
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट का बड़ा फैसला; अदालत ने पटना की 358 डिसमिल जमीन को ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ माना, 44.75 करोड़ रुपये की संपत्ति पहले ही हो चुकी है अटैच
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
आईआरसीटीसी होटल मनी लॉन्ड्रिंग मामले में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने गुरुवार को बड़ा आदेश सुनाया। विशेष अदालत ने पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और तेजस्वी प्रसाद यादव समेत नौ आरोपियों के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट की धारा 3 के साथ धारा 4 के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया है। अदालत ने साथ ही सात आरोपियों को मामले में डिस्चार्ज कर दिया है। इस आदेश में अदालत ने साफ कहा कि पटना की वह जमीन, जिसे ईडी ने अपराध से अर्जित संपत्ति यानी ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ बताया है, कथित मनी लॉन्ड्रिंग की पूरी कड़ी का केंद्रीय हिस्सा है।
जिन नौ आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने का आदेश दिया गया है, उनमें लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी प्रसाद यादव, प्रेम चंद गुप्ता, सरला गुप्ता, विनय कोचर, विजय कोचर, सुजाता होटल्स प्राइवेट लिमिटेड और लारा प्रोजेक्ट्स एलएलपी शामिल हैं। लारा प्रोजेक्ट्स एलएलपी वही कंपनी है जिसे पहले डिलाइट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड यानी डीएमसीपीएल के नाम से जाना जाता था।
जमीन के बदले आईआरसीटीसी होटलों के टेंडर
मामले की सबसे अहम और चौंकाने वाली कड़ी पटना की 358 डिसमिल जमीन है। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक यह जमीन 2005 में डीएमसीपीएल ने उन लोगों से खरीदी थी जिन्हें बाद में आईआरसीटीसी के रांची और पुरी स्थित बीएनआर होटलों का टेंडर मिलने से जोड़ा गया। ईडी का आरोप है कि करीब 1.61 करोड़ रुपये में खरीदी गई इस जमीन का बाद के वर्षों में मूल्य कई गुना बढ़ गया और कंपनी के शेयरों के जरिए इसका नियंत्रण धीरे-धीरे राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव तक पहुंचा। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 2005 से 2014 के बीच की घटनाओं की यह पूरी कड़ी प्रथमदृष्टया एक-दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती है।
लालू के रेल मंत्री रहते रांची और पुरी में मिले होटल
दरअसल, ईडी की पूरी थ्योरी का आधार यह कथित लेन-देन है कि लालू प्रसाद यादव जब रेल मंत्री थे, तब रांची और पुरी के रेलवे होटलों के टेंडर को कथित तौर पर सुजाता होटल्स के पक्ष में प्रभावित किया गया। इसके बदले सुजाता होटल्स से जुड़े कोचर बंधुओं की पटना की कीमती जमीन कथित तौर पर लालू प्रसाद यादव के करीबी सहयोगी प्रेम चंद गुप्ता और उनकी पत्नी सरला गुप्ता से जुड़ी कंपनी डीएमसीपीएल को बाजार मूल्य से कम कीमत पर पहुंची। इसके बाद इस कंपनी के शेयर कथित तौर पर बेहद कम कीमत पर राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को ट्रांसफर किए गए। अदालत ने इसी कथित व्यवस्था को मामले की मनी लॉन्ड्रिंग की केंद्रीय कड़ी माना है।
पूरे केस में जमीन की कीमत का अंतर भी महत्वपूर्ण
इस मामले में जमीन की कीमत का अंतर भी बेहद महत्वपूर्ण है। अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज ईडी के आकलन के मुताबिक 358 डिसमिल जमीन को 2005 में कुल 1,61,67,000 रुपये में खरीदा गया था। बाद में संबंधित जमीन का मूल्यांकन करीब 37.59 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यानी जिस संपत्ति को करीब 1.61 करोड़ रुपये में खरीदा गया था, उसका मूल्य बाद में 37 करोड़ रुपये से ज्यादा आंका गया।
कंपनी के शेयर ट्रांसफर पर भी सवाल
