
— रुखसार, तहलका
नई दिल्ली । 23 सितंबर, 2026 । सुप्रीम कोर्ट में पिछले दो दिनों में आम लोगों के अधिकार और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े तीन अहम मामले चर्चा में रहे। इनमें वंदे मातरम् गाने को लेकर आपराधिक कार्रवाई, कैंसर की जरूरी दवाओं की कीमत और दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर (SIR) से जुड़े मामले शामिल हैं।
वंदे मातरम् मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया है, कैंसर दवा मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को है और दिल्ली एसआईआर (SIR) मामले में चुनाव आयोग से जवाब और स्थिति रिपोर्ट मांगी गई है। इसलिए फिलहाल कोर्ट की टिप्पणियों और आगे आने वाले संभावित असर को समझना ज्यादा जरूरी है।
1. वंदे मातरम्: क्या पूरा गीत न गाने पर आपराधिक कार्रवाई हो सकती है?
मामला क्या है?
यह मामला कर्नाटक के संगीतकार और गायक टी.एम. कृष्णा की याचिका से जुड़ा है। कृष्णा ने 2026 में किए गए कानून में बदलाव और केंद्र सरकार की ओर से जारी उन निर्देशों को चुनौती दी है, जिनके तहत कुछ सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाने की व्यवस्था की गई है।
मामले में एक बड़ा कानूनी सवाल यह है कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक विश्वास या अपनी अंतरात्मा के कारण वंदे मातरम् गाने से इनकार करता है, तो क्या उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है?
2026 के बदलाव के बाद राष्ट्रीय गीत को भी उस कानून के दायरे में लाया गया है, जिसमें राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कुछ कृत्यों को दंडनीय बनाया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकने या ऐसे कार्यक्रम में बाधा डालने पर आपराधिक कार्रवाई का प्रावधान सामने आया है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
22 सितंबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे।
कोर्ट ने 1986 के बिजो एमैनुएल बनाम केरल सरकार (Bijoe Emmanuel) मामले का संदर्भ दिया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन स्कूली बच्चों को संरक्षण दिया था जो अपनी धार्मिक मान्यता के कारण राष्ट्रगान नहीं गाते थे, लेकिन सम्मानपूर्वक खड़े रहते थे।
वर्तमान मामले में कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर कोई व्यक्ति वास्तविक धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़ी आपत्ति के कारण वंदे मातरम् नहीं गाता, तो सिर्फ इस वजह से उसे आपराधिक सजा का सामना नहीं करना चाहिए।
कोर्ट ने क्या तय नहीं किया?
यहां एक बहुत जरूरी बात है।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह अंतिम फैसला नहीं दिया है कि वंदे मातरम् के छह अंतरे गाना अनिवार्य है या नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय गीत क्या होगा और उसमें कितने अंतरे होंगे, यह तय करना सरकार और कानून बनाने वाली व्यवस्था का विषय है। अदालत फिलहाल इस बात की जांच कर रही है कि ऐसे प्रावधानों के साथ किसी व्यक्ति पर आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।
केंद्र सरकार को इस याचिका पर जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।
आम जनता को इससे क्या फायदा हो सकता है?
अगर कोर्ट अंततः धार्मिक या वास्तविक अंतरात्मा की आपत्ति रखने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई से संरक्षण देता है, तो इसका सीधा असर व्यक्ति की अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता पर पड़ेगा।
इसका मतलब यह नहीं होगा कि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय गीत का अपमान कर सकता है। सवाल अलग है—सम्मान बनाए रखते हुए किसी व्यक्ति को गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है या नहीं।
अभी स्थिति क्या है?
अंतिम फैसला बाकी है।
फिलहाल कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है और यह संकेत दिया है कि 1986 के बिजो एमैनुएल फैसले (Bijoe Emmanuel) में तय संवैधानिक सिद्धांत को ध्यान में रखना होगा।
2. ₹2,700 की कैंसर दवा का एमआरपी (MRP) ₹27,000: सुप्रीम कोर्ट ने कीमत पर सवाल क्यों उठाए?
मामला क्या है?
यह मामला कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाओं की कीमत और दवा की कीमत तय करने की व्यवस्था से जुड़ा है।
22 सितंबर को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के सामने एक उदाहरण रखा गया।
इसमें बताया गया कि एक कैंसर की जरूरी दवा की खुदरा विक्रेता को कीमत ₹2,700
जबकि
दवा पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी (MRP) — ₹27,000
यानी दोनों कीमतों में करीब 10 गुना अंतर था।
इस पर कोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी की और सवाल किया कि अगर दवा विक्रेता को ₹2,700 में मिल रही है, तो मरीज से ₹27,000 क्यों लिया जा रहा है।
पहले समस्या क्या थी?
