
कंपनी के खिलाफ FSSAI की कानूनी कार्रवाई शुरू; कोर्ट के निर्देश पर 3.7 मीट्रिक टन एक्सपायर्ड शिशु आहार नष्ट कराया गया, सवाल- आखिर शिशुओं के भोजन पर इतनी सख्त निगरानी क्यों?
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
शिशुओं के लिए तैयार किए जाने वाले खाद्य उत्पादों में मामूली लेबलिंग गड़बड़ी भी सामान्य पैकेज्ड फूड की तुलना में कहीं अधिक गंभीर मानी जाती है। इसी वजह से बेंगलुरु स्थित ब्रिटिश लाइफ साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की कार्रवाई ने खासा ध्यान खींचा है। एफएसएसएआई के मुताबिक कंपनी के बेंगलुरु परिसर में निरीक्षण के दौरान भारी मात्रा में मिसब्रांडेड शिशु आहार मिला, जिसे खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत जब्त किया गया। मामले में संबंधित खाद्य कारोबार संचालक (एफबीओ) के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी शुरू की गई है।
लेकिन इस कार्रवाई का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा है- 3.7 मीट्रिक टन यानी 3,700 किलोग्राम एक्सपायर्ड शिशु आहार। एफएसएसएआई के अनुसार इस एक्सपायर्ड स्टॉक को कोर्ट के निर्देश पर नष्ट कराया गया और इस तरह उसका निपटान किया गया कि वह दोबारा इस्तेमाल या खाद्य आपूर्ति व्यवस्था में वापस न पहुंच सके। मामला सिर्फ ‘एक्सपायर्ड’ फूड का नहीं है। यहां दो अलग-अलग नियामकीय चिंताओं को समझना जरूरी है।
एफएसएसएआई की कार्रवाई में एक ओर मिसब्रांडेड शिशु आहार की महत्वपूर्ण मात्रा जब्त किए जाने की बात है, वहीं दूसरी ओर 3.7 मीट्रिक टन एक्सपायर्ड शिशु आहार को नष्ट करने की कार्रवाई का उल्लेख है। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि पूरी 3.7 टन मात्रा ही मिसब्रांडेड थी। उपलब्ध जानकारी में दोनों उल्लंघनों को अलग-अलग बताया गया है।
यानी जांच के सामने कम से कम दो सवाल हैं- क्या कुछ उत्पादों की लेबलिंग या प्रस्तुति नियमों के अनुरूप नहीं थी? और क्या कंपनी के परिसर में इतनी बड़ी मात्रा में ऐसा शिशु आहार मौजूद था जिसकी निर्धारित वैध अवधि समाप्त हो चुकी थी?
अब समझिए ‘मिसब्रांडेड’ का मतलब क्या होता है?
‘मिसब्रांडेड’ का मतलब यह जरूरी नहीं कि खाद्य पदार्थ नकली या जहरीला हो। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि पैकेट पर दी गई जानकारी, लेबल या उत्पाद की प्रस्तुति तय नियमों के मुताबिक न हो या उपभोक्ता को गुमराह करती हो। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 52 के तहत ऐसे मामले में तीन लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है और जरूरत पड़ने पर खाद्य सामग्री को नष्ट करने का आदेश भी दिया जा सकता है। ब्रिटिश लाइफ साइंसेज मामले में कौन-से नियम टूटे और कौन-सी धाराएं लागू होंगी, यह जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा।
एक्सपायर्ड फूड इतना गंभीर क्यों?
एक्सपायरी डेट सिर्फ पैकेट पर लिखी तारीख नहीं है। इसके बाद तय परिस्थितियों में खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता और सुरक्षा की गारंटी नहीं रहती, इसलिए ऐसे भोजन की बिक्री नहीं की जानी चाहिए। शिशु आहार में इसका महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि इसका इस्तेमाल जीवन के शुरुआती दौर में होता है और इसके लिए खास पोषण मानक तय हैं।
शिशु आहार के नियम इतने सख्त क्यों हैं?
भारत में शिशुओं के दूध और भोजन के लिए सामान्य खाद्य सुरक्षा नियमों के अलावा 1992 का अलग कानून भी है। इसका मकसद मां के दूध को बढ़ावा देना और शिशु आहार के सही इस्तेमाल को सुनिश्चित करना है। इसके तहत ऐसे उत्पादों के विज्ञापन, प्रचार और बिक्री पर भी पाबंदियां हैं। पैकेट पर यह बताना जरूरी है कि मां का दूध बच्चे के लिए सबसे अच्छा है और उत्पाद का इस्तेमाल स्वास्थ्यकर्मी की सलाह से किया जाना चाहिए।
2020 से शिशु आहार के लिए और सख्त नियम
एफएसएसएआई ने 2020 में शिशु आहार के लिए अलग विस्तृत नियम लागू किए। इनमें इन्फैंट फॉर्मूला, फॉलो-अप फॉर्मूला और खास चिकित्सकीय जरूरत वाले बच्चों के आहार के लिए सामग्री, पोषक तत्वों और पैकेट पर दी जाने वाली जानकारी के मानक तय किए गए हैं। यानी बेबी फूड को सामान्य खाद्य पदार्थ नहीं माना जाता और उसकी गुणवत्ता, पोषण और लेबलिंग पर खास निगरानी रखी जाती है।
ब्रिटिश लाइफ साइंसेज के कौन-कौन से बेबी फूड?