सिर्फ जमीन की कीमत ही नहीं, बल्कि कंपनी के शेयरों के ट्रांसफर को लेकर भी अदालत ने गंभीर टिप्पणी की है। रिकॉर्ड के मुताबिक संबंधित समय में कंपनी की परिसंपत्ति आधारित वैल्यू के हिसाब से एक शेयर की कीमत करीब 1,02,870 रुपये तक आंकी गई थी, जबकि राबड़ी देवी को कुछ शेयर महज 5,750 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर ट्रांसफर किए गए। तेजस्वी यादव को भी कुछ शेयर सिर्फ 100 और 200 रुपये प्रति शेयर की कीमत पर दिए जाने का आरोप है। अदालत ने कहा कि राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव अंडरवैल्यूड शेयर ट्रांसफर के सीधे लाभार्थी थे और इन शेयरों के जरिए कंपनी की जमीन उनके लाभ में चली गई।
लालू और राबड़ी पर कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
अदालत ने राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा कि दोनों के बारे में रिकॉर्ड से ‘स्ट्रॉन्ग सस्पिशन’ बनता है कि वे 2010 से 2014 के बीच डीएमसीपीएल के शेयरों की कथित कम कीमत पर खरीद के जरिए पटना की जमीन के कब्जे, इस्तेमाल और छिपाने से जुड़ी गतिविधि में शामिल थे। इसी आधार पर दोनों के खिलाफ पीएमएलए की धारा 3 और 4 के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया गया। वहीं लालू प्रसाद यादव को लेकर अदालत ने कहा कि ईडी ने उन्हें इस कथित मनी लॉन्ड्रिंग का ‘प्रोजेनिटर’ यानी मूल कर्ताधर्ता बताया है। आरोप है कि तत्कालीन रेल मंत्री के रूप में उन्होंने रांची और पुरी के बीएनआर होटलों का टेंडर सुजाता होटल्स के पक्ष में प्रभावित किया और इसी प्रक्रिया से जुड़ी जमीन बाद में उनकी पत्नी और बेटे तक पहुंची। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर उपलब्ध सामग्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त है।
लालू ने रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को मौखिक आदेश दिए
मामले में टेंडर प्रक्रिया को लेकर भी अदालत के आदेश में अहम तथ्य दर्ज हैं। सीबीआई के आरोपों के अनुसार लालू प्रसाद यादव ने 31 अगस्त 2004 और 26 सितंबर 2005 को रेलवे बोर्ड के तत्कालीन चेयरमैन को मौखिक निर्देश दिए थे। इसके बाद रांची और पुरी के बीएनआर होटलों को आईआरसीटीसी के जरिए निजी कंपनियों को देने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक टेंडर की पात्रता और प्रतिस्पर्धी बोलियों के मूल्यांकन से जुड़ी शर्तों में कथित तौर पर हेरफेर किया गया और अंततः सुजाता होटल्स को दोनों होटलों का ठेका मिला। इससे पहले 31 अगस्त 2004 को तत्कालीन रेलवे बोर्ड चेयरमैन आरके सिंह द्वारा दर्ज एक नोट में यह दर्ज था कि रेल मंत्री की इच्छा थी कि केवल निजी ठेकेदारों द्वारा संचालित कैटरिंग सेवाओं को आईआरसीटीसी को ट्रांसफर किया जाए, जबकि विभागीय कैटरिंग फिलहाल रेलवे के पास रहे। इसके बाद नवंबर 2004 में रेलवे बोर्ड ने रांची और पुरी के रेलवे होटलों के संबंध में अलग निर्णय लिया और आगे चलकर इन्हें आईआरसीटीसी के जरिए निजी पक्षों को देने की प्रक्रिया शुरू हुई। अदालत ने इस पूरी पृष्ठभूमि को आरोपों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है।
सीबीआई की एफआईआर से शुरू हुई ईडी की जांच
ईडी की जांच इसी सीबीआई एफआईआर से शुरू हुई थी। सीबीआई ने 5 जुलाई 2017 को एफआईआर दर्ज की थी। इसमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण कानून की धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। इसके बाद सीबीआई ने 16 अप्रैल 2018 को चार्जशीट दाखिल की। इसी आधार पर ईडी ने पीएमएलए के तहत अपनी जांच शुरू की।
इस मामले में ईडी ने पीएमएलए की धारा 5 के तहत संपत्तियां भी अटैच की थीं। अदालत के रिकॉर्ड के मुताबिक अटैच की गई संपत्तियों की कीमत 44.75 करोड़ रुपये आंकी गई थी और एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी ने इस अटैचमेंट की पुष्टि भी की।
अदालत ने प्रेम चंद गुप्ता और सरला गुप्ता की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना है। आदेश में कहा गया है कि डीएमसीपीएल के संचालन, पटना की जमीन खरीदने और बाद में कंपनी के शेयरों को राबड़ी देवी तथा तेजस्वी यादव तक पहुंचाने की कड़ी में दोनों की भूमिका सामने आती है। अदालत ने दोनों के खिलाफ भी आरोप तय करने का निर्देश दिया है।
