DUSU Election 2026: ABVP की 3 पदों पर जीत, NSUI ने आखिरी राउंड तक दी कांटे की टक्कर; पढ़िए सुबह से शाम तक बदलती तस्वीर

DUSU Election 2026: ABVP की 3 पदों पर जीत, NSUI ने आखिरी राउंड तक दी कांटे की टक्कर; पढ़िए सुबह से शाम तक बदलती तस्वीर — अध्यक्ष पद पर यश डबास ने विजय शंकर मीणा को 2,053 वोट से हराया; 9वें और 14वें राउंड में अंतर सिर्फ 1 वोट; 11वें राउंड में NSUI 647 वोट आगे; उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय दीपांशु शौकीन की जीत, ABVP के ईशू मौर्य दूसरे; सचिव रिया छावड़ी, संयुक्त सचिव लक्ष्य राज सिंह विजयी; हॉस्टल, सुरक्षा, सोशल मीडिया कैंपेन रहे प्रमुख मुद्दे
DUSU Election 2026 में ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पद जीते, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीता। अध्यक्ष पद की काउंटिंग में 9वें और 14वें राउंड में अंतर सिर्फ 1 वोट रहा। 11वें राउंड में NSUI 647 वोट आगे थी। अंतिम परिणाम में ABVP 3, निर्दलीय 1, NSUI 0 पद।

रुखसार, तहलका

नई दिल्ली। 19 सितंबर, 2026 । दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी DUSU Election 2026 का नतीजा सामने आ चुका है। चार केंद्रीय पदों की इस पूरी चुनावी जंग में ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—तीन पदों पर जीत दर्ज की, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार और पूर्व NSUI सदस्य दीपांशु शौकीन के खाते में गया। अध्यक्ष पद पर ABVP के यश डबास ने NSUI के विजय शंकर मीणा को 2,053 वोटों से हराया। सचिव पद पर रिया छावड़ी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्य राज सिंह ने जीत दर्ज की। लेकिन इन नतीजों की कहानी सिर्फ तीन सीटों की जीत और एक सीट की हार तक सीमित नहीं है। इस चुनाव की असली कहानी उस कांटे की टक्कर में छिपी है, जिसमें अध्यक्ष पद की काउंटिंग के दौरान बढ़त बार-बार बदली और एक वक्त NSUI उम्मीदवार महज एक वोट से आगे था।

सुबह 8 बजे शुरू हुई गिनती, पहले राउंड में ABVP आगे

19 सितंबर की सुबह करीब 8 बजे नॉर्थ कैंपस स्थित यूनिवर्सिटी स्पोर्ट्स स्टेडियम के मल्टीपर्पज हॉल में वोटों की गिनती शुरू हुई। शुरुआत में तस्वीर ABVP के पक्ष में दिखी। शुरुआती रुझानों में यश डबास ने अध्यक्ष पद पर बढ़त बनाई और पहले राउंड में उनके खाते में 1,305 वोट आए।

लेकिन जैसे-जैसे ईवीएम (EVM) खुलती गईं, मुकाबला सीधा नहीं रहा।

तीसरे राउंड तक NSUI के विजय शंकर मीणा ने अध्यक्ष पद पर बढ़त बना ली। चौथे राउंड में भी NSUI आगे रही। यानी सुबह के शुरुआती रुझानों में ही यह साफ हो गया था कि अध्यक्ष पद पर मुकाबला एकतरफा नहीं रहने वाला।

और फिर आया वो दौर, जिसने इस चुनाव को रोमांचक बना दिया।

12 बजे के आसपास बदली कहानी, कभी ABVP आगे तो कभी NSUI

छठे राउंड तक यश डबास 7,346 वोट के साथ विजय शंकर मीणा के 6,760 वोटों से आगे थे। लेकिन सातवें और आठवें राउंड में भी ABVP ने अपनी बढ़त बनाए रखी। आठवें राउंड में यश डबास 9,827 वोट पर थे, जबकि विजय मीणा के 9,490 वोट थे यानी अंतर 337 वोट का था।

लेकिन इसके बाद मुकाबले ने अचानक करवट ली।

नौवें राउंड में NSUI ने सिर्फ बढ़त ही नहीं बनाई, बल्कि अंतर घटकर महज एक वोट रह गया।

