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भ्रष्टाचार पर दोहरा मापदण्ड

आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार को ख़त्म करने की क़सम खा रखी है। लगातार विरोधियों और विपक्षियों के यहाँ सीबीआई, ईडी और आईटी यानी इनकम टैक्स के अधिकारियों की छापेमारी से यह पता चलता है कि देश में जितने भी लोगों के पास कालाधन है, वो निकलवाकर ही प्रधानमंत्री मोदी दम लेंगे। गुजरात में नक़ली नोटों के बक्से पकड़े गये हैं, वो भी एम्बुलेंस में; वो भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक एम्बुलेंस को प्रोटोकॉल तोड़ते हुए रास्ता देने के तीन दिन के अन्दर। है न कमाल की बात। किसे मालूम था कि एक एम्बुलेंस को रास्ता दिया जाएगा और एक एम्बुलेंस में करोड़ों के नक़ली नोट बरामद हो जाएँगे।

ड्रग्स भी कई बार पकड़ी ही जा चुकी है। हाल में पकड़ी गयी, उसमें ज़रूर कुछ पाकिस्तानी और कुछ अफ़ग़ानिस्तानी गिरफ़्तार हुए हैं। बाक़ी इससे पहले मुंद्रा बंदरगाह पर जो पकड़ी गयी थी, उसमें क्या कार्रवाई हुई? कुछ पता नहीं चला। चलना भी नहीं चाहिए। अख़बारों और चैनलों के ज़रिये लोगों तक वही चीज़ें पहुँचनी चाहिए, जो सरकार चाहती है। गुजरात का नमक देश खाता है। इसके मायने कहीं-न-कहीं यही हैं कि अब गुजरात यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ लोग बोलना बन्द कर दें। लेकिन सवाल यह है कि आख़िर ऐसा क्यों कि सरकार जो चाहती है, वही लोगों तक पहुँचना चाहिए और लोगों को भी उसी को सच मानना चाहिए? बाक़ी सब चीज़ों की ओर से उन्हें आँखें मूँद लेनी चाहिए। क्या भाजपा में भ्रष्ट नेताओं की कमी है? क्या भाजपा के समर्थक व्यापारी भ्रष्टाचार नहीं करते?

अभी हाल ही में यूनाइटेड स्टेट्स सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (एसईसी) ने ओरेकल कॉर्पोरेशन पर भारतीय रेलवे की एक फर्म को क़रीब 4,00,000 डॉलर की मोटी रिश्वत देने के आरोप में 2,30,00,000 डॉलर का ज़ुर्माना लगाया है।

दरअसल यह घोटाला अमेरिका के भ्रष्टाचार निरोधक क़ानून विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम-1977 के तहत पकड़ा गया है। ओरेकल कॉर्पोरेशन पर भ्रष्टाचार का दूसरी बार इस तरह का आरोप लगा है। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन ने ओरेकल कॉर्पोरेशन को भारत समेत तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और अन्य कई देशों में सहायक कम्पनियों द्वारा विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम (एफसीपीए) के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोपों में लिप्त पाते हुए उस पर 23 मिलियन डॉलर (एक अरब 89 करोड़ रुपये) से ज़्यादा की भारी-भरकम रक़म का ज़ुर्माना लगाया है।

सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन की रिपोर्ट बताती है कि उपरोक्त कम्पनी ने सन् 2016 से सन् 2019 के बीच व्यापार के बदले विदेशी अधिकारियों को रिश्वत देने के लिए स्लश फंड (रिश्वत के लिए रखे गये फंड) का इस्तेमाल किया। ऐसा आरोप है कि ओरेकल की सहायक कम्पनियों ने भी ओरेकल नीतियों और प्रक्रियाओं के उल्लंघन करते हुए तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और भारत के अधिकारियों को प्रौद्योगिकी सम्मेलनों में भाग लेने के लिए भुगतान करने के लिए स्लश फंड का इस्तेमाल किया। दरअसल एसईसी ने पहले ओरेकल को स्लश फंड बनाने के सम्बन्ध में मंज़ूरी दी थी। सन् 2012 में ओरेकल ने ओरेकल इंडिया द्वारा लाखों डॉलर के स्लश फंड के निर्माण से सम्बन्धित आरोपों का समाधान किया, जिससे निधि का उपयोग अवैध रूप से हुआ।

चौंकाने वाले ख़ुलासे के मुताबिक, ओरेकल कॉर्पोरेशन ने 67,000 डॉलर की भारी-भरकम रक़म का रिश्वत फंड बनाया था। यानी अपने ग़लत कामों को करने देने के एवज़ में रिश्वत देने के लिए इस कम्पनी ने 67,000 डॉलर (55,00,000 रुपये से ज़्यादा) का स्लश फंड रखा हुआ था। यह तो वो रक़म है, जो दिखायी जा रही है। कहा जा रहा है कि इससे कहीं ज़्यादा पैसा कम्पनी रिश्वत और गिफ्ट के लिए ख़र्च करती थी। यहाँ सवाल यह उठता है कि जब इस कम्पनी के इतने बड़े घोटाले, जो कि अभी 10 फ़ीसदी भी उजागर नहीं हुआ है; के बारे में पूरी दुनिया में हंगामा मचा हुआ है; तो हमारे देश की मोदी सरकार को क्या इसके बारे में पता नहीं चला है? क्या इस कम्पनी के साथ-साथ रिश्वत लेने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और शायद इसमें कुछ नेता भी हों, उनकी जाँच सीबीआई और ईडी के साथ-साथ इनकम टैक्स जैसे विभागों को नहीं करनी चाहिए? क्या इनका इस्तेमाल सिर्फ़ और सिर्फ़ विरोधियों और विपक्षियों को कमज़ोर करने और डराने के लिए ही किया जाता है?

एसईसी के एफसीपीए यूनिट के प्रमुख चाल्र्स केन कहते हैं- ‘ऑफ-बुक स्लश फंड का निर्माण स्वाभाविक रूप से जोखिम को जन्म देता है। इन फंडों का अनुचित तरीक़े से उपयोग किया जाएगा। ओरेकल द्वारा तुर्की, यूएई और भारत की सहायक कम्पनियों में ठीक यही हुआ है। यह मामला कम्पनी के सम्पूर्ण संचालन में प्रभावी आंतरिक लेखा नियंत्रण की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।’

ओरेकल कॉर्पोरेशन का चुपचाप ज़ुर्माना भरना साफ़ ज़ाहिर करता है कि कम्पनी अपनी ग़लती मानती है और बड़ी जाँच से बचने के लिए उसने बिना आनाकानी किये 23 मिलियन डॉलर का ज़ुर्माना देने के लिए सहमति दे दी। सवाल यह है कि भारतीय रेलवे के तहत राज्य के स्वामित्व वाली संस्थाओं में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को यूनाइटेड स्टेट्स सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन के उजागर करने के बावजूद केंद्र की मोदी सरकार इस पर कोई चर्चा नहीं कर रही है और न ही उसने कोई कार्रवाई इस कम्पनी और रिश्वत लेने वालों के ख़िलाफ़ की गयी है। जबकि रिपोट्र्स बताती हैं कि सरकार को सारी कहानी अच्छी तरह मालूम है।

विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम अमेरिकी कम्पनियों के लिए विदेशों में रिश्वत देना और लेना दोनों ही अपराध माने जाते हैं। इसके बावजूद हिन्दुस्तान में अनुचित आचरण के तहत सन् 2019 में ओरेकल ने रेलवे के अधिकारियों को रिश्वत खिलाते हुए अपने लिए अत्यधिक छूट का दुरुपयोग किया। इस लेन-देन में से अधिकांश का स्वामित्व भारतीय रेल मंत्रालय (भारतीय एसओई) के पास था।

नाम न छापने की शर्त पर कुछ कर्मचारियों ने ख़ुलासा किया है कि सन् 2019 में सॉफ्टवेयर सामान पर 70 फ़ीसदी की भारी छूट के लिए रिश्वत दी। लेन-देन में शामिल बिक्री कर्मचारियों में किसी ने स्प्रेडशीट बना ली, जिससे पता चलता है कि 67,000 डॉलर की भारी-भरकम रक़म तो एक विशिष्ट भारतीय एसओई अधिकारी के लिए लिए दी गयी। नहीं कहा जा सकता कि इस मामले को हिन्दुस्तान में दबाने के लिए कितनी मोटी रक़म रिश्वत या गिफ्ट के तौर पर ली गयी या ली जाएगी।

बहरहाल एक दूसरे मामले की भी यही कहानी है और यह मामला वालमार्ट द्वारा अपने स्टोर खोलने के लिए रिश्वत दिये जाने का है। कहा जाता है कि सन् 2019 में वालमार्ट ने अपने स्टोर भारत में खोलने के लिए मोटी रिश्वत दी थी, जिसके चलते उसने 292 मिलियन डॉलर का ज़ुर्माना अमेरिका में भरा था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस कम्पनी के ख़िलाफ़ और ख़ासतौर पर रिश्वत लेने वाले नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की। इसी प्रकार से ब्राजील की एंब्रेय कम्पनी ने वहाँ पर मोटा ज़ुर्माना भरा। इस कम्पनी पर भारतीय वायु सेना को विमान बेचने के लिए रिश्वत खिलाने का आरोप लगा था।

एक राजनीतिक जानकार कहते हैं कि ज़ाहिर है जब अमेरिका जैसे देश की कम्पनियाँ हिन्दुस्तान में अपना व्यापार स्थापित करने के लिए मोटी रिश्वत खिला रही हैं; तो चीनी कम्पनियों ने यहाँ अपना व्यापार स्थापित करने के लिए कितनी मोटी रिश्वत खिलायी होगी? राफेल मामला हममें से किसी से छिपा नहीं है; लेकिन सरकार ने उस पर भी पर्दा डाल दिया है। दरअसल ये कम्पनियाँ मामले को दबाने के लिए मुक़दमे और जाँच से बचने के लिए विदेशों में तो मोटा ज़ुर्माना देकर सेटलमेंट कर लेती हैं; लेकिन क्या हिन्दुस्तान में ओरेकल और वालमार्ट जैसी कम्पनियों पर कोई ज़ुर्माना केंद्र सरकार लगाती है? यहाँ कहा जा सकता है कि अगर ये विदेशी कम्पनियाँ इतनी मोटी रिश्वत देने, ज़ुर्माना भरने और दूसरी मदों में ख़र्चा करती हैं, तो ज़ाहिर है कि वो सारा पैसा निकालने के लिए भारत की जनता का ही ख़ून चूसेंगी। क्या इस लिहाज़ से केंद्र की मोदी सरकार इन पर कोई लगाम कसेगी? सवाल यह भी है कि अधिकतर मामलों में सीबीआई, ईडी और इनकम टैक्स के अधिकारी ऐसे मामलों में तो तुरन्त पहुँच जाते हैं, जिनमें कई बार कोई गम्भीर मामला ही नहीं निकलता। लेकिन जहाँ सब कुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है, वहाँ न तो सीबीआई के अधिकारी पहुँचते हैं, न ईडी के अधिकारी पहुँचते हैं और न ही इनकम टैक्स के ही अधिकारी पहुँचते हैं। तो यहाँ ऐसा नहीं लगता कि इन एजेंसियों का आँखें मूँदे रहना और सरकार का सीधे सामने नज़र आ रहे भ्रष्टाचार पर संज्ञान न लेना, एक दोहरा मापदण्ड है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

माफ़ी से कमाया मुनाफ़ा

बीती 26 सितंबर की उस दोपहर को बादल छाये हुए थे। बारिश का इंतज़ार था। एक तो मानसून की लुकाछिपी ऊपर से आग उगलता सूरज तिलमिलाहट पैदा कर रहे थे। शहर के टोंक रोड स्थित होटल वैरिएंट में टैक्स्ट मैसेज के ज़रिये चल रही बातचीत में साज़िशों की बेसुरी सरसराहट किसी तनावपूर्ण सियासी ड्रामे की भूमिका तैयार कर रही थी। राजस्थान के प्रभारी अजय माकन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की स्मार्टनेस पर ठहाके लगाते हुए उनकी बखिया उघेड़ रहे थे- ‘अभी तो सचिन पायलट के समर्थकों की संख्या बढ़ती जा रही है…।’ ठहाकों में सुर मिलाते हुए वहाँ मौज़ूद विधायक खिलाड़ी लाल बैरवा बल्लियाँ उछलते हुए कहते नज़र आ रहे थे- ‘वाह, माकन साहब! आपने भी ख़ूब चला तुरुप का पत्ता।’

 

उधर पोस्ट इंटरनेट पर नाटकीय अंदाज़ में विधायकों को मशविरा देते हुए माकन कहते नज़र आ रहे थे कि आपको सही वक़्त पर सही क़दम उठाना है। आपको मुख्यमंत्री पद के लिए सचिन पायलट की तरफ़दारी करनी है। साज़िश के तारसप्तक में झूमते हुए माकन की अदावत का यह नाटकीय नवाचार था, जो शाम होते-होते रायते की तरह फैल गया।

गहलोत को नीचा दिखाने की तीव्र कामना ने पार्टी में अशोभनीय और अंतर्कलह के हालात पैदा कर दिये। सल्तनत को सँभालने की बजाय माकन ने सुल्तान बनने की कोशिश में हुक्मराना तरीक़ा अपनाया नतीजतन बात बिगड़ती चली गयी। गहलोत समर्थक विधायक ग़ुस्से से अपने नाखून चबा रहे थे, और संसदीय मंत्री शान्ति धारीवाल के फोन खडख़ड़ा रहे थे। माकन को तारणहार की तरह बर्ताव करना था; लेकिन अहंकार के मद में डूबे माकन क्षुब्ध विधायकों के आक्रोश को शान्त करने के लिए किसी से मिलना तो दूर, उन्हें दरकिनार करते हुए होटल तक से बाहर नहीं निकले।

भले ही माकन की मनमानी की बदौलत तनावपूर्ण ड्रामा क्लाइमेक्स तक नहीं पहुँचा; लेकिन गहलोत समर्थकों की भीड़ सैलाब की तरह उमड़ती हुई धारीवाल के निवास पर स्थिर होने लगी। कुषाग्रबुद्धि धारीवाल जानते थे कि इस तीन-तरफ़ा चक्रव्यूह को कैसे सँभालना है? ताकि आलाकमान के प्रति दुराग्रह भी न हो, न भरोसे में कमी आये और न स्वीकार्यता में। साथ ही गहलोत की अस्मिता पर भी कोई आँच भी न आये।

