
स्नेहलता |
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद के ध्वस्तीकरण के बाद सामने आया एक पुराना कुआं अब पूरे मामले में नया सवाल खड़ा कर रहा है। मलबा हटाने के दौरान मस्जिद के बीचोंबीच मिले इस कुएं की बनावट और इस्तेमाल को लेकर प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। कुआं करीब डेढ़ मीटर व्यास का और 20 से 22 फीट गहरा बताया जा रहा है।
सबसे अहम बात यह है कि कुएं में इस्तेमाल हुई ईंटें पुरानी लखौरी ईंटें प्रतीत हो रही हैं। इसके बाद प्रशासन ने कुएं की उम्र और इतिहास का पता लगाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से संपर्क किया है। ASI की टीम मौके का निरीक्षण कर सकती है।
कुआं कितना पुराना? ASI की जांच पर टिकी नजर
कुएं के सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इसका निर्माण कब हुआ था और कलेक्ट्रेट परिसर में इसका इस्तेमाल किस दौर में होता था। प्रशासन पुराने राजस्व रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दस्तावेजों को भी खंगालने की तैयारी में है।
अधिकारियों की नजर खसरा-खतौनी जैसे पुराने राजस्व अभिलेखों पर भी है। पुराने रिकॉर्ड में जमीन पर मौजूद कुओं और दूसरी संरचनाओं का उल्लेख मिलता रहा है। यदि रिकॉर्ड में इस कुएं का जिक्र मिलता है तो इसके इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी सामने आ सकती है।
लखौरी ईंटें बढ़ा रही हैं ऐतिहासिक दिलचस्पी
इतिहासकार और लेखक डॉ. राजीव उपाध्याय यायावर के अनुसार उत्तर भारत में मुगलकाल के दौरान, खासतौर पर 17वीं और 18वीं शताब्दी के निर्माण कार्यों में लखौरी ईंटों का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता था।
इन ईंटों को जोड़ने के लिए गारे या चूने का इस्तेमाल किया जाता था। उत्तर भारत में इनका प्रयोग करीब 1850 तक निर्माण कार्यों में होता रहा। हालांकि केवल ईंटों की बनावट के आधार पर किसी निर्माण की सटीक उम्र तय नहीं की जा सकती। इसके लिए पुरातात्विक और ऐतिहासिक जांच जरूरी होगी।
राजस्व रिकॉर्ड भी खोलेगा पुराने निर्माण का राज
कलेक्ट्रेट परिसर में पुराने समय में जमीन के इस्तेमाल और वहां मौजूद संरचनाओं का रिकॉर्ड राजस्व दस्तावेजों में दर्ज किए जाने की व्यवस्था थी। लेखपाल फसलों की स्थिति के साथ जमीन पर मौजूद कुएं जैसी संरचनाओं की जानकारी भी दर्ज करते थे।
ऐसे में पुराने खसरा-खतौनी रिकॉर्ड प्रशासन के लिए अहम साबित हो सकते हैं। दस्तावेजों में कुएं का उल्लेख मिलने पर यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि यह संरचना कब से वहां मौजूद थी।
अब जांच से सामने आएगा असली इतिहास
फिलहाल कुएं को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। कुछ लोगों की ओर से इसे पुराने देवस्थान से जोड़कर भी दावा किया गया है, लेकिन इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
अब ASI का सर्वे और पुराने राजस्व अभिलेख इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण होंगे। वैज्ञानिक और दस्तावेजी जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कुआं वास्तव में कितना पुराना है।