विजय शंकर मीणा — 10,888 वोट
यश डबास — 10,887 वोट

यानी उस वक्त अगर एक वोट दूसरी तरफ जाता, तो तस्वीर फिर बदल जाती।

क्रिकेट की भाषा में कहें तो यह मुकाबला उस मैच जैसा हो चुका था, जिसमें आखिरी गेंद तक नतीजा तय नहीं होता।

11वें राउंड में NSUI 647 वोट आगे, 12वें में भी बढ़त कायम

नौवें राउंड की एक वोट वाली बढ़त के बाद NSUI ने 11वें राउंड तक अपनी बढ़त 647 वोट कर ली।

विजय शंकर मीणा — 13,424
यश डबास — 12,777

12वें राउंड में भी NSUI आगे रही और अंतर 424 वोट था। 13वें राउंड में विजय मीणा की बढ़त फिर 293 वोट रही।

यानी दोपहर तक अध्यक्ष पद का मुकाबला लगातार NSUI और ABVP के बीच झूल रहा था।

2 बजे के आसपास फिर पलटा पासा

13वें राउंड के बाद तस्वीर NSUI के पक्ष में थी, लेकिन इसके बाद ABVP ने वापसी शुरू की।

14वें राउंड में NSUI की बढ़त फिर घटकर सिर्फ एक वोट रह गई—

विजय शंकर मीणा — 16,107
यश डबास — 16,106

कुछ ही राउंड पहले 293 वोट से आगे चल रही NSUI अब सिर्फ एक वोट से आगे थी।

फिर 15वें राउंड में यश डबास ने बढ़त हासिल की और 16वें राउंड तक उनका अंतर 79 वोट हो गया।

16वें राउंड के बाद:

यश डबास — 18,786
विजय शंकर मीणा — 18,707

यहां तक पहुंचते-पहुंचते मुकाबला फिर ABVP के पक्ष में झुक चुका था, लेकिन अंतर इतना कम था कि नतीजे को लेकर रोमांच बना रहा।

शाम 3:45 बजे तक तस्वीर बदल चुकी थी

18वें राउंड तक यश डबास की बढ़त 555 वोट हो चुकी थी।

यश डबास — 21,109
विजय शंकर मीणा — 20,554

यानी सुबह जिस मुकाबले में कभी NSUI एक वोट से आगे थी, वही मुकाबला 18वें राउंड तक ABVP के पक्ष में 555 वोट की बढ़त में बदल चुका था।

इसके बाद आखिरी दो राउंड की गिनती ने अंतिम तस्वीर साफ कर दी।

20 राउंड के बाद आया फाइनल फैसला

करीब 20 राउंड की काउंटिंग पूरी होने के बाद आखिरकार यश डबास ने अध्यक्ष पद जीत लिया।

उन्हें 24,576 वोट मिले, जबकि NSUI के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। जीत का अंतर रहा 2,053 वोट।

यानी जिस मुकाबले में एक वक्त सिर्फ एक वोट का फासला था, उसका अंतिम अंतर 2,053 वोट तक पहुंच गया।

बाकी तीन पदों पर क्या हुआ?

अध्यक्ष पद की यह नजदीकी लड़ाई चुनाव की सबसे बड़ी कहानी रही, लेकिन बाकी तीन केंद्रीय पदों पर तस्वीर अलग रही।

सचिव पद पर ABVP की रिया छावड़ी ने 21,650 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी NSUI की नम्रता चौधरी को 14,869 वोट मिले। यानी रिया ने 6,781 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।

वहीं संयुक्त सचिव पद पर ABVP के लक्ष्य राज सिंह विजयी रहे। उन्हें 16,615 वोट मिले।

और उपाध्यक्ष पद ने पूरे चुनाव का समीकरण ही बदल दिया। यहां निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल कर ABVP के ईशू मौर्य को पीछे छोड़ दिया। ईशू मौर्य को 16,910 वोट मिले, जबकि NSUI के वीर चतरथ 4,313 वोट के साथ पीछे रहे।

इस तरह फाइनल तस्वीर बनी—ABVP के तीन पद, निर्दलीय के खाते में एक पद और NSUI खाली हाथ।

