इस्तांबुल में आज पहली बार एक मेज पर पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के रक्षा प्रमुख

इस्तांबुल में पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के रक्षा प्रमुखों की बैठक
पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के रक्षा प्रमुख इस्तांबुल में मक्का समझौते के तहत पहली बार एक मेज पर बैठ रहे हैं।

मक्का समझौते को जमीन पर उतारने की पहली कोशिश; ‘एक पर हमला, तीनों पर हमला’ वाली व्यवस्था के पीछे क्या है असली रणनीति?

एम. रियाज़ हाशमी | नई दिल्ली

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब आज इस्तांबुल में अपने नए रक्षा समझौते को राजनीतिक घोषणा से आगे ले जाने की कोशिश करेंगे। मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत गठित रणनीतिक राजनीतिक एवं रक्षा समिति की यह पहली बैठक है। इसमें तीनों देशों के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और शीर्ष सैन्य अधिकारी शामिल होंगे। तुर्किये के विदेश मंत्रालय ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की है। पाकिस्तान की ओर से विदेश मंत्री इशाक डार, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और सेना प्रमुख व चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल आसिम मुनीर प्रतिनिधित्व करेंगे।

यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 7 अगस्त को मक्का में हुआ समझौता अब पहली बार संस्थागत रूप लेने जा रहा है। समझौते की सबसे अहम शर्त है कि तीनों में से किसी एक देश पर सशस्त्र हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा। अब असली सवाल यह है कि इस राजनीतिक प्रतिबद्धता को सैन्य स्तर पर किस तरह लागू किया जाएगा?

पहले समझिए कि मक्का समझौता आखिर है क्या?

7 अगस्त को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेजेब तैयब एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसका घोषित उद्देश्य तीनों देशों की सामूहिक प्रतिरोध क्षमता और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान सामूहिक रक्षा का है- एक सदस्य पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा।

आज ‘संधि’ से ‘सिस्टम’ तक पहुंचने की परीक्षा

किसी समझौते में यह लिखना आसान है कि एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। मुश्किल यह है कि हमला होने पर बाकी दोनों देश वास्तव में क्या करेंगे? इसीलिए इस्तांबुल की बैठक का महत्व केवल तीनों देशों के नेताओं की मौजूदगी में नहीं, बल्कि उसके संभावित एजेंडे में है। रक्षा क्षमताओं को बढ़ाना, सेनाओं के बीच तालमेल, रक्षा उद्योग में सहयोग, संयुक्त उत्पादन, अनुसंधान एवं तकनीकी सहयोग और आतंकवाद से मुकाबला इसके प्रमुख विषय हो सकते हैं। अगर बैठक के बाद संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, रक्षा उत्पादन और स्थायी संस्थागत व्यवस्था का रोडमैप सामने आता है, तभी इसे वास्तविक सुरक्षा तंत्र की दिशा में बढ़ता कदम माना जाएगा।

लेकिन क्या यह NATO जैसा गठबंधन है?

पूरी तरह नहीं। सामूहिक रक्षा की अवधारणा NATO के आर्टिकल 5 से मिलती है, लेकिन NATO के पास दशकों पुरानी साझा कमांड व्यवस्था, संयुक्त सैन्य योजना, सैन्य अभ्यास और स्थायी संस्थागत ढांचा है। पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी व्यवस्था अभी शुरुआत में है। आईआईएसएस के अनुसार समझौते में हमले की स्थिति में सहयोग का सिद्धांत है, लेकिन सहायता की प्रकृति और मात्रा पहले से स्पष्ट नहीं है। इसलिए इसे अभी ‘इस्लामिक NATO’ कहना ज्यादा राजनीतिक व्याख्या होगी, तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं।

तीनों की क्षमताएं अलग, लेकिन एक-दूसरे की पूरक

इस समझौते की असली ताकत तीनों देशों की अलग-अलग क्षमताओं के मेल में है। पाकिस्तान परमाणु शक्ति और बड़ी सैन्य क्षमता रखता है। तुर्किये NATO सदस्य होने के साथ तेजी से विकसित हुआ रक्षा उद्योग और सैन्य तकनीक रखता है। सऊदी अरब के पास विशाल आर्थिक संसाधन, ऊर्जा शक्ति और खाड़ी में रणनीतिक भौगोलिक स्थिति है। आईआईएसएस ने भी इस समझौते को तीन महत्वपूर्ण मध्य शक्तियों के करीब आने के रूप में देखा है- परमाणु पाकिस्तान, आर्थिक शक्ति सऊदी अरब और मजबूत सैन्य एवं रक्षा उद्योग वाला तुर्किये।

अब बड़ा सवाल: इससे किसे क्या मिलेगा?

  • पाकिस्तान: सैन्य और रणनीतिक भूमिका का विस्तार।
  • तुर्किये: रक्षा तकनीक, उत्पादन और संभावित बड़े बाजार का विस्तार।
  • सऊदी अरब: अपनी रक्षा क्षमता और आत्मनिर्भरता बढ़ाने का अवसर।

यानी समीकरण मोटे तौर पर पाकिस्तान की सैन्य क्षमता, तुर्किये की तकनीक और सऊदी अरब की आर्थिक ताकत का है। अगर तीनों देश संयुक्त रूप से ड्रोन, मिसाइल, वायु रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, युद्धपोत या दूसरी सैन्य तकनीक विकसित करने लगते हैं, तो समझौते का असर सिर्फ सैन्य गठबंधन तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक साझा रक्षा उद्योग की दिशा में भी बढ़ सकता है।

