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केदारनाथ के पास हेलीकॉप्टर हादसे में 7 लोगों की मौत, इनमें दो पायलट भी

उत्तराखंड में एक हेलीकॉप्टर के हादसे का शिकार होने की खबर है। इसमें सात लोग सवार थे जिनमें सभी की मौत हो जाने की आशंका है। यह हादसा केदारनाथ के नजदीक हुआ है। हादसे में दो पायलट की भी मौत हो गयी है। डीजीसीए ने इसकी पुष्टि की है।

यह हादसा केदारनाथ धाम में दोपहर करीब 12 बजे हुआ है। हादसा केदारनाथ से दो किलोमीटर पहले गरुड़चट्टी में हुआ। हादसे का शिकार हेलीकॉप्टर आर्यन कंपनी का बताया गया है। हादसे की जानकारी मिलती ही रेस्क्यू टीम घटनास्थल के लिए रवाना कर दी गईं हैं।

जानकारी के मुताबिक केदारनाथ धाम से करीब दो किलोमीटर पहले यह हेलीकॉप्टर क्रैश हुआ है। हादसे के कारणों का अभी पता नहीं चला है। यह हेलीकॉप्टर केदारनाथ से वापस लौट रहा था कि हादसे का शिकार हो गया। हादसा केदारनाथ से वापस लौटते समय गरुड़चट्टी के पास हुआ।

यह भी जानकारी मिली है कि जहाँ यह हादसा हुआ है वह केदारनाथ धाम जाने का का पुराना मार्ग है। जानकारी के मुताबिक हादसे के समय हेलिकॉप्टर में छह लोग सवार थे। इनमें से छह लोगों की जान जाने की जानकारी मिली है।

पाकिस्तान संसद के आठ उपचुनाव में छह पर इमरान खान की पार्टी पीटीआई जीती  

पाकिस्तान में संसद की सात सीटों के लिए हुए उपचुनाव में सत्तारूढ़ शरीफ-भुट्टो  सरकार को करारा झटका लगा है। इसके अलावा पंजाब विधानसभा की दो सीटों पर भी जीत दर्ज की है। शरीफ की सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) को  केवल एक सीट पर जीत मिली है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) ने देश में संसद और प्रांतीय विधानसभा की 11 सीटों पर हुए उपचुनाव में सबसे अधिक 8 सीटों पर जीत दर्ज की। मुख्य मुकाबला प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) और खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के बीच था।

पाकिस्तान में अगले साल संसद के चुनाव होने हैं और उससे पहले यह नतीजे इमरान खान की पार्टी पीटीआई के लिए काफी महत्वपूर्ण कहे जा रहे हैं। पाकिस्तान निर्वाचन आयोग के मुताबिक नेशनल असेंबली की आठ और पंजाब प्रांत की तीन विधानसभा सीट पर चुनाव हुआ।

खान ने स्वयं संसद की सात सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से छह पर उन्हें जीत मिली।  कराची सीट पर पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के उम्मीदवार ने उन्हें मात दी।  उनकी पार्टी को मुल्तान में भी हार का सामना करना पड़ा, जहां पीटीआई ने पूर्व विदेश मंत्री शाह महमूद की बेटी मेहर बानो कुरैशी का समर्थन किया था।

संसद की छह सीट के अलावा पीटीआई ने पंजाब विधानसभा की दो सीटों पर भी जीत दर्ज की। इससे पंजाब के उनके मुख्यमंत्री चौधरी परवेज इलाही की स्थिति और मजबूत हो गई है। पीटीआई ने नतीजों के बाद  कहा कि चुनाव नतीजे बताते हैं कि जनता किसके हक में खड़ी है।

एनआईए की गैंगस्टर-आतंकी-ड्रग तस्कर गठजोड़ के तहत 50 जगह छापेमारी

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने मंगलवार को देश के कई हिस्सों में 50 जगह छापेमारी की है। यह छापेमारी गैंगस्टर-आतंकी-ड्रग तस्कर गठजोड़ के सिलसिले में की गयी है।

जानकारी के मुताबिक केंद्रीय जांच एजेंसी ने यह छापे उत्तर भारत में 50 ठिकानों पर मारे हैं। इनमें ज्यादा छापे पंजाब और हरियाणा में हैं। हरियाणा के झज्जर में गैंगस्टर नरेश सेठी के ठिकाने पर एनआईए ने छापा मारा। उसकी टीम तड़के चार बजे ही सेठी के घर पहुँच गयी और छापे के दौरान स्थानीय डीएसपी और स्थानीय पुलिस को साथ रखा।

बताया गया है कि एनआईए ने नरेश सेठी की अवैध संपत्ति और बैंक डिटेल खंगालीं। साथ ही उसके परिजनों से भी पूछताछ की गयी है। एनआईए की टीम करीब पांच घंटे सेठी के घर पर रही। बता दें गैंगस्टर सेठी हत्या, फिरौती सहित अन्य कई संगीन मामलों में आरोपी है।

सेठी आजकल दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद है। उसका नाम लॉरेंस बिश्रोई और अन्य गैंग के साथ भी जुड़ा रहा है। हरियाणा के सोनीपत में भी लॉरेन्स बिश्नोई गैंग्स के शार्प शूटरों और सोनीपत के कुख्यात गैंगस्टर राजू बसोदी और अक्षय पलड़ा के ठिकानों पर एनआईए ने छापेमारी की है। बसोदी और पलड़ा उत्तर भारत में करीब दो दर्जन से ज्यादा संगीन आपराधिक घटनाओं के आरोपी हैं।

महाराष्ट्र के ग्राम पंचायत चुनाव में भाजपा पहले, कांग्रेस दूसरे, उद्धव शिवसेना तीसरे नंबर पर

भाजपा ने दावा किया है कि उसने महाराष्ट्र के ग्राम पंचायत चुनाव में 1079 में से 397 सीटों पर जीत दर्ज की है। इस चुनाव में कांग्रेस ने दूसरी नंबर पर रहते हुए 134, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने 110, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 128 और बाळासाहेबांची शिवसेना ने 114 सीटें जीती हैं। ग्राम पंचायत चुनाव में 300 निर्दलीय उम्मीदवार भी जीते हैं।

यह चुनाव रविवार को हुए थे। इनके नतीजों की घोषणा सोमवार देर शाम की गयी। भाजपा की प्रदेश इकाई के सोशल मीडिया पर दावा किया गया है कि पार्टी ने 397 सीट जीतकर ग्राम पंचायत चुनावों में पहला स्थान हासिल किया है। इस तरह मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली बाळासाहेबांची शिवसेना के साथ उसके गठबंधन का साझा आंकड़ा 478 रहा है।

भाजपा 235 गांवों में सरपंच या ग्राम प्रधान का पद जीतने में सफल रही है जबकि दूसरे नंबर पर कांग्रेस रही जिसने 134 सीटें जीतें। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने 110, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 128 और बाळासाहेबांची शिवसेना ने 114 सीटें जीती हैं। इस तरह विपक्षी कांग्रेस-उद्धव शिवसेना-एएसपी ने मिलाकर 372 सीटें जीती हैं।

इन चुनावों में 300 निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं। कांग्रेस, दोनों शिवसेना और भाजपा सभी ने दावा किया है कि इनमें से अधिकतर उनके समर्थक हैं। कांग्रेस उम्मीदवार मुक्ता कोकर्डे नागपुर जिला परिषद की अध्यक्ष और कुंडा राउत उपाध्यक्ष चुने गए हैं। इनका चुनाव जिला परिषद सदस्यों की विशेष आम सभा की बैठक में किया गया।  जिला परिषद की प्रभावी ताकत 57 है।

बता दें नागपुर जिले में पंचायत समिति के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों के चुनाव के परिणामों में कांग्रेस का दबदबा रहा। नागपुर कांग्रेस (ग्रामीण) के अध्यक्ष राजेंद्र मुलक ने पत्रकारों से इसे एक ऐतिहासिक जीत बताया और दावा किया कि भाजपा जमीन खो रही है। उधर वंचित बहुजन आघाडी (वीबीए) की संगीता अधाऊ और सुनील फातकर को सोमवार को अकोला जिला परिषद का क्रमश: अध्यक्ष और उपाध्यक्ष चुना गया।

उधर मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा कि मतदाताओं ने बाळासाहेबांची शिवसेना के पक्ष में अपना फैसला सुनाया है। उन्होंने कहा – ‘हमने (उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना से अलग होने का) जो कदम उठाया, वह सही साबित हुआ है।’

