दिल्ली में छात्रों की जिंदगी दांव पर: सत्य निकेतन से मुखर्जी नगर तक, 3 साल में 3 बड़े हादसे

दिल्ली में छात्रों की जिंदगी दांव पर: सत्य निकेतन से मुखर्जी नगर तक, 3 साल में 3 बड़े हादसे
पिछले तीन वर्षों में दिल्ली में छात्रों से जुड़े तीन बड़े हादसे हो चुके हैं। सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर और ओल्ड राजेंद्र नगर की घटनाओं ने छात्र सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

रिपोर्टर प्रिया तिवारी

नई दिल्ली: बेहतर भविष्य का सपना लेकर हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों छात्र दिल्ली पहुंचते हैं। कोई UPSC की तैयारी के लिए मुखर्जी नगर और ओल्ड राजेंद्र नगर का रुख करता है, तो कोई दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई के लिए साउथ कैंपस के आसपास सत्य निकेतन जैसे इलाकों में PG या किराये का कमरा तलाशता है। लेकिन पिछले तीन वर्षों में हुए तीन बड़े हादसों ने राजधानी में छात्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कभी कोचिंग सेंटर में आग, कभी बेसमेंट में पानी भरने से मौत और अब PG की इमारत ढहने जैसी घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या दिल्ली में छात्रों के रहने और पढ़ने की जगहों की सुरक्षा की नियमित जांच होती है या प्रशासन हादसे के बाद ही सक्रिय होता है?

तीन साल, तीन बड़े हादसे

पिछले तीन वर्षों में छात्रों से जुड़े तीन बड़े हादसे राजधानी की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर चुके हैं।

वर्ष और स्थानहादसाहताहत/प्रभावमुख्य सवाल
सितंबर 2026, सत्य निकेतनपांच मंजिला निजी PG इमारत ढही7 की मौत, 12 लोगों का रेस्क्यूस्ट्रक्चरल सेफ्टी, निर्माण और निगरानी
जुलाई 2024, ओल्ड राजेंद्र नगरRau’s IAS की बेसमेंट लाइब्रेरी में बारिश का पानी भरा3 UPSC अभ्यर्थियों की मौतबेसमेंट के इस्तेमाल और ड्रेनेज व्यवस्था पर सवाल
जून 2023, मुखर्जी नगरकोचिंग बिल्डिंग में भीषण आगकरीब 61 छात्र अस्पताल पहुंचेFire Safety, Emergency Exit और वेंटिलेशन

इन तीनों घटनाओं का स्वरूप अलग था, लेकिन एक सवाल समान रहा—क्या हादसे से पहले सुरक्षा मानकों की पर्याप्त जांच हुई थी?

सत्य निकेतन हादसा: PG की इमारत ने खोल दी व्यवस्था की पोल

सितंबर 2026 में दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पांच मंजिला निजी PG इमारत अचानक ढह गई। हादसे में 7 लोगों की मौत हुई, जबकि 12 लोगों को रेस्क्यू किया गया।

घटना के बाद MCD के पांच अधिकारियों को निलंबित किया गया। वहीं भवन मालिक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी की गई। हादसे के बाद इमारत के निर्माण, मरम्मत और स्ट्रक्चरल सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की जांच शुरू हुई।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है अगर इमारत में सुरक्षा से जुड़ी गंभीर खामियां थीं, तो उनका पता हादसे से पहले क्यों नहीं चला? क्या किसी PG या किराये की इमारत की सुरक्षा जांच तभी होती है, जब वहां कोई हादसा हो जाए?

ओल्ड राजेंद्र नगर में तीन मौतों के बाद खुलीं सुरक्षा की परतें

27 जुलाई 2024 को ओल्ड राजेंद्र नगर में Rau’s IAS Study Circle की बेसमेंट लाइब्रेरी में बारिश का पानी भरने से तीन UPSC अभ्यर्थियों की मौत हो गई।

इस हादसे के बाद दिल्ली में कोचिंग सेंटरों और लाइब्रेरी की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर देशभर में सवाल उठे। MCD और अन्य एजेंसियों ने बड़े स्तर पर निरीक्षण और कार्रवाई शुरू की।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 28 जुलाई 2024 से 8 फरवरी 2026 के बीच 370 यूनिट्स सील की गईं।

  • 89 कोचिंग सेंटर
  • 181 लाइब्रेरी

इसके अलावा 899 संस्थानों को शो-कॉज नोटिस जारी किए गए।

  • 505 कोचिंग सेंटर
  • 394 लाइब्रेरी

ये आंकड़े बताते हैं कि हादसे के बाद जांच में बड़ी संख्या में ऐसे संस्थान सामने आए जहां नियमों और सुरक्षा मानकों को लेकर कार्रवाई की जरूरत पड़ी। लेकिन यहां भी वही सवाल सामने आता है अगर इतने संस्थानों में खामियां थीं, तो क्या इनकी पहचान हादसे से पहले नहीं की जा सकती थी?

