हरीश द्विवेदी को BJP का राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने पर लखनऊ में जश्न, जानिए कौन हैं वे

हरीश द्विवेदी को BJP का राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने पर लखनऊ में जश्न
हरीश द्विवेदी को BJP का राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने के बाद लखनऊ में उनके समर्थकों ने जोरदार स्वागत किया।

महात्मा गांधी ने कहा था कि “आप खुद वह बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।” राजधानी लखनऊ में लोगों का हजूम, जोरदार नारे, ढोल और नगाड़े की थाप, सड़क पर चारों तरफ बिखरे फूल, हवा में फूलों की सुगन्ध से राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हरीश द्विवेदी का स्वागत किया गया।

भारतीय राजनीति में संगठन कौशल और जमीनी पकड़ के धनी नेता हरीश द्विवेदी को भारतीय जनता पार्टी (BJP) का राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त किया गया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा गठित नई राष्ट्रीय टीम में उन्हें यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है।

ABVP से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा

हरीश द्विवेदी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जमीनी कार्यकर्ता के तौर की थी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़कर छात्र राजनीति में कदम रखा, बस्ती जिले में जिला प्रमुख जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।

संघ की पृष्ठभूमि और वैचारिक दृढ़ता के चलते उन्होंने जल्द ही भाजपा संगठन में अपनी मजबूत पैठ बना ली। वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें बस्ती सदर सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था।

दो बार सांसद, 2024 में हार के बाद भी बड़ा पद

उत्तर प्रदेश की बस्ती लोकसभा सीट से वे दो बार सांसद चुने गए और संसद में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, बस्ती लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी (SP) के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने चुनाव जीता था। हरीश द्विवेदी को लगभग 1,00,994 वोटों के अंतर से हराया था।

इसके बावजूद पार्टी संगठन में उनका प्रभाव, सक्रियता लगातार बनी रही। हरीश द्विवेदी को भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने के पीछे पार्टी ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। हरीश द्विवेदी को पार्टी के भीतर एक ‘माहिर संगठक’ माना जाता है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के अलावा असम और बिहार जैसे राज्यों में पार्टी के सह-प्रभारी के रूप में कार्य किया है। विशेष रूप से असम में पार्टी की रणनीति और जीत के पीछे उनके कुशल प्रबंधन को बड़ा योगदान माना गया।

जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से आने वाले हरीश द्विवेदी एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे हैं। जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन को साधने तथा आगामी राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी वे हताश होने के बजाय पूरी तरह से संगठन के विस्तार और पार्टी के कार्यों में जुटे रहे। उनकी इस निरंतर निष्ठा और कार्यशैली ने केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान आकर्षित किया।

पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम में युवाओं और अनुभवी सांगठनिक क्षमता के बीच संतुलन बनाने के तहत हरीश द्विवेदी को यह बड़ी जिम्मेदारी दी गई है ताकि संगठन को और अधिक धार दी जा सके। हरीश द्विवेदी की यह नियुक्ति इस बात को दर्शाती है कि भारतीय जनता पार्टी में चुनावी हार-जीत से ऊपर उठकर, पार्टी के लिए निरंतर पसीना बहाने वाले और सांगठनिक दक्षता रखने वाले कार्यकर्ताओं को बड़ा मुकाम दिया जाता है।

ब्राह्मण समुदाय का राजनीतिक प्रभाव

भारत में ब्राह्मण समुदाय की आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 5% से 6% के आसपास है, लेकिन राजनीतिक रूप से इनका प्रभाव केवल इनकी संख्या तक सीमित नहीं है। देश के कई राज्यों में यह समुदाय चुनावी नतीजों को तय करने में ‘टर्निंग पॉइंट’ या निर्णायक भूमिका निभाता है।