कश्मीर में हालात खराब, कश्मीरी पंडित के बाद आतंकियों ने 2 मजदूरों की हत्या की

केंद्र सरकार के तमाम दावों के विपरीत कश्मीर में आतंकी वारदातों में कोई कमी नहीं आ रही है। तीन दिन पहले एक कश्मीरी पंडित की हत्या के बाद आतंकियों ने अब दो प्रवासी मजदूरों की हत्या कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के नेता इन हत्याओं पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से पूछा है कि अब तो धारा 370 भी नहीं है तो क्यों यह हत्याएं हो रही हैं। इस बीच घाटी में कश्मीरी पंडित की हत्या के बाद समुदाय के लोगों के प्रदर्शनों में मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी उभरती  दिख रही है।

तीन दिन पहले ही कश्मीर में आतंकियों ने कश्मीरी पंडित की हत्या कर दी थी जिससे यह आशंका जोर पकड़ रही है कि घाटी में आतंकी फिर से पाँव पसार चुके हैं और उनपर लगाम लगानी की कोशिशें पूरी तरह रंग नहीं ला पाई हैं। कश्मीरी पंडित  पूरण कृष्ण भट्ट की हत्या के बाद अब आतंकियों ने शोपियां में दो प्रवासी मजदूरों की हत्या कर दी है।

आतंकियों के ग्रेनेड का शिकार हुए दोनों दोनों मजदूर मनीष कुमार और राम सागर उत्तर प्रदेश में कन्नौज के रहने वाले थे। इन हत्याओं की जिम्मेदारी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) ने ली है। एजेंसियों के मुताबिक यह हत्याएं करने वाले आतंकी एलईटी के  हाइब्रिड आतंकी हैं। पुलिस ने दवा किया है कि उसने हमलावर आतंकी इमरान बशीर गनी को पकड़ लिया है।

इन मजदूरों की हत्या दक्षिण कश्मीर के शोपियां में हरमन के पास तब की गयी जब आतंकियों ने उनपर ग्रेनेड फेंक दिया। इस तरह पिछले तीन दिन में आतंकियों ने तीन लोगों की टारगेट किलिंग की है जिनमें दो गैर कश्मीरी और एक कश्मीरी पंडित है।

डेढ़ महीने में ही लिज़ ट्रस की कुर्सी पर खतरे के बादल, सांसद लाएंगे अविश्वास प्रस्ताव !

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनने के डेढ़ महीने के भीतर ही लिज़ ट्रस की कुर्सी खतरे में दिख रही है। कुछ दिन पगले अपने वित्त मंत्री को पद से हटाने वाली ट्रस बहुत तेजी से सांसदों का समर्थन खो रही हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कंजरवेटिव पार्टी के कम से कम 100 सांसद लिज़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का एक पत्र कंजरवेटिव पार्टी की समिति के प्रमुख को भेजने की तैयारी कर रहे हैं।

ब्रिटिश मीडिया में यह दावा किया गया है। इसमें कहा गया है कि 100 से ज्यादा कंजर्वेटिव साब्सदों ने कंजरवेटिव पार्टी की समिति के प्रमुख ग्राहम ब्रैडी को इस सिलसिले में एक अविश्वास प्रस्ताव पत्र भेजने की तैयारी कर ली है। याद रहे लीज़ भारतीय मूल के ऋषि सुनक को हराकर डेढ़ महीने पहले ही ब्रिटेन की पीएम बनी हैं।

बता दें ब्रिटेन ने 2016 में यूरोपीय संघ छोड़ दिया था जिसके बाद वहां बार-बार प्रधानमंत्री बदले हैं। एक तरह का राजनीतिक संकट वहां बार-बार देखा गया है। दिलचस्प यह है कि यह सब तब हो रहा है जब देश में राजशाही के खिलाफ लोगों की संख्या बढ़ी है।

अब मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि सांसद तत्काल विश्वास मत की मंजूरी के लिए कंजर्वेटिव पार्टी के के नियमों में बदलाव की मांग करने जा रहे हैं ताकि लिज़ के खिलाफ वे प्रस्ताव देकर उसपर जल्दी अमल होता देख सकें। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ऋषि सिनक की टीम अपनी मजबूत वापसी की उम्मीद कर रही है। सर्वे में उन्हें आगे दिखाया जा रहा है।

राजनीतिक रेवडिय़ाँ

लोगों को मुफ़्त सुविधाएँ देने पर छिड़ी बहस के बीच हर पार्टी कर रही लोक-लुभावन वादे

देश में इस समय राजनीतिक दलों के चुनावों में मुफ़्त सुविधाओं की घोषणाओं को लेकर व्यापक स्तर पर चर्चा चल रही है। मामला देश के सर्वोच्च न्यायालय में है। अब चुनाव आयोग ने भी इसे लेकर राजनीतिक दलों को एक पत्र भेजकर इस मसले पर कुछ सवालों के जवाब के साथ अपने विचार 19 अक्टूबर तक देने को कहा है। इसके पक्ष और विरोध में, दोनों ही तरह की राय हैं। हालाँकि एक सच यह भी है कि नेताओं को मुफ़्त की रेवडिय़ों का सबसे ज़्यादा लाभ मिलता है। दूसरा बड़ा सच यह है कि देश और राज्य क़र्ज़ के जाल में गहरे तक उलझ चुके हैं। इसके विभिन्न पहलुओं पर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

देश में राजनीतिक दल अपने विरोधी दलों को मात देने और मत (वोट) लेने के लिए चुनावों में जनता से ऐसे वादे करते रहे हैं, जिनको अमल में लाने के लिए बड़े स्तर पर पैसे की ज़रूरत रहती है। मुफ़्त बिजली, पानी, शिक्षा से लेकर स्कूटी, लेपटॉप, आईपैड और अन्य उपहार तक। हाल के वर्षों में इसका प्रचलन कुछ ज़्यादा ही बढ़ा है। अब इस पर देश भर में बहस छिड़ गयी है कि क्या राजनीतिक दलों को जनता के पैसे पर अपने चुनावी लाभ के लिए इस तरह से वादे करने का अधिकार है? मामला सर्वोच्च न्यायालय में है और देश के चुनाव आयोग ने भी तमाम राजनीतिक दलों को पत्र भेजकर इस बारे में उनकी राय पूछी है। यह मामला राजनीतिक भी बन गया है, क्योंकि कई राजनीतिक दलों का कहना है कि यह उनका अधिकार है कि चुनाव में वो वादे करें और ऐसे लोगों को रियायतें दें, जो इसके हक़दार हैं। वैसे बहुत-से विशेषज्ञ यह मानते हैं कि जनता मुफ़्त की घोषणाओं से हमेशा प्रभावित होकर मतदान करती हो, यह सही नहीं है। ऐसा इक्का-दुक्का मामलों में ही होता है। जबकि अन्य का कहना है कि मुफ़्त की घोषणाएँ मतदाता को लुभाती हैं और इससे प्रभावित होकर वह पार्टी विशेष को मतदान करता है।

दिलचस्प बात यह है कि ऐसी योजनाओं को लेकर समाज, राजनीतिक दल, चिन्तक, वुद्धिजीवी बँटे दिखते हैं। कुछ का कहना है कि कि चुनावी फ़ायदे के लिए मुफ़्त की संस्कृति देश के लिए अभिशाप है; तो कुछ का कहना है कि जो योजनाएँ ज़रूरतमंदों को लाभ पहुँचती हैं, उन्हें जारी रखना चाहिए, क्योंकि संविधान में एक कल्याणकारी राज्य (वेलफेयर स्टेट) होने के नाते सरकारों की यह ज़िम्मेदारी है कि वो अन्तिम ज़रूरतमंद तक भी लाभ पहुँचाएँ।

यह मुद्दा तब शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगस्त में उत्तर प्रदेश के जालौन में अपने एक सम्बोधन में राजनीतिक पार्टियों के मुफ़्त सुविधाओं के वादों को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि लोग मुफ़्त की रेवड़ी बाँट रहे हैं। ये रेवड़ी कल्चर देश को आत्मनिर्भर होने से रोकता है। हालाँकि इस बयान के बाद कई विपक्षी नेताओं और देश के एक बड़े तबक़े ने प्रधानमंत्री को सवालों के कटघरे में खड़ा किया था। इसका कारण यह है कि केंद्र सरकार की ऐसी कई योजनाएँ हैं, जो इस तरह की श्रेणी में रखी जा सकती हैं। इसके बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँच गया, जिसके बाद देश भर में इस मुद्दे पर बहस जारी है।

इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय में वहीं के वकील अश्विनी दुबे ने एक याचिका डाली है, जिसमें उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 में यह स्पष्ट कहा गया है कि नागरिकों को ज़िन्दा रहने के लिए सम्मानजनक पर्यावरण देना निर्वाचित सरकार का फ़र्ज़ है। शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ़ पानी उपलब्ध कराना उनका संवैधानिक दायित्व है। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक सरकारें ऐसा करती रही हैं; लेकिन अब वो अपने रास्ते से भटकी हुई नज़र आती हैं। इन तीनों सुविधाओं को बाज़ार के हाथों सौंप दिया गया है, क्योंकि सरकारों की हालत अब ख़स्ता है।

जनहित की योजनाएँ

चुनाव में मुफ़्त या सस्ते में दी जाने चीज़ों की घोषणा की परिभाषा पर ही विवाद है। ऐसी बहुत-सी योजनाएँ हैं, जिनसे वास्तव में जनता या कहिए कि ज़रूरतमंदों को हाल के दशकों में लाभ पहुँचा हैं। बिलकुल हाल की बात करें, तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) ने कोरोना के समय में देश की एक बड़ी आबादी को फ़ायदा पहुँचाया। यहाँ तक की कोरोना से सामान्य हो रही परिस्थितियों में भी यह योजना बहुत उपयोगी साबित हो रही है। सरकारें भी इस योजना के सहारे अपनी नाक बचाने में सफल रही हैं।

हाँ, यह भी सच है कि भ्रष्टाचारी इस तरह की योजनाओं की ताक में रहते हैं और इनके नाम पर लूट के रास्ते भी निकाल लेते हैं। लेकिन इससे योजनाओं को ग़लत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये समाज के एक बड़े और ज़रूरतमंद तबक़े के लिए बहुत लाभकारी साबित हुई हैं। मुफ़्त घोषणाओं को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह बात कही कि जिन योजनाओं से वास्तव में ज़रूरतमंदों को लाभ पहुँच रहा है, क्या उन्हें भी फ्रीबीस (मुफ़्त घोषणाओं) की श्रेणी में रखा जाएगा?

वैसे भी देखें, तो हाल के वर्षों में एलपीजी सब्सिडी, जो उज्ज्वला सिलेंडर योजना को छोडक़र अब ख़त्म कर दी गयी है; 200 या 300 यूनिट मुफ़्ती बिजली की घोषणाओं की परिभाषा में फ़ेरबदल हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी ने जनता से अपील कि जिन लोगों को एलपीजी में सब्सिडी की ज़रूरत नहीं वे स्वेच्छा से इसे त्याग सकते हैं। काफ़ी लोगों ने ऐसा किया भी। लेकिन बाद में सरकार ने उन लोगों को भी सब्सिडी देनी बन्द कर दी। इसी तरह दिल्ली सरकार ने हाल में कहा कि जिन लोगों को 200 यूनिट तक बिजली में रियायत नहीं चाहिए, वे ख़ुद को इससे अलग कर सकते हैं। एक और बात यह है कि दिल्ली में 200 यूनिट तक मुफ़्त बिजली का लाभ सिर्फ़ उन्हीं लोगों को है, जो 200 यूनिट या उससे कम बिजली ख़र्च करते हैं। नियम यह है कि 200 से एक यूनिट ऊपर जाने से आप मुफ़्त वाली सुविधा से वंचित हो जाते हैं। दिल्ली में सरकारी स्कूलों में मुफ़्त शिक्षा, राशनकार्ड धारकों को 10 किलोग्राम अनाज प्रति व्यक्ति के हिसाब से, कुछ ख़ास जगहों पर मुफ़्त वाई फाई और डीटीसी व कलस्टर बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त यात्रा भी है। सरकारी स्कूल और अस्पताल में मुफ़्त इलाज और पढ़ाई के अलावा पंजाब में भी 300 यूनिट तक मुफ़्त बिजली, हर महिला को 1,000 रुपये महीना देने का वादा किया है, जिस पर सरकार क़रीब 17,000 करोड़ रुपये ख़र्च करेगी।

देश में दशकों से राशन कार्ड पर केंद्र सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत सस्ता अथवा मुफ़्त अनाज देती है। वहीं कोरोना-काल से प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना के तहत पाँच किलोग्राम प्रति व्यक्ति मुफ़्त अनाज दे रही है। कमोवेश सभी राज्यों में यह योजना है। खाद्य सुरक्षा के तहत ज़रूरतमंदों के लिए पीडीएस प्रणाली बहुत उपयोगी साबित हुई है। इसी प्रकार प्रधानमंत्री मोदी के शासन-काल में शुरू की गयी एनडीए के केंद्र सरकार की किसान सम्मान योजना भी ऐसी ही है, जिसमें किसानों के खाते में साल भर में तीन क़िस्तों में 6,000 रुपये डालती है। लेकिन कहा जाता है कि इस योजना का लाभ सभी किसानों को नहीं मिलता। बल्कि यहाँ तक हुआ किसान आन्दोलन से नाराज़ केंद्र सरकार ने कई किसानों को पात्र न बताते हुए उनसे किसान सम्मान की 500 रुपये महीने वाली राशि वापस लौटाने को कहा और ऐसा न करने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने को कहा। इसी प्रकार प्रधानमंत्री ने घर-घर शौचालय मुफ़्त बनवाये। हालाँकि न तो हर घर में शौचालय बने और न ही इस योजना में भ्रष्टाचार रुका। इसके अलावा कांग्रेस के दौर की इंदिरा आवास योजना, जिसके तहत ग़रीबों को सरकारी ज़मीन पर छोटे घर बनाकर दिये गये थे; प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक देश के हर नागरिक को घर देने का वादा किया था, जो कि अभी तक पूरा नहीं हुआ है। हाँ, बहुत-से लोगों को इस योजना के तहत घर बनाने के लिए पैसा मिला है। लेकिन यह योजना भी भ्रष्टाचार से नहीं बची। इसी तरह कई राज्य सरकारें बेरोज़गारी भत्ता देने के वादे करती रही हैं। इसके अलावा दिव्यांगों को अब तक की केंद्र सरकारों से लेकर राज्य सरकारों तक ने मुफ़्त रिक्शे, बैसाखी और दूसरे उपक्रम बाँटे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसी योजना को मुफ़्त की रेवड़ी कहा जाएगा? नहीं कहा जा सकता। दूसरी बात नेताओं और मंत्रियों को लाखों रुपये की कई सुविधाएँ मुफ़्त मिलती है। क्या यह भी रेवड़ी संस्कृति नहीं है?

इसी प्रकार कई राज्य अपने स्तर पर मुफ़्त की योजनाएँ चला रहे हैं। जैसे- मध्य प्रदेश और बिहार में नल जल योजना। इनमें से कुछ में निश्चित ही भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं। बावजूद इसके इनसे लोगों को लाभ मिला है। इससे पहले 15 अगस्त, 1995 को नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने सरकारी स्कूलों के लिए मिड-डे मील योजना शुरू की थी। यह योजना ज़मीन पर बहुत उपयोगी साबित हुई और बड़ी संख्या में बच्चों को स्कूल लाने में सफल रही। आज मिड-डे मील एक बड़ी योजना मानी जाती है; लेकिन इससे चार दशक पहले सन् 1955 में तमिलनाड में तब के मुख्यमंत्री कामराज ने प्राइमरी स्कूलों में ग़रीब बच्चों के लिए भोजन योजना शुरू की थी। उन्हें इस योजना का आइडिया तब मिला, जब वह तिरुनेलवेली ज़िले के चरण महादेवी नगर में एक चौराहे पर रुके हुए थे। उन्होंने वहाँ खड़े एक बच्चे से जब पूछा कि वह स्कूल क्यों नहीं गया, तो उसने कामराज से कहा कि यदि मैं स्कूल जाता हूँ, तो क्या आप मुझे वहाँ खाना देंगे? क्योंकि मेरे पास खाना नहीं है। कामराज को यहीं से स्कूलों में दोपहर की भोजन योजना चलाने की प्रेरणा मिली।

दशकों से चल रहीं मुफ़्त योजनाएँ

देश में आज़ादी के एक दशक के भीतर ही राजनीतिक दल लोकलुभावन योजनों की घोषणा करने लगे थे। इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि उस समय प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी और देश की एक बड़ी आबादी ग़रीबी की रेखा के नीचे थी। ऐसा नहीं कि देश में अब ग़रीबी ख़त्म हो गयी है। आज भी लाखों-लाख लोग ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं। लेकिन निश्चित ही ऐसी योजनाएँ इन लोगों के लिए काफ़ी उपयोगी साबित होती हैं।

