
बदली डिजिटल रणनीतिः पुलवामा में 40 से ज्यादा वर्चुअल सिम से शुरू हुई कहानी गेमिंग चैट और एन्क्रिप्टेड ऐप से होते हुए अब पोर्न वेबसाइटों के चैट तक पहुंची; ताकि निगरानी से बचकर संपर्क होता रहे
एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली
जम्मू-कश्मीर में आतंकी नेटवर्क के डिजिटल संपर्क को लेकर सुरक्षा एजेंसियों के सामने फिर एक नया तरीका सामने आया है। उच्च पदस्थ सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, आतंकी हैंडलर अब पोर्न वेबसाइटों के चैटिंग रूम, गुमनाम मैसेजिंग सर्विस और कुछ विशेष रूप से सुरक्षित ऐप्स का इस्तेमाल संपर्क के लिए कर रहे हैं। इन माध्यमों के जरिये घाटी में संभावित युवाओं तक पहुंचने और उनसे संपर्क बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, कुछ पोर्न वेबसाइटों पर सीधे बातचीत की सुविधा मौजूद है। जांच एजेंसियों को जानकारी मिली है कि आतंकी हैंडलर इसी सुविधा का इस्तेमाल संभावित भर्तियों से संपर्क के लिए कर रहे हैं। ताजा जानकारी में कुछ ऐसे विशेष संदेश ऐप भी सामने आए हैं जिनमें बातचीत को गोपनीय रखने की सुविधाएं मौजूद हैं। सुरक्षा एजेंसियां ऐसे माध्यमों की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं।
पोर्न साइटों के चैटिंग रूम भी जांच के दायरे में
उच्च पदस्थ सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, जांच के दौरान ऐसे पोर्न प्लेटफॉर्म की जानकारी मिली है जिनमें लाइव बातचीत की सुविधा उपलब्ध है। इन वेबसाइटों पर यह सुविधा सामान्य तौर पर उपयोगकर्ताओं को एक-दूसरे से संपर्क कराने के लिए होती है। आतंकी हैंडलर इसी सुविधा का इस्तेमाल संभावित युवाओं से संपर्क के लिए कर रहे हैं। इन वेबसाइटों और कुछ अन्य डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध गोपनीयता से जुड़ी सुविधाओं के कारण सुरक्षा एजेंसियां इनकी गतिविधियों पर नजर रख रही हैं।
इससे पहले गेमिंग ऐप की चैट थी संपर्क का सोर्स
जुलाई 2025 में सुरक्षा अधिकारियों ने बताया था कि ऑनलाइन युद्ध वाले गेम्स की चैट सुविधा का इस्तेमाल आतंकी संगठन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई जम्मू-कश्मीर में संभावित भर्तियों से संपर्क के लिए कर रहे थे। उस समय सुरक्षा एजेंसियों ने चार ऐसे मामलों की पहचान किए जाने की जानकारी दी थी। इनमें एक नाबालिग भी शामिल था। अधिकारियों के मुताबिक, सीमा पार मौजूद उसका गेमिंग साथी उसे कट्टरपंथ की ओर प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था। बाद में उसे परिवार को सौंपे जाने की जानकारी दी गई थी। इन गेमिंग ऐप में बातचीत की सुविधा का इस्तेमाल खेल के अलावा दूसरे उद्देश्यों के लिए भी किया जा रहा था।
एन्क्रिप्टेड ऐप के दुरुपयोग में 10 लोग पकड़े जा चुके
जुलाई 2025 में जम्मू-कश्मीर पुलिस की काउंटर-इंटेलिजेंस शाखा की कार्रवाई भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। पुलिस ने घाटी में अलग-अलग स्थानों पर तलाशी के बाद 10 लोगों को हिरासत में लिया था। अधिकारियों के मुताबिक, इन लोगों पर एन्क्रिप्टेड संदेश ऐप के जरिये पाकिस्तान स्थित हैंडलरों के संपर्क में रहने और आतंकी गतिविधियों में मदद का आरोप था। तलाशी के दौरान डिजिटल उपकरण और अन्य साक्ष्य जब्त किए जाने की भी जानकारी दी गई थी। यह मामला गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए के तहत दर्ज मामले से जुड़ा बताया गया था।
