हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड कैंसर और नसों के दर्द की नई दवाओं पर रेग्युलेटर सख्त, विदेशी मंजूरी पर भरोसा नहीं

अमेरिका में मंजूर हाई ब्लड प्रेशर की दवा पर भारतीय मरीजों का और डेटा मांगा, ब्लड कैंसर की दवा को शर्तों के साथ मंजूरी; दुनिया में कहीं मंजूर नहीं नसों के दर्द की नई स्ट्रेंथ पर अतिरिक्त अध्ययन के निर्देश

एम. रियाज हाशमी

नई दिल्ली। देश में करीब 4 करोड़ मरीजों से जुड़ी नई दवाओं की मंजूरी को लेकर सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (सीडीएससीओ) ने सख्त रुख अपनाया है। जुलाई में हुई अलग-अलग सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमेटी (एसईसी) की बैठकों में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि केवल अमेरिका या यूरोप की मंजूरी के आधार पर भारत में नई दवाओं को अनुमति नहीं मिलेगी। जहां जरूरत होगी, वहां भारतीय मरीजों पर अतिरिक्त क्लीनिकल डेटा (रोगियों पर परीक्षण के आंकड़े), सुरक्षा अध्ययन और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे।

सबसे बड़ा फैसला एस्ट्राजेनेका की हाई ब्लड प्रेशर की नई दवा ‘बैक्सड्रोस्टैट’ को लेकर हुआ। कंपनी ने बताया कि इस दवा को अमेरिका में मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन विशेषज्ञों ने पाया कि भारतीय मरीजों पर उपलब्ध क्लीनिकल डेटा पर्याप्त नहीं है। गंभीर दुष्प्रभावों की आशंका को देखते हुए अधिक भारतीय मरीजों पर अध्ययन का डेटा मांगा गया है और फिलहाल मंजूरी की सिफारिश नहीं की।

वहीं, जॉनसन एंड जॉनसन की ब्लड कैंसर (मल्टीपल मायलोमा) की दवा ‘डार्ज़ालेक्स फ़ैसप्रो’ को स्थानीय तीसरे चरण के क्लीनिकल परीक्षण से छूट देने की सिफारिश की गई। हालांकि समिति ने शर्त रखी कि कंपनी को भारत में फेस-4 स्ट्डी यानी दवा बाजार में आने के बाद सुरक्षा एवं प्रभाव का अध्ययन करना होगा और उसका प्रोटोकॉल तीन महीने के भीतर सीडीएससीओ को सौंपना होगा।

इसी तरह, एलकेम लैबोरेट्री की ‘गैबापेंटिन एक्सटेंडेड रिलीज़ 200’ टैबलेट, जिसका उपयोग नसों के दर्द जैसी समस्याओं में किया जाता है, को भी तत्काल मंजूरी नहीं मिली। समिति ने कहा कि यह 200 मिग्रा स्ट्रेंथ दुनिया के किसी भी देश में अभी तक मंजूर नहीं है, इसलिए पहले बायोअवेलेबिलिटी स्ट्डी (दवा शरीर में कितनी और कितनी तेजी से पहुंचती और असर करती है) की जांच कराई जाए और उसका प्रोटोकॉल ड्रग कंट्रोलर के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

बड़े देश, बड़े नाम से ज्यादा वैज्ञानिक साक्ष्यों को महत्व: तीनों अलग-अलग एक्सपर्ट कमेटियों के फैसलों से यह संकेत मिलता है कि सीडीएससीओ नई दवाओं की मंजूरी में भारतीय मरीजों पर उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों को अधिक महत्व दे रहा है। जिन दवाओं में तत्काल चिकित्सा जरूरत है, वहां भी मंजूरी के साथ फेस-4 अध्ययन जैसी शर्तें लगाई जा रही हैं, जबकि पर्याप्त भारतीय डेटा नहीं होने पर कंपनियों से अतिरिक्त अध्ययन मांगा जा रहा है।