इसे किसी एक निश्चित संख्या या फिक्स सीटों में नहीं बांधा जा सकता, क्योंकि इनका प्रभाव मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा राज्यों और वहां की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की आबादी लगभग 8% से 10% है। राज्य की कुल 80 लोकसभा सीटों और 403 विधानसभा सीटों में से 100 से 125 सीटें ऐसी हैं जहाँ ब्राह्मण मतदाता हार-जीत में निर्णायक या मजबूत प्रभाव रखते हैं। विशेष तौर पर पूर्वांचल, वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज, देवरिया वही मध्य उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों पर इनका सीधा असर है।

बिहार में सवर्ण जातियों में ब्राह्मणों की आबादी अच्छी खासी है जो लगभग 4% से 5% है। यहां की करीब 30 से 40 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां ब्राह्मण वोटर उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। मिथिलांचल क्षेत्र में इनका प्रभाव सबसे ज्यादा माना जाता है।

मध्य प्रदेश और राजस्थान यहां कुल आबादी का लगभग 7% से 8% हिस्सा ब्राह्मणों का है। विंध्य, ग्वालियर-चंबल और महाकोशल क्षेत्र की करीब 45 से 60 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता हार-जीत तय करने की क्षमता रखते हैं। वही राजस्थान में करीब 7% आबादी के साथ ब्राह्मण मतदाता जयपुर, अजमेर, कोटा, जोधपुर और मेवाड़ बेल्ट की लगभग 30 से 35 सीटों पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

कई सीटों पर भले ही इनकी आबादी सीधे तौर पर सबसे ज्यादा न हो, लेकिन ये ‘स्विंग वोटर’ की भूमिका निभाते हैं यानी ये जिस भी पार्टी या उम्मीदवार की तरफ एकजुट होते हैं, उसका पलड़ा भारी हो जाता है। राजनीतिज्ञों का मानना है कि ब्राह्मण समुदाय के लोग स्थानीय स्तर पर वैचारिक रूप से जागरूक माने जाते हैं वो चुनावी माहौल को दिशा देने में अहम भूमिका निभाते हैं, इसीलिए लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल इन्हें अपने पाले में करने के लिए विशेष रणनीति बनाते हैं।

साधारण परिवार से उठे नेता

हरीश द्विवेदी का संबंध किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से नहीं है। उनके पिता साधु शरण दुबे राजनीति में नहीं, बल्कि पेशे से एक शिक्षक थे और जनता इंटर कॉलेज में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उनका परिवार एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार है। उनकी माता का नाम श्रीमती यशोदा देवी है।

हरीश का विवाह विनीता द्विवेदी से हुआ है। उनके परिवार में संतान के तौर पर एक बेटा कुशाग्र द्विवेदी और एक बेटी (अवन्तिका द्विवेदी) हैं।

2027 UP विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी जिम्मेदारी

उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा का चुनाव होना है। राम मंदिर में चन्दा चोरी, जेन जी आन्दोलन के बाद से देश और प्रदेश में जेन जी का बढ़ता प्रभाव के बीच छात्र राजनीति से निकल कर नेता बने हरीश द्विवेदी कितने प्रभावी होंगे ये देखना दिलचस्प होगा।

हरीश की लोगों से मिलने की सहजता और सरलता उनको बाकी लोगों से अलग बना देता है। हरीश द्विवेदी छात्र राजनीति से निकल कर आए हैं। हरीश के जरिए भाजपा लोगों को संदेश देना चाहती है कि यहां पर हार जीत का कोई मायने नहीं है आपको आगे बढ़ना होगा और चुनौतियों से लड़ना होगा।

ऐसे लोगों के लिए अरस्तू ने कहा है “युवा लोग अपनी भावनाओं और जोश के कारण आसानी से उत्तेजित हो जाते हैं, लेकिन राजनीति में दीर्घकालिक सफलता के लिए केवल जोश नहीं, बल्कि अनुभव और विवेक का होना अनिवार्य है।”