भारत में सभी दवाओं की कीमत एक ही तरीके से नियंत्रित नहीं होती।
दवाओं के मूल्य नियंत्रण आदेश यानी डीपीसीओ (DPCO), 2013 के तहत कुछ जरूरी दवाओं की अधिकतम कीमत तय की जाती है। इन दवाओं के लिए राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी एनपीपीए (NPPA) अधिकतम कीमत तय करता है।
लेकिन बड़ी संख्या में ऐसी दवाएं भी हैं जो इस सूची में शामिल नहीं हैं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि करीब 82 प्रतिशत दवाएं गैर-सूचीबद्ध श्रेणी यानी नॉन-शेड्यूल्ड (non-scheduled) श्रेणी में आती हैं और इनके शुरुआती मूल्य को तय करने के लिए उसी तरह की मूल्य-सीमा व्यवस्था लागू नहीं है।
यही इस मामले का मूल सवाल है—
क्या जरूरी दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने की व्यवस्था पर्याप्त है?
सुप्रीम कोर्ट ने किस कमी पर सवाल उठाया?
कोर्ट ने खास तौर पर पीटीआर (PTR) और एमआरपी (MRP) के बीच बहुत बड़े अंतर पर सवाल उठाया।
पीटीआर यानी वह कीमत जिस पर दवा खुदरा विक्रेता को मिलती है।
एमआरपी यानी वह अधिकतम कीमत जो पैकेट पर लिखी होती है।
अगर इन दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है, तो इसका बोझ मरीज पर पड़ सकता है।
कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि अगर ऐसी महंगी दवाओं का भुगतान सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत किया जाता है, तो इसका असर सरकारी खजाने और कर देने वाले लोगों के पैसे पर भी पड़ सकता है।
सरकार की मौजूदा व्यवस्था क्या कहती है?
सरकार के मार्च 2026 के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, एनपीपीए (NPPA) ने 131 कैंसर दवाओं की अधिकतम कीमतें लागू की हैं।
सरकार के अनुसार, इन कीमतों में पुराने आधार की तुलना में करीब 21 प्रतिशत की कमी आई है और इससे मरीजों को सालाना लगभग 294 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान है।
इसका मतलब यह है कि सरकार के पास पहले से मूल्य-नियंत्रण व्यवस्था मौजूद है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था सभी जरूरी दवाओं और खासकर गैर-सूचीबद्ध दवाओं के लिए पर्याप्त है।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने ₹27,000 वाली दवा की कीमत ₹2,700 कर दी?
सुप्रीम कोर्ट ने अभी यह आदेश नहीं दिया है कि इस दवा का एमआरपी (MRP) ₹27,000 से घटाकर ₹2,700 कर दिया जाए।
कोर्ट ने दवाओं की कीमत तय करने की व्यवस्था, एमआरपी (MRP) और दवाओं पर नियंत्रण को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर 2026 को होनी है।
आम मरीज को इससे क्या फायदा हो सकता है?
अगर आगे अदालत या सरकार की ओर से दवा की शुरुआती कीमत और एमआरपी (MRP) तय करने के नियम मजबूत किए जाते हैं, तो संभावित असर यह हो सकता है:
- जरूरी दवाओं की कीमतों में अनावश्यक बढ़ोतरी पर रोक लग सकती है।
- मरीज और परिवार पर इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सकता है।
- कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में दवा की लागत नियंत्रित हो सकती है।
- सरकारी योजनाओं के तहत इलाज कराने पर सरकारी पैसे का बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।
- दवा की कीमत तय करने की प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी हो सकती है।
लेकिन यह फायदे भविष्य में होने वाले कानूनी और नीतिगत बदलावों पर निर्भर करेंगे। अभी सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश आना बाकी है।
3. दिल्ली एसआईआर (SIR): 33 लाख से ज्यादा मतदाताओं को नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या पूछा?
एसआईआर (SIR) क्या है?
एसआईआर यानी विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision), यानी मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण।
इसका मकसद मतदाता सूची की दोबारा जांच करना है, ताकि मृत लोगों, दूसरी जगह चले गए लोगों या एक से ज्यादा जगह दर्ज नामों जैसी गड़बड़ियों को ठीक किया जा सके।
लेकिन दिल्ली में इसी प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं को नोटिस भेजे जाने पर सवाल उठे हैं।
विवाद क्या है?