वादों की बढ़ती सूची

देखा जाए, तो वादों की जननी दक्षिण के राज्य हैं; जहाँ सस्ते अनाज से लेकर अन्य वाडे किये गये और पूरे भी हुए। एन.टी. रामाराव ने अपने समय में आंध्र प्रदेश में दो रुपये प्रति किलो चावल दिये, तो तमिलनाडु में राजनीतिक दलों ने प्रेशर कुकर, मिक्सर ग्राइंडर, मंगल सूत्र तह देने की शुरुआत की। उत्तर प्रदेश और पंजाब में हाल के चुनावों में यह वादे वाशिंग मशीन, मुफ़्त वाई फाई, स्कूटी, लैपटॉप और टैबलेट तक जा पहुँचे। हालाँकि इसकी चर्चा दिल्ली में भी है। दिल्ली में मुफ़्त बिजली, पानी और शिक्षा का वादा तो देश भर में चर्चा में रहा। अब भाजपा भी बिजली मुफ़्त करने के वादे कर रही है। हाल ही में चुनावों को देखते हुए उसने हिमाचल में 125 यूनिट बिजली मुफ़्त देने का वादा किया है; जबकि इससे कई साल पहले से बिजली उत्पादन करने वाले हिमाचल प्रदेश में बिजली के बिल का आधा ही जनता को देना होता है।

तमिलनाडु में पिछले विधानसभा चुनाव में एआईएडीएमके और डीएमके दोनों ही दलों ने वॉशिंग मशीन, केबल कनेक्शन, मुफ़्त सोलर गैस स्टोव, हर परिवार को छ: गैस सिलेंडर मुफ़्त, कॉलेज छात्रों को एक साल के लिए 2जीबी इंटरनेट (सभी वादे एआईएडीएमके), जबकि डीएमके ने सरकारी स्कूल और कॉलेज के छात्रों को मुफ़्त में टैबलेट देने, गैस सिलेंडर पर 100 रुपये की कटौती जैसे वादे किये और अब सत्ता में आकर डीएमके उन्हें पूरा भी कर रही है।

कांग्रेस ने पंजाब और उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान मुफ़्त में आठ सिलेंडर, 12वीं पास लडक़ी को 20,000 रुपये, 10वीं पास को 10,000 रुपये, कॉलेज जाने वाली लडक़ी को स्कूटी देने के वादे किये। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने 12वीं पास लड़कियों को स्मार्ट फोन, कॉलेज जाने वाली लडक़ी को स्कूटी और 300 यूनिट मुफ़्त बिजली, जबकि भाजपा ने मुफ़्त स्कूटी और लैपटॉप का वादा किया।

राजस्थान में कांग्रेस सरकार प्रदेश की 1.33 करोड़ महिलाओं को स्मार्टफोन, तीन साल की कनेक्टिविटी और मुफ़्त इंटरनेट डाटा का वादा करके इस पर काम कर रही है। राज्य सरकार ने स्मार्ट मोबाइल ख़रीदने के लिए बाक़ायदा 7,500 करोड़ रुपये का बजट मंज़ूर किया। कांग्रेस ने अब हिमाचल के चुनाव में हर घर मुफ़्त बिजली, 18 से 60 साल की आयु की महिलाओं को 1,500 रुपये हर महीने वित्तीय मदद का वादा किया है। आम आदमी पार्टी भी गुजरात और हिमाचल में 300 यूनिट मुफ़्त बिजली और पानी की घोषणा कर चुकी है। अब केजरीवाल दिल्ली और पंजाब की तर्ज पर दूसरे राज्यों में मुफ़्त बिजली, पानी और शिक्षा का वादा कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी के संयोजक कहते हैं कि लोक कल्याणकारी योजना और मुफ़्त योजना में अन्तर है। सन् 2006 में बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना को एक बड़ी योजना माना जाता है, जिसमें सरकार ने युवा बालिकाओं को साइकिल ख़रीदने में मदद दी। सरकार का कहना था कि इस योजना के बाद सरकारी माध्यमिक स्कूलों में लड़कियों के दाख़िले में 30 से ज़्यादा फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई। ऐसी योजनाएँ समय-समय पर राज्य सरकारें चलाती रहती हैं।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने शिशु साथी योजना शुरू की, जिसमें ग़रीब बच्चों की हृदय शल्य चिकित्सा (हार्ट सर्जरी) मुफ़्त में की जाती है। ममता ने वैसे तो सबुज साथी, खाद्य साथी, शिक्षा श्री, गतिधारा से लेकर रूपश्री जैसी आर्थिक रूप से जुड़ी कई योजनाएँ लागू कीं; लेकिन उनकी कन्याश्री योजना की तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तारीफ़ हुई और इसके उन्हें संयुक्त राष्ट्र पब्लिक सर्विस अवार्ड भी मिला। शिक्षा को लेकर दिल्ली की केजरीवाल सरकार की नीति की भी हाल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तारीफ़ हुई है। तमाम आबादी को इसका लाभ भी मिला है। ऐसे में यह फ़र्क़ करना बहुत कठिन है कि ऐसी योजनाएँ सिर्फ़ मत (वोट) लेने के लिए हैं।

मुफ़्त की योजनाओं के विरोध में तर्क

देश में आर्थिक विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग है, जो मुफ़्त की योजनाओं का कड़ा विरोध करता है। इनमें से ज़्यादातर का मानना है कि यह वादे देश की आर्थिक हालत को ख़राब और खोखला कर रहे हैं। चुनाव में राजनीतिक दलों में इस बात ही होड़ लग जाती है कि वह कितने मुफ़्त वादी जनता से कर सकता है, ताकि उसे वोट मिल सकें। वास्तव में यह वादे ऐसे होते हैं, जिनका बजट प्रस्तावों में कोई ज़िक्र या प्रावधान नहीं होता।

विरोध करने वालों का कहना है कि मुफ़्त सुविधाएँ देने से अंतत: सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ पड़ता है। देखा जाए, तो देश के अधिकांश राज्यों की वित्तीय स्थिति मज़बूत नहीं है। यही नहीं, उनके वित्तीय संसाधन बहुत सीमित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि मुफ़्त की घोषणाएँ वांछित लाभ नहीं देतीं और सिर्फ़ ग़ैर-ज़िम्मेदाराना ख़र्च को बढ़ावा देती हैं। उनके मुताबिक, ग़रीबों की मदद के लिए बिजली और पानी के बिल माफ़ करने जैसी योजनाएँ तो कल्याणकारी कही जा सकती हैं; लेकिन पार्टियों की चुनाव और वोट-प्रेरित अव्यवहारिक घोषणाएँ विनाशकारी हैं।

विशेषज्ञ कहते हैं कि आर्थिक नीतियों को यदि प्रभावी तरीक़े से बनाया जाए, भ्रष्टाचार या लीकेज की सम्भावना न हो और लाभार्थियों तक सही तरीक़े से इनकी पहुँच सुनिश्चित बनायी जाए, तो ऐसे मुफ़्त घोषणाओं की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। उनका यही भी तर्क है कि राजनीतिक दलों को आर्थिक प्रभावों की ज़्यादा समझ नहीं होती और वे वादा करते हुए इसके नफ़ा-नुक़सान की नहीं सोचते। दूसरे कई योजनाओं में केंद्र से पैसे की ज़रूरत रहती है और जब इन्हें राजनीतिक रूप से घोषित किया जाएगा, तो केंद्र भी पैसा देने में आनाकानी करेगा।

उनका कहना है कि केवल वही योजनाएँ नुक़सान नहीं करतीं, जिन्हें राज्य अपने बजट में आसानी से समायोजित कर सकें। बुनियादी ज़रूरतों में सब्सिडी जैसे- छोटे बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देना या स्कूलों में मुफ़्त भोजन देना ज़रूर सकारात्मक दृष्टिकोण है। उनका यह भी कहना है कि इसके अलावा सब्सिडी (उपदान) और मुफ़्त में अन्तर करना भी ज़रूरी है। वे सब्सिडी को उचित और लक्षित लाभ बताते हैं, जो माँग से पैदा होता है; जबकि मुफ़्तख़ोरी इससे भिन्न है।