महात्मा गांधी ने कहा था कि “आप खुद वह बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।” राजधानी लखनऊ में लोगों का हजूम, जोरदार नारे, ढोल और नगाड़े की थाप, सड़क पर चारों तरफ बिखरे फूल, हवा में फूलों की सुगन्ध से राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हरीश द्विवेदी का स्वागत किया गया।

भारतीय राजनीति में संगठन कौशल और जमीनी पकड़ के धनी नेता हरीश द्विवेदी को भारतीय जनता पार्टी (BJP) का राष्ट्रीय महामंत्री नियुक्त किया गया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा गठित नई राष्ट्रीय टीम में उन्हें यह अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है।

ABVP से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा

हरीश द्विवेदी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जमीनी कार्यकर्ता के तौर की थी। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़कर छात्र राजनीति में कदम रखा, बस्ती जिले में जिला प्रमुख जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं।

संघ की पृष्ठभूमि और वैचारिक दृढ़ता के चलते उन्होंने जल्द ही भाजपा संगठन में अपनी मजबूत पैठ बना ली। वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें बस्ती सदर सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था।

दो बार सांसद, 2024 में हार के बाद भी बड़ा पद

उत्तर प्रदेश की बस्ती लोकसभा सीट से वे दो बार सांसद चुने गए और संसद में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, बस्ती लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी (SP) के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने चुनाव जीता था। हरीश द्विवेदी को लगभग 1,00,994 वोटों के अंतर से हराया था।

इसके बावजूद पार्टी संगठन में उनका प्रभाव, सक्रियता लगातार बनी रही। हरीश द्विवेदी को भाजपा का राष्ट्रीय महामंत्री बनाए जाने के पीछे पार्टी ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। हरीश द्विवेदी को पार्टी के भीतर एक ‘माहिर संगठक’ माना जाता है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के अलावा असम और बिहार जैसे राज्यों में पार्टी के सह-प्रभारी के रूप में कार्य किया है। विशेष रूप से असम में पार्टी की रणनीति और जीत के पीछे उनके कुशल प्रबंधन को बड़ा योगदान माना गया।

जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन का भी ध्यान

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से आने वाले हरीश द्विवेदी एक प्रमुख ब्राह्मण चेहरे हैं। जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन को साधने तथा आगामी राजनीतिक चुनौतियों को देखते हुए पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद भी वे हताश होने के बजाय पूरी तरह से संगठन के विस्तार और पार्टी के कार्यों में जुटे रहे। उनकी इस निरंतर निष्ठा और कार्यशैली ने केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान आकर्षित किया।

पार्टी की नई राष्ट्रीय टीम में युवाओं और अनुभवी सांगठनिक क्षमता के बीच संतुलन बनाने के तहत हरीश द्विवेदी को यह बड़ी जिम्मेदारी दी गई है ताकि संगठन को और अधिक धार दी जा सके। हरीश द्विवेदी की यह नियुक्ति इस बात को दर्शाती है कि भारतीय जनता पार्टी में चुनावी हार-जीत से ऊपर उठकर, पार्टी के लिए निरंतर पसीना बहाने वाले और सांगठनिक दक्षता रखने वाले कार्यकर्ताओं को बड़ा मुकाम दिया जाता है।

ब्राह्मण समुदाय का राजनीतिक प्रभाव

भारत में ब्राह्मण समुदाय की आबादी कुल जनसंख्या का लगभग 5% से 6% के आसपास है, लेकिन राजनीतिक रूप से इनका प्रभाव केवल इनकी संख्या तक सीमित नहीं है। देश के कई राज्यों में यह समुदाय चुनावी नतीजों को तय करने में ‘टर्निंग पॉइंट’ या निर्णायक भूमिका निभाता है।