धारीवाल का बेलाग कथन था कि आब्जर्वर अजय माकन अपनी निष्पक्ष भूमिका से इतर जब सचिन पायलट की हिमायत में जुटे थे, तो सभी विधायक मेरे पास पहुँचे। ज़ाहिर है उनकी बात सुनने के तीन-चार घंटे से कम कैसे लगते। विश्लेषक लक्ष्मी प्रसाद पंत का कहना है कि इस घटना ने जयपुर में कांग्रेस के दर्शनशास्त्र के सभी नैतिक अध्याय बदल दिये। राजस्थान की सियासत में क्या होने वाला है, इसके पूरे कालचक्र की स्क्रिप्ट दिल्ली में लिखी गयी थी। तय हुआ कि विधायक दल की बैठक में दो प्रमुख एजेंडे होंगे। पहला राजस्थान का नया मुख्यमंत्री आलाकमान तय करेंगी, इस पर सभी विधायकों को सहमत होना था। दूसरा, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इस्तीफ़े की पेशकश होनी थी और अध्यक्ष पद पर नामांकन से पहले ही सचिन पायलट को नया मुख्यमंत्री बनाना था। यानी सारे विधायकों को इस स्क्रिप्ट को हँसते-हँसते स्वीकार करना था। पर ऐसा हुआ नहीं। क्यों? सबको पता है।

सियासत के पुराने महाराजा ने दिल्ली से आये आदेशों को दरहम-बरहम कर दिया और अपनी नयी स्क्रिप्ट लिख डाली। भरपूर एक्शन से भरी। क्या राजस्थान कांग्रेस के इतिहास में पहले कभी आलाकमान का ऐसा तिरस्कारपूर्ण विरोध हुआ? क्या सत्ता केंद्र्र से ऐसी चुनौती मिली? इतिहास के पास ऐसे दस्तावेज़ नहीं है, लेकिन पुरानी और नयी पीढ़ी सत्ता के लिए उलझती रही है।

वरिष्ठ पत्रकार अनंत मिश्रा की पहली अक्टूबर 2021 की भविष्यवाणी को याद करें, तो उन्होंने साफ़ कह दिया था कि पंजाब से चली  कांग्रेस की बग़ावत एक्सपे्रस का अगला पड़ाव जयपुर होगा, वही हुआ भी। विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस आलाकमान ने न तो समय पर विवाद निपटाया और न ही मात से सबक़ लिया। नतीजतन सरकार हाथों से सरक गयी। अजय माकन ने जो पंजाब और दिल्ली में जो षड्यंत्र रचा, वो ही उन्होंने जयपुर ने दोहराया। उनको गहलोत और पायलट गुट में समन्वय बनाना था। लेकिन माकन एकतरफ़ा खेल खेल गये। विधायकों के विरोध के बावजूद उन्होंने गहलोत से मिलने तक की ज़रूरत नहीं समझी।

अगर एक-दूसरे को काटने वाली दो अलहदा बातों पर भरोसा करना अक़्लमंदी की निशानी है, तो ज़ाहिर है कि अजय माकन ने बेहद अक़्लमंद रवायत पर निजी तौर पर ठप्पा लगा दिया। आख़िर क्यों कर एक के बाद एक विधायक माकन पर ग़ैर-भरोसेमंदी का इल्जाम लेकर संसदीय मंत्री शान्ति धारीवाल के पास पहुँचे? अचम्भे और शक-शुबह में मुब्तिला विधायकों की कहानियाँ अविश्वास के बियाबान से धू-धू करती नज़र आ रही थी। अगर ताज़िन्दगी मनमानी में मुब्तिला रहे माकन की जन्म कुंडली को बाँचा जाए, तो विश्वास की बर्फ़ पिघलती चली जाएगी।

सूत्र कैप्टन अमरिंदर सिंह के बयान का हवाला देते हैं कि माकन 1984 के सिख विरोधी दंगों के मुख्य आरोपी ललित माकन के भतीजे हैं, ऐसे में पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों को चुभने वाली स्क्रीनिंग कमेटी में अजय माकन को चेयरमैन बनाया गया। यह तो पंजाबियों के जख़्मों पर नमक छिडक़ने जैसा काम था। $गज़ब तो यह है कि अजय माकन ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में पार्टी की लगातार दो शिकस्तों में अहम भूमिका निभायी। जिस शख़्स ने दिल्ली में कांग्रेस का पूरी तरह सफ़ाया कर दिया, उसे क्यों पंजाब की ज़िम्मेदारी सौंपी? विशेषज्ञ कहते हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने आगे चलकर आत्मघात का गड्ढा खोद लिया।

मुख्यमंत्री गहलोत ने 2020 के सियासी संकट का ज़िक्र करके सचिन पायलट गुट की भाजपा के साथ मिलीभगत की नयी थ्योरी भी सामने रखी। पायलट का नाम लिये बिना सन् 2020 के संकट का ज़िक्र किया और कहा कि उस वक़्त कुछ विधायक अमित शाह और धर्मेन्द्र प्रधान के साथ बैठे थे। इसे वीडियो में शाह हँस-हँसकर कह रहे हैं कि पास आओ। मिठाई खिला रहे हैं। बाद में राज्यपाल ने तिथि निश्चित की तो हार्स ट्रेडिंग का खेल शुरू हो गया और सत्ता के इन घोड़ों की क़ीमत 10 से शुरू होकर 50 करोड़ पहुँच गयी। लेकिन गहलोत की लगाम में विश्वास का बल था। नतीजतन भाजपा को मुँह की खानी पड़ी।

प्रश्न है कि जो नेता सन् 2014 से 2019 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव हार गया; यहाँ तक कि अपनी जमानत तक नहीं बचा सका; उसे राजस्थान का विवाद सुलझाने का अहम दायित्व क्यों सौंप दिया गया? विश्लेषकों का कहना है कि माकन तो राजस्थान में गहलोत सरकार की बुलंद इमारत को गिराने आये थे। लेकिन आख़िर उन्हें बेदर्द रुख़सती ही मिली। गहलोत के माफ़ीनामे के मुद्दे को लेकर तर्क-वितर्क का लम्बा सिलसिला भी चला। लेकिन रिसते हुए बाँध को टूटना ही था कि जिन्होंने मेरी सरकार बचायी, उनको मैं कैसे धोखा दे सकता था? इसलिए मैंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से माफ़ी माँगना ही बेहतर समझा। गहलोत ने विधायक दल की बैठक में शिरकत करने आये राजनीतिक समीक्षक मल्लिकार्जुन तक का नसीहत दे दी कि आपको पार्टी अध्यक्ष के सोच और आभामंडल को ध्यान में रखते हुए इस काम को करना था; लेकिन कहाँ कर पाए? उन्होंने वही बेबाक़ी से कहा कि नये मुख्यमंत्री का नाम आने से विधायक भडक़ गये थे।

एक राजनीतिक सूत्र के शब्दों में क़िस्सा-कुर्सी के मुद्दे पर बड़े दावों वाला कहीं बड़ा खेल खेला जा रहा था, जिसमें गहलोत को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाना था और सत्ता के नये नियम तय होने थे। इसकी भीतरी खोह में छिपी यूज एंड थ्रो की दराती छिपी हुई थी। लेकिन करामती रणकौशल में माहिर गहलोत सत्ता हथियाकर उन्हें दरकिनार करने की साज़िश को भाँप गये और बचाव कर लिया। नतीजतन पर्यवेक्षकों की जमकर फ़ज़ीहत हुई पर्यवेक्षकों के लिए अपना दामन बचाना मुश्किल हो गया, उन्हें रिपोर्ट में गहलोत के पक्ष में बाज़ी पलटनी पड़ी। रिपोर्ट में कहा गया कि जो बग़ावत हुई उसके लिए तकनीकी तौर पर गहलोत ज़िम्मेदारी नहीं थे। पूरे घटनाक्रम में गहलोत न तो खुलकर सामने आये और न ही कोई बयान दिया। पूरे घटनाक्रम में माकन की भूमिका सवालों में रही।

मल्लिकार्जुन को भी सोनिया गाँधी को फोन पर बताना पड़ा कि ‘सब कुछ माकन के मिस मैनेजमेंट की वजह से हुआ। आलाकमान को भी विवाद को बढऩे से रोकना पड़ा। आख़िर गहलोत के हक़ में दो बड़े मुद्दे थे। पहला-कांग्रेस के पास अब दो ही राज्य बचे हैं। पहला राजस्थान और दूसरा-छत्तीसगढ़। आलाकमान को पार्टी चलाने और चुनावों क प्रबंधन सँभालने के लिए गहलोत की ज़रूरत थी। गुजरात विधानसभा चुनावों का दारोमदार भी गहलोत पर ही था। अलबत्ता गहलोत के नज़दीकी राजनेताओं को नोटिस भेजना सांकेतिक कार्यवाही थी, ताकि आलाकमान का रुतबा बना रहे। पायलट न घर के रहे, न घाट के। भाजपा के निमंत्रण से उन पर सन्देह के बादल घने हो गये हैं। हालाँकि पायलट भाजपा के महासागर में बूँद बनने नहीं जा सकते; लेकिन आइंदा के लिए ताजपोशी की उम्मीदें भी तो तबाह हो गयीं।

धारीवाल का रणकौशल

गहलोत ख़ेमे के मुख्य रणनीतिकार नगरीय विकास मंत्री शान्ति धारीवाल ने दिल्ली का सियासी मौसम बदलकर गहलोत के ताज को सुरक्षित कर लिया। सूत्र कहते हैं कि पर्यवेक्षकों के दुश्चक्र ने सरकार पलटने की ऐसी कौडिय़ाँ खेलने की तैयारी कर ली थी कि लोहा दाँत के नीचे आ गया था। नतीजतन धारीवाल ने आलाकमान द्वारा भेजे गये प्रभारी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने में एक पल की भी देर नहीं लगायी। उन्होंने जिस तरह पिरामिड पर बैठे गहलोत को सुरक्षित किया, प्रदेश के राजनीतिक हलक़ों में चर्चाओं का सैलाब उमड़ पड़ा। अटकलों की इस हवाबाज़ी में धारीवाल जिस तरह माकन पर हमलावर रहे। विश्लेषक इसका निहितार्थ तलाशने की माथापच्ची कर रहे हैं। उनका सवाल है कि आख़िर धारीवाल ने कौन-से जुनून की सवारी की और दुश्चक्र को पैरों तले रौंद दिया। उन्होंने अपनी साख को दाँव पर लगाकर भितरघात की बखिया उघेडक़र गहलोत सरकार को सुरक्षित कर दिया। विश्लेषकों कहते हैं कि अगर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और गहलोत सरकार के बीच खाई बढ़ती है, तो गहलोत ख़ेमा फिर आगे आ सकता है। ऐसे में धारीवाल फिर मोर्चाबंदी कर सकते हैं। गहलोत के प्रति भरोसे का एक ख़ामोश अहसास धारीवाल के चेहरे पर हर किसी को दिखायी देता है। इसलिए विधायक और मंत्री उनकी बातों को पूरी निष्ठा से तवज्जो देते हैं। अब उनका सियासी क़द कितना ऊँचा हो गया है, कहने की ज़रूरत नहीं। धारीवाल सरकार के छोटे-मोटे पहलुओं को ही नहीं, कई बार पूरे प्रतिमान को दुरुस्त कराने का काम करते हैं। कई मौक़ों पर धारीवाल ने सरकार का वित्तीय अंकगणित सुलझाने का काम भी किया है, तो लोगों के अहम् पर भी ख़ूबसूरत लफ़्ज़ों में बतर्ज छींटाकशी के छींटे भी मारे हैं।

बदल रहा है खादी ग्रामोद्योग

शुल्क बढ़ा; लेकिन आधुनिक मशीनों से दिया जा रहा प्रशिक्षण, सुविधाएँ भी हुईं बेहतर

ग्रामीण विकास के बग़ैर भारत के समग्र विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी सोच से सन् 1956 में तब की केंद्र सरकार ने खादी और ग्रामोद्योग आयोग की स्थापना की थी। खादी और ग्रामोद्योग आयोग यूँ तो दो अलग-अलग संस्थाओं की एक मिलीजुली स्वायत्त और स्वरोज़गार को बढ़ावा देने वाली संस्था है, जिसकी देश भर में कई शाखाएँ हैं। इन शाखाओं को बोर्ड कहा जाता है, जो ग्रामीण और शहरी लोगों को बहुउद्देश्यीय प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्वरोज़गार को बढ़ावा देने वाले इस खादी और ग्रामोद्योग आयोग को केंद्र सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय तहत रखा गया है।

हालाँकि इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि क़रीब 66 साल बाद भी खादी और ग्रामोद्योग को उतना बढ़ावा नहीं मिल सका, जिसकी कल्पना कभी महात्मा गाँधी और ग्रामीण विकास की सोच रखने वाले नेताओं ने की थी। लेकिन फिर भी पूरे देश में अब तक केंद्र और राज्यों में शासन करने वाली सरकारों और कुछ कर्मठ अधिकारियों व कर्मचारियों की लगन व मेहनत से खादी और ग्रामोद्योग आयोग आज एक बेहतर मकाम पर है।

दिल्ली के राजघाट पर स्थित खादी और ग्रामोद्योग की अगर बात करें, तो सन् 2006 आते-आते इसके कई प्रशिक्षण केंद्र क़रीब-क़रीब बन्द होने की हालत में थे। उस समय इस केंद्र के तत्कालीन निदेशक अमर सिंह ने अपने प्रयासों से इसे जीवंत करने की जो कोशिश की, उसे आगे बढ़ाने का काम अब इस केंद्र के मौज़ूदा निदेशक बलराम दीक्षित कर रहे हैं।

क़ाबिले-तारीफ़ बात यह है कि आज इस केंद्र का कायाकल्प हो चुका है और यहाँ कई नये प्रशिक्षण जुड़ चुके हैं। वर्तमान में यहाँ बेसिक कम्प्यूटर कोर्स, कम्प्यूटर (हार्डवेयर एवं नेटवर्क रिपेयरिंग), मोबाइल रिपेयरिंग से लेकर ब्यूटिशियन, मेकअप आर्टिस्ट, सिलाई-कु़ाई, हेयर स्टाइलिंग, कोस्मेटिक कोर्स, एडवांस फैशन डिजाइन कोर्स, फैशन डिजाइनिंग सहित फुटवियर डिजाइन मेकिंग सिखाने, मधुमक्खी पालन करने और प्लंबिंग का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा बेकरी बनाना, फल प्रशोधन, पापड़ बड़ी बनाना, परफ्यूम / एसश्यिल ऑयल्स बनाने, मसाला बनाने, खाद्य तेल तैयार करने, अगरबत्ती और मोमबत्ती बनाने, नहाने और कपड़े धोने के साबुन व सर्फ बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इसके अलावा भी यहाँ कई प्रशिक्षण दिये जाते हैं और भविष्य में इनमें और इज़ाफ़े की उम्मीद है।

