का आदेश रद्द किया, 21 तस्वीरों और मेडिकल रिपोर्ट पर उठे सवाल

साकेत कोर्ट के फैसले में पुलिसकर्मियों को समन करने के आदेश और मेडिकल सबूतों पर उठे सवाल
साकेत कोर्ट ने तस्वीरों, मेडिकल रिकॉर्ड और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े तथ्यों का मूल्यांकन करते हुए चार पुलिसकर्मियों को समन करने का आदेश रद्द किया। यह प्रतिनिधि तस्वीर है।

पुलिस जिप्सी में 10-12 पुलिसवाले और चार पीड़ित? कोर्ट ने कहानी पर उठाए सवाल

क्या एक पुलिस जिप्सी में 10-12 पुलिसकर्मियों के साथ चार कथित पीड़ित को भी ले जाया जा सकता है? क्या शरीर के अलग-अलग हिस्सों की 21 तस्वीरें महज एक मिनट में खींची जा सकती हैं? और अगर तस्वीर में दिखाई गई चोटें मेडिकल रिपोर्ट से मेल ही न खाएं, तो उस सबूत पर कितना भरोसा किया जा सकता है?

साकेत कोर्ट के एक हालिया फैसले में इन सवालों ने एक 12 साल पुराने मामले की दिशा ही बदल दी। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता की ओर से पेश सामग्री उसकी कहानी पर इतना भरोसा पैदा नहीं करती कि चार पुलिसकर्मियों को आरोपी के तौर पर समन किया जा सके। इसी आधार पर कोर्ट ने चार को समन करने का आदेश रद्द कर दिया।

एडिशनल सेशंस जज सोनू अग्रवाल ने जजमेंट में कहा कि CrPC की धारा 197 या दिल्ली पुलिस एक्ट की धारा 140 के तहत पुलिस अधिकारियों को मिलने वाले प्रोटेक्शन का सवाल तब आएगा, जब शिकायतकर्ता उसकी कहानी पहले इतनी विश्वसनीय हो कि आरोपियों को समन करने का आधार बन सके। इस मामले में कोर्ट को ऐसा भरोसा पैदा नहीं हुआ।

एक जिप्सी में कितने लोग ले जाए गए? कोर्ट ने दावे की व्यवहारिकता पर सवाल उठाया

मामला 24-25 जून 2014 की आधी रात करीब 12.30 बजे का है। शिकायतकर्ता राजबीर सिंह का आरोप था कि तत्कालीन SHO विजय सिंह चंदेल, SI महेश कुमार भार्गव, हेड कांस्टेबल कुलदीप, कांस्टेबल विजय कुमार और 4-5 अन्य पुलिसकर्मी जबरन उसके घर में घुसे।

शिकायत के मुताबिक पुलिसकर्मियों ने घर में तोड़फोड़ की, राजबीर सिंह, उसके भांजे पवन कुमार, चचेरे भाई हेमंत कुमार और नौकर पवन को उठाया और मारपीट करते हुए पुलिस थाने ले गए। आरोप था कि रास्ते में भी राजबीर के साथ मारपीट की गई।

लेकिन कोर्ट ने शिकायतकर्ता और उसके गवाह के इस बयान पर एक बेहद व्यावहारिक सवाल उठाया। गवाही के मुताबिक पुलिसकर्मियों की संख्या 10-12 थी और चार कथित पीड़ितों को भी उसी पुलिस जिप्सी में ले जाया गया था। कोर्ट ने कहा कि एक जिप्सी में 10-12 पुलिसकर्मियों और चार कथित घायलों का एक साथ बैठना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं लगता।

21 तस्वीरें और समय सिर्फ एक मिनट: कोर्ट ने फोटो सबूत पर क्या कहा?

मामले में शिकायतकर्ता ने अपनी चोट की तस्वीरों को भी सबूत के तौर पर पेश किया था। कोर्ट ने इन तस्वीरों की टाइमिंग और उनमें दिखाई गई चोटों की तुलना मेडिकल रिकॉर्ड से की।

23 तस्वीरों में से 21 पर 25 जून 2014 की तारीख और सुबह 3.45 बजे का समय दर्ज था। कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग हिस्सों की 21 तस्वीरें एक ही मिनट में खींचना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

कोर्ट की नजर एक और महत्वपूर्ण अंतर पर गई। तस्वीरों में शिकायतकर्ता के दोनों नितंब, दोनों पैर, दोनों हाथ और गर्दन के दाहिने हिस्से पर चोटें दिखाई गई थीं। इसके विपरीत, 28 जून की मेडिकल रिपोर्ट में चोटें शरीर के बाईं ओर दर्ज थीं। कोर्ट ने दोनों रिकॉर्ड के बीच इस अंतर को भी ध्यान में रखा।

