15 साल इलाज, बार-बार जांच और ऑपरेशन का इंतजार… तन्वी की मौत ने खड़े किए AIIMS पर बड़े सवाल

दिल्ली के AIIMS में 15 वर्षीय तन्वी की मौत के बाद उसके पिता ने 14 साल तक ऑपरेशन में देरी का आरोप लगाया है।
दिल्ली के AIIMS में 15 वर्षीय तन्वी की मौत के बाद उसके पिता ने 14 साल तक ऑपरेशन में देरी का आरोप लगाया है।

पिता का आरोप- 2015-16 में ऑपरेशन हो सकता था तो सालों तक क्यों टलता रहा? AIIMS ने विस्तृत जांच के लिए बनाई समिति, कहा- क्लिनिकल रिकॉर्ड और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बिना निष्कर्ष जल्दबाजी होगा

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली

दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में 15 वर्षीय तन्वी की मौत ने मरीजों के इलाज में देरी, रेफरल, बार-बार होने वाली जांच और जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवाल फिर से खड़े कर दिए हैं। तन्वी के पिता मुकेश परियानी का आरोप है कि उनकी बेटी वर्ष 2012 से AIIMS में इलाज के लिए आती रही, लेकिन करीब 14 साल की अवधि में ऑपरेशन नहीं हो सका। परिवार का दावा है कि कई बार जांच कराई गई, ऑपरेशन की तारीख का इंतजार कराया गया और हर बार इलाज आगे टलता गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए AIIMS नई दिल्ली ने अब विस्तृत जांच के लिए एक समिति गठित की है। संस्थान के मुताबिक समिति तन्वी के उपचार के पूरे क्रम, क्लिनिकल रिकॉर्ड, विशेषज्ञों की राय और उसकी मृत्यु से जुड़ी परिस्थितियों की समीक्षा करेगी। AIIMS ने यह भी कहा है कि समिति की रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम के निष्कर्ष आने से पहले किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

2012 में शुरू हुआ इलाज, 2015 तक पहुंची ऑपरेशन की बात

तन्वी के पिता के मुताबिक वह पहली बार 10 अक्टूबर 2012 को अपनी बेटी को AIIMS की OPD में लेकर पहुंचे थे। इसके बाद उन्हें अलग-अलग कमरों और विशेषज्ञों के पास भेजा गया। शुरुआती जांच और परीक्षणों का सिलसिला करीब एक वर्ष चला। इसके बाद उन्हें डॉ. सचिन तलवार के पास भेजा गया। पिता का आरोप है कि डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए पैसे और रक्त जमा कराने को कहा और ऑपरेशन का आश्वासन दिया। उन्होंने 4 अप्रैल 2014 को रक्त और पैसे जमा कर दिए। यहीं से मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है- अगर ऑपरेशन की तैयारी 2014 तक पहुंच चुकी थी, तो वास्तविक सर्जरी क्यों नहीं हुई?

सितंबर 2015: ऑपरेशन के लिए पहुंचे, मिली अगली तारीख

पिता के अनुसार उन्हें ऑपरेशन की तारीख दी गई थी। लेकिन जब वह 2 सितंबर 2015 को AIIMS पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि ऑपरेशन दीपावली के बाद किया जाएगा। इसके बाद परिवार के अनुसार उन्होंने जनवरी 2016 के बाद लगातार अस्पताल से संपर्क किया, लेकिन उन्हें बार-बार बाद में आने के लिए कहा गया। ऑपरेशन लगातार टलता रहा। यही घटनाक्रम इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल बन गया है- क्या उस समय सर्जरी संभव थी और यदि थी, तो उसे टालने का चिकित्सकीय कारण क्या था? इस सवाल का जवाब अब AIIMS की जांच समिति के सामने महत्वपूर्ण होगा।

PMO तक पहुंची शिकायत, फिर भी नहीं हुआ ऑपरेशन

पिता के मुताबिक लगातार देरी के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में औपचारिक शिकायत की। उनका दावा है कि शिकायत के बाद अस्पताल से उन्हें बुलाया गया और कहा गया कि सर्जरी की जाएगी। लेकिन पिता के अनुसार बाद में डॉ. सचिन तलवार ने यह कहते हुए ऑपरेशन करने से इनकार कर दिया कि जब तक शिकायत वापस नहीं ली जाती, तब तक सर्जरी नहीं होगी। यह परिवार का गंभीर आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि जांच के जरिए ही हो सकती है। यहीं एक और बड़ा सवाल पैदा होता है- क्या किसी मरीज का उपचार किसी प्रशासनिक या शिकायत संबंधी विवाद से प्रभावित हुआ था? यदि ऐसा हुआ था, तो यह केवल एक चिकित्सकीय देरी का मामला नहीं बल्कि संस्थागत जवाबदेही का भी प्रश्न बन सकता है।

2018 में फिर जांचें हुईं, लेकिन बीमारी तक नहीं बताई गई

परियानी के मुताबिक वर्ष 2018 में फिर आवश्यक जांच कराने को कहा गया। परिवार ने जांच कराई, लेकिन उनका आरोप है कि इसके बाद उन्हें न तो कोई स्पष्ट जवाब मिला और न ही बीमारी की प्रकृति के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई। यहां भी जांच समिति के सामने एक महत्वपूर्ण बिंदु होगा- क्या सभी आवश्यक जांचों के परिणाम रिकॉर्ड में दर्ज थे, विशेषज्ञों ने उनका मूल्यांकन किया था और परिवार को उपचार की अगली योजना बताई गई थी?

