आईसीएमआर का राष्ट्रीय मॉडल: सात जिलों में शुरू हुआ ‘अनंत मुस्कान’ कार्यक्रम, शुरुआती अध्ययन में सामने आया—लगभग तीन-चौथाई बच्चों में दांतों की सड़न, केवल हर चौथा बच्चा दिन में दो बार ब्रश करता है
एम. रियाज हाशमी

नई दिल्ली। देश के स्कूली बच्चों में तेजी से बढ़ रही दांतों की बीमारियों और खराब ओरल हेल्थ की चुनौती से निपटने के लिए इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने ‘अनंत मुस्कान’ नाम से एक राष्ट्रीय मॉडल शुरू किया है। इस कार्यक्रम के तहत देश के सात जिलों में 2.17 लाख से अधिक प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों को नियमित रूप से सही तरीके से ब्रश करना, दांतों की सफाई बनाए रखना और मुख स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना सिखाया जा रहा है। आईसीएमआर का उद्देश्य वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ऐसा मॉडल विकसित करना है, जिसे भविष्य में पूरे देश के स्कूलों में लागू किया जा सके।
कार्यक्रम की पृष्ठभूमि में किए गए शुरुआती अध्ययन ने चिंता बढ़ा दी है। आईसीएमआर के अनुसार, भारत में लगभग तीन में से चार स्कूली बच्चे दांतों की सड़न (डेंटल कैरीज़) से प्रभावित हैं। अध्ययन में यह भी सामने आया कि 76 प्रतिशत बच्चे सही तरीके से ब्रश नहीं करते, केवल हर चौथा बच्चा दिन में दो बार ब्रश करता है, जबकि सिर्फ 18 प्रतिशत बच्चे ही टूथपेस्ट की अनुशंसित मात्रा का उपयोग करते हैं। यही कारण है कि बचपन में रोकी जा सकने वाली दंत समस्याएं बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही हैं।
आईसीएमआर के मुताबिक, दांतों की बीमारी केवल दर्द तक सीमित नहीं रहती। बच्चों में अनुपचारित दांतों की सड़न स्कूल में उपस्थिति, पढ़ाई पर ध्यान और जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है। इसके बावजूद भारत सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों में बच्चों के मुंह के स्वास्थ्य को अभी भी सबसे अधिक उपेक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में गिना जाता है। मार्च 2024 में शुरू किया गया ‘अनंत मुस्कान’ कार्यक्रम वर्तमान में कोच्चि, लखनऊ, पंचकूला, वर्धा, डिब्रूगढ़, दिल्ली और खोरधा जिलों में चल रहा है। कार्यक्रम को लागू करने से पहले आईसीएमआर ने 504 गुणात्मक संवाद, विशेषज्ञ परामर्श और समुदाय आधारित चर्चाओं के माध्यम से इसकी रूपरेखा तैयार की। इसके बाद स्कूलों और स्वास्थ्य तंत्र के सहयोग से बच्चों में सही ब्रशिंग की आदत विकसित करने का अभियान शुरू किया गया।
कार्यक्रम को टिकाऊ बनाने के लिए आईसीएमआर ने केवल बच्चों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा है। अब तक 160 प्रशिक्षण सत्रों के माध्यम से 434 से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों, 2,495 मास्टर ट्रेनरों और लगभग 15 हजार स्कूल शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया है, ताकि स्कूल स्तर पर यह पहल लगातार जारी रह सके। आईसीएमआर का कहना है कि परियोजना के पूरा होने पर इससे प्राप्त वैज्ञानिक प्रमाण स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके आधार पर इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने पर विचार किया जाएगा, जिससे स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम में निवारक मुख स्वास्थ्य सेवाओं को स्थायी रूप से शामिल किया जा सके।