चुनाव आयोग सख़्त

मुफ़्त की रेवड़ी को लेकर राजनीतिक दलों में छिड़ी बहस के दौरान चुनाव आयोग ने 4 अक्टूबर, 2022 को राजनीतिक दलों को एक पत्र लिखकर मुफ़्त की योजनाओं पर उनसे 19 अक्टूबर तक इस पर अपनी राय माँगी है। आयोग ने पत्र में यह कहा है कि राजनीतिक दल अगर कोई चुनावी वादा करने पर उन्हें साथ में यह भी बताना होगा कि अगर वह सत्ता में आते हैं, तो वादे को कैसे पूरा करेंगे? इस पर कितना ख़र्च आएगा? पैसे कहाँ से आएँगे? इसके लिए वो टैक्स बढ़ाएँगे या नॉन-टैक्स रेवेन्यू को बढ़ाएँगे? योजना के लिए अतिरिक्त क़र्ज़ लेंगे या कोई और तरीक़ा अपनाएँगे? चुनाव आयोग भविष्य में राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा-पत्र में एक अलग फार्म होगा, जिसमें यह भरकर यह बताना होगा कि पार्टियों के चुनावी वादे क्या हैं? और वो कैसे इन्हें पूरे करेंगे? उन्हें यह भी बताना होगा कि राज्य की वित्तीय सेहत को देखते हुए उन वादों को कैसे पूरा किया जाएगा। चुनाव आयोग का मानना है कि चुनाव घोषणा-पत्र में यदि ऐसी सूचना होगी, तो मतदाता को विभिन्न राजनीतिक दलों के वादों की तुलना करने और अपना निर्णय लेने में मदद मिलेगी। ज़ाहिर है चुनाव आयोग इसके लिए चुनाव आदर्श आचार संहिता में संशोधन करके ज़रूरी बदलाव करेगा। आयोग का भले कहना है कि चुनाव घोषणा-पत्र बनाना किसी भी राजनीतिक दल का संवैधानिक अधिकार है; लेकिन उन्हें उन वादों पर जानकारी देनी होगी, जिनमें बड़े पैमाने पर धन की ज़रूरत होगी। आयोग इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ज़रूरी बता रहा है। ज़ाहिर है आयोग का इस बात पर ज़ोर है कि पार्टियाँ सिर्फ़ ऐसे वादे करें जिन्हें पूरा किया जाना सम्भव हो। इस मसले पर हाल में मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने एक बैठक की अध्यक्षता की थी, जिसमें यह कहा गया आयोग ऐसे मसलों पर चुपचाप नहीं बैठ सकता। बेशक आयोग यह सब क़वायद कर रहा है; लेकिन विपक्ष आयोग के इन निर्णयों के पीछे केंद्र सरकार को देख रहा है। उसका कहना है कि यह लोकतंत्र के ताबूत में एक और कील होगी। वास्तव में मोदी सरकार इन सब चीज़ों को चुनाव सुधार का हिस्सा बता रही है। यह साफ़ संकेत मिल रहे हैं कि केंद्र इन सब बातों को क़ानून का हिस्सा बनाने के लिए जन प्रतिनिधित्व क़ानून में बदलाव की तैयारी कर रही है।

सर्वोच्च न्यायालय में क्या हुआ?

सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर एक जनहित याचिका दायर की गयी है, जिसमें घोषणा-पत्र में किये गये अपने वादों को पूरा करने में विफल रहने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने का चुनाव आयोग को निर्देश देने की माँग की गयी है। सर्वोच्च न्यायालय में इस जनहित याचिका को दायर कर केंद्र और चुनाव आयोग को चुनाव घोषणा-पत्र को विनियमित करने और उसमें किये गये वादों के लिए राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाने के लिए निर्देश देने की भी माँग की गयी। यह भी कहा गया है कि प्रत्यक्ष रूप से यह घोषित किया जाए कि चुनाव घोषणा-पत्र एक विजन डॉक्यूमेंट है। यह राजनीतिक दल के इरादों, उद्देश्यों और विचारों की एक प्रकाशित घोषणा है, जिसका उस राजनीतिक दल के लिए सत्ता प्राप्ति की राह में व्यापक योगदान देखा जा रहा है। इसलिए यह वैधानिक और क़ानूनी रूप से लागू करने वाला एक योग्य दस्तावेज़ भी कहा जा सकता है।

इससे जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चुनावी मौसम के दौरान राजनीतिक दलों की ओर से मुफ़्त उपहार का वादा एक गम्भीर मुद्दा है, क्योंकि इससे अर्थ-व्यवस्था को नुक़सान हो रहा है। रेवड़ी संस्कृति को सर्वोच्च न्यायालय ने गम्भीर मुद्दा माना। हालाँकि मुफ़्त सौगात देने का वादा करने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द करने पर कहा कि यह विचार अलोकतांत्रिक है। कल्याणकारी योजनाओं और मुफ़्त के रेवड़ी संस्कृति दोनों में कितना अन्तर है, इसको लेकर विवाद है। सर्वोच्च न्यायालय की ओर से भी इस बारे में सुझाव माँगे गये हैं। यूयू ललित से पहले जब यह मामला तब के प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमना के सामने आया था तब उन्होंने कहा था कि यह सरकार का काम है कि वह लोगों के लिए काम करे। उस समय मुख्य न्यायाधीश रमना की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि न्यायालय राजनीतिक दलों को मुफ़्त में चीज़ें देने की योजनाओं का ऐलान करने से नहीं रोक सकती। यह सरकार का काम है कि वह लोगों के लिए वेलफेयर के लिए काम करे। न्यायालय ने कहा था कि चिन्ता की बात यह है कि कैसे जनता के पैसे को ख़र्च किया जाए। यह मामला काफ़ी जटिल है। इस बात का भी सवाल उठता है कि क्या इस मसले पर कोई फ़ैसला देने का अधिकार न्यायालय के पास है।

प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा था कि किन योजनाओं को मुफ़्तख़ोरी की घोषणाओं में शामिल किया जा सकता है और किन्हें नहीं, यह बहुत जटिल मसला है। उन्होंने कहा था कि हम राजनीतिक दलों को वादे करने से रोक नहीं सकते। सवाल यह है कि कौन-से वादे सही हैं? क्या हम मुफ़्त शिक्षा के वादे को भी मुफ़्त योजना मान सकते हैं? क्या पीने का पानी और कुछ यूनिट बिजली मुफ़्त देने को भी मुफ़्त योजना माना जा सकता है? या फिर उपभोग की वस्तुओं और इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम्स दिये जाने को वेलफेयर स्कीम में शामिल किया जा सकता है। फ़िलहाल चिन्ता की बात यह है कि जनता के पैसे को ख़र्च करने का सही तरीक़ा क्या हो सकता है। कुछ लोगों का कहना होता है कि पैसे की बर्बादी हो रही है। इसके अलावा कुछ लोगों की राय होती है कि यह वेलफेयर है। यह मामला जटिल होता जा रहा है। आप अपनी राय दे सकते हैं। बहस और चर्चा के बाद हम इस पर फ़ैसला ले सकते हैं। यही नहीं कोर्ट ने यह भी कहा कि अकेले वादों के आधार पर ही राजनीतिक दलों को जीत नहीं मिलती। तब रमना ने मनरेगा का उदाहरण भी दिया था। उन्होंने कहा था कि कई बार राजनीतिक दल वादे भी करते हैं; लेकिन उसके बाद भी जीतकर नहीं आ पाते।

क़र्ज़ में देश और राज्य

रेवड़ी संस्कृति की चर्चा के बीच यह जानना भी ज़रूरी है कि देश और राज्यों पर कितना क़र्ज़ है। सरकार के ही आँकड़े देखें, तो 31 मार्च, 2022 तक भारत का विदेशी क़र्ज़ 620.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो मार्च 2021 के अन्त में रहे 573.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर के क़र्ज़ से 8.2 फ़ीसदी अधिक है। जीडीपी के अनुपात मार्च 2022 के अन्त में विदेशी क़र्ज़ जीडीपी के अनुपात में गिरकर 19.9 फ़ीसदी हो गया, जो एक साल पहले 21.2 फ़ीसदी था। विदेशी क़र्ज़ के अनुपात के रूप में विदेशी मुद्रा भण्डार गिरकर मार्च, 2022 के अन्त में 97.8 फ़ीसदी पर रहा, जो एक साल पहले 100.6 फ़ीसदी था। दीर्घ अवधि का क़र्ज़ 499.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर अनुमानित था, जो कुल क़र्ज़ का 80.4 फ़ीसदी है। वहीं, 121.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर का काम अविधि क़र्ज़ ऐसे कुल ऋण का 19.6 फ़ीसदी था। आरबीआई के मुताबिक, देश भर की सभी राज्य सरकारों पर मार्च 2022 तक 72 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का क़र्ज़ था। मार्च 2022 तक देश में 19 राज्य ऐसे थे, जिन पर एक लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का क़र्ज़ था। सबसे ज़्यादा क़र्•ो में तमिलनाडु सरकार है, जिस पर 6.59 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा क़र्ज़ है। इसके बाद उत्तर प्रदेश पर 6.53 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ है।