पहले यहाँ मसाला, मोमबत्ती, अगरबत्ती, सिलाई, मेकअप और मधुमक्खी पालन जैसे प्रशिक्षण दिये जाते थे। इन दिनों प्रशिक्षण के लिए न्यूनतम उम्र 16 साल की होनी चाहिए।

एक सप्ताह से एक महीने वाले प्रशिक्षणों में प्रत्येक प्रशिक्षण का शुल्क (कोर्सेज की फीस)सामान्य जाति के पुरुषों के लिए 1,534 रुपये है। इन्हीं प्रशिक्षणों के लिए महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांगों के लिए शुल्क 944 रुपये है। वहीं तीन महीने वाले प्रशिक्षणों में प्रत्येक प्रशिक्षण का शुल्क सामान्य वर्ग के पुरुषों के लिए 3,894 रुपये है। इन्हीं प्रशिक्षण कोर्सेज के लिए महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांगों के लिए शुल्क 2,124 रुपये है। इसके अतिरिक्त प्रवेश फॉर्म लेने के लिए इच्छुक अभ्यर्थी को 236 रुपये देने होंगे।

हालाँकि अब से क़रीब 10-11 साल पहले तक सामान्य वर्ग के पुरुषों के लिए शुल्क न के बराबर था। वहीं महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांगों को प्रशिक्षण लेने के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था। वहीं उस दौरान प्रशिक्षण लेने वालों को प्रशिक्षण के दौरान ज़रूरी कच्चा माल खादी और ग्रामोद्योग आयोग कराता था; लेकिन अब कच्चा माल प्रशिक्षण लेने वालों को लाना पड़ता है।

सन् 2014 से शुल्क में धीरे-धीरे वृद्धि शुरू हुई, जो अब काफ़ी हो चुकी है। हालाँकि अब सुविधा यह है कि अगर प्रशिक्षण लेने का कोई इच्छुक अभ्यर्थी एक साथ शुल्क नहीं दे सकता, तो वह क़िस्तों में भी उसे दे सकता है। वहीं पहले शुल्क सिर्फ़ नक़द जमा करना होता था, जबकि अब ऑनलाइन भुगतान ऐप के ज़रिये भी शुल्क जमा किया जा सकता है।

हालाँकि इसके पीछे खादी और ग्रामोद्योग आयोग की सोच यह भी हो सकती है कि पहले जब कच्चा माल आयोग की तरफ़ से उपलब्ध कराया जाता था और प्रशिक्षण की शुल्क नहीं लिया जाता था, तब लोगों में प्रशिक्षण के प्रति ख़ास रुचि होती थी। क्योंकि उन्हें उसकी क़द्र नहीं होती थी। लेकिन अब जब वे उस पर पैसा ख़र्च करते हैं, तो अपने कच्चे माल से बेहतर-से-बेहतर उत्पाद बनाने का प्रयास करते हैं।

इसके अलावा पहले सभी प्रशिक्षण प्राप्त लोग प्रशिक्षण के बाद स्वरोज़गार के प्रति ज़्यादा जागरूक होते थे। इसका नतीजा यह होता था कि प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों में से मुश्किल से 15-20 फ़ीसदी ही स्वरोज़गार करते थे और बाक़ी प्रशिक्षण प्राप्त लोग दूसरों के यहाँ कारीगर के रूप में नौकरी करना पसन्द करते थे। जबकि आज क़रीब 30-35 फ़ीसदी लोग स्वरोज़गार करने में दिलचस्पी रखते हैं। ज़ाहिर है कि ज़्यादा लोग स्वरोज़गार करेंगे, तो वे ज़्यादा उत्पादन करेंगे और ज़्यादा लोगों को रोज़गार दे सकेंगे। इसलिए स्वरोज़गार को बढ़ावा देने के विचार से खादी और ग्रामोद्योग आयोग ने कुछ इस तरह के क़दम उठाये हैं।

आयोग के इन क़दमों से पहले की अपेक्षा काफ़ी बदलाव आये हैं, जिससे खादी और ग्रामोद्योग को काफ़ी बढ़ावा मिला है। इसके लिए खादी और ग्रामोद्योग आयोग पहले की ही तरह प्रशिक्षण प्राप्त पात्र लोगों को स्वरोज़गार करने के लिए 50,00,000 रुपये तक का ऋण उपलब्ध कराता है। इस लोन में शहरी लोगों में सामान्य वर्ग को पुरुषों को 15 फ़ीसदी की छूट दी जाती है। वहीं महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांगों को 25 फ़ीसदी की छूट प्रदान की जाती है।

वहीं ग्रामीण क्षेत्र में स्वरोज़गार स्थापित करने वाले प्रशिक्षित लोगों में सामान्य वर्ग के पुरुषों के लिए लोन में 25 फ़ीसदी की छूट मिलती है। वहीं महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांगों को लोन लेने पर 35 फ़ीसदी की छूट मिलती है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद स्वरोज़गार स्थापित करने वाले इच्छुकों को 10 दिन की ईडीपी (पीएमईजीपी) प्रदर्शनी लगाकर काफ़ी जानकारी दी जाती है, ताकि वे स्वरोज़गार स्थापित करने से लेकर ख़ुद की कम्पनी के उत्पादों की ब्रांडिंग और बिक्री बेहतर तरीक़े से कर सकें।

इसके अलावा पहले लोगों को खादी उत्पादों पर ख़रीदारों को महात्मा गाँधी की जयंती 2 अक्टूबर के अवसर पर 15 दिन पहले से 15 दिन बाद तक या कभी-कभी पूरे अक्टूबर 40 से 50 फ़ीसदी छूट मिलती थी। लेकिन अब छूट 2 अक्टूबर से ही शुरू होती है और सिर्फ़ 10 से 20 फ़ीसदी ही है। इसकी जानकारी खादी स्टोर्स पर उपलब्ध नहीं हो सकी। हालाँकि खादी और ग्रामोद्योग उत्पादन पर अभी भी ठीक-ठाक छूट उपलब्ध कराता है।

फ़िलहाल जिस तरह से खादी और ग्रामोद्योग आयोग से लेकर इसमें कार्यरत अधिकारी, कर्मचारी और केंद्र सरकार मिलकर काम कर रहे हैं, उससे आज लाखों ग्रामीण और शहरी लोगों का भविष्य सँवर रहा है। बढ़ती बेरोज़गारी के इस दौर में ग्रामीण और शहरी युवाओं के लिए खादी और ग्रामोद्योग आयोग एक संजीवनी की तरह है। ज़रूरत है, तो खादी और ग्रामोद्योग आयोग के बनाये विश्वास को आयोग के अधिकारी और कर्मचारियों सहित सरकार और स्वरोज़गार करने के इच्छुक देश के लोगों द्वारा आगे बढ़ाने के लिए एक ऐसे दृढ़ संकल्प की, जो कभी टूटे नहीं। अगर ऐसा होता है, तो देश के कई राज्यों में बन्द हो चुके और बन्द होने की हालत में पहुँच चुके खादी और ग्रामोद्योग आयोग के प्रशिक्षण केंद्र पुनर्जीवित हो उठेंगे, जिससे वहाँ के लोगों को लाभ पहुँचेगा।

खादी और ग्रामोद्योग आयोग का मुख्यालय मुम्बई में है। हर राज्य और केंद्र शासित राज्य में इसके कार्यालय हैं, जो हर बोर्ड, जिन्हें मंडल मतलब बोर्ड कहा जाता है; के निदेशक द्वारा संचालित होते हैं। आयोग इन्हीं मंडलों के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के उद्यमियों एवं सहकारी समितियों की समस्याएं हल की जाती हैं। खादी और ग्रामोद्योग आयोग के विकास और विस्तार के लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयासरत है, जिसके लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों का ऋण देकर स्वरोज़गार बढ़ाने में सहयोग भी बहुत बड़ा है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग हमेशा वित्तीय संसाधनों को ध्यान में रखकर इन योजनाओं का अनुमोदन करता है।

ग्रामोद्योग स्थापित होने के मामले में देखा गया है कि घरेलू महिलाओं का योगदान लगातार बढ़ रहा है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग आज पूरे देश में उत्पाद और बिक्री को बढ़ावा देने के लिए पूरे देश में नेटवर्क फैला चुका है। फ़िलहाल देश में 10 के आसपास खादी ग्रामोद्योग भवन, 14 से ज़्यादा खादी भण्डार एवं बिक्री केंद्र उपलब्ध हैं।

आयोग अभी और कई सुधार करने सहित प्रशिक्षण के नये और आधुनिक विषयों पर भी ध्यान दे रहा है। वर्तमान में देश में खादी और ग्रामोद्योग के उत्पादों की एक विश्वसनीयता है। हालाँकि कुछ खादी उत्पादों के उपभोक्ताओं का कहना है कि खादी के उत्पादों की गुणवत्ता और रेट में बहुत फ़र्क़ पड़ा है। अब खादी के उत्पादों की गुणवत्ता धीरे-धीरे पहले से ख़राब हुई है, जबकि उत्पादों के रेट बढ़े हैं। कुछ साल पहले एक खादी कर्मचारी ने बताया था कि खादी और ग्रामोद्योग आयोग का उद्धार कुछ ईमानदार अधिकारियों की वजह से हो रहा है, वरना यह भी भ्रष्टाचार का अड्डा रहा है। उत्पादों की ख़रीद-फरोख़्त में भी मिलावटी माल को ख़रीदने में भ्रष्टाचारी अधिकारी करते हैं। यही कारण है कि खादी और ग्रामोद्योग आयोग के सभी उत्पादों की गुणवत्ता में पहले से काफ़ी फ़र्क़ पड़ा है। हालाँकि अभी भी कुछ ईमानदार अधिकारी हैं, जिनकी वजह से खादी और ग्रामोद्योग आयोग के उत्पादों की शाख़ बची हुई है।

ज्ञात हो कि वर्तमान में दिल्ली के उप राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना पर आम आदमी पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया था कि जब वह खादी और ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भ्रष्टाचार किया था। इन नेताओं ने इस भ्रष्टाचार को लेकर केंद्र सरकार से जाँच की भी माँग की थी।

आरोप अपनी जगह है; लेकिन फ़िलहाल चुनौती देश के युवाओं के एक बड़े धड़े को रोज़गार देने की है, जिसमें खादी और ग्रामोद्योग आयोग अहम भूमिका निभा सकता है और निभा रहा है। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय को चाहिए कि देश में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग जगत को और बढ़ावा देने के लिए अभी खादी और ग्रामोद्योग आयोग को और मज़बूत करने की ज़रूरत है।

दो बड़े दलों में अध्यक्ष पद की दौड़

कांग्रेस में काफ़ी उठापटक के बाद दो चेहरे मुक़ाबले में, भाजपा में बिना शोर-शराबे के सब तय

कांग्रेस में अध्यक्ष पद का चुनाव 17 अक्टूबर को होना है, जबकि भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा का कार्यकाल जनवरी में पूरा हो रहा है। कांग्रेस में गाँधी परिवार के प्रतिनिधि माने जा रहे वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खडग़े और गाँधी परिवार का विरोध न करके भी उसके प्रतिनिधि के ख़िलाफ़ लड़ रहे वरिष्ठ नेता शशि थरूर के बीच टक्कर है। उधर भाजपा में पिछले तीन साल में अपनी मेहनत से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का भरोसा जीतने वाले जे.पी. नड्डा का कार्यकाल 2024 के चुनाव तक बढ़ाये जाने की प्रबल सम्भावना है। हालाँकि यदि नड्डा का कार्यकाल नहीं बढ़ता है, तो पार्टी में भूपेंद्र यादव अध्यक्ष पद के सबसे सशक्त दावेदार होंगे। दोनों पार्टियों के इस चुनावी हालात पर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

यह संयोग ही है कि लम्बे समय से अटका पड़ा कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव उस समय हो रहा है, जब भाजपा के अध्यक्ष पद के चुनाव को भी महज़ तीन ही महीने बचे हैं। कांग्रेस के चुनाव में दो वरिष्ठ नेता आमने-सामने हैं, जबकि भाजपा में वर्तमान अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का कार्यकाल बढ़ाये जाने की मज़बूत सम्भावना दिख रही है।

पहले बात करते हैं कांग्रेस की, जिसमें दो बड़े नेताओं में मुक़ाबला है और जिन्होंने गाँधी परिवार की सत्ता में भरोसा जताते हुए एक-दूसरे को चुनौती दी है। इनमें मल्लिकार्जुन खडग़े तो गाँधी परिवार के कमोवेश घोषित उम्मीदवार ही हैं, जबकि शशि थरूर गाँधी परिवार की सत्ता को चुनौती दिये बग़ैर खडग़े के ख़िलाफ़ एक अलग सोच के साथ मैदान में हैं, क्योंकि उनका मानना है कि एक लोकतांत्रिक पार्टी में चुनाव होना ही चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव का महत्त्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यह उस समय हो रहा है। जब पार्टी की बहुत उम्मीद और एक रणनीति के तहत शुरू की गयी, भारत जोड़ो यात्रा चल रही है और दक्षिण राज्यों में लोग उससे जुड़ रहे हैं। पिछले आठ साल में कांग्रेस नेताओं ने एसी कमरों से राजनीति की तो जनता उससे दूर चली गयी। अब जब पार्टी के सबसे बड़े देशव्यापी चेहरा राहुल गाँधी ख़ुद मैदान में उतरे हैं और एक महीने से भी ज़्यादा से लगातार पदयात्रा कर रहे हैं, तो जनता का भी ध्यान उनकी तरफ़ जा रहा है।

