सत्य निकेतन हादसा: सपनों के साथ दिल्ली आए थे बच्चे, अब घर लौट रही हैं सिर्फ उनकी यादें

सत्य निकेतन हादसा: सपनों के साथ दिल्ली आए थे बच्चे, अब घर लौट रही हैं सिर्फ उनकी यादें
सत्य निकेतन में हुए बिल्डिंग हादसे ने कई परिवारों के सपने तोड़ दिए हैं। छात्रों की मौत के बाद परिवारों में मातम पसरा है।

रिपोर्टर प्रिया तिवारी

दिल्ली के सत्य निकेतन में हुआ दर्दनाक बिल्डिंग हादसा कई परिवारों की जिंदगी में ऐसा खालीपन छोड़ गया है, जिसे शायद कभी भरा नहीं जा सकेगा। जिन बच्चों को उनके माता-पिता ने बेहतर भविष्य और पढ़ाई के सपनों के साथ घर से दूर दिल्ली भेजा था, उनमें से कई अब कभी अपने घर वापस नहीं लौटेंगे।

रविवार की सुबह भी बाकी दिनों की तरह ही शुरू हुई थी। सत्य निकेतन की इमारत में रहने वाले छात्र अपने-अपने कमरों में थे। कोई पढ़ाई कर रहा था, कोई फोन पर परिवार से बात कर रहा था और कोई आने वाले दिनों की तैयारी में जुटा था। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद एक हादसा कई परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल देगा।

घर से विदा करते वक्त माता-पिता ने देखे थे बड़े सपने

बड़े शहर में पढ़ाई के लिए बच्चों को घर से दूर भेजना माता-पिता के लिए आसान नहीं होता। लेकिन उम्मीद होती है कि बच्चा पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा और एक दिन कामयाबी हासिल करके घर लौटेगा।

अर्पित भी ऐसा ही एक सपना लेकर मध्य प्रदेश के देवास से दिल्ली आया था। पढ़ाई पूरी कर अपना भविष्य बनाने की उम्मीद थी। परिवार ने उसे दिल्ली भेजा था ताकि वह आगे बढ़ सके।

लेकिन रविवार को आया हादसा इन उम्मीदों पर भारी पड़ गया।

चेहरे से नहीं हो पा रही थी पहचान, हाथ के तिल से हुई अर्पित की पहचान

हादसे की खबर मिलने के बाद अर्पित के परिवार को करीब 3 बजे इसकी जानकारी मिली। दोस्तों से खबर मिलने के बाद परिजन तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हुए। दिल्ली पहुंचने के बाद परिवार के सामने सबसे मुश्किल घड़ी थी। हादसे में अर्पित की हालत ऐसी थी कि उसके चेहरे से पहचान करना संभव नहीं हो पा रहा था।

आखिरकार उसके दाहिने हाथ पर मौजूद एक तिल उसकी पहचान बना।

जिस बेटे को उसकी मां चेहरे से पहचानती थी, उसी बेटे की पहचान हादसे के बाद हाथ के एक निशान से करनी पड़ी।

यह पल किसी भी परिवार के लिए शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

मां के पास सवाल हैं, जवाब नहीं

अर्पित की मौत की खबर ने उसकी मां को पूरी तरह तोड़ दिया है। बेटे को याद करते हुए उनकी आंखों से आँसू रुक नहीं रहे हैं।

उनकी जुबान पर बस यही बात है

“मेरे बच्चे ने अभी कुछ नहीं देखा था… पढ़ने आया था।”

एक मां के लिए इससे बड़ा दर्द शायद क्या होगा कि जिस बेटे को उसने बेहतर भविष्य के लिए घर से दूर भेजा था, उसी बेटे के शव को लेने के लिए दिल्ली आना पड़ा।

सिर्फ अर्पित का परिवार नहीं, कई घरों में पसरा मातम

सत्य निकेतन हादसे ने एक नहीं, कई परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया है।

किसी घर ने अपना बेटा खोया है, किसी ने भाई, किसी ने पोता और किसी ने अपने परिवार का भविष्य।

ये छात्र सिर्फ पीजी के कमरों में रहने वाले बच्चे नहीं थे। वे अपने परिवारों की उम्मीद थे। उनके पीछे ऐसे माता-पिता थे, जिन्होंने अपनी जिंदगी की कमाई और उम्मीदें बच्चों की पढ़ाई पर लगाई थीं।

घर से निकलते समय शायद किसी मां ने कहा होगा, “समय पर खाना खा लेना।”

किसी पिता ने कहा होगा, “मन लगाकर पढ़ना और खूब आगे बढ़ना।”

किसी भाई या बहन ने कहा होगा, “जल्दी घर आना।”

लेकिन अब इन परिवारों में इंतजार सिर्फ यादों का है।

मलबा हट जाएगा, लेकिन परिवारों का दर्द नहीं

हादसे के बाद मलबा हट जाएगा। सड़कें साफ हो जाएंगी और कुछ समय बाद इलाके में जिंदगी सामान्य भी नज़र आने लगेगी।

लेकिन जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए कुछ भी सामान्य नहीं रहेगा।

एक कमरा हमेशा खाली रहेगा।

फोन की घंटी पर एक पल के लिए उम्मीद जगेगी।

पुरानी तस्वीरें सामने आएंगी।

और हर त्योहार, हर जन्मदिन और हर पारिवारिक मौके पर उनकी कमी महसूस होगी।

सत्य निकेतन हादसा सिर्फ एक इमारत के गिरने की घटना नहीं है। यह उन सवालों को भी सामने लाता है जो छात्रों की सुरक्षा से जुड़े हैं। आखिर ऐसी इमारतों की समय रहते जांच क्यों नहीं हुई?

सुरक्षा नियमों का पालन क्यों नहीं कराया गया? और क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही प्रशासन को कार्रवाई करनी होगी?

इन सवालों के जवाब इसलिए जरूरी हैं क्योंकि दिल्ली जैसे शहरों में हजारों छात्र हर साल अपने घरों से दूर पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए आते हैं।

अर्पित भी इसी उम्मीद के साथ दिल्ली आया था।

उसके परिवार ने उसे भविष्य बनाने के लिए भेजा था।

लेकिन अब उसका परिवार दिल्ली से वापस जाएगा तो साथ में अर्पित नहीं जाएगा। सिर्फ उसकी तस्वीर होगी, उसकी यादें होंगी और एक ऐसा दर्द होगा, जो शायद जिंदगी भर उनके साथ रहेगा।

सत्य निकेतन में सिर्फ एक इमारत नहीं गिरी।

उसके साथ कई परिवारों के सपने और उम्मीदें भी हमेशा के लिए टूट गईं।