इसे किसी एक निश्चित संख्या या फिक्स सीटों में नहीं बांधा जा सकता, क्योंकि इनका प्रभाव मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा राज्यों और वहां की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की आबादी लगभग 8% से 10% है। राज्य की कुल 80 लोकसभा सीटों और 403 विधानसभा सीटों में से 100 से 125 सीटें ऐसी हैं जहाँ ब्राह्मण मतदाता हार-जीत में निर्णायक या मजबूत प्रभाव रखते हैं। विशेष तौर पर पूर्वांचल, वाराणसी, गोरखपुर, प्रयागराज, देवरिया वही मध्य उत्तर प्रदेश की दर्जनों सीटों पर इनका सीधा असर है।

बिहार में सवर्ण जातियों में ब्राह्मणों की आबादी अच्छी खासी है जो लगभग 4% से 5% है। यहां की करीब 30 से 40 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां ब्राह्मण वोटर उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। मिथिलांचल क्षेत्र में इनका प्रभाव सबसे ज्यादा माना जाता है।

मध्य प्रदेश और राजस्थान यहां कुल आबादी का लगभग 7% से 8% हिस्सा ब्राह्मणों का है। विंध्य, ग्वालियर-चंबल और महाकोशल क्षेत्र की करीब 45 से 60 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता हार-जीत तय करने की क्षमता रखते हैं। वही राजस्थान में करीब 7% आबादी के साथ ब्राह्मण मतदाता जयपुर, अजमेर, कोटा, जोधपुर और मेवाड़ बेल्ट की लगभग 30 से 35 सीटों पर सीधा प्रभाव डालते हैं।

कई सीटों पर भले ही इनकी आबादी सीधे तौर पर सबसे ज्यादा न हो, लेकिन ये ‘स्विंग वोटर’ की भूमिका निभाते हैं यानी ये जिस भी पार्टी या उम्मीदवार की तरफ एकजुट होते हैं, उसका पलड़ा भारी हो जाता है। राजनीतिज्ञों का मानना है कि ब्राह्मण समुदाय के लोग स्थानीय स्तर पर वैचारिक रूप से जागरूक माने जाते हैं वो चुनावी माहौल को दिशा देने में अहम भूमिका निभाते हैं, इसीलिए लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल इन्हें अपने पाले में करने के लिए विशेष रणनीति बनाते हैं।

साधारण परिवार से उठे नेता

हरीश द्विवेदी का संबंध किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से नहीं है। उनके पिता साधु शरण दुबे राजनीति में नहीं, बल्कि पेशे से एक शिक्षक थे और जनता इंटर कॉलेज में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उनका परिवार एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार है। उनकी माता का नाम श्रीमती यशोदा देवी है।

हरीश का विवाह विनीता द्विवेदी से हुआ है। उनके परिवार में संतान के तौर पर एक बेटा कुशाग्र द्विवेदी और एक बेटी (अवन्तिका द्विवेदी) हैं।

2027 UP विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी जिम्मेदारी

उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा का चुनाव होना है। राम मंदिर में चन्दा चोरी, जेन जी आन्दोलन के बाद से देश और प्रदेश में जेन जी का बढ़ता प्रभाव के बीच छात्र राजनीति से निकल कर नेता बने हरीश द्विवेदी कितने प्रभावी होंगे ये देखना दिलचस्प होगा।

हरीश की लोगों से मिलने की सहजता और सरलता उनको बाकी लोगों से अलग बना देता है। हरीश द्विवेदी छात्र राजनीति से निकल कर आए हैं। हरीश के जरिए भाजपा लोगों को संदेश देना चाहती है कि यहां पर हार जीत का कोई मायने नहीं है आपको आगे बढ़ना होगा और चुनौतियों से लड़ना होगा।

ऐसे लोगों के लिए अरस्तू ने कहा है “युवा लोग अपनी भावनाओं और जोश के कारण आसानी से उत्तेजित हो जाते हैं, लेकिन राजनीति में दीर्घकालिक सफलता के लिए केवल जोश नहीं, बल्कि अनुभव और विवेक का होना अनिवार्य है।”