एनएफएचएस-6 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता, हरियाणा-उत्तर प्रदेश समेत कई बड़े राज्यों में सबसे ज्यादा गिरावट; सिक्किम और केरल बने मिसाल
एम. रियाज हाशमी

नई दिल्ली। देश में नवजात शिशुओं को जीवन के पहले छह महीने केवल मां का दूध पिलाने की आदत में चिंताजनक गिरावट दर्ज हुई है। एनएफएचएस-6 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, केवल स्तनपान (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग) की दर एनएफएचएस-5 के 63.7 प्रतिशत से घटकर 55.8 प्रतिशत रह गई है। इसका मतलब है कि अब देश के करीब 44 प्रतिशत शिशुओं को जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल मां का दूध नहीं मिल रहा है, जबकि यही अवधि बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।
सर्वे के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में से 21 में केवल स्तनपान की दर घटी है। सबसे अधिक गिरावट हरियाणा (-28.3 प्रतिशत अंक), उत्तर प्रदेश (-25.1), लद्दाख (-18.8), मध्य प्रदेश (-17.6) और राजस्थान (-16.1) में दर्ज की गई है। ये आंकड़े बताते हैं कि देश के कई बड़े राज्यों में शिशु पोषण की स्थिति पहले की तुलना में कमजोर हुई है। हालांकि, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। कुछ राज्यों ने उल्लेखनीय सुधार भी किया है। सिक्किम में केवल स्तनपान की दर में 21.3 प्रतिशत अंक, केरल में 17.2 प्रतिशत अंक, पुडुचेरी में 8.3 प्रतिशत अंक और गुजरात में 6.4 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इन राज्यों के अनुभव अब दूसरे राज्यों के लिए सीख बन सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जन्म के बाद पहले छह महीने तक केवल मां का दूध शिशु को संक्रमण से बचाने, कुपोषण रोकने, मस्तिष्क के बेहतर विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे मां के स्वास्थ्य को भी लाभ मिलता है और परिवार का स्वास्थ्य खर्च कम होता है।
एनएफएचएस-6 के आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं है। गर्भावस्था के दौरान सही परामर्श, प्रसव के तुरंत बाद स्तनपान में मदद, आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं का सहयोग, कामकाजी महिलाओं के लिए अनुकूल कार्यस्थल और मातृत्व लाभ जैसी व्यवस्थाएं भी उतनी ही जरूरी हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन राज्यों में केवल स्तनपान की दर तेजी से घटी है, वहां इसकी वजह क्या रही और जिन राज्यों ने सुधार किया, उन्होंने ऐसा क्या अलग किया जिसे पूरे देश में लागू किया जा सके।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस गिरावट को समय रहते नहीं रोका गया, तो इसका असर केवल शिशुओं के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में देश की पोषण, स्वास्थ्य और मानव संसाधन क्षमता पर भी पड़ सकता है। इसलिए केवल स्तनपान को बढ़ावा देना अब सिर्फ मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं, बल्कि देश के भविष्य में निवेश का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