पुलवामा में सामने आया था वर्चुअल सिम का इस्तेमाल
इस सिलसिले की एक पुरानी महत्वपूर्ण कड़ी 2019 के पुलवामा आतंकी हमले की जांच तक जाती है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की जांच के हवाले से 2020 में बताया गया था कि पुलवामा हमले से जुड़े नेटवर्क में 40 से ज्यादा वर्चुअल सिम का इस्तेमाल हुआ था। हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों की मौत हुई थी। वर्चुअल सिम ऐसी मोबाइल नंबर सेवा है जिसमें पारंपरिक भौतिक सिम कार्ड की जरूरत नहीं होती। उस समय अधिकारियों ने इसे सीमा पार मौजूद आतंकियों और उनके संपर्कों के बीच संचार का एक नया माध्यम बताया था।
सात साल में सामने आए अलग-अलग डिजिटल माध्यम
2019 के वर्चुअल सिम, 2025 के गेमिंग चैट और एन्क्रिप्टेड संदेश ऐप तथा अब 2026 में पोर्न वेबसाइटों के चैट से जुड़े ताजा दावे- इन सभी मामलों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए इन्हें एक ही आतंकी संगठन की लगातार बदलती रणनीति के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। लेकिन उच्च पदस्थ सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, आतंकवाद से जुड़ी जांच में ऐसे अलग-अलग डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल सामने आता रहा है, जिनसे सामान्य संचार माध्यमों की तुलना में निगरानी और पहचान से जुड़ी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
टोर आधारित ऐप भी सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर
ताजा जानकारी में टोर आधारित संदेश ऐप का भी उल्लेख है। टोर (इंटरनेट पर उपयोगकर्ता की पहचान और इंटरनेट संपर्क के रास्ते को अधिक गोपनीय रखने वाली व्यवस्था) का इस्तेमाल गोपनीयता और सेंसरशिप से बचने जैसे वैध उद्देश्यों के लिए भी होता है। इसलिए केवल टोर का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को संदिग्ध नहीं बनाता। सूत्रों के मुताबिक, जांच में कुछ टोर आधारित संदेश ऐप और दूसरे गोपनीयता-केंद्रित माध्यमों की जानकारी सामने आई है। कुछ ऐसे ऐप की भी जानकारी सामने आई है जिनमें पारंपरिक मोबाइल नंबर या ईमेल के बिना पंजीकरण की सुविधा होने का दावा किया गया है। इस तरह के मामलों में सुरक्षा एजेंसियों को डिजिटल गतिविधि को वास्तविक व्यक्ति से जोड़ने के लिए दूसरे साक्ष्यों पर निर्भर करना पड़ सकता है।
धीमे इंटरनेट पर काम करने वाले ऐप की भी जानकारी
सूत्रों के मुताबिक, घाटी में कुछ ऐसे संदेश ऐप के इस्तेमाल की भी जानकारी मिली है जो धीमे इंटरनेट पर काम कर सकते हैं। इससे जुड़े तकनीकी विवरण सार्वजनिक करना जरूरी नहीं है। सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण बात यह है कि एजेंसियां अलग-अलग तरह के डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल की जानकारी जुटा रही हैं। यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि एन्क्रिप्शन, टोर या वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल अपने आप में किसी व्यक्ति को आतंकी या संदिग्ध नहीं बनाता। इनका वैध इस्तेमाल भी होता है। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की चिंता उन मामलों को लेकर है जहां जांच में इन तकनीकों या माध्यमों का संबंध कथित तौर पर आतंकी संपर्क, भर्ती या दूसरी गैरकानूनी गतिविधियों से सामने आता है।