“हमारे देश रेवड़ी कल्चर को बढ़ावा देने कोशिश हो रही है। मुफ़्त की रेवड़ी बाँटकर वोट बटोरने का कल्चर लाने की कोशिश हो रही है। यह रेवड़ी कल्चर देश के विकास। के लिए बहुत घातक है। इस रेवड़ी कल्चर से देश के लोगों को बहुत सावधान रहना है। मोदी ने कहा कि रेवड़ी कल्चर वाले कभी आपके लिए नये एक्सप्रेस-वे नहीं बनाएँगे। रेवड़ी कल्चर वालों को लगता है कि जनता जनार्दन को मुफ़्त की रेवड़ी बाँटकर उन्हें ख़रीद लेंगे।”

नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री

 

“मुझ पर आरोप लगाये जा रहे हैं कि केजरीवाल मुफ़्त की रेवडिय़ाँ बाँट रहा है। मुझे गालियाँ दी जा रही हैं। मेरा मज़ाक़ उड़ाया जा रहा है। आज मैं देश के लोगों से पूछना चाहता हूँ कि मैं क्या ग़लत कर रहा हूँ। दिल्ली के ग़रीबों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में शानदार शिक्षा दे रहा हूँ। मुफ़्त शिक्षा दे रहा हूँ। मैं देश के लोगों से पूछना चाहता हूँ कि क्या मैं मुफ़्त की रेवडिय़ाँ दे रहा हूँ। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 18 लाख बच्चे पढ़ते हैं। अभी तक इन बच्चों को भविष्य अंधकार में था। पहले पढ़ाई नहीं होती थी। बोर्ड, डेस्क नहीं थे। बच्चों का भविष्य बर्बाद था। आज मैं इनका भविष्य बनाना रहा हूँ। 75 साल में पहली बार 99 फ़ीसदी से ज़्यादा रिजल्ट आया है। प्राइवेट स्कूलों को पीछे छोड़ दिया है। चार लाख बच्चों ने प्राइवेट से नाम कटवाया और सरकारी में दाख़िल करवाया।”

अरविन्द केजरीवाल

मुख्यमंत्री, दिल्ली

मुफ़्त के वादों पर बहस

जब प्रधानमंत्री मोदी ने एक जनसभा में विपक्ष पर निशाना साधते हुए युवाओं को रेवड़ी संस्कृति यानी मुफ़्त योजनाओं के लाभ के ख़िलाफ़ आगाह किया, तो एक नयी बहस छिड़ गयी। मुफ़्त की घोषणाओं पर सर्वोच्च न्यायालय में बहस के बाद चुनाव आयोग ने प्रस्ताव दिया है कि आदर्श आचार संहिता में संशोधन किया जाए, ताकि सभी दलों के लिए मतदाताओं को यह बताना अनिवार्य हो जाए कि वे चुनाव में अपनी तरफ़ से की गयी मुफ़्त सुविधाएँ देने की घोषणाओं को सरकार में आकर लागू करने के लिए आवश्यक धन का इंतज़ाम कैसे और कहाँ से करेंगे?

इस बार विशेष संवाददाता राकेश रॉकी की ‘तहलका’ की आवरण कथा (कवर स्टोरी) ‘राजनीतिक रेवडिय़ाँ’ इसी विषय पर है। आवरण कथा में तर्क दिया गया है कि एक राज्य में, जहाँ ग़रीबी और असमानता है; मुफ़्त योजनाओं की वास्तव में आवश्यकता क्यों है? साथ ही देश और राज्यों पर इनसे पडऩे वाले आर्थिक बोझ के साथ-साथ नेताओं और मंत्रियों को मिलने वाली लाखों की मुफ़्त सुविधाओं का भी ज़िक्र किया गया है। यहाँ तक कि चुनाव आयोग ने भी सर्वोच्च न्यायालय में अपने हलफ़नामे में स्वीकार किया कि मुफ़्त घोषणाएँ व्यक्तिपरक हैं और व्याख्या के लिए खुली हैं। इन घोषणाओं को परिभाषित करना कठिन है। अगर बिजली के बिलों में छूट एक मुफ़्त योजना है, तो ग़रीबों को मुफ़्त अनाज और भी बड़ी मुफ़्त की सौग़ात है।

उसी मानदण्ड से प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण अन्न योजना (पीएम-जीकेएवाई) भी मुफ़्त के दायरे में आ जाएगी। इस योजना के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत दिये जाने वाले राशन के अलावा लगभग 81.35 करोड़ लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति पाँच किलो राशन दिया जाता है। क्या बुज़ुर्गों की आबादी को बिना किसी वित्तीय सहायता के वृद्धावस्था पेंशन एक मुफ़्त या कल्याणकारी उपाय है? जब सरकार कमज़ोर वर्गों को लाभ पहुँचाने के लिए आबादी के सम्पन्न वर्गों पर कर लगाती है, तो क्या ग़लत है? मुफ़्त उपहार देना राज्य को स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सब्सिडी वाली सेवाएँ प्रदान करने और सब्सिडी वाले भोजन या बिजली आदि प्रदान करके परिवारों को ग़रीबी से निपटने में मदद करने का अधिकार देता है। राजनीतिक दलों को चुनावों के दौरान मतदाताओं को बिना वित्तीय प्रावधानों के सभी प्रकार के मुफ़्त उपहार देने का वादा करने में कोई गुरेज़ नहीं है। पंजाब में चुनाव से ठीक पहले आम आदमी पार्टी ने घरेलू उपभोक्ताओं को हर महीने 300 यूनिट मुफ़्त बिजली देने का वादा किया था और अब वह गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी यही वादा दोहरा रही है। जहाँ विपक्षी दल सत्ता में आने पर मतदाताओं से लुभावने वादे करते हैं, वहीं सत्तारूढ़ दल आदर्श आचार संहिता लागू होने के महीनों पहले से ही छूट देना शुरू कर देते हैं।

मुफ़्त योजनाओं, जिन्हें कुछ लोग मुफ़्तखोरी भी कहते हैं; पर यह बहस अन्तहीन है। बड़ा सवाल यह है कि आज़ादी के 75 साल बाद भी हम मुफ़्त चीज़ों के लिए क्यों तरसते हैं? सच तो यह है कि कुछ भी मुफ़्त नहीं मिलता। क्योंकि मुफ़्त की सुविधाओं की भी क़ीमत किसी-न-किसी रूप में चुकानी होती है। समाधान एक स्वतंत्र वित्तीय परिषद् की स्थापना में निहित है। जैसा कि राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन समीक्षा समिति द्वारा अनुशंसित है, ताकि केंद्र और राज्यों को प्रमुख विकास उद्देश्यों में शामिल होने के दौरान सूचित आर्थिक निर्णय लेने में सक्षम बनाया जा सके। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र, नीति आयोग, वित्त आयोग और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को चुनावों के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ़्त उपहार देने की प्रथा से निपटने के लिए रचनात्मक सुझाव देने के लिए एक विशेषज्ञ निकाय का गठन करने के लिए कहा है। यह आशा की जाती है कि निकट भविष्य में इस तरह की घोषणाओं को दरवाज़ा दिखा दिया जाएगा।

प्रखर राजनीतिज्ञ थे मुलायम

धरती पुत्र मुलायम सिंह यादव के न रहने से किस दिशा में जाएगी समाजवाद की राजनीति?