दिल्ली एसआईआर (SIR) में 33 लाख से ज्यादा मतदाताओं को नोटिस भेजे जाने की बात कोर्ट के सामने रखी गई।
इन नोटिस में एक कारण “तार्किक विसंगति” यानी लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी (logical discrepancy) बताया गया।
समस्या यह सामने आई कि कई मतदाताओं को यह साफ नहीं था कि उनके रिकॉर्ड में असल गड़बड़ी क्या है।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में मांग की कि मतदाता को साफ बताया जाना चाहिए कि उसके रिकॉर्ड में क्या समस्या मिली है और उसे कौन-से दस्तावेज देने हैं।
चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?
सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली एसआईआर को लेकर सवाल उठाए जाने के बीच चुनाव आयोग ने 23 सितंबर को एक प्रेस नोट जारी कर अपने कामकाज और निर्णय प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण दिया।
आयोग ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत काम करने वाली एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। आयोग के मुताबिक, लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल उसकी सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता, कानून का पालन और बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
आयोग ने यह भी कहा कि उसके सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की कानूनी मंजूरी और तय प्रक्रिया के अनुसार जारी किए जाते हैं।
क्या चुनाव आयुक्तों के बीच अलग-अलग राय हो सकती है?
इस सवाल पर आयोग ने कहा कि किसी संस्था में किसी मुद्दे पर अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग के मुताबिक, किसी अंतिम फैसले से पहले अलग-अलग विचार सामने आना निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा है। इतना ही नहीं, आयोग के अनुसार सिर्फ तीनों चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनाव व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए अपने सुझाव देने के लिए अधिकृत है।
14 आपत्तियों पर आयोग ने क्या कहा?
आयोग ने कहा कि पिछले 10 महीनों में सामने आई कुछ आंतरिक टिप्पणियों को पूरे आयोग के कामकाज की तस्वीर के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आयोग के मुताबिक, इन 10 महीनों में लिए गए फैसलों, जारी निर्देशों और शुरू की गई पहलों का दायरा इससे कहीं बड़ा है। आयोग ने बताया कि इस अवधि में करीब 40 नई पहल शुरू की गईं और देशभर में मतदाता सूची के निरंतर पुनरीक्षण सहित एसआईआर जैसी चुनावी सुधार की प्रक्रियाएं भी आगे बढ़ाई गईं।
आयोग ने दावा किया कि पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले पूरे आयोग की सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
ईसीआईनेट और मतदाता डेटा पर भी आयोग की सफाई
मतदाता डेटा के केंद्रीकरण और ईसीआईनेट को लेकर उठी चिंताओं पर भी चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा।
आयोग ने कहा कि उसके डिजिटल मंच, जैसे ईसीआईनेट (ECINet), अनधिकृत छेड़छाड़ और डेटा में बदलाव को रोकने के लिए कड़े सुरक्षा नियमों के तहत काम करते हैं।
आयोग के अनुसार, इन व्यवस्थाओं में सुरक्षा जांच और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था है। राष्ट्रीय स्तर पर बनाए गए डेटाबेस के लिए भी साइबर सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता पंजीकरण अधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी जैसे वैधानिक अधिकारी कानून के तहत अपने अधिकारों के अनुसार मतदाता पंजीकरण और नाम हटाने की प्रक्रिया पर काम करते हैं।
आयोग ने अपने काम का हवाला भी दिया
अपने बचाव में चुनाव आयोग ने हाल में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में हुए बड़े चुनावों और चुनाव संबंधी प्रक्रियाओं के सफल संचालन का भी उल्लेख किया।
आयोग ने कहा कि इस दौरान बड़े स्तर पर प्रशासनिक और चुनावी व्यवस्था के साथ-साथ आयोग के कई अनुमोदन और निर्देश भी शामिल रहे।
अंत में आयोग ने कहा कि वह अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरी ईमानदारी से निभाने और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
23 सितंबर की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने नोटिस जारी करने के तरीके पर सवाल उठाए।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि कुछ नोटिस “लगभग मशीन की तरह” भेजे जाते दिखाई दे रहे हैं और चुनाव आयोग को यह देखना चाहिए कि नोटिस भेजने से पहले अतिरिक्त जांच या जांच के अतिरिक्त चरण यानी फिल्टर (filters) की जरूरत है या नहीं।
कोर्ट ने खास तौर पर पूछा कि “तार्किक विसंगति” यानी “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” आखिर तय कैसे की जा रही है।
यानी किसी व्यक्ति को नोटिस भेजा जा रहा है तो उसे साफ पता होना चाहिए कि उसे किस बात का जवाब देना है।
कोर्ट ने उदाहरण से क्या समझाया?
