PM की आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट: कंपनियों का मुनाफा 21%, निवेश सिर्फ 6%

कॉरपोरेट कंपनियों का मुनाफा 21% और निवेश 6% का अंतर
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट में कंपनियों के मुनाफे और निवेश के बीच बड़े अंतर का खुलासा हुआ है।

पीएम की इकॉनोमिक एडवाइजरी कमेटी की रिपोर्ट: कॉरपोरेट कंपनियां मौजूदा संपत्तियों से ज्यादा कमाई कर रही हैं, लेकिन नई फैक्ट्री, मशीनरी और क्षमता बढ़ाने पर खर्च उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा; वजह नई पूंजी से मिलने वाले मुनाफे को लेकर दबाव

एम. रियाज़ हाशमी। नई दिल्ली

देश की कंपनियां मुनाफा तो खूब कमा रही हैं, लेकिन इस तेजी के मुकाबले नया निवेश नहीं कर रही हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम यानी इकोनॉमिक एडवाइजरी काउंसिल-प्राइम मिनिस्टर) के अध्यक्ष प्रो. एस. महेंद्र देव, संयुक्त निदेशक डॉ. श्री वत्स सेहरा, संयुक्त सचिव डॉ. के.के. त्रिपाठी और उप निदेशक कामिल केपीएस भुल्लर की ताजा रिपोर्ट में यह विरोधाभास सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2023-24 में कंपनियों के ब्याज और कर से पहले के मुनाफे (पीबीआईटी- प्रॉफिट बिफोर इंटरेस्ट एंड टैक्स) में करीब 21.4% की बढ़ोतरी हुई। इसके मुकाबले कंपनियों की सकल स्थायी संपत्तियों (जीएफए-ग्रॉस फिक्स्ड एसेट्स) में वृद्धि केवल 6.1% रही। यानी मुनाफे की रफ्तार और नई पूंजीगत संपत्तियों में बढ़ोतरी के बीच बड़ा अंतर है।

सवाल बड़ा है- जब मुनाफा बढ़ रहा है तो निवेश क्यों नहीं?

आम तौर पर माना जाता है कि किसी कंपनी का मुनाफा बढ़े तो वह नई फैक्ट्री लगाएगी, मशीनें खरीदेगी, उत्पादन क्षमता बढ़ाएगी और कारोबार का विस्तार करेगी। लेकिन मौजूदा स्थिति कुछ अलग तस्वीर दिखा रही है।

रिपोर्ट बताती है कि महामारी के बाद कंपनियों का मुनाफा लगातार सुधरा है। वहीं निवेश भी महामारी के झटके से उबरा है, लेकिन उसकी वापसी धीमी और अस्थिर रही। खासकर विदेशी कंपनियों और भारतीय निजी कंपनियों में निवेश की रिकवरी कमजोर रही।

यानी समस्या यह नहीं है कि कंपनियां बिल्कुल निवेश नहीं कर रही हैं। समस्या यह है कि मुनाफे के मुकाबले निवेश की रफ्तार काफी कम है।

2019-20 में क्या हुआ था?

रिपोर्ट के मुताबिक महामारी से ठीक पहले वित्त वर्ष 2019-20 में निवेश में जोरदार उछाल आया था। लेकिन यह उछाल पूरी अर्थव्यवस्था की सभी कंपनियों में समान रूप से नहीं था।

कुछ बड़ी और बहुत अधिक संपत्ति वाली कंपनियों ने उस समय बहुत ज्यादा निवेश किया था। इसे रिपोर्ट ने ‘इन्वेस्टमेंट इंटेंसिटी स्पाइक’ यानी निवेश की असाधारण तेजी के रूप में दर्ज किया है। महामारी के दौरान यह उछाल गायब हो गया और उसके बाद भी वैसा दोबारा देखने को नहीं मिला।

इसका मतलब यह हुआ कि 2019-20 के निवेश स्तर को बनाए रखने के लिए जिस तरह बड़ी कंपनियों का भारी निवेश जरूरी था, वैसा निवेश महामारी के बाद नहीं हुआ।

लेकिन कंपनियां कमजोर भी नहीं हुई हैं

यह इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार कंपनियों की औसत लाभप्रदता में सुधार हुआ है। यानी जो संपत्तियां कंपनियों के पास पहले से हैं, उनसे वे पहले के मुकाबले बेहतर कमाई कर रही हैं। खासकर विनिर्माण कंपनियों में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखा है। समान या कम स्थायी संपत्तियों से अधिक राजस्व हासिल किया जा रहा है। रिपोर्ट इसे मुख्य रूप से मौजूदा उत्पादन क्षमता के बेहतर इस्तेमाल से जोड़ती है, न कि कंपनियों के पूरी तरह ‘एसेट-लाइट’ यानी कम संपत्ति वाले कारोबार की ओर जाने से।

सरल शब्दों में कहें तो:

पहले की मशीनें और फैक्ट्रियां अभी ज्यादा काम आ रही हैं, इसलिए कंपनियों को तुरंत नई क्षमता जोड़ने की उतनी जरूरत महसूस नहीं हो रही।

असली वजह: अगली मशीन से कितना मुनाफा मिलेगा?