असली रणनीति क्या है? अमेरिका का विकल्प नहीं, लेकिन सहारा जरूर

सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भर रहा है। लेकिन पश्चिम एशिया में लगातार बदलते सुरक्षा समीकरणों ने रियाद को अपनी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है। यही वजह है कि मक्का समझौते को अमेरिका के खिलाफ गठबंधन मानना भी सही नहीं होगा। सऊदी अरब के अमेरिका से बेहद महत्वपूर्ण सुरक्षा और आर्थिक संबंध बने हुए हैं। इसे अधिक सही ढंग से एक अतिरिक्त सुरक्षा परत के रूप में देखा जा सकता है। आईआईएसएस के विश्लेषण के मुताबिक यह समझौता क्षेत्रीय देशों की अपनी सामूहिक प्रतिरोध क्षमता मजबूत करने की बढ़ती इच्छा को दिखाता है।

तुर्किये क्यों महत्वपूर्ण है? सिर्फ सेना नहीं, हथियार बनाने की क्षमता भी

तुर्किये की भूमिका इस समझौते को खास बनाती है। वह केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि ड्रोन, मिसाइल, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और दूसरी रक्षा तकनीकों में तेजी से बढ़ती घरेलू क्षमता वाला देश है। सऊदी अरब अपनी घरेलू रक्षा क्षमता विकसित करना चाहता है और तुर्किये तथा पाकिस्तान के साथ रक्षा उद्योग सहयोग उसके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। तीनों देशों के बीच संयुक्त रक्षा औद्योगिक क्षमता विकसित करना सहयोग का अधिक व्यावहारिक क्षेत्र हो सकता है।

सबसे संवेदनशील सवाल: क्या निशाने पर ईरान है?

तीनों देशों ने समझौते को किसी एक देश के खिलाफ गठबंधन नहीं बताया है। लेकिन इसकी टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में ईरान से जारी संघर्ष और खाड़ी देशों पर हमलों ने क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया है। मौजूदा क्षेत्रीय तनाव इस नए सामूहिक सुरक्षा ढांचे की पृष्ठभूमि का महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिर भी इसे सीधे ‘ईरान विरोधी सैन्य गठबंधन’ कहना जल्दबाजी होगी। तुर्किये के ईरान के साथ अपने अलग कूटनीतिक और आर्थिक संबंध हैं और सऊदी अरब भी हाल के वर्षों में तेहरान के साथ तनाव कम करने की कोशिश कर चुका है। यानी ईरान इस समीकरण का हिस्सा जरूर है, लेकिन शायद पूरा लक्ष्य नहीं।

इजरायल और अमेरिका का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण

तीनों देशों के सुरक्षा हित पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। तुर्किये की क्षेत्रीय प्राथमिकताएं सऊदी अरब और पाकिस्तान से अलग हैं। सऊदी अरब की पहली चिंता खाड़ी और ऊर्जा सुरक्षा है, पाकिस्तान की प्राथमिकता दक्षिण एशिया और अपनी सैन्य सुरक्षा है, जबकि तुर्किये की रणनीति NATO, सीरिया, इराक, भूमध्यसागर और व्यापक क्षेत्रीय प्रभाव से भी जुड़ी है। यही इस समझौते की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों हैं। किसी संयुक्त सैन्य समझौते की विश्वसनीयता शांति के समय नहीं, संकट के समय तय होती है।

अगर किसी एक देश पर मिसाइल हमला होता है तो क्या बाकी दो तुरंत सैन्य सहायता देंगे? क्या खुफिया जानकारी साझा होगी? क्या संयुक्त वायु रक्षा सक्रिय होगी? क्या सैनिक भेजे जाएंगे या केवल राजनीतिक समर्थन दिया जाएगा? मक्का समझौते के भविष्य का सबसे बड़ा सवाल यही है।

अब भारत के लिए इस समझौते का क्या मतलब है?

भारत के लिए इस समझौते को नजरअंदाज करना संभव नहीं है, लेकिन इसे सिर्फ पाकिस्तान के चश्मे से देखना भी गलत होगा। पाकिस्तान भारत का रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी है। वहीं सऊदी अरब भारत का महत्वपूर्ण ऊर्जा, निवेश और आर्थिक साझेदार है। तुर्किये के साथ भारत के संबंध अधिक जटिल रहे हैं। इसलिए नई दिल्ली के लिए असली चुनौती यह होगी कि वह रियाद के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करे, जबकि पाकिस्तान-तुर्किये की बढ़ती सैन्य निकटता पर भी नजर रखे। आज की बैठक के बाद चार चीजें सबसे महत्वपूर्ण होंगी- क्या स्थायी सचिवालय बनता है, क्या संयुक्त सैन्य अभ्यास की योजना बनती है, क्या रक्षा उद्योग में ठोस परियोजनाएं तय होती हैं और क्या खुफिया/ सैन्य सूचना साझा करने की व्यवस्था आगे बढ़ती है।

अगर इन क्षेत्रों में ठोस रोडमैप सामने आता है तो मक्का समझौता राजनीतिक घोषणा से आगे बढ़कर एक वास्तविक सुरक्षा तंत्र की दिशा में कदम होगा। अगर ऐसा नहीं होता, तो ‘एक पर हमला, तीनों पर हमला’ फिलहाल प्रतिरोध का राजनीतिक संदेश ही बना रहेगा और यही वजह है कि आज की इस्तांबुल बैठक सिर्फ एक बैठक नहीं है। यह इस बात की पहली परीक्षा है कि पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने एक रक्षा समझौता किया है या एक नई सामूहिक सैन्य शक्ति बनाने की शुरुआत की है?