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान एक उदाहरण दिया।
अगर कोई व्यक्ति पहले चंडीगढ़ में वोट देता था और बाद में दिल्ली आकर रहने लगा, तो उसके रिकॉर्ड में बदलाव दिखाई दे सकता है।
ऐसी स्थिति में सिर्फ यह कहना कि “आपके रिकॉर्ड में गड़बड़ी है” पर्याप्त नहीं है।
मतदाता को यह बताया जाना चाहिए कि उसे किस बात की जानकारी या सफाई देनी है।
चुनाव आयोग का क्या पक्ष है?
चुनाव आयोग की ओर से अदालत में बताया गया कि:
- दिल्ली में करीब 14,000 बूथ स्तर के अधिकारी यानी बीएलओ (BLO) लगाए गए हैं।
- करीब 1,200 मतदाता पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ (ERO) भी काम कर रहे हैं।
- नोटिस में कारण बताए जा रहे हैं।
- लोगों की मदद के लिए व्यवस्था की जा रही है।
- जरूरत पड़ने पर समय सीमा बढ़ाने पर भी विचार किया जा सकता है।
आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि नोटिस में बताए गए दस्तावेजों की सूची अंतिम या सीमित सूची नहीं है।
एसआईआर (SIR) में आम जनता के लिए असली चिंता क्या है?
यहां दो बातें एक साथ समझना जरूरी है।
एसआईआर का उद्देश्य
मतदाता सूची को साफ और सही करना।
इससे:
- मृत लोगों के नाम हटाए जा सकते हैं।
- एक से ज्यादा जगह दर्ज नामों की पहचान हो सकती है।
- गलत तरीके से दर्ज नामों की जांच हो सकती है।
- सही मतदाता सूची तैयार हो सकती है।
लेकिन समस्या कहां हो सकती है?
अगर किसी वास्तविक मतदाता को गलती से नोटिस मिल जाए और उसे यह ही समझ न आए कि समस्या क्या है, तो वह समय पर सही जवाब नहीं दे पाएगा।
और अगर किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाता है, तो चुनाव के समय उसका वोट डालना प्रभावित हो सकता है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा चिंता का बड़ा हिस्सा “नाम हटाना चाहिए या नहीं” से ज्यादा “नाम हटाने से पहले प्रक्रिया कितनी साफ और निष्पक्ष हो” पर है।
बिहार एसआईआर (SIR) का फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?
दिल्ली मामले को समझने के लिए बिहार एसआईआर में सुप्रीम कोर्ट की पहले की कार्यवाही भी महत्वपूर्ण है।
बिहार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की मतदाता सूची की जांच करने की शक्ति को पूरी तरह खत्म नहीं किया। लेकिन कोर्ट ने प्रक्रिया में नोटिस, जवाब देने का अवसर और उचित प्रक्रिया जैसे सुरक्षा उपायों पर जोर दिया।
इसलिए दिल्ली मामले में भी एक बड़ा सवाल यही है कि मतदाता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का वास्तविक मौका मिल रहा है या नहीं।
हालांकि बिहार और दिल्ली की कार्यवाही को एक ही मामला नहीं माना जाना चाहिए। दोनों राज्यों में चल रही प्रक्रिया और अदालत के सामने मौजूद तथ्य अलग हैं।

तीनों मामलों का आम जनता पर क्या असर हो सकता है?
तीनों मामले अलग-अलग हैं, लेकिन इनके बीच एक महत्वपूर्ण समानता है।
सवाल है-
वंदे मातरम् – राज्य की तय व्यवस्था और व्यक्ति की अंतरात्मा के बीच संतुलन कैसे बने।
दवा के मामले —नियमन और मरीज की जेब के बीच संतुलन कैसे बने।
एसआईआर में — साफ और सही मतदाता सूची बनाने तथा वास्तविक मतदाता के अधिकार की रक्षा के बीच संतुलन कैसे बने।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 23 सितंबर 2026 तक इन तीनों मामलों में अंतिम कानूनी परिणाम अलग-अलग चरणों में हैं। वंदे मातरम् मामले में केंद्र का जवाब बाकी है, कैंसर दवा मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को है और दिल्ली एसआईआर मामले में चुनाव आयोग से जवाब और स्थिति रिपोर्ट मांगी गई है।



