MP में 6 चीनी मिलें बंद, देश में चीनी महंगी होने पर सरकार ने 10 लाख टन आयात का फैसला किया

मध्यप्रदेश की बंद पड़ी चीनी मिलें और चीनी महंगी होने का मुद्दा
मध्यप्रदेश की छह बड़ी चीनी मिलें वर्षों से बंद हैं, जिससे किसान, कर्मचारी और स्थानीय कारोबार प्रभावित हुए हैं।

संजीव आचार्य

भोपाल, 31 अगस्त: देश में चीनी महंगी होने पर सरकार ने त्योहारों के सीजन के मद्देनजर कमी न हो इसके लिए दस लाख टन चीनी आयात करने का फैसला किया है। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश की कई शक्कर मिलें सालों से बंद हैं और प्लांट और मशीनरी जर्जर हो रहे हैं।

कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय के आमरण अनशन ने प्रदेश की बंद पड़ी शक्कर मिलों के मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया। उन्होंने मुरैना की कैलारस शुगर मिल को दोबारा शुरू कराने की मांग को लेकर अनशन किया। कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना के आश्वासन के बाद अनशन खत्म हो गया, लेकिन किसानों और कर्मचारियों में नाराजगी बनी हुई है।

एमपी में शुगर मिल का मुद्दा कैसे गरमाया

ये मुद्दा मुरैना की कैलारस शुगर मिल से गर्माया, जो करीब 15 साल से बंद है। इसे दोबारा शुरू कराने की मांग को लेकर कांग्रेस विधायक पंकज उपाध्याय ने आमरण अनशन शुरू किया। इसके बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी अनशन स्थल पर पहुंचे, जबकि राहुल गांधी ने आंदोलन को समर्थन दिया।

सरकार के आश्वासन से विधायक और संगठन संतुष्ट नहीं हैं। वजह है कि मिल को शुरू करने के लिए सरकार 2017 के बाद दो बार प्रयास कर चुकी है, लेकिन दोनों बार मामला कागजी खानापूर्ति से आगे नहीं बढ़ पाया।

15 साल में 6 शुगर फैक्ट्रियां बंद हो गईं

कैलारस मिल का मामला अकेला नहीं है। मध्य प्रदेश की छह बड़ी चीनी मिलें वर्षों से बंद हैं। इससे उनसे जुड़े किसान, कर्मचारी और स्थानीय कारोबार प्रभावित हुए हैं।

1. भोपाल शुगर इंडस्ट्रीज, सीहोर (नवाबों के दौर की मिल)

इतिहास: इसकी स्थापना 1937 में भोपाल के अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान ने की थी, बाद में यह मुंबई के वाधवाना समूह के पास चली गई। इसकी क्षमता 1,250 TCD (टन गन्ना प्रतिदिन) थी।

बंद होने की वजह: 1994 से प्रबंंधन-मजदूर विवाद शुरू हुए। प्रबंधन पर मिल को जानबूझकर घाटे में दिखाकर “बीमार इकाई” घोषित करने के आरोप लगे। 2002-03 में मिल बंद हो गई।

विवाद: मिल के पास 4,365 एकड़ से अधिक कृषि भूमि है। आरोप है कि प्रबंधन ने भू-माफियाओं के साथ मिलकर जमीन बेची और कॉलोनियां विकसित कीं। हजारों मजदूरों का 107 करोड़ रुपये से अधिक वेतन और PF बकाया होने का दावा है। इसे लेकर हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई चल रही है।

2. डबरा शुगर मिल, ग्वालियर (सिंधिया रियासत की विरासत)

इतिहास: 1940 में सिंधिया रियासत के दौरान स्थापित इस मिल को तत्कालीन ग्वालियर राज्य ने जमीन दी थी। इसकी क्षमता 1,250 TCD थी।

बंद होने की वजह: वित्तीय संकट के चलते किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर नहीं मिला। इसके बाद किसानों ने गन्ने की जगह दूसरी फसलें लेना शुरू कर दिया। कच्चे माल की कमी से मिल बंद हो गई। अब इसकी मशीनरी और जमीनें विवाद में हैं। डबरा चीनी मिल संघर्ष समिति के संजीव राजपूत कहते हैं कि मिल सरकार की उदासीनता के कारण बंद हुई है।

3. मालवा सहकारी शक्कर कारखाना, बरलाई (इंदौर)

इतिहास: नवंबर 1980 में स्थापित यह प्रदेश की बड़ी सहकारी चीनी मिलों में से एक थी। इंदौर, देवास और उज्जैन के 10,000 किसानों के अंशदान से बनी मिल की क्षमता 1,250 TCD थी।

बंद होने की वजह: 2001 के सूखे से गन्ने का उत्पादन घटा। कुप्रबंधन और करोड़ों के कर्ज के बीच 2002-03 में सरकार के आदेश पर मिल बंद कर दी गई। मिल पर सरकार का ₹165 करोड़ का कर्ज दर्ज है और किसान अपने अधिकारों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

4. नारायणपुरा मिल, गुना (सहकारिता मॉडल की चुनौती)

इतिहास: वर्ष 2000 में सहकारिता मॉडल पर स्थापित इस मिल की क्षमता 2,500 क्विंटल प्रतिदिन थी। इससे 3,000 हेक्टेयर क्षेत्र के किसान जुड़े थे।

बंद होने की वजह: बैंक कर्ज और बढ़ते ब्याज से बैंक घाटे में चला गया। किसानों का भुगतान अटकने पर उन्होंने गन्ने की खेती बंद कर दी। इसके बाद 2017-18 में मिल बंद हो गई।

ताजा स्थिति: जुलाई 2026 में गुना कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल ने तकनीकी टीम के साथ मिल का निरीक्षण किया। उन्होंने इसे दोबारा शुरू करने के लिए विशेष एक्शन प्लान की बात कही। नारायणपुरा शक्कर मिल संगठन के राधेश्याम चंदेल कहते हैं कि मिल बंद होने से करीब 80 गांवों के किसान प्रभावित हुए हैं, 2-3 हजार कर्मचारियों का वेतन बकाया है। सरकार इच्छाशक्ति दिखाए तो जर्जर फैक्ट्री को अब भी दोबारा चलाया जा सकता है।