NTR के पदचिन्हों पर चले Vijay, दो साल में ढहा दिए सत्ता के पुराने किले  

सिनेमाई करिश्मा बना राजनीतिक हकीकत: तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में टीवीके की बढ़त ने स्थापित किया नया कीर्तिमान; एनटीआर के बाद सबसे कम समय में सत्ता के करीब पहुंचने वाले दूसरे अभिनेता बने विजय…

थलापति का ‘सुपरहिट’ पॉलिटिकल डेब्यू: विजय ने तोड़ा चिरंजीवी और कमल हासन की विफलता का चक्र…(Photo Source: Thalapathy Thamizhaga Vetri Kazhagam/Facebook)
थलापति का ‘सुपरहिट’ पॉलिटिकल डेब्यू: विजय ने तोड़ा चिरंजीवी और कमल हासन की विफलता का चक्र…(Photo Source: Thalapathy Thamizhaga Vetri Kazhagam/Facebook)

हैदराबाद/चेन्नई। तमिलनाडु की राजनीति में सोमवार को एक नया इतिहास लिखा गया, जब थलापति विजय की ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) ने बहुमत के जादुई आंकड़े की ओर कदम बढ़ाकर द्रविड़ राजनीति के दशकों पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया। विजय की यह अविश्वसनीय सफलता सीधे तौर पर तेलुगु सिनेमा के दिग्गज और आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन. टी. रामाराव (एनटीआर) की याद दिलाती है। 234 सदस्यीय विधानसभा में 118 के जादुई आंकड़े की ओर बढ़ती टीवीके ने यह साबित कर दिया है कि फिल्मी लोकप्रियता को ठोस चुनावी सफलता में कैसे बदला जाता है।

विजय अब भारतीय राजनीति के उन विरल नायकों में शामिल हो गए हैं जिन्होंने पार्टी गठन के मात्र दो वर्षों के भीतर सत्ता की दहलीज को छू लिया। इससे पहले 1983 में एनटीआर ने महज नौ महीने के भीतर कांग्रेस के 27 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका था। हालांकि तमिलनाडु के अपने नायक एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) को भी सत्ता तक पहुंचने में पांच साल (1972 से 1977) का वक्त लगा था, लेकिन विजय ने इस गति को और तेज कर दिया है।

थलापति का ‘सुपरहिट’ पॉलिटिकल डेब्यू…(Photo Source: Thalapathy Thamizhaga Vetri Kazhagam/Facebook)

विजय की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दक्षिण भारत के कई अन्य सुपरस्टार्स इस मोर्चे पर विफल रहे हैं। चिरंजीवी की ‘प्रजा राज्यम’ तीन साल में ही कांग्रेस में विलीन हो गई, जबकि कमल हासन की ‘मक्कल नीधि मय्यम’ चुनावी मैदान में संघर्ष करती नजर आई। यहां तक कि पवन कल्याण को भी अपनी पहचान बनाने के लिए एक दशक का इंतजार और गठबंधन का सहारा लेना पड़ा।

विजयकांत ने ‘कैप्टन’ के रूप में शुरुआत तो दमदार की थी, लेकिन वे कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच सके। ऐसे में विजय का सीधे द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसी दिग्गज पार्टियों को पछाड़ना यह दर्शाता है कि तमिलनाडु की जनता ने एक नए विकल्प को पूर्ण स्वीकारोक्ति दे दी है। यह केवल एक फिल्म सितारे की जीत नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति की परिणति है।