राजनीति में लोहिया की राजनीतिक विचारधारा और योजना को लाने वाले धरती पुत्र कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव महज़ एक नेता भर नहीं थे। क़रीब 55 साल के राजनीतिक सफ़र में उन्होंने राजनीति के कई मुहावरे गढ़े और राज्य से लेकर केंद्र तक की राजनीति में उनका दख़ल रहा। राज्य और केंद्र की राजनीति में मुलायम सिंह इतने लोकप्रिय रहे कि अपने आप में राजनीति का एक कोष थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश में इन दशकों में कई नये प्रतिमान स्थापित किये।

धुर-विरोधी कांशीराम और मायावती के साथ मिलकर सरकार चलाने वाले मुलायम सिंह को सन् 1989 में भाजपा ने मुख्यमंत्री बनाने में सहयोग दिया। मुलायम सिंह मिलनसार थे। उम्र भर आरएसएस की विचारधारा के विरोधी रहने के बावजूद आरएसएस के कई नेता उनसे मिलते-मिलाते रहे।

मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के संस्थापक थे और कुश्ती के जबरदस्त शौक़ीन थे। अपने समर्थकों में नेता जी के नाम से मशहूर मुलायम सिंह के जाने से निश्चित ही देश में सामजवाद की राजनीति को बड़ा झटका लगा है। काफ़ी दिन बीमार रहने के बाद 10 अक्टूबर को जब उन्होंने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अन्तिम साँस ली, तो उनके साथ राजनीति की एक ऐसी शख़्सियत भी चली गयी, जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की राजनीति में दख़ल रखा और कई मौक़े पर विपक्षी एकता के सूत्रधार भी बने। भाजपा के बड़े नेताओं से लेकर कांग्रेस और दक्षिण तक के राजनीतिक दलों के नेताओं से उनका सीधा सम्पर्क था।

नेता जी का जन्म 22 नवंबर, 1939 को इटावा ज़िले के सैफई में हुआ था। राजनीति शास्त्र में एमए की पढ़ाई के बाद वह सन् 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश के जसवंत नगर से विधायक निर्वाचित होकर विधानसभा पहुँचे। इसके बाद उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में कभी पीछे मुडक़र नहीं देखा। मुलायम आठ बार विधायक, जबकि सात बार लोकसभा सदस्य चुने गये। सन् 1996 में उन्हें यूनाइटेड फ्रंट गठबंधन की सरकार में रक्षा मंत्री बनने का भी अवसर मिला। सन् 1977 में वह पहली बार जनता पार्टी से उत्तर प्रदेश के मंत्री बने, जबकि सन् 1989 में वह पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चुने गये। सन् 1992 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की और सन् 1993 में बसपा के साथ मिलकर सरकार बनायी। इसके बाद सन् 1993 में और फिर सन् 2003 में वह दूसरी और तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। पक्ष-विपक्ष में उन्हें राजनीति का माहिर खिलाड़ी समझा जाता था और संसद में उनकी तकरीरों को महत्त्व दिया जाता था। कुल मिलाकर मुलायम का राजनीतिक करियर बेहतरीन रहा। सन् 2012 में उन्होंने अपने बड़े बेटे अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया और सन् 2017 में अखिलेश के ही ऊपर डालकर उन्हें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष बनने दिया; लेकिन मुलायम सिंह अन्तिम साँस तक संरक्षक की भूमिका में रहे। वह अन्तिम समय तक भी लोकसभा में मैनपुरी सीट से सांसद थे।

राजनीति में मुलायम सिंह यादव ने ही लोहिया योजना को लागू किया। सन् 1956 में जब राम मनोहर लोहिया और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर एक समझौते के तहत साथ आने की योजना बना रहे थे, तभी अंबेडकर चल बसे। इस तरह लोहिया का दलित और पिछड़ों को साथ लाने की जो योजना नाकाम-सी होकर अधूरी रह गयी थी, उस पर सन् 1992 में बाबरी मस्जिद ढहने के बाद मुलायम ने नये सिरे से काम किया। मुलायम ने कांशीराम के साथ समझौता किया और सपा (109 सीट) और बसपा (67 सीट) ने मिलकर सरकार बनायी और भाजपा को बड़ा झटका दिया। मुलायम सिंह के समय कई राजनीतिक नारे भी प्रसंग में आये, जिनमें से उस समय एक नारा था- ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गये जय श्रीराम।’ जब बाबरी मस्जिद ढहायी गयी थी, तब कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। उस समय मुलायम सिंह ने कल्याण को समर्थन देने की अपनी $गलती स्वीकार की थी। इससे उनकी पार्टी में विद्रोह भी हुआ।

राजनीति के अलावा यदि मुलायम सिंह का कोई और जुनून रहा, तो वह कुश्ती थी। कहते हैं कि मुलायम परीक्षा तक छोडक़र कुश्ती के मु$काबलों में पहुँच जाते थे। एक बार तो उन्होंने कॉलेज में कवि सम्मेलन के मंच पर ही एक चर्चित दारो$गा को पटक दिया। दरअसल वह एक कवि को सत्ता-विरोधी कविता पढऩे से रोक रहा था। साहित्य और कला प्रेमी मुलायम सिंह के जीवन में कई विवाद भी जुड़े। उन्हें हार नहीं मानने वाले नेताओं में गिना जाता था। एक बार उनकी हत्या का प्रयास भी हुआ, जिसके बाद मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश विधान परिषद् में विपक्ष के नेता बन गये। किसान नेता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने उन्हें लोकदल का नेता भी बनाया।

नब्बे के दशक में जब देश बुरी तरह मंडल-कमंडल की लड़ाई में उलझ गया और सन् 1990 में विश्व हिन्दू परिषद् और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए कार सेवा शुरू की, तब मुलायम उन्हें रोकने के लिए राजनीतिक चर्चा में और आये। यह 30 अक्टूबर, 1990 की बात थी, जब कारसेवकों की भीड़ बे$काबू हो गयी और उसने पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ते हुए मस्जिद की ओर बढऩा शुरू किया। बतौर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने बहुत सख़्त फ़ैसला लेते हुए पुलिस को उन पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। इस गोलीबारी में छ: कारसेवकों की जान चली गयी। इस घटना के दो दिन बाद ही 2 नवंबर को हज़ारों कारसेवक जब हनुमान गढ़ी के क़रीब पहुँच गये, तब मुलायम सिंह के आदेश पर पुलिस को एक बार उन पर फिर गोली चलानी पड़ी, जिसमें क़रीब एक दर्ज़न कारसेवकों की मौत हो गयी। उनके इस फ़ैसले से मुलायम सिंह की छवि हिन्दू विरोधी की बन गयी और भाजपा ने इसका ख़ूब प्रचार किया। भाजपा ने तो उन्हें मुल्ला मुलायम तक कहना शुरू कर दिया। हालाँकि मुलायम सिंह ने इस विरोध के बाद एक जनसभा में कहा कि देश की एकता की रक्षा के लिए उनका फ़ैसला सही था और वह किसी भी तरह की क़ुर्बानी के लिए तैयार हैं। बाद में जब कारसेवक विवादित ढाँचे के क़रीब पहुँच गये, तब पुलिस की कार्रवाई में फिर 16 कारसेवकों सहित 28 लोग मारे गये। यह बात ख़ुद मुलायम सिंह ने स्वीकारी थी। हालाँकि भाजपा का आरोप रहा है कि मरने वालों की संख्या कहीं ज़्यादा थी।

मुलायम सिंह के जाने से निश्चित ही उत्तर प्रदेश की विकट राजनीति पर काफ़ी गहरा असर पड़ेगा। हालाँकि अभी से यह कहना कठिन है कि समाजवाद की मुलायम सिंह की राजनीति के उत्तराधिकारी उनके बेटे अखिलेश यादव बन पाएँगे या नहीं। यह सच है कि अनुभव और राजनीतिक दाँव-पेच में अखिलेश यादव को पिता जैसा बनने में अभी समय लगेगा। निश्चित ही पिता के जाने से अखिलेश के सामने बड़ी चुनौतियाँ आएँगी। इसकी एक वजह हाल के वर्षों में पार्टी और परिवार के भीतर उठापटक का रहना भी है। अत: यह तो समय ही बताएगा कि वह कितनी मज़बूती से परिवार और समाजवादी पार्टी को साथ लेकर चल पाएँगे।

मंदी की आहट

दुनिया में एक बार फिर मंदी की आहट दस्तक देती दिखायी दे रही है। यह ऐसे समय में हो रहा है, जब केंद्र सरकार पाँच ट्रिलियन इकॉनमी की तरफ़ बढऩे का दावा कर रही है। यदि मंदी आती है, तो निश्चित ही मोदी सरकार के लिए यह बड़ी अग्निपरीक्षा होगी; भले इसके कारण भी सन् 2008 की मंदी की तरह वैश्विक हों। हाल में आईएमएफ ने भारत की आर्थिक वृद्धि दर अनुमान आरबीआई के 7.5 फ़ीसदी से घटाकर वित्त वर्ष 2022-23 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.8 फ़ीसदी कर दिया है और भारत की अर्थ-व्यवस्था अभी भी दो साल के मुश्किल कोरोना-काल के नुक़सानों से बाहर नहीं निकल पायी है। हालाँकि आईएमएफ ने यह भी कहा है कि शायद भारत को अमेरिका या दूसरे पश्चिमी देशों के मुक़ाबले कम संकट का सामना करना पड़े।