अभी तक दक्षिण में ही चर्चा में रही यात्रा को लेकर उत्तर भारत में भी लोग चर्चा करने लगे हैं। ख़ासकर राहुल गाँधी की, जिनको लेकर यात्रा से पहले भाजपा ने यह प्रचार किया था कि कुछ दिन पदयात्रा करके राहुल गाँधी विदेश यात्रा पर निकल जाएँगे। भाजपा का यह प्रचार झूठा निकला है और राहुल गाँधी इस बात के प्रति दृढ़ दिख रहे हैं कि वह यात्रा के बीच दिल्ली भी नहीं जाएँगे। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी भी दो दिन तक यात्रा में जुड़ चुकी हैं, जिससे निश्चित ही कांग्रेस $खेमे में ख़ासा उत्साह दिख रहा है। विभिन्न तटस्थ रिपोट्र्स बताती हैं कि केरल और कर्नाटक दोनों में कांग्रेस और राहुल गाँधी को पार्टी की उम्मीद से कहीं अधिक समर्थन मिला है और बड़ी संख्या में लोग यात्रा से जुड़ रहे हैं।

अध्यक्ष पद के लिए शशि थरूर कई राज्यों का दौरा करके समर्थन माँग चुके हैं। वह ख़ुद यह बात साफ़ कर चुके हैं कि वह मुक़ाबले से बाहर नहीं होंगे। अपने चुनावी घोषणा-पत्र में थरूर युवाओं, महिलाओं और पार्टी कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाने पर ज़ोर देते हैं। यह वही बातें हैं, जो राहुल गाँधी भी कहते रहे हैं। घोषणा-पत्र में उन्होंने अपना उद्देश्य पार्टी को फिर से खड़ा, सक्रिय करना, कार्यकर्ताओं को सशक्त बनाना, सत्ता का विकेंद्रीकरण करके जनता के सम्पर्क में रहना बताया है। खडग़े से मुक़ाबले को लेकर वह कहते हैं कि यह भाजपा का सामना करने के लिए है।

थरूर कहते हैं कि कांग्रेस को 2024 के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा से लडऩे के लिए राजनीतिक रूप से सशक्त किया जाना चाहिए। थरूर पार्टी के काम करने के तरीक़े में सुधार की ज़रूरत बता रहे हैं। उनका कहना है कि युवाओं को पार्टी में लाने और उन्हें वास्तविक अधिकार देने के अलावा मेहनती और लम्बे समय तक सेवा करने वाले कार्यकर्ताओं को अधिक सम्मान देने की बात कह रहे हैं। वह ऐसे अध्यक्ष पर ज़ोर दे रहे हैं, जो नियमित रूप से पार्टी मुख्यालय में बैठे और कार्यकर्ताओं को सुने। उनका कांग्रेस के धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांत पर बने रहने पर भी ज़ोर है।

उधर मल्लिकार्जुन खडग़े का कहना है कि चुनाव जीतने के बाद वह उदयपुर घोषणा-पत्र को लागू करेंगे। इस घोषणा-पत्र में कई प्रस्ताव शामिल हैं। पार्टी ने मई में उदयपुर में हुए चिन्तन शिविर में इन प्रस्तावों को मंज़ूरी दी थी। खडग़े का कहना है कि वह सामूहिक नेतृत्व और विचार विमर्श में विश्वास करते हैं। खडग़े के मुताबिक, यदि वह कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाते हैं, तो उदयपुर घोषणा-पत्र को लागू करते हुए युवाओं, किसानों, महिलाओं और छोटे कारोबारियों की समस्याओं का समाधान करने की कोशिश करेंगे। यह कमोवेश वही बातें हैं, जो राहुल गाँधी कहते हैं और थरूर अपने घोषणा-पत्र में कह रहे हैं। उदयपुर के घोषणा-पत्र में ही संगठनात्मक सुधार के तहत एक व्यक्ति-एक पद की नीति की बात कही गयी थी और खडग़े ने इसका पालन करते हुए अक्टूबर के शुरू राज्य सभा में पार्टी के अपने नेता पद से इस्ती$फा दे दिया था। शिविर में पास किये गये अन्य प्रस्ताव चुनाव के लिए टिकट बँटवारे और पदाधिकारियों के कार्यकाल से सम्बन्धित थे।

खडग़े आरएसएस और भाजपा पर देश के स्वायत्त निकायों को नष्ट करने का आरोप लगाते हुए कहते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद इस अहम पद पर होने के नाते वह भारत की विविधता और बहुलतावाद के सम्मान की रक्षा की लड़ाई लड़ेंगे। इसके अलावा पार्टी पदों के लिए कार्यकाल की सीमा के साथ 50 से कम उम्र के लोगों के लिए टिकट और पार्टी पदों पर महिलाओं, युवाओं, एससी / एसटी / ओबीसी के साथ अल्पसंख्यकों को नियुक्त करने की बात वह कह रहे हैं। साथ ही उम्मीदवार चयन के लिए पेशेवर तकनीक अपनाने पर उनका ज़ोर है।

उनका यह भी कहना है कि उम्मीदवारों को एक ही सीट पर दो चुनाव हारने के बाद दोहराया नहीं जाएगा और चुनाव प्रबंधन बेहतर करने के लिए डेटा तकनीक का उपयोग किया जाएगा। राहुल गाँधी की सोच की तरह खडग़े कांग्रेस को फिर जिताने के लिए बेरोज़गार युवाओं, कार्यरत युवाओं ख़ासकर आईटी क्षेत्र, इसी के साथ प्रवासी युवाओं के मुद्दों को उठाने की बात कर रहे हैं। राष्ट्र निर्माण के लिए कांग्रेस को जॉब फेयर (नौकरी मेला), स्किलिंग के साथ नये उद्योग में सहयोग को लेकर भी बड़ी भूमिका निभाने पर उनका ज़ोर है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने ‘लडक़ी हूँ, लड़ सकती हूँ’ का नारा दिया था। इसे लेकर वह कहते हैं कि पार्टी महिलाओं के नेतृत्व का समर्थन करेगी साथ ही चुनाव में महिलाओं के लिए पद और सीटें आरक्षित की जाएँगी, जिसके लिए पार्टी महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने पर काम करेगी।

यह बहुत दिलचस्प बात है कि उत्तर भारत, जो कभी कांग्रेस के लिए मज़बूत क़िला रहा है; वहाँ से पार्टी का अध्यक्ष पद का एक भी उम्मीदवार नहीं। पार्टी के भीतर कुछ नेता यह भी कहते हैं कि गाँधी परिवार ने जानबूझकर दक्षिण के दो नेताओं को मैदान में रखा है, ताकि दक्षिण में बेहतर सन्देश जा सके।

ऐसा नहीं है कि उत्तर भारत में कांग्रेस को सीटें नहीं मिल सकती हैं। यदि राज्यों पर नज़र दौड़ाएँ, तो लोकसभा के चुनाव में भाजपा ने उत्तर भारत में राज्यवार कुल सीटों में से अधिकतम सीटें जीती हैं। लिहाज़ा उसके सामने 2024 के आम चुनाव में इस प्रदर्शन को दोहराने की बड़ी चुनौती होगी। खडग़े कह चुके हैं कि अध्यक्ष बनने पर वह गाँधी परिवार और वरिष्ठ नेताओं से राय-मशविरा करेंगे। गाँधी परिवार का विरोध शशि थरूर भी नहीं कर रहे। सच तो यह है कि चुनाव लडऩे का फ़ैसला करने से पहले से सोनिया गाँधी से मिलकर आये थे और उन्हें अपने फ़ैसले की जानकारी दी थी। शशि थरूर ने अक्टूबर के शुरू में खडग़े के सामने मुद्दों पर सार्वजनिक बहस का प्रस्ताव रखा था। थरूर का कहना था कि सार्वजनिक बहस को लोग देखना पसन्द करेंगे और इससे उनमें पार्टी के प्रति दिलचस्पी बढ़ेगी। सम्भवत: थरूर ब्रिटेन में हाल में हुए कंजर्वेटिव पार्टी के नेतृत्व पद के चुनाव की तर्ज पर ऐसा करना चाहते थे। हालाँकि वहाँ यह मुक़ाबला प्रधानमंत्री पद के लिए था, जबकि यहाँ पार्र्टी अध्यक्ष पद के लिए है।

 

नड्डा रहेंगे भाजपा अध्यक्ष?

भाजपा के अध्यक्ष जे.पी. नड्डा अपना तीन साल का कार्यकाल 20 जनवरी, 2023 को पूरा कर रहे हैं। इस लिहाज़ से उनकी जगह नया अध्यक्ष बनेगा। हालाँकि इस बात के मज़बूत संकेत हैं कि पार्टी उनके काम को देखते हुए उन्हें 2024 तक अध्यक्ष बनाये रख सकती है। या हो सकता है कि उन्हें एक और पूर्ण कार्यकाल दे दिया जाए। पार्टी संविधान में एक अध्यक्ष को तीन-तीन साल के लगातार दो कार्यकाल दिये जा सकते हैं। पहले भी कई अध्यक्ष दो कार्यकाल तक रहे हैं। पूर्व अध्यक्ष अमित शाह को भी इसी तरह सन् 2019 में लोकसभा चुनाव तक विस्तार (एक्सटेंशन) दिया गया था।

दरअसल यह पार्टी के बीच बड़े नेताओं की राय है कि चूँकि 2024 का लोकसभा चुनाव पार्टी के लिए बहुत अहम है, नड्डा की जगह नया अध्यक्ष बनाने से दिक़्क़तें आ सकती हैं। नड्डा पार्टी संगठन के साथ-साथ पार्टी की चुनावी रणनीति से भी बख़ूबी वाक़िफ़ हैं और उनके नेतृत्व में पार्टी ने चुनावों में बेहतर नतीजे दिखा चुकी है। ऊपर से नड्डा को प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह दोनों का भरोसेमंद माना जाता है।

वैसे नड्डा के अलावा जिस नेता की चर्चा सन् 2019 से ही संगठन के बीच होती रही है, वह भूपेंद्र यादव हैं। उन्हें एक महीना पहले पुनर्गठित पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति में शामिल किया गया है। जहाँ तक नड्डा की बात है, उनका नाम तो सन् 2014 में ही अध्यक्ष पद के लिए सामने आ गया था।

हालाँकि तब प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार और संगठन में बेहतर तालमेल के लिए गुजरात सरकार में अपने गृह मंत्री रहे अमित शाह पर भरोसा जताया था। इसके बाद अमित शाह ने जब सन् 2019 में गृह मंत्री बनने के साथ ही अध्यक्ष पद छोड़ा, तो नड्डा ही सन् 2020 में पूर्णकालिक अध्यक्ष बनने तक कार्यकारी अध्यक्ष रहे।

भाजपा में नड्डा को ऐसा नेता माना जाता है, जो आरएसएस की सामाजिक समरसता की विचारधारा और भाजपा की चुनावी सोशल इंजीनयरिंग दोनों में फिट बैठते हैं। यह कहा जाता है कि अमित शाह के अध्यक्ष रहते नड्‌डा ही ऐसे महासचिव थे, जो संगठन के पदों पर सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़े हैं।

नड्डा का कार्यकाल बढ़ाया जाता है, तो निश्चित ही उनके सामने ढेरों चुनौतियाँ होंगी, जिनमें एकाध महीने में दो राज्यों के विधानसभा चुनाव भी शामिल हैं। इस साल दो राज्यों प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात और नड्डा के गृह राज्य हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के भाजपा की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण चुनाव हैं। यही नहीं, अगले साल कर्नाटक, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव हैं। इस तरह से एक के बाद एक विधानसभा के चुनाव नड्डा की रणनीतिक क्षमताओं की परीक्षा लेंगे।

नड्डा ख़ुद को लगातार हिमाचल के चुनाव पर नज़र रखे ही हैं और प्रधानमंत्री मोदी के दो दौरे भी करवा चुके हैं। यही नहीं, हाल के महीनों में नड्डा ने दक्षिण भारत के भी काफ़ी दौरे किये हैं। क्योंकि पार्टी वहाँ अपनी ज़मीन मज़बूत करना चाहती है। जे.पी. नड्डा को स्वभाव से सौम्य माना जाता है। अमित शाह से चार साल बड़े नड्डा को संगठन में माहिर माना जाता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) में 13 साल तक रहे नड्डा का पार्टी के संगठन में व्यापक नेटवर्क है। उस दौर के युवा नेता आज पार्टी के वरिष्ठ पदों पर हैं और सभी नड्डा को जानते हैं।

नड्डा की संगठन क्षमता तब सामने आयी, जब सन् 2019 में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पार्टी प्रभारी के नाते उन्होंने चुनाव रणनीति बुनी और भाजपा को जीत दिलायी। नड्डा के बारे में कहा जाता है कि बड़े निर्णय वे कभी जल्दी में नहीं लेते और सभी पक्षों से बात करने को प्राथमिकता देते हैं। हाल में जब महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस को उप मुख्यमंत्री बनाने की बात आयी, तो नड्डा ने इसमें बड़ी भूमिका अदा की।

जे.पी. नड्डा पर भाजपा के मिशन दक्षिण की बड़ी चुनौती है। नड्डा लगातार दक्षिण के राज्यों का दौरा करते रहे हैं। तेलंगाना और तमिलनाडु के बाद हाल में वह दो दिन केरल में रहे हैं, जहाँ उन्होंने पार्टी की ज़मीन मज़बूत करने के लिए रणनीति तैयार की है। नड्डा इन राज्यों में पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। वह राज्यों के बुद्धिजीवियों और जानी मानी हस्तियों से भी मुलाक़ात कर रहे हैं। तमिलनाडु, तेलंगाना और केरल में नड्डा प्रोफेशनल से लेकर ख़ासतौर पर महिला कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात के अलावा बूथ अध्यक्षों के घर गये हैं। वह उन्हें यह सन्देश देना चाहते हैं कि पार्टी के लिए इन राज्यों में खड़ा होना कितना ज़रूरी है। हालाँकि इसमें कोई दो-राय नहीं कि भाजपा के सामने दक्षिण में संगठन को खड़ा करना बड़ी चुनौती है।

भाजपा के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से दक्षिण बहुत अहम है। यह बहुत $गौर करने लायक बात है कि सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर भारत के ज़्यादातर राज्यों में शिखर पर रही थी। अर्थात् उसने कई जगह तो सभी की सभी सीटें जीती थीं। पार्टी के नेता भी मानते हैं कि 2024 में उस प्रदर्शन को दोहराना कठिन होगा। लिहाज़ा पार्टी को इसकी भरपाई दक्षिण से करनी होगी। उत्तर पूर्व में वैसे ही ज़्यादा सीटें नहीं हैं। लिहाज़ा दक्षिण पर ही पार्टी को भरोसा है, जहाँ कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा के ज़रिये अपनी ज़मीन मज़बूत करने में जुटी है, जिसका असली म$कसद वहाँ भाजपा को न उठने देना ही है।

