सहारनपुर कलेक्ट्रेट में मस्जिद पर चला बुलडोजर, कोर्ट के फैसले के बाद हुआ एक्शन; इकरा हसन का हाउस अरेस्ट का दावा

सहारनपुर कलेक्ट्रेट की प्राचीन मस्जिद को तड़के 4 बजे बुलडोजर से ध्वस्त किया गया
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित प्राचीन मस्जिद को शनिवार तड़के 4 बजे छह बुलडोजरों से ध्वस्त कर दिया गया। यह कार्रवाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई, हालांकि 22 दिन की अवधि उपलब्ध थी।

2 सितंबर को जिला जज ने मस्जिद कमेटी की अपील खारिज कर सिटी मजिस्ट्रेट का आदेश बरकरार रखा था; कब्जा हटाने के लिए 22 दिन की अवधि के बीच 4 सितंबर की रात मस्जिद सील हुई, डीएम ने सांसद इमरान मसूद को कार्रवाई न होने का भरोसा दिया और कुछ घंटों बाद सुबह चार बजे छह बुलडोजरों ने ढहा दिया

एम. रियाज़ हाशमी। सहारनपुर

सहारनपुर कलेक्ट्रेट के दोनों गेट शनिवार तड़के बंद थे। अंदर, बाहर भारी पुलिस बल तैनात था और किसी को भी परिसर में दाखिल होने की इजाजत नहीं थी। इसी बीच सुबह करीब चार बजे छह बुलडोजर कलेक्ट्रेट परिसर में पहुंचे और देखते ही देखते प्राचीन मस्जिद की इमारत को गिराने की कार्रवाई शुरू हो गई। अंधेरे में शुरू हुए इस एक्शन के दौरान पूरे परिसर को सुरक्षा घेरे में रखा गया और बाहर मौजूद लोगों को अंदर जाने से रोक दिया गया।

पुलिस लाइन में जन्माष्टमी उत्सव, 100 मीटर दूर मस्जिद गिरी

कलेक्ट्रेट और पुलिस लाइन के बीच महज एक छोटी-सी दीवार है। 4 सितंबर की रात पुलिस लाइन में पारंपरिक श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव चल रहा था। रात आगे बढ़ने के साथ उत्सव समाप्ति की ओर था। इसी दौरान, पुलिस लाइन से करीब 100 मीटर की दूरी पर स्थित कलेक्ट्रेट परिसर में प्राचीन मस्जिद को लेकर प्रशासनिक कार्रवाई अपने निर्णायक चरण में पहुंच रही थी। जैसे ही तड़के पुलिस लाइन का जन्माष्टमी उत्सव समाप्ति की ओर पहुंचा, कलेक्ट्रेट परिसर में छह बुलडोजरों ने मस्जिद का ध्वस्तीकरण शुरू कर दिया।

कुछ ही देर में मस्जिद की इमारत मलबे में बदल गई। इसके बाद नगर निगम के डंपर मौके पर पहुंचे और मलबे को लादकर दूसरी जगह भेज दिया गया। यह कार्रवाई उस घटनाक्रम के कुछ ही घंटे बाद हुई, जब 4 सितंबर की रात करीब 8.45 बजे ईशा की नमाज के बाद मस्जिद को प्रशासन ने सील किया था और कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के मुताबिक जिलाधिकारी अरविंद कुमार चौहान ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि बुलडोजर की कार्रवाई नहीं की जाएगी।

22 दिन की अवधि थी, फिर तड़के कार्रवाई क्यों?

यह कार्रवाई ऐसे समय हुई, जब मस्जिद को लेकर चल रहे भूमि विवाद में जिला जज की अदालत 2 सितंबर को मस्जिद कमेटी की अपील खारिज कर चुकी थी और सिटी मजिस्ट्रेट के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें मस्जिद को सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे का मामला मानते हुए बेदखली और ध्वस्तीकरण का आदेश दिया गया था। हालांकि, जिला अदालत के आदेश के बाद कब्जा हटाने के लिए 22 दिन की अवधि निर्धारित की गई थी।

यही वजह है कि अब इस कार्रवाई की टाइमिंग ही सबसे बड़ा सवाल बन गई है- जब 22 दिन की अवधि उपलब्ध थी तो प्रशासन ने 4 सितंबर की रात मस्जिद को सील करने और उसके कुछ ही घंटे बाद 5 सितंबर की सुबह ध्वस्तीकरण करने का फैसला क्यों किया? हालांकि, प्रशासन की ओर से इस कार्रवाई को अदालत के आदेश का अनुपालन बताया गया है। सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह के अनुसार, मस्जिद सरकारी जमीन पर अनधिकृत रूप से बनी थी और मस्जिद कमेटी की अपील अदालत ने खारिज कर दी थी।

मस्जिद को लेकर आखिर विवाद क्या था?