तीन कथित घायलों का मेडिकल रिकॉर्ड नहीं, तस्वीरों का स्रोत भी अस्पष्ट

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता के अलावा उसके जिन तीन साथियों से मारपीट का आरोप था, उनके मेडिकल परीक्षण का कोई रिकॉर्ड अदालत में पेश नहीं किया गया था।

शिकायतकर्ता की तस्वीरों को लेकर भी एक महत्वपूर्ण कमी सामने आई। उसने यह नहीं बताया था कि पुलिस थाने में उसकी तस्वीरें किसने खींचीं। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि उसके भाई को ये तस्वीरें किस मोबाइल नंबर से भेजी गई थीं।

पुलिस की ATR में क्या अलग कहानी सामने आई?

मामले में पुलिस की ओर से पेश Action Taken Report यानी ATR में एक अलग घटनाक्रम सामने आया था। पुलिस के मुताबिक 24 जून की रात एक महिला के साथ मारपीट की PCR कॉल मिली थी। मौके पर पहुंची पुलिस ने राजबीर सिंह को स्थानीय लोगों के साथ झगड़ते हुए पाया।

पुलिस के अनुसार इसी दौरान उसे चोटें आईं और बाद में उसे CrPC की धारा 107/151 के तहत गिरफ्तार किया गया।

ATR में पड़ोसी देविका का बयान भी दर्ज था। उसके मुताबिक राजबीर सिंह किसी रेनू के साथ मारपीट कर रहा था और स्थानीय लोगों ने उसे बचाया था।

शिकायत से समन तक कैसे पहुंचा मामला?

राजबीर सिंह ने 11 जुलाई 2014 को शिकायत और CrPC की धारा 156(3) के तहत आवेदन दाखिल किया था। आवेदन खारिज होने के बाद उसे प्री-समनिंग एविडेंस पेश करने की अनुमति दी गई।

उसने आठ गवाहों को अदालत में पेश किया।

इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 202 के तहत रिपोर्ट मंगाई और 19 अगस्त 2025 को चार पुलिसकर्मियों—विजय सिंह चंदेल, महेश कुमार भार्गव, कुलदीप और विजय कुमार—को IPC की धाराओं 323, 325, 342, 506 और 34 के तहत समन कर लिया।

चार पुलिसकर्मियों ने इस आदेश को सेशंस कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि वे घटना के समय ड्यूटी पर थे और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए कथित कार्यों से जुड़े थे। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की ATR और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य महत्वपूर्ण सामग्री पर पर्याप्त विचार नहीं किया।

आखिर कोर्ट किस नतीजे पर पहुंचा?

सेशंस कोर्ट ने शिकायतकर्ता और उसके गवाहों की गवाही के साथ-साथ मेडिकल रिकॉर्ड, तस्वीरों और पुलिस रिकॉर्ड को भी देखा।

कोर्ट ने विशेष रूप से इन परिस्थितियों को ध्यान में रखा—अन्य कथित घायलों का मेडिकल न होना, तस्वीरों के स्रोत का स्पष्ट न होना, 21 तस्वीरों का एक मिनट में लिया जाना, तस्वीरों में दिखाई गई चोटों और MLC में दर्ज चोटों का मेल न खाना, एक जिप्सी में 10-12 पुलिसकर्मियों और चार कथित घायलों का साथ जाना और शिकायतकर्ता के खिलाफ धारा 107/151 CrPC के तहत पुलिस कार्रवाई।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता का संस्करण पर्याप्त भरोसा पैदा नहीं करता। इसलिए आरोपियों को समन करने का आधार नहीं बनता।

कोर्ट ने 19 अगस्त 2025 का समन आदेश रद्द कर दिया और चार पुलिसकर्मियों की रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली।

फैसले में कोर्ट ने किन मुख्य बिंदुओं पर भरोसा किया?

  • कोर्ट ने माना कि एक जिप्सी में 10-12 पुलिसकर्मियों के साथ चार कथित पीड़ितों का बैठना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था।
  • कोर्ट ने पाया कि एक मिनट में शरीर के अलग-अलग हिस्सों की 21 तस्वीरें खींचा जाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं था।
  • तस्वीरों में दोनों तरफ चोटें दिखीं, जबकि शिकायतकर्ता की MLC में चोटें केवल शरीर के बाईं ओर दर्ज थीं।
  • अन्य तीन कथित पीड़ितों का मेडिकल नहीं कराया गया था, जिससे उनके साथ मारपीट के दावे पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए।