
प्राकृतिक हीरों को लैब में बने हीरे बताकर निर्यात करने के आरोप में लगा था ₹425.27 करोड़ का जुर्माना; सुप्रीम कोर्ट ने कहा- एआई मददगार हो सकता है, लेकिन फैसले की जगह नहीं ले सकता
एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई अब सिर्फ लिखने, तस्वीर बनाने या जानकारी खोजने का माध्यम नहीं रह गया है। कानून और सरकारी फैसलों में भी इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है। लेकिन एआई पर आंख मूंदकर भरोसा कितना महंगा पड़ सकता है, इसका बड़ा उदाहरण सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले में सामने आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक हीरे के कारोबारी पर लगाया गया ₹425.27 करोड़ का कस्टम्स जुर्माना रद्द कर दिया, क्योंकि जिस आदेश के आधार पर यह जुर्माना लगाया गया था, उसमें ऐसे न्यायिक फैसलों का सहारा लिया गया था जो या तो अस्तित्व में ही नहीं थे, उनके उद्धरण गलत थे या वास्तविक फैसलों में वह कानूनी बात कही ही नहीं गई थी, जो कस्टम्स अधिकारी ने उनसे निकाली। सुप्रीम कोर्ट ने इसे एआई की संभावित ‘हैलुसिनेशन’ यानी मनगढ़ंत जानकारी पैदा करने का मामला माना।
फैसला 2 सितंबर 2026 को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने दिया। मामला विजय घनश्याम गडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का था।
₹425 करोड़ का जुर्माना क्यों लगाया गया था?
मामला सूरत के कस्टम्स विभाग से जुड़ा है। 8 अक्टूबर 2025 को एडिशनल कमिश्नर ऑफ कस्टम्स ने विजय घनश्याम गडिया पर कस्टम्स एक्ट, 1962 की धारा 114 के तहत ₹425,27,99,100 का व्यक्तिगत जुर्माना लगाया था। कस्टम्स विभाग का आरोप था कि प्राकृतिक हीरों को लैब में बने हीरों के रूप में घोषित कर निर्यात किया गया, ताकि कम शुल्क देना पड़े। गुजरात हाई कोर्ट ने 20 जनवरी 2026 को गडिया की चुनौती खारिज कर दी थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जांच में पाया गया था कि संबंधित खेप में करीब 99.2 प्रतिशत हीरे प्राकृतिक थे और उन्हें कट-पॉलिश्ड लैब में बने हीरों के रूप में निर्यात करने का आरोप था। कस्टम्स अधिकारी ने गडिया पर इस अवैध निर्यात में मदद करने का आरोप लगाते हुए पूरी खेप के मूल्य के बराबर जुर्माना लगाया था। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मूल विवाद सिर्फ एआई का इस्तेमाल नहीं था। प्राकृतिक और लैब में बने हीरों की कथित गलत घोषणा और उससे जुड़ी कस्टम्स कार्रवाई का पूरा मामला भी अदालत के सामने था।
फिर इस मामले में एआई कहां से आया?
सुप्रीम कोर्ट में गडिया की ओर से यह सवाल उठाया गया कि कस्टम्स अधिकारी के आदेश में जिन कई न्यायिक फैसलों और लेखों का हवाला दिया गया है, उनमें कुछ एआई से तैयार किए गए लगते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिर्फ सुनकर स्वीकार नहीं किया। पीठ ने खुद संबंधित फैसलों और उद्धरणों की जांच की। जांच में सामने आया कि कुछ कथित न्यायिक फैसले मौजूद ही नहीं थे। कुछ के उद्धरण यानी केस नंबर भी गलत या फर्जी थे। वहीं कुछ फैसले वास्तविक थे, लेकिन उनमें वह कानूनी सिद्धांत मौजूद नहीं था, जिसे कस्टम्स अधिकारी ने उनके नाम पर पेश किया था।
अदालत ने इसे एआई की ‘हैलुसिनेशन’ बताया। यानी एआई ने ऐसी कानूनी जानकारी पैदा कर दी जो देखने में असली लगती है, लेकिन वास्तव में उसका कोई भरोसेमंद आधार नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- गलत केस का एक टुकड़ा भी काफी
शीर्ष अदालत ने इस मामले को केवल तकनीकी गलती नहीं माना। उसका कहना था कि किसी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक फैसले में फर्जी या मनगढ़ंत कानूनी सामग्री का इस्तेमाल पूरी निर्णय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले जुलाई 2026 में पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर बैंक मामले में भी एआई से बने फर्जी न्यायिक उद्धरणों पर सख्त रुख अपनाया था। उस फैसले में अदालत ने कहा था कि वकील द्वारा बिना जांचे ऐसे फर्जी फैसलों का हवाला देना पेशेवर कदाचार हो सकता है और यदि कोई न्यायाधीश ऐसे फर्जी या मनगढ़ंत फैसलों पर भरोसा करता है तो यह गंभीर चूक है। गडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी सिद्धांत को आगे बढ़ाते हुए कहा कि फर्जी या एआई से मनगढ़ंत सामग्री पर आधारित फैसला टिकाऊ नहीं रह सकता।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने एआई के इस्तेमाल पर रोक लगा दी?
नहीं। यही इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट ने एआई के इस्तेमाल को पूरी तरह खारिज नहीं किया। अदालत ने माना कि एआई काम को तेज करने और निर्णय प्रक्रिया में सहायता देने वाला उपयोगी साधन हो सकता है। लेकिन इसके साथ अदालत ने साफ चेतावनी दी कि एआई की सहायता को निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने बेहद प्रभावी उदाहरण देते हुए कहा कि एआई ‘ट्रेनिंग व्हील्स’ की तरह मदद कर सकता है, लेकिन उसे ‘पायलट की सीट’ पर बैठाना समझदारी और सुरक्षित दोनों नहीं होगा। सरल भाषा में इसका मतलब है- एआई जानकारी खोज सकता है, लेकिन यह तय नहीं कर सकता कि कानून वास्तव में क्या कहता है।
कोर्ट ने अपना फैसला क्यों पलटा?
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कस्टम्स अधिकारी के आदेश में इस्तेमाल की गई संदिग्ध कानूनी सामग्री ने उस आदेश की वैधता को प्रभावित किया। इसलिए अदालत ने गुजरात हाई कोर्ट का 20 जनवरी 2026 का आदेश रद्द किया, कस्टम्स के 8 अक्टूबर 2025 के मूल आदेश को भी रद्द किया और पूरे मामले को नए सिरे से सुनने के लिए वापस भेज दिया। लेकिन एक महत्वपूर्ण शर्त रखी गई। मामले की दोबारा सुनवाई उसी स्तर के किसी दूसरे अधिकारी को करनी होगी। वह अधिकारी वही व्यक्ति नहीं होगा जिसने 8 अक्टूबर 2025 को मूल आदेश दिया था।
इसका मतलब यह है कि गडिया के खिलाफ मूल आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला नहीं दिया है। अब मामले की दोबारा सुनवाई होगी और उसके बाद ही यह तय होगा कि कस्टम्स का आरोप और जुर्माना कितना टिकता है।
क्या मूल कस्टम्स अधिकारी पर कार्रवाई होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने इस संभावना को पूरी तरह बंद नहीं किया है। अदालत ने कहा कि मूल आदेश लिखने वाले अधिकारी के खिलाफ कानून के मुताबिक कोई कार्रवाई की जानी चाहिए या नहीं, इसका फैसला नियुक्ति करने वाले सक्षम प्राधिकारी पर छोड़ा जाता है। यानी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारी को कोई सीधी सजा नहीं दी है, लेकिन संबंधित प्राधिकारी को कार्रवाई पर विचार करने की छूट दी है। अब, यह फैसला सिर्फ ₹425 करोड़ के जुर्माने का मामला नहीं है। यह उस दौर की चेतावनी है जब एआई तेजी से सरकारी और कानूनी कामकाज में प्रवेश कर रहा है। कानून में एक गलत तथ्य या गलत केस नंबर महज टाइपिंग की गलती नहीं होता। किसी फैसले की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें इस्तेमाल किए गए कानून और न्यायिक मिसालें वास्तव में मौजूद और सही हैं या नहीं।
जुलाई में भी सुप्रीम कोर्ट दे चुका है कड़ी चेतावनी
गडिया मामला अकेला नहीं है। जुलाई 2026 में पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर बैंक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया था कि एनसीएलटी और एनसीएलएटी की कार्यवाही में ऐसे फर्जी और मनगढ़ंत न्यायिक उद्धरण इस्तेमाल हुए थे, जो एआई से तैयार किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों फैसलों को रद्द करते हुए एआई से बने फर्जी न्यायिक उद्धरणों के इस्तेमाल के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का रुख अपनाया था। अदालत ने उस फैसले में यह भी कहा था कि सही तरीके से इस्तेमाल किए जाने वाले एआई पर उसकी आपत्ति नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब एआई से मिली मनगढ़ंत सामग्री को असली कानूनी मिसाल मान लिया जाता है।
अब एआई के लिए असली सवाल क्या है?
इस फैसले के बाद सवाल यह नहीं है कि “क्या सरकारी अधिकारी एआई का इस्तेमाल कर सकते हैं?” ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है- क्या एआई से मिली हर कानूनी जानकारी को आधिकारिक कानून और मूल न्यायिक फैसले से जांचे बिना किसी सरकारी या न्यायिक आदेश का हिस्सा बनाया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट का जवाब साफ है- नहीं। एआई सहायता दे सकता है, शोध को तेज कर सकता है और बड़ी मात्रा में सामग्री खोजने में मदद कर सकता है। लेकिन अंतिम जिम्मेदारी इंसान की ही रहेगी। फैसले का सबसे बड़ा सबक है- एआई तेज है, लेकिन अचूक नहीं।