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक तर्क यहीं सामने आता है।

किसी कंपनी के लिए यह मायने नहीं रखता कि उसे आज अपनी मौजूदा फैक्ट्री से कितना मुनाफा हो रहा है। नई फैक्ट्री या नई मशीन लगाने का फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि उस नए निवेश से भविष्य में कितना अतिरिक्त मुनाफा मिलने की उम्मीद है।

इसी को रिपोर्ट ‘मार्जिनल प्रोफिटेबिलिटी’ यानी अतिरिक्त निवेश से मिलने वाली सीमांत लाभप्रदता के संदर्भ में समझाती है।

रिपोर्ट के विश्लेषण में संकेत मिले हैं कि महामारी के बाद नई पूंजी लगाने से शुरुआती दौर में मिलने वाला मुनाफा कमजोर हुआ है। इसलिए कंपनियों पर नए निवेश को लेकर नीचे की ओर दबाव है।

यानी कंपनी के पास पैसा है, मुनाफा भी है, लेकिन सवाल यह है: नई फैक्ट्री लगाएंगे तो उससे हमें पहले जैसी कमाई मिलेगी भी या नहीं?

अगर इस सवाल का जवाब बहुत मजबूत नहीं है तो कंपनी निवेश टाल सकती है।

क्या बाजार में बड़ी कंपनियों का दबदबा इसकी वजह है?

रिपोर्ट ने इस संभावना की भी जांच की, लेकिन उसे इसका मजबूत सबूत नहीं मिला।

बाजार में कंपनियों के दबदबे को एचएचआई (हर्फिंडाल-हिर्शमैन इंडेक्स) से मापा गया। विश्लेषण में पाया गया कि करीब 90.6% कॉरपोरेट परिसंपत्तियों वाले उद्योगों में बाजार एकाग्रता या तो घटी या मामूली बढ़ी। 200 अंक से ज्यादा की बड़ी वृद्धि केवल करीब 9.4% कॉरपोरेट परिसंपत्तियों वाले उद्योगों में हुई। इसलिए रिपोर्ट के मुताबिक बाजार में बढ़ता एकाधिकार निवेश की धीमी रफ्तार की बड़ी वजह नहीं दिखता।

कर्ज की कमी भी मुख्य वजह नहीं

दूसरा सवाल था कि क्या कंपनियां कर्ज के दबाव में हैं और इसलिए निवेश नहीं कर पा रही हैं? रिपोर्ट का जवाब भी काफी हद तक नहीं है। करीब 82.4% कॉरपोरेट परिसंपत्तियों वाले हिस्से में कंपनियों का कर्ज-इक्विटी अनुपात (डीईआर-डेट इक्विटी रेशियो) घटा है। यानी बड़ी संख्या में कंपनियां कर्ज कम कर रही हैं। विस्तृत सांख्यिकीय जांच में भी कर्ज का दबाव निवेश में कमी की प्रमुख वजह साबित नहीं हुआ। यानी तस्वीर यह नहीं है कि कंपनियों के पास पैसा या कर्ज लेने की क्षमता नहीं है। सवाल नए निवेश पर मिलने वाले संभावित रिटर्न का ज्यादा है।

विनिर्माण क्षेत्र से मिल रही है उम्मीद

इस पूरी रिपोर्ट में एक सकारात्मक संकेत भी है। विनिर्माण कंपनियों में महामारी के बाद मौजूदा उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल बेहतर हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2021-22 के बाद स्थायी संपत्ति की तुलना में राजस्व बढ़ने का रुझान दिखा है। इसका अर्थ है कि कंपनियां अपनी मौजूदा मशीनों और उत्पादन क्षमता से ज्यादा उत्पादन और बिक्री हासिल कर रही हैं। अगर मांग आगे भी मजबूत रहती है और मौजूदा क्षमता पूरी तरह इस्तेमाल होने लगती है, तो कंपनियों के लिए नई फैक्ट्री और नई मशीनों में निवेश करना फिर आकर्षक हो सकता है। यानी आज का बेहतर ‘कैपेसिटी यूट्लाइजेशन’ कल के निवेश की जमीन तैयार कर सकता है।