इस मस्जिद का विवाद करीब डेढ़ साल से चल रहा था। शुरुआत बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत से हुई थी। आरोप था कि कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील सरकारी परिसर में सरकारी जमीन पर मस्जिद का निर्माण किया गया और परिसर का इस्तेमाल धार्मिक गतिविधियों के अलावा दूसरे उद्देश्यों के लिए भी किया जा रहा था। यह भी आरोप लगाया गया था कि मस्जिद परिसर के कुछ कमरे किराये पर दिए गए थे और वहां डाकघर भी संचालित होता था। प्रशासन की जांच के बाद मामला उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जेदारों की बेदखली) अधिनियम के तहत सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत तक पहुंचा। विवादित जमीन को प्रशासन ने खसरा संख्या 539 की करीब 315 वर्ग मीटर भूमि बताया। प्रशासन का पक्ष रहा कि यह सरकारी जमीन है और कलेक्ट्रेट परिसर का हिस्सा है।

16 जुलाई को सिटी मजिस्ट्रेट का आदेश

16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने मस्जिद को सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे का मामला मानते हुए उसे हटाने का आदेश दिया। आदेश में 30 दिन के भीतर बेदखली/ ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया और करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का भी प्रावधान किया गया था। प्रशासन का तर्क था कि कलेक्ट्रेट एक संवेदनशील सरकारी परिसर है और वहां किसी अनधिकृत ढांचे का बने रहना सुरक्षा और सरकारी कामकाज की गोपनीयता के लिहाज से उचित नहीं है। हालांकि, इसी परिसर में एक मंदिर भी है जिसे लेकर कोई विवाद नहीं है। मस्जिद कमेटी ने इस आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी। जुलाई में जिला जज की अदालत से उसे अंतरिम राहत मिली और सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश पर एक महीने का स्टे दिया गया था।

2 सितंबर को जिला अदालत ने क्या कहा?

मस्जिद कमेटी की अपील पर जिला जज सतेन्द्र कुमार की अदालत में सुनवाई हुई। 2 सितंबर को अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने विवादित भूमि को सरकारी भूमि मानने वाले प्रशासनिक निष्कर्ष को कायम रखा और बेदखली/ ध्वस्तीकरण के आदेश को भी बरकरार रखा। लेकिन इसी आदेश के साथ कब्जा हटाने के लिए 22 दिन की अवधि का प्रावधान महत्वपूर्ण है।

यही अवधि अब पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गई है। अदालत के आदेश के महज दो दिन बाद, 4 सितंबर की रात मस्जिद सील की गई और 5 सितंबर को तड़के ध्वस्तीकरण कर दिया गया।

मस्जिद पक्ष का दावा- 1911 से मौजूद है मस्जिद

मस्जिद कमेटी का कहना है कि यह कोई हाल में किया गया निर्माण नहीं है, बल्कि 1911 में स्थापित बताई जाने वाली प्राचीन मस्जिद है। मस्जिद पक्ष ने अदालत में पुराने दस्तावेजों के आधार पर इसके लंबे समय से अस्तित्व में होने का दावा किया। मस्जिद पक्ष की ओर से 1 जनवरी 1911 का बिजली बिल भी पेश किया गया था। तर्क था कि यह दस्तावेज साबित करता है कि कलेक्ट्रेट की मौजूदा व्यवस्था से पहले भी वहां मस्जिद मौजूद थी। हालांकि, प्रशासन ने इस दस्तावेज की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया। तर्क रखा गया कि सहारनपुर में बिजली आपूर्ति 1920 के दशक में शुरू हुई थी और 1911 का कथित बिजली बिल इसलिए संदिग्ध है।

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के लिए यह ‘ब्लैक डे’

सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने ध्वस्तीकरण पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे सहारनपुर के लिए ‘ब्लैक डे’ बताया और कानूनी लड़ाई जारी रखने की बात कही है। मसूद इस मामले की शुरुआत से ही मस्जिद पक्ष के समर्थन में मुखर रहे हैं। जुलाई में सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद भी उन्होंने कार्रवाई पर सवाल उठाए थे और कहा था कि जमीन और धार्मिक स्थल से जुड़े मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। अब 4 सितंबर की रात डीएम से हुई बातचीत और 5 सितंबर तड़के हुई कार्रवाई भी उनके विरोध का प्रमुख आधार बन गई है।

