₹22,006 करोड़ के विपरीत सुभाष चंद्रा के ₹6.25 करोड़ के भुगतान पर NCLT ने लगाई रोक

NCLT ने सुभाष चंद्रा की ₹6.25 करोड़ भुगतान योजना पर लगाई रोक
जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में NCLT ने ₹6.25 करोड़ की भुगतान योजना पर रोक लगा दी है।

तीन अलग-अलग राय के बाद बनी पांच सदस्यीय विशेष पीठ; संपत्तियां बेचने या हस्तांतरित करने पर भी रोक, अब मामले की नए सिरे से सुनवाई

तहलका वेब ब्यूरो। नई दिल्ली

जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया उस समय फिर कानूनी उलझन में फंस गई है, जब नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने उन्हें ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले महज ₹6.25 करोड़ का भुगतान कर मामले को निपटाने की अनुमति देने वाले अपने 25 अगस्त के आदेश पर रोक लगा दी। पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने मंगलवार को न केवल उस आदेश के अमल पर रोक लगाई, बल्कि चंद्रा को अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बेचने या हस्तांतरित करने से भी रोक दिया।

तीन अलग-अलग राय के बीच फंसा मामला

इस पूरे घटनाक्रम की खासियत यह है कि मामला किसी एक स्पष्ट न्यायिक निष्कर्ष तक पहुंचने के बजाय तीन अलग-अलग राय के बीच फंस गया। NCLT की शुरुआती दो सदस्यीय पीठ के दोनों सदस्यों की राय अलग थी। इसके बाद मामला तीसरे सदस्य के पास गया। तीसरे सदस्य ने 25 अगस्त को ₹6.25 करोड़ की पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी, लेकिन बाद में मूल पीठ ने पाया कि इन तीन राय से भी कोई ऐसा स्पष्ट बहुमत नहीं बन रहा था, जिसे लागू किया जा सके। यही वजह बनी कि NCLT के अध्यक्ष ने पांच सदस्यीय विशेष पीठ का गठन किया।

₹6.25 करोड़ की योजना ने क्यों बड़ा सवाल खड़ा किया?

चंद्रा की प्रस्तावित योजना के तहत लेनदारों को ₹6.25 करोड़ देने की पेशकश की गई थी, जबकि उनके खिलाफ स्वीकार किए गए दावों का कुल मूल्य ₹22,006.57 करोड़ था। इसके अलावा दिवालिया प्रक्रिया की लागत के लिए ₹25 लाख अलग रखे गए थे। यानी प्रस्तावित भुगतान स्वीकृत दावों का बेहद छोटा हिस्सा था। इसी वजह से यह योजना शुरू से ही असाधारण वित्तीय अंतर के कारण चर्चा में रही। यदि योजना लागू हो जाती, तो चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया बेहद कम भुगतान के साथ समाप्त होने का रास्ता खुल सकता था।

लेकिन अब 25 अगस्त का आदेश प्रभावी नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि योजना अंतिम रूप से खारिज हो गई है। विशेष पीठ अब यह तय करेगी कि इसे किस रूप में और किन शर्तों के साथ मंजूरी दी जा सकती है या इसे अस्वीकार किया जाना चाहिए।

असली कानूनी पेच: तीन राय, लेकिन बहुमत कहां?

मामले की शुरुआत दो सदस्यीय NCLT पीठ से हुई। एक सदस्य ने योजना को केवल उन लेनदारों तक सीमित रखने का पक्ष लिया, जिन्होंने इसका समर्थन किया था। उनके अनुसार असहमत लेनदार जिनमें बैंक और वित्तीय संस्थान भी शामिल थे- अपनी वसूली के लिए स्वतंत्र कानूनी उपाय अपना सकते थे। दूसरे सदस्य ने योजना को ही खारिज कर दिया। इसके पीछे मुख्य वजह Resolution Professional द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में गंभीर खामियां मानी गईं।