किसी गंभीर जन्मजात हृदय रोग के मामले में इलाज की निरंतरता और फॉलो-अप का रिकॉर्ड इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि बीमारी की स्थिति समय के साथ बदल सकती है।

2023 में फिर AIIMS पहुंचे, 2025 में दोबारा शिकायत

परियानी के अनुसार उन्होंने 2023 में फिर AIIMS का रुख किया, लेकिन तब भी ऑपरेशन नहीं हुआ। इसके बाद वर्ष 2025 में परिवार ने दोबारा शिकायत दर्ज कराई। परिवार को 28 जुलाई 2025 को AIIMS में बुलाया गया। पिता का कहना है कि जब वे बेटी को लेकर पहुंचे तो संबंधित डॉक्टर छुट्टी पर थे। इसके बाद परिवार को कथित तौर पर बताया गया कि बच्ची दवाओं से ही मैनेज कर सकती है और फिलहाल कोई समस्या नहीं है।

अगर जांच में यह तथ्य सामने आता है कि पहले ऑपरेशन की सलाह दी गई थी और बाद में केवल दवाओं से इलाज पर्याप्त माना गया, तो दोनों चिकित्सकीय आकलनों के बीच बदलाव का कारण भी जांच का अहम हिस्सा होगा।

फरवरी 2026: शिकायत के कुछ ही महीने बाद मौत

परियानी के अनुसार दवा लिखे जाने के बाद उन्होंने 9 फरवरी 2026 को फोन के जरिए शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप है कि इसके बाद भी जांचें होती रहीं, लेकिन ऑपरेशन नहीं हुआ। फिर 1 सितंबर 2026 की तड़के तन्वी को हाइपोक्सिक अटैक आया। इसके बाद उसे कार्डियक अरेस्ट हुआ। AIIMS के अनुसार लगातार पुनर्जीवन के प्रयास किए गए, लेकिन सुबह 5:06 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया। अब पोस्टमॉर्टम भी कराया जा रहा है।

AIIMS की जांच समिति क्या-क्या देखेगी?

AIIMS ने स्पष्ट किया है कि समिति केवल मृत्यु के अंतिम क्षणों को नहीं, बल्कि उपचार के पूरे क्रम की समीक्षा करेगी। इस जांच के लिहाज से कम से कम ये सवाल निर्णायक हो सकते हैं:

  1. 2012 में तन्वी की वास्तविक बीमारी और उसकी गंभीरता क्या थीं?
  2. 2014 में रक्त और पैसे जमा कराने के बाद सर्जरी की योजना क्या थी?
  3. 2015 में ऑपरेशन क्यों नहीं हुआ और उसे दीपावली के बाद तक क्यों टाला गया?
  4. 2016-17 में उपचार की स्थिति क्या थी और क्या सर्जरी अब भी चिकित्सकीय रूप से जरूरी थी?
  5. 2018 की जांचों के बाद विशेषज्ञों ने क्या राय दी थी?
  6. 2023 और 2025 में तन्वी की हालत का चिकित्सकीय आकलन क्या था?
  7. जुलाई 2025 में दवाओं से इलाज को पर्याप्त मानने का आधार क्या था?
  8. फरवरी 2026 के बाद मरीज की निगरानी और उपचार योजना क्या थी?
  9. क्या इलाज में कोई वास्तविक चिकित्सकीय देरी हुई और यदि हुई तो उसका कारण क्या था?
  10. सबसे अहम— क्या इलाज में कथित देरी और 1 सितंबर 2026 को हुई मृत्यु के बीच कोई चिकित्सकीय संबंध था?

इन सवालों का उत्तर केवल आरोपों या अस्पताल के बयान से नहीं, बल्कि मेडिकल रिकॉर्ड, जांच रिपोर्ट, विशेषज्ञों की राय, उपचार की टाइमलाइन और पोस्टमॉर्टम निष्कर्षों से ही निकलेगा।

जन्मजात हृदय रोग में ‘समय’ क्यों महत्वपूर्ण है?

तन्वी के मामले में एक अहम तथ्य यह है कि AIIMS के अनुसार वह जटिल जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित थी। जन्मजात हृदय रोग में हृदय की संरचना या उससे जुड़ी रक्त वाहिकाओं में जन्म से मौजूद समस्या शामिल हो सकती है। इसकी गंभीरता अलग-अलग हो सकती है। कुछ मरीजों को नियमित निगरानी और दवाओं की जरूरत होती है, जबकि कुछ स्थितियों में कैथेटर प्रक्रिया या सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है। इसलिए इस मामले में केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं होगा कि “ऑपरेशन क्यों नहीं हुआ?”

असल चिकित्सकीय सवाल यह है- किस समय ऑपरेशन जरूरी था, किस समय वह जोखिमपूर्ण या अनावश्यक माना गया और हर चरण पर विशेषज्ञों का निर्णय क्या था? यही वह अंतर है जो सामान्य प्रशासनिक देरी और वास्तविक चिकित्सकीय लापरवाही के बीच फर्क कर सकता है। तन्वी के पिता ने सवाल उठाया है कि यदि उनकी बेटी का ऑपरेशन 2015, 2016 या 2017 में किया जा सकता था, तो वह इतने वर्षों तक क्यों टलता रहा? उनकी मांग है कि मामले की जांच हो और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।