ब्रिटिश लाइफ साइंसेज के पास बच्चों के पोषण से जुड़े कई उत्पाद हैं। कंपनी की वेबसाइट पर एमएमएस, एमएमएस गोल्ड, नैसेंट और ऑप्टिलेट जैसे इन्फेंट फॉर्मूले दर्ज हैं। कुछ उत्पाद खास जरूरत वाले बच्चों के लिए भी हैं। इसके अलावा ‘मम्स केयर’ नाम से राइस एंड मूंग दाल, रागी एंड मूंग दाल, व्हीट एंड एप्पल और राइस-व्हीट मिक्स्ड फ्रूट जैसे बेबी सीरियल भी बेचे जाते हैं। कंपनी के मुताबिक ये छह महीने से अधिक उम्र के बच्चों के लिए पूरक आहार हैं। ऐसे में 3.7 टन एक्सपायर्ड शिशु आहार का मिलना सवाल खड़ा करता है कि इतनी बड़ी मात्रा में एक्सपायर्ड उत्पाद स्टॉक में कैसे रहा। इसका जवाब जांच के बाद ही मिलेगा।
देश में बेबी फूड की जांच की तस्वीर
केंद्र सरकार के मुताबिक 2022-23 से 2024-25 के बीच देश में शिशु दूध के विकल्प और शिशु आहार के 1,142 सैंपल जांचे गए। इनमें 82 सैंपल तय मानकों के अनुरूप नहीं मिले। इनमें 7 असुरक्षित, 30 घटिया मानक के और 45 में लेबलिंग, भ्रामक जानकारी या दूसरी कमियां पाई गईं। यानी हर गैर-अनुरूप सैंपल असुरक्षित नहीं था। यह भी स्पष्ट है कि ये आंकड़े ब्रिटिश लाइफ साइंसेज के मामले से जुड़े नहीं हैं, बल्कि देश में शिशु आहार की जांच की व्यापक तस्वीर बताते हैं।
अब जांच में सबसे अहम सवाल क्या होंगे?
ब्रिटिश लाइफ साइंसेज के मामले में अब इन सवालों के जवाब जरूरी होंगे:
- कौन-कौन से उत्पाद और बैच नियमों के खिलाफ पाए गए?
- ‘मिसब्रांडेड’ होने की वजह क्या थी?
- 3.7 टन एक्सपायर्ड सामान कब तैयार हुआ और उसके आखिरी इस्तेमाल की तारीख क्या थी?
- क्या एक्सपायर्ड सामान कंपनी के परिसर से बाहर भी गया था?
- क्या उसके सैंपल की प्रयोगशाला में जांच हुई?
- क्या ऐसा कोई उत्पाद उपभोक्ताओं या बच्चों तक पहुंचा था?
- कंपनी के स्टॉक और एक्सपायरी की निगरानी में कहां चूक हुई?
इन सवालों के जवाब से ही पता चलेगा कि मामला केवल नियमों के उल्लंघन तक सीमित है या इसके पीछे आपूर्ति और निगरानी व्यवस्था की भी बड़ी खामी है।
117.8 करोड़ की आमदनी, बच्चों के लिए कई उत्पाद
बेंगलुरु की ब्रिटिश लाइफ साइंसेज प्राइवेट लिमिटेड कोई छोटी स्थानीय कंपनी नहीं है। उपलब्ध वित्तीय आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में कंपनी की आमदनी करीब 117.8 करोड़ रुपये थी। वहीं वित्त वर्ष 2025-26 के जीएसटी आंकड़ों में इसका कारोबार 100 से 500 करोड़ रुपये के दायरे में बताया गया है। हालांकि, इससे कंपनी की सटीक मौजूदा सालाना आमदनी का पता नहीं चलता। कंपनी की वेबसाइट पर 27 उत्पाद दर्ज हैं। इनमें एमएमएस, एमएमएस गोल्ड, नैसेंट, ऑप्टिलेट और खास जरूरत वाले बच्चों के लिए फॉर्मूला उत्पाद शामिल हैं। ‘मम्स केयर’ के तहत राइस एंड मूंग दाल, रागी एंड मूंग दाल, व्हीट एंड एप्पल और राइस-व्हीट मिक्स्ड फ्रूट जैसे उत्पाद भी हैं। यानी कंपनी का बेबी फूड कारोबार कई उत्पादों और अलग-अलग उम्र के बच्चों के लिए बनाए गए खाद्य उत्पादों तक फैला हुआ है।