विदेशी कंपनियां और भारतीय निजी कंपनियां पीछे

रिपोर्ट में कंपनियों को स्वामित्व के आधार पर भी देखा गया है। इसमें पाया गया कि भारतीय बिजनेस ग्रुप से जुड़ी कंपनियों में महामारी के बाद निवेश की रिकवरी अपेक्षाकृत ज्यादा लगातार रही। इसके विपरीत विदेशी कंपनियों में 2019-20 के बाद निवेश की तीव्रता में लगातार गिरावट दिखी। भारतीय निजी कंपनियों में भी महामारी के बाद शुरुआती रिकवरी के बाद निवेश का स्तर लगभग स्थिर रहा। हालांकि रिपोर्ट ने किसी कंपनी का नाम लेकर यह नहीं बताया है कि कौन निवेश कर रही है या कौन नहीं।

एक और वजह- भविष्य की तकनीक

रिपोर्ट एक और दिलचस्प संभावना सामने रखती है। तेजी से बदलती तकनीक, खासकर जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण कंपनियों को डर हो सकता है कि आज खरीदी गई तकनीक जल्दी पुरानी पड़ जाए। ऐसे में कोई कंपनी नई तकनीक पर बड़ा खर्च करने के बजाय कुछ समय इंतजार कर सकती है, ताकि यह साफ हो जाए कि भविष्य में कौन-सी तकनीक टिकने वाली है। रिपोर्ट इसे भी निवेश पर दबाव डालने वाला संभावित कारण मानती है।

‘सुपरस्टार कंपनियों’ की कमी भी चर्चा में

रिपोर्ट में ‘सुपरस्टार कंपनियों’ का भी जिक्र है। यहां इसका मतलब ऐसी बेहद उत्पादक कंपनियों से है जो नई तकनीक और नवाचार को बहुत तेजी से बड़े पैमाने पर कारोबार में बदल सकती हैं। रिपोर्ट का कहना है कि 2019-20 में बड़ी ‘एसेट-रिच’ कंपनियों की ओर से आया निवेश उछाल बाद में दोबारा नहीं दिखा। भविष्य में उत्पादकता बढ़ाने वाले क्षेत्रों, खासकर जेनरेटिव एआई जैसे क्षेत्रों में ऐसी बड़ी नवाचार-आधारित कंपनियों का उभरना निवेश को फिर तेज कर सकता है।

सरकार के लिए क्या संदेश?

रिपोर्ट का सुझाव है कि निजी निवेश को बढ़ाने के लिए मौजूदा सरकारी समर्थन को और मजबूत किया जाए। इसमें उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई- प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) जैसी योजनाओं को जारी रखने और मजबूत करने, सार्वजनिक निवेश के जरिये निजी निवेश को बढ़ावा देने और छोटे-मझोले कारोबारों के लिए लक्षित सहायता की बात कही गई है। इसके अलावा रिसर्च एवं डेवलपमेंट यानी आरएंडडी पर खर्च बढ़ाने, उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग मजबूत करने तथा कारोबारी विवादों के निपटारे को तेज करने की जरूरत बताई गई है। हालांकि, रिपोर्ट यह दावा नहीं करती कि उसने निवेश में सुस्ती की हर वजह खोज ली है। मसलन, घरेलू मांग और कारोबारी अनिश्चितता की भूमिका का अलग से विस्तृत परीक्षण नहीं किया गया। रिपोर्ट खुद कहती है कि उपलब्ध आंकड़ों की सीमाओं के कारण ‘एग्रिगेट डिमांड’ का पर्याप्त सांख्यिकीय विश्लेषण संभव नहीं था और अनिश्चितता को मापना भी कठिन है।

निष्कर्ष: पैसा है, मुनाफा है, लेकिन अगला निवेश अभी उतना आकर्षक नहीं

इस रिपोर्ट की पूरी तस्वीर को अगर बेहद आसान भाषा में समझें तो कहानी यह है:

कंपनियां महामारी के बाद फिर अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। उनकी मौजूदा फैक्ट्रियां और मशीनें भी बेहतर तरीके से इस्तेमाल हो रही हैं। लेकिन नई पूंजी लगाने से मिलने वाले अतिरिक्त मुनाफे को लेकर उतना भरोसा नहीं है। इसलिए मुनाफे की रफ्तार 21% से ज्यादा होने के बावजूद स्थायी संपत्तियों में बढ़ोतरी करीब 6% तक सीमित रही। बाजार में बढ़ता एकाधिकार या कंपनियों पर कर्ज का दबाव इस अंतर की मुख्य वजह नहीं दिखता। अब आगे का बड़ा सवाल यही है कि क्या बढ़ती मांग और बेहतर कैपेसिटी यूट्लाइजेशन कंपनियों को अगली बड़ी निवेश लहर के लिए तैयार कर पाएंगे?