ABVP क्यों जीत सकी? कैंपस से सोशल मीडिया तक बना चुनावी नेटवर्क

ABVP की जीत को सिर्फ अंतिम वोटों के आंकड़ों से समझना पूरी तस्वीर नहीं देता। चुनाव से पहले की कैंपेनिंग और कैंपस के मुद्दों को देखें तो कुछ फैक्टर लगातार दिखाई देते हैं।

हॉस्टल और छात्र सुरक्षा पर फोकस
इस साल दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में हॉस्टल और सुरक्षित आवास बड़ा मुद्दा रहा। सत्य निकेतन में पीजी (PG) बिल्डिंग हादसे के बाद छात्र आवास और सुरक्षा का सवाल चुनावी बहस के केंद्र में आया। ABVP ने अपने अभियान में ‘आवास’ को प्रमुखता दी और लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल, स्टूडेंट हाउसिंग सेल (Student Housing Cell), हेल्पलाइन और फायर-सेफ्टी ऑडिट (Fire Safety Audit) जैसे प्रस्ताव रखे।

ग्राउंड कैंपेन के साथ डिजिटल पहुंच
इस चुनाव में राजनीति सिर्फ कॉलेज कैंपस तक सीमित नहीं रही। इंस्टाग्राम (Instagram) रील्स, कैंपेन वीडियो और सोशल मीडिया नैरेटिव ने भी बड़ी भूमिका निभाई। ABVP का “DU Bole Dil Se, ABVP Fir Se” वीडियो कैंपेन इसी डिजिटल रणनीति का हिस्सा था।

कॉलेज स्तर पर संगठन की मौजूदगी
केंद्रीय नतीजों से पहले कई कॉलेज यूनियन चुनावों में भी ABVP ने प्रदर्शन किया। SRCC, Aditi Mahavidyalaya और Bharti College जैसे कॉलेजों में संगठन ने प्रमुख पदों पर जीत दर्ज की। इससे कैंपस के अलग-अलग हिस्सों में उसके संगठनात्मक नेटवर्क की मौजूदगी का संकेत मिला।

इसलिए उपलब्ध चुनावी कवरेज को देखें तो ग्राउंड नेटवर्क, मुद्दा-आधारित कैंपेन और डिजिटल आउटरीच (Outreach) ABVP के अभियान के प्रमुख हिस्से रहे। हालांकि, इन सभी में से किसी एक फैक्टर को अंतिम जीत का अकेला कारण बताना संभव नहीं है।

NSUI की हार के बीच सबसे बड़ी कहानी—मुकाबला कितना करीब था?

NSUI चारों केंद्रीय पदों में से एक भी सीट नहीं जीत सकी। लेकिन अध्यक्ष पद की काउंटिंग को देखें तो कहानी अलग नजर आती है।

एक तरफ फाइनल रिजल्ट में NSUI 2,053 वोट से पीछे रही, दूसरी तरफ उसी उम्मीदवार ने कुछ घंटों पहले ABVP उम्मीदवार को एक वोट से पीछे छोड़ा था।

नौवें राउंड में अंतर—1 वोट
11वें राउंड में—647 वोट NSUI के पक्ष में
13वें राउंड में—293 वोट NSUI के पक्ष में
14वें राउंड में—फिर सिर्फ 1 वोट
16वें राउंड में—79 वोट ABVP के पक्ष में
18वें राउंड में—555 वोट ABVP के पक्ष में
फाइनल—2,053 वोट ABVP के पक्ष में।

यानी अगर इस मुकाबले को क्रिकेट की भाषा में समझें, तो यह ऐसा मैच था जिसमें स्कोरबोर्ड लगातार बदलता रहा और आखिरी हिस्से तक मैच हाथ से निकलता-दिखता और वापस आता रहा।

NSUI का कैंपेन भी कई सीधे छात्र मुद्दों पर केंद्रित था।

उसके “Accountable DU, Accountable DUSU” घोषणापत्र में अफोर्डेबल हाउसिंग (Affordable Housing), सस्ता मेट्रो कन्सेशन (Metro Concession), 24×7 लाइब्रेरी, सब्सिडाइज्ड कैंटीन (Subsidised Canteen), बेहतर वाई-फाई (Wi-Fi), साफ पानी, मेंस्ट्रुअल लीव (Menstrual Leave), मेंटल-हेल्थ सपोर्ट (Mental Health Support) और अकादमिक सुधार जैसे मुद्दे शामिल थे।