दूसरी तरफ अदालत ने सभी आरोपियों को एक ही नजर से नहीं देखा। गौरव गुप्ता, नाथ मल ककरानिया, राहुल यादव, विजय त्रिपाठी, देवकी नंदन तुलश्यान, राजीव कुमार रेलन और एबिहेक फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड को डिस्चार्ज कर दिया गया है। अदालत ने कहा कि इन लोगों के खिलाफ उपलब्ध सामग्री आरोप तय करने के लिए जरूरी ‘स्ट्रॉन्ग सस्पिशन’ तक नहीं पहुंचती।
राहुल यादव के मामले में ईडी ने आरोप लगाया था कि उन्होंने 6 फरवरी 2014 को राबड़ी देवी को एक करोड़ रुपये का ब्याज-मुक्त लोन दिया था और इससे पहले उनके खाते में 16 दिसंबर 2013 को 1.35 करोड़ रुपये नकद जमा हुए थे। अदालत ने माना कि यह लेन-देन संदिग्ध हो सकता है, लेकिन रिकॉर्ड से अपराध की आय के साथ सीधा संबंध साबित करने वाला पर्याप्त आधार नहीं मिलता। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि संयुक्त खाते की दूसरी धारक रागिनी यादव को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया।
इसी तरह राजीव कुमार रेलन और एबिहेक फाइनेंस पर डीएमसीपीएल को जमीन खरीदने के लिए 2 करोड़ रुपये का लोन देने को लेकर संदेह जताया गया था। लेकिन अदालत ने कहा कि किसी लेन-देन का संदिग्ध होना अपने आप में पीएमएलए के तहत आरोप तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। रिकॉर्ड में अपराध की आय से सीधा संबंध स्थापित होना जरूरी है और इन दोनों के मामले में ऐसा सीधा संबंध नहीं दिखाई देता।
गौरव गुप्ता और देवकी नंदन तुलश्यान के बारे में अदालत ने कहा कि केवल डीएमसीपीएल के निदेशक होने के आधार पर उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग का आरोपी नहीं बनाया जा सकता। रिकॉर्ड में ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं है जिससे यह पता चले कि उन्हें जमीन की खरीद या राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव को शेयर ट्रांसफर किए जाने की कथित योजना की जानकारी थी।
अदालत ने इस मामले में पीएमएलए के तहत एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी स्पष्ट किया। उसके मुताबिक मनी लॉन्ड्रिंग एक ‘कंटीन्यूइंग ऑफेंस’ है। यानी अपराध केवल उस समय तक सीमित नहीं रहता जब कथित तौर पर अपराध की आय पैदा हुई, बल्कि जब तक ऐसी संपत्ति को छिपाया जाता है, उसका इस्तेमाल किया जाता है या उसे बेदाग संपत्ति के रूप में पेश किया जाता है, तब तक अपराध के परिणाम जारी रह सकते हैं।
अदालत ने लालू प्रसाद यादव की ओर से लगाए गए राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप को भी इस स्तर पर स्वीकार नहीं किया। आदेश में कहा गया कि जांच की प्रकृति, उसका समय और उसकी प्रक्रिया ऐसी नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकले कि ईडी की शिकायत राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित थी। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान और दस्तावेज लालू यादव के खिलाफ आरोप तय करने को समर्थन देते हैं।
हालांकि, अदालत का यह आदेश दोषसिद्धि नहीं है। यह आरोप तय करने के चरण का आदेश है। अदालत ने स्वयं स्पष्ट किया है कि इस चरण पर अभियोजन को वही कठोर प्रमाण प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं है जो मुकदमे के अंतिम चरण में दोष साबित करने के लिए आवश्यक होगा। अब आगे ट्रायल में ईडी को उन आरोपों और कथित लेन-देन की कड़ी को साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होगा।
इस तरह करीब दो दशक पुरानी इस कथित डील की कहानी अब उस मुकाम पर पहुंच गई है जहां अदालत ने रेलवे के दो होटलों के टेंडर से शुरू होकर पटना की 358 डिसमिल जमीन और फिर कंपनी के शेयरों के जरिए लालू परिवार तक पहुंची कथित संपत्ति की कड़ी को ट्रायल के लिए पर्याप्त माना है। अदालत के आदेश में इस पूरी कड़ी को 2005 से 2014 के बीच की घटनाओं से जोड़ते हुए लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव और छह अन्य के खिलाफ पीएमएलए के तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया गया है।