सहारनपुर से लेकर लखनऊ तक सियासी घमासान

कार्रवाई के बीच कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए उनके आवास पर पुलिस बल तैनात किया गया और उन्हें घर से बाहर निकलने नहीं दिया गया। हसन सहारनपुर जाकर घटनास्थल का दौरा करना चाहती थीं। पुलिस प्रशासन की ओर से कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए उन्हें रोकने की कार्रवाई की गई बताई गई है।

बसपा प्रमुख मायावती ने सहारनपुर की कार्रवाई पर नाराजगी जताई है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में कथित अवैध धार्मिक स्थलों पर हो रही ऐसी कार्रवाइयों पर सवाल उठाते हुए सरकार से इन्हें रोकने और कानून के मुताबिक निष्पक्ष तरीके से विवादों का समाधान करने की मांग की।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी मस्जिद के ध्वस्तीकरण पर सवाल उठाया है और धार्मिक स्वतंत्रता तथा पुराने दस्तावेजों के आधार पर मस्जिद के अस्तित्व का मुद्दा उठाया है।

प्राचीन मस्जिद अब इतिहास का हिस्सा

शनिवार सुबह तक कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद प्राचीन मस्जिद अब वहां नहीं है। उसका मलबा भी मौके से हटा दिया गया है। एक ओर प्रशासन के पास जिला अदालत के उस फैसले का आधार है, जिसने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा। दूसरी ओर मस्जिद कमेटी और उसके समर्थकों का कहना है कि एक लंबे समय से मौजूद धार्मिक स्थल को हटाने की प्रक्रिया में कई सवाल अनुत्तरित हैं। मस्जिद पक्ष के लिए अब अगला रास्ता ऊपरी अदालत का है। जिला अदालत में अपील खारिज होने के बाद पक्ष ने आगे कानूनी चुनौती की बात कही है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में सरकारी जमीन के दावे, 1911 से मस्जिद के अस्तित्व के दस्तावेजी दावे, अदालत के आदेश और 22 दिन की अवधि के बीच हुई तड़के की कार्रवाई- ये सभी सवाल बने हुए हैं।

धर्मस्थलों पर बुलडोजर: यूपी में एक्शन के बड़े आंकड़े

देश में पिछले कुछ वर्षों में मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे, चर्च और मदरसों समेत धर्मस्थलों के ध्वस्तीकरण का कोई एकीकृत सरकारी राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। स्वतंत्र संगठनों और मीडिया रिपोर्टों में अलग-अलग घटनाओं का संकलन मिलता है, लेकिन उनकी परिभाषाएं और समय-सीमा अलग हैं। उदाहरण के लिए, एक स्वतंत्र अध्ययन ने जून 2024 से फरवरी 2026 के बीच देश में मस्जिदों/ इस्लामिक धार्मिक स्थलों से जुड़ी 20 ध्वस्तीकरण कार्रवाइयों को दस्तावेजीकृत किया, लेकिन इसे सभी धर्मस्थलों का राष्ट्रीय आंकड़ा नहीं माना जा सकता।

उत्तर प्रदेश में अप्रैल-मई 2025 में भारत-नेपाल सीमा से लगे सात जिलों में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 225 मदरसों, 30 मस्जिदों, 25 मजारों और छह ईदगाहों पर कार्रवाई की गई। प्रशासन ने इसके पीछे सरकारी जमीन पर कथित अतिक्रमण और बिना मान्यता संचालित संस्थानों को कारण बताया। अगस्त 2025 तक इसी अभियान में 298 कथित अवैध संरचनाएं चिन्हित और 130 ध्वस्त किए जाने की जानकारी दी गई।

संभल में नवंबर 2024 के बाद की कार्रवाई में प्रशासन के अनुसार 1,000 से ज्यादा संरचनाएं हटाई गईं, जिनमें 17 मस्जिदें, 12 मजार, सात कब्रिस्तान और दो मदरसे शामिल थे।

अयोध्या में रामपथ निर्माण के दौरान प्रशासन के अनुसार करीब 30 मंदिर और 14 मस्जिद/ इस्लामिक धार्मिक स्थल प्रभावित हुए; प्रशासन ने इसे सड़क चौड़ीकरण की कार्रवाई बताया।