वैसे तो दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञों की मानें, तो आने वाली इस आर्थिक मंदी का सबसे ज़्यादा असर अमेरिका, ब्रिटेन पर होगा और यूरोप पर इस मंदी की गहरी मार पड़ सकती है। विशेषज्ञों के अनुमान चीन के लिए भी बेहतर नहीं हैं। उनका यह ज़रूर कहना है कि भारत पर इसका शायद ज़्यादा असर न पड़े। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने अपनी एक रिपोर्ट में हाल में कहा था कि दूसरे देशों की तुलना में भारत की स्थिति बेहतर है। अर्थ-व्यव्स्था में वैश्विक गिरावट से उपजी मंदी की मार भारत पर कम ही पड़ेगी।

हालाँकि यह भी सच है कि भारतीय बाज़ारों में कोरोना-काल के दौरान से पहले जैसी तेज़ी नहीं आ सकी है। वैसे इसके बावजूद देश चीन, अमेरिका और ब्रिटेन की तुलना में बेहतर दिख रहा है। साल 2023 में चीन की जीडीपी वृद्धि दर 4.4 फ़ीसदी रहने का अनुमान है, जबकि भारत की अनुमानित वृद्धि दर 6.1 फ़ीसदी बतायी गयी है। आईएमएफ के अलावा हाल में जापानी ब्रोकरेज फर्म नोमुरा की भी एक रिपोर्ट सामने आयी है। इसमें कहा गया है कि साल 2023 में दुनिया की प्रमुख अर्थ-व्यवस्थाएँ मंदी का सामना करेंगी। रिपोर्ट में टेक कम्पनियों के पिछले 5-6 महीने ख़राब बीतने का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि अमेरिकी शेयर बाज़ार पर गिरावट का दौर है। अमेरिकी टेक कम्पनियाँ गूगल, एप्पल, टेस्ला पर सबसे ज़्यादा मार पड़ रही है, जबकि दुनिया में अमेरिका की अर्थ-व्यवस्था सबसे मज़बूत है।

ख़ुद राष्ट्रपति जो बाइडेन स्वीकार कर चुके हैं कि अमेरिका मंदी का सामना कर सकता है। ज़ाहिर है इसका असर दुनिया भर में पड़ेगा। हालाँकि उनका यह भी कहना है कि उसने इस सम्भावित संकट से उबरने की तैयारी की है, जिससे उसके पास इसका मुक़ाबला करने की क्षमता है। अमेरिका, यूरोप के अलावा चीन का भी आर्थिक मंदी में जाना तय माना जा रहा है। कारण यह भी है कि शून्य कोरोना नीति के चलते चीन को बड़ा आर्थिक नुक़सान सहना पड़ा है। आज भी हालत यह है कि वहाँ कोरोना का एक भी मामला सामने आ जाए, तो वहाँ सख़्त पाबंदियाँ लगा दी जाती हैं। इससे कारोबार ठप पड़ जाते हैं और उद्योग को भी बड़ा धक्का लगता है।

इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध ने दुनिया की आर्थिक स्थिति पर जबरदस्त असर डाला है। दरअसल कोरोना महामारी के भयंकर दो साल के बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी दुनिया की आर्थिकी पर विपरीत असर डाला है। वैश्विक निर्यात शृंखला (ग्लोबल सप्लाई चेन) की कमर टूट गयी है और कच्चे तेल के भाव अचानक आसमान छूने रहे हैं। इससे दुनिया भर में आवश्यक चीज़ों का संकट होने से उनके दाम बढ़े हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि रूस और यूक्रेन, दोनों ही गेहूँ-जौ जैसे अनाजों के बड़े निर्यातक हैं।

भारत ही नहीं दुनिया है। कई देश आज की तारीख़ में महँगाई से परेशान हैं। ब्रिटेन में तो महँगाई पिछले 40 साल के सबसे ऊँचे स्तर पर है। अमेरिका भी महँगाई पर क़ाबू के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर रहा है। भारत में हाल में रेपो रेट में लगातार वृद्धि की गयी, जिसका मक़सद महँगाई पर क़ाबू पाना है, क्योंकि देश में खुदरा महँगाई दर आठ फ़ीसदी से ऊपर है।

हाल में स्टिजरलैंड बेस्ड ग्लोबल इंवेस्टमेंट बैंक और दुनिया की टॉप फाइनेंशियल सर्विसेज कम्पनी क्रेडिट सुइस जैसी दिग्गज कम्पनी का शेयर अब तक के सेबल निचले स्तर पर आगे, जिसके बाद आर्थिक विशेषज्ञों ने इसे भविष्य में वैश्विक मंदी का बड़ा संकेत बताया। इस कम्पनी के शेयर 10 अक्टूबर को 10 फ़ीसदी नीचे गिर गये। माना जाता है कि बढ़ती महँगाई के कारण कम्पनी ख़राब वित्तीय स्थिति में फँसी है। रिपोट्र्स के मुताबिक, साल भर पहले ही क्रेडिट सुइस का मार्केट कैप 22.3 बिलियन डॉलर था, जो अब घटकर 10.4 बिलियन डॉलर पर पहुँच गया है, जो इसके शेयरों में 56 फ़ीसदी की गिरावट दर्शाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि क्रेडिट सुइस जैसी ग्लोबल कम्पनी को ऐसी स्थिति झेलनी पद रही है, तो यह ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट के ध्वस्त होने के संकेत हैं।

इसके अलावा पिछले कुछ महीने से कच्चे देल के दाम में लगातार बढ़ोतरी हुई है और इसके दाम लगातार 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ज़्यादा चल रहे हैं। यह माना जाता है कि जब भी किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बिना नागा छ: महीने (दो तिमाही) तक गिरावट होती जाए, तो अर्थशास्त्र की भाषा में इसे आर्थिक मंदी माना जाता है। लेकिन लगातार दो-तिमाही तक जीडीपी दर 10 फ़ीसदी गिर जाए, तो इसे मंदी (डिप्रेशन) कहा जाता है। इसे अर्थशास्त्री बेहद चिन्ताजनक मानते हैं। इसके लिए 1930 के दशक में विश्व युद्ध के बाद की महामंदी का उदाहरण दे सकते हैं। मंदी से जब विकट हो और निचले स्तर पर पहुँच जाएँ, तो उसे महामंदी कहते हैं।

आर्थिक मंदी की सबसे पहली मार जीडीपी के आकर पर पड़ती है और दैनिक उपयोग की ची•ों महँगी हो जाती हैं। ख़र्च बढ़ जाता है और आय गिरने लगती है। इसका असर जनता के ख़रीदारी की क्षमता पर पड़ता है। इसके अलावा कम्पनियाँ पैसा बचने के लिए कर्मचारियों की छँटनी (ले ऑफ) शुरू कर देती हैं। इससे का असर यह होता है कि बेरोज़गारी की लाइन और लम्बी हो जाती है। हाल के कोरोना-काल में यह दिखा था। छोटे व्यवसाय (एमएसएमई) ठप पड़ जाते हैं। कच्चा माल भी महँगा हो जाता है और शेयर बाज़ार में लगा पैसा लोग निकालने लगते हैं।

भारत झेल चुका है मंदी

आज़ादी के बाद सन् 1991 में भारत ने सबसे बड़ी मंदी का सामना किया था। देखा जाए, तो भारत में दो बार मंदी आयी है। पहली बार सन् 1991 में और उसके बाद सन् 2008 में। सन् 1991 में आयी भयंकर मंदी के समय तो भारत की आर्थिक हालत यह थी कि हमारे पास महज़ इतनी ही विदेशी मुद्रा बची थी कि सिर्फ़ तीन हफ़्ते के आयात ख़र्चे पूरे किये जा सकते थे। उस समय भारत क़र्ज़ की क़िस्तें चुकाने में असमर्थ हो गया था और देश का सोना गिरवी रखना पड़ा था। तब देश में चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली सरकार थी।

इसके बाद दूसरी बार सन् 2008 में बड़ी मंदी का सामना देश ने किया, जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। उस मंदी का कारण हालाँकि वैश्विक थे और आर्थिक विशेषज्ञों ने कहा था कि एक जाने-माने अर्थशास्त्री के सत्ता में होने के कारण देश ने इसका बेहतर तरीक़े से सामना किया था।