तेलंगना में सन् 2019 में भाजपा ने 17 में से चार सीटें जीती थीं। तमिलनाडु में लोकसभा की 38 सीटें हैं। लेकिन भाजपा वहाँ शून्य है। ऐसे ही केरल की 20 में से एक भी सीट भाजपा के पास नहीं, जबकि कांग्रेस नेता राहुल गाँधी इसी राज्य से सांसद हैं। उनकी पदयात्रा को केरल में काफ़ी समर्थन मिलता दिखा है। भाजपा का यही हाल आंध्र प्रदेश में है, जहाँ 25 में से एक भी सीट उसके पास नहीं। नड्डा दोबारा अध्यक्ष बने, तो उनके लिए इन शून्य वाले राज्यों में पार्टी को खड़ा करना बड़ी चुनौती रहेगी।

भारत नहीं किसी से कम

भारतीय वायु सेना दिवस समारोह में जवानों ने किया जबरदस्त शक्ति-प्रदर्शन

मुश्किल से 10-15 मिनट में ही एक जिप्सी गाड़ी को अलग-अलग हिस्से करके खोलना, फिर जोडऩा और चलाकर आगे बढऩा। यह एक ड्रिल का हिस्सा था, जो मैकेनिकल ट्रांसपोर्ट की टीम ने कर दिखाया। मौक़ा था भारतीय वायु सेना दिवस की समारोह का।

वायु सैनिकों ने अपने एक और करतब में वज़नदार बंदूकों को खिलौनों की तरह ऊपर-नीचे, दायें-बायें उछाला, मगर सन्तुलन बरक़रार रखा। वहीं आसमान में पैराशूट से रंगीन धुएँ के ग़ुब्बारे छोड़ते जोशीले, उत्साही, कुशल वायु सैनिकों का प्रशिक्षण इस बात का गवाह है कि भारत अब किसी से कम नहीं है। 8 अक्टूबर को चंडीगढ़ में 90वाँ वायु सेना दिवस समारोह दो भागों में आयोजित किया गया। पहला 12 विंग वायु सेना स्टेशन पर भव्य परेड के रूप में, दूसरा सुखना झील पर हवाई प्रदर्शन। हवाई प्रदर्शन में युद्धक विमानों ने हैरतअंगेज़ करतब दिखाकर उपस्थित चंडीगढ़ वासियों को जमकर रोमांचित कर दिया।

भारतीय वायु सेना के मुख्यालय हिंडन हवाई अड्डा, ग़ाज़ियाबाद के बाहर पहली बार चंडीगढ़ में वायु सेना दिवस मनाया गया। यह समारोह बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की नयी इबारत लिखता नज़र आया। परम्परा से आगे बढक़र अति आधुनिक तकनीक, कुशल प्रशिक्षण और अनुशासन भारतीय वायु सेना को नये अर्थों में परिभाषित कर रहा है। अब बेचारा नहीं रहा हमारा भारत। उसके पास अपनी सोच है। अपना ज्ञान है। ईमान भी है और अरमान भी। आधुनिक तकनीक और सूचनाओं से लैस हो रहा देश दुश्मनों के दाँत खट्टे करने वाले लड़ाकू विमानों को अपने यहाँ निर्मित कर रहा है। हम आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इसलिए कई युवाओं के अरमान भी पूरे हो रहे हैं। समारोह में बहुत-से युवा सैनिकों से बात हुई। इस क्षेत्र में आकर वह अपने को काफ़ी सन्तुष्ट ख़ुश और गौरवान्वित महसूस करते हैं। उनका कहना है कि 12वीं के बाद बेस्ट ऑप्शन है वायु सेना में भर्ती होना। इससे परिवार की मदद भी कर सकते हैं और आगे अपनी पढ़ाई भी कर सकते हैं। व्यक्तित्व भी अच्छा हो जाता है। वायु सेना में प्रवेश के बाद पता चलता है कि इसमें काफ़ी सुविधाएँ हैं।

बदलते भारत की तस्वीर

हमारा फ्लैट जिस सोसायटी में है, वह हवाई अड्डा क्षेत्र के पास है। पिछले 10 साल से हम देख रहे हैं कि हमारी छत के ऊपर से हर रोज़ कई तरह के विमान आते-जाते रहते हैं। यात्री विमान भी और वायु सेना के भी। सुबह-सवेरे भारी-भरकम गरजता हुआ गजराज लेह के लिए निकलता है। विशेष दिनों में एक ऐसा विमान अक्सर क्षेत्र में उड़ता रहता है, जिसे समारोह के दौरान आर्टिलरी गन ले जाते देखा। इसे चीनूक का नाम दिया गया है। जिस तेजस को वायु सेना परेड के दौरान डिस्प्ले में देखा था, उसे सुखना झील पर गरजते और दहाड़ते देखा। यह देश में ही बनाया गया है। इसी तरह प्रचंड विमान भी स्वदेशी है। इसके अलावा रफाल, सूर्य किरण, मिग, सुखोई, मिराज आदि 80 से अधिक युद्धक विमानों ने अपनी- अपनी ख़ूबियों से लैस होकर जबरदस्त हवाई प्रदर्शन किया। आसमान में आग उगलते, धुएँ के रास्ते बनाते, कलाबाज़ी खाते ये विमान भारतीय वायु सेना की नयी ताक़त को बयाँ करते नज़र आये। युवा वायु सैनिकों ने ज़मीन से लेकर आसमान तक अपनी सूझबूझ, क्षमता, शक्ति और कौशल का प्रदर्शन किया।

भविष्य के लिए परिवर्तन

जी हाँ, वर्ष 2022 के लिए वायु सेना दिवस की थीम यही थी। वायुसेना ठिकाने पर अपने वक्तव्य में मुख्य अतिथि एयर चीफ मार्शल वी.आर. चौधरी का कहना था कि वायु सेना को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा। इसलिए नये विमानों, प्रणालियों और अवधारणाओं में बदलाव लाया जा रहा है। वायु सेना के अधिकारियों के लिए आयुध प्रणाली शाखा के निर्माण के लिए केंद्र सरकार की मंज़ूरी मिल गयी है।

यह पहली बार है कि आज़ादी के बाद एक नयी परिचालन शाखा बनायी जा रही है। यह अनिवार्य रूप से सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, रिमोट से पायलेटेड एयरक्राफ्ट और वेपन सिस्टम ऑपरेटरों की जुड़वाँ और बहु क्रू-विमानों में चार विशेष धाराओं के संचालन के लिए होगा। इस शाखा के निर्माण से उड़ान प्रशिक्षण पर कम ख़र्च आएगा और 34,00 करोड़ रुपये से अधिक की बचत होगी।

नयी वर्दी

भारतीय वायु सेना ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहाँ आकर आपके व्यक्तित्व का समग्र विकास होता है। अधिकारी राजीव शर्मा को वायु सेना की वर्दी आकर्षित करती है। इसी वजह से वह वायु सेना में भर्ती हुए। वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए कड़ी मेहनत और काफ़ी शोध करने के बाद एक नयी वर्दी (डिजिटल पैटर्न कॉम्बैट ड्रेस) वायु सेना के लिए दी गयी। इसे विंग कमांडर कुणाल खन्ना और उनकी टीम ने प्रदर्शित किया और एयर चीफ मार्शल वी.आर. चौधरी ने लॉन्च किया। कार्यकम के बाद मीडिया को उन्होंने बताया कि अब युद्ध पुराने ढर्रे पर नहीं लड़े जा सकते, बल्कि अपनी पारम्परिक हथियार प्रणाली को हालात के मुताबिक आधुनिक तकनीक से जोडऩे की ज़रूरत है। इसलिए वायु सैनिकों के लिए यह नयी वर्दी तैयार की गयी है, जो युद्ध के दौरान सुरक्षा के लिए काफ़ी मददगार साबित होगी। वायु सेना प्रमुख का कहना है कि हल्के ग्रे, हरे रंग से तैयार की गयी स्वदेशी वर्दी आरामदायक है। $खास बात यह है कि इसे जोन कर दिया गया है, ताकि हमारे लडक़े टेक्निकल स्पेस में आराम से काम कर सके। इसके साथ बेल्ट, टोपी और जूते भी आरामदायक हैं।

रोज़गार के नये आयाम

भारतीय वायु सेना में रोज़गार के नये आयामों को तलाश किया गया है। अब अग्नि वीर वायुसेना में प्रशिक्षण लेकर अपनी सेवाएँ देंगे। इस वर्ष दिसंबर तक 3,000 अग्निवीर प्रशिक्षण के लिए भर्ती किये जाएँगे। आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ेगी। अगले साल से यानी वर्ष 2023 से महिला अग्निवीर भी शामिल की जाएँगी।

श्रीमद्भगवद्गीता से ली प्रेरणा

भारतीय वायु सेना की स्थापना 8 अक्टूबर 1932 को हुई थी। आज़ादी से पहले इसे रॉयल इंडियन वायु सेना कहा जाता था। वर्ष 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध में वायु सेना की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय वायु सेना ने श्रीमद्गवद्गीता से प्रेरणा लेकर नित नयी ऊँचाइयों को प्राप्त किया है। ‘नभ: स्पृशं दीप्तम्’ वायु सेना का आदर्श वाक्य है। यह श्रीमद्गवद्गीता के 11वें अध्याय का 24वाँ श्लोक है। इसका अर्थ है- ‘गर्व के साथ आसमान को छूना।’

भारत में घटने लगी प्रजनन दर

हिन्दू महिलाओं की कुल प्रजनन दर घटकर 1.94, मुस्लिम महिलाओं की 2.2, ईसाई महिलाओं की 1.88, सिख महिलाओं की 1.61 और जैन महिलाओं की 1.6 हो गयी है। भारत के लिए इसके क्या मायने हैं? बता रहे हैं भारत हितैषी :-

भारत ने इस मायने में इतिहास बना दिया है कि जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के सरकारी प्रयास आख़िर वांछित परिणाम दिखा रहे हैं। प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से भी नीचे चली गयी है। प्रजनन दर में गिरावट की इस गति का भारत जैसे देश के लिए सकारात्मक अर्थ संकेत हैं, क्योंकि इससे देश की जनसंख्या अब 2030 तक चीन से अधिक नहीं हो सकती है।

प्रजनन क्षमता में यह गिरावट सभी समुदायों में देखी जा रही है। नवीनतान आँकड़ों के मुताबिक, हिन्दू महिलाओं की कुल प्रजनन दर 1.94 है और मुस्लिम महिलाओं के लिए यह 2.2 है, जबकि ईसाई समुदाय की प्रजनन दर 1.88, सिख समुदाय 1.61, जैन समुदाय 1.6 और बौद्ध और नव-बौद्ध समुदाय 1.39 है। सीधे शब्दों में कहें, तो यह एक एकल परिवार में बच्चों की औसत संख्या है।

प्रतिस्थापन स्तर की उर्वरता उस स्तर का प्रतिनिधित्व करती है, जिस पर जनसंख्या बिलकुल एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अपने आप को बदल लेती है। इस प्रकार यदि यह स्तर पर्याप्त रूप से लम्बी अवधि तक बना रहता है, तो शून्य जनसंख्या वृद्धि होती है। अधिकांश देशों में यह दर लगभग 2.1 बच्चे प्रति महिला है। हालाँकि यह मृत्यु दर के साथ मामूली रूप से भिन्न हो सकती है। प्रतिस्थापन स्तर की उर्वरता शून्य जनसंख्या वृद्धि को तभी बढ़ावा देगी, जब मृत्यु दर स्थिर रहे और प्रवास का कोई प्रभाव न पड़े।

भारत में अधिक जनसंख्या एक बड़ी चुनौती रही है और देश में ग़रीबी, बेरोज़गारी और निरक्षरता जैसी अधिकांश समस्यायों का एक बड़ा कारण है। नमूना पंजीकरण प्रणाली डाटा 2020 के अनुसार, भारत की सामान्य प्रजनन दर (एक वर्ष में 15-49 के प्रजनन आयु वर्ग में प्रति 1,000 महिलाओं पर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या) में पिछले एक दशक में 20 फ़ीसदी की गिरावट आयी है।

गिरावट की इस दर का मतलब है कि भारत विश्व स्तर पर सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने के लिए चीन को पछाड़ नहीं पाएगा। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, औसत सामान्य प्रजनन दर सन् 2018 से सन् 2020 के बीच 68.7 है, जबकि सन् 2008 सन् 2010 के बीच यह 86.1 थी। गिरती प्रजनन दर को कई संरचनात्मक हस्तक्षेपों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है, जैसे कि शादी की उम्र में वृद्धि, महिलाओं में साक्षरता दर में सुधार, और आधुनिक गर्भनिरोधक विधियों की आसान और व्यापक उपलब्धता आदि।

नमूना पंजीकरण प्रणाली डाटा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुरूप है, जिसमें भारत की कुल प्रजनन दर (प्रजनन आयु की प्रति महिला जन्म दर) 2015-16 की 2.2 से गिरकर 2019-2021 में 2.0 हो गयी है।

हालाँकि कुल प्रजनन दर में गिरावट एक समान नहीं है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह शहरी क्षेत्रों में 15.6 फ़ीसदी की तुलना में 20.2 फ़ीसदी है। एक ग्रामीण महिला का टीएफआर 2.2 है, जबकि एक शहरी महिला का 1.6 है। इसलिए यह तर्क दिया जा सकता है कि सामाजिक और आर्थिक विकास तो राष्ट्रीय स्तर पर प्रजनन दर में गिरावट को प्रेरित कर रहे हैं। वहीं साक्षरता, आर्थिक सशक्तिकरण, महिलाओं की जागरूकता में असमानता है, जिससे विसंगतियाँ बढ़ रही हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करते हुए) में चंडीगढ़ में कुल प्रजनन दर 1.4 से लेकर उत्तर प्रदेश में 2.4 तक देखी गयी। मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश को छोडक़र कई राज्यों ने प्रजनन क्षमता का प्रतिस्थापन स्तर (2.1) हासिल कर लिया है।