छात्र आवास, रोजगार, पेपर लीक (Paper Leak), कैंपस सुरक्षा और विश्वविद्यालय में जवाबदेही जैसे मुद्दों ने भी कैंपेन नैरेटिव में जगह बनाई।

यानी NSUI ने जिस मुद्दा-आधारित कैंपेन को आगे बढ़ाया, उसके कुछ हिस्से सीधे उन समस्याओं से जुड़े थे जिन पर चुनाव के दौरान छात्रों के बीच चर्चा हो रही थी।

‘छात्रों की गूंज’, राहुल गांधी और यूथ कांग्रेस की कैंपेनिंग

NSUI कांग्रेस से संबद्ध छात्र संगठन है। इस चुनाव के दौरान कांग्रेस की व्यापक युवा पहुंच भी उसके राजनीतिक कम्युनिकेशन का हिस्सा रही।

NSUI की ओर से ‘छात्रों की गूंज’ अभियान को छात्रों की शिक्षा, रोजगार और छात्र अधिकारों से जुड़े मुद्दों के साथ जोड़ा गया। राहुल गांधी ने जून 2026 में इस अभियान को शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के लिए छात्रों की आवाज से जोड़कर पेश किया था।

इसके साथ ही कांग्रेस से जुड़े युवा संगठन और कार्यकर्ता भी छात्र राजनीति में आउटरीच (Outreach) और मोबिलाइजेशन (Mobilisation) में सक्रिय रहे। हालांकि, उपलब्ध स्वतंत्र रिपोर्टिंग के आधार पर यह कहना कि राहुल गांधी, दिल्ली यूथ कांग्रेस और NSUI के संयुक्त प्रयास ही अध्यक्ष पद की करीबी लड़ाई का कारण बने, सीधे तौर पर स्थापित तथ्य नहीं है।

इतना जरूर है कि NSUI ने छात्र मुद्दों, युवा आउटरीच और डिजिटल कम्युनिकेशन को अपने कैंपेन में एक साथ इस्तेमाल किया और इसका असर कम से कम अध्यक्ष पद की करीबी लड़ाई में दिखाई दिया—हालांकि वोटिंग के आधार पर किसी एक कैंपेन एलिमेंट के प्रभाव को अलग से मापना संभव नहीं है।

Gen Z के लिए बदल गया DUSU का चुनावी मैदान

DUSU 2026 का एक बड़ा बदलाव चुनाव प्रचार के तरीके में भी दिखा।

कैंपस में पर्चे, नारे, पोस्टर, जुलूस और आमने-सामने की कैंपेनिंग जारी रही, लेकिन साथ ही इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो, कैंपेन सॉन्ग और वायरल कंटेंट ने भी जगह बना ली।

इंडियन एक्सप्रेस की चुनावी रिपोर्टिंग में भी इस बदलाव को रेखांकित किया गया—एक तरफ जमीन पर पर्चे और नारे थे, तो दूसरी तरफ छात्रों की मोबाइल स्क्रीन पर रील्स, फॉलोअर्स और भावनात्मक नैरेटिव चुनावी पहुंच का नया मैदान बन रहे थे।

यानी DUSU की राजनीति अब सिर्फ “कौन कैंपस में कितना दिखा?” तक सीमित नहीं रही; सवाल यह भी बन गया कि “कौन डिजिटल स्क्रीन पर कितनी तेजी से पहुंचा?”