मुखर्जी नगर 2023 में आग के बीच फंसे सैकड़ों छात्र

15 जून 2023 को दिल्ली के मुखर्जी नगर में एक कोचिंग इमारत में भीषण आग लग गई। हादसे के वक्त इमारत में करीब 250 छात्र मौजूद बताए गए। आग लगने के बाद छात्रों के बीच अफरा-तफरी मच गई। कई छात्रों को इमारत से बाहर निकलने के लिए मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

पुलिस और अधिकारियों के मुताबिक करीब 61 छात्रों को अस्पताल पहुंचाया गया। हालांकि इस हादसे में किसी छात्र की मौत की सूचना नहीं थी। इस घटना ने राजधानी के कोचिंग हब में Fire Safety, Emergency Exit, वेंटिलेशन और बिल्डिंग सेफ्टी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए।

जब सुरक्षित हॉस्टल नहीं मिले, तो PG बना मजबूरी

छात्रों की सुरक्षा का सवाल केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं है। इसके पीछे किफायती और सुरक्षित छात्र आवास की कमी भी एक बड़ी वजह है। दिल्ली विश्वविद्यालय में 2.5 लाख से अधिक छात्र पढ़ते हैं, जबकि विश्वविद्यालय के आधिकारिक हॉस्टलों में कुल क्षमता करीब 9,000 बेड के आसपास बताई जाती है।

इस अंतर के कारण बड़ी संख्या में छात्र निजी PG, किराये के कमरे और साझा आवास पर निर्भर रहते हैं।

सत्य निकेतन, मुखर्जी नगर, ओल्ड राजेंद्र नगर, करोल बाग और विजय नगर जैसे इलाकों में छात्रों की बड़ी आबादी इसी निजी आवास व्यवस्था पर निर्भर है। यानी छात्र के सामने अक्सर दो ही विकल्प होते हैं—महंगा कमरा या कम सुविधाओं वाला सस्ता कमरा। ज्यादा किराया और ज्यादा बेड के चक्कर में सुरक्षा से समझौता? छात्रों की बढ़ती मांग के बीच कई इलाकों में छोटे मकानों और इमारतों को PG या छात्र आवास के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। जहां जगह सीमित होती है, वहां ज्यादा छात्रों को रखने के लिए कमरों में अतिरिक्त बेड लगाए जाने, वेंटिलेशन की कमी और आपात स्थिति में बाहर निकलने के रास्तों की समस्या सामने आती है।

कुछ मामलों में अवैध निर्माण या अतिरिक्त मंजिलों को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

ऐसे में सवाल सिर्फ भवन मालिक की जिम्मेदारी का नहीं है।

क्या निजी PG में रहने वाले छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई नियमित और प्रभावी निगरानी व्यवस्था है?

हादसे के बाद कार्रवाई नहीं, हादसे से पहले निगरानी जरूरी

सत्य निकेतन, ओल्ड राजेंद्र नगर और मुखर्जी नगर की घटनाएं एक बात साफ करती हैं—सिर्फ हादसे के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है।

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें खतरे की पहचान हादसे से पहले हो।

क्या हो सकते हैं समाधान?

1. नियमित स्ट्रक्चरल और फायर ऑडिट
PG, कोचिंग सेंटर और लाइब्रेरी जैसे छात्र-बहुल संस्थानों का नियमित थर्ड-पार्टी सेफ्टी ऑडिट कराया जाए।

2. पब्लिक सेफ्टी डैशबोर्ड
एक ऐसा ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाए जहां छात्र और अभिभावक किसी PG या कोचिंग सेंटर का सुरक्षा स्टेटस, फायर NOC और अन्य जरूरी प्रमाणपत्र देख सकें।

3. अवैध बेसमेंट और अतिरिक्त मंजिलों पर सख्ती
रिहायशी इमारतों में बेसमेंट या अन्य हिस्सों के अवैध व्यावसायिक इस्तेमाल पर नियमित निरीक्षण और कार्रवाई हो।

4. सुरक्षित छात्र आवास बढ़ाए जाएं
केंद्र, राज्य सरकार और विश्वविद्यालय मिलकर PPP मॉडल के जरिए सुरक्षित और किफायती हॉस्टल की संख्या बढ़ाएं।

5. शिकायत की आसान व्यवस्था
छात्रों के लिए ऐसा हेल्पलाइन या डिजिटल सिस्टम हो जहां वे किसी इमारत की सुरक्षा संबंधी शिकायत तुरंत दर्ज करा सकें और उसकी कार्रवाई को ट्रैक भी कर सकें।

सवाल सिर्फ तीन हादसों का नहीं, व्यवस्था का है

2023 का मुखर्जी नगर हादसा Fire Safety को लेकर चेतावनी था। 2024 का ओल्ड राजेंद्र नगर हादसा बेसमेंट के इस्तेमाल और कोचिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की खामियों को सामने लाया।

और 2026 का सत्य निकेतन हादसा निजी PG और छात्र आवासों की Structural Safety पर गंभीर सवाल खड़े करता है। तीन साल में तीन घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या दिल्ली में छात्रों की सुरक्षा का सिस्टम अभी भी ‘हादसा पहले, जांच बाद में’ के मॉडल पर चल रहा है?

दिल्ली आने वाला हर छात्र सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। उसके पीछे एक परिवार की उम्मीद, वर्षों की मेहनत और बेहतर भविष्य का सपना होता है। इसलिए अब जरूरत सिर्फ हादसे के बाद अधिकारियों के निलंबन या इमारत सील करने की नहीं है।

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जो हादसा होने से पहले खतरे को पहचान सके। क्योंकि छात्रों की सुरक्षा किसी हादसे के बाद की कार्रवाई नहीं, बल्कि हादसे से पहले की जिम्मेदारी होनी चाहिए।