रिपोर्ट बताती हैं कि दो से ऊपर की कुल प्रजनन दर वाले पाँच राज्य बिहार, मेघालय, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड और मणिपुर थे। हरियाणा, असम, गुजरात उत्तराखण्ड और मिजोरम 1.9 पर कुल प्रजनन दर दो थी। छ: राज्य- केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा 1.8 पर थे। इसके अलावा 1.7 में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड और त्रिपुरा थे, जबकि इस सर्वेक्षण में पश्चिम बंगाल में टीएफआर सबसे कम 1.6 था।

आँकड़े बताते हैं कि पिछले दो दशक में सभी धार्मिक समुदायों में मुसलमानों की प्रजनन दर में सबसे तेज़ गिरावट आयी है। आँकड़ों से यह भी पता चलता है कि मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू और कश्मीर ने सभी राज्यों में सामान्य प्रजनन दर में सबसे ज़्यादा गिरावट दर्ज की है।

अपनी प्रजनन क्षमता में गिरावट के बावजूद भारत में अभी भी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है। हालाँकि बड़ी या तेज़ी से गिरावट, जनसंख्या वृद्धि दर अनुमानित 1.9 फ़ीसदी प्रति वर्ष है। दुनिया के केवल तीन देशों नाइजीरिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश में  विकास की उच्च दर है।

प्रजनन क्षमता में गिरावट का श्रेय साक्षरता, शहरीकरण, औद्योगीकरण, आधुनिक संचार और परिवहन और महिलाओं की स्थिति में वृद्धि को दिया जाता है। सरकारी परिवार नियोजन सेवाओं की उपलब्धता ने भी प्रजनन क्षमता में गिरावट में योगदान दिया है। शहरी क्षेत्रों में प्रजनन क्षमता में तेज़ी से गिरावट आयी है, जो कि 1,00,000 से अधिक लोगों की आबादी वाले शहरों में केंद्रित हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री भारती प्रवीण पवार के अनुसार, समग्र गर्भनिरोधक प्रसार दर (सीपीआर) देश में 54 फ़ीसदी से बढक़र 67 फ़ीसदी हो गयी है। लगभग सभी राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों में गर्भ निरोधकों के आधुनिक तरीक़ों का उपयोग भी बढ़ा है। परिवार नियोजन की अधूरी ज़रूरतों में 13 फ़ीसदी से नौ फ़ीसदी की महत्त्वपूर्ण गिरावट देखी गयी है। अतीत में भारत में एक प्रमुख मुद्दा बनी रही रिक्ति की अधूरी आवश्यकता अब घटकर चार फ़ीसदी से भी कम रह गयी है। भारत में संस्थागत जन्म 79 फ़ीसदी से बढक़र 89 फ़ीसदी हो गये हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लगभग 87 फ़ीसदी जन्म स्वास्थ्य सुविधाओं में होता है और शहरी क्षेत्रों में यह 94 फ़ीसदी है। जनसंख्या वृद्धि स्वास्थ्य और मृत्यु दर में सुधार के लिए ज़िम्मेदार है। जीवन प्रत्याशा बढक़र 60 वर्ष हो गयी है और शिशु मृत्यु दर घटकर 74 प्रति 1,000 हो गयी है।

राष्ट्रीय परिवार के पाँचवें दौर के निष्कर्षों के अनुसार, कुल प्रजनन दर, जो कि किसी भी महिला से उसके जीवनकाल में पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या है; 2015-16 के 2.2 से घटकर 2019-21 में 2.0 हो गयी थी। स्वास्थ्य सर्वेक्षण या एनएफएचएस-5। भारत की दो की कुल प्रजनन दर वर्तमान में प्रति महिला 2.1 बच्चों की प्रजनन क्षमता के प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। इस बीच निम्न-प्रतिस्थापन प्रजनन क्षमता अंतत: नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि और लम्बी अवधि में जनसंख्या के कम होने का परिणाम है। 1992-93 और 2019-21 के बीच भारत की कुल प्रजनन दर 3.4 बच्चों से घटकर 2.0 बच्चे रह गयी। कुल प्रजनन दर सिक्किम में प्रति महिला 1.1 बच्चों से लेकर बिहार में प्रति महिला तीन बच्चों तक है। एनएफएचएस-5 के अनुसार, पाँच राज्यों को प्रजनन क्षमता का प्रतिस्थापन स्तर 2.1 प्राप्त करना अभी बा$की है। ये राज्य बिहार (2.98), मेघालय (2.91), उत्तर प्रदेश (2.35), झारखण्ड (2.26) और मणिपुर (2.17) है।

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की कुल प्रजनन दर 1992-93 में 3.7 बच्चों से घटकर 2019-21 में 2.1 बच्चे रह गयी है। शहरी क्षेत्रों में महिलाओं में यह गिरावट 1992-93 में 2.7 बच्चों से 2019-21 में 1.6 बच्चों की थी। सभी एनएफएचएस सर्वेक्षणों में कमोबेश सभी जगह (रहने वाली जगह) प्रजनन दर 20-24 वर्ष की आयु में चरम पर होती है, जिसके बाद इसमें लगातार गिरावट आती है। एक और दिलचस्प पहलू यह था कि महिलाओं के स्कूली शिक्षा के स्तर के साथ प्रति महिला बच्चों की संख्या में गिरावट आयी है। बिना स्कूली शिक्षा वाली महिलाओं में औसतन 2.8 बच्चे होते हैं, जबकि 12 या अधिक वर्षों की स्कूली शिक्षा वाली महिलाओं के बच्चों की औसत संख्या 1.8 है।

उत्तर प्रदेश के हर गाँव में टंकी से मिलेगा पानी

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार अपनी छवि चमकाने का हर सम्भव प्रयास कर रही है। प्रदेश में बढ़ते अपराध एवं महँगाई की ओर भले ही उनका ध्यान न हो, मगर योगी आदित्यनाथ लोगों में ऐसा सन्देश देना चाहते हैं कि वह जनता के लिए काम कर रहे हैं। इस बार जब योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए योगी ने एक एक करके कई योजनाओं की घोषणा कर डाली। योगी की इन योजनाओं में ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों का पुनरुद्धार, पौधरोपण एवं ग्रामीण क्षेत्रों में ही घर घर में टंकी का पानी पहुँचाने की योजनाएँ प्रमुख हैं।

योगी सरकार की ये तीनों ही योजनाएँ कब तक पूर्ण होंगी एवं उनसे ग्रामीणों को कितना लाभ होगा, यह तो योजनाओं के पूर्ण होने के बाद ही पता चलेगा; मगर वर्तमान में तीनों ही योजनाओं पर काम हो रहा है। मिलक क्षेत्र के एक अधिकारी ने बताया कि कई गाँवों में टंकियाँ बनकर तैयार हो चुकी हैं, जबकि कई गाँवों में बोरिंग हो चुके हैं अथवा हो रहे हैं। यह काम शीघ्रता के साथ पूरे प्रदेश में चल रहा है, ताकि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए शुद्ध पानी उपलब्ध कराया जा सके। मीरगंज क्षेत्र के कुछ गाँवों के लोगों ने कहा कि उनके यहाँ 40 फुट से लेकर 70 फुट तक पानी प्रदूषित हो चुका है। इस पानी को थोड़ी देर भी रख दो, तो पीला पड़ जाता है। गहरा बोरिंग कराने में लगभग 60 से 70,000 रुपये लगते हैं। ऐसे में यदि सरकारी टंकी लगती है तथा घर-घर स्वच्छ पेयजल मिलने लगेगा, तो अच्छा रहेगा।

एक गाँव की ग्राम प्रधान के पति प्रदीप ने बताया टंकियों के निर्माण के बाद लगभग दो किलोमीटर लम्बी पाइप लाइन बिछायी जाएगी। अभी तो कुछ जगह टंकियाँ बन चुकी हैं। कुछ जगह बोरिंग हो गये हैं। कुछ जगह होने हैं; तो कुछ जगह पाइप लाइन बिछायी जा रही है। इस योजना से हर घर के दरवाज़े पर पानी की टोंटी लगेगी। टंकियाँ लगने का कार्य सरकारी भूमि पर हो रहा है। अभियंता, क्षेत्रीय अधिकारी, लेखपाल, ग्राम प्रधान भूमि की सीमांकन कर रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। टंकियाँ लगने के बाद इन्हें चलाने के लिए नियुक्तियाँ की जाएँगी तथा जो लोग इन्हें चलाएँगे, उनको राज्य वित्त आयोग से प्राप्त धनराशि में से मनरेगा के वित्त कोष में से ग्राम प्रधान के माध्यम से 2,000 रुपये महीने का भत्ता दिया जाएगा।

गाँव-गाँव में पानी की टंकियाँ लगने की कुछ लोग प्रशंसा कर रहे हैं, तो कुछ लोग इसे भविष्य में घाटे का सौदा बताकर इसकी निंदा कर रहे हैं। गुलडिय़ा गाँव के गोविंद शर्मा का कहना है कि इससे ग्रामीणों को पीने योग्य पानी मिलने की सम्भावना है, मगर किस मूल्य पर? प्रश्न तो यह है। ठिरिया निवासी हरीश गंगवार कहते हैं कि गाँव में टंकियों से पानी लेने की ज़रूरत तो तब होती, जब यहाँ पानी की कमी होती। यहाँ तो जहाँ भी बोरिंग करो, वहीं पानी है। हर घर में नल लगे हुए हैं। लगभग 35-40 फ़ीसदी लोगों के यहाँ तो पानी की मोटर लगी हुई हैं। इसलिए जहाँ पानी की कमी है, वहाँ सरकार को पानी पहुँचाना चाहिए। ऐसी योजनाएँ कारगर नहीं होती हैं।

प्रदेश में भूजल की स्थिति

उत्तर प्रदेश में भूमिजल की निकासी बड़ी मात्रा में होती है। इसकी वजह यह है कि प्रदेश में कृषि क्षेत्र 694.35 लाख हेक्टेयर है, जबकि मानव निवास क्षेत्र इसके सातवें हिस्से से भी कम है। मगर उत्तर प्रदेश में घटता भूजल एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रहा है। प्रदेश के कई स्थानों पर पानी की समस्या पैदा हो रही है। बुंदेलखण्ड में पानी की कमी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ऐसे स्थानों पर पानी की व्यवस्था करने का प्रयास सराहनीय है। मगर प्रश्न यह है कि जहाँ भूमि में जल ही नहीं है अथवा अत्यधिक गहराई में है, वहाँ टंकियों के माध्यम से योगी सरकार पानी की व्यवस्था कैसे करेगी?

कुल मिलाकर टंकियाँ लगने की कार्ययोजना वर्ष 2021 में ही बन गयी थी। इसके तहत भूजल के प्रभावी प्रबन्धन हेतु भूगर्भ जल विभाग को प्रदेश की भूजल सम्पदा के सर्वेक्षण, अनुसंधान, नियोजन, विकास एवं प्रबंधन के लिए उत्तरदायी बनाया गया था। इस योजना में भूजल दोहन पर नियंत्रण, भूजल संरक्षण एवं जल संचय करने की व्यवस्था है। अब उत्तर प्रदेश भूगर्भ जल (प्रबंधन और विनियमन) अधिनियम-2019 बनने के बाद इस पर पिछले छ:-सात महीने से युद्धस्तर पर काम हो रहा है।

भूजल दोहन पर लगेगा प्रतिबंध?

एक ग्राम प्रधान ने नाम प्रकाशित न करने की प्रार्थना करते हुए बताया कि यह सरकार आम लोगों से उन संसाधनों छीन लेना चाहती है, जिन पर उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। भाजपा सरकार अगर सीधे-सीधे भूजल दोहन पर रोक लगाएगी, तो इसका विरोध होगा और सरकार गिर जाएगी अथवा उसे भविष्य में कोई नहीं चुनेगा। इसलिए उसने गाँव-गाँव में टंकियाँ लगानी शुरू कर दी हैं। इसे ग्रामीण लोग विकास समझ रहे हैं, किन्तु प्रदेश के भोले-भाले लोगों को नहीं पता कि भविष्य में वे भूमि से पानी नहीं निकाल सकेंगे। क्योंकि सरकार की योजना यही है कि आम लोगों, विशेषकर किसानों द्वारा भूजल दोहन पर रोक लगायी जाए; तथा उन्हें जब पानी की आवश्यकता हो, तो वे पानी सरकार से मोल लें। ऐसे में तत्काल की प्रसन्नता जीवन भर का रोना बन सकती है।

भविष्य में ख़रीदना पड़ेगा पानी?

योगी सरकार की योजनानुसार टंकियाँ लगने के बाद हर किसी को टंकियों की पाइपलाइन से पानी दिया जाएगा। कहा जा सकता है कि पानी सप्लाई से लेना होगा, जिसका भुगतान उसे भविष्य में बिजली बिल की तरह भी करना पड़ सकता है। इससे पानी को भी लोग तरस सकते हैं। क्योंकि पानी की सप्लाई एक टंकी से होगी। अगर कभी वह टंकी अथवा उसकी मोटर ख़राब हुई अथवा कभी बिजली देर तक नहीं आयी अथवा कहीं पाइपलाइन प्रभावित हुई, तो पानी की सप्लाई प्रभावित होगी।

वर्ष 2021 में बने अधिनियम को भूगर्भ जल के तहत सरकारी सूचना से पता चलता है कि इस योजना को गाँवों में सुचारू रखने के लिए ग्राम पंचायत भूजल उप समितियाँ बनी हैं, जिनके अध्यक्ष ग्राम प्रधान एवं सदस्य सचिव ग्राम पंचायत सचिव हैं। इनका काम ग्राम पंचायत भूगर्भ जल सुरक्षा होगा, जिसकी निगरानी ब्लॉक पंचायत भूजल प्रबंधन समितियाँ करेंगी। इनके अध्यक्ष ब्लॉक प्रमुख एवं सदस्य सचिव खण्ड विकास अधिकारी होंगे। इनका काम विकासखण्ड स्तर पर भूगर्भ जल का संरक्षण एवं घरेलू एवं कृषि भूजल उपभोक्ताओं का पंजीकरण करना होगा। इनके ऊपर निगरानी के लिए नगर निगम जल प्रबंधन समितियाँ होंगी, जिनके अध्यक्ष नगर प्रमुख अथवा नगर पालिका प्रमुख एवं सदस्य सचिव नगर आयुक्त अथवा अधिशासी अधिकारी होंगे। इनका काम सतही जल एवं भूगर्भ जल के स्रोतों का संयोजन एवं प्रबंधन कराना होगा।