दीपांशु शौकीन ने दोनों बड़े संगठनों के बीच तीसरी तस्वीर दिखाई

अगर अध्यक्ष पद ABVP और NSUI की कांटे की लड़ाई की कहानी है, तो उपाध्यक्ष पद का नतीजा बिल्कुल अलग कहानी कहता है।

पूर्व NSUI सदस्य रहे निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट लेकर उपाध्यक्ष पद जीत लिया। ABVP के ईशू मौर्य 16,910 वोट के साथ दूसरे और NSUI के वीर चतरथ 4,313 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे।

यानी एक तरफ जहां ABVP और NSUI चार केंद्रीय पदों पर मुख्य मुकाबले में थीं, वहीं एक निर्दलीय उम्मीदवार ने उपाध्यक्ष पद पर दोनों संगठनों को पीछे छोड़ दिया।

यह नतीजा DUSU की राजनीति में व्यक्तिगत उम्मीदवार की पकड़ और संगठन से बाहर जाकर चुनाव लड़ने की क्षमता को भी चर्चा में लाता है।

तो क्या NSUI के लिए यह सिर्फ हार है या आगे की चुनौती का संकेत?

फाइनल आंकड़ा साफ है—NSUI चारों केंद्रीय पद हार गई। इसलिए संगठन के लिए कॉलेज-स्तरीय नेटवर्क, उम्मीदवार चयन, ग्राउंड मोबिलाइजेशन और कैंपेन रणनीति की समीक्षा महत्वपूर्ण होगी।

लेकिन दूसरी तरफ अध्यक्ष पद के आंकड़े यह भी बताते हैं कि मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं था।

जिस उम्मीदवार के खिलाफ NSUI के विजय शंकर मीणा अंततः 2,053 वोट से हारे, वही उम्मीदवार दिन के बीच में कभी एक वोट से पीछे, कभी 647 वोट से पीछे और फिर दोबारा बढ़त में आया।

इसलिए DUSU 2026 को दो आंकड़ों में पढ़ा जा सकता है—

सीटों की तस्वीर: ABVP 3, निर्दलीय 1, NSUI 0।
अध्यक्ष पद की लड़ाई: NSUI और ABVP के बीच बेहद करीबी उतार-चढ़ाव के बाद ABVP की जीत।

यही वह जगह है जहां आने वाले समय में NSUI के लिए असली सवाल होगा कि करीबी प्रेसिडेंशियल कॉन्टेस्ट को वह स्थायी कॉलेज नेटवर्क और लगातार छात्र आउटरीच में बदल पाती है या नहीं।

अंतिम तस्वीर: ABVP की पकड़ बनी, लेकिन मुकाबला भी दिखाई दिया

DUSU Election 2026 का फाइनल रिजल्ट ABVP के पक्ष में गया। यश डबास अध्यक्ष, रिया छावड़ी सचिव और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव बने, जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीता।

लेकिन इस चुनाव को सिर्फ “ABVP की तीन सीटों की जीत” कह देना पूरी कहानी नहीं होगी।

क्योंकि सुबह 8 बजे शुरू हुई काउंटिंग से लेकर शाम तक अध्यक्ष पद का मुकाबला कई बार पलटा। कभी ABVP आगे रही, कभी NSUI। कभी अंतर 647 वोट हुआ, कभी 293, फिर सिर्फ एक वोट, फिर ABVP की 79 वोट की बढ़त और आखिरकार 20 राउंड के बाद 2,053 वोट का फैसला।

यही DUSU 2026 की सबसे बड़ी कहानी है—नतीजा ABVP के पक्ष में आया, लेकिन इस बार कैंपस ने यह भी दिखाया कि मुकाबला कितना करीब पहुंच सकता है।

DUSU 2026 का अंतिम स्कोर

अध्यक्ष: यश डबास — ABVP — 24,576 वोट
उपाध्यक्ष: दीपांशु शौकीन — निर्दलीय — 30,615 वोट
सचिव: रिया छावड़ी — ABVP — 21,650 वोट
संयुक्त सचिव: लक्ष्य राज सिंह — ABVP — 16,615 वोट

अंतिम स्थिति: ABVP — 3 पद | निर्दलीय — 1 पद | NSUI — 0 पद।

ABVP बनाम NSUI की इस चुनावी जंग में जीत-हार तो तय हो गई, लेकिन सवाल समाज से है—क्या ऐसी छात्र राजनीति युवाओं के भविष्य को मजबूत कर रही है, या फिर समाज को एक ऐसी राजनीतिक पीढ़ी दे रही है जो मुद्दों से ज्यादा सत्ता की लड़ाई में उलझ रही है?