दोनों की असहमति के कारण मामला Companies Act, 2013 की धारा 419(5) के तहत तीसरे सदस्य के पास भेजा गया। तीसरे सदस्य ने 25 अगस्त को इसके विपरीत योजना को मंजूरी दे दी। हालांकि, उन्होंने अनिल कुमार के माध्यम से 960 लोगों और सुनील जैन के माध्यम से 300 लोगों की ओर से दाखिल दावों को योजना से बाहर रखा। इन दावों के लिए निर्धारित राशि को अन्य पात्र लेनदारों में पुनर्वितरित करने का निर्देश दिया गया।

उन्होंने यह भी माना कि आईबीसी की धारा 115 के तहत स्वीकृत योजना उन सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिन्होंने इसके खिलाफ मतदान किया था।

मामला फिर मूल दो सदस्यीय पीठ के पास लौटा। 31 अगस्त को इस पीठ ने माना कि तीनों राय के बावजूद कोई स्पष्ट बहुमत नहीं बना है- क्योंकि एक सदस्य योजना के खिलाफ था, दूसरे ने इसे केवल समर्थक लेनदारों तक सीमित करने की बात कही थी और तीसरे ने इसे सभी लेनदारों पर बाध्यकारी मानते हुए मंजूरी दी थी। यही तकनीकी और कानूनी स्थिति अब पांच सदस्यीय विशेष पीठ के सामने है।

₹22,006 करोड़ का दावा आखिर किस बात का है?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। ₹22,006.57 करोड़ का आंकड़ा यह नहीं बताता कि सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत रूप से बैंकों से ₹22,000 करोड़ उधार लिया था। यह रकम उन व्यक्तिगत गारंटियों से जुड़े दावों की है, जो चंद्रा ने एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज के लिए दी थीं। यानी मूल कर्ज कंपनियों ने लिया था, लेकिन चंद्रा ने उन उधारों के लिए व्यक्तिगत गारंटर के रूप में अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की थी।

चंद्रा पहले भी इस अंतर को स्पष्ट कर चुके हैं। उनके कार्यालय की ओर से कहा गया था कि उनकी व्यक्तिगत गारंटियों का कुल मूल्य लगभग ₹22,000 करोड़ था, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि इतनी रकम उन्होंने स्वयं उधार ली थी। यही अंतर इस मामले को समझने के लिए केंद्रीय है- कॉरपोरेट कर्ज और व्यक्तिगत गारंटी के बीच का अंतर।

2019 के संकट से जुड़ी है पूरी कहानी

चंद्रा का पक्ष रहा है कि 2019 में एस्सेल ग्रुप के वित्तीय संकट के समय समूह की देनदारियां करीब ₹45,000 करोड़ थीं। उनका दावा है कि इसके बाद लगभग ₹43,000 करोड़ की देनदारियां चुकाई जा चुकी हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि परिवार की संपत्तियों, यहां तक कि उनके घर, को बेचकर भी कर्ज चुकाने के प्रयास किए गए। हालांकि, व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में NCLT के सामने सवाल केवल यह नहीं है कि समूह ने कितना कर्ज चुकाया। मुख्य प्रश्न यह है कि व्यक्तिगत गारंटर के रूप में चंद्रा के खिलाफ स्वीकार किए गए दावों का निपटारा किस कानूनी ढांचे और कितनी राशि में किया जा सकता है।

इस प्रकरण में अब आगे क्या?

पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर दिया है और मामले की नए सिरे से सुनवाई का फैसला किया है। फिलहाल ₹6.25 करोड़ की भुगतान योजना पर अमल नहीं हो सकता और चंद्रा अपनी संपत्तियों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अलग नहीं कर सकते।

इसलिए 25 अगस्त का आदेश चंद्रा की दिवालिया प्रक्रिया का अंतिम पड़ाव साबित नहीं हुआ है। इसके बजाय उसने एक और बड़ा कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है- जब स्वीकार किए गए दावे ₹22,000 करोड़ से अधिक हों, तो क्या ₹6.25 करोड़ की योजना को कानूनी रूप से सभी लेनदारों पर बाध्यकारी बनाया जा सकता है? अब पांच सदस्यीय विशेष पीठ की सुनवाई इस सवाल का अगला निर्णायक चरण होगी।