इन सबके ऊपर जनपद भूजल प्रबंधन परिषद् अध्यक्ष के रूप में ज़िला अधिकारियों एवं सदस्य सचिव के रूप में ज़िला विकास अधिकारियों को नियुक्त माना जाएगा। इनका काम ग्राम पंचायत, ब्लॉक पंचायत, म्युनिसिपल तथा राज्य स्तरीय भूजल प्रबंधन एवं नियामक प्राधिकरण से आवश्यक समन्वय स्थापित करना। उपभोक्ताओं का पंजीकरण, अनापत्ति निर्गत करना तथा ड्रिलिंग एजेंसी का पंजीकरण करने के साथ-साथ भूजल प्रदूषण के रोकथाम के उपाय करना, किसी भी व्यावसायिक, औद्योगिक एवं अन्य लाभ के उपयोग पर रोक के लिए भूगर्भ जल दोहन अधिनियम की धारा-39 एवं 40 के अंतर्गत कार्रवाई करना होगा।

इन सबके ऊपर उत्तर प्रदेश राज्य भूजल प्रबंधन एवं नियामक प्राधिकरण अध्यक्ष के रूप में उत्तर प्रदेश सरकार का मुख्य सचिव एवं सदस्य सचिव के रूप में उत्तर प्रदेश के भूगर्भ जल विभाग के निदेशक को नियुक्त किया जाएगा। इनका काम अधिसूचित या ग़ैर-अधिसूचित क्षेत्रों में वर्गीकृत करना, भूजल निकास की सीमा तय करना, भूजल प्रदूषण की रोकथाम कराना तथा जनपदीय भूजल शिकायत निवारण अधिकारी के निर्णय से क्षुब्ध व्यक्ति की शिकायत का समाधान करना होगा।

हाल में टंकियों से पानी लेने के लिए जो नियम बना है, उसमें घरेलू उपभोक्ताओं का पंजीकरण नि:शुल्क होगा। कहा तो यह जा रहा है कि इन्हें टंकियों से पानी भी घर पर लगने वाली टोंटी से नि:शुल्क ही मिलेगा। मगर कुछ जानकार कह रहे हैं कि भविष्य में शीघ्र ही इसका शुल्क देना होगा। वहीं व्यावसायिक, औद्योगिक अथवा अन्य लाभकारी उपयोग के लिए भूजल उपभोक्ताओं को पंजीकरण शुल्क 5,000 रुपये देना होगा। इसकी निर्गत अनापत्ति की वैधता केवल पाँच वर्ष होगी। अर्थात् पाँच वर्ष बाद शुल्क पुन: लिया जा सकता है। कृषि कार्यों के लिए अभी किसी शुल्क के बारे में पता नहीं चला है, मगर यह तो सत्य है कि कृषि कार्य के लिए सरकारी ट्यूबबेल अथवा नहर से $फसलों की सिंचाई करने पर शुल्क तो देना ही पड़ता है। ऐसे में स्पष्ट है कि इन टंकियों अथवा किसी अन्य सरकारी जल उपक्रम से सिंचाई करने पर शुल्क तो किसानों को भी देना ही पड़ेगा।

कहा जा रहा है कि इस योजना के तहत अगर कोई सरकार की टंकियों से पानी मिलने के बाद भी भूजल दोहन करता है अथवा सरकार द्वारा उपलब्ध पानी का दुरुपयोग करता है, तो उसे प्रथम अपराध हेतु दो लाख से पाँच लाख रुपये तक का आर्थिक दण्ड अथवा छ: माह से एक वर्ष का कारावास अथवा दोनों हो सकते हैं। अपराध की पुनरावृत्ति करने पर प्राधिकार पत्र निरस्त करते हुए दण्ड दोगुना कर दिया जाएगा।

वहीं भूजल प्रदूषण करने पर प्रथम अपराध हेतु पाँच लाख से 10 लाख रुपये का आर्थिक दण्ड अथवा दो वर्ष से तीन वर्ष तक का कारावास अथवा दोनों के तहत दण्डित किया जाएगा। वहीं भूजल प्रदूषण हेतु अपराध की पुनरावृत्ति पर यह दण्ड दोगुना कर दिया जाएगा। अब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उत्तर प्रदेश के निवासियों के लिए भविष्य में किस प्रकार से पानी मिल सकेगा?

भ्रष्टाचार एवं अकर्मण्यता के केंद्र बनते विश्वविद्यालय

जनवादी परम्परा के लेखक मुक्तिबोध अपनी ‘साहित्यिक डायरी’ में लिखते हैं- ‘दिल्ली से प्रांतीय राजधानियों तक जो अवसरवाद, अनाचार और भ्रष्टाचार फैला हुआ है, उसके लिए हमारे बुज़ुर्ग ज़िम्मेदार थे।’

असल में जिन्हें समाज को ईमानदारी की सीख और संस्कार देने थे, उन्होंने भ्रष्टाचार और अनाचार को प्रश्रय दिया। वर्तमान में इस कुव्यवस्था से संस्कार प्रदाता और व्यक्तित्व निर्माणक शिक्षण संस्थान भी अतिशप्त हैं। कुछ समय पूर्व उच्च शिक्षण संस्थान के प्राध्यापकों की योग्यता का एक विद्रूप दृश्य तब देखने को मिला, जब तिलकामांझी विश्वविद्यालय, भागलपुर में विश्वविद्यालय सेवा आयोग से चयनित असिस्टेंट प्रोफेसरों से कुलपति ने पूछा कि बेरोज़गारी क्या है? बेरोज़गारी दर क्या है? मौलिक अधिकार कितने और कौन-कौन से हैं? शिक्षा का अधिकार क्या है? अब तक संविधान में कितनी बार संशोधन हुआ है? इन सामान्य स्तर के प्रश्नों का उत्तर देने में असिस्टेंट प्रोफेसरों के पसीने छूट रहे थे। निकट ही उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय में नवनियुक्त शिक्षक ठीक ढंग से प्रार्थना पत्र नहीं लिख पा रहे थे। इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा आयोग में भर्तियों में हुई धाँधली पर आन्दोलनरत प्रतियोगी छात्रों की शिकायत और जाँच की माँग को सरकार लगातार अनसुनी कर रही है। ज़रा कल्पना कीजिए कि जिन अयोग्य तथाकथित शिक्षकों की विषय की समझ ही अपर्याप्त है, वे विद्यार्थियों को क्या पढ़ाएँगे? देश के भविष्य का निर्माण कैसे करेंगे?

इस दूरावस्था के मूल कारण नियुक्ति में होने वाला भ्रष्टाचार, उच्च शिक्षण संस्थानों में राजनीतिक दख़ल, भाई-भतीजावाद, धन के आधार पर नियुक्ति आदि हैं। नियुक्तियों में राजनीतिक दख़ल का ज्वलंत उदाहरण केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के निजी सचिव के.के. रागेश की पत्नी प्रिया वर्गीज का कन्नूर विश्वविद्यालय द्वारा मलयालम भाषा विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति का मामला है। प्रिया वर्गीज का शोध स्कोर मात्र 156 था, जबकि द्वितीय स्थान पर नामित हुए प्रत्याशी को 651 अंक प्राप्त थे। साक्षात्कार में द्वितीय स्थान पर आये उम्मीदवार को कुल 50 में से 32 अंक मिले, वहीं प्रिया वर्गीज को मात्र 30 अंक। विवाद बढऩे पर केरल उच्च न्यायालय ने प्रिया की नियुक्ति पर रोक भी लगा दी और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को समन (नोटिस) जारी किया। ग़ौरतलब है कि प्रिया के पति रागेश माकपा के छात्र संगठन एसएसआई के प्रमुख एवं माकपा के सांसद रहे हैं। यह कोई पहला मामला या अपवाद नहीं है। सभी दलों की सरकारें ऐसे ही अपने-अपने लोगों की नियुक्तियाँ करती-कराती रही हैं। अल्लामा इकबाल ने शायद ऐसे ही धूर्त और पतित शिक्षितों के लिए लिखा है :-

‘तेरी बेइल्मी ने रख ली, बेइल्मों की शान।

आलिम-फ़ाज़िल बेच रहे हैं अपना दीन-ईमान।।’

अब प्राध्यापकों के भीतर पिछले दो दशकों से विशेष रूप से फैल चुके राजनीतिक सक्रियता के मर्ज के व्यसन से शिक्षक समाज बुरी तरह संक्रमित हो चुका है। गिरते राजनीतिक स्तर और सोशल मीडिया के दौर में ऊल-जुलूल बयान देना, टीवी डिबेट, मीडिया चैनलों के कार्यक्रमों और विभिन्न आयोजनों में तर्कहीन, लक्ष्यहीन, ध्येयहीन बहसबाज़ी और बयानबाज़ी करना प्राध्यापकों का शौक़ बन चुका है। महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के अतिथि प्राध्यापक द्वारा सोशल मीडिया पर नवरात्रि जैसे पवित्र त्योहार के विषय में आपत्तिजनक पोस्ट करना इसकी एक झलक है। हालाँकि इसकी उन्हें सज़ा मिली; लेकिन यह बयान उनकी विकृत मानसिकता को दर्शाता है। इससे पहले लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक एसोसिएट प्रोफेसर ने काशी विश्वनाथ मन्दिर पर विवादित बयान दिया। आख़िर उच्च शिक्षकों को यह ध्यान क्यों नहीं रहता कि विद्यालय, महाविद्यालय (कॉलेज) और विश्वविद्यालय शिक्षा के मन्दिर हैं, राजनीति और सामाजिक विघटनवाद की गन्दगी फैलाने के अखाड़े नहीं। छोटे शहरों के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की यह स्थिति है, तो देश की राजधानी दिल्ली के विश्वविद्यालयों में राजनीतिक दख़ल की सहज कल्पना की जा सकती है। वर्तमान परिस्थितियों के अवलोकन से प्रतीत होता है कि विश्वविद्यालय ऐसे तत्त्वों का गढ़ बनते जा रहे हैं, जिन्हें न अपने पद की गरिमा का ख़याल है, न समाज को गुमराह करने की अपनी हरकतों पर शर्म है, न शासन-प्रशासन का भय है और न ही राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का भान।

एक से डेढ़ लाख तक की मोटी तनख़्वाह पाने वाले इन आधुनिक गुरुओं की अकर्मण्यता का आलम यह है कि इनका एक बड़ा वर्ग समय से कॉलेज आना, नियमित कक्षाएँ लेना ज़रूरी नहीं समझता। शोध छात्रों के फाइलों के काम निपटाने के लिए प्रोफेसर्स की कौन कहे काम आगे बढ़ाने के लिए क्लर्क और चपरासी से लेकर फाइलों पर हस्ताक्षकर करने के एवज़ में विभागाध्यक्ष तक छात्रों से नोटों से भरे लिफ़ाफ़े लेते हैं। ये कोई निराधार आरोप नहीं है। सम्भव है कि आप अपने नज़दीकी महाविद्यालय या विश्वविद्यालय में जाकर जाँच करें, तो इससे भी विद्रूप स्थिति का सामना करना पड़े।

उदाहरणस्वरूप स्वनामधन्य मगध विश्वविद्यालय में किसी भी कोर्स की पढ़ाई पूरी करने में निर्धारित समय से दोगुना लगता है। कुछ दिन पहले तीन साल से लम्बित परिणामों को लेकर सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने पटना में प्रदर्शन किया। जब विद्यार्थी राज्यपाल से मिलने राजभवन की ओर बढ़े, तब पुलिस ने उन्हें बल प्रयोग करके रोक दिया। कुछ छात्राओं ने रोते हुए पुलिसकर्मियों का पैर भी पकड़े और विश्वविद्यालय प्रशासन की प्रताडऩा के जारी रहने पर आत्महत्या की बात भी कही; लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। युवाओं के भविष्य को रौंदने वाले शिक्षण संस्थान की इस अकर्मण्यता एवं निर्लज्जता की वीभत्सता को समझना होगा।

प्रसंगवश बताते चलें कि इसी मगध यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद अपने भ्रष्टाचार के कारनामों को लेकर सुर्ख़ियों में रहे थे। यूनिवर्सिटी में ख़रीदारी के नाम पर 30 करोड़ रुपये से ज़्यादा के ग़लत इस्तेमाल को लेकर उनके आवास, बोधगया के दफ़्तर और गोरखपुर स्थित घर पर छापेमारी हुई। गोरखपुर के उनके घर से 70,00,000 की भारतीय नक़दी, क़रीब 5,00,000 की विदेशी मुद्रा के अलावा 15,00,000 रुपये के ज़ेवर बरामद हुए। ज़मीन के कई काग़ज़ात, बैंक खातों में नक़दी और लॉकर में रखी दौलत अलग।

शिष्य को पुत्र के और शिष्या को पुत्री के समकक्ष मानने वाले भारतीय शिक्षण-परम्परा में प्राध्यापक वर्ग के नैतिक पतन की एक बानगी बोकारो के एक महाविद्यालय के उस प्रोफेसर की हरकत से पता चलती है, जिसने स्नातक अन्तिम वर्ष की छात्रा से अश्लील हरकत की और उसके मोबाइल में अश्लील वीडियो भेजे। प्रकरण सामने आने के बाद कई अन्य छात्राओं ने ऐसे उत्पीडऩ की शिकायत की। हालाँकि प्रोफेसर को गिरफ़्तार किया गया। लेकिन शिक्षा प्राप्त करने आयी इन छात्राओं पर इसका कितना बुरा असर पड़ा होगा, किसी को इसका अंदाज़ा है? यह कोई पहली या एकमात्र घटना नहीं है, बल्कि ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएँगे। सरकार और प्रशासनिक स्तर पर तो शिक्षण संस्थानों में बदलाव की उम्मीद छोड़ ही दें। लेकिन अगर किसी विश्वविद्यालय का कुलपति या उप कुलपति निजी स्तर पर सुधार का प्रयास करे, तो प्राध्यापकों से लेकर कर्मचारी तक अपने संगठनों के बल पर एकत्रित होकर आन्दोलन पर उतर आते हैं। एक समय विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों के कैंपस में छात्र राजनीति के आवरण में बढ़ रही अराजकता एवं गुंडागर्दी को रोकने के लिए जिस तरह लिंगदोह कमेटी की सिफ़ारिशों ने एक अवरोधक का कार्य किया और छात्र राजनीति की दशा-दिशा बदल दी। उसी प्रकार प्राध्यापकों एवं विश्वविद्यालय कर्मचारियों की वर्तमान कार्यशैली के विरुद्ध भी किसी निर्णायक और नियंत्रणकारी प्रयास की आवश्यकता है।

देश में प्राध्यापकों की नियुक्ति में भी ए.पी.आई. स्कोर महत्त्वपूर्ण होता हैं, जिसका निर्धारण शैक्षणिक योग्यता के अतिरिक्त शोध पत्रों का प्रकाशन, शिक्षा के क्षेत्र में प्राप्त सम्मान आदि से होता है। लेकिन अब इसके मानक भी समुचित एवं प्रामाणिक नहीं हैं। इसी वजह से अब शिक्षकों की भर्ती में धाँधली हो रही है। कई प्रकार की अनाम संस्थाएँ पैसा बटोरने के लिए सम्मान समारोह और शोधशालाएँ आयोजित करवाकर अपात्रों को प्रमाण-पत्र वितरित करतीं हैं, जिनके आधार पर परीक्षार्थी की योग्यता निर्धारित होती है। इसके लिए 1,500 रुपये से 5,000 रुपये या उससे अधिक का शुल्क भी वसूलती हैं। शोध पत्रों के प्रकाशन के लिए प्री-रिव्यू और यूजीसी केयर लिस्ट जर्नल की मान्यता है, जिसके सम्पादकों द्वारा शोधार्थियों से 2,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक वसूले जाते हैं। यही नहीं, 5,000 से 10,000 रुपये का शुल्क वसूलकर शोध-पत्र लिखने वाले को शोध प्रकाशित करवाने वाले गिरोह भी लूटते हैं। इन विसंगतियों के बीच बची-खुची कसर पैसा, पहुँच और राजनीतिक दबाव द्वारा पूरी हो जाती है।

ऊपर से जिस पीएचडी की डिग्री को ए.पी.आई. स्कोर में सबसे ज़्यादा अंक मिलते हैं, उसे देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में ठेके पर पूरी करवाये जाने की बात सर्वविदित है। विसंगति देखिए कि एक प्रकाशित शोध-पत्र के लिए दो अंक दिये जाते हैं और दो अंक ही एक वर्ष शिक्षण के अनुभव पर दिये जाते हैं। विमर्श के लिए ऐसे और भी कई मसले हैं। हाल में यूजीसी के अध्यक्ष एम. जगदीश कुमार ने असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति के नये मानक घोषित करते हुए इस पर एक समिति गठित करने की घोषणा की है। यह एक राहत भरी बात है; लेकिन सकारात्मक परिवर्तन के लिए अभी लम्बे संघर्ष और दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

देश में निम्न स्तर के शोधों को लेकर सरकार की लम्बे समय से शिकायत रही है। लेकिन उसे इसकी वजह भी जानने-समझने का प्रयास करने चाहिए और सरकारी संरक्षण में पल रहे विश्वविद्यालयों के भ्रष्ट तत्त्वों की जाँच करानी चाहिए। आज देश में लगभग 1,000 विश्वविद्यालयों और 40,000 से अधिक महाविद्यालयों के होते हुए भी ग्लोबल टैलेंट कॉम्पिटिटिव इंडेक्स के 132 देशों की फ़ेहरिस्त में भारत का स्थान 72वाँ क्यों है? दुनिया की महाशक्ति होने का दावा करने वाले भारत में उच्च शिक्षा गृहण करने वाले विदेशी छात्रों की हिस्सेदारी महज़ एक फ़ीसदी क्यों है? जाहिर है कि उच्च शिक्षा की दुरावस्था और धीमी गति ही इसका परिणाम है और यह भारत की उच्च शिक्षा नीति के मूलभूत दोषों का प्रत्यक्ष प्रमाण है। आज अनैतिकता से भरे ये शैक्षणिक केंद्र और शिक्षक नैतिकतावादी, चरित्रवान विद्यार्थी और देश को समर्पित भले नागरिक कैसे तैयार कर रहे हैं? यह चिन्ता का विषय है।

(लेखक राजनीति एवं इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

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उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की नियुक्ति की मज़ूरी यूजीसी का बेहतर क़दम

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में प्राध्यापकों की नियुक्ति की पात्रता निर्धारित करने वाली संस्था विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने हाल ही में विश्वविद्यालय तथा कॉलेज स्तर पर प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी है। यूजीसी द्वारा जारी दिशा-निर्देश के अनुसार, अब देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में पेशेवर विशेषज्ञों को प्रैक्टिस के प्रोफेसर्स के रूप में बिना औपचारिक अकादमिक योग्यता के (बिना पीएचडी एवं राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा पास किये) नियुक्त किया जा सकेगा। इस व्यवस्था के तहत उम्मीदवार को अपने क्षेत्र में विशिष्टता हासिल होनी चाहिए तथा उसके पास 15 साल का कार्य अनुभव होना चाहिए। अभी तक उच्च शिक्षण संस्थानों में प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए नेट या पीएचडी होना ज़रूरी होता था।

इस नियुक्ति का आशय उच्च शिक्षण में व्यावहारिक अनुभव को तवज्जो देना है। ऐसा माना जा रहा है कि इस व्यवस्था से फैकल्टी के स्तर पर विविधता आएगी और छात्रों को प्रैक्टिस के प्रोफेसर्स द्वारा वर्तमान समय में नौकरी के लिए ज़रूरी स्किल्स का पता चलेगा। सम्बन्धित दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी संस्थान में कुल स्वीकृति पदों के 10 फ़ीसदी पद प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के होंगे। यह संस्थानों को तय करना होगा कि वे किस क्षेत्र से विशेषज्ञों को लेना चाहते हैं। इस व्यवस्था के तहत इंजीनियरिंग, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, वाणिज्य, उद्यमिता, क़ानून, फाइन आट्र्स, मीडिया, सिविल सेवा, सशस्त्र बलों और लोक प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को लाया जाएगा। यूजीसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रैक्टिस के प्रोफेसर को एक ख़ास समय अवधि के लिए ही नियुक्त किया जाएगा। नियुक्त प्राध्यापक अधिकतम चार वर्ष तक किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान में पढ़ा सकेंगे। प्रैक्टिस के प्रोफेसर्स पाठ्यक्रम के निर्माण में अपनी भूमिका निभाने के साथ-साथ शोध परियोजनाओं पर भी कार्य कर सकते हैं।

भारतीय मीडिया में भले ही प्रैक्टिस के प्रोफेसर पर अब बातें होनी शुरू हुई हों; लेकिन पश्चिमी देशों के विभिन्न क्षेत्रों के टॉप संस्थानों में यह व्यवस्था पहले से ही प्रचलन में है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों तथा भारतीय प्रबंधन संस्थानों में इस तरह की व्यवस्था पहले से ही प्रचलन में है। लेकिन यूजीसी की तरफ़ से इनकी नियुक्ति को हरी झण्डी मिलने के बाद देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में यह योजना व्यापक स्तर पर देखने को मिलेगी। इसमें कोई दो-राय नहीं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में इस व्यवस्था के तहत सिद्धांत एवं अभ्यास के एक साथ समायोजन से छात्रों को इसका लाभ मिलेगा।

21वीं सदी में शिक्षा के क्षेत्र में बदलते परिवेश को देखते हुए प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस पद का समायोजन समय की माँग है। हालाँकि कई विद्वानों के मन में इनकी नियुक्ति की पारदर्शिता को लेकर संशय है। ऐसे में बेहतर होता कि साक्षात्कार और लिखित परीक्षा दोनों के संयोजन के माध्यम से इन्हें चुना जाता। केवल साक्षात्कार के माध्यम से चयन में एक तो अनावश्यक अभ्यर्थियों की भीड़ बढ़ेगी, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसा सम्भव है कि जिस संस्थान में प्रैक्टिस के प्रोफेसर की नियुक्ति की जा रही हो, वहाँ के प्रशासन प्रमुखों से कोई अभ्यर्थी साँठगाँठ करके नौकरी पाने की जुगत करे; जैसा कि अभी तक देश के कई उच्च शिक्षण संस्थानों में होते आया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का जोर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर है और प्रैक्टिस के प्रोफेसर्स की नियुक्ति इसको मज़बूती देगी तथा छात्रों में नवाचार की भावना को प्रोत्साहित करेगी। यह दु:खद बात है कि देश के सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों में आज भी असिस्टेंट प्रोफेसर्स, एसोसिएट प्रोफेसर्स तथा प्रोफेसर्स के कई पद रिक्त हैं, जिसका सीधा सम्बन्ध गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जुड़ा है।

आज देश में कई सरकारी संस्थान ऐसे हैं, जिनमें न तो नियुक्तियाँ समय से होती हैं और न ही वे यूजीसी के दिशा-निर्देशों को गम्भीरता से पालन करते हैं। ऐसे में यूजीसी को नये सिरे से सभी सरकारी संस्थानों को एक नोटिस जारी करके उन पर दबाव बनाना चाहिए, ताकि एक निश्चित समय सीमा के अन्दर नियुक्तियाँ हो सकें और बिना बाधा के गुणवत्तापूर्ण शिक्षण जारी रहे। केंद्र तथा सभी राज्य सरकारों को भी इस ओर शीघ्रता से ध्‍यान देने की ज़रूरत है।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)

उत्तर प्रदेश में शिक्षा की दशा

उत्तर प्रदेश में सरकारी विद्यालयों की दशा किसी प्रदेशवासी से छिपी नहीं है। योगी आदित्यनाथ सरकार इन विद्यालयों के सुधार में तो लगी है मगर बड़े अनोखे रूप से। योगी आदित्यनाथ सरकार का यह अनोखा रूप सरकार के प्राइमरी जूनियर विद्यालयों को निजी विद्यालयों को गोद देने का है। योगी आदित्यनाथ सरकार का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने के लिए उसने एक प्रयोग किया है। इसका सकारात्मक नतीजा शीघ्र ही देखने को मिलेगा।

एक निजी विद्यालय के संचालक एवं प्राधानाध्यक प्रेमपाल गंगवार कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने सरकारी विद्यालयों को गोद देने का जो निर्णय किया है, उससे निजी विद्यालयों के संचालकों को प्रसन्नता है कि उन्हें सरकार विद्यालयों को भी संचालित करने का अवसर प्राप्त होगा। उनका कहना है कि प्रदेश में निजी विद्यालयों के विद्यार्थियों का ज्ञान सरकारी विद्यालयों के बच्चों के ज्ञान से कहीं अच्छा है। निजी विद्यालयों के बच्चों का परीक्षा परिणाम भी सरकारी विद्यालयों के बच्चों से अच्छा आता है। ऐसे में अगर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने निजी विद्यालयों पर सरकारी विद्यालयों में सुधार का भरोसा जताया है, तो यह निजी विद्यालयों के संचालकों एवं अध्यापकों के लिए गौरव की बात है।

नाम प्रकाशित न करने प्रार्थना करते हुए एक सरकारी प्राइमरी विद्यालय के अध्यापक ने कहा कि सरकार जो भी करे, उसे ठीक कहना सरकारी अध्यापकों की मजबूरी तो हो सकती है, मगर कोई भी सरकारी अध्यापक सरकार के इस निर्णय से प्रसन्न नहीं है। क्योंकि सरकारी अध्यापकों को सरकार निकम्मा समझ रही है, तभी उसने निजी विद्यालयों के हाथों में सरकारी विद्यालय सौंपने का निर्णय लिया है। यह तो सरकारी अध्यापकों की योग्यता एवं शिक्षा पर उँगली उठाने जैसी बात है। इसके अतिरिक्त सरकारी अध्यापकों में असुरक्षा की भावना जन्म ले रही है कि कहीं ऐसा न हो कि आने वाले समय में योगी सरकार सरकारी विद्यालयों में रिक्त पड़े पदों पर भर्तियां ही न करे तथा सरकारी अध्यापकों को भी ठेंगा दिखा दे।

विदित हो कि योगी आदित्यनाथ सरकार सरकारी प्राइमरी जूनियर विद्यालयों को गोद लेने का आदेश जारी कर चुकी है। सूत्रों की मानें तो बेसिक शिक्षा परिषद् के विद्यालयों के कायाकल्प के लिए सरकार अब निजी कम्पनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी, सामुदायिक सहयोग, प्रतिष्ठित एवं इच्छुक व्यक्तियों से सहयोग ले सकती है। इसका एक अर्थ यह निकलता है कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के पास अब विद्यालय चलाने के लिए बजट नहीं है अथवा उसकी नीयत इन विद्यालयों के निजीकरण की है। क्योंकि अगर निजी विद्यालय सरकारी विद्यालयों को गोद लेंगे, तो भविष्य में सरकारी विद्यालयों में पढऩे वाले बच्चों को भी निजी विद्यालयों की तरह ही मोटा शुल्क देकर पढ़ाई करनी पड़ सकती है।

अगर उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्यालयों पर दृष्टिपात करें, तो पता चलता है कि इन विद्यालयों में पूर्ण सुविधाओं का नितांत अभाव है। कई विद्यालय भवन जर्जर अवस्था में हैं। अधिकतर विद्यालयों में बच्चों के बैठने की समुचित व्यवस्था नहीं है। बच्चियों के लिए शौचालयों की व्यवस्था भी कई विद्यालयों में बहुत अच्छी नहीं है। अध्यापकों की भी सरकारी विद्यालयों में कमी है। मिड-डे मील में पौष्टिकता की कमी के अतिरिक्त भोजन विवरणिका के अनुसार बच्चों के भोजन की व्यवस्था भी अधिकतर विद्यालयों में अच्छी नहीं है। इस बारे में कई समाचार भी प्रकाशित हो चुके हैं।

पिछले महीने ही उत्तर प्रदेश के कुछ सरकारी विद्यालयों द्वारा रद्दी के भाव 10 रुपये प्रति किलो के हिसाब से किताबें बेचने का आरोप भी लगा था। इसके अतिरिक्त सरकारी विद्यालयों के बच्चों को पाठ्य सामग्री का वितरण भी पूरी तरह नहीं हो सका है। पिछले महीने जब बच्चों को पाठ्य सामग्री वितरण न होने के समाचार प्रकाशित हुए, तो सरकार ने दावा किया कि 92 प्रतिशत किताबें वितरित हो चुकी हैं, केवल आठ प्रतिशत किताबों का वितरण शेष है।

अब सरकारी विद्यालयों को गोद लेने का निर्णय लेते हुए योगी आदित्यनाथ सरकार ने 27 सुविधाओं की सूची जारी की है। प्रश्न यही है कि निजी विद्यालयों के संरक्षण में जाने पर क्या सरकारी विद्यालयों में सुधार हो सकेगा?